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Sunday, 27 May 2012

दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27 May 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भारी पड़ गए। पार्टी में संघ की नहीं चली और संजय जोशी को भाजपा कार्य समिति की बैठक से पहले बाहर का रास्ता दिखाना ही पड़ा। मोदी के दबाव में गडकरी और संघ नतमस्तक दिखे। पार्टी सूत्रों ने बताया कि मोदी ने साफ कहा कि अगर कार्य समिति में संजय जोशी आए तो बैठक से खुद को दूर रखने को मजबूर होंगे। गडकरी ने बुधवार शाम को फोन से बात की थी। गडकरी ने कोर कमेटी की बैठक में मोदी से बातचीत का सार रखा। सूत्रों के मुताबिक कुछ वरिष्ठ भाजपा नेता मोदी की धमकी को स्वीकार्य करने के इच्छुक नहीं थे मगर गडकरी और संघ के दबाव के चलते संजय जोशी को दो लाइन का इस्तीफा फैक्स से भेजना पड़ा। दरअसल मोदी और गडकरी में सौदे की सुगंध आ रही है। मोदी ने शर्त रखी कि जोशी को बाहर करो और गडकरी ने शर्त रखी कि मुझे दूसरा कार्यकाल देने का आप समर्थन करें। अब लगता है कि गडकरी के दूसरे कार्यकाल मिलने में सभी रुकावटें दूर हो गई हैं और उन्हें दूसरा कार्यकाल मिलना लगभग तय है। गडकरी का तीन साल का कार्यकाल 25 दिसम्बर को पूरा हो रहा है। इस प्रस्ताव के लिए बाकायदा संगठन के संविधान में संशोधन किया जाना प्रस्तावित था, जिसे अमली जामा पहनाया गया। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने औपचारिक रूप से बैठक में अध्यक्ष के कार्यकाल को एक्सटेंशन दिए जाने का प्रस्ताव रखा जिसका दूसरे पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने अनुमोदन किया। इस सौदे का एक पहलू यह भी है कि केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य छत्रप के प्रभाव को स्वीकार कर लिया है। यह न तो भाजपा के लिए अच्छा संकेत है और न ही संघ के लिए। राष्ट्रीय पार्टी की छवि को लेकर जिस भाजपा को राष्ट्रवाद और अनुशासन के लिए जाना जाता था अब उस सिद्धांत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। भाजपा का बौना होता नेतृत्व और उस पर हावी होते राज्य छत्रप संघ के लिए चुनौती बन गए हैं। राजस्थान में वसुंधरा राजे, गुजरात में नरेन्द्र मोदी और कर्नाटक में वीएस येदियुरप्पा से जो चुनौतियां मिल रही हैं वह भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभरने से भी रोक रही है। भाजपा अध्यक्ष गडकरी के कार्यकाल को बढ़ाकर संघ भाजपा पर अपनी पकड़ जरूर साबित करना चाह रहा है लेकिन वह इकबाल और इस्तकबाल नहीं दिख रहा जो भाजपा में पहले होता था। भाजपा के इतिहास में यह पहला मौका है जब भाजपा को संघ की ओर से नियुक्त करवाए गए व्यक्ति को हटाना पड़ा है। इससे भी साबित होता है कि संघ की भाजपा पर पकड़ कमजोर होती जा रही है। हमें लगता है कि भाजपा के अन्दर भी ऐसे नेता हैं जो चाहते हैं कि संघ की भाजपा मामलों में दखलअंदाजी कम हो। पूरे प्रकरण में जहां नरेन्द्र मोदी की जीत हुई है वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक मायने में हार हुई है। इससे नरेन्द्र मोदी का कद और बढ़ेगा और दुनिया को उन्होंने साबित कर दिया कि दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए।
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Tuesday, 24 April 2012

भाजपा में सत्ता की तीन धुरियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी में नगर निगम चुनाव जीतने के बाद एक नया उत्साह है। उन्हें लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बाजी मार सकती है पर सबसे बड़ी कमी जो उभर कर आ रही है वह है क्लीयर नेतृत्व का अभाव। यह किसी से छिपा नहीं कि पार्टी के एक बड़े धड़े खासकर सांसदों के मन में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था कि आखिर यूपीए-2 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के मुद्दे पर घिरी रही। लेकिन सरकार की विफलता का भाजपा को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। इसके चलते केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए पार्टी को लोकसभा चुनाव पूर्व अपना पीएम उम्मीदवार घोषित करने की दरकार है। इस समय यह स्थिति है कि भाजपा तीन धुरियों पर चल रही है। सबसे पहले हैं श्री नितिन गडकरी जो पार्टी अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन है। दूसरी तरफ हैं डी-4 नेता। इनमें आडवाणी जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली प्रमुख हैं। तीसरी धुरी नरेन्द्र मोदी हैं जो अपने आपको पार्टी से ऊपर मानते हैं और प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार मानते हैं। इन तीनों धुरियों में सभी नेता अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। नितिन गडकरी के एक तरफ नरेन्द्र मोदी से मतभेद हैं वहीं दूसरी ओर 5-4 से अकसर खींचतान होती रहती है। ताजा उदाहरण सुरेन्द्र सिंह आहलूवालिया का पहले राज्यसभा से टिकट काटना और फिर जब डी-4 ने जोरदार विरोध किया तो उन्हें फिर से उम्मीदवार घोषित करना। कई माह से गडकरी और नरेन्द्र मोदी के बीच बातचीत तक नहीं हो रही है। संवादहीनता की इस स्थिति को गडकरी ने खुद स्वीकारा है। सवाल यह भी किया जा रहा है कि गडकरी ने मोदी से संवादहीनता की बात सार्वजनिक रूप से क्यों कही? यह बात किसी से छिपी नहीं कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को पुन भाजपा में सक्रिय किए जाने के फैसले से नाराज हैं। गडकरी ने संजय जोशी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खासा महत्व दिया। इसी के बाद दोनों में `कुट्टी' हो गई। रहा सवाल भाजपा की ओर से कौन होगा पीएम उम्मीदवार तो भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने गुरुवार को हैदराबाद में कहा कि अगले आम चुनाव से पहले पार्टी अपना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित कर देगी। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले हम अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे, अभी हम अपना उम्मीदवार बताने की स्थिति में नहीं हैं। उधर नरेन्द्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में आने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। पिछले दिनों प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के विरोध में सारे मुख्यमंत्री दिल्ली में एकत्र हुए थे। मोदी ने विशेष रूप से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और बीजू जनता दल प्रमुख और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ बैठक की। हालांकि ऊपरी स्तर पर तो यह बैठक केंद्र सरकार के प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र को लेकर थी पर अन्दर खाते 2014 लोकसभा चुनावों पर भी चर्चा हुई होगी। मोदी ने अपने आपको पीएम उम्मीदवार दर्शाने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं। आने वाले दिनों में यह अंतर्पलह और तेज होना स्वाभाविक है।
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Sunday, 11 December 2011

महंगाई की बहस में सुषमा व प्रणब दा की नोकझोंक


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11th December 2011
अनिल नरेन्द्र
संसद चलते ही विपक्ष ने महंगाई के मोर्चे पर मनमोहन सरकार पर करारा हमला बोल दिया। इस मुद्दे पर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज का भाषण महत्वपूर्ण था। उनके और वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के बीच नोकझोंक भी महत्वपूर्ण रही। यह देखकर अच्छा लगा कि भारत की जनता की सबसे बड़ी समस्या पर दोनों,विपक्ष और सरकार जागरूक हैं और जनता को इससे निजात दिलवाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। सुषमा स्वराज व अन्य विपक्षी नेताओं ने महंगाई पर चर्चा में सरकार की नीतियों, नीयत, वादों और इरादों की धज्जियां उड़ा दीं। बहस की शुरुआत माकपा नेता गुरुदास दासगुप्ता ने की,लेकिन सरकार पर करारा हमला सुषमा ने बोला। जब प्रणब मुखर्जी ने महंगाई दर 11.8 फीसदी से घटकर 6.6 फीसदी आने की बात कही तो सुषमा ने कहा रेहड़ी, बेड़ी और छाबड़ी वाले फीसदी की भाषा नहीं समझते, उन्हें बस यह पता होता है कि कितना पैसा आता है और जाता है। तीखा कटाक्ष करते हुए सुषमा ने कहा कि इस सरकार का अमीरी का पैमाना तो पाव भर आटा, दो तोला दाल, एक चम्मच तेल और एक चुटकी नमक है। देश के 121 करोड़ लोगों को तो दो वक्त की रोटी चाहिए। इसके लिए उनके पास 242 करोड़ हाथ हैं, लेकिन ब्याज दर बढ़ाकर महंगाई घटाएंगे तो इन हाथों का काम जरूर छिन जाएगा। उन्होंने कहा कि राजग के शासन में वित्तमंत्री फीसदी में बजट नहीं देते थे। हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को हार्वर्ड और आक्सफोर्ड वाले नहीं समझ सकते। उन्होंने कहा कि अमेरिका के सामने छवि सुधारने से सुधार नहीं होता,उसके लिए गरीब आदमी की आमदनी सुधरनी चाहिए। मूल्य वृद्धि के लिए सरकार की गलत नीतियों और भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराते हुए सुषमा ने कहा कि अगर सरकार जनता को राहत देने की बजाय निराशा एवं हताशा की बात करती है तो उसे सत्ता से हट जाना चाहिए। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के साथ हुई नोकझोंक में सुषमा ने पलटवार करते हुए कहा कि आंकड़ेबाजी से भूखी जनता का पेट नहीं भरता है। शुक्रवार को भी प्रणब और सुषमा के बीच महंगाई पर नोकझोंक जारी रही। गुरुवार को सुषमा ने प्रणब से कहा था कि पेट आंकड़ों से नहीं भरता,दानों से भरता है। इसके लिए आम आदमी को जद्दोजहद करनी पड़ रही है। शुक्रवार को प्रणब ने विपक्ष खासकर भाजपा पर पलटवार करते हुए कहा कि समय अब (इमोशनल) बातों का नहीं, काम करने का है। अगर महंगाई कम करनी है तो विपक्ष को साथ मिलकर काम करना होगा। वह महंगाई घटाने का कोई सुझाव क्यों नहीं देता? आर्थिक मामलों में सहयोग क्यों नहीं करता?प्रणब दा ने कहा कि क्या विपक्षी नेता चाहते हैं कि हम तेल कम्पनियों पर इतना घाटा थोप दें कि वे एक दिन बन्द हो जाएं। सुषमा से बात करने के लहजे में प्रणब ने कहा कि विपक्ष के लोग खुलकर बताएं कि वे चाहते क्या हैं। वे चाहते हैं कि सब्सिडी बढ़ाई जाए या सब्सिडी कुछ सेक्टरों तक ही सीमित रहे। सरकार जो कर रही है वह उन्हें मंजूर नहीं है। अगर मंजूर नहीं है तो वे सरकार को बताएं कि क्या करना है? बेशक यह सही है कि अगर विपक्ष के पास कुछ ठोस सुझाव हों तो वह सरकार को जरूर दे पर हम प्रणब दा को बताना चाहेंगे कि सरकार चलाना, नीतियां तय करना, जनता को राहत पहुंचाना सरकार का काम है, विपक्ष का नहीं। आज वह अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती। अगर सरकार गम्भीर है तो सबसे पहले अमेरिका परस्त प्रधानमंत्री और उनके सिपहसालार योजना आयोग के अध्यक्ष की नीतियों को ठुकरा दे और उनकी जगह प्रणब दा आप खुद नीतियां बनाएं। आप इन दोनों से कहीं ज्यादा बेहतर अर्थशास्त्रा हैं और राजनेता हैं जो आम आदमी के दुःख-दर्द को बेहतर समझते हैं। अर्थशास्त्रा प्रधानमंत्री ने तो देश का अर्थशास्त्र ही बिगाड़कर रख दिया है।
Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Pranab Mukherjee, Sushma Swaraj, Vir Arjun

Sunday, 27 November 2011

शरद पवार को थप्पड़ आखिर क्यों पड़ा?



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th November 2011
अनिल नरेन्द्र
बृहस्पतिवार को नई दिल्ली के एनडीएमसी सेंटर में इफ्को के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आए केंद्रीय कृषि मंत्री ने कभी अन्दाजा नहीं लगाया होगा कि उस दिन उनसे क्या घटना घटेगी। कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए पवार जब बाहर की तरफ बढ़े तभी एक सिख युवक ने आगे बढ़कर उनके मुंह पर तमाचा मार दिया। पवार को समझ नहीं आया कि क्या हुआ। वह चुपचाप आगे बढ़ गए। मंत्री के स्टाफ की धक्का-मुक्की से नाराज युवक ने अपनी कृपाण निकाल ली। विरोधस्वरूप अपने हाथ पर वार भी किया। एनडीएमसी के गार्डों ने युवक को बड़ी मुश्किल से काबू कर पुलिस को सौंपा। हमलावर युवक का नाम हरविन्दर सिंह है और वह दिल्ली के विजय विहार में रहता है। वह नारा लगा रहा था, `वह भ्रष्ट हैं।' मैं यहां मंत्री को थप्पड़ मारने ही आया था। वे सभी भ्रष्ट हैं। उसने आगे कहा कि आज गुरु तेग बहादुर की शहादत का दिन है। हालात और भी बुरे हो सकते थे। मैंने ही रोहिणी कोर्ट में सुखराम को भी मारा था। मैं सिख हूं, चप्पल नहीं मारूंगा। सिर्प भाषण देते हो। भगत सिंह को भूल गए जिसने कुर्बानी दी। मारो-मारो मुझे खूब मारो। पागल...हूं मैं। इनके पास घोटालों के अलावा कुछ नहीं है। मैं गलत नहीं हूं।
शरद पवार पर तमाचे की गूंज ने दिल्ली की सियासत को हिला दिया है। विपक्ष ने इस घटना की निन्दा तो की है, लेकिन इसे महंगाई से उपजा गुस्सा करार देकर सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। वहीं कांग्रेस ने इस घटना के लिए भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के गैर जिम्मेदाराना बयान पर निशाना साधा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पवार से बातचीत कर पूरे घटनाक्रम की निन्दा की। कांग्रेस के संसदीय कार्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि यशवंत सिन्हा के बयान, महंगाई नहीं रुकी तो हिंसा होगी, वापस होना चाहिए। ऐसी धारणा बनाना गलत है। वहीं भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि यह शख्स मेरे बयान से पहले ही सुखराम को भी थप्पड़ मार चुका है। ऐसे में इसे मुझसे जोड़ा जाना ठीक नहीं है। भाजपा की ही सुषमा स्वराज की टिप्पणी थी, भाजपा इसकी निन्दा करती है। अहिंसक तरीके से जताया जाना चाहिए अपना मतभेद। पवार उम्र के कारण आदर योग्य हैं। वहीं सबसे दिलचस्प टिप्पणी अन्ना हजारे की थी। अन्ना हजारे ने पवार पर हमले की सूचना मिलने पर पहली प्रतिक्रिया के तौर पर पूछा, `केवल एक थप्पड़?' बाद में उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि पवार को थप्पड़ पड़ा लोकतंत्र को तमाचा है। जनता में इस घटना की क्या प्रतिक्रिया हुई, कुछ टिप्पणियां प्रस्तुत हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को पड़ा थप्पड़ किसी नेता या मंत्री पर नहीं बल्कि इनके द्वारा बनाई गई उस व्यवस्था पर है जिससे आम लोगों का पूरा बजट गड़बड़ा गया है। वह आम आदमी क्या करे, जिसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया हो। दिल्ली वालों ने इसी तरह की प्रतिक्रिया दी। `महंगाई घरों की किचन के साथ लोगों के सपनों पर भी हमला कर रही है। एक इंसान अपने बच्चे को पढ़ाकर कुछ बनाने के सपने देखने से पहले यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि उसके लिए पैसे कैसे बचाए' कोटला की एक महिला की प्रतिक्रिया थी। मयूर विहार की एक कामकाजी महिला ने कहा कि यह थप्पड़ एक आदमी का नहीं, पूरे देश की जनता का है। देश के नेताओं और मंत्रियों को यह समझ जाना चाहिए कि जनता अपने तरीके से जवाब देना सीख रही है। उसे पांच साल तक बहला-फुसलाकर बेवकूफ नहीं बना सकते हैं। कोटला फिरोजशाह की एक महिला का कहना था कि परेशानी है तभी तो लोग ऐसा करने को मजबूर हो रहे हैं। मंत्री दफ्तर में बैठकर जो नीति तैयार करते हैं, वह आम आदमी की कमर तोड़ने वाली होती है। ऐसे में लोग क्या करें? उनके पास कोई विकल्प नहीं है। सेवा नगर में एक सियासी कार्यकर्ता का कहना था कि परेशानी अपनी जगह है, लेकिन हर जगह थप्पड़ मारना ठीक नहीं है। सबक सिखाना है तो चुनाव में सिखाएं। लेकिन लोग भी क्या करें जब उनके प्रतिनिधि उम्मीद पर खरे नहीं उतरते तो वह तनाव में आ जाते हैं और यही तनाव थप्पड़ के रूप में दूर होता है। एक व्यवसायी की टिप्पणी थी, `सरकार जब सो रही हो तो उसे जगाने के लिए इससे बेहतर तरीका और कुछ नहीं हो सकता।' सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता आरके शर्मा का मानना है कि लोगों का गुस्सा जायज है। मंत्री, नेता और उनके रिश्तेदार करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं और आम आदमी भरपेट खाने से पहले भी सोचता है। यह स्थिति खतरनाक है और देश के नीति-निर्धारकों को अब गम्भीरता से जनता के दुःख-दर्द के बारे में सोचना ही होगा। मैक्स अस्पताल के मनोचिकित्सक डाक्टर समीर पारिख का कहना है कि अपने आक्रोश को निकालने का यह तरीका काफी कैट कहा जा सकता है, जब लोग दूसरे की नकल करते हुए किसी पर हमला करते हैं और उसे चोट पहुंचाते हैं तो वह चीप पब्लिसिटी के भूखे होते हैं। हमला करने वाला पहले की घटना से कहीं न कहीं प्रेरित होता है और उसे लगता है कि उसे भी लोगों का आकर्षण मिल सकता है।
शरद पवार पर हुए हमले से सियासी पारा भी तेज होगा। पवार की पार्टी राकांपा अन्दरखाते कांग्रेस से बेहद नाराज है। उसे लग रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस ने पवार को महंगाई का प्रतीक बनाया, उसकी वजह से हालात यहां तक पहुंचे। यद्यपि तुरन्त कांग्रेस के नेता पवार के बचाव में जरूर उतरे, लेकिन राकांपा इस घटना से बेहद व्यथित है। भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि बड़े नेताओं की सुरक्षा पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। पवार पर हमले के बाद महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में पार्टी कार्यकर्ताओं के उग्र रवैये पर पटेल ने संयम रखने की अपील की। मामले के पीछे भाजपा का हाथ होने का खुद पवार ने ही काट किया। उन्होंने कहा, मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी राजनीतिक दल का हाथ है। इस बारे में पार्टी इसलिए भी नाराज है कि कांग्रेस लगातार महंगाई के मसले पर शरद पवार को ही आगे करती रही है। बेशक भ्रष्टाचार और महंगाई से देश त्रस्त है और भारी गुस्से में है लेकिन इसका समाधान यह नहीं है कि हम चारों तरफ आग लगाना शुरू कर दें और जो सामने आए टूट पड़ें। इससे समाधान तो क्या निकलेगा, हां चारों ओर अराजकता जरूर फैल जाएगी। वहीं राजनीतिज्ञों को भी समझ लेना चाहिए कि पब्लिक का मूड क्या है। हमारे सामने मध्य पूर्व का उदाहरण है जहां एक छोटी-सी चिंगारी ने देश में आग लगा दी थी। सियासतदानों को इस किस्से से डरना चाहिए और सबक लेना चाहिए।
Anil Narendra, Anna Hazare, Congress, Daily Pratap, Maharashtra, Manmohan Singh, NCP, Sharad Pawar, Sonia Gandhi, Sushma Swaraj, Vir Arjun, Yashwant Sinha

Wednesday, 23 November 2011

जन चेतना यात्रा का अत्यंत सफल समापन



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23th November 2011
अनिल नरेन्द्र
भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी में मानना पड़ेगा गजब का जज्बा है। इतनी उम्र होने पर भी वह नौजवानों से ज्यादा ऊर्जा रखते हैं। रविवार को आडवाणी ने अपनी 7000 किलोमीटर की 22 राज्यों और पांच केंद्र शासित प्रदेशों से होती हुई जन चेतना यात्रा पूरी की। दिल्ली में उनका क्या भव्य स्वागत हुआ। रामलीला मैदान या तो इतना अन्ना के आंदोलन के समय भरा था या फिर जन चेतना यात्रा की समाप्ति पर। हजारों की संख्या में लोग आडवाणी जी का स्वागत करने आए हुए थे। नगर निगम चुनाव से पहले श्री आडवाणी की जन चेतना यात्रा के समापन को राजधानी की भाजपा राजनीति में शक्ति परीक्षण के रूप में भी देखा जा रहा था और इस कार्यक्रम पर सभी की निगाहें लगी हुई थीं क्योंकि यहां का संदेश दूर तक जाना था। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने लगता है कि रविवार के समापन के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इस सफल कार्यक्रम में उनका निजी कद भी बढ़ा है। बहुत कम भावुक होने वाले श्री आडवाणी यह कहने से अपने आपको रोक नहीं सके कि दिल्ली में इतना बड़ा जनसैलाब देखकर मैं अभिभूत हूं और दिल्ली सीमा से रामलीला मैदान तक 30 किलोमीटर के रास्ते में जो अभूतपूर्व स्वागत हुआ है उसे वह जीवनभर याद रखेंगे। आडवाणी जी का यह कहना अपने आप में कई मायनों में और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इस समय पार्टी के शीर्षस्थ नेता हैं और दिल्ली के लिए अनजान नहीं हैं। उनकी स्थिति यहां तक है कि वह भाजपा के प्रदेश ही नहीं, मंडल से लेकर मोर्चों के पदाधिकारियों तक के नाम जानते हैं। किस क्षेत्र में वस्तुस्थिति क्या है उन्हें आज भी पता है। इसलिए अगर वह तैयारियों को सराहते हैं तो वह सही ही है। आडवाणी की इस लम्बी यात्रा ने तमाम देश में भाजपा के कार्यकर्ताओं को जगाने में मदद की है। जिस तरीके से देश के विभिन्न भागों में जनता उमड़ी उससे साफ है कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं ने बहुत मेहनत की है, जो लाखों कार्यकर्ता निराश होकर घर बैठ गए थे वह एक बार फिर सक्रिय हुए और सड़कों पर उतर आए। आडवाणी जी से मैंने राजस्थान के चुरु के सुजानगढ़ रैली के बाद पूछा कि आप इतने क्राउड का क्या आंकलन करते हैं? उन्होंने जवाब दिया कि आज पूरे देश में इस मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के खिलाफ एक भारी रोष है, गुस्सा है और इस गुस्से को वह दर्शान के लिए यहां इकट्ठे हुए हैं। उन्होंने मुझे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश के फोटो दिखाए। इन राज्यों में तो भाजपा की ज्यादा राजनीतिक मौजूदगी नहीं पर यहां की भीड़ देखकर मैं भी हैरान हो गया। जब मैंने उनसे पूछा कि राजनीतिक रूप से इस यात्रा का भाजपा को क्या फायदा होगा तो उनका कहना था कि यह भीड़ जरूरी नहीं हमें सब वोट दें। यह एक माहौल दर्शाता है। बाकी चुनाव में अभी समय है। हम प्रयास करेंगे कि चुनाव तक यह ढांचा बना रहे। इस यात्रा से भाजपा की एनडीए घटक दलों की संख्या बढ़ाने की कोशिश रंग लाती नजर आने लगी है। आडवाणी अपनी यात्रा के लिए एनडीए के दलों को साथ लाने में कुछ हद तक सफल भी रहे। शरद यादव, नीतीश कुमार, बादल परिवार तो यात्रा में साथ था ही रविवार के समापन समारोह में जयललिता ने अपना दूत भेजकर राजनीतिक संकेत दिया। दिल्ली में अपने भाषण में आडवाणी जी ने कहा कि यह यात्रा खत्म हुई है लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग पूरी नहीं हुई है। देश को संतोष मिलने तक यह जंग जारी रहेगी। सुबह जब मैं गाजियाबाद से चला था तो कोहरा था जो मौसम के कारण छट भी गया। लेकिन जो कोहरा आज भारत की राजनीति पर देश की अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार के भ्रष्टाचार के कारण छाया हुआ है, वह मौसम के कारण नहीं मिटेगा, वह जन चेतना और जनमत से ही दूर होगा। भ्रष्टाचार के मामले में घिरी केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए नई रणनीति के तहत उन्होंने भाजपा गठबंधन के सभी सांसदों से कहा कि राजग के सभी सांसद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को यह लिखकर दें कि वह यह घोषणा करते हैं कि भारत के बाहर किसी भी बैंक में उनका कोई अवैध खाता नहीं है न ही कोई अवैध सम्पत्ति ही है। मैं अपील करता हूं कि एक सप्ताह के भीतर इस तरह का पत्र सौंप दिया जाएगा।
रविवार को रामलीला मैदान में लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने भी मजा बांध दिया। अपने भाषण में सुषमा ने कहा कि जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को किसी भी मामले की कोई जानकारी नहीं है तो वह किस मर्ज की दवा हैं? और ऐसे प्रधानमंत्री की रहबरी पर हमें मलाल है। सभी मामलों में प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों पर ठीकरा फोड़कर बरी होना चाहते हैं। घोटाला होने पर वह कहते हैं कि राजा से पूछो और महंगाई के मुद्दे पर शरद पवार से पूछो। जब प्रधानमंत्री को कुछ पता ही नहीं तो वह आखिर किस मर्ज की दवा हैं। सुषमा ने कहा कि मैंने लोकसभा में प्रधानमंत्री से एक शेर के जरिये सवाल किया था कि `तू इधर-उधर की बात न कर, यह बता कि काफिला क्यों लूटा, मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।' इस पर प्रधानमंत्री ने एक गैर-प्रासंगिक शेर के जरिये जवाब दिया। उन्होंने कहा, `लेकिन अपने शेर का ही मैं आज प्रधानमंत्री को यह कहकर जवाब देती हूं कि मैं बताऊं कि काफिला क्यों लुटा, तेरा रहजनों (लुटरों) से वास्ता था और इसी का हमें मलाल है।'
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Sunday, 2 October 2011

आडवाणी और नरेन्द्र मोदी में टकराव बढ़ रहा है



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2nd October 2011
अनिल नरेन्द्र 
मनमोहन सिंह की कैबिनेट में अंतर्विरोध और टकराव का आरोप लगाने वाली भाजपा खुद भी ऐसी ही स्थिति में घिरी हुई है। भारतीय जनता पार्टी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आरम्भ हो गई है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के आग्रह के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कर्नाटक और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और रमेश पोखरियाल निशंक बैठक में शामिल नहीं हुए। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने हालांकि यह कहा था कि पार्टी कोशिश कर रही है कि मोदी बैठक में शामिल हों। कुछ ही लोग शायद इस तर्प को मानेंगे कि मोदी नवरात्र के व्रत रख रहे हैं इसलिए बैठक में नहीं आए। असल कारण कुछ और ही है। 8 सितम्बर को पार्टी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने अचानक देशव्यापी रथ यात्रा निकालने का ऐलान कर दिया था। इससे भाजपा नेतृत्व भी हतप्रभ रह गया था। इस ऐलान के साथ ही ये कयास लगने लगे कि आडवाणी की इस रथ यात्रा का उद्देश्य एक बार फिर पीएम इन वेटिंग का संदेश देना है। संघ ने 2009 के चुनाव में हार के बाद श्री आडवाणी को पीछे करके नम्बर दो के नेताओं को आगे करने की योजना बनाई। इसमें नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और खुद नितिन गडकरी शामिल थे पर आडवाणी की अचानक रथ यात्रा की घोषणा ने यह समीकरण बिगाड़ दिए। आडवाणी की यात्रा का सबसे ज्यादा झटका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगा। लम्बे समय तक उनकी पहचान आडवाणी के खास सिपहसालार के रूप में रही है। लेकिन अब मोदी बड़े उस्ताद बन गए हैं। कुछ मायनों में वह अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। भाजपा सूत्रों के अनुसार भाजपा में प्रधानमंत्री पद के इन दो भावी दावेदारों मोदी और आडवाणी के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा मोदी को रास नहीं आ रही है। इसी के चलते उन्होंने भी आडवाणी की तर्ज पर पिछले दिनों अहमदाबाद में एक बड़ा राजनीतिक शो कर डाला था। राज्यपाल के खिलाफ हाल ही में गुजरात में आयोजित मोदी की रैली में आडवाणी समेत किसी भी बड़े नेता ने हिस्सा नहीं लिया था। अहमदाबाद में मोदी उपवास का जिस तरह प्रचार किया गया उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खुश नहीं है। उनका मानना है कि मोदी खुद को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश कर रहे हैं। उधर संघ ने आडवाणी पर दबाव डाला कि वह यह स्पष्ट कर दें कि उनकी यात्रा से उनकी प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी से कुछ लेना-देना नहीं है। संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में नेतृत्व से मुलाकात के बाद श्री आडवाणी ने घोषणा की कि वह प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर यह रथ यात्रा नहीं कर रहे। सबसे पहले नरेन्द्र मोदी ने ही उनकी यात्रा का विरोध किया था। सूत्रों के मुताबिक जब आडवाणी ने उनसे इस यात्रा के बारे में बात की तो मोदी ने अपनी आदत के मुताबिक उनसे दो टूक पूछ लिया कि इससे क्या फायदा? आप हासिल क्या करना चाहते हैं? इतना ही नहीं, मोदी ने गुजरात से यात्रा शुरू करने में मदद करने में अपनी असमर्थता तक जता दी। आखिरकार श्री आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा बिहार से शुरू करने का फैसला किया। इसके पीछे एक और उद्देश्य भी नजर आता है। शायद आडवाणी जी एनडीए की तर्ज की राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं। पहले भी उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करके उसी लाइन पर चलने का प्रयास किया था जिस पर अटल जी चलते थे। आडवाणी की कोशिश है कि वह एनडीए की तर्ज पर फिर केंद्र में सरकार बनाएं और उसका नेतृत्व करें। इस उद्देश्य का न तो संघ समर्थन करेगा और न ही मोदी सरीखे नेता जिनकी पहचान हिन्दुत्व नेता की है। श्री आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा को लेकर जो विवाद आरम्भ हुआ है, यह थमने वाला नहीं। भाजपा नेतृत्व में इस समय जबरदस्त महत्वाकांक्षाओं का टकराव है और इसे इस रथ यात्रा ने फोकस में लाकर खड़ा कर दिया है। उधर कांग्रेस नेतृत्व में घमासान हो रहा है, रही-सही कसर भाजपा की अंतर्पलह ने पूरी कर दी है।
Anil Narendra, Arun Jaitli, BJP, Daily Pratap, L K Advani, Narender Modi, Nishank, Nitin Gadkari, Sushma Swaraj, Vir Arjun, Yadyurappa

Friday, 30 September 2011

आफेंस इज दी बेस्ट डिफेंस


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अंग्रेजी में एक कहावत है "आफेंस इज दी बेस्ट डिफेंस" यानि कि आक्रमण करना सबसे अच्छा बचाव है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसी तकनीक को अपनाया लगता है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच से झुलस रही केंद्र की यूपीए सरकार के रणनीतिकार जहां डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए हैं वहीं अमेरिका से स्वदेश लौटते ही डॉ. मनमोहन सिंह ने विपक्ष पर जमकर हमला बोल दिया और विपक्ष के मंसूबों और इरादों की हवा निकालने का प्रयास किया है। विपक्ष पर सरकार को अस्थिर करने और जबरदस्ती देश को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने का आरोप प्रधानमंत्री ने लगाकर पूरे मामले को एक नई दिशा देने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री ने यह जवाबी हमला हवा में एयर इंडिया के विमान से ही शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि हम पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे और मध्यावधि चुनाव नहीं होगा। मंत्रिमंडल के सदस्यों में टकराव की बातें मीडिया की कल्पना है। पी. चिदम्बरम पर मुझे पहले भी पूरा भरोसा था और आज भी है। न्यूयार्प में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने के बाद फ्रैंकफर्ट से नई दिल्ली जाते हुए विमान में पत्रकारों से बात करते हुए मनमोहन सिंह ने माना कि बिगड़ती अर्थव्यवस्था का असर भारत पर भी हुआ है। मुद्रास्फीति हमारी सबसे बड़ी समस्या है लेकिन हम स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। डॉ. सिंह ने स्वीकार किया कि उनकी सरकार की छवि के बारे में जनता के बीच समस्या हो सकती है जिसे सही करना जरूरी है।
सरकार को अस्थिर कर देश को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने के विपक्ष पर लगाए प्रधानमंत्री के आरोप पर भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर सरकार गिरेगी तो अपने कुकर्मों से, हमें साजिश करने की जरूरत नहीं है और न ही ऐसा करने के लिए हमारे पास पर्याप्त संख्या बल है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि प्रधानमंत्री ने विदेश से लौटते ही आरोप लगाया है कि विपक्ष सरकार को अस्थिर करने में जुटा है। सुषमा ने कहा कि सरकार के अस्थिरता की ओर बढ़ने का ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ने की बजाय बेहतर यह होगा कि प्रधानमंत्री अपने घर को दुरुस्त करने की फिक्र करें। सुषमा ने कहा कि सरकार और उनके मंत्रियों को लेकर जो भ्रष्टाचार के खुलासे हो रहे हैं उन्हें विपक्ष ने नहीं गढ़ा है बल्कि उन कुकर्मों को खुद उनके द्वारा संचालित सरकार की एजेंसियों ने ही उजागर किया है। अरुण जेटली ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल घोटाला, यह विपक्ष ने नहीं किया। नोट के बदले वोट कांड से विपक्ष लाभान्वित नहीं हुआ। अस्थिरता की ओर बढ़ने का कारण सरकार में नेतृत्व का गंभीर संकट होना है। यह सरकार स्वयं विध्वंसक मोड़ में है। भाजपा के दोनों नेताओं ने दावा किया कि वित्त मंत्रालय के नोट से साबित हो चुका है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला में जो अपराध तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा ने किया वही अपराध हूबहू चिदम्बरम ने भी किया। उन्होंने कहा कि इस घोटाले में प्रधानमंत्री को कहीं भी अंधेरे में नहीं रखा गया था बल्कि उन्हें राजा और चिदम्बरम ने हर कदम की बाकायदा जानकारी दी। प्रधानमंत्री की यह रणनीति कितनी सार्थक साबित होगी यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे पर एक तरह से उन्होंने यह बयान देकर खुद अपनी सरकार के जीवन पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जब प्रधानमंत्री खुद ही मध्यावधि चुनाव की बात करने लगे तो इसका जनता-जनार्दन में क्या संदेश जाएगा, आप खुद ही समझदार हैं।
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Wednesday, 14 September 2011

नरेन्द्र मोदी की अग्निपरीक्षा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th September 2011
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को बहुत उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट सोमवार को मोदी को 2002 के गोधरा कांड के बाद दंगों पर केस में लपेट लेगा और उन्हें कटघरे में खड़ा कर देगा।
मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और 62 अन्य अधिकारियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 2002 में हुए गुलबर्ग सोसाइटी दंगों को रोकने के लिए जानबूझ कर कोई कदम नहीं उठाया और हिंसा को बढ़ावा दिया पर मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे उनके प्रतिद्वंद्वियों को सुप्रीम कोर्ट से निराशा मिली।
शीर्ष अदालत ने उनको दंगा रोकने में उनकी भूमिका में निक्रियता पर कोई फैसला सुनाने से इंकार कर दिया। न्यायमूर्ति डीके जैन की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मोदी और अन्य सरकारी अधिकारियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज करने के लिए कोई भी विशिष्ठ निर्देश देने से इंकार कर दिया।
मोदी और इन सरकारी अधिकारियों को पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी द्वारा की गई शिकायत में पक्ष बनाया गया था। जाफरी की अहमदाबाद दंगों में गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार में जान चली गई थी। न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम और न्यायमूर्ति आफताब आलम की सदस्यता वाली पीठ ने शीर्ष न्यायालय के निर्देश पर विशेष जांच अदालत (एसआईटी) द्वारा की गई जांच की अंतरिम रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के समक्ष दाखिल करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए गठित की गई विशेष जांच समिति यानि एसआईटी को आदेश दिए हैं कि वह अपनी रिपोर्ट गुजरात की निचली अदालत को सौंप दे यानि अब निचली अदालत यह तय करेगी कि गुजरात दंगों में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मामला बनता है या नहीं? फैसले पर अपने-अपने ढंग से प्रतिक्रिया हुई। इस दंगे में मारे गए सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने कोर्ट के इस फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बेहद निराशाजनक है। मेरे पास एक बार फिर इसके खिलाफ अपील करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। 2002 में जो कुछ भी हुआ था, उसके हर पल का सच्चा ब्यौरा मैंने एसआईटी को दिया था। इतने बरसों के बाद एक ही बात को मैं कब तक दोहराऊंगी? जकिया जाफरी का कहना है कि राज्य की अदालत को इस मामले का सौंप दिए जाने का मतलब यह ही है कि नरेन्द्र मोदी के हक में ही फैसला आएगा। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता और नरेन्द्र मोदी की चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी तीस्ता सीतलवाड़ ने कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया और कहा कि इस फैसले को क्लीन चिट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, `यह संघर्ष बहुत लम्बा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का गलत अर्थ निकाला जा रहा है। अब हमारी याचिका, एसआईटी की रिपोर्ट और राजू रामचन्द्रन की रिपोर्ट गुजरात के मजिस्ट्रेट देखेंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी और अन्य लोगों के खिलाफ और केस ही नहीं है। अगर मोदी या किसी और के खिलाफ मामला बन्द होने की बात होती तो जकिया जी और हमारा पक्ष सुना जाएगा। हमें भरोसा है कि गुजरात की अदालत इस मामले में उपयुक्त फैसला सुनाएगी।' सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर नरेन्द्र मोदी ने महज तीन शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया दी। `ईश्वर महान है।' भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि पार्टी को विश्वास था कि मोदी को बदनाम करने की मुहिम ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगी।
पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने मुस्कुराते हुए कहा, `मोदी से नफरत करने वालों और उन्हें गिराने की ताक में रहने वालों की वर्तमान अवस्था को मैं समझ सकता हूं। कानून ने वह रास्ता अपनाया है जो बिल्कुल सही है।
कांग्रेस ने इस मसले पर बहुत ही सोची-समझी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट नहीं दी है।' प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा, `इससे निराशा की कोई बात नहीं है। नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट थोड़े ही मिली है? हमारी कानूनी प्रक्रिया में सुधार लाए जाने की जरूरत है। जकिया जी और उनके परिवार के लिए मैं सहानुभूति जताना चाहूंगा।'
मामला कुछ यूं था। गोधरा कांड के बाद गुजरात में बड़े पैमाने में दंगे भड़के। गुलबर्ग सोसाइटी दंगों में 35 से ज्यादा लोग मारे गए थे और जकिया जाफरी ने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री मोदी और 62 अन्य लोगों ने गुजरात में हुई हिंसा को बढ़ावा दिया। गुजरात में 2002 के दंगों में 1000 से अधिक लोग मारे गए थे। साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों को जिन्दा जलाने के स्वरूप यह प्रतिक्रिया हुई थी। इन दंगों पर एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट पिछले साल आई थी। लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया था। एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी और कहा था कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर एक स्वतंत्र राय लेने के लिए राजू रामचन्द्रन को अदालत की सहायता के लिए नियुक्त किया गया था। रामचन्द्रन को आदेश दिया गया था कि वे एसआईटी रिपोर्ट की निष्पक्ष पड़ताल करें और मामले से जुड़े गवाहों, पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों से मिलें और उसके बाद सुझाव दें कि गुजरात मुख्यमंत्री की भूमिका पर क्या कदम उठाना चाहिए? मीडिया में आई खबरों के मुताबिक राजू रामचन्द्रन ने एसआईटी की रिपोर्ट का खंडन करते हुए कहा था कि गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीके जैन, जस्टिस पी. सदाशिवम और जस्टिस आफताब आलम की बैंच ने इसी रिपोर्ट के आधार पर अपना फैसला सुनाया और एसआईटी को आदेश दिया कि वह अपनी रिपोर्ट अब निचली अदालत के समक्ष रखें।
इस फैसले से जहां भाजपा की बांछें खिल गई हैं वहीं कांग्रेस मोदी को संसद से लेकर सड़क तक घेरती रही को इससे झटका लगा है। यही वजह है कि मोदी को भाजपा के हर कोने से बधाई मिली और उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका भी तलाशनी शुरू हो गई है। इस फैसले के बाद मोदी का राजनीतिक कद बढ़ा है। पार्टी के भीतर से उनके राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में आने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि मोदी पार्टी द्वारा सौंपे जाने वाली किसी भी जिम्मेदारी को निभाने में सक्षम हैं।
राज्यसभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मोदी पहले से ही राष्ट्रीय राजनीति में हैं और हमारे प्रमुख नेताओं में हैं। फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए जेटली ने कहा कि भाजपा शुरू से ही कहती रही है कि मोदी पर लगाए गए आरोप झूठे हैं और उनकी दंगों में कोई भूमिका नहीं थी। इससे साबित हुआ है कि मात्र प्रोपेगंडा व झूठे आरोप कभी भी साक्ष्य नहीं हो सकते। मोदी का नाम एक भी आरोप पत्र में नहीं है और न ही विशेष जांच दल ने उन्हें दोषी पाया है। सुषमा ने कहा कि मोदी ने अग्निपरीक्षा पास कर ली है, `सत्यमेव जयते।'
Anil Narendra, Arun Jaitli, Godhra, Gujarat, L K Advani, Narender Modi, Supreme Court, Sushma Swaraj

Thursday, 4 August 2011

मतदान वाले नियम के तहत बहस का जुआ


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th August 2011
अनिल नरेन्द्र
जैसा अनुमान था भारतीय जनता पार्टी ने संसद में संपग सरकार पर हल्ला बोल दिया है। भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को घेरने में लगी भाजपा ने पधानमंत्री मनमोहन सिंह को घेरने का पूरा प्लान बना लिया है। भाजपा ने मनमोहन सिंह पर मानसून सत्र का माहौल बिगाड़ने का भी आरोप लगाया है। भाजपा ने कहा कि पधानमंत्री ने ही पहल करते हुए विपक्ष के संबंध में जो अनावश्यक वक्तव्य दिया है उसके पीछे उनका एक मात्र मकसद विपक्ष को उत्तेजित करना और संसद का वातावरण खराब करना लगता है। संसद भवन परिसर में एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में लोकसभा के विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने मनमोहन और चिदंबरम पर तीखे हमले किए। जेटली ने कहा कि स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में पूर्व संचार मंत्री ए राजा और पधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं उनके कार्यालय के बीच 18 बार पत्राचार हुआ। इस पत्राचार के जरिए राजा ने पधानमंत्री को स्पेक्ट्रम मामले में अपने मंत्रालय के फैसले और नीति से पूरी तरह अवगत कराया था। इसलिए पधानमंत्री यह कहकर बच नहीं सकते कि उन्हें कुछ भी नहीं पता था। सुषमा ने पधानमंत्री पर संसद का माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाते हुए कहा कि राजग संसद में महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर मतदान के पावधान वाले नियमों के तहत चर्चा कराने का नोटिस देगी। सुषमा ने कहा कि राजग भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर लोकसभा में मतदान वाले नियम 184 और राज्यसभा में नियम 167 के तहत नोटिस देगा।
भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को संसद में घेरने के लिए भाजपा और उसके नेतृत्व वाले राजग ने मतदान वाले नियम के तहत बहस कराने का पस्ताव लोकसभा सचिवालय को भेज दिया है। भाजपा चाहती है कि भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर सदन में केवल चर्चा ही नहीं बल्कि मतदान भी हो ताकि इन मुद्दों पर यह साफ हो सके कि कौन सरकार के साथ है और कौन सरकार के विरोध में है। यह दांव चलकर भाजपा कांग्रेस के साथ उसके घटक दलों को भी एक्सपोज करना चाहती है। भाजपा का आकलन है कि भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर मतदान हुआ तो यूपीए सरकार फंस सकती है। सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का इन मुद्दों पर विचार स्पष्ट है। सपा के रामगोपाल यादव ने कहा कि भ्रष्टाचार पर अब सरकार भाग नहीं सकती। उसे संसद का सामना करना होगा और देश की जनता के सवालों का जवाब देना होगा। बसपा की ओर से मोर्चा सतीश मिश्रा ने संभाला है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा है। इसके खिलाफ उनकी पार्टी कारगर लोकपाल से कम पर राजी नहीं है। इसके अलावा अन्नाद्रमुक, बीजू जद, राजद, जनता दल एस और लोकदल जैसे तथ्य माने जाने वाले छोटे दलों ने भी अपने अन्दाज में सरकार को आंखे दिखाईं और कांग्रेस सदस्य चुपचाप सुनते, देखते रहे। मजबूरन सदन के पहले दिन सभापति को सदन स्थगित करना पड़ा। उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा महंगाई और भ्रष्टाचार पर कांग्रेस, सपा और बसपा के गठबंधन को फिर से उजागर करना चाहती है। सपा और बसपा ने यदि कांग्रेस का समर्थन किया तो भाजपा सपा, बसपा और कांग्रेस गठबंधन को मुद्दा बनाएगी। यदि सपा और बसपा ने मतदान के समय कांग्रेस का साथ नहीं दिया और यूपीए घटक दलों ने भी अलग अलग सुर और तेवर दिखाए तब ऐसे में यूपीए सरकार की फजीहत हो सकती है। वामदलों का स्टैंड पहले से ही स्पष्ट है वह सरकार का जमकर विरोध करेंगे। भाजपा ने इन सारी बातों को ही ध्यान में रखकर यह दांव चला है। हमें नहीं लगता कि सरकार मतदान वाले नियम के तहत किसी भी चर्चा को तैयार होगी। जाहिर है कि यदि भाजपा की मांग नहीं मानी गई तो पार्टी संसद के भीतर और बाहर यही संदेश देगी कि सरकार भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर गम्भीर नहीं है इसलिए सिर्प चर्चा कर मुद्दे को टाल रही है। भाजपा की ओर से भ्रष्टाचार पर नियम 184 के तहत चर्चा कराने के लिए वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने पस्ताव भेजा है। महंगाई पर भाजपा नेता यशवंत सिन्हा और राजग के कार्यकारी संयोजक शरद यादव ने पस्ताव दिया है। अब सरकार ने वोट नियम के तहत बहस स्वीकार कर ली है। देखें कि इस जुए में वह कितनी सफल रहती है ?
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Saturday, 30 July 2011

अंतत येदियुरप्पा को जाना ही पड़ा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th July 2011
अनिल नरेन्द्र
अंतत भाजपा हाई कमान ने हिम्मत और बुद्धिमता दिखाई और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को हटाने का फैसला कर ही लिया। येदियुरप्पा ने हालांकि अपनी कुर्सी बचाने के लिए सब तरह के हथकंडे अपना लिए परन्तु आलाकमान के आगे उनकी एक न चली। आला कमान ने बुधवार देर रात ही उन्हें बता दिया कि पार्टी चाहती है कि वे अपना पद छोड़ दें। इसके बाद गुरुवार सुबह संसदीय दल की बैठक में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के बारे में किए गए फैसले पर मोहर लगा दी गई। पार्टी ने येदियुरप्पा को हटाने के बारे में तभी मन बना लिया था, जब लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट के कुछ हिस्से लीक हो गए थे। लेकिन पार्टी चाहती थी कि पहले लोकायुक्त अपनी रिपोर्ट औपचारिक तौर पर सरकार के सुपुर्द कर दें। रिपोर्ट सुपुर्द करने के फौरन बाद ही येदियुरप्पा को दिल्ली तलब किया गया और उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा गया। येदियुरप्पा बिना इस्तीफा दिए बेंगलुरु पहुंच गए। बेंगलुरु पहुंचने पर येदियुरप्पा ने अपनी ताकत आजमाने के लिए विधायकों व मंत्रियों की बैठक बुलाई जिसमें उनके हाथ निराशा ही लगी। उनकी बुलाई बैठक में कुल 13 विधायक ही पहुंचे। दरअसल भाजपा हाईकमान येदियुरप्पा की चाल को समझ गए थे। इधर येदियुरप्पा दिल्ली से खिसके उधर नितिन गडकरी ने विधायकों को येदियुरप्पा से दूरी बनाने को फोन कर दिया। मंत्रियों को साफ कहा गया कि अगर उन्होंने येदियुरप्पा का अब भी साथ दिया तो उन्हें अगले मंत्रिमंडल में नहीं लिया जाएगा। हाईकमान ने एम. वेंकैया नायडू को `ऑपरेशन येदियुरप्पा' के लिए बेंगलुरु रवाना कर दिया। पार्टी के कड़े रुख को देखते हुए येदियुरप्पा ने पद छोड़ने का फैसला किया और कहा कि वह 31 जुलाई को त्यागपत्र देंगे। उन्होंने बताया कि वह 31 जुलाई को इस्तीफा देंगे क्योंकि 31 जुलाई को शुक्ल पक्ष शुरू हो रहा है क्योंकि 30 जुलाई को अमावस्या है और ज्योतिषियों ने उन्हें शुभ मुहूर्त में इस्तीफा देने की सलाह दी है।
येदियुरप्पा ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर सांसद सदानन्द गौड़ा का नाम सुझाया है, लेकिन पार्टी शुक्रवार को होने वाली विधान मंडल की बैठक में ही नेता का फैसला करेगी। दिल्ली से अरुण जेटली और राजनाथ सिंह को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जा रहा है। मुख्यमंत्री के दावेदारों में के. ईश्वरप्पा, बीएस आचार्य, सुरेश कुमार और अनन्त कुमार भी दावेदार हैं। येदियुरप्पा लिंगायत हैं। कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अपनी इस जाति के ताकत पर ही येदियुरप्पा हाईकमान को ब्लैकमेल कर रहे थे। राज्य की कुल आबादी में लिंगात करीब 27 प्रतिशत हैं जबकि लिंगात के बाद दूसरे स्थान पर वोकलिंग हैं जो 17 प्रतिशत हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा वोकलिंग समुदाय से हैं। हाल के वर्षों में येदियुरप्पा लिंगात समुदाय के बड़े नेता के तौर पर उभरकर सामने आए। कर्नाटक भाजपा विधायक दल में ही 35 से ज्यादा विधायक लिंगायत जाति के हैं। विधायकों के बलबूते पर ही विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव या पंचायत चुनाव, लिगांत कार्ड खेलकर येदियुरप्पा भाजपा को चुनाव जिताने के साथ-साथ अपनी भी जड़ें जमाते रहे। भाजपा को उत्तराधिकारी चुनते समय कर्नाटक के जातीय समीकरण का जरूर ध्यान रखना होगा। जहां तक सम्भव हो येदियुरप्पा का उत्तराधिकारी भी लिगांयत समुदाय से ही होगा।
कर्नाटक की राजनीति में एक बहुत बड़ा फैक्टर रेड्डी बंधु हैं। रेड्डी बंधुओं की कहानी किसी किवदंती से कम नहीं लगती। पुलिस कांस्टेबल के बेटे, जिनके पास साइकिल खरीदने की क्षमता थी उनके पास आज अपना हेलीकाप्टर है। राजनीतिक पकड़ ऐसी कि मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी उन्हें किनारे करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उन पर लौह अयस्क के अवैध खनन के गम्भीर आरोप लगे। वे करीब 1500 करोड़ के खनन कारोबारी हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2002 में खनन तथा इसके निर्यात के व्यवसाय में उतरने के बाद उनकी सम्पत्ति अरबों में है। ओबुलापुरम माइनिंग कम्पनी का मालिकाना हक कर्नाटक के पर्यटन मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी के पास है तो येदियुरप्पा सरकार में बड़े भाई जी. करुणाकरण रेड्डी राजस्व मंत्री हैं जबकि छोटे भाई सोमशेखर बेल्लारी से विधानसभा सदस्य हैं। वर्ष 2009 में भी रेड्डी बंधुओं ने येदियुरप्पा के खिलाफ इसलिए विद्रोह कर दिया था कि उन्हें बेल्लारी में मनमाफिक अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार नहीं दिया गया। तब भी सुषमा स्वराज के दखल से मामला सुलझा। भाजपा के शीर्ष नेता कहते रहे हैं कि बेल्लारी में कांग्रेस के गढ़ तोड़ने के लिए भाजपा को उनका सहारा लेना पड़ा। रेड्डी बंधुओं का राजनीतिक उदय बेल्लारी संसदीय सीट से पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के चुनाव लड़ने के दौरान हुआ। भाजपा ने सोनिया के खिलाफ सुषमा स्वराज को मैदान में उतारा था। तब रेड्डी बंधुओं ने सुषमा को `काची' (मां) का दर्जा देते हुए उनकी जीत के लिए हर सम्भव कोशिश की थी पर जीत सोनिया की हुई। रेड्डी बंधुओं के सुषमा स्वराज से संबंधों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं लेकिन हाल ही में सुषमा ने दो टूक शब्दों में यह कह दिया कि रेड्डी बंधुओं से उनका कोई कारोबारी संबंध नहीं है। येदियुरप्पा के उत्तराधिकारी चुनने के समय भाजपा आलाकमान को रेड्डी बंधुओं से क्या रणनीति अपनानी है, इस पर भी गम्भीरता से विचार करना होगा क्योंकि यह सरकार बनाने और उखाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं।
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Wednesday, 6 July 2011

सर्वदलीय बैठक में सरकार ज्यादा सफल रही


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6th July 2011
अनिल रेन्द्र
अगर मनमोहन सिंह सरकार की सर्वदलीय बैठक बुलाकर यह मंशा थी कि अन्ना हजारे के आंदोलन की हवा निकालने के लिए विपक्षी दलों का इस्तेमाल किया जाए तो वह इसमें पूर्ण सफल नहीं हो सकी। हां कुछ हद तक सफल जरूर हुई। विभिन्न राजनीतिक दलों ने सिविल सोसाइटी की डिमांडों पर अपने पत्ते नहीं खोले। इस बात पर सहमति बहरहाल जरूर बन गई कि एक मजबूत लोकपाल बिल जरूर होना चाहिए। इस मुद्दे पर आम सहमति बनने की उम्मीद भी नहीं थी। भाजपा का हमेशा से यही स्टैंड रहा है कि पहले सरकार संसद में विधेयक पेश करे फिर उस पर हम चर्चा करेंगे। सुषमा स्वराज का कहना था कि सर्वदलीय बैठक में मसौदे के प्रावधानों पर चर्चा नहीं हुई। हमें ऐसा लोकपाल चाहिए जो पारदर्शी तरीके से चुना जाए और निष्पक्षता के साथ काम करे। हमारे सरकारी मसौदे के प्रावधानों पर अनेक मतभेद हैं। इसमें लोकपाल की चयन प्रक्रिया, अधिकार क्षेत्र शामिल हैं। लगभग सभी दलों की राय आमतौर पर यह भी थी कि सरकार को सिविल सोसाइटी के सामने झुकना नहीं चाहिए। कुछ राजनेता अन्ना की टीम पर भी भड़के। `आपने अन्ना और उनकी सिविल सोसाइटी के बनाए हुए जन लोकपाल विधेयक का मसौदा तो हमें दे दिया, जरा अन्ना की बॉयोग्राफी भी दे दीजिए जिससे हमें उनके बारे में भी पता चल जाए।' अपने अधिकारों पर उठते सवाल से खार खाए कुछ राजनीतिक दलों का गुस्सा इस बैठक में समाजवादी पार्टी की ओर से ऐसे ही अन्दाज में बयां किया गया। `पहले तो आपको हमारी याद आई नहीं अब जब आप पीड़ित हो गए तो हमें बुला लिया। अब आप संसद में पहले स्थापित प्रक्रिया के तहत बिल लाइए, इसके बाद ही हमें जो कुछ कहना होगा कहेंगे।'
इस सर्वदलीय बैठक में आम राय होना तो दूर की बात रही सभी दल इस बात के ज्यादा इच्छुक थे कि अमुक पार्टी का स्टैंड क्या है। केंद्र सरकार इस लिहाज से सफल रही कि सभी दलों ने एक स्वर में यह कह दिया कि वह अपने अधिकारों से कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि किसी भी सिविल सोसाइटी से बड़े हैं और उन्हें सिविल सोसाइटी डिक्टेट नहीं कर सकता। सरकार अपने इरादे को छिपा रही थी और उसकी इच्छा भी मामले को सुलझाने की बजाय उलझाने में ज्यादा थी। अगर ऐसा न होता तो वह दोनों मसौदों, एक जो अन्ना ने दिया था और एक जो पांच मंत्रियों ने बनाया था, का समन्वय करके अपनी ओर से एक ऐसा मसौदा पेश करती जिसमें दोनों की प्रमुख शर्तें होती तो शायद कोई आम सहमति बन जाती पर सरकार ने ऐसा नहीं किया। कुल मिलाकर इस सर्वदलीय बैठक का कोई महत्वपूर्ण परिणाम नहीं निकला। टीम अन्ना ने बैठक के बाद कहा कि सर्वदलीय बैठक में तो कोई नतीजा निकलना ही नहीं था। सरकार ने कैबिनेट से पारित कोई मसौदा भी नहीं तैयार किया था। सिविल सोसाइटी कार्यकर्ता मनीष सिसोदिया ने कहा, `16 अगस्त से अन्ना हजारे का अनशन इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार कितना प्रभावी विधेयक मानसून सत्र में संसद में पेश करती है। हमारी आंखें कैबिनेट से पारित मसौदे पर अटकी हैं।' किरण बेदी ने कहा, `रविवार की बैठक में कम से कम राजनीतिक पार्टियों ने लोकपाल बिल की जिम्मेदारी तो ली।' हमें लगता है कि लोकपाल बिल सही दिशा में आगे बढ़ रहा है पर मुझे नहीं मालूम कि किरण जी के विचारों से कितने लोग सहमत होंगे।
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Saturday, 25 June 2011

नितिन गडकरी को धूल चटाने में जुटे उन्हीं के पार्टी के नेता


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th June 2011
अनिल नरेन्द्र
एक हफ्ते के ड्रामे के बाद आखिर भाजपा नेता श्री गोपीनाथ मुंडे मान ही गए। कहा जा रहा है कि लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज से मिलने के बाद महाराष्ट्र में भाजपा के चेहरे और लोकसभा में पार्टी के उपनेता ने अपने तेवर नरम कर लिए। इसके साथ ही पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ मुंडे की बगावत से उपजे संकट के फिलहाल टलने का रास्ता साफ हो गया। एक बार फिर इससे साबित हो गया कि भाजपा जो एक समय अपने आपको पार्टीविद् व डिफरैंस कहती थी वह कितनी नीचे आ चुकी है और दूसरी पार्टियों की तरह बनकर रह गई है। गोपीनाथ मुंडे इतने महत्वपूर्ण नहीं जितना महत्वपूर्ण है पार्टी में अनुशासन। गोपीनाथ मुंडे ने क्या-क्या नहीं किया? उन्होंने खुलकर पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को गाली दी। पहले शिवसेना में जाने का प्रयास किया, वहां से उनके लिए दरवाजा बन्द था, फिर कांग्रेस में घुसने की कोशिश की। मुंडे हैं तो प्रमोद महाजन के बहनोई, इसलिए सौदेबाजी में तो अपने आपको माहिर समझते हैं। कांग्रेस से उन्होंने आने की शर्त रखी। मुझे कैबिनेट का दर्जा चाहिए। रिपोर्टों के अनुसार वह सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से भी मिले। कांग्रेस ने उलटा शर्त रख दी कि आप पहले भाजपा की टिकट पर बीड लोकसभा सीट से त्यागपत्र दें और बतौर कांग्रेस उम्मीदवार वार्ड इलैक्शन जीतें फिर आपको मंत्री बनाने की बात सोची जाएगी। गोपीनाथ मुंडे इसके लिए शायद तैयार नहीं थे। वह चाहते थे कि उन्हें पृथ्वीराज चव्हाण की खाली हुई पृथ्वीराज चव्हाण की राज्यसभा सीट दी जाए। जब कांग्रेस से लात पड़ी तो मुंह बचाने के लिए मुंडे ने वापस आने का रास्ता ढूंढना आरम्भ कर दिया। यहां सुषमा स्वराज काम आ गईं। चूंकि मुंडे ने नितिन गडकरी को खुली चुनौती दी थी इसलिए भाजपा के एक गुट का उन्हें गुप्त समर्थन मिल रहा था। यह गुट अध्यक्ष नितिन गडकरी को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। भाजपा का आज हाई कमान क्या है? कौन है हाई कमान? कांग्रेस में तो सोनिया गांधी जो पार्टी अध्यक्ष हैं वही हैं हाई कमान। उनके फैसले को कोई नहीं टाल सकता। अच्छे अच्छों को आंखें दिखाने पर बाहर का रास्ता दिखाया गया है पर भाजपा में हिसाब उलटा ही है। अध्यक्ष को गाली निकालो और हीरो बनो। भाजपा को मजबूत करने में जुटे गडकरी को पार्टी के अन्दर ही एक गुट रोकना चाहता है ताकि वह पार्टी में अपनी पकड़ न बना पाएं। महाराष्ट्र की राजनीति में उलझाकर भाजपा की यह लॉबी गडकरी को कमजोर अध्यक्ष साबित करने में जुटी है जिससे वह बड़े फैसले न ले सकें। मुंडे ने भाजपा में बने रहने का शंखनाद नहीं किया बल्कि गडकरी के खिलाफ लड़ाई जारी रखने के लिए एक चाल चली है। भाजपा में यह लॉबी त्रस्त चल रही है। गडकरी के भाजपा में पुराने लोगों को लाना उन्हें रास नहीं आ रहा। गडकरी ने हाल ही में अपने कई इंटरव्यू में जो कड़ा संदेश दिया उससे भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता परेशान हैं। गडकरी ने साफ कहा है कि वह पार्टी को मजबूत करने के लिए अपने एजेंडे पर कायम रहेंगे। इसका मतलब साफ है कि पुराने जमे लोगों को तकलीफ हो रही है। गडकरी के साथ संघ पूरी तरह खड़ा है। संघ चाहता है कि भाजपा की खोई हुई ऊर्जा वापस आए। गोपीनाथ मुंडे की लड़ाई मुद्दों पर नहीं है। दरअसल असल मुद्दा उनके लिए यह है कि उनसे जूनियर नितिन गडकरी दिसम्बर 2009 में अध्यक्ष बनने के बाद उनसे ऊपर कैसे पहुंच गए। वह आज भी अपने आपको गडकरी से ऊपर मानते हैं। वह खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। दुःखद यह है कि उस पार्टी के भीतर नेताओं के आपसी टकराव बढ़ रहे हैं, जो खुद को दूसरों से अलग बताती है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को लेकर सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की तकरार सुर्खियों में थी। ऐसा लगता है कि पार्टी अटल जी के सक्रिय राजनीति से अलग होने और आडवाणी जी के संरक्षण की भूमिका में आने के बाद से नेतृत्व संकट से जूझ रही है। असल में पांच-सात वर्ष पहले तक जो नेता दूसरी और तीसरी पंक्ति में थे, वे अब पहली पंक्ति में आ गए हैं और उनमें आगे बढ़ने की होड़ लग गई है। यह विडम्बना ही है कि ऐसे समय जब देश घोटालों के अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार चरम पर है और केंद्र सरकार लोकप्रियता के सबसे निचले स्तर पर आ गई है, प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते भाजपा का इन सबसे लड़ने के लिए न तो कोई ठोस कार्यक्रम है और न ही सशक्त नेतृत्व। कल को जनता पूछ सकती है कि अगर जनता आपको विकल्प की तरह चुने तो आपका प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन होगा? आपका नेतृत्व क्या है? हमारी राय में तो श्री गोपीनाथ मुंडे को निकाल बाहर करना चाहिए था ताकि दूसरों को भी सबक मिले। अपने आपको पार्टीविद् डिफरैंस कहलाने वाली पार्टी से यह उम्मीद नहीं थी कि वह इस तरह के समझौते करती फिरेगी?
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Friday, 24 June 2011

प्रणब मुखर्जी की जासूसी का मामला अत्यंत गंभीर मसला है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
यूपीए सरकार पर लगता है ग्रहण का सबसे ज्यादा असर हुआ है। एक के बाद एक घोटाले में यह सरकार फंसती जा रही है। अभी बाबा रामदेव का मामला, अन्ना हजारे से विवाद सुलटा नहीं कि एक और घोटाला सामने आ गया है। यह घोटाला तो नहीं पर हां अत्यंत गम्भीर मुद्दा जरूर है। यह है केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के कार्यालय में टेपिंग करने का मुद्दा। एक अंग्रेजी पत्र द इंडियन एक्सप्रेस ने एक सनसनीखेज रिपोर्ट छापी है। इसमें बताया गया है कि केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि उनके ऑफिस नॉर्थ ब्लॉक में उनके मेज के नीचे व कम से कम 15 और मेजों के नीचे चूइंगम लगी पाई गई। वित्तमंत्री के कार्यालय में, उनके सलाहकार उमीता पॉल के, निजी सचिव मनोज पन्त, दो कांफ्रेंस कमरों में ऐसी चूइंगम मेजों के नीचे लगी पाई गई हैं। इन चूइंगम के ऊपर ट्रांसमीटर फिट किया जाता है ताकि जो भी बातचीत हो उसे सुना जा सके, उसे टेप किया जा सके। इन चूइंगम पर हालांकि कोई माइक तो नहीं मिला पर निशान जरूर लगे मिले जिससे यह साबित होता है कि प्रणब दा की कोई पूरी जासूसी कर रहा था।
अब देखिए क्या होता है? प्रणब मुखर्जी इसकी शिकायत गृह मंत्रालय से नहीं करते जो आमतौर पर होना चाहिए था, वह सीधे प्रधानमंत्री से करते हैं और उन्हें कहते हैं कि वह मामले की जांच करें। इस घटना से कई बातें उभरकर सामने आती हैं। इससे साफ पता चलता है कि कांग्रेस के अन्दर गड़बड़ है और जबरदस्त खींचतान है। पाठकों को याद होगा कि मैंने इसी कॉलम में दो दिन पहले लिखा था कि कांग्रेस पार्टी में दो खेमे बन चुके हैं। एक खेमा सोनिया गांधी व कांग्रेस पार्टी का है तो दूसरा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनके मंत्रियों का है जो सरकार का पक्ष लेते हैं। यानि पार्टी बनाम सरकार। चूंकि गृहमंत्री चिदम्बरम का प्रणब दा से 36 का आंकड़ा है और दोनों अलग-अलग कैम्प में हैं इसलिए प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री से शिकायत की, गृहमंत्री से नहीं। नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक का क्षेत्र अति सुरक्षित क्षेत्र माना जाता है। अगर वित्त मंत्रालय में किसी ने टेपिंग यंत्र लगाए तो यह कौन हो सकता है? पहली बात तो यह है कि बिना अन्दर के सूत्र के कोई बाहरी ताकत, व्यक्ति इन कार्यालयों में पहुंच ही नहीं सकता, क्योंकि यहां सुरक्षा इतनी कड़ी है। क्या कांग्रेस ने खुद अपने वित्तमंत्री की जासूसी करवाई? सुब्रह्मण्यम स्वामी का तो कहना है कि यह जासूसी पी. चिदम्बरम ने करवाई है। क्या यह काम किसी बाहरी देश का है? जो चूइंगम पाई गई वह विदेशी है। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि कोई विदेशी सरकार या ताकत ने जासूसी करवाई। यह सम्भावना भी है कि किसी औद्योगिक घराने ने यह जासूसी इसलिए करवाई हो ताकि उन्हें पता लग सके कि वित्त मंत्रालय में क्या चल रहा है?
पूरे प्रकरण से कई सवाल खड़े हो गए हैं। मसलन जब प्रणब मुखर्जी को इसका पता था तो उन्होंने आईबी को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी? क्योंकि आईबी के कार्यक्षेत्र में ही यह काम आता है और सर्वेलांस और एंटी सर्वेलांस में वह महारथ रखती है। प्रणब मुखर्जी ने सीबीडीटी को छानबीन के लिए क्यों कहा, क्योंकि उसका यह काम नहीं और उसे मालूम भी नहीं कि ऐसी स्थितियों से कैसे निपटना है। रिपोर्ट के अनुसार सीबीडीटी ने किसी प्राइवेट खुफिया एजेंसी को बुलाकर जांच करवाई। आईबी को इसलिए नहीं बुलाया गया क्योंकि वह गृह मंत्रालय के आधीन है और प्रणब मुखर्जी गृह मंत्रालय को शामिल नहीं करना चाहते थे। बाद में आईबी को बुलाया गया और आईबी ने क्लीन चिट देते हुए कह दिया कि चूइंगम तो मिली है पर माइक्रोफोन कोई नहीं मिला। आईबी तो कहेगी ही? सरकार यह नहीं चाहेगी कि सच सामने आए और इस मामले को दबाने का हर सम्भव प्रयास करेगी। नॉर्थ ब्लॉक व साउथ ब्लॉक कार्यालयों को रोज रात बन्द करने की जिम्मेदारी एक अलग विभाग की है। बिना चॉभियों के यह कार्यालय कब और कैसे खुले ताकि बगिंग डिवाइस फिट की जा सकें? क्या कोई इस विभाग का आदमी मिला हुआ था?
वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी और उनके सलाहकारों की मंत्रालय के अन्दर जासूसी को लेकर जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आरोप लगाया है कि सोनिया गांधी के कहने पर प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई गई। डॉ. स्वामी ने कहा कि सोनिया गांधी के कहने पर हसन अली केस मामले में वित्तमंत्री की जासूसी कराई गई। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने जासूसी कराई। उन्होंने कहा कि उनकी जानकारी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के दबाव में प्रणब मुखर्जी झुकते नजर आ रहे थे। कई बड़े नामों का खुलासा हो सकता था। इसलिए प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई गई। वहीं स्वामी के आरोप के बाद राजनीतिक गहमागहमी तेज हो गई है। लोकसभा विपक्ष के नेता व तेज-तर्रार भाजपा की सुषमा स्वराज ने इस जासूसी कांड को अमेरिका के वॉटरगेट स्कैंडल का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि वित्तमंत्री कार्यालय की जासूसी का मामला अत्यंत गम्भीर है। वित्तमंत्री स्वयं इसे खारिज करने की कोशिश कर सकते हैं, वह किन्हीं दबावों में हो सकते हैं। लेकिन देश असलियत जानना चाहता है। विपक्ष के हमलों को देखते हुए सरकारी तंत्र भी सक्रिय हुआ और सरकार की मीडिया संबंधी मंत्रिमंडलीय समूह ने भी इस बारे में विचार किया। इसके बाद कांग्रेस ने सफाई देने के बजाय भाजपा के आरोपों को उसकी पांच राज्यों के चुनाव में हार की हताशा करार दिया। देश जानना चाहता है कि इसमें सच क्या है? यह अत्यंत गम्भीर मामला है। इस मामले से कई तरह के प्रश्न खड़े हो गए हैं। सरकार को इस मामले में लीपापोती करने की बजाय मंत्रियों की जासूसी करने वालों का खुलासा करना चाहिए। यह मामला देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े होने के अलावा देश की सुरक्षा से भी जुड़ा हो सकता है। मामले की पूरी जांच होनी चाहिए और सच्चाई जनता के सामने आनी ही चाहिए। प्रणब मुखर्जी एक बहुत सुलझे हुए, समझदार मंत्री हैं। अगर उन्हें दाल में कुछ काला नहीं दिखा होता तो वह जांच की मांग करते ही नहीं? और फिर गृह मंत्रालय को छोड़कर सीधा प्रधानमंत्री को शिकायत क्यों की?
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Thursday, 9 June 2011

उमा भारती की वापसी : सही दिशा में सही कदम


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th June 2011
अनिल नरेन्द्र
अंतत भाजपा के प्रधानमंत्री पद के तमाम दावेदारों के विरोध के बावजूद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उमा भारती को वापस पार्टी में शामिल कर लिया है। जब उमा भारती को भाजपा में फिर शामिल करने की घोषणा गडकरी पार्टी मुख्यालय में कर रहे थे तो उनका धुर विरोध करने वाले अरुण जेटली व सुषमा स्वराज और वेंकैया नायडू नदारद थे। दरअसल उमा भारती की वापसी के पीछे कई कारण, कई मजबूरियां थीं। सबसे अहम बात तो यह है कि आजकल सभी पार्टियों का फोकस मिशन यूपी 2012 पर लगा हुआ है। भाजपा नेतृत्व यह समझ रहा है कि कांग्रेस की हवा दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है पर इससे भाजपा का रास्ता आसान नहीं हो रहा है। दिल्ली की गद्दी का रास्ता वाया यूपी आता है। इसलिए अगर उत्तर प्रदेश में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो दिल्ली दरबार तक पहुंचना आसान नहीं होगा। यूपी में वैसे भी भाजपा के नेतृत्व का अभाव है, जो नेता हैं वह तमाम पूंके कारतूस की तरह हैं। भाजपा को यूपी में नई जान पूंकने के लिए एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो युवाओं, महिलाओं, पिछड़ों व हिन्दुत्व वोटों को एक साथ पार्टी के पीछे ला सके। उमा भारती में नितिन गडकरी को लगा कि यह सब खूबियां मौजूद हैं। वह कुशल प्रशासक भी हैं। जब वह मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने अच्छा शासन दिया था। उन्हीं के बल पर पार्टी सत्ता में आई थी।

उमा भारती की छह साल बाद वापसी हुई है। भाजपा नेतृत्व व रणनीतिकारों का मानना है कि जिस तरह से उमा भारती आक्रमक राजनीति करती हैं उनका मुकाबला उनके शब्दों और शैली में करने के लिए पार्टी के पास कोई वैसा नेता प्रदेश में मौजूद नहीं था जो उनकी भाषा में उनको जवाब दे सके। भाजपा का मानना है कि यदि पार्टी को उत्तर प्रदेश में सीटों में बढ़ोतरी न भी कर पाए तो भी वह जिस शैली में भाषण देती हैं उससे पार्टी के एक माहौल बनाने में सहायता अवश्य मिलेगी। सामाजिक संरचना की दृष्टि से भी अगर देखा जाए तो पार्टी को कद्दावर नेता रहे कल्याण सिंह की पार्टी से छुट्टी और पुनर्वापसी के बाद भी पार्टी अपने रुठे पिछड़े वर्ग को पार्टी में जोड़ने में असफल रही। उमा भारती का लोद जाति का होना भी पार्टी के लिए अच्छा है। हो सकता है कि जातिवाद की राजनीति के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग शायद उमा के कारण पार्टी से जुड़ जाए?

उमा भारती की मुश्किल यह है कि जब उन्हें गुस्सा आता है तो वह सब कुछ भूल जाती हैं और अपने आपे से बाहर हो जाती हैं। मुझे वह सीन आज भी याद है जब लगभग साढ़े पांच वर्ष पूर्व उमा भारती ने मीडिया के सामने ही लाल कृष्ण आडवाणी की उपस्थिति में पार्टी के कुछ लोगों पर ऑफ द रिकॉर्ड बात करने, छवि खराब करने और अपनी उपेक्षा का आरोप लगाया था और भरी मीटिंग से उठकर चली गई थीं। तब भाजपा संसदीय बोर्ड ने छह दिसम्बर 2005 को उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया था। जहां हम समझते हैं कि श्री नितिन गडकरी ने सही दिशा में एक सही कदम उठाया है वहीं उमा ने भी पिछले पांच-छह सालों में सीख ली होगी और भविष्य में वह अनुशासन की लक्ष्मण रेखा नहीं लांघेंगी।
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Tuesday, 17 May 2011

भाजपा के इस शर्मनाक प्रदर्शन का जिम्मेदार कौन?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 May 2011
अनिल नरेन्द्र
भाजपा के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बेहद निराशाजनक रहे। असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और प. बंगाल में भाजपा राष्ट्रीय दल के रूप में पहचान के लिए तरस गई। कर्नाटक में उपचुनावों में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने जरूर अपना दबदबा बनाए रखा। चुनावों में पहली बार भाजपा के बड़े नेताओं की अपनी रणनीतिक कौशल दिखाने के लिए ड्यूटी लगाई गई थी, लेकिन कोई भी नेता अपना चमत्कार नहीं दिखा सका। भाजपा को असम और पश्चिम बंगाल में अच्छे परिणाम की उम्मीद थी। पार्टी को केरल में भी अपना खाता खोलने की पूरी उम्मीद थी। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के पास दक्षिण के राज्यों तमिलनाडु और केरल की कमान थी। विजय गोयल के पास असम और चन्दन मित्रा के पास पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी थी। उनके ऊपर सुपर बोस थे अरुण जेटली।
भाजपा को सबसे बड़ा झटका असम में लगा है। सवाल हो रहा है कि आखिर पूर्वोत्तर के इस राज्य में भाजपा क्यों पिटी? वह भी तब जबकि सबसे ज्यादा ताकत भाजपा नेतृत्व ने इसी राज्य में लगाई थी। पार्टी के चार-चार महासचिव असम में डेरा डाले रहे। पार्टी के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर अरुण जेटली तक लोगों से वोट मांगने के लिए उतरे। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने दर्जनों सभाएं संबोधित की। लेकिन इन सबके बाद भी पार्टी की लुटिया डूब गई। राज्य में सरकार बनाने का सपना पाले भाजपा के नेताओं को उम्मीद थी कि असम गण परिषद (एजीपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बाद सरकार बन जाएगी और सरकार न भी बनी तो पार्टी एक बड़ी ताकत के रूप में उभरेगी। मगर पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में जीतीं 10 सीटों का आंकड़ा भी नहीं छू पाई और असम की विधानसभा में पार्टी की ताकत आधी हो गई।
पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भाजपा खाता खोलने के लिए ही चुनाव लड़ रही थी पर केरल में उसका यह सपना इस बार भी साकार नहीं हो पाया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी ने तो कटाक्ष भी किया कि भाजपा खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहती है लेकिन पांच राज्यों की लगभग 800 विधानसभा सीटों में से वह आठ सीटें भी नहीं जीत पाई। पश्चिम बंगाल में भाजपा को एक सीट मिली है जबकि असम में चार सीटों से ही संतोष करना प़ड़ा। बाकी कहीं खाता नहीं खुल सका है। अब भाजपा नेतृत्व भले ही यह कहकर अपनी झेंप मिटा रही हो कि हमें तो पहले से ही बहुत उम्मीद नहीं थी। भाजपा नेताओं ने केरल में अपनी पूरी ताकत इसलिए लगाई थी कि अगर वहां कमल खिल जाता तो वह इस बात का ढिंढोरा पीट सकती थी कि दक्षिण के लालगढ़ में भी हम पहुंच गए हैं। भाजपा को केरल में 9 फीसदी वोट जरूर मिले पर खाता नहीं खोल पाई। असम और प. बंगाल में भाजपा के लिए सबसे रणनीतिक असफलता यह रही कि दोनों ही राज्यों में पार्टी का किसी दल या गठबंधन के साथ तालमेल नहीं हो पाया। इस शर्मनाक प्रदर्शन के लिए जवाब कौन देगा? राज्य के प्रभारी और महासचिव विजय गोयल, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वरुण गांधी या फिर खुद अध्यक्ष नितिन गडकरी?