Translater

Showing posts with label Sanjay Joshi. Show all posts
Showing posts with label Sanjay Joshi. Show all posts

Saturday, 9 June 2012

संघ चाहता है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़े

भाजपा में बढ़ते अंतर्पलह का एक सबूत संजय जोशी का पार्टी छोड़ना है। पहले बेइज्जत करके संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकाला गया और अब पार्टी से ही निकलने पर मजबूर कर दिया गया। यह सब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के इशारों पर अध्यक्ष नितिन गडकरी ने किया। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि गडकरी तो मुखौटा हैं असल ताकत तो संघ है और संघ ने अन्दरखाते यह फैसला कर लिया है कि एक तरफ वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को डाउन करना है दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करना है। तभी तो संघ के मुखपत्र आर्गनाइजर के ताजा अंक में कहा गया है कि कांग्रेस पार्टी का तेजी से ग्रॉफ गिर रहा है लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को कांग्रेस के इस ह्रास का फायदा उठा पाना भी मुश्किल नजर आ रहा है। केवल मोदी ही ऐसा चेहरा हैं जिनमें पार्टी को उभारने और देशभर में उसके वोट आधार का विस्तार करने की क्षमता है जैसे अटल बिहारी वाजपेयी ने नब्बे के दशक में करके दिखाया था। अगर संघ इस नतीजे पर वाकई ही पहुंच चुकी है तो क्यों नहीं खुली घोषणा कर देता कि संघ और भाजपा 2014 का लोकसभा चुनाव नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ेगा? श्री नरेन्द्र मोदी की छवि कट्टर हिन्दुत्व की है। अटल जी की छवि और मोदी की छवि में बहुत फर्प है। अटल जी सबको साथ लेकर चलते थे। मोदी के काम करने का अपना ही ढंग है, यह न तो कार्यकर्ता की परवाह करते हैं, न नेता की और न ही संघ की। उनकी महत्वाकांक्षाएं अब संघ और भाजपा से ऊपर हो गई हैं। वह इनको कुछ नहीं समझते। कल तक इन्हीं गडकरी साहब की मोदी से अनबन थी पर अब संघ के इशारे पर गडकरी को मोदी से समझौता करना पड़ा है और इस सौदे की गडकरी को क्या कीमत देनी पड़ी है संजय जोशी के केस से पता चलता है। हमें लगता यह है कि संघ मोदी को आडवाणी के खिलाफ खड़ा कर रहा है। आडवाणी को किनारे लगाने के लिए संघ किसी भी हद तक जा सकता है। जब संघ को यह विश्वास हो गया कि अब अटल जी राजनीति में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकते तो उसने आडवाणी की काट करनी आरम्भ कर दी और विडम्बना यह है कि खुद श्री आडवाणी ने उन्हें बहाना भी गलती से दे दिया। मैं जिन्ना के बयान की बात कर रहा हूं। कभी राजनाथ सिंह को आगे करके तो कभी दूसरी पंक्तियों के नेताओं को उकसा कर आडवाणी को डाउन करने का प्रयास होता रहा। कटु सत्य तो यह है कि आज भी आडवाणी के सामने अन्य सभी भाजपा नेता बौने लगते हैं। नरेन्द्र मोदी बेशक एक काबिल और धाकड़ छवि वाले नेता हैं पर उन्हें भाजपा के अन्दर और बाहर कितना स्वीकार किया जाएगा, यह कहना मुश्किल है। अगर नरेन्द्र मोदी को भावी पीएम प्रोजेक्ट किया जाता है तो भाजपा में ही घमासान मच जाएगा। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, डाक्टर मुरली मनोहर जोशी सभी अपने दावे पेश कर सकते हैं। फिर राजग के दूसरे घटक दलों जिनमें नीतीश कुमार, बाल ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल जैसे दिग्गज प्रमुख हैं, क्या मोदी को स्वीकार करेंगे? आडवाणी जी ऐसे नेता हैं जिनकी छतरी के नीचे राजग सहयोगी दल संगठित हो सकते हैं। कांग्रेस के खिलाफ माहौल इतना खराब है कि क्या कह सकते हैं शायद मुसलमान भी मोदी की जगह आडवाणी का समर्थन कर दें? पर आडवाणी के ऊंचे कद के बावजूद आरएसएस उन्हें डाउन करने के लिए किसी हद तक जाने को तैयार है। पहले राजनाथ सिंह को खड़ा किया गया, वह फेल हो गए अब नरेन्द्र मोदी को खड़ा किया जा रहा है यानि संघ ऐसा करने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार है पर संघ अपने ही बुने जाल में फंसता नजर आ रहा है और आडवाणी के खिलाफ मोदी को विकल्प के रूप में आगे करने की रणनीति संघ के ही खिलाफ साबित हो रही है। अब संघ को यह समझ नहीं आ रहा है कि वह मोदी की शर्तों को अस्वीकार कैसे करे? विवश होकर संघ मोदी से ब्लैकमेल हो रहा है। असल में संघ को यह अनुमान शायद नहीं था कि नरेन्द्र मोदी अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक ही राजनीति करेंगे। उन्होंने अपनी राजनीतिक दबंगई से जिस तरह प्रवीण तोगड़िया सरीखे के संघ के नेताओं को प्रभावहीन बना दिया उसी तरह अपने विरोधियों को षड्यंत्र और राजनीतिक सौदेबाजी के तहत निपटाने में संकोच नहीं किया। नरेन्द्र मोदी की इस दबंगई की वजह से आज पूरी दुनिया में भाजपा की छवि मुस्लिम विरोधी और दंगाई की बनी हुई है। हिन्दुत्व के झंडाबरदारों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि देश में उदार हिन्दुत्व तो ठीक है किन्तु हिंसक एवं कट्टर हिन्दुत्व का समर्थन बहुसंख्य हिन्दू भी नहीं करते। इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं कि केंद्रीय राजनीति में मोदी प्रासंगिक और स्वीकार्य हों? भारत गुजरात नहीं। राज्य में जो चले यह जरूरी नहीं कि पूरे देश में भी वही चले। अभी तो संघ की गलत रणनीति के दुष्परिणाम की शुरुआत है। उसने भाजपा के परम्परागत सिस्टम के खिलाफ जो प्रयोग शुरू किया उसकी विकृति स्वरूप परिणाम भी आने शुरू हो गए हैं। सरल भाषा में कहें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेन्द्र मोदी को भस्मासुर के रूप में तैयार कर दिया है। किन्तु जैसा कि संघ से जुड़ी पत्र-पत्रिकाएं एवं नेता नरेन्द्र मोदी को लगातार नसीहतें दे रहे हैं, उसे छोड़ें और अपना दिल बड़ा करें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भाजपा में अब संगठन पहले नेता बाद में का सिद्धांत समाप्त हो गया है। अब भाजपा संघ की प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी बन चुकी है जिसके एमडी नितिन गडकरी हैं और यह पार्टी को अपनी निजी कम्पनी की तरह चला रहे हैं। मात्र दो सीटों से लोकसभा में भाजपा को पौने दो सौ तक पहुंचाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी की तुलना में नरेन्द्र मोदी कितने सफल साबित होंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा किन्तु इतना तो तय है कि मोदी को भाजपा के अन्दर ही कई मोर्चों पर जूझना पड़ेगा। अभी लोकसभा चुनाव में दो वर्ष शेष हैं, ऐसी हालत में संघ की आडवाणी विरोधी मुहिम भी पिट सकती है। आडवाणी जी को संघ और भाजपा मिलकर भी चाहे जितना पीछे धकेलने की कोशिश करे किन्तु वास्तविकता तो यही है कि उनके सामने गडकरी और नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर दोनों में इन दोनों का व्यक्तित्व बौना लगता है। अगर आने वाले दिनों में यदि आडवाणी ने भाजपा से ही किनारा कर लिया तो पार्टी में विभाजन तक हो सकता है क्योंकि संघ की घटिया राजनीति की वजह से भाजपा का कोई भी नेता दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहा है और इसीलिए पार्टी में कई गुट सक्रिय हैं। जाहिर है कि इन गुटों का परस्पर संघर्ष पार्टी को कमजोर ही करेगा और यदि अंतर्पलह के कारण 2014 में भाजपा को मात मिलती है तो इसके लिए पूरी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार होगा। यदि संघ को भाजपा की चिन्ता होती तो वह पार्टी में उठापटक कराने के लिए आडवाणी के खिलाफ दूसरी पंक्ति के नेताओं को उकसाने और एकजुट करने का काम नहीं करता। यदि उसको जरा भी राजनीतिक समझ होती तो क्रम परम्परा, अटल जी के बाद आडवाणी जी और उनके बाद डॉ. मुरली मनोहर जोशी, से छेड़छाड़ न करता। सच तो यह है कि अब संघ खुद भी दिग्भ्रमित और अविश्वसनीय होता जा रहा है। एक वक्त था जब लोग मानते थे कि यदि भाजपा इतनी अनुशासित है तो संघ कितना अनुशासित होगा। लेकिन अब लोग भाजपा और संघ में कोई अन्तर नहीं करते, लोग अब दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू मान रहे हैं। अब फैसला संघ को करना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा चुनाव लड़ेगी या नरेन्द्र मोदी के?
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, L K Advani, Modi, Narender Modi, RSS, Sanjay Joshi, Vir Arjun

Tuesday, 24 April 2012

भाजपा में सत्ता की तीन धुरियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी में नगर निगम चुनाव जीतने के बाद एक नया उत्साह है। उन्हें लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बाजी मार सकती है पर सबसे बड़ी कमी जो उभर कर आ रही है वह है क्लीयर नेतृत्व का अभाव। यह किसी से छिपा नहीं कि पार्टी के एक बड़े धड़े खासकर सांसदों के मन में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था कि आखिर यूपीए-2 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के मुद्दे पर घिरी रही। लेकिन सरकार की विफलता का भाजपा को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। इसके चलते केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए पार्टी को लोकसभा चुनाव पूर्व अपना पीएम उम्मीदवार घोषित करने की दरकार है। इस समय यह स्थिति है कि भाजपा तीन धुरियों पर चल रही है। सबसे पहले हैं श्री नितिन गडकरी जो पार्टी अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन है। दूसरी तरफ हैं डी-4 नेता। इनमें आडवाणी जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली प्रमुख हैं। तीसरी धुरी नरेन्द्र मोदी हैं जो अपने आपको पार्टी से ऊपर मानते हैं और प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार मानते हैं। इन तीनों धुरियों में सभी नेता अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। नितिन गडकरी के एक तरफ नरेन्द्र मोदी से मतभेद हैं वहीं दूसरी ओर 5-4 से अकसर खींचतान होती रहती है। ताजा उदाहरण सुरेन्द्र सिंह आहलूवालिया का पहले राज्यसभा से टिकट काटना और फिर जब डी-4 ने जोरदार विरोध किया तो उन्हें फिर से उम्मीदवार घोषित करना। कई माह से गडकरी और नरेन्द्र मोदी के बीच बातचीत तक नहीं हो रही है। संवादहीनता की इस स्थिति को गडकरी ने खुद स्वीकारा है। सवाल यह भी किया जा रहा है कि गडकरी ने मोदी से संवादहीनता की बात सार्वजनिक रूप से क्यों कही? यह बात किसी से छिपी नहीं कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को पुन भाजपा में सक्रिय किए जाने के फैसले से नाराज हैं। गडकरी ने संजय जोशी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खासा महत्व दिया। इसी के बाद दोनों में `कुट्टी' हो गई। रहा सवाल भाजपा की ओर से कौन होगा पीएम उम्मीदवार तो भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने गुरुवार को हैदराबाद में कहा कि अगले आम चुनाव से पहले पार्टी अपना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित कर देगी। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले हम अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे, अभी हम अपना उम्मीदवार बताने की स्थिति में नहीं हैं। उधर नरेन्द्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में आने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। पिछले दिनों प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के विरोध में सारे मुख्यमंत्री दिल्ली में एकत्र हुए थे। मोदी ने विशेष रूप से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और बीजू जनता दल प्रमुख और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ बैठक की। हालांकि ऊपरी स्तर पर तो यह बैठक केंद्र सरकार के प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र को लेकर थी पर अन्दर खाते 2014 लोकसभा चुनावों पर भी चर्चा हुई होगी। मोदी ने अपने आपको पीएम उम्मीदवार दर्शाने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं। आने वाले दिनों में यह अंतर्पलह और तेज होना स्वाभाविक है।
Anil Narendra, Arun Jaitli, BJP, Daily Pratap, Jayalalitha, L K Advani, Manmohan Singh, Narender Modi, NCTC, Nitin Gadkari, Sanjay Joshi, Sushma Swaraj, Tamil Nadu, UPA, Vir Arjun

Monday, 12 March 2012

Election results bring more pain than cheer for BJP

Anil Narendra
Assembly elections in all the five States have brought more pain than cheer for the Bharatiya Janata Party. The reason for cheer is the result of Goa Assembly, where BJP and Goa Gomantak Party combined has secured clear majority. BJP, for the first time has claimed majority on its own in this State with beautiful beaches. The real hero of this BJP victory is the former Chief Minister, Parrikar. He was leading the BJP election campaign in the State. I think that securing power with the support of minority is the biggest achievement of BJP. Goa Christians have proved that BJP is not a pariah. The party has won eight seats out of 17 from Christian majority areas. BJP itself fielded 6 Christian candidates and supported two independent candidates and all the eight won. The Party has received the biggest shock in UP. The election results in Uttar Pradesh have proved to be a big blow to Party's hopes of forming RJD government at the Centre in 2014. BJP was viewing its performance in UP Assembly elections as a cornerstone for its success in 2014 General Elections, but the Assembly results have dashed its hopes and it is now more concerned about the 2014 scenario. Once again, the UP is following the path shown by Tamil Nadu, where national parties have almost taken to backstage and their role has become almost irrelevant. In UP elections considered to be election touchstone for BJP and the RSS, all their experiments, on one hand, have been shattered one by one and on the other, a number of their warriors have been grounded. RSS and the Party President Nitin Gadakari had jointly taken up the challenging task of consoling the dissatisfied voters. First, Gadakari, with the support of the RSS, propped up the former RSS Pracharak and former Organiser, Sanjay Joshi in the UP elections, in spite of strong objections from the high-statured leader and Gujarat Chief Minister, Narendra Modi. Secondly, in spite of stiff opposition from all party leaders, Gadakari admitted the ousted BSP leaders Babu Singh Kushwaha and Badshah Singh in the Party. In view of increasing opposition, he suspended the membership of Babu Singh Kushwaha, but not only kept the other corrupt leader, Badshah Singh in the Party, but made him party candidate from the Mahoba seat. Except Uma Bharati, all the BJP experiments with Bundelkhand proved unsuccessful. He restricted firebrand leaders like Varun Gandhi and Yogi Adityanath to their constituencies to stop the polarization of Muslim votes, and no effort was made to placate Narendra Modi considered to the face of Hinduism, who was invited to join the BJP election campaign, but who was not happy with the situation. In spite of all efforts, Party not only failed to stop the polarization of Muslim votes, but instead it lost its traditional voters, resulting in its failure to re-enact the 2007 performance, but its performance this time was miserably poor. This is the first occasion after the demolition of disputed structure in Ayodhya on 6th December 1992 that the BJP candidate Lallu Singh lost to Tej Narayan Pandey alias Pawan Pandey of SP. Lallu Singh has been winning this seat since 1991. Candidates for UP were also decided by RSS, Gadkari and Joshi. They fielded such weak candidates, who not only brought disgrace to the Party, but it was ousted from the race and was relegated to the fourth place and most of its candidates were unable to save their deposits. One hundred twenty two such candidates were defeated who failed to secure their place even in the four-cornered fight. The BJP President Nitin Gadakari had made comprehensive preparations to effect change in UP. He did several new experiments instead of sticking to the traditional attitude and not only this, Gadakari & Co conducted a separate survey for selection of best candidates. In the situation emerging after the elections, it came fourth with 122 candidates and most of them had to fight to save their deposit. There were a number of candidates, who were struggling hard even to get 5,000 votes. In UP, the BJP has been put on margin and responsibility for such a debacle rests on RSS and leaders like Nitin Gadakari and Sanjay Joshi.

Saturday, 10 March 2012

भाजपा के लिए परिणाम ज्यादा गम और कम खुशी लेकर आए हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 March 2012
अनिल नरेन्द्र
 भारतीय जनता पार्टी के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव थोड़ी खुशी और ज्यादा गम लाए हैं। खुशी की वजह है गोवा परिणाम। गोवा में भाजपा और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। भाजपा ने पहली बार खूबसूरत तटों वाले इस राज्य में 21 सीटें जीतकर अकेले अपने दमखम से बहुमत हासिल किया। गोवा में भाजपा की इस जीत के असल नायक पूर्व मुख्यमंत्री पार्रिकर हैं। चुनावी कमान उन्हीं के हाथों में थी। गोवा में मेरी राय में एक बहुत बड़ी उपलब्धि भाजपा की यह है कि उसने अल्पसंख्यकों के समर्थन से सत्ता पाई। गोवा के ईसाइयों ने यह साबित कर दिया कि भाजपा अछूती नहीं है। दक्षिण गोवा की 17 में से 8 सीटें पार्टी उन क्षेत्रों से जीते हैं जहां ईसाई बहुमत है। भाजपा ने खुद 6 ईसाई उम्मीदवार खड़े किए थे और 2 निर्दलीयों का समर्थन किया था। सभी आठों जीते। पार्टी को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश में लगा है। उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम भाजपा को 2014 में केंद्र में राजग सरकार बनाने की उम्मीदों पर बड़ा झटका साबित हुए। भाजपा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में रोपे गए बीज से केंद्र में 2014 के लोकसभा चुनावों में सफलता का अनुमान लगा रही थी, लेकिन परिणाम आए उससे निराशा और चिन्ता ही हाथ लगी है। उत्तर प्रदेश फिर एक बार तमिलनाडु की राह पर चला गया है जहां राष्ट्रीय दल की भूमिका अप्रासंगिक-सी हो गई है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चुनावी प्रयोगशाला बने यूपी चुनावों में जहां एक-एक करके सभी प्रयोगों को धराशायी कर दिया वहीं पार्टी के कई दिग्गजों को धूल चटाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। रूठे मतदाताओं को मनाने का जिम्मा राष्ट्रीय स्वयं संघ और अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मिलकर उठाया। सबसे पहले गडकरी ने संघ के समर्थन की बदौलत पार्टी के कद्दावर नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध के बावजूद संघ के प्रचार रहे पूर्व संगठन मंत्री संजय जोशी को यूपी के चुनावों में सक्रिय किया। दूसरा गडकरी ने सभी पार्टी नेताओ के विरोध के बावजूद बसपा से निष्कासित बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल किया। बढ़ते विरोध के चलते कुशवाहा की सदस्यता को तो निलंबित कर दिया लेकिन भ्रष्टाचार के दूसरे आरोपी बादशाह सिंह को पार्टी में बनाए रखा बल्कि उनको महोबा से चुनाव मैदान में उतार दिया। पार्टी ने बुंदेलखंड को लेकर जितने भी प्रयोग किए सिवाय उसमें एकमात्र उमा भारती के अलावा कोई सफल नहीं हो सका। मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अपने सभी फायर ब्रांड नेताओं वरुण गांधी, योगी आदित्यनाथ को जहां अपने क्षेत्र तक सीमित कर दिया वहीं दूसरी तरफ हिन्दुवादी चेहरा माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी को न्यौता तो भेजा लेकिन जब उनकी नाराजगी जाहिर हुई तो उन्हें मनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। पार्टी के सभी प्रयासों के बाद भी पार्टी मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण करने से तो न रोक सकी बल्कि वह अपने इस प्रयास में अपने परम्परागत मतदाताओं का भी वोट गंवा बैठे, जिसके चलते पार्टी 2007 के प्रदर्शन को दोहराना तो दूर रहा, उससे भी कम हो गई। अयोध्या में 6 दिसम्बर 1992 को विवादित ढांचे गिरने के बाद यह पहला मौका है जब भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी लल्लू सिंह सपा के तेज नारायण पांडे उर्प पवन पांडे से हार गया। लल्लू सिंह 1991 से लगातार यह सीट जीतते आ रहे थे। उत्तर प्रदेश के लिए उम्मीदवारों का चयन भी संघ, गडकरी और संजय जोशी ने किया। इन्होंने ऐसे फिसड्डी उम्मीदवार खड़े किए जिन्होंने न केवल पार्टी की भद्द पिटवाई बल्कि यह संघर्ष में न आकर चौथे स्थान पर रहे जहां भी ज्यादातर ने जमानत तक गंवा दी। 122 ऐसे प्रत्याशी हारे हैं जो चतुष्कोणीय लड़ाई में भी जगह नहीं बना सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यूपी के अन्दर बदलाव के लिए लम्बी तैयारी की थी। पार्टी के अन्दर के पुराने परम्परावादी रवैये के बजाय कई नए प्रयोग किए और यही नहीं, गडकरी एण्ड कम्पनी ने अलग सर्वेक्षण कराया जिससे कि अव्वल प्रत्याशी चयन हो सके। चुनाव बाद जो स्थिति बनी है उसमें भाजपा के चौथे स्थान पर करीब 122 प्रत्याशी रहे जिनमें से ज्यादातर अपनी जमानत बचाने के लिए संघर्ष करते रहे। कई प्रत्याशी तो ऐसे थे जिनको 5000 वोट लाने के लाले पड़ गए। उत्तर प्रदेश में भाजपा हाशिये पर चली गई और इसके लिए जिम्मेदार हैं संघ, नितिन गडकरी और संजय जोशी सरीखे के नेता।
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, Elections, Goa, Nitin Gadkari, Punjab, RSS, Sanjay Joshi, State Elections, Uttar Pradesh, Uttara Khand, Vir Arjun

Friday, 21 October 2011

क्या नरेन्द्र मोदी पार्टी से ऊपर हो चुके हैं?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st October 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ समय से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा के बीच समीकरण ठीक नहीं लग रहा। भाजपा में मोदी को लेकर दोनों रोष और अलगाव की भावना पैदा हो रही है। भाजपा के नेतृत्व का मानना है कि नरेन्द्र मोदी को अब अहंकार हो गया है और वह अपने आपको पार्टी से ऊपर मानने लगे हैं। पार्टी ने मोदी को उनकी हैसियत का अहसास करवाना शुरू कर दिया है। लाल कृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा पर आंखें दिखाने वाले नरेन्द्र मोदी को इस यात्रा में बिल्कुल अनदेखा कर दिया है। वह कहीं भी नजर नहीं आ रहे और अब अखबारों में उनकी सुर्खियां भी कम देखने को मिल रही हैं। आडवाणी जी ने अपनी यात्रा में भाजपा के और तमाम मुख्यमंत्रियों के कामकाज, उपलब्धियों का जिक्र किया है पर उन्होंने अभी तक एक भी बड़ी सभा में नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं लिया। यही आडवाणी पहले नरेन्द्र मोदी को एक आदर्श मुख्यमंत्री पेश करते थकते नहीं थे। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि मोदी का राजनीतिक कद काफी बड़ा हो चुका है। उन्हें यह अहसास कराने की जरूरत है कि पार्टी उनकी वजह से नहीं बल्कि वे पार्टी की वजह से हैं। इसके तहत इस मुद्दे पर अब विचार किया जा रहा है कि अगले साल में शुरू होने वाले उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में विधानसभा चुनावों में मोदी को प्रचार के लिए न बुलाया जाए। पार्टी को लगता है कि अपनी कट्टरवादी हिन्दुत्व की छवि के कारण अगर मोदी प्रचार करते हैं तो तमाम मुसलमान बिखर जाएंगे और भाजपा का मोदी की वजह से विरोध करना शुरू कर देंगे। भाजपा को यह मालूम है कि एक भी मुसलमान वोट उसे मिलने वाला नहीं पर वह यह भी नहीं चाहती कि बिना वजह मुसलमान पार्टी के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लें। पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछड़े व अतिपिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने के लिए नीतीश कुमार की मदद लेना बेहतर विकल्प समझने लगी है। नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं कि श्री आडवाणी ने अपनी जनचेतना यात्रा को बिहार से शुरू किया और इस यात्रा को हरी झंडी नीतीश ने दिखाई। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने मोदी को प्रदेश में न भेजने की चेतावनी दी थी, भाजपा ने इस पर अमल किया और नतीजे सबके सामने हैं। आज नीतीश कुमार एनडीए के सबसे सशक्त उम्मीदवार बनकर उभरे हैं। भाजपा को भी सूट करता है कि वह एनडीए को आगे बढ़ाए और इस रास्ते से वह सत्ता तक पहुंचे। मोदी का कद छोटा करने के लिए भाजाप नेतृत्व और संघ ने मिलकर जानबूझ कर संजय जोशी को जिम्मेदारी सौंपी है। नरेन्द्र मोदी संजय जोशी को बेहद नापसंद करते हैं। उन्हें संगठन मंत्री पद से हटवाने में उनकी बहुत अहम भूमिका रही। वैसे तो लाल कृष्ण आडवाणी भी संजय जोशी को पसंद नहीं करते क्योंकि जिन्ना प्रकरण में संजय जोशी ने ही आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा था। आमतौर पर अध्यक्ष अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को देता है पर आडवाणी ने अपना इस्तीफा संजय जोशी को भेजा था।
श्री नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। वह अपने घर में ही घिरते जा रहे हैं। गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी को फंसाने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ने वाले निलम्बित और फिर गिरफ्तार किए गए आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को सोमवार एक स्थानीय अदालत ने तमाम विरोध के बावजूद जमानत दे दी। अदालत ने उस प्रकरण पर तार्किक संदेह व्यक्त किया जिसके तहत भट्ट को गिरफ्तार किया गया था। रिहा होते ही भट्ट ने मोदी पर हमला बोल दिया। भट्ट ने मोदी को अपराधी बताते हुए कहा कि मेरे लिए मोदी सिर्प एक अपराधी हैं जो मुख्यमंत्री बन गए हैं। मोदी और उनके लोग खुद को बचाने के लिए मेरी हत्या तक करवा सकते हैं। जैसा कि हरेन पांड्या का कराया गया। यह निश्चित है कि कांग्रेस जो संजीव भट्ट को उकसा रही है इनका जमानत पर छूटने और बाहर आने का पूरा-पूरा लाभ उठाएगी। हैरानगी तो इस बात की भी है कि गुजरात के तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने संजीव भट्ट का खुला समर्थन कर दिया है। 30 सितम्बर को भट्ट की गिरफ्तारी के बाद यह पहली बार है जब अधिकारी भट्ट परिवार से मिलने उसके घर गया और संजीव की पत्नी श्वेता भट्ट से मुलाकात की। यह मुलाकात करीब दो घंटे चली। श्वेता ने बताया कि तीनों अधिकारियों ने संजीव के साथ हो रहे घटनाक्रम पर खेद व्यक्त किया और मदद का आश्वासन दिया। आने वाले दिनों में लगता है कि नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं, घटने वाली नहीं।
Anil Narendra, Bihar, BJP, Daily Pratap, Gujarat, L K Advani, Narender Modi, Nitin Gadkari, Nitish Kumar, Rath Yatra, Sanjay Joshi, Sanjeev Bhatt, Vir Arjun