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Friday, 18 May 2012

मध्य प्रदेश के यह भ्रष्ट अफसर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 May 2012
अनिल नरेन्द्र
इस देश में लगता है कि बाबुओं ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मध्य प्रदेश में भ्रष्ट अफसरों और कारोबारियों की तिजोरियों से अकूत सम्पदा निकल रही है। पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 1200 करोड़ रुपये से अधिक की सम्पत्ति उजागर हो चुकी है यानि हर माह सौ करोड़ रुपये भ्रष्टों की जेब से निकले हैं। आयकर, लोकायुक्त सहित अन्य एजेंसियां द्वारा डाले गए छापों में यह रकम उजागर हुई है। आयकर व लोकायुक्त अधिकारियों ने कहा कि यदि उन्हें और अधिकार दे दिए जाएं तो वे उस चल-अचल सम्पत्ति को और भी पकड़ सकते हैं जो भ्रष्ट तरीके से अर्जित की गई है अथवा जिसमें कालेधन का इस्तेमाल किया गया है। वर्ष 2011-12 में विभिन्न एजेंसियों की छापामार कार्रवाई में इंदौर, भोपाल, जबलपुर व ग्वालियर में की गई 17 छापामार कार्रवाइयों में इन्वेस्टीगेशन विंग ने 482 करोड़ रुपये सरेंडर कराए हैं। सुरेश चन्द बंसल ग्रुप, सागर ग्रुप, सिगनेट ग्रुप, मोखा बिल्डरöडॉ. जामदार, अम्बिका साल्वेक्स आदि समूहों पर कार्रवाई हुई। नकद व अचल सम्पत्तियां 45 करोड़ की जब्त की गई। मध्य प्रदेश में 182 सर्वे किए गए। भोपाल में 87 व इंदौर में 95 सर्वे में क्रमश 56 करोड़ व 723 करोड़ रुपये सरेंडर हुए। ये सर्वे व्यापारियों, संस्थाओं और बिजनेस समूहों पर किए गए। यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जो पैसे विकास योजनाओं पर लगना चाहिए था वह इन भ्रष्ट अफसरों की जेबों में चला जाता है। जितने पैसे इन अफसरों ने लूटे उसमें तो प्रदेश में गांवों व कस्बों तक 7 मीटर चौड़ाई की 3000 किलोमीटर सड़क बनाई जा सकती थी या फुटपाथों पर रहने वाले अथवा गरीबों के लिए 1.20 लाख घर बन सकते हैं। प्राइमरी शिक्षा के लिए आठ हजार स्कूल भवन बनाए जा सकते थे। सर्व सुविधायुक्त व अत्याधुनिक 5 हॉस्पिटल बन सकते थे। प्रदेश में कम से कम एक अच्छा अस्पताल बन सकता था।
इस देश में लगता है कि बाबुओं ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मध्य प्रदेश में भ्रष्ट अफसरों और कारोबारियों की तिजोरियों से अकूत सम्पदा निकल रही है। पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 1200 करोड़ रुपये से अधिक की सम्पत्ति उजागर हो चुकी है यानि हर माह सौ करोड़ रुपये भ्रष्टों की जेब से निकले हैं। आयकर, लोकायुक्त सहित अन्य एजेंसियां द्वारा डाले गए छापों में यह रकम उजागर हुई है। आयकर व लोकायुक्त अधिकारियों ने कहा कि यदि उन्हें और अधिकार दे दिए जाएं तो वे उस चल-अचल सम्पत्ति को और भी पकड़ सकते हैं जो भ्रष्ट तरीके से अर्जित की गई है अथवा जिसमें कालेधन का इस्तेमाल किया गया है। वर्ष 2011-12 में विभिन्न एजेंसियों की छापामार कार्रवाई में इंदौर, भोपाल, जबलपुर व ग्वालियर में की गई 17 छापामार कार्रवाइयों में इन्वेस्टीगेशन विंग ने 482 करोड़ रुपये सरेंडर कराए हैं। सुरेश चन्द बंसल ग्रुप, सागर ग्रुप, सिगनेट ग्रुप, मोखा बिल्डरöडॉ. जामदार, अम्बिका साल्वेक्स आदि समूहों पर कार्रवाई हुई। नकद व अचल सम्पत्तियां 45 करोड़ की जब्त की गई। मध्य प्रदेश में 182 सर्वे किए गए। भोपाल में 87 व इंदौर में 95 सर्वे में क्रमश 56 करोड़ व 723 करोड़ रुपये सरेंडर हुए। ये सर्वे व्यापारियों, संस्थाओं और बिजनेस समूहों पर किए गए। यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जो पैसे विकास योजनाओं पर लगना चाहिए था वह इन भ्रष्ट अफसरों की जेबों में चला जाता है। जितने पैसे इन अफसरों ने लूटे उसमें तो प्रदेश में गांवों व कस्बों तक 7 मीटर चौड़ाई की 3000 किलोमीटर सड़क बनाई जा सकती थी या फुटपाथों पर रहने वाले अथवा गरीबों के लिए 1.20 लाख घर बन सकते हैं। प्राइमरी शिक्षा के लिए आठ हजार स्कूल भवन बनाए जा सकते थे। सर्व सुविधायुक्त व अत्याधुनिक 5 हॉस्पिटल बन सकते थे। प्रदेश में कम से कम एक अच्छा अस्पताल बन सकता था।

Saturday, 18 February 2012

...और अब एक सरकारी डाक्टर दम्पति से मिले 35 करोड़

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th February  2012
अनिल नरेन्द्र
सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार का बोलबाला चौंकाने वाला है। कुछ सरकारी अधिकारियों ने तो अवैध सम्पत्ति बनाने की होड़ में सारी हदें पार कर ली हैं। ऐसा एक उदाहरण हमें पिछले दिनों मध्य प्रदेश से मिला। मध्य प्रदेश लोकायुक्त टीम ने गत दिनों एक सरकारी डाक्टर दम्पति के उज्जैन व नागदा स्थित घर पर छापा मारा। जिले के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत डॉ. विनोद एवं डॉ. विद्या लहरी के पास आय से अधिक करोड़ों की सम्पत्ति मिली है। पांच मकान, एक पेट्रोल पम्प, वेयर हाउस, 150 बीघा जमीन, पोहा फैक्टरी का खुलासा हुआ है। एक अनुमान के अनुसार उनकी सम्पत्ति 35 करोड़ रुपये की आंकी जा रही है। लोकायुक्त एसपी अरुण मित्रा ने बताया कि इन्दिरा नगर निवासी डॉ. विनोद लहरी व उनकी पत्नी विद्या लहरी 22 सालों से शासकीय सेवा में दोनों दो वर्ष से निलम्बित होने के कारण ज्वाइंट डायरेक्टर कार्यालय उज्जैन में पदस्थ हैं। इन्हें अब तक की इस सरकारी नौकरी में करीब 80 लाख रुपये वेतन मिला है। डाक्टर दम्पति की इतनी आय होती है कि वे हाथों से नोट नहीं गिन पाते थे। उनके घर में नोट गिनने की मशीन भी मिली। लोकायुक्त का दूसरा दल जब नागदा में डॉ. लहरी के हॉस्पिटल रोड स्थित मकान पर तलाशी के लिए गया तो मकान देखकर चौंक पड़ा क्योंकि वहां मकान नहीं, महल बना हुआ है। काफी समय से बन्द पड़े इस महल के अन्दर आधुनिक नर्सिंग होम और एक स्वीमिंग पूल भी मिला है। दम्पति पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है, सम्पत्ति के मूल्यांकन के बाद उसकी कीमत का सही अनुमान लग सकेगा। इधर सूत्रों के मुताबिक लोकायुक्त सम्पत्ति की कीमत करीब 35 करोड़ से अधिक है। मजेदार बात यह भी है कि दोनों डाक्टर जून 2010 से निलम्बित हैं। नागदा सेवाकाल में शिकायतों के चलते ये निलम्बित हुए थे। सवाल है कि सरकार अब इस डाक्टर दम्पति के खिलाफ क्या कार्रवाई करेगी? इन मामलों में बिहार ने अच्छी पहल की है। हाल ही में पटना की निगरानी अदालत के विशेष न्यायाधीश रमेश चन्द्र मिश्र ने एक फरवरी को बिहार के पूर्व डीजीपी नारायण मिश्र की आय से करीब एक करोड़ 40 लाख रुपये से अधिक की सम्पत्ति जब्त करने के आदेश दिए। बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी अभियान में यह एक महान उपलब्धि है। एक तरह जहां 2जी स्पैक्ट्रम लाइसेंस को रद्द करवाने के लिए लोगों को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है वहीं बिहार राज्य सरकार ने एक नया कानून बनवाकर अपने सर्वोच्च पुलिस अधिकारी की सम्पत्ति भी जब्त करवाने में सफलता पा ली है। इससे पहले भी पटना की निगरानी अदालत बिहार कैडर के आईएएस अफसर एसएस वर्मा सहित कई लोक सेवकों की सम्पत्ति जब्त कर चुका है। वर्मा के पटना स्थित निजी आवास में अब सरकारी स्कूल चल रहा है। निगरानी अदालत पटना कोषागार के पूर्व अधिकारी गिरीश कुमार, गया नगर निगम के पूर्व अफसर योगेन्द्र सिंह, कैमूर के वन प्रमंडल अधिकारी भोला प्रसाद जैसे कई अन्य विवादास्पद अफसरों की भी सम्पत्ति जब्त करने के आदेश दे चुकी है। सवाल सिर्प राजनीतिक इच्छाशक्ति का है और बिहार ने रास्ता दिखा दिया है। मध्य प्रदेश को भी बिहार से सीख लेनी चाहिए।
Anil Narendra, Black Money, Corruption, Daily Pratap, Lokayukta, Madhya Pradesh, Vir Arjun

Friday, 20 January 2012

गुजरात हाई कोर्ट ने लोकायुक्त मामले में दिया मोदी को झटका

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21th January  2012
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लोकायुक्त मामले में निश्चित रूप से गुजरात हाई कोर्ट के ताजा फैसले से झटका लगा है। गुजरात हाई कोर्ट ने राज्यपाल द्वारा लोकायुक्त के पद पर की गई नियुक्ति को पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी तौर पर जायज ठहराया है। लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर मोदी सरकार के टालमटोल के बाद राज्यपाल कमला बेनीवाल ने पिछले साल 25 अगस्त को सेवानिवृत्त न्यायाधीश आरए मेहता को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया था। गुजरात में नवम्बर 2003 से लोकायुक्त पद खाली पड़ा था। राज्यपाल ने जस्टिस मेहता को लोकायुक्त कानून-1986 की उपधारा-3 के विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया। 26 अगस्त को गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील की। तीन महीने पहले हाई कोर्ट ने विभाजित निर्णय दिया था। बुधवार को तीसरे न्यायाधीश वीएम सहाय की अदालत ने मतभेद के बिंदुओं पर सुनवाई के बाद राज्यपाल के फैसले को सही ठहराया। दोनों पक्षों के वकीलों की राय अपने-अपने हिसाब से थी। अकील कुरैशी का कहना था कि लोकायुक्त की नियुक्ति सही और संविधान सम्मत है। जबकि सोनिया बेन गोकार्णा का कहना था कि मेहता को लोकायुक्त नियुक्त करने का फैसला असंवैधानिक है। अब मामला सुपीम कोर्ट में पहुंच गया है। गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती दे दी है। यह अच्छा हुआ कि यह मामला सुपीम कोर्ट पहुंच गया। पिछले साल पूरे समय देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए लोकपाल कानून की मांग गूंजती रही। इस शोरगुल के बीच लोगों को याद नहीं रहा कि कई राज्यों में भ्रष्टाचार पर नजर रखने के लिए लोकायुक्त नामक एक संस्था पहले से ही वजूद में है। हमने गत दिनों यह भी देखा कि लोकायुक्त क्या-क्या कर सकते हैं। उत्तर पदेश में लोकायुक्त ने मायावती सरकार के नाक में दम कर रखा है और परिणामस्वरूप कई मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाने पर मायावती मजबूर हुईं। यह बात दीगर है कि राज्यों में लोकायुक्तों का वजूद और उनके अधिकार वहां की सरकारों के रहमोकरम पर हैं। कई राज्यों ने तो इतने हंगामे के बावजूद लोकायुक्तों को अब तक जरूरी नहीं समझा और कुछ राज्यों ने समय की नजाकत देखते हुए इस पद को बनाया तो लेकिन अपने हिसाब से कारगर करते हुए। उम्मीद की जा सकती है कि सुपीम कोर्ट के फैसले से लोकायुक्तों के मामले में पूरे देश में एकरूपता आएगी और पार्टियों को केंद्र बनाम राज्य की आड़ में राजनीति करने का भी मौका नहीं मिलेगा। गुजरात का नमूना आखें खोलने के लिए काफी है। गुजरात बेशक अपने उद्योग-धंधों के लिए सबसे माकूल राज्य के लिए पचार करता रहे पर कटु सत्य तो यह भी है कि राज्य पिछले आठ वर्षों से लोकायुक्त के बिना ही चल रहा था। वहां के राज्यपाल और मुख्यमंत्री की खुन्नस के बारे में सभी जानते हैं। वैसे भी पिछले कुछ समय से लगता है कि नरेन्द्र मोदी में थोड़ा अहंकार आ गया है। यह झटका उनके लिए भी अच्छा है। अब वह थोड़ा जमीन पर उतरेंगे। मोदी सरकार कह रही है कि राज्यपाल ने राज्य मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बिना लोकायुक्त बना कर राज्य के अधिकारों में हस्तक्षेप किया है जबकि 2-1 से आए गुजरात हाई कोर्ट के फैसले में मुख्यमंत्री की कार्यशैली की बखियां उधेड़ी गई हैं। फैसले में मोदी की आलोचना में यह भी कहा गया है कि वह राज्य में लोकायुक्त कानून में बदलाव लाकर चीफ जस्टिस को ही नियुक्ति पकिया से हटाना चाहते थे। सच्चाई क्या है यह तो सुपीम कोर्ट के फैसले के बाद ही पता चलेगी लेकिन आंशिक रूप से अभी दोनों पक्ष सही लग रहे हैं। बेशक राज्यपाल केन्द्र के पतिनिधी हैं इसलिए अपनी मनमर्जी राज्य की निर्वाचित सरकार पर नहीं थोप सकते। मोदी को उन राज्यों से समर्थन मिल सकता है जहां गैर कांग्रेसी सरकारें हैं पर आज की तारीख में भ्रष्टाचार रोकने की किसी भी पकिया को रोकने का पयास जनता को नहीं भाएगा। मोदी की लड़ाई राजनीतिक है, अधिकार क्षेत्र के अतिकमण का है, वह भ्रष्टाचार रोकने के खिलाफ नहीं दिखना चाहिए। विचित्र यह भी है कि जो भाजपा सशक्त लोकपाल की वकालत करती नजर आती है और जिसने संबंधित विधेयक में एक संशोधन यह भी सुझाया था कि लोकपाल के चयन में केन्द्र सरकार की भूमिका कम की जाए, वह इस बात को लेकर नाराज रहीं कि गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति राज्य सरकार की मर्जी से क्यों नहीं की गई। क्या पार्टी यह चाहती है कि लोकायुक्त कौन हो और उसके अधिकार क्या हों इसका निर्णय राज्य सरकारों की इच्छा पर छोड़ दिया जाए? फिर क्या ऐसी व्यवस्था भ्रष्टाचार को रोकने में पभावी साबित हो सकती है?
Anil Narendra, Daily Pratap, Gujarat, Lokayukta, Narender Modi, Vir Arjun

36 सालों की नौकरी, 22 लाख वेतन और 29 करोड़ की सम्पत्ति?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th January  2012
अनिल नरेन्द्र
कुछ लोगों का कहना है कि हमारे देश में राजनीतिज्ञ तो ब्लैकमनी के लिए जरूरत से ज्यादा बदनाम हैं, असल तो अवैध कमाई नौकरशाहों के पास है। मध्य पदेश में पिछले कुछ समय से नौकरशाह बिरादरी पर छापे पड़ रहे हैं। इन छापों के परिणामों से तो यही लगता है कि लोग जो सोचते हैं सही ही लगता है। लोअर ब्यूरोकेसी ने इतनी लूट-खसोट मचा रखी है जिनका अनुमान लगाना मुश्किल है। मंगलवार को उज्जैन में लोकायुक्त टीम ने पीएचआई (लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग) के एक सहायक इंजीनियर के घर छापा मारा। तलाशी में सहायक इंजीनियर रमेश कुमार पिता पुंदन लाल द्विवेदी के घर से तलाशी में कृषि, भूमि, मकान, सोने-चांदी के जेवरात व लग्जरी वाहन सहित करीब 20 करोड़ की सम्पत्ति के पमाण मिले। लोकायुक्त एसपी अरुण मिश्रा ने बताया कि द्विवेदी की 1976 में उपयंत्री पद पर नौकरी लगी थी। उसे 2010 तक कुल 22 लाख रुपए वेतन मिला है। कोर्ट के एक फैसले के कारण उसने डेढ़ वर्ष से वेतन नहीं लिया है। द्विवेदी के घर तलाशी लेने गई टीम को जब तबेले में से घर में जाना पड़ा तो वह चौंक गए। लगा कि वह गलत घर में तो नहीं आ गए हैं। बाद में 20 करोड़ की सम्पत्ति का जब ब्यौरा मिला और तबेले की छानबीन हुई तब जाकर उन्हें लगा कि वह सही जगह आए हैं। लोकायुक्त की तलाशी में द्विवेदी के घर पर एक कार चालक व दो नौकर रखे होने का भी रिकार्ड मिला है। इन तीन कर्मचारियों को द्विवेदी करीब 15 हजार रुपए माह वेतन देता था जबकि उसे स्वयं को 24 हजार रुपए वेतन पतिमाह मिलता है। छापे में क्या-क्या मिला इस पर गौर फरमाएं ः 86 बीघा जमीन कीमत 17 करोड़ रुपए, 9 मकान (इंदौर-उज्जैन) 1.50 करोड़ रुपए, 3 लग्जरी कार (21 लाख रुपए), 2 डम्पर, टैक्ट्रर-25 लाख रुपए, 2 बाइक-1लाख रुपए, 13 तोला सोना -3.64 लाख, और 2.5 किलो चांदी कीमत 85 हजार रुपए। पत्नी साधना, पुत्र पियंक, पीयूष व बहू मेधा के नाम से बैंकों में 16 खातों में 4 लाख रुपए। द्विवेदी के 9 लाख की बीमा पॉलिसी भी मिली।
अभी कुछ समय पहले ही इंदौर में मध्य पदेश की अपराध जांच ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने परिवहन विभाग के क्लर्प की 40 करोड़ रुपए से ज्यादा की बेहिसाब सम्पत्ति का खुलासा किया था। क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) में क्लर्प के रूप में पदस्थ रमेश उर्फ रमण के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार से बेहिसाब दौलत बनाने की शिकायत मिली थी। इस शिकायत पर उसके तीन स्थानीय ठिकानों पर एक साथ छापे मारे गए। सूत्रों ने बताया कि क्लर्प की बेहिसाब सम्पत्ति में अलग-अलग जगहों पर कुछ 49 बीघा जमीन, चार भूखण्ड, आलीशान बंगला, एक होटल और एक मकान शामिल है। छापों के दौरान उसके ठिकाने पर जेवरात की शक्ल में लगभग एक किलो सोना और तकरीबन साढ़े चार किलो चांदी मिली। इसके अलावा पांच बैंक खातों और बीमा योजनाओं में निवेश के दस्तावेज भी बरामद किए गए। चार महंगे वाहन और दो दुपहिए भी क्लर्प की बेहिसाब मिल्कीयत की सूची में है। रमेश वर्ष 1996 में सरकारी सेवा में आया था और फिलहाल उसका वेतन करीब 16 हजार रुपए पतिमाह है। 16 हजार रुपए वेतन पाने वाले ने 40 करोड़ की सम्पत्ति कैसे बना ली? इसी के साथ सवाल यह भी उठता है कि पकड़ी गई ऐसी संपत्ति का क्या किया जाए? एक हल तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिखाया है। एक भ्रष्ट कर्मचारी गिरीश कुमार के पटना के आलीशान बंगले में अब नीतीश सरकार ने किशोरियों का आवासीय स्कूल खोल दिया है। पिछले कई दिनों से यह बंगला बंद था। पार्प रोड स्थित इस 28 कमरों वाले बंगले को पिछड़ी जाति की छात्राओं के प्लस-टू के आवासीय स्कूल को हस्तांतरित किया गया है। यहां वर्ग 6 से 10 तक की 140 छात्राएं रहेंगी और सभी कक्षाएं इसी भवन में होंगी। गिरीश का मकान आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सरकार ने जब्त किया था। गिरीश कुमार ने वर्ष 1992 से 2004 के बीच आय से 96 लाख रुपए की अधिक सम्पत्ति अर्जित की थी। कोर्ट ने 15 नवंबर को जिलाधिकारी को गिरीश की संपत्ति जब्त करने का आदेश लिया था। डेढ़ कट्टा जमीन जो उसकी पत्नी के नाम थी, को जब्त कर लिया गया और इस स्कूल की पहली घंटी नए साल (2012) में 2 जनवरी को बजी। पिछड़े तबके की छात्राएं जब नए स्कूल के कमरों में पहुंची तो चौंक गई। 10वीं की छात्रा सोनी ने कहा, `कितनी बड़ी आलमारी है?' शिक्षिका नीरा आर्य ने टोका ः यह आलमारी नहीं वार्डरोब है। पहली बार यह शब्द सुन रही सोनी ने उलट सवाल दागा ये वार्डरोब क्या होता है?
Anil Narendra, Corruption, Daily Pratap, Lokayukta, Madhya Pradesh, Vir Arjun

Tuesday, 3 January 2012

यूपी में मंत्री और लोकायुक्त में छिड़ा विवाद

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd  January 2012
अनिल नरेन्द्र
नए साल की शुरुआत ही एक सियासी विवाद से हुई है। उत्तर प्रदेश में चुनावी जंग के ठीक पहले यूपी के ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय ने यूपी के लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके महरोत्रा के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी कर नए विवाद को जन्म दे दिया है। मायावती सरकार के कई मंत्रियों के लोकायुक्त जांच के दायरे में होने के चलते मंत्री जी अपना आपा खो बैठे। शुक्रवार शाम हाथरस की एक जनसभा में रामवीर ने कहा कि उन्हें जज (लोकायुक्त) के मुकाबले कानून की ज्यादा समझ है। लोकायुक्त के साथ व्यक्तिगत संबंध नहीं होते तो मैं सुप्रीम कोर्ट की शरण लेकर उन्हें बर्खास्त भी करा सकता था। ऊर्जा मंत्री यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि मैं कानून का छात्र रहा हूं और इसे अच्छी तरह समझता हूं। मैं कानून उनसे ज्यादा जानता हूं। उपाध्याय ने उनके खिलाफ भाजपा के महासचिव किरीट सोमैया द्वारा लोकायुक्त को की गई शिकायत के सन्दर्भ में यह बात कही। इस टिप्पणी पर लोकायुक्त ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मायावती ने अब तक जो कुछ भी किया है, रामवीर ने उस पर पानी फेर दिया है। मेहरोत्रा ने कहा कि रामवीर से उनके व्यक्तिगत संबंध नहीं हैं। मंत्री होने के नाते उन्होंने रामवीर को सम्मान दिया, जिसे वह गलत समझ बैठे। उन्हें पता नहीं कि ऐसी टिप्पणी के लिए रामवीर ने अपनी सरकार से अनुमति ली या नहीं, लेकिन उनका यह आचरण हताशा का परिचायक है और पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है। हाथरस के व्यापारियों की ओर से शुक्रवार की रात यहां घंटाघर पर जनसभा में उपाध्याय की उक्त टिप्पणी की जब सपा जिलाध्यक्ष देवेन्द्र अग्रवाल को जानकारी मिली तो उन्होंने ऊर्जा मंत्री पर लोकायुक्त की अवमानना का आरोप लगाने के साथ जिला प्रशासन व लोकायुक्त से ऊर्जा मंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और मुख्यमंत्री से उन्हें बर्खास्त करने की मांग कर डाली। हाल ही में लोकायुक्त मेहरोत्रा ने उत्तर प्रदेश के कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ प्राथमिक स्तर पर उनके और उनकी पत्नी विधान परिषद सदस्य हुस्ना सिद्दीकी के खिलाफ दाखिल शिकायतों को मजबूत पाते हुए दोनों के खिलाफ मामला दर्ज कर मुख्यमंत्री मायावती को सूचना दे दी। दरअसल मायावती की पार्टी के कुछ नेता न्यायमूर्ति मेहरोत्रा से सख्त दुःखी हैं। उनकी सिफारिश पर कई मंत्रियों को अपने पद से हाथ धोना पड़ा है। मायावती ने आनन-फानन में कई मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया है। चुनाव सिर पर देखते हुए खबर यह है कि बहन जी बहुत से सिटिंग एमएलए के टिकट भी काट रही हैं। महीनों पहले ही विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों की घोषणा करने वाली बहुजन समाज पार्टी में चुनाव की तारीख आने के बाद उम्मीदवारों में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। बसपा अध्यक्ष ने गत सोमवार को आगरा, बुंदेलखंड और कानपुर क्षेत्र की सीटों पर फिर से विचार किया है। मायावती ने बीते दिनों में अपने कई मंत्रियों और मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर उनके स्थान पर नए प्रत्याशियों को तय किया है। हमारा मानना है कि बहन जी थोड़ी बौखलाहट में अब काम कर रही हैं। ऐसे मौजूदा विधायकों को आखिरी समय पर बदलना पार्टी के लिए घातक भी साबित हो सकता है। इन लोगों ने महीनों से अपने क्षेत्रों में काम किया है, जमीन तैयार की है। आखिरी समय में नए उम्मीदवार के लिए ऐसा कर पाना इतना आसान नहीं होगा। फिर जाहिर-सी बात है कि जिनको अपमानित कर टिकट काटे गए हैं उनमें से कुछ जरूर पार्टी के नए अधिकृत उम्मीदवार को हराने का प्रयास करेंगे।
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, Daily Pratap, Lokayukta, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Saturday, 27 August 2011

रणनीति के तहत फंसाया गया है विभिन्न लोकपालों को



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th August 2011
अनिल नरेन्द्र
मनमोहन सरकार अपनी चालबाजियों से बाज नहीं आ रही। कहने को तो उसने अन्ना हजारे की यह शर्त मान ली है कि वह शुक्रवार को जन लोकपाल बिल को संसद में चर्चा के लिए रख देगी पर जो बात हमें लग रही है कि सरकार अकेले जन लोकपाल बिल पर चर्चा नहीं करेगी। उसने अरुणा राय द्वारा तैयार किया गया लोकपाल बिल व कुछ अन्य बिल भी साथ-साथ रखे जाएंगे। अन्ना तीन मुद्दों पर चर्चा करने पर विशेष जोर दे रहे हैं। अन्ना ने अपने अनशन के 10वें दिन रामलीला मैदान में अपने समर्थकों से कहा कि अगर जन लोकपाल के तीन मुद्दों पर सत्तापक्ष और विपक्ष में सहमति बन जाती है तो वह अपना अनशन खत्म कर देंगे। लेकिन शेष मुद्दों पर धरना जारी रखेंगे। अन्ना ने कहा कि अगर सरकार कल (शुक्रवार) संसद में चर्चा पर नहीं मानी तो वह अनशन जारी रखेंगे और मरते दम तक करते रहेंगे। अन्ना ने कहा कि वह जन लोकपाल के तीन मुद्दों पर यानि सरकारी दफ्तरों में सिटीजन चार्टर होने, राज्यों में लोकायुक्त के गठन और नीचे से लेकर ऊपर तक के सभी नौकरशाहों को लोकपाल के दायरे में लाने पर संसद में चर्चा चाहते हैं। अन्ना की यह मांग सरकार ने मान ली है और संसद में चर्चा कराने को तैयार हैं पर उसने यह नहीं कहा कि वह जन लोकपाल बिल को मान रही है। वह केवल संसद में चर्चा के लिए तैयार है। सरकार ने यह भी साफ किया कि बाकी के मसौदों पर भी चर्चा होगी। सरकार अन्ना हजारे को केडिट से वंचित रखने के लिए यह चाल चली है ताकि सरकार यह कहकर अपनी नाक ऊंची कर ले कि उसने सिर्प अन्ना को ही नहीं दूसरे सिविल सोसाइटी के लोगों को भी तरजीह दी है।

एक तरफ संसद में चर्चा होगी तो दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस को जरूरत पड़ने पर अन्ना को जबरन उठाने की योजना भी बन चुकी है। अन्ना की बिगड़ती सेहत से चिंतित सरकार ने दिल्ली पुलिस को अन्ना को उठाने का आदेश दे दिया है। टीम अन्ना पर कार्रवाई करने के लिए पुलिस ने ग्राउंड तैयार कर लिया है। पुलिस ने एक रिपोर्ट तैयार की है जिसके अनुसार तीन शर्तों का रामलीला ग्राउंड में उल्लंघन किया गया है। जिन 22 शर्तों पर टीम अन्ना और पुलिस में सहमति बनी थी उनमें से तीन का टीम अन्ना ने पालन नहीं किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि रात 10 बजे के बाद लाउड स्पीकर का इस्तेमाल कई बार किया गया है। मंच से भड़काऊ भाषण दिए गए हैं। तीसरी शर्त के बारे में कहा गया है कि अन्ना का सरकारी डाक्टरों से चैकअप करने से मना करना है।
रमजान के महीने में बारिश और धूप की सख्ती झेलते हुए अन्ना हजारे के समर्थन में जनता लगातार रामलीला मैदान पहुंच रही है। भूखे-प्यासे होने के बावजूद 18 साल के असद रामलीला मैदान में दिनभर लोगों की प्यास बुझाता रहा। असद की तरह कई अन्य मुस्लिम युवा वर्ग भी लोगों की मदद में जुटे हैं। इन लोगों पर दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम की सलाह पर कोई खास असर नहीं दिखाई दिया। बुखारी ने एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक से बातचीत में कहा है कि अन्ना के आंदोलन में `भारत-माता की जय' और वन्दे मातरम् जैसे नारे लग रहे हैं। यह इस्लाम के खिलाफ हैं क्योंकि यह मजहब किसी देश या भूमि की इबादत की इजाजत नहीं देता। ऐसे में मुसलमानों को इस आंदोलन से दूर रहना चाहिए। इस बीच मुस्लिम महाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष अली अहमद ने कहा कि बुखारी को भूलना नहीं चाहिए कि देश की आजादी के लिए मुसलमानों ने भी कुर्बानियां दी हैं। वह शरीयत का हवाला देकर मुसलमानों को गुमराह नहीं कर सकते। एक मुसलमान का ईमान ही उसका सब कुछ होता है। मेवात के 14 लाख मुसलमान अन्ना के साथ हैं। इधर मौलाना कारिक ने कहा कि 15 अगस्त 1947 को जब हमारा देश आजाद हुआ था उस समय भी रमजान का महीना था। आज भी वही स्थिति है। अल्लाह ने चाहा तो बयानबाजी करने वाले मुंह की खाएंगे। दिल्ली की ऐतिहासिक फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम अहमद ने बुखारी का नाम लिए बिना उनके बयान से असहमति जाहिर की है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन पूरे देश का मामला है और मुसलमान भी इसी देश का हिस्सा हैं। ऐसे में मुसलमानों का इस आंदोलन में शामिल होना वाजिब है। देश की एक प्रमुख इस्लामी संस्था जमात-ए-इस्लामी हिन्द ने भी इस बात से असहमति जताई है कि आंदोलन में मुसलमानों को शामिल नहीं होना चाहिए। संस्था के सचिव मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने कहा कि हम बुखारी साहब के बयान पर कुछ नहीं कहेंगे पर हम मुसलमानों से यह अपील नहीं कर सकते कि इस आंदोलन में वह शामिल न हों।

Sunday, 31 July 2011

कांग्रेस पर येदियुरप्पा की विदाई भारी पड़ सकती है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 31st July 2011
अनिल नरेन्द्र
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफे से कांग्रेस ने भले ही ऊपरी तौर पर खुशी का इजहार किया हो पर अंदरुनी तौर पर उसे भारी चिंता जरूर होगी। अब तक कांग्रेस ने अपने कई मंत्री और मुख्यमंत्रियों को येदियुरप्पा की ओट में बचा रखा था और उनके नाम पर वह अपने घोटालों को न्यायसंगत ठहरा रही थी पर येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद कांग्रेस के कई विकेट गिरने का खतरा मंडराने लगा है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनों को फायदा दिलाने के आरोप में फंसे हैं, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उनके वरिष्ठ मंत्री राजकुमार चौहान पहले से ही लोकायुक्त के निशाने पर हैं। ऐसे में जब मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने अपने एकमात्र आरोपी मुख्यमंत्री को हटा दिया तो कांग्रेस पर भी ऐसे अपने आरोपियों पर कार्रवाई करने का दबाव जरूर बढ़ेगा। एक अगस्त से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में विपक्ष हमलावर हो सकता है। इस दौरान केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की मांग उठ सकती है। 2जी स्पेक्ट्रम एवं लाइसेंस आवंटन घोटाले के आरोप में जेल में बंद पूर्व संचार मंत्री ए. राजा ने अदालत में मोर्चा खोल दिया है। राजा के अलावा पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा के बयान ने भी सरकार को असहज स्थिति में ला दिया है। सरकार को इस मामले में सफाई देनी पड़ रही है। बेहुरा ने कहा कि दिसम्बर 2007 में लाइसेंस फीस को लेकर हुई बैठक में रिजर्व बैंक के गवर्नर सुब्बा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम मौजूद थे। बेहुरा के इस बयान पर गुरुवार को केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल को सफाई देनी पड़ी। विपक्ष अब इन सभी बयानों और सूचनाओं का तारतम्य बिठाने में जुट गया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने पहले ही चिदम्बरम के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। वह चिदम्बरम को भी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का हिस्सेदार बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। हालांकि सरकार भी इस क्रम में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आपरेशन डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। इसके लिए भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक, लोकपाल विधेयक समेत अन्य बिल संसद में पेश किए जाने की रणनीति बनाई जा रही है, ताकि विपक्ष की धार को पुंद किया जा सके। येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद अब कांग्रेस के पास कोई और ऐसा भाजपा का उदाहरण भी नहीं बचा जिससे वह अपना बचाव कर सके।
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Saturday, 30 July 2011

अंतत येदियुरप्पा को जाना ही पड़ा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th July 2011
अनिल नरेन्द्र
अंतत भाजपा हाई कमान ने हिम्मत और बुद्धिमता दिखाई और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को हटाने का फैसला कर ही लिया। येदियुरप्पा ने हालांकि अपनी कुर्सी बचाने के लिए सब तरह के हथकंडे अपना लिए परन्तु आलाकमान के आगे उनकी एक न चली। आला कमान ने बुधवार देर रात ही उन्हें बता दिया कि पार्टी चाहती है कि वे अपना पद छोड़ दें। इसके बाद गुरुवार सुबह संसदीय दल की बैठक में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के बारे में किए गए फैसले पर मोहर लगा दी गई। पार्टी ने येदियुरप्पा को हटाने के बारे में तभी मन बना लिया था, जब लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट के कुछ हिस्से लीक हो गए थे। लेकिन पार्टी चाहती थी कि पहले लोकायुक्त अपनी रिपोर्ट औपचारिक तौर पर सरकार के सुपुर्द कर दें। रिपोर्ट सुपुर्द करने के फौरन बाद ही येदियुरप्पा को दिल्ली तलब किया गया और उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा गया। येदियुरप्पा बिना इस्तीफा दिए बेंगलुरु पहुंच गए। बेंगलुरु पहुंचने पर येदियुरप्पा ने अपनी ताकत आजमाने के लिए विधायकों व मंत्रियों की बैठक बुलाई जिसमें उनके हाथ निराशा ही लगी। उनकी बुलाई बैठक में कुल 13 विधायक ही पहुंचे। दरअसल भाजपा हाईकमान येदियुरप्पा की चाल को समझ गए थे। इधर येदियुरप्पा दिल्ली से खिसके उधर नितिन गडकरी ने विधायकों को येदियुरप्पा से दूरी बनाने को फोन कर दिया। मंत्रियों को साफ कहा गया कि अगर उन्होंने येदियुरप्पा का अब भी साथ दिया तो उन्हें अगले मंत्रिमंडल में नहीं लिया जाएगा। हाईकमान ने एम. वेंकैया नायडू को `ऑपरेशन येदियुरप्पा' के लिए बेंगलुरु रवाना कर दिया। पार्टी के कड़े रुख को देखते हुए येदियुरप्पा ने पद छोड़ने का फैसला किया और कहा कि वह 31 जुलाई को त्यागपत्र देंगे। उन्होंने बताया कि वह 31 जुलाई को इस्तीफा देंगे क्योंकि 31 जुलाई को शुक्ल पक्ष शुरू हो रहा है क्योंकि 30 जुलाई को अमावस्या है और ज्योतिषियों ने उन्हें शुभ मुहूर्त में इस्तीफा देने की सलाह दी है।
येदियुरप्पा ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर सांसद सदानन्द गौड़ा का नाम सुझाया है, लेकिन पार्टी शुक्रवार को होने वाली विधान मंडल की बैठक में ही नेता का फैसला करेगी। दिल्ली से अरुण जेटली और राजनाथ सिंह को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जा रहा है। मुख्यमंत्री के दावेदारों में के. ईश्वरप्पा, बीएस आचार्य, सुरेश कुमार और अनन्त कुमार भी दावेदार हैं। येदियुरप्पा लिंगायत हैं। कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अपनी इस जाति के ताकत पर ही येदियुरप्पा हाईकमान को ब्लैकमेल कर रहे थे। राज्य की कुल आबादी में लिंगात करीब 27 प्रतिशत हैं जबकि लिंगात के बाद दूसरे स्थान पर वोकलिंग हैं जो 17 प्रतिशत हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा वोकलिंग समुदाय से हैं। हाल के वर्षों में येदियुरप्पा लिंगात समुदाय के बड़े नेता के तौर पर उभरकर सामने आए। कर्नाटक भाजपा विधायक दल में ही 35 से ज्यादा विधायक लिंगायत जाति के हैं। विधायकों के बलबूते पर ही विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव या पंचायत चुनाव, लिगांत कार्ड खेलकर येदियुरप्पा भाजपा को चुनाव जिताने के साथ-साथ अपनी भी जड़ें जमाते रहे। भाजपा को उत्तराधिकारी चुनते समय कर्नाटक के जातीय समीकरण का जरूर ध्यान रखना होगा। जहां तक सम्भव हो येदियुरप्पा का उत्तराधिकारी भी लिगांयत समुदाय से ही होगा।
कर्नाटक की राजनीति में एक बहुत बड़ा फैक्टर रेड्डी बंधु हैं। रेड्डी बंधुओं की कहानी किसी किवदंती से कम नहीं लगती। पुलिस कांस्टेबल के बेटे, जिनके पास साइकिल खरीदने की क्षमता थी उनके पास आज अपना हेलीकाप्टर है। राजनीतिक पकड़ ऐसी कि मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी उन्हें किनारे करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उन पर लौह अयस्क के अवैध खनन के गम्भीर आरोप लगे। वे करीब 1500 करोड़ के खनन कारोबारी हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2002 में खनन तथा इसके निर्यात के व्यवसाय में उतरने के बाद उनकी सम्पत्ति अरबों में है। ओबुलापुरम माइनिंग कम्पनी का मालिकाना हक कर्नाटक के पर्यटन मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी के पास है तो येदियुरप्पा सरकार में बड़े भाई जी. करुणाकरण रेड्डी राजस्व मंत्री हैं जबकि छोटे भाई सोमशेखर बेल्लारी से विधानसभा सदस्य हैं। वर्ष 2009 में भी रेड्डी बंधुओं ने येदियुरप्पा के खिलाफ इसलिए विद्रोह कर दिया था कि उन्हें बेल्लारी में मनमाफिक अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार नहीं दिया गया। तब भी सुषमा स्वराज के दखल से मामला सुलझा। भाजपा के शीर्ष नेता कहते रहे हैं कि बेल्लारी में कांग्रेस के गढ़ तोड़ने के लिए भाजपा को उनका सहारा लेना पड़ा। रेड्डी बंधुओं का राजनीतिक उदय बेल्लारी संसदीय सीट से पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के चुनाव लड़ने के दौरान हुआ। भाजपा ने सोनिया के खिलाफ सुषमा स्वराज को मैदान में उतारा था। तब रेड्डी बंधुओं ने सुषमा को `काची' (मां) का दर्जा देते हुए उनकी जीत के लिए हर सम्भव कोशिश की थी पर जीत सोनिया की हुई। रेड्डी बंधुओं के सुषमा स्वराज से संबंधों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं लेकिन हाल ही में सुषमा ने दो टूक शब्दों में यह कह दिया कि रेड्डी बंधुओं से उनका कोई कारोबारी संबंध नहीं है। येदियुरप्पा के उत्तराधिकारी चुनने के समय भाजपा आलाकमान को रेड्डी बंधुओं से क्या रणनीति अपनानी है, इस पर भी गम्भीरता से विचार करना होगा क्योंकि यह सरकार बनाने और उखाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं।
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Thursday, 28 July 2011

गले की हड्डी बने येदियुरप्पा को अविलम्ब हटाओ

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th July 2011
अनिल नरेन्द्र
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार के खिलाफ अभियान चला रही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को लेकर बुरी तरह फंस गई है। दक्षिण भारत में अपनी पहली सरकार को बचाने के लिए भाजपा हाई कमान कोई जोखिम उठाने से कतरा रहा है। लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार का दोषी करार दिया है और श्री हेगड़े की नीयत व विश्वसनीयता पर शक नहीं किया जा सकता। वह राज्यपाल हंसराज भारद्वाज की तरह नहीं जो निजी एजेंडे या राजनीतिक एजेंडे पर काम करते हैं। जस्टिस हेगड़े एक ईमानदार और विश्वसनीय छवि के हैं। अगर उन्होंने येदियुरप्पा को दोषी पाया है तो यह सही होगा। दरअसल भाजपा नेतृत्व के लिए येदियुरप्पा गले की हड्डी बन चुके हैं जिसे न तो निगल पा रही है और न ही उगल पा रही है। येदियुरप्पा हर बार यही दलील दे देते होंगे कि अगर मुझे हटाया तो सरकार गिर जाएगी और दक्षिण भारत में भाजपा ने जो पैर जमाए हैं वह उखड़ जाएंगे। भाजपा नेतृत्व को येदियुरप्पा की ब्लैकमेलिंग के सामने अब और झुकना नहीं चाहिए। येदियुरप्पा के कारण भाजपा की केंद्र सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार की मुहिम को भी धक्का लग रहा है और कांग्रेस को यह मौका मिलता है कि वह भाजपा पर दोहरे मापदंडों का आरोप लगा सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा है कि लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद येदियुरप्पा पर उचित फैसला होगा। कह तो येदियुरप्पा भी यही रहे हैं कि रिपोर्ट आने के बाद पार्टी जो भी फैसला करेगी, वे उसे मानेंगे। भाजपा नेतृत्व को अविलम्ब येदियुरप्पा को हटाकर उनके उत्तराधिकारी की घोषणा कर देनी चाहिए, अब इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिए। सम्भव है कि कुछ प्रभावशाली शक्तियों को कुछ दूसरे फायदे येदियुरप्पा के टिके रहने पर होते हों पर अगर शरीर के किसी भाग में कैंसर हो जाए तो क्या शरीर को बचाने के लिए उस अंग को काट नहीं देते? अगर येदियुरप्पा सरकार चली भी जाती है तो भी भाजपा को वापस आने में फायदा मिलेगा।
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