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Saturday, 23 June 2012

क्या नीतीश बिहार में आर-पार की लड़ाई छेड़ रहे हैं?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23 June 2012
अनिल नरेन्द्र
राष्ट्रपति चुनाव उम्मीदवार को लेकर छिड़ी राजग में एक नया विवाद छिड़ गया है। संप्रग उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को लेकर तो पहले ही एनडीए में दरार पड़ गई थी पर अब तो लगता है कि कहीं एनडीए ही न टूट जाए? ताजा विवाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बयानों को लेकर खड़ा हो गया है। नीतीश कुमार ने एक अखबार में यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि राजग का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार ऐसा होना चाहिए, जिसकी छवि धर्मनिरपेक्ष हो। उनके इस बयान को जहां गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की सम्भावनाओं पर पानी फेरने की कोशिश कहा जा सकता है वहीं उन्होंने साफ संकेत दे दिया कि वह नरेन्द्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री उम्मीदवार स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं और अगर भाजपा ने ऐसा किया तो वह एनडीए छोड़ भी सकते हैं और उन्हें इस बात की परवाह भी नहीं होगी कि बिहार में उनकी भाजपा के साथ सांझी सरकार चलती है या गिरती है। नीतीश ने आखिर यह बयान इस समय क्यों दिया? उन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन करेंगे फिर यह बयान देने के पीछे उद्देश्य क्या है? क्या वह अपने को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर रहे हैं? नीतीश के बयान आने के बाद और तो और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी सीधा मैदान में कूद पड़ा। संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने नीतीश कुमार पर पलटवार करते हुए यह सवाल खड़ा कर दिया कि कोई हिन्दुवादी देश का प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकता? हालांकि भागवत ने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन माना जा रहा है कि संघ अब नरेन्द्र मोदी के पक्ष में खुलकर खड़ा हो गया है। चलो एक बात और साबित हो गई कि संघ जो आज तक यह कहता आया है कि वह राजनीति में दखल नहीं देता अब खुलकर राजनीतिक विषयों पर बोलने लगा है। पहले एपीजे अब्दुल कलाम को समर्थन देने का बयान और अब नीतीश कुमार के बयान का जवाब। भावी प्रधानमंत्री के साथ-साथ सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता को लेकर भाजपा और जद (यू) के बीच जंग तीखी हो गई है। भागवत के बयान से तिलमिलाए नीतीश बोले कि 2002 में गुजरात दंगों के बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मोदी को हटाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मोदी को राजधर्म की नसीहत दी थी। नीतीश की बात में मिर्च-मसाला लगाकर जद (यू) नेता शिवानन्द तिवारी तो एक कदम और आगे बढ़ गए। उन्होंने कहा कि अगर मोदी पीएम पद के उम्मीदवार होंगे तो एनडीए टूट जाएगा? जद (यू) एनडीए छोड़ देगा। तिवारी आगे बोले कि भाजपा को तय करना है कि अगले चुनाव के बाद उसे केंद्र सरकार बनानी है या विपक्ष में रहना है। देश को प्रधानमंत्री के रूप में कोई धर्मार्थ चेहरा पसंद नहीं है। 1996 में ही भाजपा ने समझ लिया था कि वह कट्टर हिन्दुत्व के आधार पर केंद्र में सरकार नहीं बना सकती इसलिए समान नागरिक संहिता, अनुच्छेद 370 और राम मंदिर का मुद्दा छोड़ा गया। अगर गोधरा कांड के बाद वाजपेयी ने नरेन्द्र मोदी को बर्खास्त किया होता तो एनडीए 2004 का चुनाव नहीं हारती। वाजपेयी चाहते थे कि दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी इस्तीफा दें पर आडवाणी ने इससे मोदी को रोका था। एक सवाल अब यह उठ रहा है कि बिहार में जद (यू)-भाजपा गठबंधन सरकार का क्या होगा? नीतीश और तिवारी के तीखे बयानों की भाजपा में तीखी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक ही था। इनके जवाब में नरेन्द्र मोदी समर्थक भाजपा के वरिष्ठ नेता व नीतीश सरकार में पशुपालन मंत्री गिरिराज सिंह ने नीतीश कुमार को चुनौती दे दी। उन्होंने कहा कि वे मोदी के साथ हैं और उन्हें किसी से धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है। गिरिराज ने तो यहां तक कह डाला कि नरेन्द्र मोदी के समर्थन से मुख्यमंत्री नीतीश अगर असहज महसूस करते हैं और उनमें दम है तो उन्हें बर्खास्त कर दें। इससे पहले मंगलवार को भी गिरिराज ने तल्ख लहजे में कहा था कि धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा फिर से तय होनी चाहिए। नरेन्द्र मोदी प्रकरण पर जद (यू) और भाजपा नेताओं की जुबानी जंग को थामने के लिए उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी आगे आए। बुधवार को दिनभर खबरिया चैनलों में बयानी जंग के मद्देनजर सुशील मोदी ने समझाया कि बिहार में नरेन्द्र मोदी मुद्दा नहीं है, लालू है मुद्दा। सड़क-बिजली जैसे मुद्दे हैं। आज पार्टी पीएम उम्मीदवार घोषित नहीं कर रही है कि गठबंधन पर पुनर्विचार जैसी बात हो। जिन मुद्दों और शर्तों पर गठबंधन बना, वे वैसे ही है। लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने कहा कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत गुजरात विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी को लाभ पहुंचाने के लिए नीतीश कुमार धर्मनिरपेक्षता का शिगूफा छोड़ रहे हैं। बिहार में भ्रष्टाचार के मुद्दे से भटका रहे हैं। पासवान ने नीतीश से पूछा कि वे बताएं कि आडवाणी सेक्यूलर हैं या सांप्रदायिक? बिहार में जद (यू)-भाजपा गठबंधन की सरकार है। नीतीश इस तरह की बयानबाजी कर नूराकुश्ती का खेल खेल रहे हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने कहा कि प्रधानमंत्री के दौर में बने रहने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नौटंकी कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की आलोचना सिर्प दिखावा है। उन्होंने कहा कि गोधरा कांड के समय नीतीश कुमार केंद्र में मंत्री थे और उस समय मोदी के बचाव में सामने आए थे। उन्होंने कहा कि बिहार में भोज पर बुलाकर मना करना और दिल्ली में हाथ मिलाना, जनता के साथ कूर मजाक है। इनकी कथनी और करनी में काफी अन्तर है। जहां तक बिहार में जद (यू)-भाजपा गठबंधन का सवाल है, सत्ता के गणित के मुताबिक 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में सत्ताधारी गठबंधन का जोड़ 208 है। जद (यू) के पास 117 और भाजपा के पास 91 जबकि सत्ता में बने रहने के लिए 122 विधायकों की जरूरत है। ऐसे में अगर भाजपा सत्ता से हटती है तो जद (यू) के पास सरकार के लिए जरूरी पांच विधायक कम रह जाएंगे। दिखने में यह संख्या छोटी है पर इसे जुटाना इतना आसान नहीं है। बिहार में राजद-लोजपा गठबंधन के पास 23 सीटें हैं जबकि कांग्रेस के चार और निर्दलीय के छह विधायक हैं। एक सम्भावना यह है कि नीतीश कांग्रेस से गठबंधन कर लें और एक-दो निर्दलीय विधायकों को शामिल कर लें। अगर बिहार में नीतीश कांग्रेस से हाथ मिलाते हैं तो केंद्र में भी वह संप्रग सरकार का हिस्सा बन सकते हैं। अब भाजपा को यह तय करना है कि वह ऐसी सरकार में बने रहना चाहेंगे जो आए दिन पार्टी को कोसते रहते हैं। लगता है कि नीतीश अब ज्यादा दिन भाजपा के दोस्त नहीं रहेंगे। उन्होंने अलग होने का फैसला तय कर लिया है। यह उसकी शुरुआत है।
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, Janta Dal (U), NDA, Nitish Kumar, Vir Arjun

Sunday, 3 June 2012

ब्रह्मेश्वर की हत्या से कहीं फिर से हिंसा का दौर आरंभ न हो जाए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3 June 2012
अनिल नरेन्द्र
जब से बिहार में श्री नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली है तब से राज्य में कोई बड़ी हिंसा की घटना नहीं हुई है। इससे लगने लगा कि कभी हिंसा के लिए बदनाम बिहार में यह हिंसा का दौर खत्म हो गया है। पर शुकवार को एक नया तूफान उठ गया। कुख्यात जातीय गुट रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह उर्प मुखिया की बड़ी सनसनीखेज ढंग से हत्या कर दी गई। वे आरा में अपने निवास से सुबह की सैर पर निकले ही थे कि मोटरसाइकिल से आए अज्ञात हमलावरों ने उन पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। करीब चालीस गोलियों से ब्रह्मेश्वर को छलनी कर दिया। 1990 के दौर में जब नक्सलियों का आतंक था तो इससे निपटने के लिए भूस्वामियों ने जिनमें सारी सवर्ण जातीयां शामिल थी, ने रणवीर सेना का गठन ब्रह्मेश्वर सिंह ने गठन किया था। इस निजी सेना पर कई नरसंहारों के आरोप हैं। इनमें लक्ष्मणपुर बाथे, सिंचापुर और बकसीटोला के चर्चित नरसंहार शामिल हैं। सन् 1994 से लेकर 2002 के बीच करीब 250 लोगों की हत्या के 26 मामलों में मुख्य आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया को सबूतों के अभाव के चलते जुलाई 2011 में अदालत ने जमानत दी थी। ब्रह्मेश्वर सिंह एक दौर में आतंक का पर्याय बन गए थे। उन्हें हत्याओं के 16 मामलों में बरी किया गया था और छह मामलों में जमानत पर थे। नौ साल तक जेल में रहने के बाद पिछले महीने ही वे बाहर आए थे। उनकी तैयारी चुनावी राजनीति में पूंदने की थी। उनकी हत्या के बाद उनके समर्थकों में गुस्सा फूट गया। इन लोगों ने पहले बीडीओ कार्यालय को निशाना बनाया, वहां जमकर तोड़फोड़ के बाद आग लगा दी। इसके बाद करीब एक हजार लोगों के हुजूम ने सर्पिट हाउस पर धावा बोल दिया, जाते-जाते इसमें भी आग लगा दी। पूरे राज्य में हाईअलर्ट जारी कर दिया गया है। भागलपुर जिले में सेवा यात्रा में व्यस्त मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि हत्यारों को पकड़ा जाएगा और उन्हें सजा मिल कर रहेगी। डर यह है कि कहीं फिर से बिहार में जातिवादी हिंसा न भड़क पड़े। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं में इस हत्या का राजनीतिक लाभ लेने की होड़ शुरू हो गई है। बिहार की बुनियादी समस्या जमीन की मिलकियत से जुड़ी हुई है। लंबे वक्त तक भूमि सुधार न होने की वजह से विभिन्न जातियों के बीच विरोध और टकराव तेज होता गया। न बिहार में उस हद तक औद्योगीकरण हुआ, न ही हरित कांति जैसा बदलाव हुआ, जो आर्थिक और जातिगत संबंधों को बदलता। ऐसे ठहराव के दौर में गरीब और भूमिहीन दलितों के बीच नक्सलियों का पभाव बढ़ता गया जिन्होंने आर्थिक और सामाजिक बेहतरी की उनकी आकांक्षाओं को उग्र और हिंसक रूप दिया। इसकी पतिकिया में सभी जातियों ने अपनी हिंसक सेनाएं बना डाली। मंडलवाद के दौर में बदली गई राजनीति से भी जमीन से जुड़े आर्थिक संबंधों को व्यवस्थित रूप से ठीक करने की कोशिश नहीं की, इसके बदलाव अराजक हिंसक तरीके से हुआ। ब्रह्मेश्वर सिंह जैसे नेता ऐसे में सभी जातियों के नायक बन गए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। पतिकिया स्वरूप फिर से बिहार में जातीय संघर्ष को हर हालत में रोकना होगा।
Anil Narendra, Bihar, Daily Pratap, Nitish Kumar, Ranvir Sena, Vir Arjun

Friday, 13 April 2012

क्या नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत उम्मीदवार हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13 April 2012
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर सुर्खियों में हैं। देश के अन्दर तो उनकी इतनी चर्चा नहीं हो रही जितनी विदेशों में है। अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट के स्तम्भकार सीमोन डेयनार ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 के आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के सबसे सशक्त दावेदार होंगे। भारत में काफी लोग उन्हें रोल मॉडल के रूप में देखते हैं। कुछ लोगों की नजर में वह देश के सबसे योग्य नेता हैं। हालांकि एक बड़ा वर्ग आज भी उन्हें मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार के लिए माफ नहीं कर पाया है। रिपोर्ट में लिखा है कि नरेन्द्र मोदी को भारत की राजनीति में सबसे जटिल व्यक्तित्व वाला राजनेता माना जा सकता है। मोदी की अगुवाई में गुजरात जैसे राज्य की अर्थव्यवस्था ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। लेकिन मुख्यमंत्री की हिन्दू राष्ट्रवादी छवि से काफी लोगों को लगता है कि उनके नेतृत्व में कट्टर धार्मिक शक्तियों को बल मिलेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी जैसे नेता की अगुवाई में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पुरानी सैक्यूलर छवि को धक्का लग सकता है। नरेन्द्र मोदी को राज्य में भ्रष्टाचार खत्म करने के साथ आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति देने का श्रेय जाता है। तेजी से आगे बढ़ती गुजरात की अर्थव्यवस्था में न सिर्प देशी कम्पनियां बल्कि बड़ी संख्या में विदेशी कम्पनियों ने भी गुजरात में निवेश किया है। मोदी के आलोचक भी उन्हें निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं मानते। साल 2014 में होने वाले आम चुनाव के बाद भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार हो सकते हैं नरेन्द्र मोदी।
श्री नरेन्द्र मोदी की इस प्रकार की प्रोजेक्शन से जहां मुसलमान समुदाय परेशान है वहीं उनकी अपनी पार्टी के कुछ लोग भी खुश नहीं हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच मोदी को मिल रहे व्यापक समर्थन के चलते संघ परिवार के भीतर भी समीकरण बदल रहे हैं। इसका कारण है कि संघ की प्रवासी भारतीयों में गहरी पैठ है। अमेरिका, चीन और जापान का उद्योग क्षेत्र मोदी के साथ व्यापारिक संबंधों को बेहतर बनाने में लगा है। हालांकि भाजपा और संघ का एक बड़ा वर्ग मोदी को किनारे लगाने में लगा है ताकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताकतवर होकर न उभर पाएं। इसलिए संगठन स्तर पर मोदी की छवि खलनायक वाली बनाने की भी कोशिश हो रही है और कुछ हद तक मोदी खुद ऐसी छवि बनाने के लिए बारूद दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार न करना और पिछले वर्ष दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में न आना मोदी की संगठन विरोधी गतिविधियों को दर्शाता है। बहुत से भाजपाइयों का कहना है कि मोदी अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। मोदी के दिमाग में अब गरूर आ गया है। दुनिया के 100 प्रभावशालियों के लिए कराए जा रहे टाइम्स पत्रिका के सर्वे में मोदी ने ओबामा और ब्लादिमीर पुतिन को पछाड़ दिया है। माना जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन देश-विदेश में हो रहे सर्वेक्षणों में लोकप्रियता के हिसाब से नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी से पीछे हैं।
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Sunday, 15 January 2012

यूपी चुनाव में नरेन्द्र मोदी व नीतीश कुमार आमने-सामने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th January  2012
अनिल नरेन्द्र
आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस, भाजपा, सपा व बसपा के प्रमुख प्रचारक कौन-कौन होंगे लोगों की इस पर भी दिलचस्पी बनी हुई है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में। मिशन-2012 फतह पर देवभूमि उत्तराखंड व यूपी में कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। प्रत्याशियों के नामों की घोषणा के बाद पार्टियां अब चुनावी प्रचार के लिए स्टार प्रचारकों की सूची बनाने में लग गई हैं। जाहिर है कि श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल गांधी खास अट्रैक्शन होंगे। मुस्लिम मतदाताओं को पटाने के लिए सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह, राशिद अलवी, रशीद मसूद का इस्तेमाल हो सकता है। पता नहीं प्रधानमंत्री भी जाएंगे या नहीं? इसके अलावा दिल्ली, राजस्थान के मुख्यमंत्रियों का भी इस्तेमाल हो सकता है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भी शामिल हो सकते हैं। युवाओं को आकर्षित करने के लिए राहुल के साथ सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जतिन प्रसाद भी जनता को संबोधित कर सकते हैं। जहां तक भाजपा का सवाल है पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी, एलके आडवाणी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली मुख्य प्रचारक हो सकते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अटकलें जोरों पर हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बारे में भी कहा जा रहा है कि वह यूपी में तो जरूर प्रचार के लिए आएंगे। नीतीश कुमार और नरेन्द्र मोदी सियासत में एक-दूसरे से नजरें मिलाने से भी परहेज करते हैं लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश में दोनों आमने-सामने होंगे। भाजपा द्वारा प्रतिष्ठाजनक सीटें नहीं दिए जाने के कारण पहले नीतीश ने उप्र चुनाव से अलग रहने का फैसला लिया था, लेकिन अब जबकि उनकी पार्टी जद (यू) सभी 403 सीटों पर अकेले लड़ने के प्रयास में है तो चुनाव प्रचार के लिए उनका यूपी आना तय-सा माना जा रहा है। उधर भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को अपने स्टार प्रचारक के तौर पर पेश करने का निर्णय लिया है। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शर्त को कबूल कर लिया था और प्रचार के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बिहार नहीं आने दिया था। मोदी की छवि कट्टरवादी हिन्दू नेता की रही है। इस कारण नीतीश उनसे परहेज करते हैं। नीतीश को अल्पसंख्यकों का भारी समर्थन मिलता रहा है और वह किसी कीमत पर इस जनाधार को खोना नहीं चाहते। पूर्व में एनडीए के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में नीतीश और मोदी आमने-सामने एक मंच पर आए थे। दोनों नेताओं के साथ वाली तस्वीर से सियासत में तूफान खड़ा होता रहा है। भाजपा की राष्ट्र कार्यकारिणी की बैठक के दौरान इस तस्वीर के छपने पर नीतीश इतने नाराज हो गए कि उन्होंने भाजपा की रैली में शिरकत करने से मना कर दिया। यही नही नीतीश ने गुजरात सरकार को वह पांच करोड़ भी लौटा दिए जो बाढ़ राहत के लिए मोदी ने भेजे थे। हालांकि अब भी बिहार में दोनों पार्टियों का गठबंधन कायम है। इन दोनों राजनीतिज्ञ प्रतिद्वंद्वियों के बीच एक चुनाव में आमने-सामने से देखें क्या स्थिति बनती है? समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारक मुलायम सिंह, अखिलेश यादव और आजम खां प्रमुख होंगे। बसपा में तो एक ही प्रचारक हैं बहन जी। बहन जी अकेले अपने ही दमखम पर पार्टी को जिताने का प्रयास करेंगी। यूपी में इन प्रमुख दलों के अलावा और दर्जनों छोटे दल भी चुनावी दंगल में हैं। वह सब भी अपनी ताल ठोंकेंगे। कुल मिलाकर दिलचस्प होगा इन स्टार प्रचारकों का आपस में भिड़ने का नजारा।
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Friday, 21 October 2011

क्या नरेन्द्र मोदी पार्टी से ऊपर हो चुके हैं?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st October 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ समय से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा के बीच समीकरण ठीक नहीं लग रहा। भाजपा में मोदी को लेकर दोनों रोष और अलगाव की भावना पैदा हो रही है। भाजपा के नेतृत्व का मानना है कि नरेन्द्र मोदी को अब अहंकार हो गया है और वह अपने आपको पार्टी से ऊपर मानने लगे हैं। पार्टी ने मोदी को उनकी हैसियत का अहसास करवाना शुरू कर दिया है। लाल कृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा पर आंखें दिखाने वाले नरेन्द्र मोदी को इस यात्रा में बिल्कुल अनदेखा कर दिया है। वह कहीं भी नजर नहीं आ रहे और अब अखबारों में उनकी सुर्खियां भी कम देखने को मिल रही हैं। आडवाणी जी ने अपनी यात्रा में भाजपा के और तमाम मुख्यमंत्रियों के कामकाज, उपलब्धियों का जिक्र किया है पर उन्होंने अभी तक एक भी बड़ी सभा में नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं लिया। यही आडवाणी पहले नरेन्द्र मोदी को एक आदर्श मुख्यमंत्री पेश करते थकते नहीं थे। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि मोदी का राजनीतिक कद काफी बड़ा हो चुका है। उन्हें यह अहसास कराने की जरूरत है कि पार्टी उनकी वजह से नहीं बल्कि वे पार्टी की वजह से हैं। इसके तहत इस मुद्दे पर अब विचार किया जा रहा है कि अगले साल में शुरू होने वाले उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में विधानसभा चुनावों में मोदी को प्रचार के लिए न बुलाया जाए। पार्टी को लगता है कि अपनी कट्टरवादी हिन्दुत्व की छवि के कारण अगर मोदी प्रचार करते हैं तो तमाम मुसलमान बिखर जाएंगे और भाजपा का मोदी की वजह से विरोध करना शुरू कर देंगे। भाजपा को यह मालूम है कि एक भी मुसलमान वोट उसे मिलने वाला नहीं पर वह यह भी नहीं चाहती कि बिना वजह मुसलमान पार्टी के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लें। पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछड़े व अतिपिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने के लिए नीतीश कुमार की मदद लेना बेहतर विकल्प समझने लगी है। नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं कि श्री आडवाणी ने अपनी जनचेतना यात्रा को बिहार से शुरू किया और इस यात्रा को हरी झंडी नीतीश ने दिखाई। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने मोदी को प्रदेश में न भेजने की चेतावनी दी थी, भाजपा ने इस पर अमल किया और नतीजे सबके सामने हैं। आज नीतीश कुमार एनडीए के सबसे सशक्त उम्मीदवार बनकर उभरे हैं। भाजपा को भी सूट करता है कि वह एनडीए को आगे बढ़ाए और इस रास्ते से वह सत्ता तक पहुंचे। मोदी का कद छोटा करने के लिए भाजाप नेतृत्व और संघ ने मिलकर जानबूझ कर संजय जोशी को जिम्मेदारी सौंपी है। नरेन्द्र मोदी संजय जोशी को बेहद नापसंद करते हैं। उन्हें संगठन मंत्री पद से हटवाने में उनकी बहुत अहम भूमिका रही। वैसे तो लाल कृष्ण आडवाणी भी संजय जोशी को पसंद नहीं करते क्योंकि जिन्ना प्रकरण में संजय जोशी ने ही आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा था। आमतौर पर अध्यक्ष अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को देता है पर आडवाणी ने अपना इस्तीफा संजय जोशी को भेजा था।
श्री नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। वह अपने घर में ही घिरते जा रहे हैं। गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी को फंसाने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ने वाले निलम्बित और फिर गिरफ्तार किए गए आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को सोमवार एक स्थानीय अदालत ने तमाम विरोध के बावजूद जमानत दे दी। अदालत ने उस प्रकरण पर तार्किक संदेह व्यक्त किया जिसके तहत भट्ट को गिरफ्तार किया गया था। रिहा होते ही भट्ट ने मोदी पर हमला बोल दिया। भट्ट ने मोदी को अपराधी बताते हुए कहा कि मेरे लिए मोदी सिर्प एक अपराधी हैं जो मुख्यमंत्री बन गए हैं। मोदी और उनके लोग खुद को बचाने के लिए मेरी हत्या तक करवा सकते हैं। जैसा कि हरेन पांड्या का कराया गया। यह निश्चित है कि कांग्रेस जो संजीव भट्ट को उकसा रही है इनका जमानत पर छूटने और बाहर आने का पूरा-पूरा लाभ उठाएगी। हैरानगी तो इस बात की भी है कि गुजरात के तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने संजीव भट्ट का खुला समर्थन कर दिया है। 30 सितम्बर को भट्ट की गिरफ्तारी के बाद यह पहली बार है जब अधिकारी भट्ट परिवार से मिलने उसके घर गया और संजीव की पत्नी श्वेता भट्ट से मुलाकात की। यह मुलाकात करीब दो घंटे चली। श्वेता ने बताया कि तीनों अधिकारियों ने संजीव के साथ हो रहे घटनाक्रम पर खेद व्यक्त किया और मदद का आश्वासन दिया। आने वाले दिनों में लगता है कि नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं, घटने वाली नहीं।
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Wednesday, 7 September 2011

नीतीश कुमार ने दिखाया भ्रष्ट अफसरों से निपटने का तरीका


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th September 2011
अनिल नरेन्द्र
भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी गूंज के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने रविवार को एक मिसाल कायम की है। अनैतिक तरीके से सम्पत्ति अर्जित करने वाले एफआईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) के वरिष्ठ अधिकारी
शिवशंकर वर्मा का रुकनपुरा स्थित बंगला जब्त कर लिया गया है। सरकार ने घोषणा कर दी कि वह अब बंगला सरकारी सम्पत्ति है। देश के लिए यह पहला मौका है जब किसी राज्य सरकार ने किसी अफसर की सम्पत्ति जब्त की हो। बिहार की राजग सरकार ने भ्रष्ट तरीके से अर्जित सम्पत्ति को जब्त करने का कानून (बिहार विशेष न्यायालय विधेयक 2009) बनाया हुआ है। देश के अन्य किसी सूबे में ऐसा कानून नहीं है। पटना के दंडाधिकारी के आदेश पर रविवार को एसएस वर्मा के आवास पर जब्ती की कार्रवाई शाम छह बजे तक चली। मूल रूप से लखनऊ में मोहन लाल गंज तहसील के नगराम थाना क्षेत्र में गरहा गांव के मूल निवासी वर्मा के खिलाफ स्पेशल विजिलेंस यूनिट ने आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने (डीए) का मुकदमा दर्ज किया हुआ है। छह जुलाई 2007 को एजेंसी ने उनके ठिकानों पर छापा मारा था। सिर्प उनके लॉकर से ही 9 किलो सोना बरामद हुआ। स्पेशल विजिलेंस यूनिट ने एसएस वर्मा पर 1.43 करोड़ का मुकदमा किया हुआ है। जांच एजेंसी को वर्मा के खिलाफ 3 जुलाई 2007 से आय से 68 लाख, 70 हजार रुपये अधिक सम्पत्ति रखने की जानकारी मिली थी। जांच के दौरान 19 लाख, 7 हजार, 910 रुपये नकद, 24854 अमेरिकी डालर, 22 लाख, 14 हजार, 893 रुपये का घरेलू सामान, तीन लाख 55 हजार 227 रुपये के आभूषण, 80 लाख, 78 हजार 596 रुपये का सोना, 27 हजार रुपये का वेवली स्कॉट रिवाल्वर, पटना-रायबरेली में एक लाख, 68 हजार रुपये की भूमि की जानकारी मिली।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी जंग का सार्थक चरण है। हमने ऐसी व्यवस्था की हुई है कि कोई सपने में भी गड़बड़ी करने का न सोचे। इसी मामले में साबित हो गया कि कोई गलत तरीके से सम्पत्ति को अर्जित करता है तो उसे छिपा नहीं सकता। ऐसी सम्पत्तियों को जब्त करके हम स्कूल खोलेंगे। उसका सार्वजनिक उपयोग होगा। आखिर पैसा तो जनता का ही है। अभी ढेर सारे लोग पाइप लाइन में हैं। देखते जाइए। निगरानी की विशेष अदालत से आरोप सिद्ध होने के बाद एसएस वर्मा ने हाई कोर्ट में राहत के लिए याचिका दायर की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। 11 मई 2011 को निगरानी के विशेष न्यायाधीश आरसी मिश्रा ने राज्य सरकार के बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम 2009 के एक्ट 13(ई) के तहत सम्पत्ति जब्त का फैसला
सुनाया था। 19 अगस्त 2011 को पटना हाई कोर्ट ने इस पर अपनी मोहर लगाई और अंतत रविवार को पटना के जिला दंडाधिकारी संजय कुमार सिंह ने वर्मा के सौभाग्य शर्मा पथ रुकनपुरा स्थित बंगले को जब्त करने का आदेश पारित किया और जब्ती हो गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी राजग सरकार इस ठोस पहल के लिए बधाई की पात्र है। उन्होंने सारे देश को रास्ता दिखा दिया कि भ्रष्टाचार से निपटने का एक तरीका यह भी है।
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