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Saturday, 9 June 2012

संघ चाहता है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़े

भाजपा में बढ़ते अंतर्पलह का एक सबूत संजय जोशी का पार्टी छोड़ना है। पहले बेइज्जत करके संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकाला गया और अब पार्टी से ही निकलने पर मजबूर कर दिया गया। यह सब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के इशारों पर अध्यक्ष नितिन गडकरी ने किया। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि गडकरी तो मुखौटा हैं असल ताकत तो संघ है और संघ ने अन्दरखाते यह फैसला कर लिया है कि एक तरफ वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को डाउन करना है दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करना है। तभी तो संघ के मुखपत्र आर्गनाइजर के ताजा अंक में कहा गया है कि कांग्रेस पार्टी का तेजी से ग्रॉफ गिर रहा है लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को कांग्रेस के इस ह्रास का फायदा उठा पाना भी मुश्किल नजर आ रहा है। केवल मोदी ही ऐसा चेहरा हैं जिनमें पार्टी को उभारने और देशभर में उसके वोट आधार का विस्तार करने की क्षमता है जैसे अटल बिहारी वाजपेयी ने नब्बे के दशक में करके दिखाया था। अगर संघ इस नतीजे पर वाकई ही पहुंच चुकी है तो क्यों नहीं खुली घोषणा कर देता कि संघ और भाजपा 2014 का लोकसभा चुनाव नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ेगा? श्री नरेन्द्र मोदी की छवि कट्टर हिन्दुत्व की है। अटल जी की छवि और मोदी की छवि में बहुत फर्प है। अटल जी सबको साथ लेकर चलते थे। मोदी के काम करने का अपना ही ढंग है, यह न तो कार्यकर्ता की परवाह करते हैं, न नेता की और न ही संघ की। उनकी महत्वाकांक्षाएं अब संघ और भाजपा से ऊपर हो गई हैं। वह इनको कुछ नहीं समझते। कल तक इन्हीं गडकरी साहब की मोदी से अनबन थी पर अब संघ के इशारे पर गडकरी को मोदी से समझौता करना पड़ा है और इस सौदे की गडकरी को क्या कीमत देनी पड़ी है संजय जोशी के केस से पता चलता है। हमें लगता यह है कि संघ मोदी को आडवाणी के खिलाफ खड़ा कर रहा है। आडवाणी को किनारे लगाने के लिए संघ किसी भी हद तक जा सकता है। जब संघ को यह विश्वास हो गया कि अब अटल जी राजनीति में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकते तो उसने आडवाणी की काट करनी आरम्भ कर दी और विडम्बना यह है कि खुद श्री आडवाणी ने उन्हें बहाना भी गलती से दे दिया। मैं जिन्ना के बयान की बात कर रहा हूं। कभी राजनाथ सिंह को आगे करके तो कभी दूसरी पंक्तियों के नेताओं को उकसा कर आडवाणी को डाउन करने का प्रयास होता रहा। कटु सत्य तो यह है कि आज भी आडवाणी के सामने अन्य सभी भाजपा नेता बौने लगते हैं। नरेन्द्र मोदी बेशक एक काबिल और धाकड़ छवि वाले नेता हैं पर उन्हें भाजपा के अन्दर और बाहर कितना स्वीकार किया जाएगा, यह कहना मुश्किल है। अगर नरेन्द्र मोदी को भावी पीएम प्रोजेक्ट किया जाता है तो भाजपा में ही घमासान मच जाएगा। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, डाक्टर मुरली मनोहर जोशी सभी अपने दावे पेश कर सकते हैं। फिर राजग के दूसरे घटक दलों जिनमें नीतीश कुमार, बाल ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल जैसे दिग्गज प्रमुख हैं, क्या मोदी को स्वीकार करेंगे? आडवाणी जी ऐसे नेता हैं जिनकी छतरी के नीचे राजग सहयोगी दल संगठित हो सकते हैं। कांग्रेस के खिलाफ माहौल इतना खराब है कि क्या कह सकते हैं शायद मुसलमान भी मोदी की जगह आडवाणी का समर्थन कर दें? पर आडवाणी के ऊंचे कद के बावजूद आरएसएस उन्हें डाउन करने के लिए किसी हद तक जाने को तैयार है। पहले राजनाथ सिंह को खड़ा किया गया, वह फेल हो गए अब नरेन्द्र मोदी को खड़ा किया जा रहा है यानि संघ ऐसा करने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार है पर संघ अपने ही बुने जाल में फंसता नजर आ रहा है और आडवाणी के खिलाफ मोदी को विकल्प के रूप में आगे करने की रणनीति संघ के ही खिलाफ साबित हो रही है। अब संघ को यह समझ नहीं आ रहा है कि वह मोदी की शर्तों को अस्वीकार कैसे करे? विवश होकर संघ मोदी से ब्लैकमेल हो रहा है। असल में संघ को यह अनुमान शायद नहीं था कि नरेन्द्र मोदी अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक ही राजनीति करेंगे। उन्होंने अपनी राजनीतिक दबंगई से जिस तरह प्रवीण तोगड़िया सरीखे के संघ के नेताओं को प्रभावहीन बना दिया उसी तरह अपने विरोधियों को षड्यंत्र और राजनीतिक सौदेबाजी के तहत निपटाने में संकोच नहीं किया। नरेन्द्र मोदी की इस दबंगई की वजह से आज पूरी दुनिया में भाजपा की छवि मुस्लिम विरोधी और दंगाई की बनी हुई है। हिन्दुत्व के झंडाबरदारों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि देश में उदार हिन्दुत्व तो ठीक है किन्तु हिंसक एवं कट्टर हिन्दुत्व का समर्थन बहुसंख्य हिन्दू भी नहीं करते। इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं कि केंद्रीय राजनीति में मोदी प्रासंगिक और स्वीकार्य हों? भारत गुजरात नहीं। राज्य में जो चले यह जरूरी नहीं कि पूरे देश में भी वही चले। अभी तो संघ की गलत रणनीति के दुष्परिणाम की शुरुआत है। उसने भाजपा के परम्परागत सिस्टम के खिलाफ जो प्रयोग शुरू किया उसकी विकृति स्वरूप परिणाम भी आने शुरू हो गए हैं। सरल भाषा में कहें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेन्द्र मोदी को भस्मासुर के रूप में तैयार कर दिया है। किन्तु जैसा कि संघ से जुड़ी पत्र-पत्रिकाएं एवं नेता नरेन्द्र मोदी को लगातार नसीहतें दे रहे हैं, उसे छोड़ें और अपना दिल बड़ा करें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भाजपा में अब संगठन पहले नेता बाद में का सिद्धांत समाप्त हो गया है। अब भाजपा संघ की प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी बन चुकी है जिसके एमडी नितिन गडकरी हैं और यह पार्टी को अपनी निजी कम्पनी की तरह चला रहे हैं। मात्र दो सीटों से लोकसभा में भाजपा को पौने दो सौ तक पहुंचाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी की तुलना में नरेन्द्र मोदी कितने सफल साबित होंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा किन्तु इतना तो तय है कि मोदी को भाजपा के अन्दर ही कई मोर्चों पर जूझना पड़ेगा। अभी लोकसभा चुनाव में दो वर्ष शेष हैं, ऐसी हालत में संघ की आडवाणी विरोधी मुहिम भी पिट सकती है। आडवाणी जी को संघ और भाजपा मिलकर भी चाहे जितना पीछे धकेलने की कोशिश करे किन्तु वास्तविकता तो यही है कि उनके सामने गडकरी और नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर दोनों में इन दोनों का व्यक्तित्व बौना लगता है। अगर आने वाले दिनों में यदि आडवाणी ने भाजपा से ही किनारा कर लिया तो पार्टी में विभाजन तक हो सकता है क्योंकि संघ की घटिया राजनीति की वजह से भाजपा का कोई भी नेता दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहा है और इसीलिए पार्टी में कई गुट सक्रिय हैं। जाहिर है कि इन गुटों का परस्पर संघर्ष पार्टी को कमजोर ही करेगा और यदि अंतर्पलह के कारण 2014 में भाजपा को मात मिलती है तो इसके लिए पूरी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार होगा। यदि संघ को भाजपा की चिन्ता होती तो वह पार्टी में उठापटक कराने के लिए आडवाणी के खिलाफ दूसरी पंक्ति के नेताओं को उकसाने और एकजुट करने का काम नहीं करता। यदि उसको जरा भी राजनीतिक समझ होती तो क्रम परम्परा, अटल जी के बाद आडवाणी जी और उनके बाद डॉ. मुरली मनोहर जोशी, से छेड़छाड़ न करता। सच तो यह है कि अब संघ खुद भी दिग्भ्रमित और अविश्वसनीय होता जा रहा है। एक वक्त था जब लोग मानते थे कि यदि भाजपा इतनी अनुशासित है तो संघ कितना अनुशासित होगा। लेकिन अब लोग भाजपा और संघ में कोई अन्तर नहीं करते, लोग अब दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू मान रहे हैं। अब फैसला संघ को करना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा चुनाव लड़ेगी या नरेन्द्र मोदी के?
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Sunday, 27 May 2012

दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27 May 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भारी पड़ गए। पार्टी में संघ की नहीं चली और संजय जोशी को भाजपा कार्य समिति की बैठक से पहले बाहर का रास्ता दिखाना ही पड़ा। मोदी के दबाव में गडकरी और संघ नतमस्तक दिखे। पार्टी सूत्रों ने बताया कि मोदी ने साफ कहा कि अगर कार्य समिति में संजय जोशी आए तो बैठक से खुद को दूर रखने को मजबूर होंगे। गडकरी ने बुधवार शाम को फोन से बात की थी। गडकरी ने कोर कमेटी की बैठक में मोदी से बातचीत का सार रखा। सूत्रों के मुताबिक कुछ वरिष्ठ भाजपा नेता मोदी की धमकी को स्वीकार्य करने के इच्छुक नहीं थे मगर गडकरी और संघ के दबाव के चलते संजय जोशी को दो लाइन का इस्तीफा फैक्स से भेजना पड़ा। दरअसल मोदी और गडकरी में सौदे की सुगंध आ रही है। मोदी ने शर्त रखी कि जोशी को बाहर करो और गडकरी ने शर्त रखी कि मुझे दूसरा कार्यकाल देने का आप समर्थन करें। अब लगता है कि गडकरी के दूसरे कार्यकाल मिलने में सभी रुकावटें दूर हो गई हैं और उन्हें दूसरा कार्यकाल मिलना लगभग तय है। गडकरी का तीन साल का कार्यकाल 25 दिसम्बर को पूरा हो रहा है। इस प्रस्ताव के लिए बाकायदा संगठन के संविधान में संशोधन किया जाना प्रस्तावित था, जिसे अमली जामा पहनाया गया। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने औपचारिक रूप से बैठक में अध्यक्ष के कार्यकाल को एक्सटेंशन दिए जाने का प्रस्ताव रखा जिसका दूसरे पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने अनुमोदन किया। इस सौदे का एक पहलू यह भी है कि केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य छत्रप के प्रभाव को स्वीकार कर लिया है। यह न तो भाजपा के लिए अच्छा संकेत है और न ही संघ के लिए। राष्ट्रीय पार्टी की छवि को लेकर जिस भाजपा को राष्ट्रवाद और अनुशासन के लिए जाना जाता था अब उस सिद्धांत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। भाजपा का बौना होता नेतृत्व और उस पर हावी होते राज्य छत्रप संघ के लिए चुनौती बन गए हैं। राजस्थान में वसुंधरा राजे, गुजरात में नरेन्द्र मोदी और कर्नाटक में वीएस येदियुरप्पा से जो चुनौतियां मिल रही हैं वह भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभरने से भी रोक रही है। भाजपा अध्यक्ष गडकरी के कार्यकाल को बढ़ाकर संघ भाजपा पर अपनी पकड़ जरूर साबित करना चाह रहा है लेकिन वह इकबाल और इस्तकबाल नहीं दिख रहा जो भाजपा में पहले होता था। भाजपा के इतिहास में यह पहला मौका है जब भाजपा को संघ की ओर से नियुक्त करवाए गए व्यक्ति को हटाना पड़ा है। इससे भी साबित होता है कि संघ की भाजपा पर पकड़ कमजोर होती जा रही है। हमें लगता है कि भाजपा के अन्दर भी ऐसे नेता हैं जो चाहते हैं कि संघ की भाजपा मामलों में दखलअंदाजी कम हो। पूरे प्रकरण में जहां नरेन्द्र मोदी की जीत हुई है वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक मायने में हार हुई है। इससे नरेन्द्र मोदी का कद और बढ़ेगा और दुनिया को उन्होंने साबित कर दिया कि दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए।
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Tuesday, 24 April 2012

भाजपा में सत्ता की तीन धुरियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी में नगर निगम चुनाव जीतने के बाद एक नया उत्साह है। उन्हें लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बाजी मार सकती है पर सबसे बड़ी कमी जो उभर कर आ रही है वह है क्लीयर नेतृत्व का अभाव। यह किसी से छिपा नहीं कि पार्टी के एक बड़े धड़े खासकर सांसदों के मन में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था कि आखिर यूपीए-2 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के मुद्दे पर घिरी रही। लेकिन सरकार की विफलता का भाजपा को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। इसके चलते केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए पार्टी को लोकसभा चुनाव पूर्व अपना पीएम उम्मीदवार घोषित करने की दरकार है। इस समय यह स्थिति है कि भाजपा तीन धुरियों पर चल रही है। सबसे पहले हैं श्री नितिन गडकरी जो पार्टी अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन है। दूसरी तरफ हैं डी-4 नेता। इनमें आडवाणी जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली प्रमुख हैं। तीसरी धुरी नरेन्द्र मोदी हैं जो अपने आपको पार्टी से ऊपर मानते हैं और प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार मानते हैं। इन तीनों धुरियों में सभी नेता अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। नितिन गडकरी के एक तरफ नरेन्द्र मोदी से मतभेद हैं वहीं दूसरी ओर 5-4 से अकसर खींचतान होती रहती है। ताजा उदाहरण सुरेन्द्र सिंह आहलूवालिया का पहले राज्यसभा से टिकट काटना और फिर जब डी-4 ने जोरदार विरोध किया तो उन्हें फिर से उम्मीदवार घोषित करना। कई माह से गडकरी और नरेन्द्र मोदी के बीच बातचीत तक नहीं हो रही है। संवादहीनता की इस स्थिति को गडकरी ने खुद स्वीकारा है। सवाल यह भी किया जा रहा है कि गडकरी ने मोदी से संवादहीनता की बात सार्वजनिक रूप से क्यों कही? यह बात किसी से छिपी नहीं कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को पुन भाजपा में सक्रिय किए जाने के फैसले से नाराज हैं। गडकरी ने संजय जोशी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खासा महत्व दिया। इसी के बाद दोनों में `कुट्टी' हो गई। रहा सवाल भाजपा की ओर से कौन होगा पीएम उम्मीदवार तो भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने गुरुवार को हैदराबाद में कहा कि अगले आम चुनाव से पहले पार्टी अपना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित कर देगी। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले हम अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे, अभी हम अपना उम्मीदवार बताने की स्थिति में नहीं हैं। उधर नरेन्द्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में आने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। पिछले दिनों प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के विरोध में सारे मुख्यमंत्री दिल्ली में एकत्र हुए थे। मोदी ने विशेष रूप से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और बीजू जनता दल प्रमुख और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ बैठक की। हालांकि ऊपरी स्तर पर तो यह बैठक केंद्र सरकार के प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र को लेकर थी पर अन्दर खाते 2014 लोकसभा चुनावों पर भी चर्चा हुई होगी। मोदी ने अपने आपको पीएम उम्मीदवार दर्शाने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं। आने वाले दिनों में यह अंतर्पलह और तेज होना स्वाभाविक है।
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Tuesday, 31 January 2012

क्या देश के अगले पीएम नरेन्द्र मोदी हो सकते हैं?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th January  2012
अनिल नरेन्द्र
अगर आज लोकसभा चुनाव हो जाएं तो एक जनमत सर्वेक्षण के दावे के अनुसार संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है और कांग्रेस की अगुवाई करने वाले राहुल गांधी के मुकाबले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में बढ़त मिल सकती है। ओआरजी-नील्सन द्वारा कराए गए इस राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के अनुसार जाहिर किया गया है कि आज की स्थिति में चुनाव होने पर एनडीए को 180 से 190 सीटें और तीसरे मोर्चे को भी इतनी ही सीटें मिलेंगी जबकि यूपीए को 168-178 सीटें मिलने की उम्मीद जाहिर की गई है। सर्वेक्षण में एक दिलचस्प सवाल यह भी था कि अगर अन्ना हजारे और राहुल गांधी आमने-सामने एक ही सीट पर मुकाबला कर रहे हों तो आप किसको वोट देंगे। इस सवाल पर 60 प्रतिशत लोगों ने अन्ना हजारे के समर्थन में अपना मत दिया जबकि राहुल गांधी को 24 प्रतिशत ने वोट किया। सबसे दिलचस्प प्रश्न था प्रधानमंत्री किसको देखना चाहेंगे? प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में अगस्त 2010 के सर्वेक्षण के मुकाबले राहुल गांधी की लोकप्रियता का ग्रॉफ 24 प्रतिशत से घटकर 17 प्रतिशत आ गया है जबकि नरेन्द्र मोदी का ग्रॉफ 12 से बढ़कर 45 प्रतिशत पर पहुंच गया है। बाकी नेता बहुत नीचे हैं। उदाहरण के तौर पर इस सर्वे के मुताबिक भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी की लोकप्रियता हालांकि 4 से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गई है पर मोदी से वह बहुत पीछे हैं। ताजा सर्वेक्षण में आडवाणी, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी तीनों की लोकप्रियता एक साथ यानि 10-10 प्रतिशत आ गई है। यह सर्वेक्षण ऐसे समय आया है जब 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव भी चल रहे हैं। सर्वेक्षण में 19 राज्यों में अटकल से चुने गए 90 संसदीय क्षेत्रों के 12 हजार से अधिक लोगों की राय ली गई। नरेन्द्र मोदी आज जनता की नम्बर वन च्वाइस हैं। नरेन्द्र मोदी के मानना पड़ेगा कि सितारे तेज चल रहे हैं। विडम्बना देखिए कि मोदी की सबसे कट्टर राजनीतिक विरोधी पार्टी कांग्रेस ने भी गलती से उनकी तारीफ कर डाली। खबर अटपटी है पर ऐसा हुआ है। गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने गुजरात के कुछ हिस्सों में समाचार पत्रों के साथ दो पेज का एक विज्ञापन बंटवाया। इसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि गुजरात अस्तित्व में आने के साथ ही प्रगतिशील राज्य बन गया। इसमें नरेन्द्र मोदी सहित राज्य के सभी मुख्यमंत्रियों का योगदान दर्शाया गया है। इसमें मोदी को तस्वीर के साथ उन्हें कुशल संगठनकर्ता और माहिर चुनावी रणनीतिकार बताया गया है। गुजरात में इस साल दिसम्बर में विधानसभा चुनाव होने हैं और प्रचार अभियान लगभग शुरू हो चुका है। विज्ञापन में मोदी की अहम उपलब्धियां भी शामिल की गई हैं। कहा गया है, मोदी गुजरात को ऊर्जावान राज्य में तब्दील करने के लिए बड़ी मेहनत कर रहे हैं। उन्होंने बॉयोटैक्नोलॉजी के लिए अलग विभाग बनाया है। इस विज्ञापन के प्रकाशित होते ही कांग्रेस में घमासान मचना स्वाभाविक ही था। पार्टी के आला नेता जहां इसे मूर्खता-भरा कदम बता रहे हैं तो वहीं हाई कमान ने प्रदेश इकाई तथा प्रभारी मोहन प्रकाश से जवाब-तलब किया है। हालांकि कांग्रेस नेता व केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने इसे मोदी की तारीफ वाला नहीं बल्कि उन पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष करने वाला बताया है। इस विज्ञापन में व्यंग्य कहां है अपनी समझ से तो बाहर है। सीधी मोदी की तारीफ है।
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Friday, 25 November 2011

चिदम्बरम का बहिष्कार सोची-समझी रणनीति के तहत है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th November 2011
अनिल नरेन्द्र
संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होते ही पहले दिन से सियासी गर्मी की आंच गरमाने लगी है। सत्र की शुरुआत महंगाई और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के बहिष्कार से हुई। बुधवार को लोकसभा में वामदलों के नोटिस पर महंगाई पर होने वाली बहस में भी सदन का पारा गरम रहेगा। बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर विपक्षी दलों के स्थगन प्रस्ताव की चर्चाओं के बीच वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने स्वीकार किया कि उम्मीद के मुताबिक परिणाम हासिल नहीं हो सके। उन्होंने जैसी उनकी अब आदत-सी बन गई महंगाई का ठीकरा मांग एवं आपूर्ति में असंतुलन, डालर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट व अन्य अंतर्राष्ट्रीय कारणों को छोड़ दिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि मुद्रास्फीति की दर मार्च 2012 के अन्त तक 6-7 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। प्रणब दा के बयान से विपक्ष भड़क उठा। पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने मुखर्जी के बयान को आंकड़ों का जाल और जनता को दिग्भ्रमित करने वाला बताते हुए चेतावनी दे डाली कि अगर महंगाई का यही हाल रहा तो लोग जल्द हिंसा पर उतर आएंगे। एनडीए ने सदन के पहले दिन ही यह संकेत भी दे दिया कि वह गृहमंत्री पी. चिदम्बरम का बहिष्कार के अपने फैसले पर पूरी तरह अमल करेंगे। हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने गृहमंत्री को बचाने का पूरा प्रयास किया। मनमोहन सिंह ने कहा, जहां तक गृहमंत्री के बहिष्कार की बात है मुझे उम्मीद है कि राजनीतिक दल इस तरह के किसी कदम से बचेंगे, क्योंकि गृहमंत्री के बहिष्कार की कोई वजह नजर नहीं आती। दूसरी ओर राजग द्वारा चिदम्बरम के बहिष्कार को पूरी तरह से जायज बताते हुए भाजपा ने कहा कि यह विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में प्रधानमंत्री के नाम लिखे वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के नोट के सार्वजनिक होने के मद्देनजर ऐसा किया जाना स्वाभाविक कदम है। भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने संवाददाताओं से कहा कि कांग्रेस पूर्व में जॉर्ज फर्नांडीस के साथ ऐसा कर चुकी है जब निर्दोष जॉर्ज को उन्होंने छह महीने तक बोलने नहीं दिया था। अब यह विदित है कि अगर चिदम्बरम ने पहल की होती तो यह घोटाला रोका जा सकता था। चिदम्बरम को भाजपा 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में उतना ही जिम्मेदार मानती है, जितना ए. राजा को। भाजपा का कहना है कि जब चिदम्बरम वित्तमंत्री थे उस वक्त राजा जो भी कर रहे थे उन सभी के बारे में न सिर्प चिदम्बरम को जानकारी थी बल्कि उन्होंने राजा का समर्थन भी किया। उन्होंने राजा के उठाए कदमों को अपनी सहमति दी। अगर वह चाहते तो उसी वक्त ही इस घोटाले को होने से रोक सकते थे। भाजपा ने अपने आरोपों का आधार वित्त मंत्रालय के इस साल प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे उस नोट को भी बनाया है जो इस साल 25 मार्च को भेजा गया था। इस नोट से साफ हो जाता है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन नीलामी की बजाय `पहले आओ पहले पाओ' की नीति पर बनाने के लिए भी वित्तमंत्री के रूप में चिदम्बरम ने ही अपनी मंजूरी दी थी। यही नहीं, राजा ने बाकायदा चिदम्बरम को इस बारे में पत्र भी लिखा और बैठक भी की थी। ऐसे में चिदम्बरम इस घोटाले के लिए उतने ही जिम्मेदार हैं, जितने कि राजा। दरअसल चिदम्बरम का बहिष्कार करके राजग ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। सरकार और चिदम्बरम के लिए एक एम्बैरिसिंग स्थिति हो गई है। वहीं चिदम्बरम को पसंद न करने वाली टीम अन्ना के लोग, बाबा रामदेव और तमिलनाडु की सीएम जयललिता तक भी एक मैसेज गया है। बहिष्कार का टाइमिंग मानना पड़ेगा कि अच्छा है। जनता पार्टी के अध्यक्ष
डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी की अपील पर यह मामला कोर्ट में है। चिदम्बरम की लोकसभा सीट भी खतरे में है। क्योंकि उनके चुनाव के खिलाफ एक याचिका का फैसला कभी भी आ सकता है। डॉ. स्वामी की डिमांड पर सीबीआई को 2जी से जुड़े कागजात भी देने पड़े हैं। स्वामी दावा कर रहे हैं कि चिदम्बरम को पूरी जानकारी थी और वह इसे दस्तावेजों के साथ साबित भी कर सकते हैं। एनडीए ने सिर्प दबाव ही नहीं बनाया बल्कि एक सियासी मैसेज भी दिया है। बाबा रामदेव और उनके साथ रामलीला मैदान में बैठे लोगों पर पुलिस कार्रवाई के पीछे गृहमंत्री के आदेश माने जा रहे थे। रामदेव समर्थकों की तरह टीम अन्ना के भी काफी लोग मानते हैं कि अन्ना और साथियों की गिरफ्तारी और उसके बाद मामले को उलझाने में गृहमंत्री और मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल का मेन रोल था। उधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता तो अपने ही राज्य में चिदम्बरम को एक आंख नहीं भातीं। यह भी गौरतलब है कि गत रविवार को जयललिता की पहल पर अन्नाद्रमुक के थंबुदुरई रामलीला मैदान में लाल कृष्ण आडवाणी की रैली में आए थे। इसके एक दिन बाद चिदम्बरम के बहिष्कार का फैसला हो गया। जयललिता सम्भव है कि भविष्य में एनडीए के साथ जुड़ जाएं। कुल मिलाकर भाजपा को लगता है कि उनकी बहिष्कार की नीति सही दिशा में सही कदम है।
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Wednesday, 23 November 2011

जन चेतना यात्रा का अत्यंत सफल समापन



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23th November 2011
अनिल नरेन्द्र
भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी में मानना पड़ेगा गजब का जज्बा है। इतनी उम्र होने पर भी वह नौजवानों से ज्यादा ऊर्जा रखते हैं। रविवार को आडवाणी ने अपनी 7000 किलोमीटर की 22 राज्यों और पांच केंद्र शासित प्रदेशों से होती हुई जन चेतना यात्रा पूरी की। दिल्ली में उनका क्या भव्य स्वागत हुआ। रामलीला मैदान या तो इतना अन्ना के आंदोलन के समय भरा था या फिर जन चेतना यात्रा की समाप्ति पर। हजारों की संख्या में लोग आडवाणी जी का स्वागत करने आए हुए थे। नगर निगम चुनाव से पहले श्री आडवाणी की जन चेतना यात्रा के समापन को राजधानी की भाजपा राजनीति में शक्ति परीक्षण के रूप में भी देखा जा रहा था और इस कार्यक्रम पर सभी की निगाहें लगी हुई थीं क्योंकि यहां का संदेश दूर तक जाना था। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने लगता है कि रविवार के समापन के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इस सफल कार्यक्रम में उनका निजी कद भी बढ़ा है। बहुत कम भावुक होने वाले श्री आडवाणी यह कहने से अपने आपको रोक नहीं सके कि दिल्ली में इतना बड़ा जनसैलाब देखकर मैं अभिभूत हूं और दिल्ली सीमा से रामलीला मैदान तक 30 किलोमीटर के रास्ते में जो अभूतपूर्व स्वागत हुआ है उसे वह जीवनभर याद रखेंगे। आडवाणी जी का यह कहना अपने आप में कई मायनों में और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इस समय पार्टी के शीर्षस्थ नेता हैं और दिल्ली के लिए अनजान नहीं हैं। उनकी स्थिति यहां तक है कि वह भाजपा के प्रदेश ही नहीं, मंडल से लेकर मोर्चों के पदाधिकारियों तक के नाम जानते हैं। किस क्षेत्र में वस्तुस्थिति क्या है उन्हें आज भी पता है। इसलिए अगर वह तैयारियों को सराहते हैं तो वह सही ही है। आडवाणी की इस लम्बी यात्रा ने तमाम देश में भाजपा के कार्यकर्ताओं को जगाने में मदद की है। जिस तरीके से देश के विभिन्न भागों में जनता उमड़ी उससे साफ है कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं ने बहुत मेहनत की है, जो लाखों कार्यकर्ता निराश होकर घर बैठ गए थे वह एक बार फिर सक्रिय हुए और सड़कों पर उतर आए। आडवाणी जी से मैंने राजस्थान के चुरु के सुजानगढ़ रैली के बाद पूछा कि आप इतने क्राउड का क्या आंकलन करते हैं? उन्होंने जवाब दिया कि आज पूरे देश में इस मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के खिलाफ एक भारी रोष है, गुस्सा है और इस गुस्से को वह दर्शान के लिए यहां इकट्ठे हुए हैं। उन्होंने मुझे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश के फोटो दिखाए। इन राज्यों में तो भाजपा की ज्यादा राजनीतिक मौजूदगी नहीं पर यहां की भीड़ देखकर मैं भी हैरान हो गया। जब मैंने उनसे पूछा कि राजनीतिक रूप से इस यात्रा का भाजपा को क्या फायदा होगा तो उनका कहना था कि यह भीड़ जरूरी नहीं हमें सब वोट दें। यह एक माहौल दर्शाता है। बाकी चुनाव में अभी समय है। हम प्रयास करेंगे कि चुनाव तक यह ढांचा बना रहे। इस यात्रा से भाजपा की एनडीए घटक दलों की संख्या बढ़ाने की कोशिश रंग लाती नजर आने लगी है। आडवाणी अपनी यात्रा के लिए एनडीए के दलों को साथ लाने में कुछ हद तक सफल भी रहे। शरद यादव, नीतीश कुमार, बादल परिवार तो यात्रा में साथ था ही रविवार के समापन समारोह में जयललिता ने अपना दूत भेजकर राजनीतिक संकेत दिया। दिल्ली में अपने भाषण में आडवाणी जी ने कहा कि यह यात्रा खत्म हुई है लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग पूरी नहीं हुई है। देश को संतोष मिलने तक यह जंग जारी रहेगी। सुबह जब मैं गाजियाबाद से चला था तो कोहरा था जो मौसम के कारण छट भी गया। लेकिन जो कोहरा आज भारत की राजनीति पर देश की अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार के भ्रष्टाचार के कारण छाया हुआ है, वह मौसम के कारण नहीं मिटेगा, वह जन चेतना और जनमत से ही दूर होगा। भ्रष्टाचार के मामले में घिरी केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए नई रणनीति के तहत उन्होंने भाजपा गठबंधन के सभी सांसदों से कहा कि राजग के सभी सांसद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को यह लिखकर दें कि वह यह घोषणा करते हैं कि भारत के बाहर किसी भी बैंक में उनका कोई अवैध खाता नहीं है न ही कोई अवैध सम्पत्ति ही है। मैं अपील करता हूं कि एक सप्ताह के भीतर इस तरह का पत्र सौंप दिया जाएगा।
रविवार को रामलीला मैदान में लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने भी मजा बांध दिया। अपने भाषण में सुषमा ने कहा कि जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को किसी भी मामले की कोई जानकारी नहीं है तो वह किस मर्ज की दवा हैं? और ऐसे प्रधानमंत्री की रहबरी पर हमें मलाल है। सभी मामलों में प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों पर ठीकरा फोड़कर बरी होना चाहते हैं। घोटाला होने पर वह कहते हैं कि राजा से पूछो और महंगाई के मुद्दे पर शरद पवार से पूछो। जब प्रधानमंत्री को कुछ पता ही नहीं तो वह आखिर किस मर्ज की दवा हैं। सुषमा ने कहा कि मैंने लोकसभा में प्रधानमंत्री से एक शेर के जरिये सवाल किया था कि `तू इधर-उधर की बात न कर, यह बता कि काफिला क्यों लूटा, मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।' इस पर प्रधानमंत्री ने एक गैर-प्रासंगिक शेर के जरिये जवाब दिया। उन्होंने कहा, `लेकिन अपने शेर का ही मैं आज प्रधानमंत्री को यह कहकर जवाब देती हूं कि मैं बताऊं कि काफिला क्यों लुटा, तेरा रहजनों (लुटरों) से वास्ता था और इसी का हमें मलाल है।'
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Friday, 21 October 2011

क्या नरेन्द्र मोदी पार्टी से ऊपर हो चुके हैं?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st October 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ समय से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा के बीच समीकरण ठीक नहीं लग रहा। भाजपा में मोदी को लेकर दोनों रोष और अलगाव की भावना पैदा हो रही है। भाजपा के नेतृत्व का मानना है कि नरेन्द्र मोदी को अब अहंकार हो गया है और वह अपने आपको पार्टी से ऊपर मानने लगे हैं। पार्टी ने मोदी को उनकी हैसियत का अहसास करवाना शुरू कर दिया है। लाल कृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा पर आंखें दिखाने वाले नरेन्द्र मोदी को इस यात्रा में बिल्कुल अनदेखा कर दिया है। वह कहीं भी नजर नहीं आ रहे और अब अखबारों में उनकी सुर्खियां भी कम देखने को मिल रही हैं। आडवाणी जी ने अपनी यात्रा में भाजपा के और तमाम मुख्यमंत्रियों के कामकाज, उपलब्धियों का जिक्र किया है पर उन्होंने अभी तक एक भी बड़ी सभा में नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं लिया। यही आडवाणी पहले नरेन्द्र मोदी को एक आदर्श मुख्यमंत्री पेश करते थकते नहीं थे। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि मोदी का राजनीतिक कद काफी बड़ा हो चुका है। उन्हें यह अहसास कराने की जरूरत है कि पार्टी उनकी वजह से नहीं बल्कि वे पार्टी की वजह से हैं। इसके तहत इस मुद्दे पर अब विचार किया जा रहा है कि अगले साल में शुरू होने वाले उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में विधानसभा चुनावों में मोदी को प्रचार के लिए न बुलाया जाए। पार्टी को लगता है कि अपनी कट्टरवादी हिन्दुत्व की छवि के कारण अगर मोदी प्रचार करते हैं तो तमाम मुसलमान बिखर जाएंगे और भाजपा का मोदी की वजह से विरोध करना शुरू कर देंगे। भाजपा को यह मालूम है कि एक भी मुसलमान वोट उसे मिलने वाला नहीं पर वह यह भी नहीं चाहती कि बिना वजह मुसलमान पार्टी के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लें। पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछड़े व अतिपिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने के लिए नीतीश कुमार की मदद लेना बेहतर विकल्प समझने लगी है। नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं कि श्री आडवाणी ने अपनी जनचेतना यात्रा को बिहार से शुरू किया और इस यात्रा को हरी झंडी नीतीश ने दिखाई। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने मोदी को प्रदेश में न भेजने की चेतावनी दी थी, भाजपा ने इस पर अमल किया और नतीजे सबके सामने हैं। आज नीतीश कुमार एनडीए के सबसे सशक्त उम्मीदवार बनकर उभरे हैं। भाजपा को भी सूट करता है कि वह एनडीए को आगे बढ़ाए और इस रास्ते से वह सत्ता तक पहुंचे। मोदी का कद छोटा करने के लिए भाजाप नेतृत्व और संघ ने मिलकर जानबूझ कर संजय जोशी को जिम्मेदारी सौंपी है। नरेन्द्र मोदी संजय जोशी को बेहद नापसंद करते हैं। उन्हें संगठन मंत्री पद से हटवाने में उनकी बहुत अहम भूमिका रही। वैसे तो लाल कृष्ण आडवाणी भी संजय जोशी को पसंद नहीं करते क्योंकि जिन्ना प्रकरण में संजय जोशी ने ही आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा था। आमतौर पर अध्यक्ष अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को देता है पर आडवाणी ने अपना इस्तीफा संजय जोशी को भेजा था।
श्री नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। वह अपने घर में ही घिरते जा रहे हैं। गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी को फंसाने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ने वाले निलम्बित और फिर गिरफ्तार किए गए आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को सोमवार एक स्थानीय अदालत ने तमाम विरोध के बावजूद जमानत दे दी। अदालत ने उस प्रकरण पर तार्किक संदेह व्यक्त किया जिसके तहत भट्ट को गिरफ्तार किया गया था। रिहा होते ही भट्ट ने मोदी पर हमला बोल दिया। भट्ट ने मोदी को अपराधी बताते हुए कहा कि मेरे लिए मोदी सिर्प एक अपराधी हैं जो मुख्यमंत्री बन गए हैं। मोदी और उनके लोग खुद को बचाने के लिए मेरी हत्या तक करवा सकते हैं। जैसा कि हरेन पांड्या का कराया गया। यह निश्चित है कि कांग्रेस जो संजीव भट्ट को उकसा रही है इनका जमानत पर छूटने और बाहर आने का पूरा-पूरा लाभ उठाएगी। हैरानगी तो इस बात की भी है कि गुजरात के तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने संजीव भट्ट का खुला समर्थन कर दिया है। 30 सितम्बर को भट्ट की गिरफ्तारी के बाद यह पहली बार है जब अधिकारी भट्ट परिवार से मिलने उसके घर गया और संजीव की पत्नी श्वेता भट्ट से मुलाकात की। यह मुलाकात करीब दो घंटे चली। श्वेता ने बताया कि तीनों अधिकारियों ने संजीव के साथ हो रहे घटनाक्रम पर खेद व्यक्त किया और मदद का आश्वासन दिया। आने वाले दिनों में लगता है कि नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं, घटने वाली नहीं।
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Tuesday, 18 October 2011

आडवाणी की जनचेतना यात्रा को लग रहे हैं झटके


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th October 2011
अनिल नरेन्द्र
जनचेतना यात्रा पर निकले श्री लाल कृष्ण आडवाणी जब यात्रा पर निकले थे तो उन्हें यह अनुमान नहीं था कि यात्रा के आरम्भिक दौर में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। कभी रथ में तकनीकी खराबी आ गई तो कभी पुल से गुजरने में उसे दिक्कत आ गई पर जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती गई नई-नई मुसीबतें आती गईं। पहले मध्य प्रदेश के सतना में यात्रा की अच्छी कवरेज के लिए पत्रकारों को लिफाफे में पैसे देने की घटना का पर्दाफाश हुआ और अब जमीन घोटाले में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की गिरफ्तारी से जनचेतना यात्रा को झटका लगा है। चूंकि आडवाणी जी ने अपनी जनचेतना यात्रा का मकसद भ्रष्टाचार को बनाया है, लिहाजा इन हालात में पार्टी की किरकिरी स्वाभाविक है। भ्रष्टाचार पर सख्त रुख अपनाने का संकेत देने के लिए पार्टी ने सतना से जुड़े मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह पर कड़ी कार्रवाई का मन बना लिया है। स्वयं श्री आडवाणी इस घटना से बहुत सख्त नाराज हैं। असहज आडवाणी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा को इसकी सख्त जांच के आदेश भी दिए हैं। उनके गुस्से का कारण भी है कि मध्य प्रदेश में यात्रा के दौरान भारी जन समर्थन मिलने के बावजूद इस घटना ने सारे उत्साह पर पानी फेर दिया है। आडवाणी जी ने अपनी यात्रा में सबसे ज्यादा समय मध्य प्रदेश को ही दिया है। राज्य ने इसके लिए भारी-भरकम तैयारी भी कर रखी थी। लेकिन शुरुआत में ही इस एक घटना ने सारा मजा किरकिरा कर दिया है। यात्रा की कवरेज के लिए पैसा बांटने के आरोपों में कठघरे में खड़े प्रदेश सरकार के मंत्री नागेन्द्र सिंह व सांसद गणेश सिंह ने हालांकि इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है, लेकिन अपनी सभाओं में लोगों को रिश्वत देने या लेने से परहेज करने का संकल्प दिला रहे आडवाणी को यह घटना बेहद नागवार गुजरी।
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की गिरफ्तारी ऐसे समय हुई जब आडवाणी अपनी जनचेतना यात्रा पर निकले हुए थे। येदियुरप्पा भाजपा के पहले पूर्व मुख्यमंत्री हैं जिन्हें न्यायायिक हिरासत में भेजा गया है। कर्नाटक में लोकायुक्त अदालत ने येदियुरप्पा को ऐसे मौके पर जेल भेजा है जब आडवाणी भ्रष्टाचार, काला धन, सुशासन और स्वच्छ राजनीति को लेकर अपनी यात्रा पर निकले हुए हैं। उनका रथ 30 अक्तूबर को बेंगलुरु पहुंचेगा। ऐसे में अब श्री आडवाणी समेत भाजपा नेताओं को येदियुरप्पा मामले पर उठने वाले तीखे सवालों से जूझना पड़ेगा। भाजपा अब तक 2जी, राष्ट्रमंडल खेल, कैश फॉर वोट जैसे उदाहरण देकर कांग्रेस समेत यूपीए सरकार पर तीखे हमले करती रही है। अब येदियुरप्पा के जेल जाने से कांग्रेस को हमला करने का एक मौका मिल गया है। कांग्रेस को लम्बे समय से भ्रष्टाचार के मसले पर रक्षात्मक रही को यह मौका काफी मुफीद लगा है। पार्टी ने हमला बोलने में देरी नहीं की। पार्टी प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी का कहना था कि ये उदाहरण भाजपा की कथनी और करनी में अन्तर बताते हैं। उनके सहयोगी मनीष तिवारी ने कहा कि ज्यादा उचित यह होता कि आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा पहले कर्नाटक, उत्तराखंड और पंजाब में निकाली जाती जहां भाजपा के मंत्री और पदाधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। भाजपा में आडवाणी की इस यात्रा को लेकर पहले से उत्साह नहीं था, इस घटनाक्रम के बाद पार्टी को जवाब देना मुश्किल हो रहा है, मनीष तिवारी ने कहा कि नेताओं को यह भी आशंका है कि येदियुरप्पा की गिरफ्तारी के बाद कर्नाटक में पार्टी व सरकार का संकट बढ़ सकता है। राज्य की राजनीति में येदियुरप्पा के धुर विरोधी माने जाने वाले अनन्त कुमार जनचेतना यात्रा के प्रमुख कर्ताधर्ता हैं। ऐसा न हो कि जब तक आडवाणी जी का रथ कर्नाटक में प्रवेश करे दक्षिण भारत की एकमात्र भाजपा सरकार की स्थिति डांवाडोल हो रही हो।

Tuesday, 11 October 2011

रथ यात्री लाल कृष्ण आडवाणी की जन चेतना यात्रा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11th October 2011
अनिल नरेन्द्र
वरिष्ठ भाजपा नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी जन चेतना यात्रा 11 अक्तूबर से शुरू हो रही है। यह लम्बी यात्रा 38 दिनों में 23 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों से होकर गुजरेगी। छह चरणों में पूरी होने वाली इस यात्रा के बीच में दीपावली के कारण तीन दिनों का विश्राम है। इस दौरान देश के दूरदस्थ इलाकों तक पहुंचने के लिए आडवाणी जी बीच-बीच में हवाई मार्ग का सहारा लेंगे। वह अपनी इस यात्रा में 4600 किलोमीटर का सफर तय करेंगे। उनके लिए हर बार की तरह एक बस को रथ के रूप में तैयार किया जा रहा है, जिसमें एक लिफ्ट भी होगी जिससे वह बस के ऊपर पहुंचकर नुक्कड़ सभाओं को संबोधित करेंगे। वह हर रोज तीन-चार बड़ी सभाओं को संबोधित करेंगे। सवेरे 10 बजे से लेकर रात 10 बजे तक उनकी यात्रा चलेगी, जिसमें वह अपने गंतव्य स्थान तक पहुंचने के लिए छह-सात घंटे रोजाना सफर करेंगे। रविवार को आडवाणी जी ने अपने निवास पृथ्वीराज रोड पर एक विदाई कार्यक्रम का आयोजन किया था। इसमें जन चेतना यात्रा का थीम सांग `बस अब और नहीं' रिलीज किया गया था। भाजपा को उम्मीद है कि विशेष रूप से बनाया गया यह गाना पूरे देश में लोकप्रिय होगा खासकर युवा वर्ग में। इस मौके पर श्री आडवाणी ने कहा कि हम भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे, हम अत्याधिक निर्धनता नहीं सहेंगे जो देश में आजादी के 64 साल के बाद भी व्याप्त है और हम काले धन के मुद्दे पर कोताही को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि अपनी यात्रा के माध्यम से वे देश को जगाने की कोशिश करेंगे और यह बताएंगे कि दुनिया में पहले नम्बर का देश बनने के लिए भारत के पास प्रचुर संसाधन और क्षमताएं हैं। पूर्व उपप्रधानमंत्री की रथ यात्रा के काले धन का मुद्दा उठाने के लिए बॉलीवुड गायक राजा हसन ने साढ़े चार मिनट का गीत गाकर सुनाया। इसे फिल्मकार मणिशंकर ने निर्देशित किया है। इस गीत के शुरुआत और अन्त में आडवाणी जी को काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कुछ पंक्ति कहते सुना जा सकेगा।
श्री आडवाणी की जन चेतना रथ यात्रा पर कुछ विवाद होना स्वाभाविक ही था। भाजपा का एक वर्ग जो इस यात्रा से खुश नहीं है, का कहना था कि इस बार रथ यात्रा न तो सोमनाथ जाएगी और न ही अयोध्या। आडवाणी का रथ इस बार अजमेर शरीफ भी जाएगा और अमृतसर भी। गोधरा कांड के बाद नरेन्द्र मोदी के मुख्य मंत्रित्वकाल में कट्टर हिन्दूवाद को प्रयोगशाला के रूप में उभरे गुजरात में भी आडवाणी जी का रथ कम घूमेगा। मोदी के गुजरात के बजाय शिवराज चौहान के मध्य प्रदेश में ज्यादा घूमेगा। मध्य प्रदेश में आडवाणी इसलिए भी अधिक समय देंगे, क्योंकि शिवराज सिंह चौहान ने भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसे कानूनी प्रावधान किए हैं जो दूसरे राज्यों के लिए मिसाल बन रहे हैं। इस बार की यात्रा में किसी प्रकार का कोई सांप्रदायिक एजेंडा नहीं है। शायद श्री आडवाणी उम्मीद रखते हैं कि भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दों से सभी प्रभावित हैं चाहे वह किसी धर्म के हो, समुदाय के हों या किसी जाति के। इसलिए उन्होंने अपनी इस यात्रा को सैक्यूलर रूप देने का प्रयास किया है। आडवाणी जी की जन चेतना यात्रा का एक मकसद आगामी पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों में और 2014 को होने वाले लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस विरोधी लहर को बरकरार रखने का है और भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दों को जीवित रखना है। इसमें शक नहीं कि हजारों किलोमीटर की यात्रा से आडवाणी के पक्ष में एक माहौल बनेगा और उन्हें उम्मीद है कि वह भाजपा के सबसे कद्दावर नेता बनकर उभरेंगे। बाकी तो यात्रा के बाद ही पता चलेगा। जहां तक जनता के रिस्पांस का प्रश्न है जिस तरह इस समय भ्रष्टाचार और काले धन में देश में माहौल अन्ना हजारे ने बनाया है उससे कहा जा सकता है कि रिस्पांस अच्छा ही होगा। इस बात की तारीफ भी करनी होगी कि इतनी उम्र होने के बावजूद आडवाणी जी में आज भी युवाओं जैसा जोश भरा पड़ा है। बेस्ट ऑफ लक आडवाणी जी।

Sunday, 9 October 2011

गुजरात के आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट हीरो या विलेन?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th October 2011
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के आईपीएस अफसर संजीव भट्ट पिछले कुछ दिनों से चर्चा का विषय बने हुए हैं। गुजरात के यह विवादास्पद पुलिस अधिकारी जो आजकल सस्पैंड हैं। दरअसल एक हीरो हैं या एक विलेन। कांग्रेस की नजरों में वह हीरो हैं। संजीव भट्ट कांग्रेस के उम्मीदवार बनते जा रहे हैं और कांग्रेस का एक वर्ग यहां तक कहने लगा है कि संजीव भट्ट की गिरफ्तारी मोदी सरकार के अन्त की शुरुआत हो सकती है। इस वर्ग का कहना है कि बदले की भावना से भट्ट के खिलाफ की जा रही बदले की कार्रवाई मोदी सरकार को भारी पड़ेगी। दरअसल नरेन्द्र मोदी कांग्रेस की आंख की किरकिरी बने हुए हैं और कांग्रेस को हमेशा कोई ऐसा मुद्दा जरूर चाहिए होता है जिससे वह मोदी पर हमला कर सके। कभी मोदी के उपवास में आडवाणी सहित दूसरे बड़े भाजपा नेताओं की अनुपस्थिति को हवा दी जाती है तो कभी आडवाणी की गुजरात से अपनी यात्रा शुरू न करने को मुद्दा बनाया जाता है। पीएम पद की दावेदारी को लेकर भाजपा में चल रहे घमासान को उछाला जाता है। अब संजीव भट्ट मामले को तूल दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार बदले की भावना से काम कर रही है और संजीव भट्ट को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह मोदी के खिलाफ खुले आरोप लगा रहे हैं। भट्ट की पत्नी ने केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को एक पत्र लिखकर कहा है कि गुजरात पुलिस उनके पति के साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार कर रही है। अपने पत्र में उन्होंने राज्य सरकार पर यह भी आरोप लगाया है कि वह भट्ट को जमानत न मिल पाने से बचाने के लिए हर हथकंडा अपना रही है। कुछ दिन पहले भट्ट की पत्नी श्वेता ने चिदम्बरम को एक और पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने अपने पति की जान को खतरा बताया था।
सवाल यह है कि संजीव भट्ट क्या एक निष्ठावान, ईमानदार, साफ छवि के पुलिस अधिकारी हैं जिन्हें मोदी सरकार जानबूझ कर निशाना बना रही है, बदला ले रही है क्योंकि उन्होंने मोदी के खिलाफ अभियान चला रखा है या फिर वह एक दागदार अफसर हैं जो अपनी गतिविधियों के पर्दाफाश होने से इसलिए हमला कर रहे हैं ताकि उनके खिलाफ लगे आरोपों से बचा जा सके? संजीव भट्ट के पुलिस रिकार्ड पर अगर हम नजर डालें तो पाएंगे कि उन पर समय-समय पर गम्भीर आरोप लगते रहे हैं। 30 अक्तूबर 1990 को जामनगर जिले के जमोधपुर तालुक में एक सांप्रदायिक दंगा हुआ। इसमें 133 लोगों को गिरफ्तार किया गया। विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यकर्ता प्रभुदास वेशनानी छूटने के 11 दिन बाद पुलिस हिरासत में मर गए। क्योंकि पुलिस ने उनकी जरूरत से कहीं ज्यादा पिटाई कर दी थी। उनके बड़े भाई अमृत लाल वेशनानी ने हिरासत में मौत संबंधी जो मुकदमा किया उसमें प्रमुख आरोपी तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक संजीव भट्ट को बनाया। जामनगर के तत्कालीन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एनटी सोलंकी ने भट्ट के खिलाफ एक गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया था। भट्ट के खिलाफ गुजरात सीआईडी ने सीआरपीसी की धारा 197 के तहत अभियोग चलाने के लिए बाकायदा राज्य सरकार से अनुमति भी मांगी थी। लेकिन 1995 में मोदी सरकार ने अदालत में भट्ट का बचाव किया, अदालत ने यह केस बन्द करने की सरकार की याचिका को ठुकराते हुए कहा कि मामला चलाने योग्य है इसलिए इसे बन्द नहीं किया जा सकता। लेकिन मोदी सरकार ने 1996 की उस याचिका को वापस ले लिया। अब भी अदालती कार्रवाई भट्ट के खिलाफ जारी है। संजीव भट्ट का एक और कुत्सित चेहरा है। 1995 में वे अहमदाबाद जिला पुलिस अधीक्षक थे। वहीं एक सत्र न्यायाधीश आरके जैन थे। उनकी बहन के एक किरायेदार थे जिनके खिलाफ मुकदमा चल रहा था। किन्तु किरायेदार मुकदमा जीत गए और घर खाली कराने के सभी कानूनी रास्ते बन्द हो गए। न्यायाधीश जैन ने संजीव भट्ट से घर किसी भी तरीके से खाली करवाने की अपील की। भट्ट ने किरायेदार को बुलाया और घर खाली करने को कहा और उसे कहा कि यदि उसने घर खाली नहीं किया तो उसे परिणाम भुगतने होंगे। फिर वही हुआ जिसका डर था। संजीव भट्ट ने किरायेदार के घर पर नॉरकोटिक्स रखवाकर उसे गिरफ्तार करवा दिया और गिरफ्तार होते ही जबरन घर खाली करा दिया। बाद में जिला जज की अदालत में किरायेदार ने वाद पेश किया तो उसमें संजीव भट्ट को भी वादी बनाया। संजीव भट्ट के खिलाफ एक लाख 50 हजार का अर्थदण्ड लगा जिसका भुगतान, आपको सुनकर आश्चर्य होगा, राज्य सरकार ने किया और वह पैसा भट्ट के वेतन से किश्तों में कटता रहा। इस निलंबित आईपीएस अधिकारी की मोदी सरकार से खुंदक और उसके विरोधियों से साठगांठ पुरानी है। ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे साबित होता है कि कांग्रेस संजीव भट्ट को मोदी सरकार और खुद मुख्यमंत्री के खिलाफ उकसाती रही है और उकसा रही है। संजीव भट्ट का रिकार्ड अदालतों के सामने है। हो सकता है कि अगले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के एक उम्मीदवार भी बनें। अब आप खुद फैसला कर लें कि क्या संजीव भट्ट एक ईमानदार, साफ छवि के व्यक्ति हैं जिसे मोदी सरकार जानबूझ कर टारगेट बना रही है या फिर वह कांग्रेस की शतरंजी चाल में एक मोहरे हैं?
Anil Narendra, Daily Pratap, Gujarat, L K Advani, Narender Modi, P. Chidambaram, Sajeev Bhatt, Vir Arjun

Wednesday, 5 October 2011

सोनिया को अविलम्ब सरकार और पार्टी को सही लाइन पर लाना होगा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th October 2011
अनिल नरेन्द्र
रविवार को हर कांग्रेसी ने राहत की सांस ली होगी जब महात्मा गांधी व शास्त्राr जयंती पर लगभग दो महीने के बाद श्रीमती सोनिया गांधी को देखा। विदेश में सर्जरी कराने के बाद पहली बार किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में सोनिया गांधी ने भाग लिया। विदेश में सर्जरी कराने के बाद सितम्बर माह में सोनिया गांधी भारत लौट आई थीं। लेकिन मीडिया के सामने अभी तक मुखातिब नहीं हुई थीं। उनकी सेहत को लेकर मीडिया में कई तरह की अटकलें लगाई जाती रही हैं। देखने में सोनिया ठीक-ठाक लग रही थीं। थोड़ी कमजोर जरूर लगीं पर कुल मिलाकर पहले की तरह ही आत्मविश्वास से भरी दिखाई दे रही थीं। लाल कृष्ण आडवाणी सहित कई नेताओं ने उनकी कुशल मंगल होने के बारे में पूछा। फिर सोनिया ने संसद के केंद्रीय कक्ष में महात्मा गांधी और दिवंगत प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्राr के चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित करने के कार्यक्रम में भी  भाग लिया। करीब 15 मिनट चले इस कार्यक्रम में कई नेता उनकी कुशलक्षेम पूछने के लिए पहुंचे थे। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने सोनिया से पूछा कि अब आपने पूरी तरह से जिम्मेदारियां निभाना शुरू कर दिया हैं? सोनिया ने हंसते हुए उनका धन्यवाद करते हुए उत्तर दिया `हां'। कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता राशिद अलवी ने कहा कि श्रीमती गांधी पूरी तरह से स्वस्थ हैं और पार्टी का 2014 का अगला लोकसभा चुनाव भी उन्हीं की अगुवाई में लड़ा जाएगा। सोनिया गांधी ने अब पूरी तरह फार्म में आकर पार्टी संबंधी जिम्मेदारियों को सम्भालना शुरू कर दिया है। गुरुवार को पार्टी के दो वरिष्ठ मंत्रियों के बीच विवाद जैसे राष्ट्रीय मसले को सुलझाने के बाद शुक्रवार को वह पूरी तरह प्रादेशिक और क्षेत्रीय मामलों में सक्रिय हो गईं। सोनिया महाराष्ट्र, राजस्थान और तेलंगाना के मसलों पर सरकार और पार्टी के कार्यकर्ताओं से रूबरू हुईं। सबसे पहले उनकी मुलाकात महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और पार्टी के महाराष्ट्र अध्यक्ष माणिक राव गावित से हुई। इसके बाद सोनिया ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात की। भंवरी देवी मामले में और भरतपुर दंगों के बारे में की गई कार्रवाई का मुख्यमंत्री से तफ्सील से ब्यौरा लिया।
सोनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस में चल रही उठापटक और सरकार की गिरती छवि को सम्भालना होगा। केंद्र में सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस और सरकार इन दिनों अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। केंद्र के अलावा उसकी राज्य सरकारें भी गम्भीर संकटों से घिरी हुई हैं और सबसे दुःखद बात यह है कि सोनिया के अलावा शायद ही और कोई इन्हें सही कर सके और पार्टी को पार लगा सके। कांग्रेस के 125 साल के इतिहास में यह पहली बार है कि उसके ज्यादातर बड़े नेता विवादों और भ्रष्टाचार के घेरे में फंसे हैं। केंद्र सरकार की लोकप्रियता अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। राज्यों में भी पार्टी की सेहत संतोषजनक नहीं। कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ आंध्र प्रदेश इन दिनों केंद्र सरकार की तरह सबसे बुरी हालत में है। अलग तेलंगाना के गठन को लेकर उसकी पूर्ण बहुमत वाली किरण रेड्डी सरकार दो फाड़ होने की कगार पर है। राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार भी बुरे दौर में है, स्वयं मुख्यमंत्री गहलोत के तथा उनके संबंधियों पर जमीन आवंटन में भारी धांधली के आरोप लग रहे हैं। राज्य में सांप्रदायिक दंगे हो रहे हैं जिसके चलते नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस की आक्रमण की धार तो पुंद हो ही रही है, साथ ही पार्टी की धर्मनिरपेक्ष छवि भी धूमिल हो रही है। इसके अलावा भंवरी देवी का पता नहीं चल रहा है। सरकार के वरिष्ठ मंत्री महिपाल मदेरणा सीधे कठघरे में है। दिल्ली में शीला दीक्षित सरकार भी केंद्र सरकार की तरह भारी जनाक्रोश झेल रही है। राष्ट्रमंडल खेल घोटालों के अलावा महंगाई की मार ने दिल्ली की कांग्रेस सरकार को जनता का दुश्मन नम्बर वन बना दिया है। हरियाणा सरकार के लिए अरविन्द केजरीवाल सिरदर्द बने हुए हैं। अन्ना हजारे अपना पहला प्रयोग हिसार संसदीय सीट पर होने वाले उपचुनाव से कर रहे हैं। सोनिया गांधी के संसदीय सीट पर भी वह सर्वेक्षण करा रहे हैं। गोवा से भी खनन घोटाले की खबरों ने दिल्ली में बैठे आकाओं का सिरदर्द बढ़ा दिया है। केंद्र का तो बहुत ही बुरा हाल है। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के बाद स्वयं प्रधानमंत्री 2जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच की चपेट में हैं। कुल मिलाकर सरकार और पार्टी के सामने कई चुनौतियां और समस्याएं हैं जिन्हें सोनिया गांधी को सुलझाना होगा। मैडम खुद भी इन हालातों से दुःखी होंगी। भगवान उन्हें अच्छी सेहत बख्शे और वह इन मुंह फाड़ती चुनौतियों का हिम्मत, साहस और संयम से मुकाबला कर सकें।

Sunday, 2 October 2011

आडवाणी और नरेन्द्र मोदी में टकराव बढ़ रहा है



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2nd October 2011
अनिल नरेन्द्र 
मनमोहन सिंह की कैबिनेट में अंतर्विरोध और टकराव का आरोप लगाने वाली भाजपा खुद भी ऐसी ही स्थिति में घिरी हुई है। भारतीय जनता पार्टी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आरम्भ हो गई है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के आग्रह के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कर्नाटक और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और रमेश पोखरियाल निशंक बैठक में शामिल नहीं हुए। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने हालांकि यह कहा था कि पार्टी कोशिश कर रही है कि मोदी बैठक में शामिल हों। कुछ ही लोग शायद इस तर्प को मानेंगे कि मोदी नवरात्र के व्रत रख रहे हैं इसलिए बैठक में नहीं आए। असल कारण कुछ और ही है। 8 सितम्बर को पार्टी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने अचानक देशव्यापी रथ यात्रा निकालने का ऐलान कर दिया था। इससे भाजपा नेतृत्व भी हतप्रभ रह गया था। इस ऐलान के साथ ही ये कयास लगने लगे कि आडवाणी की इस रथ यात्रा का उद्देश्य एक बार फिर पीएम इन वेटिंग का संदेश देना है। संघ ने 2009 के चुनाव में हार के बाद श्री आडवाणी को पीछे करके नम्बर दो के नेताओं को आगे करने की योजना बनाई। इसमें नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और खुद नितिन गडकरी शामिल थे पर आडवाणी की अचानक रथ यात्रा की घोषणा ने यह समीकरण बिगाड़ दिए। आडवाणी की यात्रा का सबसे ज्यादा झटका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगा। लम्बे समय तक उनकी पहचान आडवाणी के खास सिपहसालार के रूप में रही है। लेकिन अब मोदी बड़े उस्ताद बन गए हैं। कुछ मायनों में वह अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। भाजपा सूत्रों के अनुसार भाजपा में प्रधानमंत्री पद के इन दो भावी दावेदारों मोदी और आडवाणी के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा मोदी को रास नहीं आ रही है। इसी के चलते उन्होंने भी आडवाणी की तर्ज पर पिछले दिनों अहमदाबाद में एक बड़ा राजनीतिक शो कर डाला था। राज्यपाल के खिलाफ हाल ही में गुजरात में आयोजित मोदी की रैली में आडवाणी समेत किसी भी बड़े नेता ने हिस्सा नहीं लिया था। अहमदाबाद में मोदी उपवास का जिस तरह प्रचार किया गया उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खुश नहीं है। उनका मानना है कि मोदी खुद को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश कर रहे हैं। उधर संघ ने आडवाणी पर दबाव डाला कि वह यह स्पष्ट कर दें कि उनकी यात्रा से उनकी प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी से कुछ लेना-देना नहीं है। संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में नेतृत्व से मुलाकात के बाद श्री आडवाणी ने घोषणा की कि वह प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर यह रथ यात्रा नहीं कर रहे। सबसे पहले नरेन्द्र मोदी ने ही उनकी यात्रा का विरोध किया था। सूत्रों के मुताबिक जब आडवाणी ने उनसे इस यात्रा के बारे में बात की तो मोदी ने अपनी आदत के मुताबिक उनसे दो टूक पूछ लिया कि इससे क्या फायदा? आप हासिल क्या करना चाहते हैं? इतना ही नहीं, मोदी ने गुजरात से यात्रा शुरू करने में मदद करने में अपनी असमर्थता तक जता दी। आखिरकार श्री आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा बिहार से शुरू करने का फैसला किया। इसके पीछे एक और उद्देश्य भी नजर आता है। शायद आडवाणी जी एनडीए की तर्ज की राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं। पहले भी उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करके उसी लाइन पर चलने का प्रयास किया था जिस पर अटल जी चलते थे। आडवाणी की कोशिश है कि वह एनडीए की तर्ज पर फिर केंद्र में सरकार बनाएं और उसका नेतृत्व करें। इस उद्देश्य का न तो संघ समर्थन करेगा और न ही मोदी सरीखे नेता जिनकी पहचान हिन्दुत्व नेता की है। श्री आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा को लेकर जो विवाद आरम्भ हुआ है, यह थमने वाला नहीं। भाजपा नेतृत्व में इस समय जबरदस्त महत्वाकांक्षाओं का टकराव है और इसे इस रथ यात्रा ने फोकस में लाकर खड़ा कर दिया है। उधर कांग्रेस नेतृत्व में घमासान हो रहा है, रही-सही कसर भाजपा की अंतर्पलह ने पूरी कर दी है।
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Wednesday, 21 September 2011

मोदी के सद्भावना मिशन पर `टोपी' पहनाने का प्रयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21th September 2011
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का तीन दिवसीय अनशन सोमवार को खत्म हो गया। गुजरात विश्वविद्यालय के कन्वेंशन हॉल में तीन दिनों से अनशन पर बैठे मोदी ने सोमवार शाम 6ः15 बजे धर्मगुरुओं के हाथों से नींबू पानी पीकर अनशन समाप्त कर दिया। नरेन्द्र मोदी के उपवास को जिस तरह से पार्टी के भीतर से लेकर पूरे देश में समर्थन मिला है, उससे साफ हो गया है कि लाल कृष्ण आडवाणी के बाद वह भाजपा के सबसे कद्दावर नेता बनकर उभरे हैं। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि मोदी अब भाजपा की ओर से अगले प्रधानमंत्री बनने के सबसे कद्दावर नेता बन गए हैं और श्री मोदी ने अपनी इच्छा भी नहीं छिपाई। प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा खुलकर जाहिर किए बगैर मोदी ने शनिवार को भारतीय जनता पार्टी को एक नया नारा दिया, `सबका साथ, सबका विकास' जो अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रचार का आधार बन सकता है। अपना उपवास तोड़ने के साथ ही नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में चुनाव से एक साल पहले ही अपने अभियान का रथ हांक दिया है। तीन दिन के उपवास के बाद गुजरात के सभी 26 जिलों में बारी-बारी से सारा दिन उपवास पर बैठने के ऐलान के साथ नरेन्द्र मोदी ने अब बड़े मिशन का भी श्रीगणेश कर दिया। नकारात्मक राजनीति के मुकाबले विकास के मोर्चे पर समृद्ध रिपोर्ट कार्ड की बदौलत आगे बढ़ने के एजेंडे को भी मोदी ने देश के सामने रख दिया। इतना ही नहीं, उपवास के  तीन दिनों में प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी की हवा बनाकर गुजरातियों के गौरव के रूप में भी खुद को उभारा। साथ ही सद्भावना मिशन के सहारे एक पांव मुस्लिमों की तरफ तो बढ़ाया, लेकिन कहीं भी अपनी मूल ताकत हिन्दुत्व की जमीन नहीं छूटने दी। अहमदाबाद शहर के पास स्थित पिराना गांव में एक छोटी-सी दरगाह के मौलाना सैयद इमाम शाही सैयद ने रविवार को मोदी के उपवास स्थल पर मंच पर जाकर उनसे मुलाकात की थी। मौलाना ने मोदी को एक टोपी पहनने की पेशकश की, लेकिन मुख्यमंत्री ने विनम्रता से उसे पहनने से मना कर दिया और उसके बजाय शॉल ओढ़ाने को कहा। इमाम ने मोदी को शॉल ओढ़ाया जिसे उन्होंने मंजूर कर लिया। नरेन्द्र मोदी ने बिना किसी पर आरोप लगाए और प्रहार किए खुद पर लगने वाले सांप्रदायिकता के आरोपों का जवाब गुजरात में विकास और शांति के रिकार्ड के साथ दिया। मोदी ने स्पष्ट कहा कि लीडरशिप की कसौटी एक्शन पर निर्भर करती है। आज हमने दुनिया को दिखाया कि यह रास्ता है सबको जोड़कर सबको साथ लेकर चलने का। जब तक वोट बैंक की राजनीति से उठकर विकास की राजनीति नहीं अपनाते तब तक भारत ऊपर नहीं उठ पाएगा। इस कड़ी में गुजरात के मुख्यमंत्री ने ही सच्चर कमेटी के साथ कुछ साल पहले हुए संवाद का जिक्र करते हुए कहा कि मेरी सरकार अल्पसख्यकों या बहुसंख्यकों के लिए भी कुछ नहीं करती है। मेरी सरकार छह करोड़ गुजरातियों के लिए काम करती है। मैं हर चीज को माइनारिटी और मेजोरिटी में नहीं तोलता। मेरे राज्य के नागरिक सभी एक हैं।
मोदी के उपवास खत्म होने के दिन सोमवार को भाजपा ने जबरदस्त शक्ति प्रदर्शन किया अब कांग्रेस की बारी है। मोदी के उपवास के खिलाफ गांधी आश्रम के सामने जवाबी अनशन पर बैठे कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला मंगलवार सुबह अपनी भूख हड़ताल समाप्त करेंगे। कांग्रेस के केंद्रीय पदाधिकारी के रूप में गुजरात कांग्रेस के प्रभारी मोहन प्रकाश ने मोदी सरकार पर जमकर हल्ला बोला। गुजरात सरकार पर बरसते हुए मोहन प्रकाश ने कहा कि सौ करोड़ रुपये खर्च कर नरेन्द्र मोदी कौन-सी सद्भावना दिखाना चाहते हैं। मोहन प्रकाश ने कहा कि मोदी सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है। कैग की रिपोर्ट में गुजरात सरकार का भ्रष्टाचार पूरी तरह उजागर हुआ है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मोदी सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए जनता की अदालत में जाएगी। वाघेला ने कहा कि अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर उपवास नहीं किया जाता। मोदी का उपवास महज एक दिखावा है और एक सियासी तिकड़म है। वाघेला ने आरोप लगाया कि मोदी ने पहले 72 घंटे के उपवास की घोषणा की थी लेकिन 55 घंटों में ही अनशन तोड़ दिया। कुल मिलाकर देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी का यह सियासी अनशन वैसे तो सफल रहा। जहां तक इसके भारतीय राजनीति में प्रभाव का सवाल है वह तो आने वाला वक्त ही देगा।
Anil Narendra, BJP, CAG, Congress, Corruption, Daily Pratap, Gujarat, L K Advani, Narender Modi, Vir Arjun

Sunday, 18 September 2011

Will Advani’s yatra prove to be a master stroke?

- Anil Narendra
Senior BJP leader, LK Advani will set on another Rath Yatra. Claiming UPA government loosing its legitimacy and its mandate, Mr Advani has announced that he will be undertaking this Rath Yatra before November in protest against this corrupt government. He says that he will expose the way, the cash for vote issue has been treated by the government before the masses through his yatra. The proposed yatra was discussed by the BJP Core Group. The yatra is likely to cover a distance of about 6,000 kms. Mr Advani wants to highlight clean politics and good governance, whereas some of the BJP leaders think that the thrust of this yatra should be on anti-corruption, as the corruption is the main issue in the country currently. Leaders of states like Punjab, Uttarakhand, Goa and UP want this yatra to pass through their states, as these states would be going for Assembly elections very soon, But other leaders do not agree with this line of thinking.
This yatra of Mr Advani is being both supported as well as criticized. Let us take criticism first. Anna Hazare and his team think that this yatra is being undertaken to undermine the importance of their movement. Calling this yatra as an effort to show off, Anna himself has said that he would not support BJP, till it does not support Jan Lokpal Bill in the Parliament and its State governments do not enact laws for appointment of Lokayuktas. Anna told TV Channels, if Mr Advani is serious on the issue of corruption, then instead of undertaking the rath yatra, he must persuade BJP-led States to enact laws for appointment of Lokayuktas. Recently, the Anna team held an important meeting at Ralegan. Social Activiist, Medha Patkar had expressed her serious reservations over the proposed rath yatra at the meeting. She clearly stated that the rath yatra of Advaniji must not get Anna Hazare's support at any cost. Medha Patkar warned that this was a political march that has nothing to do with the issue of corruption. As far as the Congress reaction is concerned, it is not happy with this rath yatra. One of the leaders went to the extent of calling it a master stroke of Advaniji. The proposed rath yatra of top BJP leader, known as the Iron Man of the Party, immediately after Anna's movement, relief to Narendra Modi by Supreme Court and rumours of mid-term elections have added to the concerns of the Party. The Party is already under pressure on corruption issue. First, it was Anna Hazare and now BJP leader LK Advani's announcement of undertaking rath yatra on the issue of corruption that have created more problems for the government and the party. The Congress is really worried over the ensuing Assembly elections in five States in coming months. The most important of these is UP election. The Party is also hoping to form government in Punjab and Uttarkhand this time. The problem is that the Anna movement has sent a message to the masses that the government and the Party are not serious over the issue of corruption and this has proved a great irritant to the Party. The Party is also apprehensive of Advani's master stroke, which he has played to grab benefit of the atmosphere created by Anna's movement. The problem for the government and the party is not Advani alone. Anna, too is mulling the idea of touring villages. Yog Guru Baba Ramdev has also been keeping bitterness towards the government and he is also planning yatras afresh. All these three yatras coincide on the issue of corruption. Under these circumstances, the corruption issue will not only continue to dominate, but in case the Congress is defeated in these Assembly elections, even then the issue may impact the outcome of the 2014 General Elections. Advaniji also wants that the government as well as the party, remain under pressure.
Some BJP leaders of second line are also not happy over this rath yatra in the heart of their heart. They fear that even if NDA under the leadership of BJP is able to come to power in 2014 general elections, their dream of becoming Prime Minister will not be fulfilled as Mr Advani will be left as number one leader of the BJP. On the other hand, BJP workers are happy with this yatra and they would welcome this move whole-heartedly. The party workers will be active during this yatra and in fact this is one of the objectives of Mr Advani, but there are leaders like Ram Jethmalani in the Party, who are bent upon puncturing his rath, before it embarks on its journey. Putting up arguments on behalf of jailed leader Amar Singh, Ram Jethmalani said in the Tees Hazari Court on Monday that since this sting operation was carried out at the instance of the BJP, the arrangement to disburse money to MPs must have been done by them. Earlier also, Jethmalani has been creating such difficult situations for BJP.  While the BJP had opened a front against UPA government in 2-G Spectrum scam, Jethmalani has appeared as a defence lawyer for Kanimojhi, a Rajya Sabha MP, who is in Tihar Jail these days over the 2-G scam. It is interesting to note that on one hand, Advani announces to come to streets on this matter, and on the other, a member of his party alleges that money in the cash for vote incident, the cash must have come from the BJP coffers. These allegations of Ram Jethmalani could belittle the impact of proposed rath yatra of Shri Advani, as from the very beginning the BJP has been putting UPA government to the dock in the cash for vote matter. It has been calling two of its members, who are behind bars in Tihar Jail as the whistle blowers and it has been in this reference that Shri Advani has also stated about his willingness to go to jail.
It may, however, be noted that neither Ram Mandir nor the Hindutva is at the centre of this proposed rath yatra, but it is about the two issues namely good governance and clean politics and it appeals to all religious communities. But, why, in the first place, the need for such a rath yatra was felt? There are two reasons for this. Scams after scam have put the UPA government on the offensive. Then, it was the Anna movement which made this a household issue. Being the largest opposition party, BJP feels that it is likely to be benefited the most out of the present atmosphere. Secondly, the Delhi Police has added to its uneasiness. Two of its former MPs have been sent to Tihar by the Court. Then, the Court has also issued notice to the one-time close associate of Shri Advani, Sudheendra Kulkarni and the Delhi Police has sought permission from the Lok Sabha Speaker to initiate action against a present BJP MP. The BJP has, however claimed that the persons who have been made accused, are the persons, who were, in fact, trying to expose the Congress conspiracy to secure majority through the trading of MPs. The BJP leadership might have felt that it would have to bear a huge loss, if the Party kept quite over the issue. It cannot be denied that in the twilight of his political career, Shri Advani is looking at it as an only opportunity to reach to the highest post in the country. But to achieve this objective, he will have to try to re-clean and re-organize his party. Perhaps, the biggest challenge for Advaniji would be to rekindle faith among the masses that he is really against the corruption and he is honestly in favour of elimination of corruption. No doubt, some tainted leaders have been removed from the Party, but still there are a number of leaders who would not hesitate in accepting money, if offered. It is a sad commentary on BJP that it has leaders in its fold with clean image like Advaniji along with tainted ones. Threat to Advaniji is not from without, but from within.
Amar Singh, Anil Narendra, Cash for Vote Scam, Corruption, Daily Pratap, L K Advani, Rath Yatra, Vir Arjun

Thursday, 15 September 2011

क्या आडवाणी की पस्तावित यात्रा एक मास्टर स्ट्रोक होगी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th September 2011
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता 83 वर्षीय श्री लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर रथ यात्रा पर निकलेंगे। श्री आडवाणी ने संपग सरकार के वैधता खो देने और उसका जनादेश समाप्त हो जाने का दावा करते हुए ऐलान किया कि वह इस भ्रष्ट सरकार के खिलाफ नवम्बर से पहले देश भर में रथ यात्रा करेंगे। वोट के बदले नोट जिस पकार से इस सरकार ने बर्ताव किया है उसका भी जनता में वह इस यात्रा में पर्दाफाश करेंगे। भाजपा की कोर ग्रुप की बैठक में पस्तावित यात्रा पर चर्चा हुई। यात्रा के दौरान करीब 6000 किलोमीटर का सफर तय किया जा सकता है। आडवाणी जी का विचार है कि यात्रा का जोर स्वच्छ राजनीति,बेहतर पशासन पर होना चाहिए, जबकि कुछ भाजपा नेताओं का विचार है कि इसे भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा होना चाहिए क्योंकि पूरे देश में भ्रष्टाचार का मुद्दा केन्द्र में है। पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और उत्तर पदेश जैसे राज्यों के कुछ नेता चाहते हैं कि यात्रा इन राज्यों से होकर गुजरे क्योंकि इन राज्यों में चुनाव होने हैं। वहीं कुछ नेता इस विचार से सहमतनहीं हैं।
आडवाणी जी की इस पस्तावित यात्रा का समर्थन और आलोचना दोनों ही हो रहे हैं। पहले आलोचना की बात करते हैं। अन्ना हजारे और उनकी टीम महसूस करती है कि यह यात्रा उनके आंदोलन का महत्व कम करने के लिए की जा रही है।
अन्ना ने खुद यात्रा को दिखावा करार देते हुए कहा कि वह तब तक भाजपा का समर्थन नहीं करेंगे जब तक कि वह संसद में जन लोकपाल विधेयक का समर्थन नहीं करती और उसको राज्य सरकारें लोक आयुक्त की नियुक्ति का कानून नहीं बनाती। अन्ना ने टीवी चैनलों से कहा कि अगर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आडवाणी गम्भीर हैं तो यात्रा करने की बजाए उन्हें भाजपा शासित सभी राज्यों से लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए कानून बनाने को कहना चाहिए। गत दिनों रालेगण में अन्ना की टीम की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। इस बैठक में मेधा पाटकर ने जमकर आडवाणी यात्रा का विरोध किया था। पाटकर ने साफ कहा कि आडवाणी की यात्रा को किसी भी हालत में अन्ना हजारे का समर्थन नहीं मिलना चाहिए। मेधा पाटकर ने चेताया कि यह एक राजनीतिक यात्रा है जिसका उद्देश्य राजनीतिक है, सामाजिक उत्थान या भ्रष्टाचार दूर करना नहीं है।
जहां तक कांग्रेस पार्टी के रिएक्शन का सवाल है वह इससे नाखुश है। एक नेता ने तो यहां तक कह दिया कि यह आडवाणी का मास्टर स्ट्रोक है। अन्ना हजारे के आंदोलन के ठीक बाद लौह पुरुष कहे जाने वाले भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा, सर्वोच्च अदालत द्वारा नरेन्द्र मोदी को दी गई राहत और मध्यावधि चुनावों की अफवाहों ने कांग्रेस के कान खड़े कर दिए हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार दबाव में है। पहले गांधीवादी
अन्ना हजारे और उसके बाद भाजपा नेता एलके आडवाणी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर रथ यात्रा की बात कहकर सरकार और कांग्रेस संगठन दोनों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कांग्रेस को असली चिंता आने वाले महीनों में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण उत्तर पदेश है।
पंजाब और उत्तराखंड में भी कांग्रेस इस बार सरकार बनाने की उम्मीद पाले हुए है। कांग्रेस को बड़ी परेशानी यह है कि अन्ना के आंदोलन से जनता में यह संदेश गया है कि सरकार और संगठन इसको लेकर गम्भीर नहीं है और यह पार्टी के माथे पर बल डालने के लिए काफी है। पार्टी को यह चिंता भी सता रही है कि कहीं अन्ना की बोई फसल को काटने के लिए आडवाणी ने जो मास्टर स्ट्रोक खेला है वह कामयाब न हो जाए? सरकार के लिए और कांग्रेस पार्टी के लिए परेशानी अकेले आडवाणी ही नहीं हैं। उधर अन्ना भी गांव-गांव घूमने की योजना पर विचार कर रहे हैं। योगगुरू बाबा रामदेव भी सरकार से खार खाए बैठे हैं और नए सिरे से यात्रा करने जा रहे हैं। तीनों ही यात्राएं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार का मुद्दा न केवल विधानसभा चुनावों तक जीवित रहेगा बल्कि अगर इन चुनावों में कांग्रेस हार जाती है तो 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी इसका असर पड़ सकता है।
आडवाणी भी यही चाहते हैं कि सरकार और पार्टी दोनों पर दबाव बना रहे। आडवाणी जी की इस यात्रा से भाजपा के कुछ दूसरी पंक्ति के नेता अंदरखाते खुश नहीं हैं। उन्हें लगता है कि अगर 2014 में भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को सत्ता मिल जाती है तो उनका पधानमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं होगा और आडवाणी भाजपा के नंबर वन व्यक्ति होंगे। जबकि भाजपा कार्यकर्ता इस यात्रा से खुश है और गर्मजोशी से इसका स्वागत करेगा। इस यात्रा के दौरान कार्यकर्ता सकिय हो जाएगा जो आडवाणी का एक उद्देश्य भी है पर पार्टी के अंदर राम जेठमलानी सरीखे के नेता भी मौजूद हैं जो यात्रा शुरू होने से पहले ही उसकी हवा निकालने में तुले हैं। तिहाड़ जेल में बंद अमर सिंह की पैरवी कर रहे राम जेठमलानी ने सोमवार को तीस हजारी अदालत में कहा कि चूंकि यह स्टिंग ऑपरेशन भाजपा ने कराया था, इसलिए सांसदों को दिए पैसे की व्यवस्था भी उसी ने की होगी। जेठमलानी पहले भी भाजपा के लिए इस तरह की विकट परिस्थितियां पैदा करते रहे हैं। टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में एक ओर भाजपा यूपीए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे तो जेठमलानी तिहाड़ में बंद डीएमके की राज्यसभा सांसद कनिमोझी की पैरवी कर रहे थे। एक तरफ तो आडवाणी इस मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतरने का ऐलान करते हैं दूसरी तरफ उन्ही की पार्टी का सदस्य यह आरोप लगाता है कि कैश फॉर वोट मामले में पैसा भाजपा ने ही दिया होगा। जेठमलानी की ये दलीलें आडवाणी की यात्रा की धार को पुंद कर सकती है क्योंकि कैश फॉर वोट मामले में भाजपा शुरू से ही कांग्रेस नीति यूपीए सरकार को कटघरे में खड़ा करती रही है। तिहाड़ जेल में बंद अपने दो पूर्व सांसदों को भाजपा व्हिसल ब्लोअर बताती रही है और आडवाणी इसी पकरण में कह चुके हैं कि वे जेल जाने को तैयार हैं।
अलबत्ता पस्तावित रथ यात्रा का केन्द्र बिंदु न तो राम मंदिर है और न ही हिंदुत्व बल्कि सुशासन और साफ सुथरी राजनीति के मुद्दों को लेकर है और यह मुद्दे सभी वर्गों, धर्मों,समुदायों को अपील करता है। आखिर इस यात्रा की जरूरत महसूस क्यों हुई? इसके दो कारण नजर आते हैं। एक के बाद एक घोटालों ने यूपीए सरकार को बचाव की मुद्रा में ला खड़ा किया है। फिर अन्ना के आंदोलन ने इसे घर-घर का विषय बना दिया है। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के नाते भाजपा को लगता है कि इस माहौल का सबसे ज्यादा लाभ उसी को मिल सकता है। दूसरे नोट के बदले वोट कांड में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई ने भाजपा की बेचैनी बढ़ा दी है। उसके दो पूर्व सांसदों को अदालत ने तिहाड़ भेज दिया है। फिर अदालत ने इस मामले में आडवाणी के निकट सहयोगी रहे सुधीन्द्र कुलकर्णी को नोटिस दिया गया है और दिल्ली पुलिस ने भाजपा के एक मौजूदा सांसद के खिलाफ कार्रवाई के लिए लोकसभा अध्यक्ष से इजाजत मांगी है। जबकि भाजपा का दावा है कि उनके जिन लोगों को आरोपी बनाया गया है वे तो असल में खरीद-फरोख्त के जरिए बहुमत जुटाने के कांग्रेस के षड़यंत्र को बेनकाब करने में जुटे थे। भाजपा नेतृत्व को यह महसूस हुआ होगा कि अगर पार्टी इस मामले में चुप बैठ गई तो उसे काफी नुकमसान उठाना पड़ सकता है।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब अपने राजनीतिक जीवन की सूर्यास्त की बेला पर उन्हें शीर्ष पद पर पहुंचने के लिए एक अवसर दिख रहा है। इसके लिए उन्हें अपनी पार्टी को पुनर्संशोधित और पुनर्सुनियोजित करने का पयास करना होगा। आडवाणी जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती शायद यह रहेगी कि
वह भारत की जनता में यह विश्वास पैदा करें कि वाकई ही भ्रष्टाचार के खिलाफ है और वह पूरी ईमानदारी से भ्रष्टाचार को दूर करने के पक्षधर हैं।
बेशक कुछ दागी नेताओं को हाल में हटाया गया है पर अभी भी `थैली' लेने वाले नेता पार्टी में मौजूद हैं। दुख से कहना पड़ता है कि आडवाणी जैसी स्वच्छ छवि वाले नेता भाजपा में जरूर हैं पर दागी भी मौजूद हैं। आडवाणी जी को सबसे ज्यादा खतरा अंदर से है, बाहर से नहीं।
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Wednesday, 14 September 2011

नरेन्द्र मोदी की अग्निपरीक्षा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th September 2011
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को बहुत उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट सोमवार को मोदी को 2002 के गोधरा कांड के बाद दंगों पर केस में लपेट लेगा और उन्हें कटघरे में खड़ा कर देगा।
मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और 62 अन्य अधिकारियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 2002 में हुए गुलबर्ग सोसाइटी दंगों को रोकने के लिए जानबूझ कर कोई कदम नहीं उठाया और हिंसा को बढ़ावा दिया पर मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे उनके प्रतिद्वंद्वियों को सुप्रीम कोर्ट से निराशा मिली।
शीर्ष अदालत ने उनको दंगा रोकने में उनकी भूमिका में निक्रियता पर कोई फैसला सुनाने से इंकार कर दिया। न्यायमूर्ति डीके जैन की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मोदी और अन्य सरकारी अधिकारियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज करने के लिए कोई भी विशिष्ठ निर्देश देने से इंकार कर दिया।
मोदी और इन सरकारी अधिकारियों को पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी द्वारा की गई शिकायत में पक्ष बनाया गया था। जाफरी की अहमदाबाद दंगों में गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार में जान चली गई थी। न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम और न्यायमूर्ति आफताब आलम की सदस्यता वाली पीठ ने शीर्ष न्यायालय के निर्देश पर विशेष जांच अदालत (एसआईटी) द्वारा की गई जांच की अंतरिम रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के समक्ष दाखिल करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए गठित की गई विशेष जांच समिति यानि एसआईटी को आदेश दिए हैं कि वह अपनी रिपोर्ट गुजरात की निचली अदालत को सौंप दे यानि अब निचली अदालत यह तय करेगी कि गुजरात दंगों में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मामला बनता है या नहीं? फैसले पर अपने-अपने ढंग से प्रतिक्रिया हुई। इस दंगे में मारे गए सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने कोर्ट के इस फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बेहद निराशाजनक है। मेरे पास एक बार फिर इसके खिलाफ अपील करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। 2002 में जो कुछ भी हुआ था, उसके हर पल का सच्चा ब्यौरा मैंने एसआईटी को दिया था। इतने बरसों के बाद एक ही बात को मैं कब तक दोहराऊंगी? जकिया जाफरी का कहना है कि राज्य की अदालत को इस मामले का सौंप दिए जाने का मतलब यह ही है कि नरेन्द्र मोदी के हक में ही फैसला आएगा। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता और नरेन्द्र मोदी की चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी तीस्ता सीतलवाड़ ने कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया और कहा कि इस फैसले को क्लीन चिट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, `यह संघर्ष बहुत लम्बा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का गलत अर्थ निकाला जा रहा है। अब हमारी याचिका, एसआईटी की रिपोर्ट और राजू रामचन्द्रन की रिपोर्ट गुजरात के मजिस्ट्रेट देखेंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी और अन्य लोगों के खिलाफ और केस ही नहीं है। अगर मोदी या किसी और के खिलाफ मामला बन्द होने की बात होती तो जकिया जी और हमारा पक्ष सुना जाएगा। हमें भरोसा है कि गुजरात की अदालत इस मामले में उपयुक्त फैसला सुनाएगी।' सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर नरेन्द्र मोदी ने महज तीन शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया दी। `ईश्वर महान है।' भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि पार्टी को विश्वास था कि मोदी को बदनाम करने की मुहिम ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगी।
पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने मुस्कुराते हुए कहा, `मोदी से नफरत करने वालों और उन्हें गिराने की ताक में रहने वालों की वर्तमान अवस्था को मैं समझ सकता हूं। कानून ने वह रास्ता अपनाया है जो बिल्कुल सही है।
कांग्रेस ने इस मसले पर बहुत ही सोची-समझी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट नहीं दी है।' प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा, `इससे निराशा की कोई बात नहीं है। नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट थोड़े ही मिली है? हमारी कानूनी प्रक्रिया में सुधार लाए जाने की जरूरत है। जकिया जी और उनके परिवार के लिए मैं सहानुभूति जताना चाहूंगा।'
मामला कुछ यूं था। गोधरा कांड के बाद गुजरात में बड़े पैमाने में दंगे भड़के। गुलबर्ग सोसाइटी दंगों में 35 से ज्यादा लोग मारे गए थे और जकिया जाफरी ने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री मोदी और 62 अन्य लोगों ने गुजरात में हुई हिंसा को बढ़ावा दिया। गुजरात में 2002 के दंगों में 1000 से अधिक लोग मारे गए थे। साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों को जिन्दा जलाने के स्वरूप यह प्रतिक्रिया हुई थी। इन दंगों पर एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट पिछले साल आई थी। लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया था। एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी और कहा था कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर एक स्वतंत्र राय लेने के लिए राजू रामचन्द्रन को अदालत की सहायता के लिए नियुक्त किया गया था। रामचन्द्रन को आदेश दिया गया था कि वे एसआईटी रिपोर्ट की निष्पक्ष पड़ताल करें और मामले से जुड़े गवाहों, पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों से मिलें और उसके बाद सुझाव दें कि गुजरात मुख्यमंत्री की भूमिका पर क्या कदम उठाना चाहिए? मीडिया में आई खबरों के मुताबिक राजू रामचन्द्रन ने एसआईटी की रिपोर्ट का खंडन करते हुए कहा था कि गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीके जैन, जस्टिस पी. सदाशिवम और जस्टिस आफताब आलम की बैंच ने इसी रिपोर्ट के आधार पर अपना फैसला सुनाया और एसआईटी को आदेश दिया कि वह अपनी रिपोर्ट अब निचली अदालत के समक्ष रखें।
इस फैसले से जहां भाजपा की बांछें खिल गई हैं वहीं कांग्रेस मोदी को संसद से लेकर सड़क तक घेरती रही को इससे झटका लगा है। यही वजह है कि मोदी को भाजपा के हर कोने से बधाई मिली और उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका भी तलाशनी शुरू हो गई है। इस फैसले के बाद मोदी का राजनीतिक कद बढ़ा है। पार्टी के भीतर से उनके राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में आने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि मोदी पार्टी द्वारा सौंपे जाने वाली किसी भी जिम्मेदारी को निभाने में सक्षम हैं।
राज्यसभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मोदी पहले से ही राष्ट्रीय राजनीति में हैं और हमारे प्रमुख नेताओं में हैं। फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए जेटली ने कहा कि भाजपा शुरू से ही कहती रही है कि मोदी पर लगाए गए आरोप झूठे हैं और उनकी दंगों में कोई भूमिका नहीं थी। इससे साबित हुआ है कि मात्र प्रोपेगंडा व झूठे आरोप कभी भी साक्ष्य नहीं हो सकते। मोदी का नाम एक भी आरोप पत्र में नहीं है और न ही विशेष जांच दल ने उन्हें दोषी पाया है। सुषमा ने कहा कि मोदी ने अग्निपरीक्षा पास कर ली है, `सत्यमेव जयते।'
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Friday, 1 July 2011

भाजपा के विधानसभा उपचुनाव में सफलता के कारण

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1st July 2011
अनिल रेन्द्र
दो राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पाटा ने दोनों सीटों पर सफलता अर्जित की है। मध्य प्रादेश की जबेरा सीट पर भाजपा के दशरथ लोधी ने कांग्रोस की डॉ. तान्या सालोमन को 11,738 वोटों के अन्तर से हराया।
भाजपा ने यह सीट कांग्रोस से छीनी है। उधर बिहार में पूर्णिया सदर सीट पर भाजपा की किरण केसरी ने कांग्रोस के रामचरित्र यादव को 23,665 वोटों से पराजित किया। इस सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार है। इन शानदार सफलताओं से एक बार फिर साबित होता है कि कांग्रोस की छवि और स्थिति कितनी खराब हो गईं है। इसका एक और महत्वपूर्ण कारण है इन राज्यों में सशक्त नेतृत्व। भाजपा शासित राज्यों में अच्छी छवि का सबसे बड़ा कारण है वहां पाटा का नेता। पाटा के नेता की छवि स्वच्छ, ईंमानदार, जनता के प्राति संवेदनशील, नौकरशाह पर वंट्रोल और सही प्राथमिकताओं को रखना अति आवश्यक है। नेता कार्यंकर्ता को अपने पास रखे और सत्ता में उनसे भागीदारी करे। मुझे बीजेपी के कर्मठ और हार्ड कोर कायकर्ता ने एक पते की बात बताईं। उन्होंने कहा कि भाजपा और कांग्रोस में एक बड़ा बुनियादी फर्व क्या है? कांग्रोस जब सत्ता में आती है, तो सत्ता का सुख, लाभ, पुरस्कार अपने कार्यंकर्ताओं से बांटते हैं यानि कार्यंकर्ता को सत्ता का लाभ मिलता है। दूसरी ओर भाजपा नेता चुनाव से पहले तो कार्यंकर्ता को माईं-बाप बना लेते हैं और चुनाव जीतने के बाद जब सत्ता सुख बांटने की बारी आती है तो वह अपने एयरवंडीशन ड्राइंग रूम में बन्द होकर रह जाते हैं, कार्यंकर्ता उनके घर, कार्यांलय में घुस भी नहीं सकता। वह सत्ता सुख, सत्ता के लाभ, प्रासाद खुद ही भोगना चाहते हैं, कार्यंकर्ताओं से बांटने को तैयार नहीं होते। यही वजह है कि अगले चुनाव में वह कार्यंकर्ता घर बैठ जाता है और कहता है कि हमारी बला से यह जीते या हारे, हमें क्या लेना-देना है? दूसरी ओर कांग्रोस का कार्यंकर्ता अगले चुनाव में पूरा दमखम लगा देता है। इसलिए क्योंकि अपने नेता को जिताने में उसका भी स्वार्थ जुड़ा होता है। जब तक भाजपा वेंद्रीय नेतृत्व को यह साधारणसी बात समझ नहीं आती वह शायद ही सत्ता में आ सवें। अगर मध्य प्रादेश, बिहार या गुजरात में भाजपा को इतनी सफलता मिल रही है तो उसका एक बड़ा कारण है वहां पाटा का मुख्यमंत्री। आम कार्यंकर्ता अपने आपको अपने नेता से आइडेंटीफाईं करता है और उसे मालूम है कि उसे कोईं भी समस्या होगी या उसका कोईं काम होगा तो वह अपने नेता पर भरोसा कर सकता है।
कांग्रोस में वुछ नेता चाहे जितनी भी विपरीत हवा हो, चुनाव जीत जाते हैं क्योंकि उनके कार्यंकर्ता उन्हें जिताने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं।
आज भारतीय जनता पाटा के वेंद्रीय नेतृत्व में इतनी गुटबाजी है, प्राधानमंत्री बनने की होड़ लगी हुईं कि उन्हें सिवाय अपना जोड़तोड़ करने की किसी को पुर्सत नहीं है। एक-दूसरे की टांग खींचना, नम्बर घटाने के खेल में यह दिन-रात जुटे हुए हैं। यह बात मैं अकेला नहीं कह रहा, खुद पाटा के दिग्गज नेता श्री लाल वृष्ण आडवाणी ने हाल ही में कही है। पूर्व उपप्राधानमंत्री और भारतीय जनता पाटा संसदीय दल के अध्यक्ष लाल वृष्ण आडवाणी ने कहा है कि ईंमानदारी के मामले में पाटा की साख गिरी है। उन्होंने कहा कि पाटा में गुटबाजी अब तेजी से बढ़ रही है। इससे भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। भाजपा के अंदरुनी सूत्रों के अनुसार आडवाणी ने दिल्ली नगर निगम के भाजपा पार्षदों के लिए दिल्ली के छतरपुर मंदिर में आयोजित प्राशिक्षण शिविर के उद्घाटन सत्र में कहा कि पाटा का निगम के कामों में तो प्रादर्शन अच्छा नहीं रहा है, ईंमानदारी के मामले में पाटा की साख गिरी है। इस मामले में उन्होंने अहमदाबाद नगर निगम की तारीफ करते हुए कहा कि वहां ईंमानदारी से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली प्रादेश भाजपा में पहले भी गुटबाजी थी, अब यह गुटबाजी और बढ़ रही है। उन्होंने साफ कहा कि पाटा की साख गिराने के लिए खुद पाटा के वुछ नेता जिम्मेदार हैं। आडवाणी जी ने बेशक यह बातें दिल्ली प्रादेश भाजपा नेताओं के लिए कही हों पर इशारे- इशारे में वे एक तीर से कईं शिकार कर गए हैं। आज की आवश्यकता यह है कि भाजपा के वेंद्रीय नेतृत्व के दूसरी पंक्ति के नेता प्राधानमंत्री बनने का सपना छोड़े और भाजपा ऐसे व्यक्ति को पीएम के तौर पर प्राोजेक्ट करे जो पूरी पाटा को साथ लेकर चल सके। वर्तमान नेतृत्व में मुझे तो ऐसे तीन ही विकल्प नजर आते हैं जिन्हें अनुभव है, जो ईंमानदार छवि के हैं, जो पाटा कार्यंकर्ताओं को साथ लेकर चला सकते हैं, जिनमें अहंकार इतना नहीं आया कि वह अपनी जमीन ही भूल जाएं—ये हैं श्री लाल वृष्ण आडवाणी, श्री मुरली मनोहर जोशी और श्री नरेन्द्र मोदी।
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Saturday, 25 June 2011

नितिन गडकरी को धूल चटाने में जुटे उन्हीं के पार्टी के नेता


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th June 2011
अनिल नरेन्द्र
एक हफ्ते के ड्रामे के बाद आखिर भाजपा नेता श्री गोपीनाथ मुंडे मान ही गए। कहा जा रहा है कि लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज से मिलने के बाद महाराष्ट्र में भाजपा के चेहरे और लोकसभा में पार्टी के उपनेता ने अपने तेवर नरम कर लिए। इसके साथ ही पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ मुंडे की बगावत से उपजे संकट के फिलहाल टलने का रास्ता साफ हो गया। एक बार फिर इससे साबित हो गया कि भाजपा जो एक समय अपने आपको पार्टीविद् व डिफरैंस कहती थी वह कितनी नीचे आ चुकी है और दूसरी पार्टियों की तरह बनकर रह गई है। गोपीनाथ मुंडे इतने महत्वपूर्ण नहीं जितना महत्वपूर्ण है पार्टी में अनुशासन। गोपीनाथ मुंडे ने क्या-क्या नहीं किया? उन्होंने खुलकर पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को गाली दी। पहले शिवसेना में जाने का प्रयास किया, वहां से उनके लिए दरवाजा बन्द था, फिर कांग्रेस में घुसने की कोशिश की। मुंडे हैं तो प्रमोद महाजन के बहनोई, इसलिए सौदेबाजी में तो अपने आपको माहिर समझते हैं। कांग्रेस से उन्होंने आने की शर्त रखी। मुझे कैबिनेट का दर्जा चाहिए। रिपोर्टों के अनुसार वह सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से भी मिले। कांग्रेस ने उलटा शर्त रख दी कि आप पहले भाजपा की टिकट पर बीड लोकसभा सीट से त्यागपत्र दें और बतौर कांग्रेस उम्मीदवार वार्ड इलैक्शन जीतें फिर आपको मंत्री बनाने की बात सोची जाएगी। गोपीनाथ मुंडे इसके लिए शायद तैयार नहीं थे। वह चाहते थे कि उन्हें पृथ्वीराज चव्हाण की खाली हुई पृथ्वीराज चव्हाण की राज्यसभा सीट दी जाए। जब कांग्रेस से लात पड़ी तो मुंह बचाने के लिए मुंडे ने वापस आने का रास्ता ढूंढना आरम्भ कर दिया। यहां सुषमा स्वराज काम आ गईं। चूंकि मुंडे ने नितिन गडकरी को खुली चुनौती दी थी इसलिए भाजपा के एक गुट का उन्हें गुप्त समर्थन मिल रहा था। यह गुट अध्यक्ष नितिन गडकरी को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। भाजपा का आज हाई कमान क्या है? कौन है हाई कमान? कांग्रेस में तो सोनिया गांधी जो पार्टी अध्यक्ष हैं वही हैं हाई कमान। उनके फैसले को कोई नहीं टाल सकता। अच्छे अच्छों को आंखें दिखाने पर बाहर का रास्ता दिखाया गया है पर भाजपा में हिसाब उलटा ही है। अध्यक्ष को गाली निकालो और हीरो बनो। भाजपा को मजबूत करने में जुटे गडकरी को पार्टी के अन्दर ही एक गुट रोकना चाहता है ताकि वह पार्टी में अपनी पकड़ न बना पाएं। महाराष्ट्र की राजनीति में उलझाकर भाजपा की यह लॉबी गडकरी को कमजोर अध्यक्ष साबित करने में जुटी है जिससे वह बड़े फैसले न ले सकें। मुंडे ने भाजपा में बने रहने का शंखनाद नहीं किया बल्कि गडकरी के खिलाफ लड़ाई जारी रखने के लिए एक चाल चली है। भाजपा में यह लॉबी त्रस्त चल रही है। गडकरी के भाजपा में पुराने लोगों को लाना उन्हें रास नहीं आ रहा। गडकरी ने हाल ही में अपने कई इंटरव्यू में जो कड़ा संदेश दिया उससे भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता परेशान हैं। गडकरी ने साफ कहा है कि वह पार्टी को मजबूत करने के लिए अपने एजेंडे पर कायम रहेंगे। इसका मतलब साफ है कि पुराने जमे लोगों को तकलीफ हो रही है। गडकरी के साथ संघ पूरी तरह खड़ा है। संघ चाहता है कि भाजपा की खोई हुई ऊर्जा वापस आए। गोपीनाथ मुंडे की लड़ाई मुद्दों पर नहीं है। दरअसल असल मुद्दा उनके लिए यह है कि उनसे जूनियर नितिन गडकरी दिसम्बर 2009 में अध्यक्ष बनने के बाद उनसे ऊपर कैसे पहुंच गए। वह आज भी अपने आपको गडकरी से ऊपर मानते हैं। वह खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। दुःखद यह है कि उस पार्टी के भीतर नेताओं के आपसी टकराव बढ़ रहे हैं, जो खुद को दूसरों से अलग बताती है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को लेकर सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की तकरार सुर्खियों में थी। ऐसा लगता है कि पार्टी अटल जी के सक्रिय राजनीति से अलग होने और आडवाणी जी के संरक्षण की भूमिका में आने के बाद से नेतृत्व संकट से जूझ रही है। असल में पांच-सात वर्ष पहले तक जो नेता दूसरी और तीसरी पंक्ति में थे, वे अब पहली पंक्ति में आ गए हैं और उनमें आगे बढ़ने की होड़ लग गई है। यह विडम्बना ही है कि ऐसे समय जब देश घोटालों के अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार चरम पर है और केंद्र सरकार लोकप्रियता के सबसे निचले स्तर पर आ गई है, प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते भाजपा का इन सबसे लड़ने के लिए न तो कोई ठोस कार्यक्रम है और न ही सशक्त नेतृत्व। कल को जनता पूछ सकती है कि अगर जनता आपको विकल्प की तरह चुने तो आपका प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन होगा? आपका नेतृत्व क्या है? हमारी राय में तो श्री गोपीनाथ मुंडे को निकाल बाहर करना चाहिए था ताकि दूसरों को भी सबक मिले। अपने आपको पार्टीविद् डिफरैंस कहलाने वाली पार्टी से यह उम्मीद नहीं थी कि वह इस तरह के समझौते करती फिरेगी?
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