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Sunday, 25 March 2012

उपचुनावों के परिणाम कांग्रेस और भाजपा के लिए चिन्ता पैदा करते हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 March 2012
अनिल नरेन्द्र
ताजा उपचुनावों के नतीजे अगर कांग्रेस के लिए चिन्ता का विषय थे तो आंध्र प्रदेश की सात विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में उसके सूपड़ा साफ होने की खबर तो पार्टी के लिए अशुभ संकेत है। यह उपचुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए भी अच्छे संकेत नहीं दे रहे। गुजरात को भाजपा अपना गढ़ मानती है और कर्नाटक में भी वह करीब चार साल से सत्ता में है। लेकिन इन राज्यों में उसे हार का मुंह देखना पड़ा है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस और भाजपा ही प्रमुख प्रतिद्वंद्वी हैं, इसलिए भी यह पराजय भाजपा के लिए अधिक तकलीफदेह साबित हो सकती है। कर्नाटक की उडुपी-चिकमंगलूर लोकसभा सीट मुख्यमंत्री सदानन्द गौड़ा की थी। मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था। जाहिर है इस सीट को बरकरार रखना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल था। मगर यहां उसे कांग्रेस के हाथों 45,000 से ज्यादा वोटों से मात खानी पड़ी। साफ है कि सत्ता की खातिर पार्टी के भीतर चल रही जोड़-तोड़, कलह, भ्रष्टाचार के आरोपों और विधानसभा में अश्लील वीडियो देखे जाने की घटना से खराब हुई छवि का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है। अनुशासन का दम भरने वाली पार्टी के लिए आज अनुशासनहीनता ही सबसे बड़ी समस्या बन गई है। गुजरात में मानसा विधानसभा सीट भाजपा के हाथ से निकलकर कांग्रेस की झोली में आना मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भी झटका है। गौरतलब यह भी है कि मानसा विधानसभा सीट गांधी नगर लोकसभा क्षेत्र में आती है जिसका प्रतिनिधित्व लाल कृष्ण आडवाणी करते हैं। लेकिन यह पहला मौका नहीं जब भाजपा के इस गढ़ में सेंध लगाने में कांग्रेस को कामयाबी मिली है। पिछले साल नवम्बर में नगर निकाय चुनाव में भी भाजपा की दुर्गति हुई थी। इस साल के अन्त में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए मानसा की हार जहां नरेन्द्र मोदी के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए वहीं कांग्रेस जरूर इससे उत्साहित होगी। आंध्र प्रदेश कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा गढ़ रहा है। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने यहां 95 फीसदी सीटें जीतकर राजनीति के पंडितों को चकरा दिया था। लेकिन इसके करिश्माई नेता स्वर्गीय राजशेखर रेड्डी की अकस्मात मृत्यु और उनके पुत्र जगन मोहन रेड्डी के कांग्रेस से अलग होने के बाद उसका पराभाव शुरू हो गया। इसके बाद राज्य में 17 विधानसभा और दो लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हो चुके हैं जिसमें सत्ताधारी कांग्रेस का पूरी तरह सूपड़ा साफ हुआ है। जहां कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई वहीं भाजपा जैसी पार्टी जिसका सूबे में ज्यादा असर नहीं है वह भी तीन सीटें जीत चुकी है। केंद्र सरकार में बड़े घोटालों के खुलासे के बाद कांग्रेस को महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली में हुए उपचुनावों में भी जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा है जहां उसकी सरकारें हैं। चन्द रोज पहले ही मुंबई नगर निगम के चुनावों में भी उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा था यानि हर उस जगह से कांग्रेस को बुरी खबर मिल रही है जहां उसके पास अच्छी ताकत है। केरल में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के सहयोगी दल कांग्रेस (जेकब) ने अपनी सीट बरकरार रखी। यह परिणाम कांग्रेस के लिए खास महत्व रखता है क्योंकि राज्य में उसके नेतृत्व वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार मामूली बहुमत पर टिकी है। तमिलनाडु और उड़ीसा में भी एक-एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में गए हैं। वैसे उपचुनाव परिणाम को हर हाल में आम रुझान का संकेत तो नहीं माना जा सकता पर कई राज्यों से वहां के मतदाताओं के मिजाज का जरूर कुछ संकेत मिलता ही है और यह संकेत न तो कांग्रेस के लिए अच्छे हैं और न ही भारतीय जनता पार्टी के लिए।
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Wednesday, 29 February 2012

बागी येदियुरप्पा बने गडकरी का सिरदर्द

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th February  2012
अनिल नरेन्द्र
कर्नाटक में भाजपा के सामने विकट स्थिति खड़ी हो गई है। अभी विधानसभा में तीन सांसदों का सदन के अन्दर अश्लील फिल्में देखने का मामला थमा नहीं कि पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने नया हंगामा खड़ा कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने अपनी पुनर्नियुक्ति किए जाने पर खुली बगावत कर दी है। उधर भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने उनकी धमकियों की परवाह न करते हुए साफ कह दिया है कि कर्नाटक में कोई संकट नहीं है और राज्य में मौजूदा मुख्यमंत्री डीवी सदानन्द गौड़ा को बदलने की सम्भावना से इंकार कर दिया है। हालांकि गडकरी ने खिन्न चल रहे येदियुरप्पा को यह कहकर संतुष्ट करने का प्रयास किया कि पार्टी उनका सम्मान करती है। गडकरी ने कहा कि सदानन्द गौड़ा फिलहाल सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। नेतृत्व में बदलाव का सवाल ही नहीं उठता। येदियुरप्पा ने अपनी शक्ति-प्रदर्शन के तहत विधायकों, विधान पार्षदों और सांसदों के लिए दोपहर भोज का आयोजन भी किया। सोमवार को येदियुरप्पा ने बेंगलुरु में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि पिछले साल जब उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए कहा था तब पार्टी आलाकमान ने छह माह में फिर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था। पहले पार्टी नेतृत्व को 27 फरवरी तक खुद को मुख्यमंत्री बनाने का समय देने वाले येदियुरप्पा ने कहा, `मैं मुख्यमंत्री पद का आकांक्षी नहीं हूं। चूंकि केंद्रीय नेतृत्व ने मुझे छह माह बाद फिर मुख्यमंत्री पद पर बैठाने का वादा किया था इसलिए मैं अपनी कुर्सी पाने के लिए दिल्ली गया था।' येदियुरप्पा अपने 70वें जन्मदिन पर पिछड़ा वर्ग फोरम की ओर से आयोजित बैठक को सम्बोधित कर रहे थे। केंद्रीय नेतृत्व से नाराज पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वह नेतृत्व परिवर्तन का मुद्दा सुलझाने के लिए दिल्ली में तीन मार्च को आयोजित भाजपा कोर कमेटी की बैठक में भाग नहीं लेंगे। उसकी जगह वह पूरे राज्य का दौरा करेंगे ताकि पार्टी मजबूत हो। खबर तो यह भी है कि कुछ कांग्रेसी नेता भाजपा को झटका देने के लिए बागी येदियुरप्पा को कांग्रेस में शामिल कराने की जोरदार पैरवी में लग गए हैं। कांग्रेस में आने की बातचीत भी येदियुरप्पा से की गई है। लेकिन 10 जनपथ ने कर्नाटक के अपने नेताओं को साफ सन्देश भेज दिया है कि भ्रष्टाचार के कीचड़ में सने येदियुरप्पा को किसी हालत में कांग्रेस में एंट्री नहीं दी जा सकती। सूत्रों के अनुसार एक पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता येदियुरप्पा के सन्दर्भ में एक राजनीतिक प्रस्ताव लेकर आए थे। उन्होंने पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों को भी इसके लिए तैयार कर लिया था कि यदि येदियुरप्पा को कांग्रेस में लिया जाए तो राज्य में भाजपा हमेशा के लिए कमजोर हो जाएगी पर हाई कमान इसके लिए तैयार नहीं है। जो लोग प्रस्ताव की पैरवी कर रहे थे उन्हें डांट पड़ी है। उनसे कहा गया है कि अरबों रुपये के भ्रष्टाचार में शामिल येदियुरप्पा को कांग्रेस में ले लिया गया तो इससे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए गलत सन्देश जाएगा। भाजपा नेतृत्व के लिए कर्नाटक एक चुनौती बन गई है। दक्षिण भारत में एकमात्र भाजपा सरकार को बचाने के लिए पार्टी नेतृत्व को इस मामले को जल्द से जल्द सुलझाना पार्टी हित में ही होगा। सत्ता के भूखे येदियुरप्पा को कैसे कंट्रोल किया जाए, यह गडकरी के लिए एक चुनौती है।
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Friday, 10 February 2012

कर्नाटक विधानसभा में डर्टी पिक्चर का किस्सा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th February  2012
अनिल नरेन्द्र
भाजपा शासित कर्नाटक सरकार ने एक बार फिर पार्टी की जमकर फजीहत करवा दी, वह भी ऐसे समय जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के वोट डलने शुरू हो गए हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की झंडाबरदार इस पार्टी को कर्नाटक के आला नेताओं ने खासा करारा झटका दे दिया है। सरकार के तीन मंत्री विधानसभा में नंगी लड़कियों की तस्वीरें यानि ब्लू फिल्म देखते पकड़े गए। एक स्थानीय टीवी चैनल ने अपने कैमरे में इन तीन मंत्रियों की करतूत पकड़ी। इससे जमकर हंगामा हुआ। उत्तर प्रदेश के चुनावों को देखते हुए पार्टी आला कमान ने बगैर देरी के तीनों के इस्तीफे मांग लिए जो मंजूर भी हो गए हैं। कर्नाटक विधानसभा में मंगलवार को जिस समय पाकिस्तानी झंडा फहराने पर बहस हो रही थी, ठीक उसी समय में मंत्रिगण अपने मोबाइल की क्लिपिंग देख रहे थे। यही नहीं, कुछ हॉट तस्वीरें देखकर यह एक-दूसरे से अश्लील इशारे भी कर रहे थे। यह सब हरकतें कैमरे में दर्ज हो गईं। स्थानीय चैनल ने इनमें से कुछ तस्वीरें प्रसारित भी कर दीं। शर्मसार कर देने वाली इस घटना के एक दिन पहले ही इस बात को लेकर बहस जारी थी कि सरकार ने मंगलौर के समुद्र तट पर `रेव पार्टी' की इजाजत कैसे दी? आरोप लगा था कि पर्यटन के बढ़ावे के नाम पर सरकार ने इस अश्लील `रेव पार्टी' की इजाजत दे दी। इस पार्टी में ड्रग्स व शराब का खुलकर इस्तेमाल किया गया। पार्टी में कई विदेशी लड़कियों ने अपने कपड़े उतारकर जश्न मनाया था। इसकी तस्वीरें भी एक चैनल के कैमरे में आ गई थीं। इसी बीच चाल-चरित्र और चेहरे की दुहाई देने वाली पार्टी के मंत्रियों ने विधानसभा परिसर में ही `डर्टी पिक्चर' देखकर एक नया रिकार्ड बनाया है। इस विवाद के चलते यूपी में पार्टी की छवि को धक्का लग सकता है। इस प्रकरण में शर्मसार भाजपा नेतृत्व ने पार्टी की छवि को हुए नुकसान कम करने हेतु सहकारिता मंत्री लक्ष्मण सावदी व महिला एवं बाल विकास मंत्री सीसी पाटिल को पद छोड़ने के लिए कहा जबकि विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री कृष्णा पालेमार, दोनों मंत्रियों को कथित रूप से ब्लू फिल्म देने के लिए बर्खास्त कर दिया। इस साल एक जनवरी को बीजापुर जिले में पाकिस्तानी झंडा फहराने पर मंगलवार को बहस चल रही थी उसी समय सावदी और पाटिल मोबाइल पर अश्लील वीडियो फुटेज देख रहे थे। सूत्रों के अनुसार मंत्रियों के इस्तीफे लेने का दबाव मंगलवार रात में लाल कृष्ण आडवाणी ने बनाया था। इसके बाद पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तीनों से इस्तीफे मांग लिए थे। आला कमान ने मुख्यमंत्री से कह दिया था कि आधी रात तक तीनों मंत्रियों के इस्तीफे नहीं आते तो इन्हें बर्खास्त कर दिया जाए। दिल्ली से आए इस फरमान के बाद ही तीनों ने आधी रात के बाद इस्तीफा भेजा था। वैसे कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने मीडिया से कहा कि मंत्रियों के इस्तीफे के बाद और चमत्कार हो जाएगा क्योंकि महज कुछ तस्वीरें देखने के लिए हमने अपने मंत्रियों को इतनी बड़ी सजा दे दी है। येदियुरप्पा की इस टिप्पणी को लेकर दिल्ली में भाजपा के कई बड़े नेता हैरान हैं। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा है कि वे अनैतिक आचरण करने वाले अपने किसी नेता को रियायत नहीं देने वाले जबकि कांग्रेस ऐसी हिम्मत नहीं दिखाती।
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Sunday, 31 July 2011

कांग्रेस पर येदियुरप्पा की विदाई भारी पड़ सकती है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 31st July 2011
अनिल नरेन्द्र
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफे से कांग्रेस ने भले ही ऊपरी तौर पर खुशी का इजहार किया हो पर अंदरुनी तौर पर उसे भारी चिंता जरूर होगी। अब तक कांग्रेस ने अपने कई मंत्री और मुख्यमंत्रियों को येदियुरप्पा की ओट में बचा रखा था और उनके नाम पर वह अपने घोटालों को न्यायसंगत ठहरा रही थी पर येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद कांग्रेस के कई विकेट गिरने का खतरा मंडराने लगा है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनों को फायदा दिलाने के आरोप में फंसे हैं, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उनके वरिष्ठ मंत्री राजकुमार चौहान पहले से ही लोकायुक्त के निशाने पर हैं। ऐसे में जब मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने अपने एकमात्र आरोपी मुख्यमंत्री को हटा दिया तो कांग्रेस पर भी ऐसे अपने आरोपियों पर कार्रवाई करने का दबाव जरूर बढ़ेगा। एक अगस्त से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में विपक्ष हमलावर हो सकता है। इस दौरान केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की मांग उठ सकती है। 2जी स्पेक्ट्रम एवं लाइसेंस आवंटन घोटाले के आरोप में जेल में बंद पूर्व संचार मंत्री ए. राजा ने अदालत में मोर्चा खोल दिया है। राजा के अलावा पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा के बयान ने भी सरकार को असहज स्थिति में ला दिया है। सरकार को इस मामले में सफाई देनी पड़ रही है। बेहुरा ने कहा कि दिसम्बर 2007 में लाइसेंस फीस को लेकर हुई बैठक में रिजर्व बैंक के गवर्नर सुब्बा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम मौजूद थे। बेहुरा के इस बयान पर गुरुवार को केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल को सफाई देनी पड़ी। विपक्ष अब इन सभी बयानों और सूचनाओं का तारतम्य बिठाने में जुट गया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने पहले ही चिदम्बरम के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। वह चिदम्बरम को भी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का हिस्सेदार बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। हालांकि सरकार भी इस क्रम में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आपरेशन डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। इसके लिए भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक, लोकपाल विधेयक समेत अन्य बिल संसद में पेश किए जाने की रणनीति बनाई जा रही है, ताकि विपक्ष की धार को पुंद किया जा सके। येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद अब कांग्रेस के पास कोई और ऐसा भाजपा का उदाहरण भी नहीं बचा जिससे वह अपना बचाव कर सके।
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Saturday, 30 July 2011

अंतत येदियुरप्पा को जाना ही पड़ा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th July 2011
अनिल नरेन्द्र
अंतत भाजपा हाई कमान ने हिम्मत और बुद्धिमता दिखाई और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को हटाने का फैसला कर ही लिया। येदियुरप्पा ने हालांकि अपनी कुर्सी बचाने के लिए सब तरह के हथकंडे अपना लिए परन्तु आलाकमान के आगे उनकी एक न चली। आला कमान ने बुधवार देर रात ही उन्हें बता दिया कि पार्टी चाहती है कि वे अपना पद छोड़ दें। इसके बाद गुरुवार सुबह संसदीय दल की बैठक में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के बारे में किए गए फैसले पर मोहर लगा दी गई। पार्टी ने येदियुरप्पा को हटाने के बारे में तभी मन बना लिया था, जब लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट के कुछ हिस्से लीक हो गए थे। लेकिन पार्टी चाहती थी कि पहले लोकायुक्त अपनी रिपोर्ट औपचारिक तौर पर सरकार के सुपुर्द कर दें। रिपोर्ट सुपुर्द करने के फौरन बाद ही येदियुरप्पा को दिल्ली तलब किया गया और उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा गया। येदियुरप्पा बिना इस्तीफा दिए बेंगलुरु पहुंच गए। बेंगलुरु पहुंचने पर येदियुरप्पा ने अपनी ताकत आजमाने के लिए विधायकों व मंत्रियों की बैठक बुलाई जिसमें उनके हाथ निराशा ही लगी। उनकी बुलाई बैठक में कुल 13 विधायक ही पहुंचे। दरअसल भाजपा हाईकमान येदियुरप्पा की चाल को समझ गए थे। इधर येदियुरप्पा दिल्ली से खिसके उधर नितिन गडकरी ने विधायकों को येदियुरप्पा से दूरी बनाने को फोन कर दिया। मंत्रियों को साफ कहा गया कि अगर उन्होंने येदियुरप्पा का अब भी साथ दिया तो उन्हें अगले मंत्रिमंडल में नहीं लिया जाएगा। हाईकमान ने एम. वेंकैया नायडू को `ऑपरेशन येदियुरप्पा' के लिए बेंगलुरु रवाना कर दिया। पार्टी के कड़े रुख को देखते हुए येदियुरप्पा ने पद छोड़ने का फैसला किया और कहा कि वह 31 जुलाई को त्यागपत्र देंगे। उन्होंने बताया कि वह 31 जुलाई को इस्तीफा देंगे क्योंकि 31 जुलाई को शुक्ल पक्ष शुरू हो रहा है क्योंकि 30 जुलाई को अमावस्या है और ज्योतिषियों ने उन्हें शुभ मुहूर्त में इस्तीफा देने की सलाह दी है।
येदियुरप्पा ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर सांसद सदानन्द गौड़ा का नाम सुझाया है, लेकिन पार्टी शुक्रवार को होने वाली विधान मंडल की बैठक में ही नेता का फैसला करेगी। दिल्ली से अरुण जेटली और राजनाथ सिंह को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जा रहा है। मुख्यमंत्री के दावेदारों में के. ईश्वरप्पा, बीएस आचार्य, सुरेश कुमार और अनन्त कुमार भी दावेदार हैं। येदियुरप्पा लिंगायत हैं। कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अपनी इस जाति के ताकत पर ही येदियुरप्पा हाईकमान को ब्लैकमेल कर रहे थे। राज्य की कुल आबादी में लिंगात करीब 27 प्रतिशत हैं जबकि लिंगात के बाद दूसरे स्थान पर वोकलिंग हैं जो 17 प्रतिशत हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा वोकलिंग समुदाय से हैं। हाल के वर्षों में येदियुरप्पा लिंगात समुदाय के बड़े नेता के तौर पर उभरकर सामने आए। कर्नाटक भाजपा विधायक दल में ही 35 से ज्यादा विधायक लिंगायत जाति के हैं। विधायकों के बलबूते पर ही विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव या पंचायत चुनाव, लिगांत कार्ड खेलकर येदियुरप्पा भाजपा को चुनाव जिताने के साथ-साथ अपनी भी जड़ें जमाते रहे। भाजपा को उत्तराधिकारी चुनते समय कर्नाटक के जातीय समीकरण का जरूर ध्यान रखना होगा। जहां तक सम्भव हो येदियुरप्पा का उत्तराधिकारी भी लिगांयत समुदाय से ही होगा।
कर्नाटक की राजनीति में एक बहुत बड़ा फैक्टर रेड्डी बंधु हैं। रेड्डी बंधुओं की कहानी किसी किवदंती से कम नहीं लगती। पुलिस कांस्टेबल के बेटे, जिनके पास साइकिल खरीदने की क्षमता थी उनके पास आज अपना हेलीकाप्टर है। राजनीतिक पकड़ ऐसी कि मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी उन्हें किनारे करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उन पर लौह अयस्क के अवैध खनन के गम्भीर आरोप लगे। वे करीब 1500 करोड़ के खनन कारोबारी हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2002 में खनन तथा इसके निर्यात के व्यवसाय में उतरने के बाद उनकी सम्पत्ति अरबों में है। ओबुलापुरम माइनिंग कम्पनी का मालिकाना हक कर्नाटक के पर्यटन मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी के पास है तो येदियुरप्पा सरकार में बड़े भाई जी. करुणाकरण रेड्डी राजस्व मंत्री हैं जबकि छोटे भाई सोमशेखर बेल्लारी से विधानसभा सदस्य हैं। वर्ष 2009 में भी रेड्डी बंधुओं ने येदियुरप्पा के खिलाफ इसलिए विद्रोह कर दिया था कि उन्हें बेल्लारी में मनमाफिक अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार नहीं दिया गया। तब भी सुषमा स्वराज के दखल से मामला सुलझा। भाजपा के शीर्ष नेता कहते रहे हैं कि बेल्लारी में कांग्रेस के गढ़ तोड़ने के लिए भाजपा को उनका सहारा लेना पड़ा। रेड्डी बंधुओं का राजनीतिक उदय बेल्लारी संसदीय सीट से पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के चुनाव लड़ने के दौरान हुआ। भाजपा ने सोनिया के खिलाफ सुषमा स्वराज को मैदान में उतारा था। तब रेड्डी बंधुओं ने सुषमा को `काची' (मां) का दर्जा देते हुए उनकी जीत के लिए हर सम्भव कोशिश की थी पर जीत सोनिया की हुई। रेड्डी बंधुओं के सुषमा स्वराज से संबंधों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं लेकिन हाल ही में सुषमा ने दो टूक शब्दों में यह कह दिया कि रेड्डी बंधुओं से उनका कोई कारोबारी संबंध नहीं है। येदियुरप्पा के उत्तराधिकारी चुनने के समय भाजपा आलाकमान को रेड्डी बंधुओं से क्या रणनीति अपनानी है, इस पर भी गम्भीरता से विचार करना होगा क्योंकि यह सरकार बनाने और उखाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं।
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Thursday, 28 July 2011

गले की हड्डी बने येदियुरप्पा को अविलम्ब हटाओ

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th July 2011
अनिल नरेन्द्र
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार के खिलाफ अभियान चला रही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को लेकर बुरी तरह फंस गई है। दक्षिण भारत में अपनी पहली सरकार को बचाने के लिए भाजपा हाई कमान कोई जोखिम उठाने से कतरा रहा है। लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार का दोषी करार दिया है और श्री हेगड़े की नीयत व विश्वसनीयता पर शक नहीं किया जा सकता। वह राज्यपाल हंसराज भारद्वाज की तरह नहीं जो निजी एजेंडे या राजनीतिक एजेंडे पर काम करते हैं। जस्टिस हेगड़े एक ईमानदार और विश्वसनीय छवि के हैं। अगर उन्होंने येदियुरप्पा को दोषी पाया है तो यह सही होगा। दरअसल भाजपा नेतृत्व के लिए येदियुरप्पा गले की हड्डी बन चुके हैं जिसे न तो निगल पा रही है और न ही उगल पा रही है। येदियुरप्पा हर बार यही दलील दे देते होंगे कि अगर मुझे हटाया तो सरकार गिर जाएगी और दक्षिण भारत में भाजपा ने जो पैर जमाए हैं वह उखड़ जाएंगे। भाजपा नेतृत्व को येदियुरप्पा की ब्लैकमेलिंग के सामने अब और झुकना नहीं चाहिए। येदियुरप्पा के कारण भाजपा की केंद्र सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार की मुहिम को भी धक्का लग रहा है और कांग्रेस को यह मौका मिलता है कि वह भाजपा पर दोहरे मापदंडों का आरोप लगा सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा है कि लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद येदियुरप्पा पर उचित फैसला होगा। कह तो येदियुरप्पा भी यही रहे हैं कि रिपोर्ट आने के बाद पार्टी जो भी फैसला करेगी, वे उसे मानेंगे। भाजपा नेतृत्व को अविलम्ब येदियुरप्पा को हटाकर उनके उत्तराधिकारी की घोषणा कर देनी चाहिए, अब इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिए। सम्भव है कि कुछ प्रभावशाली शक्तियों को कुछ दूसरे फायदे येदियुरप्पा के टिके रहने पर होते हों पर अगर शरीर के किसी भाग में कैंसर हो जाए तो क्या शरीर को बचाने के लिए उस अंग को काट नहीं देते? अगर येदियुरप्पा सरकार चली भी जाती है तो भी भाजपा को वापस आने में फायदा मिलेगा।
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Saturday, 21 May 2011

हंसराज भारद्वाज को अपने पद पर बने रहने का कोई हक नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st May 2011
अनिल नरेन्द्र
कर्नाटक के राज्यपाल श्री हंसराज भारद्वाज वैसे तो एक सुलझे हुए राजनीतिज्ञ हैं। वह कई महत्वपूर्ण पदों पर भी रह चुके हैं। कर्नाटक के राज्यपाल बनने से पहले वह केंद्र सरकार में कानून मंत्री थे। इन्दिरा जी के समय से वह जिम्मेदार पदों पर रहे हैं। कर्नाटक में जाने के बाद से पता नहीं उन्हें क्या हो गया है। वह इतने गैर जिम्मेदाराना तरीके से व्यवहार कर रहे हैं जो उन्हें शोभा नहीं देता। पता नहीं वह किस निजी एजेंडे पर चलना चाहते हैं। एक चुनी हुई सरकार जिसका विधानसभा में स्पष्ट बहुमत है उसे डराते-धमकाते रहते हैं, उन्हें डिसमिस करने की बेहूदा सिफारिश करते हैं। संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी किस तरह अपनी कथनी और करनी में अन्तर के प्रति बेपरवाह हो गए हैं, इसका सटीक उदाहरण है कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज का यह कथन `मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा चुने हुए प्रतिनिधि हैं। उन्हें जबरदस्त बहुमत प्राप्त है। इस पर किसी को संशय नहीं है। हम मित्र हैं। इस प्रकार के राजनीतिक तनाव अप्रासंगिक हैं। हमें संविधान और कानून के प्रति समर्पित होना चाहिए।'
पता नहीं श्री हंसराज भारद्वाज को इन दिनों क्या हो गया है। एक दिन केंद्र सरकार को येदियुरप्पा सरकार को डिसमिस करने की सिफारिश करते हैं तो उससे अगले दिन येदियुरप्पा की शान में कसीदे पढ़ने लगते हैं। हां इतना जरूर है कि वह अपना पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इतने सब विवादों के बावजूद, हिमाकतों के बावजूद कुर्सी से चिपके रहना चाहते हैं। खुद को वापस बुलाए जाने की भाजपा की मांग पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि राज्यपाल के तौर पर उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति ने की थी तथा उनके (राष्ट्रपति के) अलावा और उन्हें (भारद्वाज को) वापस नहीं बुला सकता। राज्यपाल महोदय अगर आपसे हम यही सवाल करें कि कर्नाटक की जनता ने येदियुरप्पा को न केवल चुना है बल्कि उन्हें स्पष्ट बहुत दिया है तो आप कौन होते हैं उन्हें वापस बुलाने वाले? दिलचस्प पहलू यह है कि हमें नहीं लगता कि हंसराज भारद्वाज कांग्रेस के किसी एजेंडे पर चल रहे हैं। केंद्र सरकार व कांग्रेस पार्टी बेशक येदियुरप्पा सरकार की मौजूदगी से खुश न हो पर वह इस हद तक नहीं जा सकती कि एक स्पष्ट बहुमत वाली चुनी हुई सरकार को बिना वजह हटाया जाए। तभी तो प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि कोई गैर संवैधानिक काम नहीं होगा। जब केंद्र की ऐसी कोई नीति नहीं तो राज्यपाल महोदय किसके एजेंडे पर चलने की कोशिश कर रहे हैं?
श्री हंसराज भारद्वाज ने अपनी पक्षपातपूर्ण सिफारिश से न केवल केंद्र सरकार को असहज किया बल्कि राज्यपाल के पद की गरिमा भी गिराई है। यह भी विचित्र है कि एक ओर वह येदियुरप्पा की तारीफ करते हुए उनके पास भारी बहुमत बता रहे हैं और दूसरी ओर विधानसभा का सत्र आरम्भ करने में राज्य कैबिनेट के अनुरोध को स्वीकार करने के पहले अपनी सिफारिश पर केंद्र सरकार के फैसले का इंतजार भी कर रहे हैं। क्या उन्हें अभी भी यह यकीन है कि केंद्र सरकार उनकी सिफारिश मानते हुए कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन थोप सकती है? दरअसल श्री हंसराज भारद्वाज ने अपने पत्ते इतनी बुरी तरह से खेले हैं कि अगर उनमें थोड़ा-सा स्वाभिमान बचा है तो स्वयं राज्यपाल के पद से त्यागपत्र दे दें।
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