अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद से खाड़ी देशों में आपसी मतभेद तेजी से बढ़ते नजर आने लगे हैं। होर्मूज स्ट्रेट के बंद होने से स्थिति विस्फोटक होती जा रही है। इस रास्ते के बंद होने से खाड़ी के बड़े देश जिनकी अर्थव्यवस्था तेल के निर्यात पर निर्भर है वह खासे उत्तेजित हैं। इसका एक नतीजा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का प्रमुख तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर जाने का फैसला। यह फैसला ईरान जंग की वजह से ऐतिहासिक रूप से दुनियाभर में ऊर्जा को लेकर एक बड़ा संकट पैदा हुआ है और जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। यूएई ने कहा है कि यह फैसला उसकी दीर्घकालिक रणनीति इकोनॉमिक विजन और बदलती एनजी प्रोफाइल को दर्शाती है। यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल मजरूई ने कहा है कि इस समूहों के तहत किसी बाध्यता से मुक्त होने पर देश को ज्यादा लचीलापन मिलेगा। ओपेक को 60 साल बाद छोड़ने का फैसला यूएई ने अचानक नहीं लिया, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से पनप रहा असंतोष है। अबू धाबी को लगातार यह खटक रहा था कि सऊदी अरब ओपेक के जरिए तेल उत्पादन को नियंत्रित करता है और यूएई को अपनी क्षमता के हिसाब से ज्यादा तेल निकालने नहीं देता। जब यूएई ज्यादा उत्पादन करना चाहता था, तब सऊदी कम उत्पादन पर जोर देता रहा, जिससे दोनों देशों में तनाव बढ़ता चला गया। इस तनाव को हवा और तब मिली जब पाकिस्तान की भूमिका सामने आई। यूएई को पाकिस्तान का रवैया बिल्कुल पसंद नहीं आया, खासकर तब जब अमेरिका और ईरान के बीच वह मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा था। एमएसटी फाइनेंशियल में ऊर्जा अनुसंधान के प्रमुख शाऊल कावर्निक ने कहा कि यह गठबंधन के अंत की शुरुआत हो सकती है। यूएई के जाने के साथ ओपेक अपनी क्षमता का लगभग 15 प्रतिशत खो देगा। इस फैसले को ओपेक के साथ-साथ इस गुट के सर्वेसर्वा माने जाने वाले सऊदी अरब के लिए झटका माना जा रहा है। यूएई का बाहर जाना अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक जीत माना जा रहा है जिन्होंने पहले ओपेक पर दुनिया का शोषण करने का आरोप लगाया था। जनवरी में उन्होंने सऊदी अरब और अन्य ओपेक देशों से तेल की कीमत कम करने को कहा था और टैरिफ लगाने की अपनी धमकी को भी दोहराया था। यूएई का ओपेक से अलग होने का निर्णय सिर्फ एक सदस्य देश का प्रस्थान नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक अहम मोड़ है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, होर्मूज जलडमरूमध्य पर अनिश्चितता और वैश्विक मुद्रास्फीति पहले से ही तेल बाजार को अस्थिर बनाए हुए है। यूएई ओपेक का तीसरा बड़ा उत्पादक सदस्य देश था और समूह के उत्पादन में करीब 12 फीसदी का योगदान करता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक की आपूर्ति क्षमता को प्रभावित जरूर करेगा। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर ओपेक की शर्तें से मुक्त यूएई वैश्विक तेल बाजार को अतिरिक्त आपूर्ति करता है तो इससे तेल की कीमतों में कमी आ सकती है। यह स्थिति भारत जैसे उन देशों के लिए विशेष तौर पर फायदेमंद है जो ऊर्जा के आयात पर ही निर्भर है। गौरतलब है कि भारत अपने ऊर्जा सुरक्षा संबंधी तथ्यों से निपटने के लिए लंबे समय से ओपेक देशों से तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी करने की मांग करता रहा है। भारत का कुल तेल जरूरतों का लगभग 40 फीसदी हिस्सा ओपेक देशों से आता है। हालांकि यह देखते हुए कि वैश्विक ऊर्जा बाजार कभी स्थिर नहीं रहता, वह निरंतर भू-राजनीतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय बदलावों से प्रभावित होता रहता है। सऊदी अरब के लिए अब बाकी ओपेक देशों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती बन गया है। यूएई ने शुरुआत कर दी है, अब देखना होगा कि और कौन-कौन से देश इसके नक्शे-कदम पर चलते हैं।
-अनिल नरेन्द्र
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