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Tuesday, 30 April 2024

मोदी के बयान पर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया

सत्ताधारी भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने के लिए अपना पूरा दमखम लगा रही है, तो वहीं इंडिया गठबंधन भी ऐड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है। ऐसे में नेताओं के भाषण, उनके दावे और दूसरी पार्टियों के नेताओं को लेकर दिए बयान रोज अखबारों की सुर्खियों में आ रहे हैं। लेकिन पहले चरण के मतदान के बाद प्रधानमंत्री का दिया एक भाषण विशेष रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है। भारतीय मीडिया के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे अपने पन्नों पर जगह दी है। इस्तेमाल किए गए कुछ खास शब्दों के कारण ये भाषण चुनाव आयोग में पीएम मोदी की शिकायत का कारण भी बना है। 19 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग खत्म हुई, इसके बाद 21 अप्रैल को राजस्थान के बांसवाड़ा में चुनावी रैली में दिए गए भाषण में पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक पुराने भाषण का हवाला दिया और मुसलमानों पर टिप्पणी की। पीएम मोदी ने अपने भाषण में समुदाय विशेष को घुसपैठिए और ज्यादा बच्चे पैदा करने वाला जैसी बातें कहीं। अपने भाषण में मोदी ने कहा पहले जब उनकी सरकार थी तब उन्होंने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला हक मुसलमानों का है। इसका मतलब ये संपत्ति इकट्ठा करके किसको बांटेंगे जिनके ज्यादा बच्चे हैं, उनको बांटेंगे, घुसपैठियों को बांटेंगे, क्या आपको यह मंजूर है। हालांकि पीएम मोदी ने मनमोहन सिंह के जिस 18 साल पुराने भाषण का जिक्र किया है, उसमें मनमोहन सिंह ने ऐसा कुछ नहीं कहा था। साल 2006 में मनमोहन सिंह ने कहा था, अनुसूचित जातियों, जनजातियों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। हमें नई योजनाएं लाकर ये सुनिश्चित करना होगा कि अल्पसंख्यकों का और खासतौर पर मुसलमानों का भी उत्थान हो सके, विकास का फायदा मिल सके। इन सभी का संसाधनों पर पहला दावा होना चाहिए। अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने 22 अप्रैल को इसे लेकर मोदी पर चुनावी रैली में मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण देने का आरोप शीर्षक से रिपोर्ट अपनी वेबसाइट पर छापी। उसने लिखा है कि बांसवाड़ा में दिए। भाषण के बाद 22 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में मोदी ने इसी तरह का एक और भाषण दिया। इस रिपोर्ट में भारत की नागरिकता कानून का भी जिक्र किया गया। लिखा गया है कि इस कानून की ये कहकर आलोचना की गई कि इसमें धर्म के आधार पर नागरिकता देने की बात कही गई है जो देश की धर्मनिरपेक्षता के मूलभूत सिद्धांतों से अलग है। टाइम मैगजीन ने भी लिखा है कि भारत की आबादी 1.44 अरब है और मोदी जी और भाजपा की आलोचना मुस्लिम समुदाय को बाहर से आए विदेशियों के रूप में देखने के लिए होती रही है। आलोचक कहते हैं कि मोदी की टिप्पणी का आधार विभाजनकारी हिन्दु राष्ट्रवाद है जिसके तार सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़े हैं। न्यूयार्क टाइम्स ने इस पर 23 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मोदी ने भारत के मुसलमानों को घुसपैठिया क्यों कहा? क्योंकि वो ऐसा कर सकते थे। न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि अपनी सत्ता को सुरक्षित मानकर पीएम मोदी आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर देश के विकास को लेकर वैश्विक नेता के तौर पर खुद को पेश कर रहे थे। ऐसा करके वो पार्टी के प्रचलित विभाजनकारी रवैये से खुद को अलग रखे हुए थे। इस तरह के मामलों में उनकी चुप्पी थी। इस बीच कट्टरपंथ सोच वाले गैर हिन्दू समुदायों को निशाना बना रहे थे और उनकी पार्टी के सदस्य संसद में नस्लीय और नफरती शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे। अल जजीरा ने लिखा है कि स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने पुष्टि की है कि उन्हें मोदी के भाषण से जुड़ी शिकायतें मिली हैं जिनकी वह जांच कर रही है। -अनिल नरेन्द्र

Saturday, 9 June 2012

संघ चाहता है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़े

भाजपा में बढ़ते अंतर्पलह का एक सबूत संजय जोशी का पार्टी छोड़ना है। पहले बेइज्जत करके संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकाला गया और अब पार्टी से ही निकलने पर मजबूर कर दिया गया। यह सब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के इशारों पर अध्यक्ष नितिन गडकरी ने किया। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि गडकरी तो मुखौटा हैं असल ताकत तो संघ है और संघ ने अन्दरखाते यह फैसला कर लिया है कि एक तरफ वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को डाउन करना है दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करना है। तभी तो संघ के मुखपत्र आर्गनाइजर के ताजा अंक में कहा गया है कि कांग्रेस पार्टी का तेजी से ग्रॉफ गिर रहा है लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को कांग्रेस के इस ह्रास का फायदा उठा पाना भी मुश्किल नजर आ रहा है। केवल मोदी ही ऐसा चेहरा हैं जिनमें पार्टी को उभारने और देशभर में उसके वोट आधार का विस्तार करने की क्षमता है जैसे अटल बिहारी वाजपेयी ने नब्बे के दशक में करके दिखाया था। अगर संघ इस नतीजे पर वाकई ही पहुंच चुकी है तो क्यों नहीं खुली घोषणा कर देता कि संघ और भाजपा 2014 का लोकसभा चुनाव नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ेगा? श्री नरेन्द्र मोदी की छवि कट्टर हिन्दुत्व की है। अटल जी की छवि और मोदी की छवि में बहुत फर्प है। अटल जी सबको साथ लेकर चलते थे। मोदी के काम करने का अपना ही ढंग है, यह न तो कार्यकर्ता की परवाह करते हैं, न नेता की और न ही संघ की। उनकी महत्वाकांक्षाएं अब संघ और भाजपा से ऊपर हो गई हैं। वह इनको कुछ नहीं समझते। कल तक इन्हीं गडकरी साहब की मोदी से अनबन थी पर अब संघ के इशारे पर गडकरी को मोदी से समझौता करना पड़ा है और इस सौदे की गडकरी को क्या कीमत देनी पड़ी है संजय जोशी के केस से पता चलता है। हमें लगता यह है कि संघ मोदी को आडवाणी के खिलाफ खड़ा कर रहा है। आडवाणी को किनारे लगाने के लिए संघ किसी भी हद तक जा सकता है। जब संघ को यह विश्वास हो गया कि अब अटल जी राजनीति में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकते तो उसने आडवाणी की काट करनी आरम्भ कर दी और विडम्बना यह है कि खुद श्री आडवाणी ने उन्हें बहाना भी गलती से दे दिया। मैं जिन्ना के बयान की बात कर रहा हूं। कभी राजनाथ सिंह को आगे करके तो कभी दूसरी पंक्तियों के नेताओं को उकसा कर आडवाणी को डाउन करने का प्रयास होता रहा। कटु सत्य तो यह है कि आज भी आडवाणी के सामने अन्य सभी भाजपा नेता बौने लगते हैं। नरेन्द्र मोदी बेशक एक काबिल और धाकड़ छवि वाले नेता हैं पर उन्हें भाजपा के अन्दर और बाहर कितना स्वीकार किया जाएगा, यह कहना मुश्किल है। अगर नरेन्द्र मोदी को भावी पीएम प्रोजेक्ट किया जाता है तो भाजपा में ही घमासान मच जाएगा। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, डाक्टर मुरली मनोहर जोशी सभी अपने दावे पेश कर सकते हैं। फिर राजग के दूसरे घटक दलों जिनमें नीतीश कुमार, बाल ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल जैसे दिग्गज प्रमुख हैं, क्या मोदी को स्वीकार करेंगे? आडवाणी जी ऐसे नेता हैं जिनकी छतरी के नीचे राजग सहयोगी दल संगठित हो सकते हैं। कांग्रेस के खिलाफ माहौल इतना खराब है कि क्या कह सकते हैं शायद मुसलमान भी मोदी की जगह आडवाणी का समर्थन कर दें? पर आडवाणी के ऊंचे कद के बावजूद आरएसएस उन्हें डाउन करने के लिए किसी हद तक जाने को तैयार है। पहले राजनाथ सिंह को खड़ा किया गया, वह फेल हो गए अब नरेन्द्र मोदी को खड़ा किया जा रहा है यानि संघ ऐसा करने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार है पर संघ अपने ही बुने जाल में फंसता नजर आ रहा है और आडवाणी के खिलाफ मोदी को विकल्प के रूप में आगे करने की रणनीति संघ के ही खिलाफ साबित हो रही है। अब संघ को यह समझ नहीं आ रहा है कि वह मोदी की शर्तों को अस्वीकार कैसे करे? विवश होकर संघ मोदी से ब्लैकमेल हो रहा है। असल में संघ को यह अनुमान शायद नहीं था कि नरेन्द्र मोदी अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक ही राजनीति करेंगे। उन्होंने अपनी राजनीतिक दबंगई से जिस तरह प्रवीण तोगड़िया सरीखे के संघ के नेताओं को प्रभावहीन बना दिया उसी तरह अपने विरोधियों को षड्यंत्र और राजनीतिक सौदेबाजी के तहत निपटाने में संकोच नहीं किया। नरेन्द्र मोदी की इस दबंगई की वजह से आज पूरी दुनिया में भाजपा की छवि मुस्लिम विरोधी और दंगाई की बनी हुई है। हिन्दुत्व के झंडाबरदारों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि देश में उदार हिन्दुत्व तो ठीक है किन्तु हिंसक एवं कट्टर हिन्दुत्व का समर्थन बहुसंख्य हिन्दू भी नहीं करते। इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं कि केंद्रीय राजनीति में मोदी प्रासंगिक और स्वीकार्य हों? भारत गुजरात नहीं। राज्य में जो चले यह जरूरी नहीं कि पूरे देश में भी वही चले। अभी तो संघ की गलत रणनीति के दुष्परिणाम की शुरुआत है। उसने भाजपा के परम्परागत सिस्टम के खिलाफ जो प्रयोग शुरू किया उसकी विकृति स्वरूप परिणाम भी आने शुरू हो गए हैं। सरल भाषा में कहें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेन्द्र मोदी को भस्मासुर के रूप में तैयार कर दिया है। किन्तु जैसा कि संघ से जुड़ी पत्र-पत्रिकाएं एवं नेता नरेन्द्र मोदी को लगातार नसीहतें दे रहे हैं, उसे छोड़ें और अपना दिल बड़ा करें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भाजपा में अब संगठन पहले नेता बाद में का सिद्धांत समाप्त हो गया है। अब भाजपा संघ की प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी बन चुकी है जिसके एमडी नितिन गडकरी हैं और यह पार्टी को अपनी निजी कम्पनी की तरह चला रहे हैं। मात्र दो सीटों से लोकसभा में भाजपा को पौने दो सौ तक पहुंचाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी की तुलना में नरेन्द्र मोदी कितने सफल साबित होंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा किन्तु इतना तो तय है कि मोदी को भाजपा के अन्दर ही कई मोर्चों पर जूझना पड़ेगा। अभी लोकसभा चुनाव में दो वर्ष शेष हैं, ऐसी हालत में संघ की आडवाणी विरोधी मुहिम भी पिट सकती है। आडवाणी जी को संघ और भाजपा मिलकर भी चाहे जितना पीछे धकेलने की कोशिश करे किन्तु वास्तविकता तो यही है कि उनके सामने गडकरी और नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर दोनों में इन दोनों का व्यक्तित्व बौना लगता है। अगर आने वाले दिनों में यदि आडवाणी ने भाजपा से ही किनारा कर लिया तो पार्टी में विभाजन तक हो सकता है क्योंकि संघ की घटिया राजनीति की वजह से भाजपा का कोई भी नेता दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहा है और इसीलिए पार्टी में कई गुट सक्रिय हैं। जाहिर है कि इन गुटों का परस्पर संघर्ष पार्टी को कमजोर ही करेगा और यदि अंतर्पलह के कारण 2014 में भाजपा को मात मिलती है तो इसके लिए पूरी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार होगा। यदि संघ को भाजपा की चिन्ता होती तो वह पार्टी में उठापटक कराने के लिए आडवाणी के खिलाफ दूसरी पंक्ति के नेताओं को उकसाने और एकजुट करने का काम नहीं करता। यदि उसको जरा भी राजनीतिक समझ होती तो क्रम परम्परा, अटल जी के बाद आडवाणी जी और उनके बाद डॉ. मुरली मनोहर जोशी, से छेड़छाड़ न करता। सच तो यह है कि अब संघ खुद भी दिग्भ्रमित और अविश्वसनीय होता जा रहा है। एक वक्त था जब लोग मानते थे कि यदि भाजपा इतनी अनुशासित है तो संघ कितना अनुशासित होगा। लेकिन अब लोग भाजपा और संघ में कोई अन्तर नहीं करते, लोग अब दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू मान रहे हैं। अब फैसला संघ को करना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा चुनाव लड़ेगी या नरेन्द्र मोदी के?
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Friday, 13 April 2012

क्या नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत उम्मीदवार हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13 April 2012
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर सुर्खियों में हैं। देश के अन्दर तो उनकी इतनी चर्चा नहीं हो रही जितनी विदेशों में है। अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट के स्तम्भकार सीमोन डेयनार ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 के आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के सबसे सशक्त दावेदार होंगे। भारत में काफी लोग उन्हें रोल मॉडल के रूप में देखते हैं। कुछ लोगों की नजर में वह देश के सबसे योग्य नेता हैं। हालांकि एक बड़ा वर्ग आज भी उन्हें मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार के लिए माफ नहीं कर पाया है। रिपोर्ट में लिखा है कि नरेन्द्र मोदी को भारत की राजनीति में सबसे जटिल व्यक्तित्व वाला राजनेता माना जा सकता है। मोदी की अगुवाई में गुजरात जैसे राज्य की अर्थव्यवस्था ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। लेकिन मुख्यमंत्री की हिन्दू राष्ट्रवादी छवि से काफी लोगों को लगता है कि उनके नेतृत्व में कट्टर धार्मिक शक्तियों को बल मिलेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी जैसे नेता की अगुवाई में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पुरानी सैक्यूलर छवि को धक्का लग सकता है। नरेन्द्र मोदी को राज्य में भ्रष्टाचार खत्म करने के साथ आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति देने का श्रेय जाता है। तेजी से आगे बढ़ती गुजरात की अर्थव्यवस्था में न सिर्प देशी कम्पनियां बल्कि बड़ी संख्या में विदेशी कम्पनियों ने भी गुजरात में निवेश किया है। मोदी के आलोचक भी उन्हें निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं मानते। साल 2014 में होने वाले आम चुनाव के बाद भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार हो सकते हैं नरेन्द्र मोदी।
श्री नरेन्द्र मोदी की इस प्रकार की प्रोजेक्शन से जहां मुसलमान समुदाय परेशान है वहीं उनकी अपनी पार्टी के कुछ लोग भी खुश नहीं हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच मोदी को मिल रहे व्यापक समर्थन के चलते संघ परिवार के भीतर भी समीकरण बदल रहे हैं। इसका कारण है कि संघ की प्रवासी भारतीयों में गहरी पैठ है। अमेरिका, चीन और जापान का उद्योग क्षेत्र मोदी के साथ व्यापारिक संबंधों को बेहतर बनाने में लगा है। हालांकि भाजपा और संघ का एक बड़ा वर्ग मोदी को किनारे लगाने में लगा है ताकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताकतवर होकर न उभर पाएं। इसलिए संगठन स्तर पर मोदी की छवि खलनायक वाली बनाने की भी कोशिश हो रही है और कुछ हद तक मोदी खुद ऐसी छवि बनाने के लिए बारूद दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार न करना और पिछले वर्ष दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में न आना मोदी की संगठन विरोधी गतिविधियों को दर्शाता है। बहुत से भाजपाइयों का कहना है कि मोदी अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। मोदी के दिमाग में अब गरूर आ गया है। दुनिया के 100 प्रभावशालियों के लिए कराए जा रहे टाइम्स पत्रिका के सर्वे में मोदी ने ओबामा और ब्लादिमीर पुतिन को पछाड़ दिया है। माना जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन देश-विदेश में हो रहे सर्वेक्षणों में लोकप्रियता के हिसाब से नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी से पीछे हैं।
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Sunday, 25 March 2012

उपचुनावों के परिणाम कांग्रेस और भाजपा के लिए चिन्ता पैदा करते हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 March 2012
अनिल नरेन्द्र
ताजा उपचुनावों के नतीजे अगर कांग्रेस के लिए चिन्ता का विषय थे तो आंध्र प्रदेश की सात विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में उसके सूपड़ा साफ होने की खबर तो पार्टी के लिए अशुभ संकेत है। यह उपचुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए भी अच्छे संकेत नहीं दे रहे। गुजरात को भाजपा अपना गढ़ मानती है और कर्नाटक में भी वह करीब चार साल से सत्ता में है। लेकिन इन राज्यों में उसे हार का मुंह देखना पड़ा है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस और भाजपा ही प्रमुख प्रतिद्वंद्वी हैं, इसलिए भी यह पराजय भाजपा के लिए अधिक तकलीफदेह साबित हो सकती है। कर्नाटक की उडुपी-चिकमंगलूर लोकसभा सीट मुख्यमंत्री सदानन्द गौड़ा की थी। मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था। जाहिर है इस सीट को बरकरार रखना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल था। मगर यहां उसे कांग्रेस के हाथों 45,000 से ज्यादा वोटों से मात खानी पड़ी। साफ है कि सत्ता की खातिर पार्टी के भीतर चल रही जोड़-तोड़, कलह, भ्रष्टाचार के आरोपों और विधानसभा में अश्लील वीडियो देखे जाने की घटना से खराब हुई छवि का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है। अनुशासन का दम भरने वाली पार्टी के लिए आज अनुशासनहीनता ही सबसे बड़ी समस्या बन गई है। गुजरात में मानसा विधानसभा सीट भाजपा के हाथ से निकलकर कांग्रेस की झोली में आना मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भी झटका है। गौरतलब यह भी है कि मानसा विधानसभा सीट गांधी नगर लोकसभा क्षेत्र में आती है जिसका प्रतिनिधित्व लाल कृष्ण आडवाणी करते हैं। लेकिन यह पहला मौका नहीं जब भाजपा के इस गढ़ में सेंध लगाने में कांग्रेस को कामयाबी मिली है। पिछले साल नवम्बर में नगर निकाय चुनाव में भी भाजपा की दुर्गति हुई थी। इस साल के अन्त में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए मानसा की हार जहां नरेन्द्र मोदी के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए वहीं कांग्रेस जरूर इससे उत्साहित होगी। आंध्र प्रदेश कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा गढ़ रहा है। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने यहां 95 फीसदी सीटें जीतकर राजनीति के पंडितों को चकरा दिया था। लेकिन इसके करिश्माई नेता स्वर्गीय राजशेखर रेड्डी की अकस्मात मृत्यु और उनके पुत्र जगन मोहन रेड्डी के कांग्रेस से अलग होने के बाद उसका पराभाव शुरू हो गया। इसके बाद राज्य में 17 विधानसभा और दो लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हो चुके हैं जिसमें सत्ताधारी कांग्रेस का पूरी तरह सूपड़ा साफ हुआ है। जहां कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई वहीं भाजपा जैसी पार्टी जिसका सूबे में ज्यादा असर नहीं है वह भी तीन सीटें जीत चुकी है। केंद्र सरकार में बड़े घोटालों के खुलासे के बाद कांग्रेस को महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली में हुए उपचुनावों में भी जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा है जहां उसकी सरकारें हैं। चन्द रोज पहले ही मुंबई नगर निगम के चुनावों में भी उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा था यानि हर उस जगह से कांग्रेस को बुरी खबर मिल रही है जहां उसके पास अच्छी ताकत है। केरल में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के सहयोगी दल कांग्रेस (जेकब) ने अपनी सीट बरकरार रखी। यह परिणाम कांग्रेस के लिए खास महत्व रखता है क्योंकि राज्य में उसके नेतृत्व वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार मामूली बहुमत पर टिकी है। तमिलनाडु और उड़ीसा में भी एक-एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में गए हैं। वैसे उपचुनाव परिणाम को हर हाल में आम रुझान का संकेत तो नहीं माना जा सकता पर कई राज्यों से वहां के मतदाताओं के मिजाज का जरूर कुछ संकेत मिलता ही है और यह संकेत न तो कांग्रेस के लिए अच्छे हैं और न ही भारतीय जनता पार्टी के लिए।
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Sunday, 19 June 2011

क्या इतने अनुकूल माहौल का भाजपा फायदा उठा पाएगी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th June 2011
अनिल नरेन्द्र

किसी भी विपक्षी दल के लिए न तो यूपीए सरकार से बेहतर और कोई सत्तारूढ़ सरकार हो सकती थी और न ही इतना खराब राजनीतिक माहौल जितना मनमोहन सिंह सरकार ने कर दिया है। कोई भी विपक्षी दल ऐसे राजनीतिक माहौल का इंतजार करता रहता है जब इतनी विवादास्पद केंद्र सरकार हो जितनी यह सरकार है। इस सरकार ने देश को क्या-क्या नहीं दिया? बढ़ती कीमतें, महंगाई, एक के बाद एक घोटाला, आतंकवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे पर ढुलमुल नीति, नक्सलियों से रणनीति व इच्छाशक्ति का अभाव, तानाशाह रवैया इत्यादि इत्यादि। कहने का मतलब है कि भारतीय जनता पार्टी जो प्रमुख विपक्षी दल है वह इससे बेहतर राजनीतिक वातावरण की उम्मीद नहीं कर सकती थी। खुद भाजपा नेता अरुण जेटली कहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि नौकरशाह चला रहे हैं। आजादी के बाद की इतनी भ्रष्ट, निकम्मी और कूर सरकार जनता ने पहले कभी नहीं देखी थी। यह सरकार अपने पांच वर्ष पूरे नहीं करेगी क्यों जनता अब कांग्रेस सरकार को फूटी आंख भी देखना नहीं चाहती है। यह कड़ी टिप्पणी राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरुण जेटली ने प्रदेश भाजपा द्वारा आयोजित संघर्ष के एक वर्ष कार्यक्रम में हाल में कही। जेटली ने कहा कि भाजपा को आंदोलन करने का शौक नहीं है पर मनमोहन सिंह सरकार रोज एक के बाद एक ऐसी गम्भीर गलतियां कर रही है कि भाजपा को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। देश को ऐसा प्रधानमंत्री चला रहा है जो अदृश्य है। पर्दे के पीछे सत्ता की बागडोर किन्हीं अन्य हाथों में है, इतिहास में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता, जहां सो रहे हजारों निहत्थे लोगों पर रात के अंधेरे में पुलिस टूट पड़ती हो, सोते हुए महिलाओं और बच्चों पर लाठियां बरसाई जाएं, आंसू गैस के गोले दागे जाएं। बन्द पंडाल में कहीं भी आंसू गैस के गोले नहीं छोड़े जाते हैं। जेटली ने इस सरकार को हैडलैस चिकन कहा। इसका मतलब है कि इस सरकार का कोई सिर-पैर नहीं, कोई वालीवारिस नहीं है।
मनमोहन सिंह सरकार का जो खाका जेटली साहब ने खींचा है वह बहुत हद तक सही है पर सवाल यह उठता है कि जब मनमोहन सिंह सरकार की इतनी बुरी दशा बन गई है तो इसका राजनीतिक लाभ क्या प्रमुख विपक्षी दल के नाते भारतीय जनता पार्टी उठा पा रही है? हमने देखा कि भाजपा विपक्ष में होते हुए भी विपक्ष की भूमिका सही तरीके से नहीं निभा पाई। मैं यूपीए-1 की बात कर रहा हूं। तब भाजपा नहीं वाम दल प्रमुख विपक्ष की भूमिका बेहतर निभा रहे थे। यूपीए-2 में तो कामरेड मौजूद नहीं और सारा विपक्षी दारोमदार भाजपा पर ही आ जाता है पर ईमानदारी से भाजपा नेताओं को प्रश्न करना होगा कि क्यों नहीं वह स्थितियों का फायदा उठा पा रहे हैं? क्या कारण हैं कि इतना अनुकूल माहौल होने के बावजूद आज जनता में वह इतना विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे कि जनता उन्हें केंद्र में सत्ता सौंपने की हिम्मत जुटाए? इसमें कोई शक नहीं कि राज्यों में भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही हैं, उनकी छवि भी अच्छी है और जनता को कहने को वह कह सकते हैं कि हम केंद्र में भी ऐसा शासन दे सकते हैं तावक्ते कि आप हमें मौका दें पर राज्यों में अगर भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही हैं तो उसका मुख्य कारण है मजबूत नेतृत्व। हर राज्य में एक मजबूत मुख्यमंत्री है और उसी मुख्यमंत्री के रहते, उसकी वजह से ही राज्य में अच्छा शासन चल रहा है। गुजरात में नरेन्द्र मोदी, मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान, उत्तराखंड में रमेश चन्द्र पोखरियाल निशंक इत्यादि। इनकी व्यक्तिगत छवि और दृष्टि, कारगुजारी ही अच्छे शासन की प्रमुख वजह है न कि केंद्रीय नेतृत्व। केंद्र में तो भाजपा नेतृत्व न के बराबर है। दुःख से कहना पड़ता है कि यह दूसरी पंक्ति के युवा नेता आपस में ही एक-दूसरे की काट करने से नहीं बाज आते। न तो इनकी नजरों में पार्टी का कोई महत्व है और न ही इन्हें इस बात की परवाह है कि कार्यकर्ता क्या सोचता है, जनता की तो बात छोड़ो। इनके अपने-अपने निजी एजेंडे पार्टी एजेंडे से ऊपर हैं। निजी महत्वाकांक्षाएं संगठित ढंग से काम करने में आड़े आ रही है। यही वजह है कि इतना अच्छा माहौल होने के बावजूद आज जनता में यह वह विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे जो करना चाहिए था। अटल जी आडवाणी जी के नेतृत्व में भाजपा ने सुनहरा युग देखा। उनके रहते पार्टी, पार्टी लगती थी, उनकी अपनी छवि थी, कार्यकर्ताओं से वह जुड़े थे, जनता की नब्ज को समझते थे पर आज का नेतृत्व अपने एयरकंडीशन कमरों में ही अपना गुणगान कर अंक बढ़ाता रहता है।
दुःख की बात है पर सच यही है कि आज भारत की जनता का सभी राजनीतिक दलों से, नेताओं से विश्वास उठ चुका है। उसकी नजरों में सभी एक समान हैं यानि कि हमाम में सब नंगे हैं। वह भाजपा से जानना चाहती है कि जो समस्याएं आज देश के सामने मुंह फाड़ रही हैं उनसे अगर उन्हें मौका मिले तो वह कैसे निपटेंगे? वह जानना चाहती है कि भाजपा नेतृत्व कौन-कौन से ऐसे कदम उठाएगा जिससे घोटाले रुकें, कीमतों पर नियंत्रण हो, महंगाई कम हो, बेरोजगारी घटे, कानून-व्यवस्था सुधरे, बिजली-पानी जैसी ज्वलंत समस्याओं का समाधान हो? क्यों जनता इन पर ज्यादा विश्वास करे? यह है कि कुछ प्रश्न जिनका मेरी राय में भाजपा नेतृत्व को जवाब देना होगा। जनता को बताना होगा कि अगर आप हमें सत्ता में लाएं तो हम आपकी इन समस्याओं का ऐसे समाधान करेंगे पर इसके लिए सबसे पहले भाजपा को अपना घर साधना होगा। उसे सही नेतृत्व तय करना होगा। अपनी प्राथमिकताएं सही करनी होंगी। अब तो भाजपा यह भी नहीं कह सकती कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनके कामकाज में दखलंदाजी करता है। संघ जब से मोहन भागवत के हाथ आया है, राजनीति से कुछ हद तक अलग हो गया है, अब संघ रोजमर्रा के मामलों में दखल नहीं देता। हो सकता है कि भाजपा के कुछ नेताओं को मेरे विचार अच्छे न लगें पर उन्हें समझना चाहिए कि मैं जो कुछ कह रहा हूं यह एक तरह से जनता की आवाज है और आज बहुत से लोग यह चाहते हैं कि भाजपा पहले अपना घर ठीक करे ताकि जल्द आने वाले मौके का पूरा-पूरा फायदा उठा सके।
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