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Thursday, 17 September 2026

क्या भारत की विदेश नीति बदल रही है?

नई दिल्ली में समाप्त हुए 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में जारी संयुक्त घोषणा पत्र में मिडल ईस्ट (मध्य पूर्व) को लेकर अपनाया गया रुख चर्चा का विषय बना हुआ है। इस घोषणा पत्र में बिना किसी देश का नाम लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जिसकी शायद उम्मीद बहुत कम लोगों को थी और यह चर्चा भी शुरू हो गई कि भारत ने अपनी विदेश नीति में बदलाव करना शुरू कर दिया है। इस घोषणा पत्र में जिस पर सभी संबंधित देशों ने अपनी स्वीकृति दी है और ज्वाइंट डिकलेरेशन साइन किए हैं का मतलब साफ है कि इनमें उनकी सहमति है। घोषणा पत्र में दो-तीन बिन्दु ऐसे हैं जो अब तक कि भारत की विदेश नीति से मेल नहीं खाते। इस घोषणा पत्र में इजरायल और अमेरिका का नाम लिए बिना फलस्तीन और लेबनान का जिक्र किया गया है और मध्य पूर्व के तनावपूर्ण हालात के शांतिपूर्ण हल की अपील की गई है। दिलचस्प ये भी था कि अमेरिका के साथ युद्ध में एक-दूसरे के विपरीत दोनों छोर में खड़े ईरान और यूएई भी मध्य पूर्व के हालात शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की अपील करने वाले देशों में शामिल थे। ब्रिक्स घोषणा पत्र में ट्रंप, अमेरिकी टैरिफ का नाम तो नहीं लिया गया पर कहा गया कि कई देशों को अन्यायपूर्ण, एकतरफा संरक्षणवादी कदमों से नुकसान हुआ है। चूंकि घोषणा पत्र में भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। इसका मतलब साफ है कि पहली बार बिना अमेरिका और ट्रंप का नाम लिए भारत टैरिफ की खुलकर आलोचना कर रहा है। अब इसे भारत की विदेश नीति में माना जाए? यह भी देखना होगा कि ट्रंप का इस पर क्या असर और प्रतिक्रिया होती है। इसी तरह घोषणा पत्र में गाजा और कब्जे वाले फलस्तीनी इलाकों की मानवीय स्थिति पर गंभीर चिंता जताई गई। इसमें गाजा में सीजफायर बनाये रखने और बगैर किसी बाधा के मानवीय मदद पहुंचाने की अपील की गई। इसमें फलस्तीनियों को जबरन विस्थापित किये जाने का भी विरोध किया गया है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून में ऐसे सभी उल्लंघनों की निंदा की गई है। घोषणा पत्र में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ दायर मामले में अंतर्राष्ट्रीय न्याय अदालत के अंतरिम आदेशों का भी जिक्र किया गया है। घोषणा पत्र में दो-राष्ट्र समाधान (टू नेशन थ्योरी) के समर्थन को दोहराया गया है। इसके तहत 1967 की सीमाओं को सुनिश्चित करना शामिल है। इसमें इजरायल से लेबनान में युद्ध विराम का पालन करने और लेबनान के बचे हुए इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाने की भी अपील की गई है। ब्रिक्स के घोषणा पत्र में बेशक इजरायल का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया गया लेकिन फलिस्तीन और लेबनान का जिक्र करते हुए मध्य पूर्व की समस्या के शांतिपूर्ण हल की अपील की गई है। एक विशेषज्ञ ने पूछा कि भारत-इजरायल कितने मजबूत हैं यह किसी से छिपा नहीं। इस घोषणा पत्र के बाद इजरायल और भारत के रिश्तों पर कोई असर होगा या नहीं यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। इसी तरह ट्रंप के टैरिफ और दादागिरी पर ब्रिक्स में लिए गए स्टैंड से भारत और अमेरिका के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा यह भी आने वाले दिनों में पता चलेगा। ईरान-अमेरिका युद्ध पर साफ तौर पर ब्रिक्स घोषणा पत्र में ईरान का पक्ष लिया गया है। ब्रिक्स घोषणा पत्र में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है लेकिन अमेरिका की ओर से एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों की आलोचना की गई। कहा गया कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों की निंदा की जाती है। इनका व्यापक नकारात्मक असर होता है और इनसे गरीब लोगों पर आसमान रूप से ज्यादा असर पड़ता है। ब्रिक्स के दो सदस्य देशों रूस और ईरान पर भी कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। ट्रंप का ब्रिक्स विरोध जगजाहिर है। वह कई बार ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी बता चुके हैं और ब्रिक्स के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी दे चुके हैं। सवाल यहां यह है कि चूंकि भारत ने भी इस ब्रिक्स घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं तो क्या भारत अब अमेरिका के सामने झुकने को तैयार नहीं और क्या हम यह मानें कि भारत की विदेश नीति में अब भारी परिवर्तन आने वाला है या यह महज एक इवेंट था और फोटो अपील यूनिटी थी? 

-अनिल नरेन्द्र

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