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Tuesday, 30 April 2024
मोदी के बयान पर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया
सत्ताधारी भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने के लिए अपना पूरा दमखम लगा रही है, तो वहीं इंडिया गठबंधन भी ऐड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है। ऐसे में नेताओं के भाषण, उनके दावे और दूसरी पार्टियों के नेताओं को लेकर दिए बयान रोज अखबारों की सुर्खियों में आ रहे हैं। लेकिन पहले चरण के मतदान के बाद प्रधानमंत्री का दिया एक भाषण विशेष रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है। भारतीय मीडिया के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे अपने पन्नों पर जगह दी है। इस्तेमाल किए गए कुछ खास शब्दों के कारण ये भाषण चुनाव आयोग में पीएम मोदी की शिकायत का कारण भी बना है। 19 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग खत्म हुई, इसके बाद 21 अप्रैल को राजस्थान के बांसवाड़ा में चुनावी रैली में दिए गए भाषण में पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक पुराने भाषण का हवाला दिया और मुसलमानों पर टिप्पणी की। पीएम मोदी ने अपने भाषण में समुदाय विशेष को घुसपैठिए और ज्यादा बच्चे पैदा करने वाला जैसी बातें कहीं। अपने भाषण में मोदी ने कहा पहले जब उनकी सरकार थी तब उन्होंने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला हक मुसलमानों का है। इसका मतलब ये संपत्ति इकट्ठा करके किसको बांटेंगे जिनके ज्यादा बच्चे हैं, उनको बांटेंगे, घुसपैठियों को बांटेंगे, क्या आपको यह मंजूर है। हालांकि पीएम मोदी ने मनमोहन सिंह के जिस 18 साल पुराने भाषण का जिक्र किया है, उसमें मनमोहन सिंह ने ऐसा कुछ नहीं कहा था। साल 2006 में मनमोहन सिंह ने कहा था, अनुसूचित जातियों, जनजातियों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। हमें नई योजनाएं लाकर ये सुनिश्चित करना होगा कि अल्पसंख्यकों का और खासतौर पर मुसलमानों का भी उत्थान हो सके, विकास का फायदा मिल सके। इन सभी का संसाधनों पर पहला दावा होना चाहिए। अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने 22 अप्रैल को इसे लेकर मोदी पर चुनावी रैली में मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण देने का आरोप शीर्षक से रिपोर्ट अपनी वेबसाइट पर छापी। उसने लिखा है कि बांसवाड़ा में दिए। भाषण के बाद 22 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में मोदी ने इसी तरह का एक और भाषण दिया। इस रिपोर्ट में भारत की नागरिकता कानून का भी जिक्र किया गया। लिखा गया है कि इस कानून की ये कहकर आलोचना की गई कि इसमें धर्म के आधार पर नागरिकता देने की बात कही गई है जो देश की धर्मनिरपेक्षता के मूलभूत सिद्धांतों से अलग है। टाइम मैगजीन ने भी लिखा है कि भारत की आबादी 1.44 अरब है और मोदी जी और भाजपा की आलोचना मुस्लिम समुदाय को बाहर से आए विदेशियों के रूप में देखने के लिए होती रही है। आलोचक कहते हैं कि मोदी की टिप्पणी का आधार विभाजनकारी हिन्दु राष्ट्रवाद है जिसके तार सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़े हैं। न्यूयार्क टाइम्स ने इस पर 23 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मोदी ने भारत के मुसलमानों को घुसपैठिया क्यों कहा? क्योंकि वो ऐसा कर सकते थे। न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि अपनी सत्ता को सुरक्षित मानकर पीएम मोदी आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर देश के विकास को लेकर वैश्विक नेता के तौर पर खुद को पेश कर रहे थे। ऐसा करके वो पार्टी के प्रचलित विभाजनकारी रवैये से खुद को अलग रखे हुए थे। इस तरह के मामलों में उनकी चुप्पी थी। इस बीच कट्टरपंथ सोच वाले गैर हिन्दू समुदायों को निशाना बना रहे थे और उनकी पार्टी के सदस्य संसद में नस्लीय और नफरती शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे। अल जजीरा ने लिखा है कि स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने पुष्टि की है कि उन्हें मोदी के भाषण से जुड़ी शिकायतें मिली हैं जिनकी वह जांच कर रही है।
-अनिल नरेन्द्र
Saturday, 9 June 2012
संघ चाहता है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़े
भाजपा में बढ़ते अंतर्पलह का एक सबूत संजय जोशी का पार्टी छोड़ना है। पहले बेइज्जत करके संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकाला गया और अब पार्टी से ही निकलने पर मजबूर कर दिया गया। यह सब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के इशारों पर अध्यक्ष नितिन गडकरी ने किया। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि गडकरी तो मुखौटा हैं असल ताकत तो संघ है और संघ ने अन्दरखाते यह फैसला कर लिया है कि एक तरफ वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को डाउन करना है दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करना है। तभी तो संघ के मुखपत्र आर्गनाइजर के ताजा अंक में कहा गया है कि कांग्रेस पार्टी का तेजी से ग्रॉफ गिर रहा है लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को कांग्रेस के इस ह्रास का फायदा उठा पाना भी मुश्किल नजर आ रहा है। केवल मोदी ही ऐसा चेहरा हैं जिनमें पार्टी को उभारने और देशभर में उसके वोट आधार का विस्तार करने की क्षमता है जैसे अटल बिहारी वाजपेयी ने नब्बे के दशक में करके दिखाया था। अगर संघ इस नतीजे पर वाकई ही पहुंच चुकी है तो क्यों नहीं खुली घोषणा कर देता कि संघ और भाजपा 2014 का लोकसभा चुनाव नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ेगा? श्री नरेन्द्र मोदी की छवि कट्टर हिन्दुत्व की है। अटल जी की छवि और मोदी की छवि में बहुत फर्प है। अटल जी सबको साथ लेकर चलते थे। मोदी के काम करने का अपना ही ढंग है, यह न तो कार्यकर्ता की परवाह करते हैं, न नेता की और न ही संघ की। उनकी महत्वाकांक्षाएं अब संघ और भाजपा से ऊपर हो गई हैं। वह इनको कुछ नहीं समझते। कल तक इन्हीं गडकरी साहब की मोदी से अनबन थी पर अब संघ के इशारे पर गडकरी को मोदी से समझौता करना पड़ा है और इस सौदे की गडकरी को क्या कीमत देनी पड़ी है संजय जोशी के केस से पता चलता है। हमें लगता यह है कि संघ मोदी को आडवाणी के खिलाफ खड़ा कर रहा है। आडवाणी को किनारे लगाने के लिए संघ किसी भी हद तक जा सकता है। जब संघ को यह विश्वास हो गया कि अब अटल जी राजनीति में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकते तो उसने आडवाणी की काट करनी आरम्भ कर दी और विडम्बना यह है कि खुद श्री आडवाणी ने उन्हें बहाना भी गलती से दे दिया। मैं जिन्ना के बयान की बात कर रहा हूं। कभी राजनाथ सिंह को आगे करके तो कभी दूसरी पंक्तियों के नेताओं को उकसा कर आडवाणी को डाउन करने का प्रयास होता रहा। कटु सत्य तो यह है कि आज भी आडवाणी के सामने अन्य सभी भाजपा नेता बौने लगते हैं। नरेन्द्र मोदी बेशक एक काबिल और धाकड़ छवि वाले नेता हैं पर उन्हें भाजपा के अन्दर और बाहर कितना स्वीकार किया जाएगा, यह कहना मुश्किल है। अगर नरेन्द्र मोदी को भावी पीएम प्रोजेक्ट किया जाता है तो भाजपा में ही घमासान मच जाएगा। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, डाक्टर मुरली मनोहर जोशी सभी अपने दावे पेश कर सकते हैं। फिर राजग के दूसरे घटक दलों जिनमें नीतीश कुमार, बाल ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल जैसे दिग्गज प्रमुख हैं, क्या मोदी को स्वीकार करेंगे? आडवाणी जी ऐसे नेता हैं जिनकी छतरी के नीचे राजग सहयोगी दल संगठित हो सकते हैं। कांग्रेस के खिलाफ माहौल इतना खराब है कि क्या कह सकते हैं शायद मुसलमान भी मोदी की जगह आडवाणी का समर्थन कर दें? पर आडवाणी के ऊंचे कद के बावजूद आरएसएस उन्हें डाउन करने के लिए किसी हद तक जाने को तैयार है। पहले राजनाथ सिंह को खड़ा किया गया, वह फेल हो गए अब नरेन्द्र मोदी को खड़ा किया जा रहा है यानि संघ ऐसा करने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार है पर संघ अपने ही बुने जाल में फंसता नजर आ रहा है और आडवाणी के खिलाफ मोदी को विकल्प के रूप में आगे करने की रणनीति संघ के ही खिलाफ साबित हो रही है। अब संघ को यह समझ नहीं आ रहा है कि वह मोदी की शर्तों को अस्वीकार कैसे करे? विवश होकर संघ मोदी से ब्लैकमेल हो रहा है। असल में संघ को यह अनुमान शायद नहीं था कि नरेन्द्र मोदी अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक ही राजनीति करेंगे। उन्होंने अपनी राजनीतिक दबंगई से जिस तरह प्रवीण तोगड़िया सरीखे के संघ के नेताओं को प्रभावहीन बना दिया उसी तरह अपने विरोधियों को षड्यंत्र और राजनीतिक सौदेबाजी के तहत निपटाने में संकोच नहीं किया। नरेन्द्र मोदी की इस दबंगई की वजह से आज पूरी दुनिया में भाजपा की छवि मुस्लिम विरोधी और दंगाई की बनी हुई है। हिन्दुत्व के झंडाबरदारों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि देश में उदार हिन्दुत्व तो ठीक है किन्तु हिंसक एवं कट्टर हिन्दुत्व का समर्थन बहुसंख्य हिन्दू भी नहीं करते। इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं कि केंद्रीय राजनीति में मोदी प्रासंगिक और स्वीकार्य हों? भारत गुजरात नहीं। राज्य में जो चले यह जरूरी नहीं कि पूरे देश में भी वही चले। अभी तो संघ की गलत रणनीति के दुष्परिणाम की शुरुआत है। उसने भाजपा के परम्परागत सिस्टम के खिलाफ जो प्रयोग शुरू किया उसकी विकृति स्वरूप परिणाम भी आने शुरू हो गए हैं। सरल भाषा में कहें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेन्द्र मोदी को भस्मासुर के रूप में तैयार कर दिया है। किन्तु जैसा कि संघ से जुड़ी पत्र-पत्रिकाएं एवं नेता नरेन्द्र मोदी को लगातार नसीहतें दे रहे हैं, उसे छोड़ें और अपना दिल बड़ा करें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भाजपा में अब संगठन पहले नेता बाद में का सिद्धांत समाप्त हो गया है। अब भाजपा संघ की प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी बन चुकी है जिसके एमडी नितिन गडकरी हैं और यह पार्टी को अपनी निजी कम्पनी की तरह चला रहे हैं। मात्र दो सीटों से लोकसभा में भाजपा को पौने दो सौ तक पहुंचाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी की तुलना में नरेन्द्र मोदी कितने सफल साबित होंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा किन्तु इतना तो तय है कि मोदी को भाजपा के अन्दर ही कई मोर्चों पर जूझना पड़ेगा। अभी लोकसभा चुनाव में दो वर्ष शेष हैं, ऐसी हालत में संघ की आडवाणी विरोधी मुहिम भी पिट सकती है। आडवाणी जी को संघ और भाजपा मिलकर भी चाहे जितना पीछे धकेलने की कोशिश करे किन्तु वास्तविकता तो यही है कि उनके सामने गडकरी और नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर दोनों में इन दोनों का व्यक्तित्व बौना लगता है। अगर आने वाले दिनों में यदि आडवाणी ने भाजपा से ही किनारा कर लिया तो पार्टी में विभाजन तक हो सकता है क्योंकि संघ की घटिया राजनीति की वजह से भाजपा का कोई भी नेता दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहा है और इसीलिए पार्टी में कई गुट सक्रिय हैं। जाहिर है कि इन गुटों का परस्पर संघर्ष पार्टी को कमजोर ही करेगा और यदि अंतर्पलह के कारण 2014 में भाजपा को मात मिलती है तो इसके लिए पूरी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार होगा। यदि संघ को भाजपा की चिन्ता होती तो वह पार्टी में उठापटक कराने के लिए आडवाणी के खिलाफ दूसरी पंक्ति के नेताओं को उकसाने और एकजुट करने का काम नहीं करता। यदि उसको जरा भी राजनीतिक समझ होती तो क्रम परम्परा, अटल जी के बाद आडवाणी जी और उनके बाद डॉ. मुरली मनोहर जोशी, से छेड़छाड़ न करता। सच तो यह है कि अब संघ खुद भी दिग्भ्रमित और अविश्वसनीय होता जा रहा है। एक वक्त था जब लोग मानते थे कि यदि भाजपा इतनी अनुशासित है तो संघ कितना अनुशासित होगा। लेकिन अब लोग भाजपा और संघ में कोई अन्तर नहीं करते, लोग अब दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू मान रहे हैं। अब फैसला संघ को करना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा चुनाव लड़ेगी या नरेन्द्र मोदी के?
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, L K Advani, Modi, Narender Modi, RSS, Sanjay Joshi, Vir Arjun
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Sunday, 27 May 2012
दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए
भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भारी पड़ गए। पार्टी में संघ की नहीं चली और संजय जोशी को भाजपा कार्य समिति की बैठक से पहले बाहर का रास्ता दिखाना ही पड़ा। मोदी के दबाव में गडकरी और संघ नतमस्तक दिखे। पार्टी सूत्रों ने बताया कि मोदी ने साफ कहा कि अगर कार्य समिति में संजय जोशी आए तो बैठक से खुद को दूर रखने को मजबूर होंगे। गडकरी ने बुधवार शाम को फोन से बात की थी। गडकरी ने कोर कमेटी की बैठक में मोदी से बातचीत का सार रखा। सूत्रों के मुताबिक कुछ वरिष्ठ भाजपा नेता मोदी की धमकी को स्वीकार्य करने के इच्छुक नहीं थे मगर गडकरी और संघ के दबाव के चलते संजय जोशी को दो लाइन का इस्तीफा फैक्स से भेजना पड़ा। दरअसल मोदी और गडकरी में सौदे की सुगंध आ रही है। मोदी ने शर्त रखी कि जोशी को बाहर करो और गडकरी ने शर्त रखी कि मुझे दूसरा कार्यकाल देने का आप समर्थन करें। अब लगता है कि गडकरी के दूसरे कार्यकाल मिलने में सभी रुकावटें दूर हो गई हैं और उन्हें दूसरा कार्यकाल मिलना लगभग तय है। गडकरी का तीन साल का कार्यकाल 25 दिसम्बर को पूरा हो रहा है। इस प्रस्ताव के लिए बाकायदा संगठन के संविधान में संशोधन किया जाना प्रस्तावित था, जिसे अमली जामा पहनाया गया। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने औपचारिक रूप से बैठक में अध्यक्ष के कार्यकाल को एक्सटेंशन दिए जाने का प्रस्ताव रखा जिसका दूसरे पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने अनुमोदन किया। इस सौदे का एक पहलू यह भी है कि केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य छत्रप के प्रभाव को स्वीकार कर लिया है। यह न तो भाजपा के लिए अच्छा संकेत है और न ही संघ के लिए। राष्ट्रीय पार्टी की छवि को लेकर जिस भाजपा को राष्ट्रवाद और अनुशासन के लिए जाना जाता था अब उस सिद्धांत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। भाजपा का बौना होता नेतृत्व और उस पर हावी होते राज्य छत्रप संघ के लिए चुनौती बन गए हैं। राजस्थान में वसुंधरा राजे, गुजरात में नरेन्द्र मोदी और कर्नाटक में वीएस येदियुरप्पा से जो चुनौतियां मिल रही हैं वह भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभरने से भी रोक रही है। भाजपा अध्यक्ष गडकरी के कार्यकाल को बढ़ाकर संघ भाजपा पर अपनी पकड़ जरूर साबित करना चाह रहा है लेकिन वह इकबाल और इस्तकबाल नहीं दिख रहा जो भाजपा में पहले होता था। भाजपा के इतिहास में यह पहला मौका है जब भाजपा को संघ की ओर से नियुक्त करवाए गए व्यक्ति को हटाना पड़ा है। इससे भी साबित होता है कि संघ की भाजपा पर पकड़ कमजोर होती जा रही है। हमें लगता है कि भाजपा के अन्दर भी ऐसे नेता हैं जो चाहते हैं कि संघ की भाजपा मामलों में दखलअंदाजी कम हो। पूरे प्रकरण में जहां नरेन्द्र मोदी की जीत हुई है वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक मायने में हार हुई है। इससे नरेन्द्र मोदी का कद और बढ़ेगा और दुनिया को उन्होंने साबित कर दिया कि दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए।
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, L K Advani, Narender Modi, Nitin Gadkari, RSS, Sushma Swaraj, Vir Arjun
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Saturday, 12 May 2012
The Amicus Curiae suggests prosecution against Narendra Modi
- Anil Narendra
The 2002 riots of Gujarat are not going to stop hounding Chief Minister Narendra Modi. Even after getting clean chit from the SIT a few days earlier, a new trouble has raised its head. The Amicus Curiae appointed by the Supreme Court has suggested that Modi can be tried under various IPC sections for inciting enmity within different communities during the 2002 riots. The report by Raju Ramachandran on the complaint by Zakia Jafferey is completely different from that of the SIT appointed by the Court. Earlier, the SIT had given clean chit to Modi and others. Expressing his opinion, the Amicus Curiae Ramachandran, in his report, has said that Modi can be prosecuted under sections 153a(1) (A) and (B) of the IPC, which relate to creating enmity among various communities on the basis of religion. He should also be tired under section 166. In its report, the SIT had rejected the allegations leveled by the suspended IPS officer, Sanjeev Bhatt that in view of Godhra incident of 27th February 2002, Modi had directed that let Hindus be allowed to vent their anger against Muslims and teach them a lesson. Bhatt has filed an affidavit in this regard before the Supreme Court. The SIT had handed over its report on Gulbarga Society riot to Zakia Jafferey. In the riots that followed the Godhara episode, 69 persons were killed, including Zakia's husband and former MP, Ehsan Jafferey. According to the Supreme Court Advocate, DK Garg, Zakia could base her plea in the High Court on this report of Amicus Curiae. After the refusal by the lower Court, this report is enough to support her case. The Congress Spokesperson, Manish Tiwari said that Modi cannot escape the truth that he was responsible for the massacre that followed the Godhara riots. Meanwhile, BJP leader, Arun Jaitley is of the opinion that there is no place for any advocate or amicus curiae under the IPC or under the Evidence Act and investigation is the responsibility of the Police not that of any advocate. BJP has come out in open to support Narendra Modi on the basis of the SIT report. BJP has said that Congress and some so-called activist organizations have started a campaign
against Narendra Modi to tarnish his image. At last, truth has prevailed. Javdekar said that since the SIT was constituted by the Supreme Court and there was no representative of the Gujarat Government on this team, therefore is has assumed great importance. Javdekar has asked, why the Congress, which is raising its eye-brow on Gujarat riots, had failed to get the rioters of 84-riots punishe, whereas the guilty of Gujarat riots have been punished and are still being punished. The Congress is tarnishing the image of Gujarat in the world without any reason.
against Narendra Modi to tarnish his image. At last, truth has prevailed. Javdekar said that since the SIT was constituted by the Supreme Court and there was no representative of the Gujarat Government on this team, therefore is has assumed great importance. Javdekar has asked, why the Congress, which is raising its eye-brow on Gujarat riots, had failed to get the rioters of 84-riots punishe, whereas the guilty of Gujarat riots have been punished and are still being punished. The Congress is tarnishing the image of Gujarat in the world without any reason.
Friday, 11 May 2012
एमिकस क्यूरी की नरेन्द्र मोदी पर मुकदमा चलाने की सिफारिश
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 11 May 2012
अनिल नरेन्द्र
2002 के गुजरात दंगे मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का पीछा छोड़ नहीं रहे। एसआईटी की ओर से क्लीन चिट मिले अभी कुछ दिन ही हुए कि नई पेरशानी सामने आ गई। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी (अदालत के मित्र) ने कहा है कि वर्ष 2002 के दौरान विभिन्न समूहों के खिलाफ दुश्मनी भड़काने के लिए आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत नरेन्द्र मोदी पर मुकदमा चलाया जा सकता है। जकिया जाफरी की शिकायत पर राजू रामचन्द्रन की रिपोर्ट अदालत द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) की रिपोर्ट के एकदम विपरीत है। एसआईटी ने इससे पहले मोदी और अन्य को क्लीन चिट दे दी थी। एमिकस क्यूरी रामचन्द्रन ने रिपोर्ट में कहा कि मेरी राय में मोदी के खिलाफ प्रथमदृष्टया जो अपराध का मामला बनता है वह आईपीसी की धारा 153ए(1)(ए) और (बी) के तहत है जिसके मायने हैं धर्म के आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी भड़काना। इसी तरह 153बी(1) राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाने से संबंधित है। मोदी पर धारा 166 के अंतर्गत भी मुकदमा चलाया जाना चाहिए। एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में निलंबित आईपीएस संजीव भट्ट के उन आरोपों को खारिज कर दिया था कि मोदी ने गोधरा कांड के मद्देनजर 27 फरवरी 2002 को बैठक में निर्देश दिया था कि हिन्दुओं को मुस्लिमों के खिलाफ गुस्सा निकालने और सबक सिखाने दिया जाए। भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस संबंध में हलफनामा दाखिल किया था। एसआईटी में गुलबर्ग सोसाइटी दंगे पर अपनी रिपोर्ट जाकिया जाफरी को सौंपी थी। गोधरा कांड के बाद हुए इन दंगों में जाकिया के पति और पूर्व सांसद एहसान जाफरी सहित 69 लोग मारे गए थे। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डीके गर्ग के अनुसार एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट को जाकिया हाई कोर्ट में आधार बना सकती है। निचली अदालत की ओर से इंकार के बाद यह रिपोर्ट उनके पक्ष को मजबूत करने के लिए काफी है। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि मोदी इस सच्चाई से नहीं भाग सकते कि गोधरा कांड के बाद हुए नरसंहार के लिए वह जिम्मेदार हैं। दूसरी ओर भाजपा नेता अरुण जेटली का मानना है कि आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता या एविडेंस एक्ट के तहत किसी वकील या एमिकस क्यूरी के विचार का कोई स्थान नहीं है। जांच पुलिस का काम है, किसी वकील का नहीं। एसआईटी की रिपोर्ट को आधार बनाकर भाजपा सोमवार को नरेन्द्र मोदी के समर्थन में खुलकर खड़ी हो गई। भाजपा ने कहा कि एसआईटी की रिपोर्ट से साबित हो गया है कि गुजरात और नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस और कुछ तथाकथित समाजसेवी संगठनों ने बदनाम करने का अभियान चलाया था। आखिर सत्य की जीत हुई है। जावडेकर ने कहा कि एसआईटी की रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका गठन सुप्रीम कोर्ट ने किया था और इसमें गुजरात सरकार का कोई भी अधिकारी नहीं था। जावडेकर ने कहा कि गुजरात दंगों पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस 84 के दंगों के दंगाइयों को अब तक सजा क्यों नहीं दिला सकी? जबकि गुजरात दंगों के दोषियों को सजा मिली है और मिल रही है। कांग्रेस बिना वजह गुजरात को दुनिया में बदनाम कर रही है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Gujarat, Narender Modi, Supreme Court, Vir Arjun
Tuesday, 24 April 2012
भाजपा में सत्ता की तीन धुरियां
भारतीय जनता पार्टी में नगर निगम चुनाव जीतने के बाद एक नया उत्साह है। उन्हें लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बाजी मार सकती है पर सबसे बड़ी कमी जो उभर कर आ रही है वह है क्लीयर नेतृत्व का अभाव। यह किसी से छिपा नहीं कि पार्टी के एक बड़े धड़े खासकर सांसदों के मन में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था कि आखिर यूपीए-2 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के मुद्दे पर घिरी रही। लेकिन सरकार की विफलता का भाजपा को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। इसके चलते केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए पार्टी को लोकसभा चुनाव पूर्व अपना पीएम उम्मीदवार घोषित करने की दरकार है। इस समय यह स्थिति है कि भाजपा तीन धुरियों पर चल रही है। सबसे पहले हैं श्री नितिन गडकरी जो पार्टी अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन है। दूसरी तरफ हैं डी-4 नेता। इनमें आडवाणी जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली प्रमुख हैं। तीसरी धुरी नरेन्द्र मोदी हैं जो अपने आपको पार्टी से ऊपर मानते हैं और प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार मानते हैं। इन तीनों धुरियों में सभी नेता अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। नितिन गडकरी के एक तरफ नरेन्द्र मोदी से मतभेद हैं वहीं दूसरी ओर 5-4 से अकसर खींचतान होती रहती है। ताजा उदाहरण सुरेन्द्र सिंह आहलूवालिया का पहले राज्यसभा से टिकट काटना और फिर जब डी-4 ने जोरदार विरोध किया तो उन्हें फिर से उम्मीदवार घोषित करना। कई माह से गडकरी और नरेन्द्र मोदी के बीच बातचीत तक नहीं हो रही है। संवादहीनता की इस स्थिति को गडकरी ने खुद स्वीकारा है। सवाल यह भी किया जा रहा है कि गडकरी ने मोदी से संवादहीनता की बात सार्वजनिक रूप से क्यों कही? यह बात किसी से छिपी नहीं कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को पुन भाजपा में सक्रिय किए जाने के फैसले से नाराज हैं। गडकरी ने संजय जोशी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खासा महत्व दिया। इसी के बाद दोनों में `कुट्टी' हो गई। रहा सवाल भाजपा की ओर से कौन होगा पीएम उम्मीदवार तो भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने गुरुवार को हैदराबाद में कहा कि अगले आम चुनाव से पहले पार्टी अपना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित कर देगी। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले हम अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे, अभी हम अपना उम्मीदवार बताने की स्थिति में नहीं हैं। उधर नरेन्द्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में आने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। पिछले दिनों प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के विरोध में सारे मुख्यमंत्री दिल्ली में एकत्र हुए थे। मोदी ने विशेष रूप से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और बीजू जनता दल प्रमुख और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ बैठक की। हालांकि ऊपरी स्तर पर तो यह बैठक केंद्र सरकार के प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र को लेकर थी पर अन्दर खाते 2014 लोकसभा चुनावों पर भी चर्चा हुई होगी। मोदी ने अपने आपको पीएम उम्मीदवार दर्शाने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं। आने वाले दिनों में यह अंतर्पलह और तेज होना स्वाभाविक है।
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Friday, 13 April 2012
क्या नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत उम्मीदवार हैं
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 13 April 2012
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर सुर्खियों में हैं। देश के अन्दर तो उनकी इतनी चर्चा नहीं हो रही जितनी विदेशों में है। अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट के स्तम्भकार सीमोन डेयनार ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 के आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के सबसे सशक्त दावेदार होंगे। भारत में काफी लोग उन्हें रोल मॉडल के रूप में देखते हैं। कुछ लोगों की नजर में वह देश के सबसे योग्य नेता हैं। हालांकि एक बड़ा वर्ग आज भी उन्हें मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार के लिए माफ नहीं कर पाया है। रिपोर्ट में लिखा है कि नरेन्द्र मोदी को भारत की राजनीति में सबसे जटिल व्यक्तित्व वाला राजनेता माना जा सकता है। मोदी की अगुवाई में गुजरात जैसे राज्य की अर्थव्यवस्था ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। लेकिन मुख्यमंत्री की हिन्दू राष्ट्रवादी छवि से काफी लोगों को लगता है कि उनके नेतृत्व में कट्टर धार्मिक शक्तियों को बल मिलेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी जैसे नेता की अगुवाई में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पुरानी सैक्यूलर छवि को धक्का लग सकता है। नरेन्द्र मोदी को राज्य में भ्रष्टाचार खत्म करने के साथ आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति देने का श्रेय जाता है। तेजी से आगे बढ़ती गुजरात की अर्थव्यवस्था में न सिर्प देशी कम्पनियां बल्कि बड़ी संख्या में विदेशी कम्पनियों ने भी गुजरात में निवेश किया है। मोदी के आलोचक भी उन्हें निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं मानते। साल 2014 में होने वाले आम चुनाव के बाद भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार हो सकते हैं नरेन्द्र मोदी।
श्री नरेन्द्र मोदी की इस प्रकार की प्रोजेक्शन से जहां मुसलमान समुदाय परेशान है वहीं उनकी अपनी पार्टी के कुछ लोग भी खुश नहीं हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच मोदी को मिल रहे व्यापक समर्थन के चलते संघ परिवार के भीतर भी समीकरण बदल रहे हैं। इसका कारण है कि संघ की प्रवासी भारतीयों में गहरी पैठ है। अमेरिका, चीन और जापान का उद्योग क्षेत्र मोदी के साथ व्यापारिक संबंधों को बेहतर बनाने में लगा है। हालांकि भाजपा और संघ का एक बड़ा वर्ग मोदी को किनारे लगाने में लगा है ताकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताकतवर होकर न उभर पाएं। इसलिए संगठन स्तर पर मोदी की छवि खलनायक वाली बनाने की भी कोशिश हो रही है और कुछ हद तक मोदी खुद ऐसी छवि बनाने के लिए बारूद दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार न करना और पिछले वर्ष दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में न आना मोदी की संगठन विरोधी गतिविधियों को दर्शाता है। बहुत से भाजपाइयों का कहना है कि मोदी अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। मोदी के दिमाग में अब गरूर आ गया है। दुनिया के 100 प्रभावशालियों के लिए कराए जा रहे टाइम्स पत्रिका के सर्वे में मोदी ने ओबामा और ब्लादिमीर पुतिन को पछाड़ दिया है। माना जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन देश-विदेश में हो रहे सर्वेक्षणों में लोकप्रियता के हिसाब से नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी से पीछे हैं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Modi, Narender Modi, Nitin Gadkari, Nitish Kumar, RSS, Vir Arjun
श्री नरेन्द्र मोदी की इस प्रकार की प्रोजेक्शन से जहां मुसलमान समुदाय परेशान है वहीं उनकी अपनी पार्टी के कुछ लोग भी खुश नहीं हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच मोदी को मिल रहे व्यापक समर्थन के चलते संघ परिवार के भीतर भी समीकरण बदल रहे हैं। इसका कारण है कि संघ की प्रवासी भारतीयों में गहरी पैठ है। अमेरिका, चीन और जापान का उद्योग क्षेत्र मोदी के साथ व्यापारिक संबंधों को बेहतर बनाने में लगा है। हालांकि भाजपा और संघ का एक बड़ा वर्ग मोदी को किनारे लगाने में लगा है ताकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताकतवर होकर न उभर पाएं। इसलिए संगठन स्तर पर मोदी की छवि खलनायक वाली बनाने की भी कोशिश हो रही है और कुछ हद तक मोदी खुद ऐसी छवि बनाने के लिए बारूद दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार न करना और पिछले वर्ष दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में न आना मोदी की संगठन विरोधी गतिविधियों को दर्शाता है। बहुत से भाजपाइयों का कहना है कि मोदी अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। मोदी के दिमाग में अब गरूर आ गया है। दुनिया के 100 प्रभावशालियों के लिए कराए जा रहे टाइम्स पत्रिका के सर्वे में मोदी ने ओबामा और ब्लादिमीर पुतिन को पछाड़ दिया है। माना जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन देश-विदेश में हो रहे सर्वेक्षणों में लोकप्रियता के हिसाब से नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी से पीछे हैं।
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Sunday, 25 March 2012
Party may go to hell, Gadkari’s business is on the rise.
Anil Narendra
Most of the leaders of Bhhartiya Janata Party do not agree with the style of functioning of BJP President Nitin Gadkari. Gadkari is considered to be a representative of the Rashtriya Swayamsewak Sangh, and he became BJP President with the support of the RSS. Gadkari is a businessman and he is running BJP like his own shop. The recent controversy is related to the distribution of Rajya Sabha tickets. There sharp arguments at the BJP Parliamentary Party meeting on Tuesday over the issue of setting aside the deserving Party candidate and giving ticket to a person allegedly on the basis of money power. A number of MPs under the leadership of Yashwant Sinha criticized the Party leadership for not fielding an official candidate, but supporting a businessman, Anshuman Mishra. Sinha said that the Party MLAs should not be left at the mercy of 'the horse trading bazaar'. It causes the Party's discipline to break and blemishes its image. He said that in case the strategy was not changed in the present Rajya Sabha elections in Jharkhand, he would resign. Most of the MPs were displeased with SS Ahluwalia being denied Party ticket from Jharkhand. It is reported that the Sangh had vetoed on the name of Ahluwalia. MP from Himachal Pradesh, Shanta Kumar said that Ahluwalia is an influential leader of the Upper House and he must have been allowed one more term. Nawada MP Bhola Singh said that Party's self-consciousness had been shattered and it had prostrated before the money power. Maneka Ghandhi, an MP from Anwala appealed to the central leadership to end the Karnataka crisis and consider the demands made by Yediyurappa. Denial of Rajya Sabha ticket to Ahluwalia has fulfilled the wishes of the Congress and Mayawati. Ahluwalia have been cornering the government on all the issues, which had added to the problems of the government. Mayawati also wanted that Ahluwalia should not be allowed second term as an MP, as he would have to surrender his government house at 10 Gurudwara Rakab Ganj. Had Gadkari wanted, he would have sent Ahluwalia to the Rajya Sabha. He was short of his victory by just 11 votes. Under the circumstances, he could have made up this shortage with the help of JD(U), but in spite of his talking to Gadkari for this seat earlier, Gadkari with Sushil Modi left this seat for JD(U) and the Bihar JD(U) chairman, and Vashishtha Singh was fielded from this seat. The most delicate situation in the Party's Parliamentary Committee meeting was that of LK Advani, who sat as a silent spectator throughout the meeting. The impact of the rebellious mood of MPs was evident immediately after. It is being said that now the Party would not press its MLAs to vote for any independent candidate, but efforts are being made that the BJP MLAs boycott the election. As a Party President, Gadkari led the election campaign in a dictatorial manner. First, with the support oj RSS, Gadkari appointed a Pracharak and former Organisation Secretary of RSS, Sanjay Joshi, the in charge of UP electioneering campaign, despite strong opposition from the high statured leader and the Chief Minister of Gujarat, Narendra Modi. Secondly, despite opposition from all Party leaders, Gadkari enrolled ousted BSP leaders Babu Singh Kushwaha and Badshah Singh as members of the Party. All the experiments, excepting that of Uma Bharati in Bundelkhand failed miserably. In order to stop the polarization of votes, fire-brand leaders, Varun Gandhi and Aaditya Nath were confined to their constituencies, while on the other hand, the leader with recognized Hinduism face, Narendra Modi was invited for electioneering, but when he expressed his displeasure, no effort to placate him was made.
Despite all its efforts, the Party not only failed to stop polarization of Muslim votes, but it also lost its traditional votes in this effort, which resulted in Party's failure even to revisit its performance of 2007.
Whether it is Uttarakhand or Punjab, the BJP has been down-graded in both the States. The popularity graph of BJP has been sliding downward, from the day, Gadkari has taken over as the President of the Party, but Nitin Gadkari is least bothered about this. In fact, he has been running the Party like a shop, with the sole aim of minting money and he is doing this job efficiently. Gadkari's shop is running will, Party may go to dogs.
Friday, 23 March 2012
गडकरी की हट्टी फल-फूल रही है, पार्टी जाए भाड़ में
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी के काम करने के तौर-तरीकों से अधिकतर भाजपा नेता सहमत नहीं हैं। गडकरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रतिनिधि माना जाता है, वह संघ के समर्थन से ही भाजपा अध्यक्ष बने। गडकरी एक बिजनेसमैन हैं जो भाजपा को अपनी निजी दुकान की तरह चला रहे हैं। ताजा बवाल राज्यसभा की टिकटों के बंटवारे को लेकर है। राज्यसभा चुनाव में पार्टी के सही उम्मीदवारों को दरकिनार करने और कथित रूप से पैसे के बल पर टिकट देने के मुद्दे पर मंगलवार को भाजपा संसदीय दल की बैठक में जमकर बवाल हुआ। यशवंत सिन्हा की अगुवाई में सांसदों ने झारखंड में पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार खड़ा न करके एक व्यवसायी अंशुमान मिश्रा को समर्थन देने को लेकर सीधे पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा दिया। सिन्हा ने कहा कि पार्टी विधायकों को `हार्स ट्रेडिंग की मंडी' में नहीं छोड़ना चाहिए। इससे पार्टी का अनुशासन भंग होता है और इमेज खराब होती है। उन्होंने कहा कि यदि झारखंड में मौजूदा राज्यसभा चुनाव में रणनीति को नहीं बदला गया तो वह इस्तीफा दे देंगे। अधिकतर सांसद एसएस आहलूवालिया को दोबारा झारखंड से टिकट नहीं देने पर नाराज थे। बताते हैं कि आहलूवालिया पर संघ ने वीटो लगा दिया था। बैठक में हिमाचल से सांसद शांता कुमार ने कहा कि आहलूवालिया उच्च सदन में एक प्रभावी नेता हैं और उन्हें एक और कार्यकाल तो मिलना ही चाहिए था। नवादा के सांसद भोला सिंह ने कहा कि पार्टी की आत्म चेतना मर चुकी है और वह धन-बल के सामने नतमस्तक हो रही है। आंवला से सांसद मेनका गांधी ने केंद्रीय नेतृत्व से कर्नाटक के संकट को समाप्त करने और येदियुरप्पा की मांगों पर ध्यान देने की अपील की। आहलूवालिया को राज्यसभा का टिकट न मिलने से कांग्रेस और मायावती की मुराद पूरी हो गई है। आहलूवालिया यूपीए सरकार को तमाम मुद्दों पर सबसे ज्यादा घेरते रहे हैं, जिनके कारण सरकार कई बार परेशानी में पड़ी है। मायावती भी चाहती थीं कि आहलूवालिया का राज्यसभा से पत्ता साफ हो जाए ताकि सांसद न रहने पर उनको (आहलूवालिया) अपना सरकारी बंगला 10 गुरुद्वारा रकाबगंज खाली करना पड़े। गडकरी चाहते तो आहलूवालिया को भेज सकते थे। उन्हें जीतने के लिए बस 11 वोट की कमी पड़ रही थी। ऐसे वह जद (यू) से पूरा कर सकते थे लेकिन गडकरी और सुशील मोदी ने मिलकर वह सीट ही जद (यू) के लिए छोड़ दी जिस पर बिहार जद (यू) अध्यक्ष वशिष्ठ सिंह ने नामांकन कर दिया जबकि आहलूवालिया ने इस सीट पर गडकरी से पहले से ही बात कर रखी थी। संसदीय दल की बैठक में सबसे नाजुक स्थिति आडवाणी जी की थी। पूरी बैठक में वह एक मूकदर्शक बने रहे। सांसदों के बगावती तेवर का असर तुरन्त देखने को मिला। कहा जा रहा है कि झारखंड में अब पार्टी राज्यसभा चुनाव में अपने विधायकों को किसी निर्दलीय उम्मीदवार के वोट देने के लिए दबाव नहीं देगी बल्कि कोशिश हो रही है कि भाजपा विधायक चुनाव का ही बायकॉट करें। बतौर अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हिटलरी स्टाइल से चुनाव अभियान चलाया। सबसे पहले गडकरी ने संघ के समर्थन के बल पर पार्टी के कद्दावर नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध के बावजूद संघ के प्रचारक रहे पूर्व संगठन मंत्री संजय जोशी को यूपी चुनाव प्रचार का इंचार्ज बना दिया। दूसरा गडकरी ने सभी पार्टी नेताओं के विरोध के बावजूद बसपा से निष्कासित बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल किया। पार्टी ने बुंदेलखंड में जितने भी प्रयोग किए सिवाय उमा भारती के बाकी सब फेल हुए। मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अपने सभी फायर ब्रांड नेताओं वरुण गांधी, योगी आदित्यनाथ को जहां अपने क्षेत्र तक सीमित कर दिया वहीं दूसरी तरफ हिन्दुवादी चेहरा माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी को न्यौता भेजा लेकिन जब उनकी नाराजगी जाहिर हुई तो उन्हें मनाने का कोई प्रयास नहीं किया। पार्टी के सभी प्रयासों के बाद भी पार्टी मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण तो न रोक सकी बल्कि अपने इस प्रयास में उसने अपने परम्परागत वोट भी गंवा दिए और इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी 2007 का भी प्रदर्शन न दोहरा सकी। चाहे मामला उत्तराखंड का रहा हो या पंजाब का, दोनों ही राज्यों में भाजपा की स्थिति गिरी है। गडकरी जबसे अध्यक्ष बने हैं भाजपा का ग्रॉफ गिरता ही जा रहा है पर इससे नितिन गडकरी को कोई फर्प नहीं पड़ता। वह तो पार्टी को बतौर हट्टी (दुकान) चला रहे हैं जिसका एकमात्र मकसद है पैसा बनाना और यह काम वह बाखूबी कर रहे हैं। गडकरी की हट्टी तो फल-फूल रही है, पार्टी जाए भाड़ में।
Anil Narendra, Babu Singh Kushwaha, BJP, Daily Pratap, Jharkhand, Narender Modi, Nitin Gadkari, RSS, Uttar Pradesh, Uttara Khand, Varun Gandhi, Vir Arjun
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Sunday, 12 February 2012
नरेन्द्र मोदी को मिली क्लीन चिट
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने थोड़ी राहत की सांस जरूर ली होगी। खबर है कि गुजरात दंगों पर अपनी अंतिम रिपोर्ट में विशेष जांच दल (एसआईटी) ने मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट देने वाली अपनी रिपोर्ट मेट्रोपोलिटन कोर्ट को सौंप दी है। दंगों में मारे गए पूर्व कांग्रेसी सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया की याचिका पर जांच दल का गठन किया गया था। लिफाफे में बन्द रिपोर्ट सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता शीतलवाड़ जनसंघर्ष मंच और जाकिया के वकील की उपस्थिति में 13 फरवरी को यह रिपोर्ट अदालत में खोली जाएगी। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री मोदी, उनके कैबिनेट सहयोगियों और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ जांच दल को कोई सुबूत हाथ नहीं लगे हैं। गुजरात दंगों के मामलों समेत कई अहम मुद्दों पर एमाइक्स क्यूरी (अदालत मित्र) की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ वकील राजू रामचन्द्रन भी एसआईटी से सहमत हैं। रामचन्द्रन और एसआईटी दोनों का मानना है कि गोधरा कांड में मारे गए कारसेवकों के शव अहमदाबाद लाने का निर्णय सही था। मोदी ने दंगे रोकने का पूरा प्रयास किया जबकि उनके खिलाफ आईपीएस अधिकारियों की ओर से दिए गए सुबूत और गवाही को विरोधियों की राजनीति से प्रेरित मानते हुए उन पर अधिक गौर नहीं किया गया।
ऊपर वाले का खेल भी निराला है। कई बार अच्छी धूप खिली होती है और आकाश से बारिश होने लगती है या तेज ठंडी हवाएं चलती हैं। प्रकृति की तरह ही नरेन्द्र मोदी को तूफानी थपेड़ों के साथ राहत देने वाली छांव मिल जाती है। बुधवार को गुजरात उच्च न्यायालय ने 2002 में गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों के दौरान उचित कार्रवाई नहीं करने तथा लापरवाही बरतने की टिप्पणियों के साथ मोदी सरकार की भर्त्सना की थी। अदालत ने एक जनहित याचिका को सही मानते हुए दंगों के दौरान बड़े पैमाने पर धार्मिक उपासना स्थलों के विध्वंस होने के लिए राज्य सरकार के निकम्मेपन को दोषी ठहराया। अदालती आदेश के घाव पर 24 घंटों में ही इस दूसरी जांच रिपोर्ट ने न केवल मरहम ही लगा दिया पर मोदी को क्लीन चिट देकर एक बहुत बड़ा दाग धो दिया। अगर इस रिपोर्ट को सही माना जाए तो इसका मतलब है कि अब इस केस को बन्द कर देना चाहिए। दो विभिन्न जांच रिपोर्टों ने मोदी को क्लीन चिटें दे दी हैं और यह साफ है कि जो लोग अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे के तहत मोदी को बदनाम करने पर तुले हैं वह बुरी तरह से फेल हो गए हैं। एसआईटी ने तथाकथित सुबूतों और गवाहों को कोई अहमियत नहीं दी और साफ कह दिया है कि मोदी के खिलाफ राजनीति से प्रेरित पर असत्य आरोप लगाए गए हैं। गुरुवार को अदालत में दी गई रिपोर्ट आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन प्रशासकीय स्तर पर ही छनकर बाहर आई सूचनाओं के अनुसार रिपोर्ट में दंगों के लिए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पूरी तरह दोषमुक्त ठहराया गया है। 13 फरवरी को जब यह रिपोर्ट अदालत में अधिकृत रूप से खोली जाएगी, तब इसके बारे में और विस्तृत जानकारी मिलेगी। फिलहाल तो नरेन्द्र मोदी के लिए बहुत बड़ी शुभ खबर है जिससे उन्होंने राहत की सांस जरूर ली होगी।
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ऊपर वाले का खेल भी निराला है। कई बार अच्छी धूप खिली होती है और आकाश से बारिश होने लगती है या तेज ठंडी हवाएं चलती हैं। प्रकृति की तरह ही नरेन्द्र मोदी को तूफानी थपेड़ों के साथ राहत देने वाली छांव मिल जाती है। बुधवार को गुजरात उच्च न्यायालय ने 2002 में गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों के दौरान उचित कार्रवाई नहीं करने तथा लापरवाही बरतने की टिप्पणियों के साथ मोदी सरकार की भर्त्सना की थी। अदालत ने एक जनहित याचिका को सही मानते हुए दंगों के दौरान बड़े पैमाने पर धार्मिक उपासना स्थलों के विध्वंस होने के लिए राज्य सरकार के निकम्मेपन को दोषी ठहराया। अदालती आदेश के घाव पर 24 घंटों में ही इस दूसरी जांच रिपोर्ट ने न केवल मरहम ही लगा दिया पर मोदी को क्लीन चिट देकर एक बहुत बड़ा दाग धो दिया। अगर इस रिपोर्ट को सही माना जाए तो इसका मतलब है कि अब इस केस को बन्द कर देना चाहिए। दो विभिन्न जांच रिपोर्टों ने मोदी को क्लीन चिटें दे दी हैं और यह साफ है कि जो लोग अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे के तहत मोदी को बदनाम करने पर तुले हैं वह बुरी तरह से फेल हो गए हैं। एसआईटी ने तथाकथित सुबूतों और गवाहों को कोई अहमियत नहीं दी और साफ कह दिया है कि मोदी के खिलाफ राजनीति से प्रेरित पर असत्य आरोप लगाए गए हैं। गुरुवार को अदालत में दी गई रिपोर्ट आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन प्रशासकीय स्तर पर ही छनकर बाहर आई सूचनाओं के अनुसार रिपोर्ट में दंगों के लिए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पूरी तरह दोषमुक्त ठहराया गया है। 13 फरवरी को जब यह रिपोर्ट अदालत में अधिकृत रूप से खोली जाएगी, तब इसके बारे में और विस्तृत जानकारी मिलेगी। फिलहाल तो नरेन्द्र मोदी के लिए बहुत बड़ी शुभ खबर है जिससे उन्होंने राहत की सांस जरूर ली होगी।
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Tuesday, 31 January 2012
क्या देश के अगले पीएम नरेन्द्र मोदी हो सकते हैं?
अगर आज लोकसभा चुनाव हो जाएं तो एक जनमत सर्वेक्षण के दावे के अनुसार संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है और कांग्रेस की अगुवाई करने वाले राहुल गांधी के मुकाबले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में बढ़त मिल सकती है। ओआरजी-नील्सन द्वारा कराए गए इस राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के अनुसार जाहिर किया गया है कि आज की स्थिति में चुनाव होने पर एनडीए को 180 से 190 सीटें और तीसरे मोर्चे को भी इतनी ही सीटें मिलेंगी जबकि यूपीए को 168-178 सीटें मिलने की उम्मीद जाहिर की गई है। सर्वेक्षण में एक दिलचस्प सवाल यह भी था कि अगर अन्ना हजारे और राहुल गांधी आमने-सामने एक ही सीट पर मुकाबला कर रहे हों तो आप किसको वोट देंगे। इस सवाल पर 60 प्रतिशत लोगों ने अन्ना हजारे के समर्थन में अपना मत दिया जबकि राहुल गांधी को 24 प्रतिशत ने वोट किया। सबसे दिलचस्प प्रश्न था प्रधानमंत्री किसको देखना चाहेंगे? प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में अगस्त 2010 के सर्वेक्षण के मुकाबले राहुल गांधी की लोकप्रियता का ग्रॉफ 24 प्रतिशत से घटकर 17 प्रतिशत आ गया है जबकि नरेन्द्र मोदी का ग्रॉफ 12 से बढ़कर 45 प्रतिशत पर पहुंच गया है। बाकी नेता बहुत नीचे हैं। उदाहरण के तौर पर इस सर्वे के मुताबिक भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी की लोकप्रियता हालांकि 4 से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गई है पर मोदी से वह बहुत पीछे हैं। ताजा सर्वेक्षण में आडवाणी, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी तीनों की लोकप्रियता एक साथ यानि 10-10 प्रतिशत आ गई है। यह सर्वेक्षण ऐसे समय आया है जब 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव भी चल रहे हैं। सर्वेक्षण में 19 राज्यों में अटकल से चुने गए 90 संसदीय क्षेत्रों के 12 हजार से अधिक लोगों की राय ली गई। नरेन्द्र मोदी आज जनता की नम्बर वन च्वाइस हैं। नरेन्द्र मोदी के मानना पड़ेगा कि सितारे तेज चल रहे हैं। विडम्बना देखिए कि मोदी की सबसे कट्टर राजनीतिक विरोधी पार्टी कांग्रेस ने भी गलती से उनकी तारीफ कर डाली। खबर अटपटी है पर ऐसा हुआ है। गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने गुजरात के कुछ हिस्सों में समाचार पत्रों के साथ दो पेज का एक विज्ञापन बंटवाया। इसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि गुजरात अस्तित्व में आने के साथ ही प्रगतिशील राज्य बन गया। इसमें नरेन्द्र मोदी सहित राज्य के सभी मुख्यमंत्रियों का योगदान दर्शाया गया है। इसमें मोदी को तस्वीर के साथ उन्हें कुशल संगठनकर्ता और माहिर चुनावी रणनीतिकार बताया गया है। गुजरात में इस साल दिसम्बर में विधानसभा चुनाव होने हैं और प्रचार अभियान लगभग शुरू हो चुका है। विज्ञापन में मोदी की अहम उपलब्धियां भी शामिल की गई हैं। कहा गया है, मोदी गुजरात को ऊर्जावान राज्य में तब्दील करने के लिए बड़ी मेहनत कर रहे हैं। उन्होंने बॉयोटैक्नोलॉजी के लिए अलग विभाग बनाया है। इस विज्ञापन के प्रकाशित होते ही कांग्रेस में घमासान मचना स्वाभाविक ही था। पार्टी के आला नेता जहां इसे मूर्खता-भरा कदम बता रहे हैं तो वहीं हाई कमान ने प्रदेश इकाई तथा प्रभारी मोहन प्रकाश से जवाब-तलब किया है। हालांकि कांग्रेस नेता व केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने इसे मोदी की तारीफ वाला नहीं बल्कि उन पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष करने वाला बताया है। इस विज्ञापन में व्यंग्य कहां है अपनी समझ से तो बाहर है। सीधी मोदी की तारीफ है।
Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Gujarat, L K Advani, Manmohan Singh, Narender Modi, Vir Arjun
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Thursday, 26 January 2012
नितिन गडकरी की ताजा मिसाइल नरेन्द्र मोदी पीएम
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 26th January 2012
अनिल नरेन्द्र
अपने विवादास्पद बयानों के लिए मशहूर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने फिर नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। एक टीवी चैनल को दिए एक प्रश्न के उत्तर में गडकरी ने कहा, `नरेन्द्र मोदी पार्टी अध्यक्ष बन सकते हैं, उनमें पीएम बनने की भी काबलियत है।' पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव इतने निकट हों और भाजपा अध्यक्ष ऐसा बयान दें? इससे पहले कुशवाहा प्रकरण में पार्टी को मुंह की खानी पड़ी थी। इससे पार्टी सम्भली नहीं कि नितिन जी ने नया तीर चला दिया। इस बयान से जहां भाजपा में खलबली मची वहीं कांग्रेस अपने ढंग से इसका मतलब, उद्देश्य निकाल रही है। कांग्रेस का मानना है कि नितिन गडकरी ने यह सोचा-समझा बयान दिया है जिसका मकसद यूपी में हिन्दू वोट बैंक को संगठित करना है। नरेन्द्र मोदी की छवि का फायदा उठाने की कोशिश है। यूपी को खास ध्यान में रखकर दिया गया है यह बयान। यूपी में राहुल गांधी के दौरों से उपर कास्ट वोट कांग्रेस की तरफ झुक हा है। मायावती का अपना गणित भी भाजपा के परम्परागत वोट बैंक को हिलाता लग रहा है। इसी को ध्यान में रखकर पहले उमा भारती को यूपी में आगे किया गया और अब नरेन्द्र मोदी की पीएम की बात उछाली गई। वहीं भाजपा के अन्दर इस बयान ने नई हलचल पैदा कर दी है। नितिन के इस बयान का पार्टी के अन्दर यह अर्थ निकाला जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी गडकरी और संघ की पीएम की पहली च्वाइस होंगे। लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली सरीखे के नेताओं से दूर हटकर गडकरी ने अब मोदी के साथ खड़े होने की कोशिश की है। कुशवाहा प्रकरण के बाद पार्टी विद ए डिफरेंस के दूसरे मतलब भी अब सामने आ रहे हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक एवं जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने नितिन गडकरी की राय का खुलकर विरोध किया है। जब यादव से पूछा गया कि इस बारे में आपका क्या कहना है तो उन्होंने फौरन कहाöअभी 2014 बहुत दूर है। आप लोग 2012 की बात कीजिए। जब यह बात सामने आएगी, तब हम देखेंगे। अपने अध्यक्ष के बयान पर भाजपा ने सोमवार को कहा कि यह एक विशिष्ट प्रश्न पर दिया गया विशिष्ट उत्तर था। पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ऐसे मामलों पर पार्टी सामूहिक निर्णय करती है। इस बारे में दो राय नहीं है कि मोदी में भाजपा अध्यक्ष या प्रधानमंत्री बनने की पूरी क्षमता है। सारा देश और हम सभी यह बात मानते हैं। साथ ही उन्होंने कहा, लेकिन किसी को प्रधानमंत्री या पार्टी अध्यक्ष बनाना भाजपा में कोई पारिवारिक मामला नहीं है। कौन पार्टी अध्यक्ष होगा या प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनेगा, इसे पार्टी उचित समय पर तय करेगी। भाजपा और कांग्रेस में सबसे बड़ा फर्प यही है। कांग्रेस में नेतृत्व स्पष्ट है और जो फैसला सोनिया गांधी कर दें वह अंतिम होता है। भाजपा में तो दर्जनों नेता सुप्रीमो हैं। कोई एक-दूसरे की बात मानने को तैयार नहीं है। जिसके मुंह में जो आता है वह कह देता है। फिर अभी लोकसभा चुनाव दूर हैं। अभी से पीएम उम्मीदवार की बात छेड़ने से क्या फायदा होगा हमारी समझ से बाहर है। भाजपा का पहला उद्देश्य तो यूपी में अच्छा प्रदर्शन करने, पंजाब और उत्तराखंड में पुन सरकार बनाने का होना चाहिए। इन्हीं के परिणामों से एक संकेत मिलेगा कि पार्टी जनता की नजरों में खड़ी कहां है? घर बैठे-बैठे ख्याली पुलाव बनाने से शायद ही कोई फायदा हो?
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Friday, 20 January 2012
गुजरात हाई कोर्ट ने लोकायुक्त मामले में दिया मोदी को झटका
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 21th January 2012
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लोकायुक्त मामले में निश्चित रूप से गुजरात हाई कोर्ट के ताजा फैसले से झटका लगा है। गुजरात हाई कोर्ट ने राज्यपाल द्वारा लोकायुक्त के पद पर की गई नियुक्ति को पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी तौर पर जायज ठहराया है। लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर मोदी सरकार के टालमटोल के बाद राज्यपाल कमला बेनीवाल ने पिछले साल 25 अगस्त को सेवानिवृत्त न्यायाधीश आरए मेहता को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया था। गुजरात में नवम्बर 2003 से लोकायुक्त पद खाली पड़ा था। राज्यपाल ने जस्टिस मेहता को लोकायुक्त कानून-1986 की उपधारा-3 के विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया। 26 अगस्त को गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील की। तीन महीने पहले हाई कोर्ट ने विभाजित निर्णय दिया था। बुधवार को तीसरे न्यायाधीश वीएम सहाय की अदालत ने मतभेद के बिंदुओं पर सुनवाई के बाद राज्यपाल के फैसले को सही ठहराया। दोनों पक्षों के वकीलों की राय अपने-अपने हिसाब से थी। अकील कुरैशी का कहना था कि लोकायुक्त की नियुक्ति सही और संविधान सम्मत है। जबकि सोनिया बेन गोकार्णा का कहना था कि मेहता को लोकायुक्त नियुक्त करने का फैसला असंवैधानिक है। अब मामला सुपीम कोर्ट में पहुंच गया है। गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती दे दी है। यह अच्छा हुआ कि यह मामला सुपीम कोर्ट पहुंच गया। पिछले साल पूरे समय देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए लोकपाल कानून की मांग गूंजती रही। इस शोरगुल के बीच लोगों को याद नहीं रहा कि कई राज्यों में भ्रष्टाचार पर नजर रखने के लिए लोकायुक्त नामक एक संस्था पहले से ही वजूद में है। हमने गत दिनों यह भी देखा कि लोकायुक्त क्या-क्या कर सकते हैं। उत्तर पदेश में लोकायुक्त ने मायावती सरकार के नाक में दम कर रखा है और परिणामस्वरूप कई मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाने पर मायावती मजबूर हुईं। यह बात दीगर है कि राज्यों में लोकायुक्तों का वजूद और उनके अधिकार वहां की सरकारों के रहमोकरम पर हैं। कई राज्यों ने तो इतने हंगामे के बावजूद लोकायुक्तों को अब तक जरूरी नहीं समझा और कुछ राज्यों ने समय की नजाकत देखते हुए इस पद को बनाया तो लेकिन अपने हिसाब से कारगर करते हुए। उम्मीद की जा सकती है कि सुपीम कोर्ट के फैसले से लोकायुक्तों के मामले में पूरे देश में एकरूपता आएगी और पार्टियों को केंद्र बनाम राज्य की आड़ में राजनीति करने का भी मौका नहीं मिलेगा। गुजरात का नमूना आखें खोलने के लिए काफी है। गुजरात बेशक अपने उद्योग-धंधों के लिए सबसे माकूल राज्य के लिए पचार करता रहे पर कटु सत्य तो यह भी है कि राज्य पिछले आठ वर्षों से लोकायुक्त के बिना ही चल रहा था। वहां के राज्यपाल और मुख्यमंत्री की खुन्नस के बारे में सभी जानते हैं। वैसे भी पिछले कुछ समय से लगता है कि नरेन्द्र मोदी में थोड़ा अहंकार आ गया है। यह झटका उनके लिए भी अच्छा है। अब वह थोड़ा जमीन पर उतरेंगे। मोदी सरकार कह रही है कि राज्यपाल ने राज्य मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बिना लोकायुक्त बना कर राज्य के अधिकारों में हस्तक्षेप किया है जबकि 2-1 से आए गुजरात हाई कोर्ट के फैसले में मुख्यमंत्री की कार्यशैली की बखियां उधेड़ी गई हैं। फैसले में मोदी की आलोचना में यह भी कहा गया है कि वह राज्य में लोकायुक्त कानून में बदलाव लाकर चीफ जस्टिस को ही नियुक्ति पकिया से हटाना चाहते थे। सच्चाई क्या है यह तो सुपीम कोर्ट के फैसले के बाद ही पता चलेगी लेकिन आंशिक रूप से अभी दोनों पक्ष सही लग रहे हैं। बेशक राज्यपाल केन्द्र के पतिनिधी हैं इसलिए अपनी मनमर्जी राज्य की निर्वाचित सरकार पर नहीं थोप सकते। मोदी को उन राज्यों से समर्थन मिल सकता है जहां गैर कांग्रेसी सरकारें हैं पर आज की तारीख में भ्रष्टाचार रोकने की किसी भी पकिया को रोकने का पयास जनता को नहीं भाएगा। मोदी की लड़ाई राजनीतिक है, अधिकार क्षेत्र के अतिकमण का है, वह भ्रष्टाचार रोकने के खिलाफ नहीं दिखना चाहिए। विचित्र यह भी है कि जो भाजपा सशक्त लोकपाल की वकालत करती नजर आती है और जिसने संबंधित विधेयक में एक संशोधन यह भी सुझाया था कि लोकपाल के चयन में केन्द्र सरकार की भूमिका कम की जाए, वह इस बात को लेकर नाराज रहीं कि गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति राज्य सरकार की मर्जी से क्यों नहीं की गई। क्या पार्टी यह चाहती है कि लोकायुक्त कौन हो और उसके अधिकार क्या हों इसका निर्णय राज्य सरकारों की इच्छा पर छोड़ दिया जाए? फिर क्या ऐसी व्यवस्था भ्रष्टाचार को रोकने में पभावी साबित हो सकती है?
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Sunday, 15 January 2012
यूपी चुनाव में नरेन्द्र मोदी व नीतीश कुमार आमने-सामने
आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस, भाजपा, सपा व बसपा के प्रमुख प्रचारक कौन-कौन होंगे लोगों की इस पर भी दिलचस्पी बनी हुई है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में। मिशन-2012 फतह पर देवभूमि उत्तराखंड व यूपी में कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। प्रत्याशियों के नामों की घोषणा के बाद पार्टियां अब चुनावी प्रचार के लिए स्टार प्रचारकों की सूची बनाने में लग गई हैं। जाहिर है कि श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल गांधी खास अट्रैक्शन होंगे। मुस्लिम मतदाताओं को पटाने के लिए सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह, राशिद अलवी, रशीद मसूद का इस्तेमाल हो सकता है। पता नहीं प्रधानमंत्री भी जाएंगे या नहीं? इसके अलावा दिल्ली, राजस्थान के मुख्यमंत्रियों का भी इस्तेमाल हो सकता है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भी शामिल हो सकते हैं। युवाओं को आकर्षित करने के लिए राहुल के साथ सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जतिन प्रसाद भी जनता को संबोधित कर सकते हैं। जहां तक भाजपा का सवाल है पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी, एलके आडवाणी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली मुख्य प्रचारक हो सकते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अटकलें जोरों पर हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बारे में भी कहा जा रहा है कि वह यूपी में तो जरूर प्रचार के लिए आएंगे। नीतीश कुमार और नरेन्द्र मोदी सियासत में एक-दूसरे से नजरें मिलाने से भी परहेज करते हैं लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश में दोनों आमने-सामने होंगे। भाजपा द्वारा प्रतिष्ठाजनक सीटें नहीं दिए जाने के कारण पहले नीतीश ने उप्र चुनाव से अलग रहने का फैसला लिया था, लेकिन अब जबकि उनकी पार्टी जद (यू) सभी 403 सीटों पर अकेले लड़ने के प्रयास में है तो चुनाव प्रचार के लिए उनका यूपी आना तय-सा माना जा रहा है। उधर भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को अपने स्टार प्रचारक के तौर पर पेश करने का निर्णय लिया है। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शर्त को कबूल कर लिया था और प्रचार के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बिहार नहीं आने दिया था। मोदी की छवि कट्टरवादी हिन्दू नेता की रही है। इस कारण नीतीश उनसे परहेज करते हैं। नीतीश को अल्पसंख्यकों का भारी समर्थन मिलता रहा है और वह किसी कीमत पर इस जनाधार को खोना नहीं चाहते। पूर्व में एनडीए के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में नीतीश और मोदी आमने-सामने एक मंच पर आए थे। दोनों नेताओं के साथ वाली तस्वीर से सियासत में तूफान खड़ा होता रहा है। भाजपा की राष्ट्र कार्यकारिणी की बैठक के दौरान इस तस्वीर के छपने पर नीतीश इतने नाराज हो गए कि उन्होंने भाजपा की रैली में शिरकत करने से मना कर दिया। यही नही नीतीश ने गुजरात सरकार को वह पांच करोड़ भी लौटा दिए जो बाढ़ राहत के लिए मोदी ने भेजे थे। हालांकि अब भी बिहार में दोनों पार्टियों का गठबंधन कायम है। इन दोनों राजनीतिज्ञ प्रतिद्वंद्वियों के बीच एक चुनाव में आमने-सामने से देखें क्या स्थिति बनती है? समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारक मुलायम सिंह, अखिलेश यादव और आजम खां प्रमुख होंगे। बसपा में तो एक ही प्रचारक हैं बहन जी। बहन जी अकेले अपने ही दमखम पर पार्टी को जिताने का प्रयास करेंगी। यूपी में इन प्रमुख दलों के अलावा और दर्जनों छोटे दल भी चुनावी दंगल में हैं। वह सब भी अपनी ताल ठोंकेंगे। कुल मिलाकर दिलचस्प होगा इन स्टार प्रचारकों का आपस में भिड़ने का नजारा।
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Friday, 21 October 2011
क्या नरेन्द्र मोदी पार्टी से ऊपर हो चुके हैं?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 21st October 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ समय से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा के बीच समीकरण ठीक नहीं लग रहा। भाजपा में मोदी को लेकर दोनों रोष और अलगाव की भावना पैदा हो रही है। भाजपा के नेतृत्व का मानना है कि नरेन्द्र मोदी को अब अहंकार हो गया है और वह अपने आपको पार्टी से ऊपर मानने लगे हैं। पार्टी ने मोदी को उनकी हैसियत का अहसास करवाना शुरू कर दिया है। लाल कृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा पर आंखें दिखाने वाले नरेन्द्र मोदी को इस यात्रा में बिल्कुल अनदेखा कर दिया है। वह कहीं भी नजर नहीं आ रहे और अब अखबारों में उनकी सुर्खियां भी कम देखने को मिल रही हैं। आडवाणी जी ने अपनी यात्रा में भाजपा के और तमाम मुख्यमंत्रियों के कामकाज, उपलब्धियों का जिक्र किया है पर उन्होंने अभी तक एक भी बड़ी सभा में नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं लिया। यही आडवाणी पहले नरेन्द्र मोदी को एक आदर्श मुख्यमंत्री पेश करते थकते नहीं थे। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि मोदी का राजनीतिक कद काफी बड़ा हो चुका है। उन्हें यह अहसास कराने की जरूरत है कि पार्टी उनकी वजह से नहीं बल्कि वे पार्टी की वजह से हैं। इसके तहत इस मुद्दे पर अब विचार किया जा रहा है कि अगले साल में शुरू होने वाले उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में विधानसभा चुनावों में मोदी को प्रचार के लिए न बुलाया जाए। पार्टी को लगता है कि अपनी कट्टरवादी हिन्दुत्व की छवि के कारण अगर मोदी प्रचार करते हैं तो तमाम मुसलमान बिखर जाएंगे और भाजपा का मोदी की वजह से विरोध करना शुरू कर देंगे। भाजपा को यह मालूम है कि एक भी मुसलमान वोट उसे मिलने वाला नहीं पर वह यह भी नहीं चाहती कि बिना वजह मुसलमान पार्टी के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लें। पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछड़े व अतिपिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने के लिए नीतीश कुमार की मदद लेना बेहतर विकल्प समझने लगी है। नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं कि श्री आडवाणी ने अपनी जनचेतना यात्रा को बिहार से शुरू किया और इस यात्रा को हरी झंडी नीतीश ने दिखाई। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने मोदी को प्रदेश में न भेजने की चेतावनी दी थी, भाजपा ने इस पर अमल किया और नतीजे सबके सामने हैं। आज नीतीश कुमार एनडीए के सबसे सशक्त उम्मीदवार बनकर उभरे हैं। भाजपा को भी सूट करता है कि वह एनडीए को आगे बढ़ाए और इस रास्ते से वह सत्ता तक पहुंचे। मोदी का कद छोटा करने के लिए भाजाप नेतृत्व और संघ ने मिलकर जानबूझ कर संजय जोशी को जिम्मेदारी सौंपी है। नरेन्द्र मोदी संजय जोशी को बेहद नापसंद करते हैं। उन्हें संगठन मंत्री पद से हटवाने में उनकी बहुत अहम भूमिका रही। वैसे तो लाल कृष्ण आडवाणी भी संजय जोशी को पसंद नहीं करते क्योंकि जिन्ना प्रकरण में संजय जोशी ने ही आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा था। आमतौर पर अध्यक्ष अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को देता है पर आडवाणी ने अपना इस्तीफा संजय जोशी को भेजा था।श्री नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। वह अपने घर में ही घिरते जा रहे हैं। गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी को फंसाने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ने वाले निलम्बित और फिर गिरफ्तार किए गए आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को सोमवार एक स्थानीय अदालत ने तमाम विरोध के बावजूद जमानत दे दी। अदालत ने उस प्रकरण पर तार्किक संदेह व्यक्त किया जिसके तहत भट्ट को गिरफ्तार किया गया था। रिहा होते ही भट्ट ने मोदी पर हमला बोल दिया। भट्ट ने मोदी को अपराधी बताते हुए कहा कि मेरे लिए मोदी सिर्प एक अपराधी हैं जो मुख्यमंत्री बन गए हैं। मोदी और उनके लोग खुद को बचाने के लिए मेरी हत्या तक करवा सकते हैं। जैसा कि हरेन पांड्या का कराया गया। यह निश्चित है कि कांग्रेस जो संजीव भट्ट को उकसा रही है इनका जमानत पर छूटने और बाहर आने का पूरा-पूरा लाभ उठाएगी। हैरानगी तो इस बात की भी है कि गुजरात के तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने संजीव भट्ट का खुला समर्थन कर दिया है। 30 सितम्बर को भट्ट की गिरफ्तारी के बाद यह पहली बार है जब अधिकारी भट्ट परिवार से मिलने उसके घर गया और संजीव की पत्नी श्वेता भट्ट से मुलाकात की। यह मुलाकात करीब दो घंटे चली। श्वेता ने बताया कि तीनों अधिकारियों ने संजीव के साथ हो रहे घटनाक्रम पर खेद व्यक्त किया और मदद का आश्वासन दिया। आने वाले दिनों में लगता है कि नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं, घटने वाली नहीं।
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Sunday, 9 October 2011
गुजरात के आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट हीरो या विलेन?
गुजरात के आईपीएस अफसर संजीव भट्ट पिछले कुछ दिनों से चर्चा का विषय बने हुए हैं। गुजरात के यह विवादास्पद पुलिस अधिकारी जो आजकल सस्पैंड हैं। दरअसल एक हीरो हैं या एक विलेन। कांग्रेस की नजरों में वह हीरो हैं। संजीव भट्ट कांग्रेस के उम्मीदवार बनते जा रहे हैं और कांग्रेस का एक वर्ग यहां तक कहने लगा है कि संजीव भट्ट की गिरफ्तारी मोदी सरकार के अन्त की शुरुआत हो सकती है। इस वर्ग का कहना है कि बदले की भावना से भट्ट के खिलाफ की जा रही बदले की कार्रवाई मोदी सरकार को भारी पड़ेगी। दरअसल नरेन्द्र मोदी कांग्रेस की आंख की किरकिरी बने हुए हैं और कांग्रेस को हमेशा कोई ऐसा मुद्दा जरूर चाहिए होता है जिससे वह मोदी पर हमला कर सके। कभी मोदी के उपवास में आडवाणी सहित दूसरे बड़े भाजपा नेताओं की अनुपस्थिति को हवा दी जाती है तो कभी आडवाणी की गुजरात से अपनी यात्रा शुरू न करने को मुद्दा बनाया जाता है। पीएम पद की दावेदारी को लेकर भाजपा में चल रहे घमासान को उछाला जाता है। अब संजीव भट्ट मामले को तूल दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार बदले की भावना से काम कर रही है और संजीव भट्ट को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह मोदी के खिलाफ खुले आरोप लगा रहे हैं। भट्ट की पत्नी ने केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को एक पत्र लिखकर कहा है कि गुजरात पुलिस उनके पति के साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार कर रही है। अपने पत्र में उन्होंने राज्य सरकार पर यह भी आरोप लगाया है कि वह भट्ट को जमानत न मिल पाने से बचाने के लिए हर हथकंडा अपना रही है। कुछ दिन पहले भट्ट की पत्नी श्वेता ने चिदम्बरम को एक और पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने अपने पति की जान को खतरा बताया था।
सवाल यह है कि संजीव भट्ट क्या एक निष्ठावान, ईमानदार, साफ छवि के पुलिस अधिकारी हैं जिन्हें मोदी सरकार जानबूझ कर निशाना बना रही है, बदला ले रही है क्योंकि उन्होंने मोदी के खिलाफ अभियान चला रखा है या फिर वह एक दागदार अफसर हैं जो अपनी गतिविधियों के पर्दाफाश होने से इसलिए हमला कर रहे हैं ताकि उनके खिलाफ लगे आरोपों से बचा जा सके? संजीव भट्ट के पुलिस रिकार्ड पर अगर हम नजर डालें तो पाएंगे कि उन पर समय-समय पर गम्भीर आरोप लगते रहे हैं। 30 अक्तूबर 1990 को जामनगर जिले के जमोधपुर तालुक में एक सांप्रदायिक दंगा हुआ। इसमें 133 लोगों को गिरफ्तार किया गया। विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यकर्ता प्रभुदास वेशनानी छूटने के 11 दिन बाद पुलिस हिरासत में मर गए। क्योंकि पुलिस ने उनकी जरूरत से कहीं ज्यादा पिटाई कर दी थी। उनके बड़े भाई अमृत लाल वेशनानी ने हिरासत में मौत संबंधी जो मुकदमा किया उसमें प्रमुख आरोपी तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक संजीव भट्ट को बनाया। जामनगर के तत्कालीन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एनटी सोलंकी ने भट्ट के खिलाफ एक गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया था। भट्ट के खिलाफ गुजरात सीआईडी ने सीआरपीसी की धारा 197 के तहत अभियोग चलाने के लिए बाकायदा राज्य सरकार से अनुमति भी मांगी थी। लेकिन 1995 में मोदी सरकार ने अदालत में भट्ट का बचाव किया, अदालत ने यह केस बन्द करने की सरकार की याचिका को ठुकराते हुए कहा कि मामला चलाने योग्य है इसलिए इसे बन्द नहीं किया जा सकता। लेकिन मोदी सरकार ने 1996 की उस याचिका को वापस ले लिया। अब भी अदालती कार्रवाई भट्ट के खिलाफ जारी है। संजीव भट्ट का एक और कुत्सित चेहरा है। 1995 में वे अहमदाबाद जिला पुलिस अधीक्षक थे। वहीं एक सत्र न्यायाधीश आरके जैन थे। उनकी बहन के एक किरायेदार थे जिनके खिलाफ मुकदमा चल रहा था। किन्तु किरायेदार मुकदमा जीत गए और घर खाली कराने के सभी कानूनी रास्ते बन्द हो गए। न्यायाधीश जैन ने संजीव भट्ट से घर किसी भी तरीके से खाली करवाने की अपील की। भट्ट ने किरायेदार को बुलाया और घर खाली करने को कहा और उसे कहा कि यदि उसने घर खाली नहीं किया तो उसे परिणाम भुगतने होंगे। फिर वही हुआ जिसका डर था। संजीव भट्ट ने किरायेदार के घर पर नॉरकोटिक्स रखवाकर उसे गिरफ्तार करवा दिया और गिरफ्तार होते ही जबरन घर खाली करा दिया। बाद में जिला जज की अदालत में किरायेदार ने वाद पेश किया तो उसमें संजीव भट्ट को भी वादी बनाया। संजीव भट्ट के खिलाफ एक लाख 50 हजार का अर्थदण्ड लगा जिसका भुगतान, आपको सुनकर आश्चर्य होगा, राज्य सरकार ने किया और वह पैसा भट्ट के वेतन से किश्तों में कटता रहा। इस निलंबित आईपीएस अधिकारी की मोदी सरकार से खुंदक और उसके विरोधियों से साठगांठ पुरानी है। ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे साबित होता है कि कांग्रेस संजीव भट्ट को मोदी सरकार और खुद मुख्यमंत्री के खिलाफ उकसाती रही है और उकसा रही है। संजीव भट्ट का रिकार्ड अदालतों के सामने है। हो सकता है कि अगले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के एक उम्मीदवार भी बनें। अब आप खुद फैसला कर लें कि क्या संजीव भट्ट एक ईमानदार, साफ छवि के व्यक्ति हैं जिसे मोदी सरकार जानबूझ कर टारगेट बना रही है या फिर वह कांग्रेस की शतरंजी चाल में एक मोहरे हैं?
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सवाल यह है कि संजीव भट्ट क्या एक निष्ठावान, ईमानदार, साफ छवि के पुलिस अधिकारी हैं जिन्हें मोदी सरकार जानबूझ कर निशाना बना रही है, बदला ले रही है क्योंकि उन्होंने मोदी के खिलाफ अभियान चला रखा है या फिर वह एक दागदार अफसर हैं जो अपनी गतिविधियों के पर्दाफाश होने से इसलिए हमला कर रहे हैं ताकि उनके खिलाफ लगे आरोपों से बचा जा सके? संजीव भट्ट के पुलिस रिकार्ड पर अगर हम नजर डालें तो पाएंगे कि उन पर समय-समय पर गम्भीर आरोप लगते रहे हैं। 30 अक्तूबर 1990 को जामनगर जिले के जमोधपुर तालुक में एक सांप्रदायिक दंगा हुआ। इसमें 133 लोगों को गिरफ्तार किया गया। विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यकर्ता प्रभुदास वेशनानी छूटने के 11 दिन बाद पुलिस हिरासत में मर गए। क्योंकि पुलिस ने उनकी जरूरत से कहीं ज्यादा पिटाई कर दी थी। उनके बड़े भाई अमृत लाल वेशनानी ने हिरासत में मौत संबंधी जो मुकदमा किया उसमें प्रमुख आरोपी तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक संजीव भट्ट को बनाया। जामनगर के तत्कालीन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एनटी सोलंकी ने भट्ट के खिलाफ एक गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया था। भट्ट के खिलाफ गुजरात सीआईडी ने सीआरपीसी की धारा 197 के तहत अभियोग चलाने के लिए बाकायदा राज्य सरकार से अनुमति भी मांगी थी। लेकिन 1995 में मोदी सरकार ने अदालत में भट्ट का बचाव किया, अदालत ने यह केस बन्द करने की सरकार की याचिका को ठुकराते हुए कहा कि मामला चलाने योग्य है इसलिए इसे बन्द नहीं किया जा सकता। लेकिन मोदी सरकार ने 1996 की उस याचिका को वापस ले लिया। अब भी अदालती कार्रवाई भट्ट के खिलाफ जारी है। संजीव भट्ट का एक और कुत्सित चेहरा है। 1995 में वे अहमदाबाद जिला पुलिस अधीक्षक थे। वहीं एक सत्र न्यायाधीश आरके जैन थे। उनकी बहन के एक किरायेदार थे जिनके खिलाफ मुकदमा चल रहा था। किन्तु किरायेदार मुकदमा जीत गए और घर खाली कराने के सभी कानूनी रास्ते बन्द हो गए। न्यायाधीश जैन ने संजीव भट्ट से घर किसी भी तरीके से खाली करवाने की अपील की। भट्ट ने किरायेदार को बुलाया और घर खाली करने को कहा और उसे कहा कि यदि उसने घर खाली नहीं किया तो उसे परिणाम भुगतने होंगे। फिर वही हुआ जिसका डर था। संजीव भट्ट ने किरायेदार के घर पर नॉरकोटिक्स रखवाकर उसे गिरफ्तार करवा दिया और गिरफ्तार होते ही जबरन घर खाली करा दिया। बाद में जिला जज की अदालत में किरायेदार ने वाद पेश किया तो उसमें संजीव भट्ट को भी वादी बनाया। संजीव भट्ट के खिलाफ एक लाख 50 हजार का अर्थदण्ड लगा जिसका भुगतान, आपको सुनकर आश्चर्य होगा, राज्य सरकार ने किया और वह पैसा भट्ट के वेतन से किश्तों में कटता रहा। इस निलंबित आईपीएस अधिकारी की मोदी सरकार से खुंदक और उसके विरोधियों से साठगांठ पुरानी है। ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे साबित होता है कि कांग्रेस संजीव भट्ट को मोदी सरकार और खुद मुख्यमंत्री के खिलाफ उकसाती रही है और उकसा रही है। संजीव भट्ट का रिकार्ड अदालतों के सामने है। हो सकता है कि अगले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के एक उम्मीदवार भी बनें। अब आप खुद फैसला कर लें कि क्या संजीव भट्ट एक ईमानदार, साफ छवि के व्यक्ति हैं जिसे मोदी सरकार जानबूझ कर टारगेट बना रही है या फिर वह कांग्रेस की शतरंजी चाल में एक मोहरे हैं?
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Sunday, 2 October 2011
आडवाणी और नरेन्द्र मोदी में टकराव बढ़ रहा है
मनमोहन सिंह की कैबिनेट में अंतर्विरोध और टकराव का आरोप लगाने वाली भाजपा खुद भी ऐसी ही स्थिति में घिरी हुई है। भारतीय जनता पार्टी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आरम्भ हो गई है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के आग्रह के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कर्नाटक और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और रमेश पोखरियाल निशंक बैठक में शामिल नहीं हुए। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने हालांकि यह कहा था कि पार्टी कोशिश कर रही है कि मोदी बैठक में शामिल हों। कुछ ही लोग शायद इस तर्प को मानेंगे कि मोदी नवरात्र के व्रत रख रहे हैं इसलिए बैठक में नहीं आए। असल कारण कुछ और ही है। 8 सितम्बर को पार्टी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने अचानक देशव्यापी रथ यात्रा निकालने का ऐलान कर दिया था। इससे भाजपा नेतृत्व भी हतप्रभ रह गया था। इस ऐलान के साथ ही ये कयास लगने लगे कि आडवाणी की इस रथ यात्रा का उद्देश्य एक बार फिर पीएम इन वेटिंग का संदेश देना है। संघ ने 2009 के चुनाव में हार के बाद श्री आडवाणी को पीछे करके नम्बर दो के नेताओं को आगे करने की योजना बनाई। इसमें नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और खुद नितिन गडकरी शामिल थे पर आडवाणी की अचानक रथ यात्रा की घोषणा ने यह समीकरण बिगाड़ दिए। आडवाणी की यात्रा का सबसे ज्यादा झटका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगा। लम्बे समय तक उनकी पहचान आडवाणी के खास सिपहसालार के रूप में रही है। लेकिन अब मोदी बड़े उस्ताद बन गए हैं। कुछ मायनों में वह अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। भाजपा सूत्रों के अनुसार भाजपा में प्रधानमंत्री पद के इन दो भावी दावेदारों मोदी और आडवाणी के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा मोदी को रास नहीं आ रही है। इसी के चलते उन्होंने भी आडवाणी की तर्ज पर पिछले दिनों अहमदाबाद में एक बड़ा राजनीतिक शो कर डाला था। राज्यपाल के खिलाफ हाल ही में गुजरात में आयोजित मोदी की रैली में आडवाणी समेत किसी भी बड़े नेता ने हिस्सा नहीं लिया था। अहमदाबाद में मोदी उपवास का जिस तरह प्रचार किया गया उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खुश नहीं है। उनका मानना है कि मोदी खुद को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश कर रहे हैं। उधर संघ ने आडवाणी पर दबाव डाला कि वह यह स्पष्ट कर दें कि उनकी यात्रा से उनकी प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी से कुछ लेना-देना नहीं है। संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में नेतृत्व से मुलाकात के बाद श्री आडवाणी ने घोषणा की कि वह प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर यह रथ यात्रा नहीं कर रहे। सबसे पहले नरेन्द्र मोदी ने ही उनकी यात्रा का विरोध किया था। सूत्रों के मुताबिक जब आडवाणी ने उनसे इस यात्रा के बारे में बात की तो मोदी ने अपनी आदत के मुताबिक उनसे दो टूक पूछ लिया कि इससे क्या फायदा? आप हासिल क्या करना चाहते हैं? इतना ही नहीं, मोदी ने गुजरात से यात्रा शुरू करने में मदद करने में अपनी असमर्थता तक जता दी। आखिरकार श्री आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा बिहार से शुरू करने का फैसला किया। इसके पीछे एक और उद्देश्य भी नजर आता है। शायद आडवाणी जी एनडीए की तर्ज की राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं। पहले भी उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करके उसी लाइन पर चलने का प्रयास किया था जिस पर अटल जी चलते थे। आडवाणी की कोशिश है कि वह एनडीए की तर्ज पर फिर केंद्र में सरकार बनाएं और उसका नेतृत्व करें। इस उद्देश्य का न तो संघ समर्थन करेगा और न ही मोदी सरीखे नेता जिनकी पहचान हिन्दुत्व नेता की है। श्री आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा को लेकर जो विवाद आरम्भ हुआ है, यह थमने वाला नहीं। भाजपा नेतृत्व में इस समय जबरदस्त महत्वाकांक्षाओं का टकराव है और इसे इस रथ यात्रा ने फोकस में लाकर खड़ा कर दिया है। उधर कांग्रेस नेतृत्व में घमासान हो रहा है, रही-सही कसर भाजपा की अंतर्पलह ने पूरी कर दी है।
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Wednesday, 21 September 2011
मोदी के सद्भावना मिशन पर `टोपी' पहनाने का प्रयास
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 21th September 2011
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का तीन दिवसीय अनशन सोमवार को खत्म हो गया। गुजरात विश्वविद्यालय के कन्वेंशन हॉल में तीन दिनों से अनशन पर बैठे मोदी ने सोमवार शाम 6ः15 बजे धर्मगुरुओं के हाथों से नींबू पानी पीकर अनशन समाप्त कर दिया। नरेन्द्र मोदी के उपवास को जिस तरह से पार्टी के भीतर से लेकर पूरे देश में समर्थन मिला है, उससे साफ हो गया है कि लाल कृष्ण आडवाणी के बाद वह भाजपा के सबसे कद्दावर नेता बनकर उभरे हैं। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि मोदी अब भाजपा की ओर से अगले प्रधानमंत्री बनने के सबसे कद्दावर नेता बन गए हैं और श्री मोदी ने अपनी इच्छा भी नहीं छिपाई। प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा खुलकर जाहिर किए बगैर मोदी ने शनिवार को भारतीय जनता पार्टी को एक नया नारा दिया, `सबका साथ, सबका विकास' जो अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रचार का आधार बन सकता है। अपना उपवास तोड़ने के साथ ही नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में चुनाव से एक साल पहले ही अपने अभियान का रथ हांक दिया है। तीन दिन के उपवास के बाद गुजरात के सभी 26 जिलों में बारी-बारी से सारा दिन उपवास पर बैठने के ऐलान के साथ नरेन्द्र मोदी ने अब बड़े मिशन का भी श्रीगणेश कर दिया। नकारात्मक राजनीति के मुकाबले विकास के मोर्चे पर समृद्ध रिपोर्ट कार्ड की बदौलत आगे बढ़ने के एजेंडे को भी मोदी ने देश के सामने रख दिया। इतना ही नहीं, उपवास के तीन दिनों में प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी की हवा बनाकर गुजरातियों के गौरव के रूप में भी खुद को उभारा। साथ ही सद्भावना मिशन के सहारे एक पांव मुस्लिमों की तरफ तो बढ़ाया, लेकिन कहीं भी अपनी मूल ताकत हिन्दुत्व की जमीन नहीं छूटने दी। अहमदाबाद शहर के पास स्थित पिराना गांव में एक छोटी-सी दरगाह के मौलाना सैयद इमाम शाही सैयद ने रविवार को मोदी के उपवास स्थल पर मंच पर जाकर उनसे मुलाकात की थी। मौलाना ने मोदी को एक टोपी पहनने की पेशकश की, लेकिन मुख्यमंत्री ने विनम्रता से उसे पहनने से मना कर दिया और उसके बजाय शॉल ओढ़ाने को कहा। इमाम ने मोदी को शॉल ओढ़ाया जिसे उन्होंने मंजूर कर लिया। नरेन्द्र मोदी ने बिना किसी पर आरोप लगाए और प्रहार किए खुद पर लगने वाले सांप्रदायिकता के आरोपों का जवाब गुजरात में विकास और शांति के रिकार्ड के साथ दिया। मोदी ने स्पष्ट कहा कि लीडरशिप की कसौटी एक्शन पर निर्भर करती है। आज हमने दुनिया को दिखाया कि यह रास्ता है सबको जोड़कर सबको साथ लेकर चलने का। जब तक वोट बैंक की राजनीति से उठकर विकास की राजनीति नहीं अपनाते तब तक भारत ऊपर नहीं उठ पाएगा। इस कड़ी में गुजरात के मुख्यमंत्री ने ही सच्चर कमेटी के साथ कुछ साल पहले हुए संवाद का जिक्र करते हुए कहा कि मेरी सरकार अल्पसख्यकों या बहुसंख्यकों के लिए भी कुछ नहीं करती है। मेरी सरकार छह करोड़ गुजरातियों के लिए काम करती है। मैं हर चीज को माइनारिटी और मेजोरिटी में नहीं तोलता। मेरे राज्य के नागरिक सभी एक हैं।
मोदी के उपवास खत्म होने के दिन सोमवार को भाजपा ने जबरदस्त शक्ति प्रदर्शन किया अब कांग्रेस की बारी है। मोदी के उपवास के खिलाफ गांधी आश्रम के सामने जवाबी अनशन पर बैठे कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला मंगलवार सुबह अपनी भूख हड़ताल समाप्त करेंगे। कांग्रेस के केंद्रीय पदाधिकारी के रूप में गुजरात कांग्रेस के प्रभारी मोहन प्रकाश ने मोदी सरकार पर जमकर हल्ला बोला। गुजरात सरकार पर बरसते हुए मोहन प्रकाश ने कहा कि सौ करोड़ रुपये खर्च कर नरेन्द्र मोदी कौन-सी सद्भावना दिखाना चाहते हैं। मोहन प्रकाश ने कहा कि मोदी सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है। कैग की रिपोर्ट में गुजरात सरकार का भ्रष्टाचार पूरी तरह उजागर हुआ है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मोदी सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए जनता की अदालत में जाएगी। वाघेला ने कहा कि अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर उपवास नहीं किया जाता। मोदी का उपवास महज एक दिखावा है और एक सियासी तिकड़म है। वाघेला ने आरोप लगाया कि मोदी ने पहले 72 घंटे के उपवास की घोषणा की थी लेकिन 55 घंटों में ही अनशन तोड़ दिया। कुल मिलाकर देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी का यह सियासी अनशन वैसे तो सफल रहा। जहां तक इसके भारतीय राजनीति में प्रभाव का सवाल है वह तो आने वाला वक्त ही देगा।
Anil Narendra, BJP, CAG, Congress, Corruption, Daily Pratap, Gujarat, L K Advani, Narender Modi, Vir Arjun
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Wednesday, 14 September 2011
नरेन्द्र मोदी की अग्निपरीक्षा
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Published on 14th September 2011
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को बहुत उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट सोमवार को मोदी को 2002 के गोधरा कांड के बाद दंगों पर केस में लपेट लेगा और उन्हें कटघरे में खड़ा कर देगा।मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और 62 अन्य अधिकारियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 2002 में हुए गुलबर्ग सोसाइटी दंगों को रोकने के लिए जानबूझ कर कोई कदम नहीं उठाया और हिंसा को बढ़ावा दिया पर मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे उनके प्रतिद्वंद्वियों को सुप्रीम कोर्ट से निराशा मिली।
शीर्ष अदालत ने उनको दंगा रोकने में उनकी भूमिका में निक्रियता पर कोई फैसला सुनाने से इंकार कर दिया। न्यायमूर्ति डीके जैन की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मोदी और अन्य सरकारी अधिकारियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज करने के लिए कोई भी विशिष्ठ निर्देश देने से इंकार कर दिया।
मोदी और इन सरकारी अधिकारियों को पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी द्वारा की गई शिकायत में पक्ष बनाया गया था। जाफरी की अहमदाबाद दंगों में गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार में जान चली गई थी। न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम और न्यायमूर्ति आफताब आलम की सदस्यता वाली पीठ ने शीर्ष न्यायालय के निर्देश पर विशेष जांच अदालत (एसआईटी) द्वारा की गई जांच की अंतरिम रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के समक्ष दाखिल करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए गठित की गई विशेष जांच समिति यानि एसआईटी को आदेश दिए हैं कि वह अपनी रिपोर्ट गुजरात की निचली अदालत को सौंप दे यानि अब निचली अदालत यह तय करेगी कि गुजरात दंगों में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मामला बनता है या नहीं? फैसले पर अपने-अपने ढंग से प्रतिक्रिया हुई। इस दंगे में मारे गए सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने कोर्ट के इस फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बेहद निराशाजनक है। मेरे पास एक बार फिर इसके खिलाफ अपील करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। 2002 में जो कुछ भी हुआ था, उसके हर पल का सच्चा ब्यौरा मैंने एसआईटी को दिया था। इतने बरसों के बाद एक ही बात को मैं कब तक दोहराऊंगी? जकिया जाफरी का कहना है कि राज्य की अदालत को इस मामले का सौंप दिए जाने का मतलब यह ही है कि नरेन्द्र मोदी के हक में ही फैसला आएगा। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता और नरेन्द्र मोदी की चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी तीस्ता सीतलवाड़ ने कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया और कहा कि इस फैसले को क्लीन चिट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, `यह संघर्ष बहुत लम्बा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का गलत अर्थ निकाला जा रहा है। अब हमारी याचिका, एसआईटी की रिपोर्ट और राजू रामचन्द्रन की रिपोर्ट गुजरात के मजिस्ट्रेट देखेंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी और अन्य लोगों के खिलाफ और केस ही नहीं है। अगर मोदी या किसी और के खिलाफ मामला बन्द होने की बात होती तो जकिया जी और हमारा पक्ष सुना जाएगा। हमें भरोसा है कि गुजरात की अदालत इस मामले में उपयुक्त फैसला सुनाएगी।' सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर नरेन्द्र मोदी ने महज तीन शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया दी। `ईश्वर महान है।' भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि पार्टी को विश्वास था कि मोदी को बदनाम करने की मुहिम ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगी।
पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने मुस्कुराते हुए कहा, `मोदी से नफरत करने वालों और उन्हें गिराने की ताक में रहने वालों की वर्तमान अवस्था को मैं समझ सकता हूं। कानून ने वह रास्ता अपनाया है जो बिल्कुल सही है।
कांग्रेस ने इस मसले पर बहुत ही सोची-समझी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट नहीं दी है।' प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा, `इससे निराशा की कोई बात नहीं है। नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट थोड़े ही मिली है? हमारी कानूनी प्रक्रिया में सुधार लाए जाने की जरूरत है। जकिया जी और उनके परिवार के लिए मैं सहानुभूति जताना चाहूंगा।'
मामला कुछ यूं था। गोधरा कांड के बाद गुजरात में बड़े पैमाने में दंगे भड़के। गुलबर्ग सोसाइटी दंगों में 35 से ज्यादा लोग मारे गए थे और जकिया जाफरी ने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री मोदी और 62 अन्य लोगों ने गुजरात में हुई हिंसा को बढ़ावा दिया। गुजरात में 2002 के दंगों में 1000 से अधिक लोग मारे गए थे। साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों को जिन्दा जलाने के स्वरूप यह प्रतिक्रिया हुई थी। इन दंगों पर एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट पिछले साल आई थी। लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया था। एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी और कहा था कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर एक स्वतंत्र राय लेने के लिए राजू रामचन्द्रन को अदालत की सहायता के लिए नियुक्त किया गया था। रामचन्द्रन को आदेश दिया गया था कि वे एसआईटी रिपोर्ट की निष्पक्ष पड़ताल करें और मामले से जुड़े गवाहों, पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों से मिलें और उसके बाद सुझाव दें कि गुजरात मुख्यमंत्री की भूमिका पर क्या कदम उठाना चाहिए? मीडिया में आई खबरों के मुताबिक राजू रामचन्द्रन ने एसआईटी की रिपोर्ट का खंडन करते हुए कहा था कि गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीके जैन, जस्टिस पी. सदाशिवम और जस्टिस आफताब आलम की बैंच ने इसी रिपोर्ट के आधार पर अपना फैसला सुनाया और एसआईटी को आदेश दिया कि वह अपनी रिपोर्ट अब निचली अदालत के समक्ष रखें।
इस फैसले से जहां भाजपा की बांछें खिल गई हैं वहीं कांग्रेस मोदी को संसद से लेकर सड़क तक घेरती रही को इससे झटका लगा है। यही वजह है कि मोदी को भाजपा के हर कोने से बधाई मिली और उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका भी तलाशनी शुरू हो गई है। इस फैसले के बाद मोदी का राजनीतिक कद बढ़ा है। पार्टी के भीतर से उनके राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में आने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि मोदी पार्टी द्वारा सौंपे जाने वाली किसी भी जिम्मेदारी को निभाने में सक्षम हैं।
राज्यसभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मोदी पहले से ही राष्ट्रीय राजनीति में हैं और हमारे प्रमुख नेताओं में हैं। फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए जेटली ने कहा कि भाजपा शुरू से ही कहती रही है कि मोदी पर लगाए गए आरोप झूठे हैं और उनकी दंगों में कोई भूमिका नहीं थी। इससे साबित हुआ है कि मात्र प्रोपेगंडा व झूठे आरोप कभी भी साक्ष्य नहीं हो सकते। मोदी का नाम एक भी आरोप पत्र में नहीं है और न ही विशेष जांच दल ने उन्हें दोषी पाया है। सुषमा ने कहा कि मोदी ने अग्निपरीक्षा पास कर ली है, `सत्यमेव जयते।'
Anil Narendra, Arun Jaitli, Godhra, Gujarat, L K Advani, Narender Modi, Supreme Court, Sushma Swaraj
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Friday, 1 July 2011
भाजपा के विधानसभा उपचुनाव में सफलता के कारण
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Published on 1st July 2011
अनिल रेन्द्र
दो राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पाटा ने दोनों सीटों पर सफलता अर्जित की है। मध्य प्रादेश की जबेरा सीट पर भाजपा के दशरथ लोधी ने कांग्रोस की डॉ. तान्या सालोमन को 11,738 वोटों के अन्तर से हराया।
भाजपा ने यह सीट कांग्रोस से छीनी है। उधर बिहार में पूर्णिया सदर सीट पर भाजपा की किरण केसरी ने कांग्रोस के रामचरित्र यादव को 23,665 वोटों से पराजित किया। इस सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार है। इन शानदार सफलताओं से एक बार फिर साबित होता है कि कांग्रोस की छवि और स्थिति कितनी खराब हो गईं है। इसका एक और महत्वपूर्ण कारण है इन राज्यों में सशक्त नेतृत्व। भाजपा शासित राज्यों में अच्छी छवि का सबसे बड़ा कारण है वहां पाटा का नेता। पाटा के नेता की छवि स्वच्छ, ईंमानदार, जनता के प्राति संवेदनशील, नौकरशाह पर वंट्रोल और सही प्राथमिकताओं को रखना अति आवश्यक है। नेता कार्यंकर्ता को अपने पास रखे और सत्ता में उनसे भागीदारी करे। मुझे बीजेपी के कर्मठ और हार्ड कोर कायकर्ता ने एक पते की बात बताईं। उन्होंने कहा कि भाजपा और कांग्रोस में एक बड़ा बुनियादी फर्व क्या है? कांग्रोस जब सत्ता में आती है, तो सत्ता का सुख, लाभ, पुरस्कार अपने कार्यंकर्ताओं से बांटते हैं यानि कार्यंकर्ता को सत्ता का लाभ मिलता है। दूसरी ओर भाजपा नेता चुनाव से पहले तो कार्यंकर्ता को माईं-बाप बना लेते हैं और चुनाव जीतने के बाद जब सत्ता सुख बांटने की बारी आती है तो वह अपने एयरवंडीशन ड्राइंग रूम में बन्द होकर रह जाते हैं, कार्यंकर्ता उनके घर, कार्यांलय में घुस भी नहीं सकता। वह सत्ता सुख, सत्ता के लाभ, प्रासाद खुद ही भोगना चाहते हैं, कार्यंकर्ताओं से बांटने को तैयार नहीं होते। यही वजह है कि अगले चुनाव में वह कार्यंकर्ता घर बैठ जाता है और कहता है कि हमारी बला से यह जीते या हारे, हमें क्या लेना-देना है? दूसरी ओर कांग्रोस का कार्यंकर्ता अगले चुनाव में पूरा दमखम लगा देता है। इसलिए क्योंकि अपने नेता को जिताने में उसका भी स्वार्थ जुड़ा होता है। जब तक भाजपा वेंद्रीय नेतृत्व को यह साधारणसी बात समझ नहीं आती वह शायद ही सत्ता में आ सवें। अगर मध्य प्रादेश, बिहार या गुजरात में भाजपा को इतनी सफलता मिल रही है तो उसका एक बड़ा कारण है वहां पाटा का मुख्यमंत्री। आम कार्यंकर्ता अपने आपको अपने नेता से आइडेंटीफाईं करता है और उसे मालूम है कि उसे कोईं भी समस्या होगी या उसका कोईं काम होगा तो वह अपने नेता पर भरोसा कर सकता है।
कांग्रोस में वुछ नेता चाहे जितनी भी विपरीत हवा हो, चुनाव जीत जाते हैं क्योंकि उनके कार्यंकर्ता उन्हें जिताने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं।
आज भारतीय जनता पाटा के वेंद्रीय नेतृत्व में इतनी गुटबाजी है, प्राधानमंत्री बनने की होड़ लगी हुईं कि उन्हें सिवाय अपना जोड़तोड़ करने की किसी को पुर्सत नहीं है। एक-दूसरे की टांग खींचना, नम्बर घटाने के खेल में यह दिन-रात जुटे हुए हैं। यह बात मैं अकेला नहीं कह रहा, खुद पाटा के दिग्गज नेता श्री लाल वृष्ण आडवाणी ने हाल ही में कही है। पूर्व उपप्राधानमंत्री और भारतीय जनता पाटा संसदीय दल के अध्यक्ष लाल वृष्ण आडवाणी ने कहा है कि ईंमानदारी के मामले में पाटा की साख गिरी है। उन्होंने कहा कि पाटा में गुटबाजी अब तेजी से बढ़ रही है। इससे भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। भाजपा के अंदरुनी सूत्रों के अनुसार आडवाणी ने दिल्ली नगर निगम के भाजपा पार्षदों के लिए दिल्ली के छतरपुर मंदिर में आयोजित प्राशिक्षण शिविर के उद्घाटन सत्र में कहा कि पाटा का निगम के कामों में तो प्रादर्शन अच्छा नहीं रहा है, ईंमानदारी के मामले में पाटा की साख गिरी है। इस मामले में उन्होंने अहमदाबाद नगर निगम की तारीफ करते हुए कहा कि वहां ईंमानदारी से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली प्रादेश भाजपा में पहले भी गुटबाजी थी, अब यह गुटबाजी और बढ़ रही है। उन्होंने साफ कहा कि पाटा की साख गिराने के लिए खुद पाटा के वुछ नेता जिम्मेदार हैं। आडवाणी जी ने बेशक यह बातें दिल्ली प्रादेश भाजपा नेताओं के लिए कही हों पर इशारे- इशारे में वे एक तीर से कईं शिकार कर गए हैं। आज की आवश्यकता यह है कि भाजपा के वेंद्रीय नेतृत्व के दूसरी पंक्ति के नेता प्राधानमंत्री बनने का सपना छोड़े और भाजपा ऐसे व्यक्ति को पीएम के तौर पर प्राोजेक्ट करे जो पूरी पाटा को साथ लेकर चल सके। वर्तमान नेतृत्व में मुझे तो ऐसे तीन ही विकल्प नजर आते हैं जिन्हें अनुभव है, जो ईंमानदार छवि के हैं, जो पाटा कार्यंकर्ताओं को साथ लेकर चला सकते हैं, जिनमें अहंकार इतना नहीं आया कि वह अपनी जमीन ही भूल जाएं—ये हैं श्री लाल वृष्ण आडवाणी, श्री मुरली मनोहर जोशी और श्री नरेन्द्र मोदी।
Tags: Anil Narendra, Bihar, BJP, Daily Pratap, L K Advani, Madhya Pradesh, Murli Manohar Joshi, Narender Modi, Vir Arjun
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