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Thursday, 26 April 2012

...और फिर पड़ी फूट टीम अन्ना में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26 April 2012
अनिल नरेन्द्र
टीम अन्ना में फूट पड़ चुकी है। टीम अन्ना की कोर कमेटी की बैठक में रविवार को जमकर हंगामा हुआ। रविवार को नोएडा के सेक्टर-43 में टीम की कोर कमेटी की बैठक हुई। बैठक का एजेंडा था आंदोलन की रणनीति तैयार करना। इसमें बाबा रामदेव के साथ साझा आंदोलन पर भी चर्चा होनी थी। टीम अन्ना की कोर कमेटी की इस अहम बैठक में अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण, किरण बेदी, एकमात्र मुस्लिम चेहरा मौलाना शमून कासमी, गोपाल राय, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास मौजूद थे। रामदेव के साथ आंदोलन के सवाल पर किरण बेदी कहाöजब बुरे लोग साथ आ सकते हैं तो अच्छे लोग क्यों नहीं? इस पर कासमी ने कहा कि महत्व कम होने की आशंका केजरीवाल को है। इसलिए आपत्ति उन्हें ही ज्यादा है। बहस चल ही रही थी कि कोर कमेटी के सदस्य गोपाल राय की नजर शमून कासमी पर गई। वे मोबाइल पर बातें कर रहे थे, राय ने कासमी से मोबाइल मांगा, अलग कमरे में जाकर चैक करने पर बैठक की उपलिकिंग मिली। प्रशांत भूषण ने कासमी से पूछा कि आखिर आपने ये रिकार्डिंग क्यों की? इस पर कासमी चुप रहे। भूषण ने उन्हें टीम से हटने और बैठक से बाहर जाने को कहा। कासमी बिना किसी प्रकार की सफाई दिए शाम 4 बजे बैठक से उठकर चले गए। कुमार विश्वास ने बाद में कहा कि कासमी बैठक का ऑडियो रिकार्ड करते रंगे हाथों पकड़े गए हैं। प्रशांत भूषण ने कहा कि सभी रिकार्ड करने की कोई खास वजह नहीं बता पाए। अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि अग्निवेश की तरह रंगे हाथों पकड़े गए कासमी। शाजिया इल्मी ने कहा कि विश्वासघात करने पर टीम से हटा दिया गया है। उधर मौलाना शमून कासमी ने कहा कि मैं शुरुआत से ही आंदोलन से जुड़ा रहा हूं। केजरीवाल अन्ना का इस्तेमाल कर रहे हैं। आंदोलन मुस्लिम विरोधी हो रहा है। एक मुस्लिम को ये देखना नहीं चाहते। अन्ना हजारे भी कसम खाने लगे हैं अब। कोर कमेटी की बैठक में जो हुआ, वह पहले से ही तय था। उन्होंने कहा कि अन्ना का आंदोलन राजनीति और सांप्रदायिकता का शिकार हो गया है। वे खुद ही कोर कमेटी छोड़ रहे हैं। कासमी ने टीम अन्ना के कई सदस्यों पर सनसनीखेज आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कोर कमेटी की बैठक में अरविन्द केजरीवाल और कुमार विश्वास के बीच जोरदार झड़प हुई। विश्वास पर राज्य सरकार की दलाली का आरोप लगाया गया। खुद अन्ना ने केजरीवाल के हिमाचल दौरे पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशांत भूषण और कुछ अन्य सदस्य चुनाव लड़ना चाहते हैं। हालांकि केजरीवाल ने इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया देने से इंकार करते हुए कहा कि निकाले जाने की वजह से कासमी इस तरह की अनर्गल बात कर रहे हैं। अन्ना के आंदोलन में भीतरघात का यह दूसरा मौका है। इससे पहले पिछले साल जब जन लोकपाल आंदोलन चरम पर था, उसी दौरान स्वामी अग्निवेश पर भी सरकार के लिए जासूसी करने का आरोप लगा था। कासमी और अग्निवेश के अलावा पीवी राजगोपाल और जल पुरुष राजेन्द्र सिंह भी टीम अन्ना से अलग हो चुके हैं। दुःख से कहना पड़ता है कि अन्ना हजारे की चमक दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है, वह बात नहीं रही।
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Wednesday, 28 March 2012

टीम अन्ना ने एक बार फिर जोरदार अंगड़ाई दिखाई

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28 March 2012
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे ने रविवार को नई दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर एक दिन का उपवास रखकर जन लोकपाल आंदोलन को फिर जिन्दा करने का प्रयास किया। भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों का सामना कर रहे राजनेताओं के खिलाफ अगस्त तक एफआईआर दर्ज नहीं होने पर जेल भरो आंदोलन शुरू करने की धमकी दी। साथ ही केंद्र सरकार को चेतावनी दी कि 2014 तक लोकपाल बिल लाओ या कुर्सी छोड़ने को तैयार रहो। रविवार को जन्तर-मन्तर पर वही पुराना माहौल नजर आया जो पिछले साल अप्रैल और अगस्त में रामलीला मैदान पर देखने को मिला था। टीम अन्ना दिल्ली में फिर भारी जन समर्थन पाने में सफल रही। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर एक दिवसीय धरने के दौरान टीम अन्ना ने मजबूत जन लोकपाल की मांग दोहराई। इस दौरान टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे लोगों की सुरक्षा को लेकर राजनेताओं पर तल्ख टिप्पणियां कीं। संसद की अवमानना का आरोप झेल रहे अरविन्द केजरीवाल पर लगता है कि सांसदों का कानूनी नोटिस का कोई खास असर नहीं हुआ है। `बीहड़ों में तो बागी पाए जाते हैं, डकैत तो पार्लियामेंट में बनते हैं।' हाल ही में आई अभिनेता इरफान खान और निर्देशक हिमांशु धूलिया की फिल्म पान सिंह तोमर का यह डायलाग अरविन्द केजरीवाल को इतना पसंद आया कि उन्होंने फिल्म को तीन बार देखा। लेकिन जब उन्होंने इस बात को सच्चाई के साथ कहा तो नेताओं को बुरा लग गया और सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेकर उन्हें विशेषाधिकार के हनन का नोटिस थमा दिया गया। जब चोर हैं तो चोर कहने से क्यों डरते हैं जबकि सत्य तो यह है कि जनता द्वारा चुनकर संसद भवन के अन्दर पहुंचने वाले करीब 50 फीसदी सांसद ऐसे हैं जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं, यह कहना था केजरीवाल का। विधानसभा में ताल ठोंकने वाले हजारों विधायक अपराध की सीढ़ी चढ़कर नेतागिरी का चोला ओढ़ने में कामयाब हैं। अरविन्द केजरीवाल के अनुसार मीडिया साइट्स और अखबारों के माध्यम से इस बात का स्पष्टीकरण हो चुका है कि संसद भवन में गरिमा और नैतिकता की बात करने वाले करीब 162 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। 34 कैबिनेट मंत्रियों में से 14 के ऊपर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप हैं। केजरीवाल के अनुसार जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप हैं वह हैंöपी. चिदम्बरम (2जी स्पैक्ट्रम घोटाला), अजीत सिंह (विकीलीक्स के अनुसार इन्होंने 10 करोड़ रुपये प्रति सांसद बांटे), फारुख अब्दुल्ला पर जेके क्रिकेट एसोसिएशन घपले का आरोप है, जीके वासन ने 2 लाख एकड़ जमीन तमिलनाडु में महज 44 करोड़ रुपये में कुछ चहेती कम्पनियों को बेच दी। कमलनाथ ने सांसदो के वोट खरीदने के लिए पैसा बांटा। कपिल सिब्बल पर 2जी घोटाले में शामिल होने का आरोप है। शरद पवार का नाम तेलगी स्कैम में उछला। श्रीप्रकाश जायसवाल पर 10 लाख करोड़ कोला स्कैंडल में शामिल होने का शक है। आदर्श हाउसिंग सोसाइटी स्कैम में सुशील कुमार शिंदे का नाम भी आया है। विलासराव देशमुख का भी इसी स्कैम में नाम उछला है। एमके अलागिरी ने 20 करोड़ रुपये की भूमि महज 85 लाख रुपये में खरीदी। वीरभद्र सिंह पर एफआईएएस अफसर को घूस देने का मामला चल रहा है। एसएम कृष्णा का नाम माइनिंग स्कैम में आ चुका है और प्रफुल्ल पटेल पर एयर इंडिया को डुबाने का आरोप है। केजरीवाल ने आगे कहा कि 14 सांसद ऐसे हैं जिन पर हत्या का केस चल रहा है। वहीं 20 सांसदों पर हत्या के प्रयास का मामला कोर्ट में विचाराधीन है। 11 सांसदों पर ठगी और जमीन हड़पने आदि में शामिल कोर्ट में अभी भी मामले चल रहे हैं। 13 सांसद ऐसे हैं जो अपहरण कर फिरौती मांगने के मामले में वांछित चल रहे हैं। देश के सभी राज्यों में कुल मिलाकर 4120 विधायक चुने जाते हैं। इनमें करीब 1176 विधायक ऐसे हैं जिन पर आपराधिक मामले थानों में दर्ज हैं। 513 विधायकों पर अपहरण, हत्या, हत्या के प्रयास और रंगदारी मांगने का केस फाइलों में धूल चाट रहा है। केजरीवाल ने कहा कि एक चपरासी की नौकरी पाने के लिए लोगों को चरित्र प्रमाण पत्र देना पड़ता है। उसके खिलाफ एक भी केस दर्ज होता है तो उसे नौकरी नहीं दी जा सकती। मुंबई में अन्ना का आंदोलन थोड़ा कमजोर दिखाई पड़ा तो सरकार ने यह मान लिया कि टीम अन्ना अब सरकार के लिए ज्यादा खतरा नहीं होगी पर जिस तरीके से जन्तर-मन्तर पर जनता आई लगता है कि उससे एक बार फिर सरकार में बेचैनी दिखेगी और केजरीवाल के अत्यंत गम्भीर बयान की प्रतिक्रिया अवश्य होगी।
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Friday, 30 December 2011

लोकपाल बिल का यह हश्र होगा, सभी को मालूम था

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th December 2011
अनिल नरेन्द्र
हकीकत तो यह है कि लोकपाल बिल को लेकर न तो मनमोहन सरकार गम्भीर थी और न ही विपक्ष। हमें तो लगता यह है कि सरकार और कांग्रेस पार्टी लोकपाल बिल को सिर्प लोकसभा और राज्यसभा में पेश करना चाहती थी। पारित हो जाता तो भी ठीक था, न होता तो भी ठीक था। जोर-जबरदस्ती से लोकसभा में पारित तो करवा लिया पर उसे संवैधानिक दर्जा दिलवाने में फेल हो गई। उधर विपक्ष का कभी भी इरादा इसे पास कराने व संवैधानिक दर्जा देने का नहीं था। इसलिए उसने बहस में हिस्सा तो लिया पर वोट करने के समय बटन नहीं दबाया। भारतीय जनता पार्टी और मार्क्सवादी पार्टी को लोकपाल के वर्तमान स्वरूप पर ऐतराज था और उसने लोकपाल के मूल रूप में कुछ संशोधन चाहे। पर सरकार इन संशोधनों को मानी नहीं इसलिए विपक्ष ने बिल के समर्थन में वोट नहीं दिया। कांग्रेस अब यह कह रही है कि हमने तो लोकपाल बिल पारित करवा दिया है पर भाजपा ने बटन न दबाकर अपने आपको एक्सपोज कर दिया है। भाजपा का कहना है कि ऐसे अपभावी लोकपाल बिल का समर्थन करके हमने अपनी नाक नहीं कटानी थी। हम ऐसे खोखले लोकपाल बिल का समर्थन कैसे कर सकते हैं? कांग्रेस का मकसद पभावी लोकपाल लाने का कभी था ही नहीं वह तो बस संसद में इसे पेश करना चाहती थी ताकि आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में इसकी पार्टी को लाभ मिल सके ताकि वह जनता के बीच यह कह सके कि देखो हम तो ले आए पर भाजपा ने बटन नहीं दबाया और अपने आपको एक्सपोज कर दिया है। लोकसभा में जिस तरह सरकार की इस बिल को संवैधानिक दर्जा देने की कोशिश में किरकिरी हुई उससे भी ज्यादा किरकिरी राज्सभा में होगी। राज्यसभा में तो विपक्ष का बोलबाला है। कांग्रेस और उनके सारे सहयोगी दलों की संख्या 99 होती है। नामित 8 और निर्दलीय 6 को भी अगर सरकार अपने पक्ष में जोड़ ले तब भी हार का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि विपक्ष की कुल संख्या 131 सांसदों की है और इनमें ऐसे दल हैं जो किसी भी हालत में सरकार का साथ नहीं दे सकते। इसलिए राज्यसभा में भी सरकार इस बिल को संवैधानिक दर्जा नहीं दिलवा सकती। इस पूरे पकरण को कैसे आंका जाए? एक दृष्टि से सिवाय दो-तीन बिन्दुओं के बाकी में तो सफलता मिली ही है, जो काम पिछले 40 सालों में नहीं हो सका वह पहली बार यहां तक पहुंचा है। इसके साथ यह भी ठीक है कि जिस मकसद से अन्ना हजारे ने अपना आंदोलन किया वह मकसद पूरा नहीं हुआ। लोकसभा में आंकड़ों की अग्निपरीक्षा के बाद सरकारी लोकपाल की तस्वीर भी बदल चुकी है। संशोधनों के साथ राज्यसभा की मुहर का इंतजार कर रहा लोकपाल अब न तो संवैधानिक संस्था होगा और न ही इसके जरिए लोकायुक्त की स्थापना राज्यों के लिए बाध्यता होगी। लोकपाल में सांसदों के खिलाफ शिकायत पर कार्रवाई को लेकर लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति की रिपोर्ट का पावधान तीखे विरोध के बाद सरकार ने ही वापस ले लिया। बदले हुए पावधानों के मुताबिक पधानमंत्री के विरुद्ध किसी शिकायत की जांच शुरू करने के लिए नौ सदस्यों वाले लोकपाल में अब दो-तिहाई सदस्यों की सहमति जरूरी है। पहले इसके लिए तीन-चौथाई सदस्यों की मंजूरी निर्धारित की गई थी। लोकपाल विधेयक में टकराव का सबसे बड़ा बिंदु रहा लोकायुक्त स्थापना के राज्यों के अधिकार का अतिकमण। सूबों में लोकायुक्त स्थापना की बाध्यता खत्म कर इसे वैकल्पिक बनाने की बात भी सरकार को माननी पड़ी। लोकपाल के दायरे में सशस्त्र सेनाओं को भी बाहर कर दिया गया है। गोया चालीस वर्षों से देश के साथ आंख मिचौली खेल रहा यह ब्रह्मास्त्र अब भी फायरिंग मूड में नहीं दिख रहा है। वह तो भला हो अन्ना हजारे और उनके अनशन आंदोलन का कि भ्रष्टाचार पर पहली बार आम आदमी की त्योरियां चढ़ीं और लोकपाल कानून जन-जन का संवाद बन पाया। अब सरकार लोकपाल बिल राज्यसभा में लाने के बजाए उसे पारित कराने के लिए संसद का संयुक्त सत्र आयोजित कर सकती है। यह रास्ता भी आसान नहीं होगा। क्योंकि एक तो संवैधानिक तौर तरीकों का सवाल सतह पर है और दूसरे सरकार के सहयोगी दलों की नाराजगी खत्म होने का नाम नहीं ले रही। यह विचित्र है कि खुद सत्ता में साझीदार राजनीतिक दल लोकपाल के मौजूदा पावधानों से सहमत नहीं। तृणमूल कांग्रेस को अब भी लग रहा है कि यह विधेयक राज्यों के अधिकारों का अतिकमण करने वाला है। लोकपाल को संवैधानिक दर्जा न हासिल हो पाने के लिए विरोधी दलों पर उबल रहे सत्तापक्ष को पहले इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि क्या उसके सहयोगी दल पूरी तरह इस मुद्दे पर उसके साथ हैं? लोकसभा में बहसों के रंग देखकर आश्चर्य भी हुआ कि देश की बुनियाद खोद रहे भ्रष्टाचार के खात्मे को लेकर हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की शीर्षस्थ संस्था इतने तनाव में क्यों है? ऐसे तर्प गढ़े जा रहे हैं कि एक असरदार लोकपाल हमारे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। जो ऊर्जा भ्रष्टाचार के खात्मे के उपाय ढूंढने में लगानी चाहिए उसे अन्ना या नागरिक समाज को निशाना बनाने में क्यों खर्च किया जा रहा है? यह भी आश्चर्य हुआ कि कड़े निर्देश, व्हिप जारी करने के बावजूद सत्ताधारी गठबंधन के दो दर्जन से अधिक सांसद कैसे ऐन मौके पर गायब मिले और अपनी ही सरकार की किरकिरी करवाने के जिम्मेदार बने। इनमें खुद कांग्रेस के करीब डेढ़ दर्जन सांसद शामिल थे। देश जिस मुद्दे पर उबल रहा है उस पर हमारे जन पतिनिधि क्या इतने असंवेदनशील हैं। इस लोकसभा में लोकपाल विधेयक पारित हो जाने का दबाव कहें या फिर अपेक्षा के अनुरूप समर्थकों की भीड़ न जुटा पाने का असर कि बुधवार को अन्ना हजारे ने अपना अनशन बीच में ही तोड़ दिया। यही नहीं उन्होंने 30 दिसम्बर से सांसदों के आवासों पर पस्तावित धरना और जेल भरो अभियान भी स्थगित कर देने का ऐलान किया है। आंदोलन से इस तरह पीछे हटने को टीम अन्ना का हौसला टूटने के तौर पर देखा जा रहा है। अन्ना मुंबई में तीन दिन ही अनशन पर बैठे, हालांकि उन्हें पहले से ही बुखार की शिकायत थी मगर वे अनशन के अपने फैसले पर अडिग रहे। इसके बाद कई बार उनकी हालत काफी बिगड़ी और डाक्टर सहयोगियों ने उनको उपवास खत्म करने की सलाह भी दी, लेकिन वे इंकार करते रहे। बुधवार की शाम अन्ना ने मंच पर आकर लोगों को संबोधित किया और इसी दौरान अनशन तोड़ने की घोषणा की। अन्ना ने कहा संसद में जो कुछ हुआ वह दुखद है। अब हमारे पास एक ही रास्ता है। हम नया कार्यकम बनाएंगे और राज्यों में जाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण चलाएंगे। लोगों को बताया जाएगा कि मौजूदा केन्द्र सरकार ने किस तरह देश की जनता के साथ विश्वासघात किया। लोकपाल बिल का यही हश्र होगा इस पर हमें शुरू से अंदाजा था।
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Tuesday, 27 December 2011

सीबीआई की सरकार के चंगुल से मुक्ति पाने का स्वप्न टूटा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th December 2011
अनिल नरेन्द्र
सीबीआई के भविष्य को लेकर सरकार व टीम अन्ना और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। सीबीआई पर अन्ना हजारे की मांग खारिज कर दी गई है। सरकार ने इसे लोकपाल के दायरे से बाहर रखा है। सीबीआई का कोई स्वतंत्र अभियोजन सीधे तौर पर लोकपाल के तहत नहीं रखा गया है। लेकिन लोकपाल भ्रष्टाचार से जुड़े किसी मामले के जांच की सिफारिश सीबीआई से कर सकती है। सीबीआई पमुख की नियुक्ति एक पैनल करेगा, जिसमें पधानमंत्री, नेता पतिपक्ष और चीफ जस्टिस शामिल होंगे। सीबीआई में एसपी व उससे ऊपर के अफसरों की नियुक्ति एक समिति करेगी। इसमें सीवीसी, विजिलैंस कमिश्नर, गृह सचिव व कार्मिक विभाग के सचिव होंगे। सीबीआई की जांच शाखा के लिए जांच निदेशक का पद बनाया गया है। लोकपाल के पस्तावित रूप से सीबीआई में गहरी निराशा है। इससे जांच एजेंसी की सरकार के चंगुल से मुक्ति पाने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। इसके साथ ही लोकपाल द्वारा सौंपे गए मामलों में चार्जशीट के लिए पूर्व अनुमति लेने का पावधान से उसकी मौजूदा स्वायत्तता पर भी सवालिया निशान लगा रहे हैं। राहत की बात सिर्प इतनी है कि नियुक्ति की पकिया में पधानमंत्री, नेता विपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश के शामिल होने से सीबीआई निदेशक के पद की गरिमा बढ़ गई है। एक अधिकारी के मुताबिक एजेंसी की स्वतंत्रता की बात बेमानी है। सीबीआई अधिकारियों की पतिनियुक्ति व पोन्नति से लेकर छोटे-छोटे खर्च तक के लिए सरकार का मुंह ताकना पड़ेगा। ऐसे में जांच एजेंसी से संसद की स्थायी समिति द्वारा बनाए लोकपाल के पारूप पर छह आपत्तियां जताई गई हैं। इसे लेकर सीबीआई निदेशक खुद पधानमंत्री से मिले थे। लेकिन इन छह आपत्तियों में से एक पूरी और एक आधी दूर की गई। सीबीआई निदेशक की नियुक्ति में पीएम, नेता विपक्ष और संवैधानिक संस्था के पमुख को शामिल करने की मांग पूरी की गई लेकिन एफआईआर और चार्जशीट दाखिल करने की स्वायत्तता में जांच एजेंसी को समझौता करने के लिए मजबूर किया गया है। इसके तहत लोकपाल द्वारा सौंपे गए मामलों में सीबीआई चार्जशीट करने के लिए स्वतंत्र नहीं होगी। सीबीआई का कहना है कि जांच एजेंसी पुलिस अथवा सीबीआई के अधिकारी मामले की छानबीन करते हैं। छानबीन के आधार पर आईओ अपनी फाइनल रिपोर्ट अदालत में पेश करता है। ये रिपोर्ट चार्जशीट तथा क्लोजर दोनों में से कुछ हो सकती है। आईओ छानबीन के आधार पर यह तय करता है कि चार्जशीट होगा या फिर क्लोजर रिपोर्ट। लेकिन लोकपाल बिल की धारा 20 (7) में यह पावधान किया गया है कि उस रिपोर्ट को कोर्ट में पेश किए जाने से पहले लोकपाल के सामने रखा जाए और वह तय करेगा कि मामले में क्या करना है। जबकि लोकपाल से जुड़ा शख्स पुलिस अधिकारी नहीं होगा और इस तरह यह सीआरपीसी की धारा-173 के पावधानों के विपरीत होगा। सीबीआई के मुताबिक उसे आर्थिक और पशासनिक स्वायत्तता की जरूरत है। सीबीआई अभी भी सरकार पर आर्थिक और पशासनिक तौर पर निर्भर है। इसी कारण लोगों में अवधारणा है कि सीबीआई को पभावित किया जा सकता है। लोकपाल बिल में इसके बारे में भी कोई पावधान नहीं है। कुल मिलाकर लोकपाल के पस्तावित पारूप से सीबीआई में गहरी निराशा है। इससे जांच एजेंसी की सरकार के चंगुल से मुक्ति पाने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
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Thursday, 22 December 2011

लोकपाल बिल पर टकराव की पूरी सम्भावना है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23rd December 2011
अनिल नरेन्द्र
सरकार और अन्ना हजारे का टकराव अब होना सम्भावित लग रहा है। सरकार ने साफ कर दिया है कि न तो उसे टीम अन्ना से कोई डर है और न ही अब वह उसके सामने झुकने को तैयार है। वह टीम अन्ना से लम्बी लड़ाई लड़ने को तैयार है। अब तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी मैदान में आ गई हैं और उन्होंने कमान सम्भाल ली है। सोनिया गांधी न लोकपाल को आधार बनाते हुए अन्ना हजारे और विपक्षी दलों को सीधी चुनौती दे दी है। सरकारी लोकपाल बिल का समर्थन करते हुए उन्होंने बुधवार को कहा कि इसे अब अन्ना और विपक्ष को स्वीकार कर लेना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते तो कांग्रेस पांच राज्यों के आगामी चुनाव में इन दोनों चुनौतियों से निपटने तथा लम्बी लड़ाई लड़ने को तैयार है। बुधवार को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में आक्रामक तेवर दिखाते हुए सोनिया ने पहली बार लोकपाल पर अपने विचार रखे। सरकार और संगठन के बीच किसी भी मतभेद को दरकिनार करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि यह बिल बहुत अच्छा बना है और इसे पारित कराने में विपक्ष को अड़चन पैदा नहीं करनी चाहिए और अन्ना हजारे को भी इसे स्वीकार कर लेना चाहिए पर अन्ना हजारे को वर्तमान स्वरूप में लोकपाल बिल स्वीकार्य नहीं है। सबसे बड़ा मतभेद सीबीआई और ग्रुप सी की ब्यूरोकेसी को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने को है। अन्ना ने अपना अभियान तेज करते हुए कहा कि सीबीआई को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने के पीछे सरकार की मंशा नेताओं को बचाने की है। यदि सीबीआई (लोकपाल से) बाहर रहेगा तो लोकपाल कैसे मजबूत होगा? यदि सीबीआई लोकपाल के आधीन आ जाती है तो (गृहमंत्री) पी. चिदम्बरम जेल के अन्दर होंगे। आप भ्रष्ट नेताओं को बचा रहे हैं और कह रहे हैं कि यह मजबूत लोकपाल है। उन्होंने कहा कि यह सरकार लोगों को धोखा दे रही है। जनता उसे सबक सिखा देगी। उन्होंने कहा कि अगले साल उत्तर प्रदेश और जिन चार अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं वहां संप्रग के खिलाफ अभियान चलाएंगे। विधेयक को खारिज करते हुए अन्ना ने कहा कि अलग से सिटीजन चार्टर विधेयक लाने के लिए भी सरकार ने जनता के हितों को नजरंदाज किया है। आम आदमी को अपनी शिकायत के निवारण के लिए प्रस्तावित तंत्र के तहत बेमतलब यहां से वहां दौड़ना पड़ेगा। यह लोगों से धोखा है। उधर सरकार ने मंगलवार को भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए अपनी रणनीति के तहत लोकसभा में सिटीजन चार्टर बिल पेश कर दिया। विधेयक में हर नागरिक को समयबद्ध तरीके से सामान और सेवाओं की उपलब्धता के साथ-साथ शिकायतों के निवारण का अधिकार दिया गया है यानि सरकारी महकमों में कौन-से काम कितने दिनों में होंगे। इसके लिए कौन जिम्मेदार है, यह पहले से बताना होगा। ऐसा न होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ शिकायत की जा सकेगी। हमें नहीं लगता कि लोकसभा में इसी सत्र में यह बिल पास हो सकेगा? क्रिसमस की छुट्टी के बाद सदन की कार्यवाही 27, 28 और 29 दिसम्बर तक बढ़ाने को लेकर सांसदों में भारी विरोध है। क्रिसमस के बाद सदन चलाने को लेकर खासतौर से केरल और अरुणाचल प्रदेश के सांसदों का विरोध इसलिए है कि उन्होंने पहले से ही साल के अन्त में परिवार के साथ छुट्टियां मनाने का प्रोग्राम बना रखा है। उनमें से कई विदेश भी जाना चाह रहे हैं। उधर भाजपा सहित अन्य विपक्षी दलों का भी सरकारी लोकपाल बिल पर स्टैंड स्पष्ट नहीं। लोकपाल के कई प्रावधानों पर अब भी सहमति नहीं है। सरकारी प्रवक्ता कह रहे हैं कि सिर्प दो दिन में ही लोकपाल पारित हो सकता है बशर्ते विपक्ष साथ दे और पारित कराने में सहयोग दे। लेकिन सरकारी मसौदा देखने से पहले विपक्ष खासतौर से भाजपा कोई भी आश्वासन देने को तैयार नहीं था। दूसरे विपक्षी दल भी तेवर बनाए हुए हैं। ऐसे में 23 दिसम्बर तक विस्तृत चर्चा के बाद लोकपाल पारित कराना सम्भव नहीं लगता। अगर संसद में विधेयक को लेकर आम सहमति न बनी तो आगे क्या होगा? सम्भव है कि विधेयक को सिलैक्ट कमेटी को सौंप दिया जाए। इससे सभी पक्षों का स्टैंड बरकरार रहेगा।
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Saturday, 17 December 2011

क्या लोकपाल पर सरकार और अन्ना का टकराव टलेगा?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17th December 2011
अनिल नरेन्द्र
 लोकपाल को लेकर स्थिति असमंजस की बनी हुई है। लोकपाल बिल क्या इस सत्र में आएगा, नहीं आएगा, आएगा तो कब और किस स्वरूप में? यह हैं प्रश्न जिनका आज दावे से उत्तर नहीं दिया जा सकता। बुधवार को सरकार की तरफ से सर्वसम्मति बनाने का प्रयास विफल हो गया। बुधवार को प्रधानमंत्री निवास पर तीन घंटे चली सर्वदलीय बैठक बेनतीजा रही। इस बैठक में सरकार ने सभी दलों की राय तो ली पर अपने पत्ते नहीं खोले। फिर चाहे प्रधानमंत्री का मसला हो या सीबीआई और ग्रुप सी को लोकपाल के दायरे में लाने का। ऐसे में कोई सर्वमान्य फार्मूला नहीं निकला। अब मामला फिर सरकारी पाले में आ गया है। सरकार की मुसीबतें काफी बढ़ गई हैं। असहमतियों की लम्बी लिस्ट के बीच से ही बिल का मसौदा तैयार करना होगा। सूत्रों के मुताबिक मौजूदा सत्र में बिल के पास होने की संभावना मुश्किल दिखती है। संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने कहा कि दलों की अलग-अलग राय से मसौदे में बदलाव करना होगा। इससे सरकार के पास काम बढ़ गया है, फिर भी उसे भरोसा है कि वह मौजूदा सत्र में बिल पास कर देगी। सूत्रों के अनुसार कुछ शर्तों के साथ पीएम को लोकपाल में शामिल कर सकती है। सरकार लोअर ब्यूरोकेसी पर मतभेदों को लेकर सरकार लोकपाल के दायरे में रखे जाने और इसके लिए एक जरूरी सटीक मैकेनिज्म बनाने पर विचार कर रही है। सीबीआई पर कोई सहमति बनना मुश्किल है। रविवार को रूस से लौटकर प्रधानमंत्री कैबिनेट मीटिंग करेंगे जिसमें लोकपाल बिल को संशोधित मसौदे को मंजूरी दी जा सकती है। सोमवार को सभी पार्टियों के सांसदों के बीच इस बिल के मसौदे की कॉपी दी जा सकती है। इसके अगले दिन मंगलवार को इसे संसद के पटल पर रखा जा सकता है। संसद का सत्र गुरुवार को खत्म होने वाला है। जरूरत पड़ने पर सत्र को एक दिन के लिए बढ़ाया जा सकता है। दूसरी ओर सरकार के मसौदे से असंतुष्ट अन्ना हजारे ने कहा कि इस बार वे अनशन पर नहीं बैठ रहे बल्कि सीधे कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। अगर सख्त लोकपाल नहीं आया तो एक जनवरी से संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके पुत्र एवं कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के घर के सामने खुद धरना भी देंगे। अन्ना ने गुरुवार को कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सरकार संसद के इसी सत्र में सख्त प्रावधानों वाला लोकपाल बिल पेश करेगी। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ऐसा करती है तो वो खुद उसका आभार जताएंगे। सरकार के शीर्ष लोगों को गुलाब पेश करेंगे। साथ ही उन्होंने संप्रग को चेतावनी भी दे डाली, कहा कि सख्त लोकपाल बिल नहीं आया तो इस बार सिर्प रामलीला मैदान या आजाद मैदान तक सीमित नहीं रहेगा। 27 दिसम्बर से शुरू होने वाले अनशन के अलावा एक जनवरी से जेल भरो आंदोलन भी चलाया जाएगा। लोकपाल का विरोध करने वाले सांसदों का विरोध किया जाएगा। टीम अन्ना के प्रमुख सिपहसालार प्रशांत भूषण का कहना है कि यूपीए सरकार बहानेबाजी पर उतर आई है। देश के सभी लोगों को अब यह महसूस होने लगा है कि सरकार मजबूत लोकपाल कानून बनाना ही नहीं चाहती। विधेयक संसद में रखने से पहले ही सरकार ने टालमटोल का रवैया अपनाना शुरू कर दिया है। उम्मीद की जाती है कि सरकार और अन्ना हजारे का टकराव नहीं होगा। वैसे भी सर्दी का मौसम है सभी का प्रयास यही होना चाहिए कि मामला सुलट जाए। कुछ सरकार झुके, कुछ लचीलापन टीम अन्ना दिखाए। आखिर जो मामला पिछले 40 सालों से लटका है वह इतनी आसानी से तो नहीं सुलटेगा।
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Thursday, 20 October 2011

अन्ना और उनकी टीम पर चौतरफा हमले


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th October 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे और उनकी टीम पिछले कुछ दिनों से चारों तरफ से समस्याओं से घिरती जा रही है। एक-एक करके कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। अन्ना ने खुद मौन व्रत धारण कर लिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि सवालों से परेशान अन्ना ने जवाब न देने के लिए मौन धारण किया है। मंगलवार को उनके सिपहसलार अरविंद केजरीवाल पर लखनऊ में एक व्यक्ति ने चप्पल फेंकी। उत्तर पदेश में अन्ना का संदेश लेकर दौरा कर रहे केजरीवाल राजधानी में गोमती नदी के किनारे झूलेलाल पार्प में आयोजित एक कार्यकम में भाग लेने के लिए कार से उतरकर मंच की तरफ बढ़ ही थे कि 40 वर्षीय जितेन्द्र पाठक नाम के एक व्यक्ति ने उन पर चप्पल फेंककर हमला कर दिया। हमलावर का आरोप है कि केजरीवाल लोगों को बरगला रहे हैं इसलिए उन पर हमला किया है। उसने यह भी कहा है कि वह किसी संगठन अथवा राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं है। फिलहाल जितेन्द्र पाठक पुलिस हिरासत में है। टीम अन्ना के दो पमुख सदस्य पीवी राजगोपाल और राजेन्द्र सिंह ने आंदोलन के राजनीतिक रूप लेने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए मंगलवार को कोर कमेटी से इस्तीफा दे दिया है। उनका दावा है कि यह भ्रम का शिकार हो गई है। उधर मंगलवार को ही कांग्रेस से सुलह करने के पयासों पर तब पानी फिर गया जब अन्ना हजारे के गांव के सरपंच और उनके साथी विशेष रूप से दिल्ली आए ताकि राहुल गांधी से मुलाकात हो सके, के हाथों निराशा लगी जब समय देकर भी राहुल गांधी अन्ना के गांव से आए पतिनिधिमंडल से नहीं मिले। सोमवार को योग गुरु बाबा रामदेव ने टीम अन्ना पर ही पहार कर दिया। उन्होंने कहा कि पशांत भूषण के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। बाबा रामदेव ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को तोड़ने वाली बयानबाजी घातक है। उन्होंने कहा कि सामाजिक आंदोलन में शामिल लोग भी देश को तोड़ने वाले बयान देते हैं जो देश व आंदोलनों के लिए बहुत घातक हैं। उन्होंने अन्ना हजारे को पशांत भूषण के बयान पर अपना रुख स्पष्ट करने की सलाह भी दी। एक सवाल के जवाब में रामदेव ने कहा कि पशांत भूषण के खिलाफ केस दर्ज होना चाहिए। अंत में टीम अन्ना के खिलाफ एक और झटका तब लगा जब सुपीम कोर्ट ने अन्ना हजारे के हिंद स्वराज ट्रस्ट को मिलने वाले सरकारी धन के गलत इस्तेमाल मामले की सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई को मंजूरी दे दी। जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस रंजना देसाई की बैंच ने अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सरकार से जवाब तलब किया। शर्मा ने आरोप लगाया कि साल 1995 में हजारे का ट्रस्ट बना था लेकिन इसे अनियमितता बरतते हुए एक वित्त वर्ष पहले की आर्थिक सहायता दी गई थी। याचिका में कहा गया है कि यह स्पष्ट है कि यह धोखाधड़ी, सरकारी कोष के दुरुपयोग का मामला है जो पतिवादी नंबर चार (हजारे) की ओर से किया गया है। सावंत आयोग की 2005 में आई रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है कि उनके कुछ सहयोगियों या समूह राजनीतिक मित्रों ने ऐसा किया। याचिका में कहा गया है कि ट्रस्ट ने गैरकानूनी तरीके से एक करोड़ रुपए से भी ज्यादा की रकम काउंसिल फॉर एडवांसमेंट ऑफ पीपुल्स एक्शन एंड रूरल टेक्नोलॉजी (कपार्ट) से हासिल की। रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि 1995 में अन्ना ने कपार्ट से और 75 लाख रुपए लिए। याचिकाकर्ता ने कहा कि 2001 में कपार्ट ने पांच करोड़ रुपए ग्रामीण स्वास्थ्य के नाम पर जारी किए। कुल कितना सरकारी धन ट्रस्ट को अनियमित तरीके से दिया गया, इसकी जांच सीबीआई से समुचित तरीके से कराई जानी चाहिए। सुपीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करने पर अपनी हामी भर दी है, केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को जवाब देने का नोटिस जारी कर दिया है। टीम अन्ना पर चारों ओर से हमले होने लगे हैं। अन्ना खुद तो बेदाग हैं पर उनके साथी निश्चित रूप से अन्ना की मूवमेंट को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
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Wednesday, 19 October 2011

क्या कांग्रेस हिसार उपचुनाव से सबक लेगी?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th October 2011
अनिल नरेन्द्र
हरियाणा की हिसार लोकसभा उपचुनाव पर सारे देश की नजरें टिकी हुई थीं। हिसार सीट पर हरियाणा जनहित कांग्रेस के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भजन लाल के निधन के कारण उपचुनाव हुआ। हिसार में जनता की नजरें इसलिए भी लगी थी क्योंकि यहां भजन लाल के बेटे कुलदीप विश्नोई, पूर्व मुख्यमंत्री और इनेलो के अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी ओम प्रकाश चौटाला के बेटे अजय सिंह चौटाला मैदान में थे। चूंकि हरियाणा में कांग्रेस का राज है इसलिए मुख्यमंत्री चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा व कांग्रेसी उम्मीदवार जय प्रकाश की प्रतिष्ठा भी दाव पर थी। अन्ना हजारे भी यहां कांग्रेस को हराने के लिए डटे हुए थे। देश यह भी देखना चाहता था कि अन्ना का कितना प्रभाव वोटों पर पड़ता है। चुनाव अत्यंत चुनौतीपूर्ण था और इस प्रतिष्ठित चुनाव में बाजी मारी एचजेसी-भाजपा गठबंधन के उम्मीदवार कुलदीप विश्नोई ने। कुलदीप विश्नोई ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी अजय सिंह चौटाला को 6323 मतों से हराकर यह सीट जीत ली। कांग्रेस तीसरे नम्बर पर रही। प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस उम्मीदवार और तीन बार सांसद रहे जय प्रकाश 1,49,785 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे और उनकी जमानत जब्त हो गई। मुकाबला इतने कांटा का था कि हार-जीत में सिर्प 6323 मतों का ही फर्प रहा। विश्नोई को 3,55,941 वोट मिले तो चौटाला को 3,49,618। साल 2009 के चुनाव में भी कांग्रेसी उम्मीदवार जय प्रकाश तीसरे स्थान पर रहे थे। इसलिए कांग्रेस दलील दे सकती है कि हम पहले भी तीसरे स्थान पर थे, अब भी तीसरे स्थान पर रहे पर फर्प यह है कि 2009 में जय प्रकाश को 2,04,539 वोट प्राप्त हुए थे जो इस बार घटकर 1,49,785 रह गए। कांग्रेस का वोट प्रतिशत गिरा है। अन्ना फैक्टर कितना हावी रहा कहना मुश्किल है। हालांकि अन्ना हजारे ने कहा कि सत्तारूढ़ दल को चुनाव नतीजे से सबक लेना चाहिए अन्यथा आगामी विधानसभा चुनावों में वह खुद कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करेंगे। हजारे ने कहा कि हिसार लोकसभा सीट पर उपचुनाव कांग्रेस हार गई। अब कांग्रेस को टीम अन्ना को दोष नहीं देते हुए आगामी संसद सत्र में कठोर भ्रष्टाचार निरोधी कानून बनाना चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार ने आम आदमी का जीना असम्भव कर दिया है। जनता की सहनशक्ति कम हो गई है और इसलिए उसने कांग्रेस को नकार दिया है। उन्होंने अपने ब्लॉग में सख्त अंदाज में कहा कि कांग्रेस ने इस चुनाव से अगर सबक नहीं लिया तो देश में उसकी यही अवस्था होगी। हालांकि राष्ट्रीय राजनीति के परिपेक्ष में इस उपचुनाव का ज्यादा महत्व नहीं होगा पर इससे जनता का कांग्रेस के खिलाफ रोष का जरूर पता चलता है। हिसार में चौधरी भजन लाल का विशेष प्रभाव था जिसका फायदा और सहानुभूति वोट का विश्नोई को फायदा हुआ पर अजय चैटाला को इतने वोट मिलने का मतलब, यह भी निकलता है कि चौधरी ओम प्रकाश चौटाला ने कुछ हद तक अपनी खोई प्रतिष्ठा पर पोजीशन फिर से हासिल कर ली है। राज्य के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के लिए जरूर यह एक संकेत है कि हरियाणा में वह और उनकी सरकार इतनी लोकप्रिय नहीं है जितना वह समझे बैठे थे। निकट भविष्य में और कड़े चुनाव होने हैं, कांग्रेस को दीवार पर लिखी चेतावनी को समझना चाहिए कि माहौल उसके खिलाफ चल रहा है।
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Saturday, 15 October 2011

प्रशांत भूषण की उनके चैम्बर में जमकर पिटाई


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th October 2011
अनिल नरेन्द्र
सुप्रीम कोर्ट के वकील और टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण पर बुधवार को तीन युवकों ने उनके सुप्रीम कोर्ट चैम्बर में घुसकर जमकर पिटाई कर दी। हमलावरों ने प्रशांत भूषण को कुर्सी से उठाकर जमीन पर गिराया और लात-घूसों से पीटने लगे। वहां मौजूद लोगों ने एक हमलावर इन्दर वर्मा को पकड़ लिया और पुलिस को सौंप दिया। बाकी दो फरार हो गए। प्रशांत भूषण के चेहरे व गर्दन पर चोट आई हैं। राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई। रात में तिलक मार्ग थाने में तीनों हमलावरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई। जिस समय यह तीन हमलावरों ने प्रशांत भूषण के चैम्बर के अन्दर घुसकर उन पर हमला किया उस समय वह एक न्यूज चैनल को इंटरव्यू दे रहे थे। लिहाजा यह हमला कैमरे में कैद हो गया और शाम तक हर चैनल में दिखाया जाने लगा। हमलावरों ने बाद में पर्चे भी फेंके और कहा कि कुछ दिनों पहले कश्मीर पर दिए गए प्रशांत भूषण के बयान से वह नाराज थे और इसका विरोध करने के लिए उन्होंने यह हमला किया। दरअसल वह प्रशांत भूषण द्वारा 26 सितम्बर को वाराणसी में दिए उस बयान से नाराज थे जिसमें उन्होंने कहा था कि सेना के दम पर कश्मीरियों को बहुत दिनों तक दबाव में नहीं रखा जा सकता। कश्मीर का भविष्य तय करने के लिए जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए। गिरफ्तार इन्दर वर्मा ने खुद को श्रीराम सेना का प्रदेश अध्यक्ष बताया और हमले के बाद जो पर्चे बांटे उस पर लिखा था ः कश्मीर हमारा था, हमारा है और हमारा रहेगा। तुम कश्मीर तोड़ोगे तो हम तुम्हारा सिर तोड़ देंगे। वन्दे मातरम्। हमला करने वाले युवकों को बृहस्पतिवार को पटियाला हाउस अदालत में पेश किया गया। तेजिन्द्र पाल सिंह बग्गा सहित दो अन्य को अदालत ने एक दिन के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया। बग्गा ने कहा कि उसे अपने किए पर कोई शर्मिंदगी नहीं है और चेतावनी दी कि वह प्रशांत पर फिर हमला कर सकते हैं। भूषण के हमलावरों की अदालत में पेशी के दौरान कुछ लोगों ने अन्ना समर्थकों पर हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि हमलावरों में भगत सिंह क्रांति सेना और श्रीराम सेना के कार्यकर्ता शामिल थे। जब पुलिस वहां पहुंची तो हमलावर भाग खड़े हुए। इस झड़प के दौरान दो लोग घायल भी हो गए। तेजिन्द्र पाल सिंह बग्गा ने फेसबुक पर अपनी प्रोफाइल में एक तस्वीर लगाई है जिसमें वह श्री श्री रविशंकर के साथ खड़ा है। भगत सिंह क्रांति सेना के निशाने पर छह और लोग हैं। इनमें अरुंधति रॉय, स्वामी अग्निवेश के अलावा कश्मीरी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारुख और यासीन मलिक शामिल हैं। भगत सिंह क्रांति सेना एक साल पहले बनाई गई थी। इससे पहले वह भाजपा में ही शामिल थी।
समाजसेवी अन्ना हजारे के प्रशांत भूषण के कश्मीर पर दिए गए बयानों की निन्दा की मांग करते हुए अखिल भारतीय आतंकवाद निरोधक मोर्चा के अध्यक्ष मनिंदर सिंह बिट्टा ने कहा कि भूषण ने अपने बयान से कश्मीर के लिए प्राण देने वाले हजारों शहीदों का अपमान किया है। उन्होंने कहा कि मैं इस हमले की निन्दा करता हूं, यह गलत है पर भूषण का बयान निन्दनीय है। बिट्टा ने कहा कि इस तरह के बयान से कस्मीर में लड़ने वाले और अपनी जान देने वाले शहीदों का अपमान करना है। अपने ही घर से निर्वासित कर दिए गए उन कश्मीरी पंडितों और अन्य लोगों का भी अपमान है, जो आज भी शिविरों में रह रहे हैं। प्रशांत भूषण ने कहा था, सरकार को कश्मीर से सेना वापस बुला लेना चाहिए। सरकार इस बात के लिए वोटिंग करवाए कि कश्मीरी भारत के साथ रहना चाहते हैं अथवा नहीं। उन्होंने कहा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि अन्ना सही काम कर रहे हैं लेकिन उनके साथ जो लोग हैं वह सही नहीं है। स्वामी अग्निवेश का सच सबके सामने है। प्रशांत के बयानों के लिए अन्ना को उनकी निन्दा करनी चाहिए। बिट्टा ने कहा कि ऐसे बयान देश तोड़ने वाले हैं। देश की जनता इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। बेहतर हो कि प्रशांत भूषण ऐसे बयानों से बचें।
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शिवानी की हत्या किसने और क्यों करवाई, इन सवालों का क्या जवाब है?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th October 2011
अनिल नरेन्द्र
इंडियन एक्सप्रेस की युवा पत्रकार शिवानी भटनागर की 23 जनवरी 1999 को उसके पटपड़गंज स्थित घर में हत्या कर दी गई थी। यह हत्या किसने करवाई, क्यों करवाई और क्या यह किसी साजिश के तहत किया गया मर्डर था, यह आज भी सवाल बने हुए हैं। यह तो साबित होता है कि हत्या करने वाला प्रदीप शर्मा था पर हत्या का मकसद क्या था? क्या उसने अकेले अपने दम पर हत्या को अंजाम दिया? यह सवाल हत्याकांड के 11 साल बाद फिर जिन्दा हो गए हैं। इन सवालों को उठाने के साथ दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आरके शर्मा, श्री भगवान और सत्य प्रकाश को बरी कर दिया है। वैधानिक साक्ष्यों के आधार पर प्रदीप शर्मा को हत्यारे होने की पुष्टि कर दी है और उसे उम्र कैद की सजा को हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है। चारों ने सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की हुई थी। जस्टिस बीडी अहमद और जस्टिस मनमोहन सिंह की डिवीजन बैंच ने कहा है कि साक्ष्यों से साबित होता है कि प्रदीप ने शिवानी के फ्लैट में दाखिल होकर हत्याकांड को अंजाम दिया पर हत्या का मकसद साफ नहीं है। उसने हत्याकांड को अकेले अंजाम दिया, हत्या कराने के पीछे आरके शर्मा की साजिश थी या नहीं या किसी दूसरे की, ऐसे कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब कोर्ट को नहीं मिले हैं। प्रदीप को हत्या के बदले तीन लाख रुपये की सुपारी की बात भी साबित नहीं हो सकी। डिवीजन बैंच ने कहा कि आरके शर्मा, श्री भगवान और सत्य प्रकाश का षड्यंत्र साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य नहीं हैं। न ही उनके आपसी संबंध साबित होते हैं। साक्ष्य के तौर पर दाखिल अभियुक्तों के कॉल रिकार्ड्स रहस्यमय प्रतीत होते हैं। उनके साथ छेड़छाड़ की आशंका के अलावा कई समस्याएं हैं। इनके चलते उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इन टिप्पणियों से दिल्ली पुलिस की जांच पर सवालिया निशान लग गए हैं। दिल्ली पुलिस ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। पुलिस के स्थायी अधिवक्ता पवन शर्मा ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे और उनका मानना है कि प्रदीप के हत्यारे होने की पुष्टि पुलिस के लिए महत्वपूर्ण आधार है।
शिवानी भटनागर की हत्या 23 जनवरी 1999 को आईपी एक्सटेंशन के नवपुंज अपार्टमेंट्स स्थित फ्लैट में की गई थी। केस की गुत्थी लम्बे समय तक उलझी रही। आखिरकार पुलिस ने हरियाणा कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आरके शर्मा, सत्य प्रकाश और श्री भगवान, वेद प्रकाश और वेद प्रकाश उर्प कालू को गिरफ्तार करके गुत्थी सुलझाने का दावा किया। अभियोजन पक्ष के अनुसार शिवानी की हत्या आरके शर्मा के षड्यंत्र पर हुई थी। हत्याकांड को अंजाम प्रदीप शर्मा ने दिया। वह नवपुंज अपार्टमेंट के एंट्री रजिस्टर से गलत पता और अपना फर्जी नाम लिखकर दाखिल हुआ था और शादी की मिठाई देने के बहाने घर में घुसा। शिवानी चाय बनाने रसोई में गई तो तवे का वॉर व रसोई में चाकुओं से हमला कर दिया। बाद में बेसुध हालत में बिजली के तार से गला घोंटकर हत्या कर दी। शिवानी को अभी भी इंसाफ का इंतजार है। शिवानी भटनागर की तरह राजधानी में और भी चर्चित हत्याकांड हुए हैं जिनमें इंसाफ मिलना बाकी है। मॉडल जेसिका लाल की 29 अप्रैल 1999 की रात वीना रमानी के टेमरीन्ड कोर्ट नामक कुतुब रोड स्थित रेस्टोरेंट में एक हाई-प्रोफाइल पार्टी के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। तफ्तीश में कांग्रेस के प्रभावशाली नेता विनोद शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा उर्प मनु शर्मा समेत तीन युवकों का नाम सामने आया। मनु शर्मा दिसम्बर 2006 से तिहाड़ जेल में सजायाफ्ता कैदी के तौर पर सजा काट रहे हैं। फैशन डिजाइनर पुंजुम बुद्धिराजा की 20 मार्च 1999 को दाऊद इब्राहिम के कथित गुर्गे रोमेश शर्मा के दक्षिण दिल्ली स्थित जय माता फार्म हाउस पर हत्या कर दी गई। हाई कोर्ट ने 15 दिसम्बर 2009 को रोमेश शर्मा को पुंजुम की हत्या के आरोप में बरी कर दिया। ताजा स्थिति ः पुंजुम की हत्या के चारों दोषी सुरेन्द्र, हेमचन्द, संतराम और रमेश जेल में उम्र कैद की सजा काट रहे हैं जबकि इन चारों की अपील सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। दिल्ली विश्वविद्यालय में एलएलबी तृतीय वर्ष की छात्रा प्रियदर्शनी मट्टू, 23 जनवरी 1996 को अपने वसंत पुंज स्थित घर में मृत पाई गई। दिल्ली हाई कोर्ट ने 30 अक्तूबर 2006 को संतोष को कॉलेज छात्रा के साथ बलात्कार व उसकी निर्मम हत्या के जुर्म में फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 6 अक्तूबर 2010 को पलटते हुए उम्र कैद में तब्दील कर दिया था। संतोष कुमार शर्मा अक्तूबर 2006 से ही तिहाड़ जेल में बन्द हैं। नैना साहनी युवा कांग्रेस नेता सुशील शर्मा की पत्नी थी। 2 जुलाई 1995 को सुशील ने नैना की गोली मारकर हत्या कर दी थी और शव को तंदूर में डाल दिया। इस मामले में 7 नवम्बर 2003 को अदालत ने सुशील को फांसी की सजा सुनाई थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने सुशील की सजा को बरकरार रखा था। पिछले एक दशक से ज्यादा समय से सुशील शर्मा तिहाड़ में बन्द है और उसकी सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील लम्बित है।
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Friday, 7 October 2011

एक बार फिर अन्ना हजारे और कांग्रेस आमने-सामने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th October 2011
अनिल नरेन्द्र
समाजसेवी अन्ना हजारे ने सख्त शब्दों में कांग्रेस को चेतावनी दी है। रालेगण सिद्धि से बोलते हुए अन्ना ने कहा कि यदि केंद्र संसद के शीतकालीन सत्र में जन लोकपाल विधेयक पारित करने में विफल रहा तो सत्तारूढ़ पार्टी को चुनाव होने जा रहे उन पांच राज्यों में जबरदस्त हार का सामना करना पड़ेगा। हजारे ने हिसार उपचुनाव को अपने इस अभियान का पहला कदम करार देते हुए कहा कि वह हरियाणा के हिसार लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं से अपील करेंगे कि वे कांग्रेस प्रत्याशी को वोट नहीं दें, क्योंकि पार्टी जानबूझकर जन लोकपाल विधेयक संसद में नहीं ला रही है। हिसार में 13 अक्तूबर को उपचुनाव होना है। पुणे से 50 किलोमीटर दूर अपने गांव में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए अन्ना ने कहा कि हम लोगों से यह नहीं कहने जा रहे कि उन्हें किसे वोट देना चाहिए। हम लोगों से कांग्रेस को छोड़कर किसी अन्य पार्टी को वोट देने और साफ छवि एवं अच्छे चरित्र वाला उम्मीदवार चुनने को कहेंगे। अन्ना हजारे ने यह भी घोषणा की कि वह उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव शुरू होने से तीन दिन पहले लखनऊ में चार दिन का अनशन भी करेंगे। उधर टीम अन्ना ने सरकार एवं संसद पर जन लोकपाल विधेयक के पक्ष में दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से गांधी जयंती के अवसर पर देशभर में विधेयक पर जनमत संग्रह अभियान की शुरुआत कर दी। इस जनमत संग्रह में केवल दो सवाल पूछे जा रहे हैं। पहला, कि क्या उनके निर्वाचन क्षेत्र के सांसद और उनकी पार्टी को संसद में अन्ना के जन लोकपाल विधेयक का समर्थन करना चाहिए या नहीं और दूसरा, यह कि अगर उनके क्षेत्र के सांसद ने संसद में अन्ना के जन लोकपाल विधेयक का समर्थन नहीं किया तो क्या आप अगले चुनाव में उस सांसद या उसकी पार्टी को अपना वोट देंगे या नहीं। इस अभियान की शुरुआत के लिए उत्तर प्रदेश के प्रमुख नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों को चुना गया है जिनमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी, भाजपा नेता राजनाथ सिंह, डॉ. मुरली मनोहर जोशी तथा सपा के मुलायम सिंह यादव शामिल हैं। गांधी जयंती पर जिन क्षेत्रों में जनमत संग्रह की शुरुआत की गई उनमें गाजियाबाद, कौशाम्बी, हमीरपुर, मैनपुरी, रायबरेली, अमेठी, वाराणसी, लखनऊ और अम्बेडकर नगर शामिल हैं।
कांग्रेस में अन्ना की चेतावनी का असर कितना पड़ा है यह कहना तो मुश्किल है पर इतना जरूर है कि पार्टी ने अन्ना पर जवाबी हमला करना शुरू कर दिया है। संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने कहा कि आप किसी की गर्दन पर पिस्तौल रखकर कोई चीज नहीं हासिल कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि संसद की स्थायी समिति इस पर विचार कर रही है और इस पर सदस्यों का विचार भी प्राप्त कर रही है। बंसल ने कहा कि विधेयक को आगामी शीतकालीन सत्र में पेश करने के लिए गंभीर प्रयास किए जाएंगे। लेकिन यह इस बात पर निर्भर है कि समिति कितना काम करने में सक्षम है। समिति में सभी पार्टियों से सदस्य हैं और उन्हें विभिन्न लोगों से विचार मिल रहे हैं जो इसके समक्ष आना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यदि समिति तय समय में अपनी रिपोर्ट देने में सक्षम होगी तो अगले सत्र में विधेयक पेश करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने अन्ना की घोषणा में जवाब दिया कि यदि आप भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं तो आपको राजनीति में उतरना पड़ेगा। लोकतांत्रिक तरीके से ही व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता है। महासचिव और मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि उन्हें देश के सामूहिक विवेक, जिसका प्रतिनिधित्व संसद करती है पर पूरी आस्था रखनी चाहिए और ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे उनके मुद्दे का कोई राजनीतिक स्वार्थ के लिए दुरुपयोग करे। द्विवेदी ने कहा कि संसद से जो लोकपाल विधेयक सामने आएगा वह असरदार होगा और इसे लेकर उन्हें पहले कोई धारणा नहीं बनाना चाहिए। अन्ना हजारे परिपक्व और अनुभवी व्यक्ति हैं। मैं समझता हूं कि उन्हें लोकतंत्र और उसकी प्रक्रियाओं पर भरोसा है।
अन्ना की चेतावनी और कार्यवाही से उत्तर प्रदेश और हरियाणा में असर होना स्वाभाविक है। इससे कांग्रेस की परेशानी निश्चित रूप से बढ़ेगी तो जरूर। प्रदेशाध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा ने कहा कि मुझे अन्ना के बयान का तो मालूम नहीं, लेकिन समझ में नहीं आता कि सबका निशाना कांग्रेस की तरफ ही क्यों है? चुनाव तो चुनाव हैं, देखा जाएगा। टीम अन्ना के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल के गृह क्षेत्र हिसार में भी अन्ना की घोषणा का पूरा असर दिखने लगा है। शहर के बंगलों से लेकर गांव-ढाणियों के चौबारों पर अन्ना की घोषणा पर मंथन चल निकला है। इन सबके बीच सवाल बड़ा है कि ईमानदार, अच्छा प्रत्याशी किसे चुनें? ग्रामीणों का कहना है कि यहां तो मामला कठिन है पर देना है, ऐसे में कम बुरा छांटना पड़ेगा। अन्ना 9 या 10 अक्तूबर को हिसार आएंगे। प्रत्याशियों पर नजर डालें तो सभी पर कुछ न कुछ आरोप हैं। हालांकि अन्ना ने कांग्रेस को बायकाट करने को कहा है, लेकिन हिसार के लोगों ने प्रत्याशी जय प्रकाश को भी पलड़े में रख लिया है। वे कहते हैं कि यह प्रत्याशी तीन बार सांसद बन चुका है लेकिन हर बार अलग-अलग दल का सहारा लिया। अन्य आरोप भी लगते रहे हैं। दूसरे प्रत्याशी हजकां-भाजपा के कुलदीप बिश्नोई के बारे में कहते हैं कि इनकी पार्टी के पांच विधायकों (अब कांग्रेस में) ने ही आरोप लगा दिए थे कि यह उनके बेचने का सौदा कर रहे थे। तीसरे प्रत्याशी इनेलो से अजय सिंह चौटाला हैं, इनके बारे में दूसरे दल आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में दोषी करार होने की बात कहते हैं पर अपना मानना है कि मुख्य मुकाबला अजय चौटाला और कुलदीप बिश्नोई में है। जय प्रकाश तीसरे नम्बर पर चल रहे हैं।
भाजपा को अन्ना हजारे का कांग्रेस विरोध तो रास आ रहा है लेकिन गुजरात में अपनी ही सरकार के खिलाफ अन्ना के तेवरों ने उसे बंगले झांकने को भी मजबूर किया है। पार्टी ने हालांकि अन्ना और अपने बीच किसी तरह का तालमेल होने से साफ इंकार किया है। पार्टी प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कहा कि अन्ना और भाजपा दोनों ही कांग्रेस के खिलाफ इसलिए हैं क्योंकि कांग्रेस पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुकी है। अन्ना के आंदोलन को भाजपा भले ही राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश करें, लेकिन अन्ना लगातार यह कह रहे हैं कि भाजपा और आरएसएस से उनके आंदोलन का कुछ लेना-देना नहीं है। अब उन्होंने गुजरात में आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की गिरफ्तारी का विरोध कर इसे साफ भी कर दिया है। आने वाले दिनों में अन्ना हजारे और कांग्रेस के बीच वाप्युद्ध और तेज हो सकता है। अन्ना की अपील का पहला टेस्ट हिसार लोकसभा उपचुनाव हो सकता है।
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Tuesday, 13 September 2011

अन्ना के जन लोकपाल का विरोध किसके इशारे पर?

 
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Published on 13th September 2011
अनिल नरेन्द्र
रामलीला मैदान में सफल आंदोलन करने के बाद भ्रष्टाचार पर लड़ाई की आगे की रणनीति तय करने के लिए अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि में टीम अन्ना की कोर कमेटी की बैठक हुई। दो दिन चलने वाले इस बैठक में अन्ना के अलावा अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, किरण बेदी और मेधा पाटकर समेत कोर ग्रुप के शीर्ष सदस्यों ने भाग लिया। बैठक समाप्त होने के बाद संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा, `आंदोलन की तरफ से अन्ना हजारे प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे और उनमें सांसदों के प्रदर्शन का वार्षिक लेखाजोखा कराने, खारिज करने का अधिकार, वापस बुलाने का अधिकार और भूमि अधिग्रहण विधेयक पर अपने विचार जाहिर करेंगे।' इसके साथ ही हजारे ने लोगों से उन सभी पार्टियों पर नजर रखने को कहा है जो जन लोकपाल विधेयक का विरोध कर रही हैं। उन्होंने इस विधेयक का विरोध कर रहे सांसदों के घेराव का आह्वान भी किया। अन्ना ने बैठक में जाने से पहले मीडिया से कहा कि हमें इस विधेयक के खिलाफ जाने वाली सभी राजनीतिक पार्टियों और लोगों पर ध्यान देना चाहिए। जन लोकपाल विधेयक का विरोध कर रहे सांसदों और उनकी टीम के सदस्यों को निशाना बनाने वाले लोगों को लेकर दुःख जताते हुए उन्होंने कहा कि इस विधेयक का विरोध कर रहे सभी सांसदों के घरों को हमें घेरना चाहिए। अन्ना ने कहा कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जब तक यह विधेयक संसद में पारित नहीं हो जाता तब तक हम यह आंदोलन खत्म नहीं करने दें। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार विधेयक को पारित करने में विलम्ब करने का प्रयास करेगी तो जन्तर-मन्तर पर एक और आंदोलन छेड़ा जाएगा।
इस दौरान केंद्र सरकार ने अन्ना के खिलाफ कई मोर्चे खोल दिए हैं। एक तरफ सरकार टीम अन्ना के सदस्यों को आयकर विभाग के नोटिस थमा रही है तो दूसरी तरफ रामलीला मैदान में बयानबाजी को आधार बनाकर टीम अन्ना को कई सांसदों द्वारा विशेषाधिकार हनन की नोटिस दी गई है। कल तक अन्ना का समर्थन कर रहे कांग्रेस सांसद प्रवीण सिंह ऐरन ने एक नया शोशा छोड़ दिया है। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को लिखे अपने पत्र में ऐरन ने कहा कि टीम अन्ना की चुनौती का उचित जवाब जनता में जाकर देंगे। क्योंकि उनके इरादे ठीक नहीं हैं। टीम अन्ना बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं किसी दल के लिए राजनीतिक हित साधने का काम कर रही है जबकि ये लोग जनता के बीच जाने की बात कर रहे हैं।
ऐरन ने पत्र में लिखा है कि टीम अन्ना के सदस्य किरण बेदी, अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण का इरादा और एजेंडा नेक न होकर ओछी राजनीति से प्रेरित है। ये लोग कांग्रेस और सरकार को बदनाम करने में जुटे हैं।
उन्होंने कहा कि जनता की आवाज उठाने के नाम पर ये लोग अपने या किसी और राजनीतिक, औद्योगिक या मल्टी नेशनल कम्पनी के नाजायज हित साधने के अभियान पर हैं। ये लोग समाज और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता की मनस्थिति का अनुचित और अनैतिक लाभ उठा रहे हैं।
उधर दलित संगठनों ने भी अन्ना के जन लोकपाल बिल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दलित संगठन इसे निरंकुश, संविधान-संसद विरोधी बताकर राज्यस्तरीय अभियान छेड़ने की तैयारी में हैं। इस अभियान के पीछे लेखक मुद्राराक्षस और दलित टुडे के सम्पादक एसके पंजय हैं। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के सिघौली तहसील मुख्यालय पर बामसेफ, डॉ. अम्बेडकर विचार मंच, इंसाफ, दलित एक्शन फोरम, अर्जक संघ, शोषित समाज दल, यादव महासभा, आदि संगठनों ने एक सम्मेलन कर जन लोकपाल के खिलाफ हुंकार भरी। मुद्राराक्षस ने इस सन्दर्भ में बातचीत करते हुए कहा कि जन लोकपाल भारतीय स्वर्ण मध्य वर्ग का एजेंडा है जो अति आधुनिक रूप में भी संघ की सांप्रदायिकता को अपने में समेटे है।
दलित एशिया के सम्पादक एमके पंजय ने बताया कि जन लोकपाल स्वर्ण हिन्दू पुनरुत्थान का नया पैंतरा है। जन लोकपाल भारतीय संविधान, संसद पर सवर्ण प्रभुत्व वाद का हमला है। उन्होंने कहा कि लोकपाल चाहे सरकारी हो या सिविल सोसाइटी का, दोनों ने मंदिरों, ट्रस्टों में व्याप्त भ्रष्टाचार को अपने दायरे में लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह तो पहले से ही टीम अन्ना को निशाना बना रहे हैं। केजरीवाल को आयकर विभाग का नोटिस मिलने पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि नोटिस तो उन्हें 2005 में ही जारी किया गया था। बकौल दिग्विजय उन पर न सिर्प सरकारी सेवा के नियम तोड़ने का आरोप है बल्कि राजनीति में शामिल होने और एनजीओ के जरिये करोड़ों रुपये कमाने का भी आरोप है। केजरीवाल ने जवाब देते हुए कहा कि अगर दिग्विजय को लगता है कि मैंने करोड़ों का घपला किया है तो उनकी पार्टी की सरकार एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराती। कुल मिलाकर कांग्रेस और सरकार टीम अन्ना के आगे के रास्ते में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आ रही। देखना यह है कि टीम अन्ना आगे का रास्ता कैसे तय करती है।
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Tuesday, 6 September 2011

भारतीय जनता पार्टी का चढ़ता ग्रॉफ


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6th September 2011
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी के लिए अच्छी खबर है। जन लोकपाल बिल पर सरकार की नाक में दम करने वाले समाजसेवी अन्ना हजारे ने अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भले ही अभी पूरी सफलता न पाई हो पर जनता की नजरों में अन्ना ने कांग्रेस को विलेन जरूर बनाने में कामयाबी हासिल कर ली और इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को हुआ है। स्टार न्यूज-नीलसन ने एक सर्वे किया है।
28 शहरों में करीब नौ हजार लोगों के बीच हुए इस सर्वे में भाजपा की आज की स्थिति मजबूत बताई गई है। सर्वे के अनुसार अगर वर्तमान में चुनाव हो जाएं तो भाजपा को सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे। सर्वे में 32 फीसदी लोगों ने भाजपा को सत्ता के लिए अपनी पसंद बताया है। वहीं 20 प्रतिशत लोगों ने कांग्रेस को पसंद किया है। देश के सभी क्षेत्रों में भाजपा को लोगों ने कांग्रेस की अपेक्षा तरजीह दी है। भाजपा और कांग्रेस का उत्तर में अनुमान 40ः27 का तो पूर्वी भारत में 20ः15 का रहा। पश्चिम में यही अनुपात 46ः15 का रहा।
दक्षिण में समीकरण थोड़ा अलग जरूर है। यहां अभी कांग्रेस को अधिक लोगों ने पसंद किया है। यहां कांग्रेस को 20 फीसदी तथा भाजपा को 16 फीसदी लोगों ने अपना मत सहयोग देने की बात कही है। उल्लेखनीय है कि स्टार-नीलसन ने मिलकर मई 2011 में एक सर्वे किया था। उसमें कांग्रेस को लोगों ने तरजीह दी थी। लेकिन एक-दो महीने बाद ही अन्ना के आंदोलन ने तस्वीर बदलकर रख दी है। मई के सर्वे में देशभर में करीब 30 फीसदी लोगों ने कांग्रेस को पसंद किया था, वहीं भाजपा के पक्ष में 27 फीसदी लोगों ने अपना मत दिया था। उस समय पश्चिम को छोड़कर कांग्रेस देश के हर क्षेत्र में मतदाताओं की पसंद बनी हुई थी। सर्वे की 10 बड़ी बातें यूं हैंöअन्ना का आंदोलन जहां सबसे तेज था, वहीं भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा। 54 फीसदी लोग मानते हैं कि कांग्रेस ने अन्ना के अनशन को ठीक से नहीं निपटा। 64 फीसदी लोग मानते हैं कि हालात से ठीक से निपटने के लिए प्रधानमंत्री से ज्यादा उनके वरिष्ठ मंत्री जिम्मेदार हैं। 75 फीसदी लोगों का कहना है कि भ्रष्टाचार के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां जिम्मेदार हैं। 54 फीसदी लोग मानते हैं कि राहुल गांधी को इस वक्त प्रधानमंत्री से दूर रहना चाहिए। 62 फीसदी लोगों का कहना है कि अरविन्द केजरीवाल युवकों के नायक बनकर उभरे हैं। राहुल गांधी, कपिल सिब्बल और पी. चिदम्बरम पर चुनावों में भारी पड़ सकते हैं अन्ना हजारे, किरण बेदी और केजरीवाल। 53 फीसदी लोग मानते हैं कि अगर मजबूत जन लोकपाल बिल पास हो तो 5 साल में देश में भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। 49 फीसदी लोगों का मानना है कि रिश्वत न लेने और न देने की शपथ खाने से भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। 82 फीसदी लोगों का मानना है कि अपनी मांग मनवाने का अन्ना का तरीका सही था, ब्लैकमेलिंग नहीं। यदि अन्ना और राहुल गांधी में चुनावी मुकाबला हो तो 74 फीसदी लोग गांधीवादी अन्ना हजारे को अपना वोट देंगे जबकि सिर्प 17 फीसद ही राहुल गांधी को वोट देंगे। कांग्रेस के लिए यह परिणाम खतरे की घंटी है। इससे पता चलता है कि जनता की नजरों में कांग्रेस की आज की तारीख में क्या स्थिति है। देश के बाहर भी भाजपा की स्थिति मजबूत होती दिख रही है।
देश में भले कांग्रेस और वामदलों को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का शासन रास नहीं आ रहा हो, लेकिन भारत का पड़ोसी और दुनिया के शक्तिशाली देशों में से एक चीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की शासन शैली का कायल हो गया है। इतना ही नहीं चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं और चीन के नीति निर्धारकों को भी लग रहा है कि भारत में 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आ सकती है और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन सकते हैं। चीन नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक शैली से ज्यादा मोदी के शासन में गुजरात के औद्योगिक विकास को लेकर अभिभूत है। चीन के नीति-निर्धारकों को लग रहा है कि जिस प्रकार से मोदी के शासन में गुजरात का आर्थिक विकास हुआ है उसी प्रकार मोदी भारत
की अर्थव्यवस्था को भी नया मोड़ दे सकते हैं। चीन की यह राय इसलिए भी बनी है, क्योंकि भारत के कई प्रमुख उद्योगपति लगातार मोदी की उद्योग नीति की प्रशंसा कर उन्हें भविष्य का बेहतर प्रधानमंत्री बता चुके हैं। मोदी की कार्यशैली से उत्साहित चीन गुजरात के औद्योगिक विकास और विनिर्माण (मैन्यूफैक्चरिंग) के क्षेत्र में मोदी सरकार के साथ काम करने का इच्छुक है। चीन के राजदूत झांग यान ने स्वयं यह प्रस्ताव मोदी के सामने रखा है।
चीन के राजदूत ने खासतौर पर मोदी को चीन आने का भी निमंत्रण दिया है जिसे मोदी ने स्वीकार कर लिया है। चीन की यह नीति अमेरिका और यूरोप के कुछ अन्य देशों से ठीक उल्ट है। गुजरात दंगों को लेकर अमेरिका सहित यूरोप के कुछ देशों में मानवाधिकार संगठन मोदी का विरोध करते रहे हैं। इस आधार पर इन देशों ने मोदी को वीजा तक देने से इंकार किया है। वर्ष 2005 में जब मोदी अमेरिका जाने वाले थे तो अमेरिकी सरकार ने उन्हें वीजा नहीं दिया।
नतीजतन मोदी को अमेरिका में बसे गुजरातियों को वीडियो कांफ्रेंस के जरिये से ही संबोधित करना पड़ा। लिहाजा नरेन्द्र मोदी को लेकर चीन का बदलता यह रुख अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। चीन के नीति-निर्धारक यह भी मान रहे हैं कि जिस तरह से अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के कार्यकाल में चीन और भारत के संबंध बेहतर हुए थे उसी प्रकार की संभावनाएं वे मोदी में भी देख रहे हैं। असल में जापान के बाद चीन भी नरेन्द्र मोदी में भारत के भावी प्रधानमंत्री की संभावनाएं नजर आ रही हैं। हालांकि चीन और मोदी के रिश्तों में आ रही निकटता के पीछे सिर्प यही कारण नहीं है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अन्ना के आंदोलन में भाजपा ने जिस तरह अपने पत्ते खेले हैं उससे उसे फायदा हुआ है पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि निकट भविष्य में भाजपा का नजरिया और व्यवहार कैसा होता है? क्या कुछ नेताओं का निजी स्वार्थ पार्टी के हितों से यूं ही ऊपर रहेगा? अगर ऐसी स्थिति रही तो अनुकूल माहौल होने के बावजूद हमें संदेह है कि पकी हुई फसल भाजपा काट पाए? भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा अन्दर से है। बाहर तो उसकी छवि सुधर रही है।
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Sunday, 4 September 2011

राजनीतिक आकाओं के कहने पर भेजा नोटिस ः अरविन्द केजरीवाल


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे के आंदोलन से गुस्से से भरी मनमोहन सिंह सरकार ने अब उन लोगों को चिन्हित कर निशाने पर लेना शुरू कर दिया है जिन्होंने उसकी मिट्टी पलीत करने में सक्रिय भूमिका निभाई। मीडिया पर लगाम लगाने के लिए विशेष ग्रुप बनाने की खबर है। अन्ना के मंच से सरकार को छूट करने वाले फिल्म अभिनेता ओम पुरी और किरण बेदी पर पहले ही मानहानि का केस लग चुका है। सांसदों के खिलाफ विवादास्पद टिप्पणी को लेकर संसद में विशेषाधिकार हनन के मामले का सामना कर रहीं किरण बेदी का टीम अन्ना अब खुलकर साथ दे रही है। अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि पूरी टीम एकजुट होकर किरण बेदी के साथ है। इस तरह के कदम से जनता के बीच यह धारणा जाएगी कि सांसद उनसे बदला लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जब नोटिस मिलेगा तो वह उस पर जवाब देगी।
टीम अन्ना के एक और महत्वपूर्ण सदस्य पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण सीडी प्रकरण में फंसते नजर आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने सीडी मामले में कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। इसमें जानकारी दी गई है कि
सीडी में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और शांति भूषण की बातचीत का टेप असली है। इसमें किसी तरह के जोड़तोड़ के प्रमाण नहीं हैं। यदि यह सीडी असली है तो यह सीधे-सीधे उच्चतम न्यायालय में बड़े भ्रष्टाचार का मामला बनता है। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के अनुसार इस मामले में उनके पास एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह भी है। वह गवाह है चर्चित सांसद अमर सिंह। उन्होंने पुलिस को पूछताछ में जानकारी दी है कि उन्होंने अपने घर के लैंडलाइन फोन से खुद शांति भूषण से मुलायम सिंह की बात कराई थी।
मनमोहन सिंह सरकार को सबसे ज्यादा खुंदक अरविन्द केजरीवाल से है। टीम अन्ना में केजरीवाल को वह सबसे बड़ा रोड़ा मानती है। अब केजरीवाल को भी कटघरे में खड़ा करने के प्रयास हो रहे हैं। अरविन्द केजरीवाल के भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) से वर्ष 2006 में दिए गए इस्तीफे को केंद्र सरकार ने अब तक मंजूरी नहीं दी है। सेवा शर्तों के मुताबिक केंद्र सरकार ने समय से पहले नौकरी छोड़ने के लिए उनसे तीन लाख रुपये की मांग की थी। अब यह रकम नौ लाख हो गई है। केजरीवाल ने इससे छूट के लिए आवेदन किया था जिस पर
अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है। सरकार से सीधे टकराव के बाद केंद्र सरकार का कार्मिक विभाग (डीओपीटी) केजरीवाल के इस्तीफे का मामला फिर से खोल सकता है। राजस्व सेवा के अधिकारी के तौर पर केजरीवाल ने वर्ष 2000 में दो साल का स्टडी लीव (अध्ययन अवकाश) ली थी। इस दौरान केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक उन्हें वेतन दिया गया था। इस अवधि के बाद उन्होंने दो साल का बिना वेतन का अध्ययन अवकाश भी लिया। सेवा शर्तों के मुताबिक छुट्टी से लौटने के बाद कम से कम तीन साल नौकरी करनी पड़ती है। लेकिन केजरीवाल ने इससे पहले ही 2006 में इस्तीफा दे दिया। ऐसे में डीओपीटी ने उनसे तीन लाख रुपये की मांग की। इसके जवाब में केजरीवाल ने आवेदन किया कि उनके पास इतनी रकम नहीं है, इसलिए उन्हें इससे छूट दी जाए। मगर अब तक डीओपीटी ने इस पर अंतिम फैसला नहीं किया है। हालांकि इस्तीफे के तुरन्त बाद केजरीवाल को इससे बड़ी रकम मैगसेसे पुरस्कार के तौर पर मिली थी।
शुक्रवार को अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया कि उन्हें नौ लाख रुपये का भुगतान करने का नोटिस `राजनीतिक आकाओं' के कहने पर भेजा गया है। जन लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना हजारे द्वारा अनशन करने से 10 दिन पहले आयकर विभाग ने पांच अगस्त को केजरीवाल को एक नोटिस भेजा। नोटिस में केजरीवाल से उनके आयकर आयुक्त रहते हुए अध्ययन अवकाश पर जाने की अवधि की तनख्वाह, उस पर लगे ब्याज तथा कर्ज के पुनर्भुगतान की ब्याज सहित बकाया राशि को मिलाकर कुल 9.27 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा गया। केजरीवाल ने कहा कि आयकर विभाग ने मेरे दो वर्ष अवकाश पर रहने के दौरान प्रभावी रहे बांड की गलत व्याख्या की है। मैंने बांड का कोई उल्लंघन नहीं किया है। आयकर विभाग ने यह नोटिस राजनीतिक आकाओं के दबाव में भेजा है। हजारे के एक अन्य साथी कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने सबक नहीं लिया है और वह कुत्सित तरीके पर उतर आई है। उल्लेखनीय है कि आयकर विभाग द्वारा केजरीवाल को भेजे गए नोटिस में उनसे दो वर्ष की तनख्वाह के रूप में 3.54 लाख, उस पर ब्याज के रूप में 4.16 लाख, कम्प्यूटर के कर्ज की बकाया राशि के रूप में 51,000 रुपये और उस पर ब्याज के रूप में 1.04 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा है। इस तरह उन्हें नौ लाख से अधिक रुपये की राशि देने को कहा गया है।
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Thursday, 1 September 2011

फिर विवादों में फंसे स्वामी अग्निवेश


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1st September 2011
अनिल नरेन्द्र
विवादों का स्वामी अग्निवेश से चोली-दामन का साथ है। स्वामी अग्निवेश का ताजा विवाद है यू ट्यूब पर जारी हुई एक वीडियो । वीडियो में स्वामी अग्निवेश किसी कपिल नाम के शख्स से बात करते दिखे हैं। फुटेज के अनुसार टीम अन्ना के लिए अग्निवेश ने कहा, `ये तो पागल हो रहा है, जैसे हाथी हो।' स्वामी ने आगे कहा, `पूरी पार्लियामेंट ने जब खड़े होकर अनशन तोड़ने की अपील की तो अन्ना को तभी अनशन तोड़ देना चाहिए था।' इस वीडियो में सुनाई दे रही आवाज के मुताबिक अग्निवेश कहते हैं कि वे बहुत शर्मिंदा हैं कि केंद्र सरकार आखिर इतनी कमजोर क्यों दिखाई पड़ रही है। यही नहीं, अग्निवेश बातचीत के दौरान कपिल को इशारे से यह भी सलाह दे रहे हैं कि केंद्र सरकार अन्ना के आगे कतई झुके नहीं। स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि वीडियो को तोड़-मरोड़ कर (कट-पेस्ट) कर पेश किया गया है। वह कहते हैं कि जिस कपिल से वह बात कर रहे हैं वह हरिद्वार के कपिल मुनि महाराज हैं पर जब कपिल मुनि से हरिद्वार में सम्पर्प किया गया तो कपिल मुनि ने अग्निवेश से किसी भी तरह की बातचीत से इंकार कर दिया। यह पहली बार नहीं जब अग्निवेश पर सरकारी एजेंट होने का आरोप लगा हो। यही कारण है कि इस बार हजारे टीम ने उनसे दूरी बनाना सही समझा। पिछली बार जब अप्रैल में हजारे अनशन पर बैठे थे तब भी सरकार से समझौता करवाने में अग्निवेश सबसे आगे थे। टीम हजारे को अब महसूस हो रहा है कि अग्निवेश ने अन्ना को धोखा दिया है और अन्ना की पीठ में छुरा घोंपा है।
स्वामी अग्निवेश का जन्म 21 सितम्बर 1939 को छत्तीसगढ़ में हुआ। अग्निवेश ने कोलकाता में कानून और बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद आर्य समाज में संन्यास ग्रहण किया। आर्य समाज में काम करते हुए उन्होंने 1968 में एक राजनीतिक दल आर्य सभा बनाया। बाद में 1981 में बंधुआ मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। अग्निवेश ने हरियाणा से चुनाव लड़ा और मंत्री भी बने लेकिन मजदूरों पर लाठीचार्ज की एक घटना के बाद उन्होंने राजनीति से इस्तीफा दे दिया। कहा जाता है कि स्वामी अग्निवेश वाम विचारों के नेता हैं और सीताराम येचुरी से उनकी खास दोस्ती है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि सोची-समझी चाल के तहत आर्य समाज में घुसपैठ करने के लिए स्वामी को लगाया गया है ताकि अन्दर से वह इसे कंट्रोल कर सकें। स्वामी अग्निवेश को माओवादियों से विशेष हमदर्दी है और वह हमेशा माओवादियों और केंद्र सरकार में शांतिवार्ता कराने के पक्षधर रहते हैं। माओवादी प्रवक्ता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की घटना को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाले स्वामी अग्निवेश का कहना है कि इस घटना ने शांतिवार्ता को गहरा झटका पहुंचाया है। हिन्दू धर्म का अपमान करने वाले भगवा चोला पहने हुए इस स्वामी को तब कतई शर्म नहीं आई जब श्रीनगर में एक शांति सम्मेलन के दौरान अमरनाथ यात्रा को धार्मिक धोखा करार देते हुए कहा था कि मुझे समझ नहीं आता कि `लोग अमरनाथ यात्रा पर क्यों जाते हैं? मेरा धर्म के इस प्रकार पर कोई विश्वास नहीं है। धर्म वह होता है जब गरीबों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लड़कर उन्हें न्याय दिलाए।' अहमदाबाद में एक सभा में अग्निवेश को अपने विचारों का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। भरी सभा में स्वामी नित्यानन्द ने स्वामी अग्निवेश को थप्पड़ मारा और उन्हें मंच से घसीटने की कोशिश की। इसके बाद हालांकि स्वामी नित्यानन्द को गिरफ्तार कर लिया गया पर स्वामी अग्निवेश की हिम्मत नहीं हुई कि स्वामी नित्यानन्द के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज करवाएं। अब हरियाणा के हांसी की एक कोर्ट ने उनके खिलाफ इसी बयान के लिए एक गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया है। पुलिस को निर्देश दिया गया है कि उन्हें गिरफ्तार कर 19 सितम्बर को कोर्ट में पेश किया जाए। अग्निवेश ने यह भी कहा था कि अमरनाथ में बर्प का शिवलिंग बनना कोई ईश्वरीय चमत्कार नहीं है। यह तो एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। फिर भी पता नहीं क्यों लाखों लोग बावले होकर अमरनाथ यात्रा जाने के लिए तैयार हो जाते हैं।
स्वामी अग्निवेश के विवादित वीडियो पर हो रहे हंगामे से कांग्रेस और उसकी अगुवाई वाली सरकार बहरहाल थोड़ा चिंतित जरूर होगी, कांग्रेस ने उन्हें सरकारी खजाने से अपकृत जो कर रखा है। दिल्ली सरकार ने बंधुआ मजदूरों के सर्वे के लिए नियम-शर्तों को दरकिनार कर अग्निवेश के बंधुआ मुक्ति मोर्चा को 18 लाख रुपये जारी कर दिए। जैसे आनन-फानन में रुपये जारी हुए, एनजीओ ने वैसी ही बिना मतलब की 60 पेज की रिपोर्ट भी जारी कर दी। सर्वे में गेहूं, चावल जैसे किरयाने के साथ-साथ ऑफिस के टेलीफोन का बिल तक शामिल है। बंधुआ मजदूर कहां थे, कौन नियोजक था, इसका रिपोर्ट में कोई ब्यौरा नहीं है। हां खर्च का पूरा हिसाब 160 पन्नों में दर्ज जरूर है। दिल्ली सरकार की इस अंधेरगर्दीभरी दरियादिली के पांच वर्ष बाद अब महालेखा परीक्षक ने इस साठगांठ की जांच करने का फैसला किया है। यह बात 2006 की है। उस समय दिल्ली सरकार ने यकायक सभी नौ जिलों में बंधुआ मजदूरों के सर्वे के लिए अग्निवेश के जन्तर-मन्तर स्थित संगठन को 18 लाख की एकमुश्त राशि दी थी। इसके लिए न तो कोई समझौता पत्र तैयार हुआ और न ही नियम व शर्तें तय की गईं। आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी में डिवीजनल मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया है कि संस्था से सर्वे कराने का फैसला किसी आवेदन के आधार पर नहीं बल्कि सरकार के स्तर पर हुआ था। शायद यही कारण था कि पूरी राशि एकमुश्त अग्रिम मिल गई। स्वामी जी के और कारनामों की भी रिपोर्टें हैं, इनमें अवैध जमीनी कब्जा भी शामिल है पर इन सब आरोपों से स्वामी अग्निवेश को शायद ही कोई फर्प पड़े। उनका मकसद कुछ और ही है और जब तक उनके असल आका उनके काम से संतुष्ट हैं इन आरोपों का ज्यादा महत्व नहीं रह जाता।
Anil Narendra, Anna Hazare, Daily Pratap, Lokpal Bill, Swami Agnivesh, Vir Arjun

Wednesday, 31 August 2011

Why Anna got overwhelming support?

- Anil Narendra
A number of lessons can be learnt from Anna Hazare movement. It was a unique movement, which united whole of the country. People,  irrespective of their class, religion or community bond together. It was after years that the middle class came to street in such a huge number. It must have been a unique experience for these car-borne people serving food to their fellow citizens who had gathered there in support of the movement. For 12 days, this middle class, which shun elections, was standing there beside Anna at Ramlila Ground. Every class of the people participated in this movement. Many people were saying that those participating in candle light procession, were the  people who had never ventured out for polling. But these people forget  the fact that this very class feels neglected during elections. This  urban class feels itself in a minority in the scenario where elections are won on the basis of caste and region. They feel that persons like them are few in number and they do not consider their role in elections as that important. But, now they have realized that at least they must play their role in enactment of a strong anti-corruption law, a law to deal with the corruption that has weakened the foundation of the country. This movement has kindled a ray of hope for them.
Intellectuals and political observers are baffled as to what the people, who take Independence Day and Republic Day as holidays, saw in this movement that they spontaneously rushed to Ramlila Grounds.
Today, the Bhartiya Janta Party may be trying to claim credit for making Anna's movement a success and no doubt it had an important role as had it not openly accepted and supported all the three conditions put forth by Anna without any reservation, the government would not have conceded defeat so easily. In fact, the BJP initiative lend weight to Anna's movement, but it must also introspect as to why during these past years, it couldn't make corruption an issue, whereas, Anna succeeded in making it a forceful issue. Even the government always ignored the fervent public appeals to save them from
the monster of corruption. Crushed by corruption and price rise, the people of India continued lamenting and appealing to the government to take appropriate measures, but the Congress and the government took no heed. To console public, our politicians started saying that corruption is no more an issue. They concluded that people voted for the Congress in the name of development and they have now accepted corruption as a way of life. In other words, the government had come to the conclusion that now, neither corruption would be raised as an issue and nor there would be any anti-corruption movement, but a just 7th standard saintly person from Ralegan made all the calculations of
political pundits ineffective. People were moved by Anna's clean image and his forceful voice and they took to the streets. His trustworthiness has been the most important reason behind the success
of his movement. His moral stature, his selflessness and his sincere conduct also made his movement a resounding success. The common man saw in Anna, a 74-year elderly person fighting not for his own
interests but fighting their own battle. Whenever a politician says such things, people take it otherwise. It knows that whenever this party or the politician gets a chance, it or he will behave in the same manner. He will act against his preaching. This is due to the declining trust in political leaders that political parties have to put it all their resources for just gathering a crowd of 10-20 thousands. Party leaders of lower ranks are entrusted the responsibility to arrange crowd. Arrangements for tea, snacks and transportation are made. Their stature is dependent upon the crowd they are able to attract. On the other hand, people joined Anna's movement with the spirit of service and they made their own arrangements for food and transportation. They were not compelled by anybody, but it was a spontaneous outburst. Our politicians should learn from this movement and understand the deep insights of Anna's victory. Don't know whether they have still realized it or not.

अन्ना के लिए जनमानस क्यों उतरा, यह समझना चाहिए


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 31st August 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे के आंदोलन से कई सबक निकलते हैं। यह एक अद्भुत आंदोलन था जिसने सारे देश को एक कर दिया। सारे वर्गों, धर्मों, समुदायों सभी को मिला दिया। वर्षों बाद मिडल क्लास के लोग सड़कों पर उतरे। अपनी गाड़ियों से उतरकर रामलीला मैदान में सफाई कर रहे, भोजन परोस रहे इन लोगों ने शायद इससे पहले कभी भी यह सब नहीं किया होगा। वह मिडल क्लास जो वोट नहीं करता वह 12 दिनों में रामलीला मैदान में अन्ना के साथ खड़ा दिखा। इस आंदोलन में देश का हर तबका शामिल था। कई लोग कह रहे हैं कि कैंडिल मार्च करने वाले लोग वे हैं जो कभी वोट डालने भी नहीं जाते। मगर ये सब कहने वाले भूल जाते हैं कि देश का यही वर्ग चुनावों में अपने आपको उपेक्षित महसूस करता है। जिस तरह चुनाव जातिवाद और क्षेत्रवाद जैसे मुद्दों पर जीते जाते हैं, वहां देश का यह शहरी वर्ग अपने आपको अल्पमत महसूस करता है। उन्हें लगता है कि उनकी संख्या मुट्ठीभर है और वे चुनाव में अपनी कोई भूमिका ही नहीं मानते। मगर अब इन्हें लग रहा है कि कम से कम हमारी भूमिका उस कानून को बनाने में तो हो जो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सके। वही भ्रष्टाचार जो देश को घुन की तरह खा गया है। इस आंदोलन ने उनमें एक उम्मीद जगाई है।
बुद्धिजीवियों और राजनीतिक पंडितों को यह बात अचम्भित कर रही है कि जो जनता स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस को एक छुट्टी के दिन ही तरह देखती है उसे इस आंदोलन में ऐसा क्या दिखा कि वह बिना बुलाए रामलीला मैदान की तरफ दौड़ पड़ी। आज बेशक भाजपा इस बात का श्रेय लेने की कोशिश कर ही है कि अन्ना का आंदोलन अंतत सफल कराने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बेशक रही भी, अगर भाजपा खुलेआम घोषणा नहीं करती कि वह अन्ना की तीनों शर्तों को बिना किसी रिजर्वेशन के स्वीकार करती है और समर्थन करती है तो शायद सरकार अब भी इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। भाजपा के इनिशिएटिव ने अन्ना का पलड़ा भारी कर दिया पर भाजपा को यह सवाल अपने से जरूर पूछना चाहिए कि इतने वर्षों से वह भ्रष्टाचार को मुद्दा क्यों नहीं बना पाई। आखिर अन्ना इसे कैसे मुद्दा बना गए? सरकार ने भी जनता की पुकार व जनता में मची त्राहि-त्राहि को हमेशा नजरंदाज किया। भ्रष्टाचार और महंगाई से दबी भारत की जनता चीख-चीखकर पुकारती रही कि कुछ करो, कुछ करो पर कांग्रेस पार्टी और सरकार के जूं तक नहीं रेंगी। हमारे राजनेताओं ने अपने को तसल्ली देने के लिए यह दलील देनी आरम्भ कर दी कि भ्रष्टाचार अब कोई मुद्दा नहीं रहा है। राजनेताओं का यही मानना था कि जनता ने विकास के नाम पर कांग्रेस को वोट दिया और भ्रष्टाचार अब जनता में स्वीकार्य हो चुका है यानि भ्रष्टाचार का अब न तो मुद्दा बनाया जा सकेगा और न ही भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत में कोई आंदोलन हो सकता है परन्तु महज सातवीं कक्षा पास रालेगण के एक संत ने राजनीतिक पंडितों की सारी थ्यौरियों को विफल कर दिया। अन्ना की अपनी साफ स्वच्छ छवि और सीधी आवाज ने लोगों को दिल से छू लिया और वह सड़कों पर आ गए। अन्ना के आंदोलन सफल होने के पीछे सबसे बड़ा कारण था उनकी अपनी विश्वसनीयता। इसके पीछे कारण था अन्ना का नैतिक कद, उनकी निस्वार्थता और उनका निष्कपट व्यक्तित्व। अन्ना हजारे को देखकर आम आदमी को यह लगा कि यह 74 साल का वृद्ध अपने लिए संघर्ष नहीं कर रहा, यह उनके लिए संघर्ष कर रहा है। जब कोई राजनेता इन्हीं बातों को कहता है तो जनता इसका दूसरा मतलब निकालती है। उसे पता होता है कि अवसर पड़ने पर यह दल या राजनेता भी वही व्यवहार करेगा जिसके खिलाफ वह भाषण कर रहा है। राजनेताओं पर से जनता के उठते विश्वास का ही नतीजा है कि राजनीतिक दलों को अपनी रैलियों में 10-20 हजार की भीड़ इकट्ठी करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है। पार्टी के छुटभैया नेताओं पर भीड़ इकट्ठी करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। चाय, नाश्ते और गाड़ियों का इंतजाम किया जाता है। इन नेताओं का कद पार्टी में उनके द्वारा इकट्ठी की गई भीड़ से ही तय होता है और अन्ना के आंदोलन में जनता खुद अपने खर्चे पर, अपना खाना-पीना लेकर सेवाभाव से आई। उसे किसी ने मजबूर नहीं किया था। राजनेताओं को इस आंदोलन से सीख लेनी चाहिए और अन्ना की जीत के गहरे निहितार्थों को समझना चाहिए। पता नहीं अब भी इनको समझ आई कि नहीं।
Anil Narendra, Anna Hazare, BJP, Congress, Daily Pratap, Lokpal Bill, Manmohan Singh, Ram Lila Maidan, Vir Arjun

Monday, 29 August 2011

अन्ना का आंदोलन और मीडिया की भूमिका


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th August 2011
अनिल नरेन्द्र
शनिवार को लोकपाल विधेयक पर टीम अन्ना की तीन शर्तों पर संसद में हुई चर्चा में मीडिया की भूमिका पर भी टिप्पणियां की गईं। मीडिया की भूमिका को लेकर अक्सर नाराजगी जताने वाले जनता दल (यू) के शरद यादव और राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव शनिवार को भी नहीं चूके। इन दोनों ने स्वर से स्वर मिलाते हुए कहा कि अन्ना का पूरा आंदोलन मीडिया की देन है। जमीन से जुड़े संघर्षशील समाजवादी शरद यादव ने अन्ना की तीन मांगों पर लोकसभा में हुई बहस के दौरान केवल सहमति भर जताई। उन्होंने कहा कि अन्ना हजारे ईमानदार, संघर्षशील और जूझारू व्यक्ति हैं। मैं उनकी इज्जत करता हूं लेकिन उनसे शिकायत भी है। उन्होंने इन 12 दिनों में कभी भी महात्मा फुले को याद नहीं किया। शरद यादव ने कहा कि अन्ना को उनके आसपास के लोग और मीडिया भ्रमित कर रहा है। उनके इस अभियान को अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए इलैक्ट्रॉनिक मीडिया हवा दे रहा है। स्थिति यह हो गई है कि डिब्बा (टीवी) रातभर बजता रहता है। पूरे देश में कहीं बाढ़ तो कहीं गरीबी से तबाही मची हुई है, लेकिन डिब्बे को फुर्सत नहीं। उन्होंने सरकार से कहा कि इसे आप फुर्सत दिलाइए। आप अन्ना की बातों को मानकर अपनी सहमति डिब्बे वालों को भेज दें ताकि यह बन्द हो सके। उन्होंने कहा कि रामलीला मैदान में रात में जो भी भीड़ दिखती है उसमें ज्यादातर वहां घूमने और पिकनिक मनाने के लिए जा रहे हैं। पहले लोग बोट क्लब जाते थे अब रामलीला मैदान जा रहे हैं और मीडिया इन्हें बार-बार दिखाकर अपनी टीआरपी रेटिंग बढ़ा रहा है। शरद यादव ने कहा कि चार महीने से डिब्बा बज रहा रहा है। इस डिब्बे से बहुत दिक्कतें हैं। ये चैनल अन्ना से इतने ज्यादा प्रभावित हैं कि उन्हें देश में आई बाढ़ तक की खबर दिखाने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि वे पिछले 10 साल से किसी चैनल पर नहीं गए। उन्होंने वहां बैठे जतिन प्रसाद और सचिन पायलट से पूछा कि तुम लोग तो बुद्धिमान हो, क्यों जब भी इनके यहां चले जाते हो? उन्होंने एक चैनल विशेष की ओर इशारा करते हुए कहा कि एक डिब्बे में बंगाली बाबू मोशाय तो बात करते हुए इतने आक्रामक हो जाते हैं कि लगता है कि मुंह ही नोच लेंगे और दूसरों से भी नेताओं का मुंह नुचवाते हैं। अब तो अन्ना की बातें मानकर इन चैनलों से हमें भी निजात दिलवाओ। इस पर सदस्यों ने मेजें थपथपाकर उनका उत्साह बढ़ाया।
हम शरद साहब का बहुत आदर करते हैं पर उनकी दलीलों से सहमत नहीं हैं। मीडिया वही करेगा जो जनता चाहेगी और इसी के चलते मीडिया निर्णायक है और यह बात पिछले एक पखवाड़े में साबित भी हो गई है। इस दौरान टीवी देखने वालों के आंकड़े बढ़े हैं। अन्ना के आंदोलन ने सास-बहू या खेल की चैनलों पर अन्य सीरियलों की चैनलों और लोकप्रियता का ग्रॉफ गिराया है। लोग न्यूज चैनलों के सामने चिपके रहे। खेल चैनल 33 प्रतिशत और हिन्दी सिनेमा की चैनलों के चार प्रतिशत दर्शक घटे। इसके विपरीत हिन्दी न्यूज चैनलों के दर्शकों में छह फीसदी वृद्धि हुई। हिन्दी में स्टार न्यूज ने तीन करोड़ दर्शकों का आंकड़ा पार किया तो अंग्रेजी में टाइम्स नाऊ जबरदस्त हिट हुआ। ऐसा सब कुछ इसलिए है क्योंकि जनता जागरूक है, समझदार है और उसे मीडिया में अपनी बात की प्रतिध्वनि चाहिए। जनता का गुस्सा मजबूर कर रहा है कि चैनल और अखबार उसकी सोच पर थिरकें। औरों की बात क्या करें, मैं खुद पिछले एक पखवाड़े से केवल अन्ना के आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर ही अपने विचार दे रहा हूं और किसी विषय पर लिखने का मन ही नहीं। सवाल यह भी है कि अगर देश में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है, अगर देश में लोगों को अभिव्यक्ति का भरपूर मौका मिल रहा है तो भला मीडिया अपनी मजबूत भूमिका क्यों नहीं निभाएगा? जो लोग मीडिया पर अंगुली उठा रहे हैं वह कह रहे हैं कि अन्ना का आंदोलन तो मूलत मीडिया का आंदोलन है। ऐसे बुद्धिजीवियों से पूछा जाना चाहिए कि अगर देश में सामाजिक परिवर्तन लाने वाले किसी आंदोलन में मीडिया सकारात्मक भूमिका निभा रही है तो क्या वह लोकतंत्र और देशवासियों के लिए खराब है? क्या इससे लोकतंत्र मजबूत होता है या उनकी जड़ें खोखली हो रही हैं? किसी देश में लोकतंत्र की सफलता की कसौटी यही होती है कि क्या यह दिशा मीडिया भी रिफ्लैक्ट कर रहा है। अगर लोकतंत्र के प्रति मीडिया का रवैया सकारात्मक और सक्रिय भूमिका वाला नहीं है तो ऐसे में लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। जहां भी मीडिया की सक्रियता है वहीं लोकतंत्र भी जिन्दा है। आखिर तमाम ताकतवर षड्यंत्रों के बावजूद अमेरिका जैसे देश में बार-बार यह मीडिया ही तो है जो उजागर करती है कि किस तरह राष्ट्रपति निक्सन ने वॉटरगेट करवाया, किस तरह अमेरिका की आतंक के खिलाफ लड़ाई में अमेरिकी सैनिक मारे जा रहे हैं, यह मीडिया ही है जिसने ग्वांतानामे में इराक के लोगों से कुछ अमेरिकी सैनिकों ने अमानवीय व्यवहार किया। यह मीडिया ही है जो इंग्लैंड में मीडिया युगल रूपर्ट मर्डोक को बैकफुट पर जाने के लिए ही नहीं, सार्वजनिक रूप से माफी मांगने और दुनिया के एक प्राचीन व लोकप्रिय अखबार को बन्द करा दिया। यह मीडिया ही है जिसने पाकिस्तानी सेना के कुछ अफसरों की अलकायदा से साठगांठ का पर्दाफाश किया और उसकी भारी कीमत भी वहां के पत्रकारों को चुकानी पड़ रही है। इसलिए यह सोचना या कहना कि मीडिया के तौर-तरीके सही नहीं हैं, गलत है। अगर मीडिया सक्रिय नहीं होगा, अगर मीडिया बढ़कर अपनी भूमिका नहीं निभाएगा तो लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा। सरकारें व कारपोरेट जगत क्या मीडिया का अपने हितों, स्वार्थों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल नहीं करता? सबसे आश्चर्यजनक बात तो खुलकर उन सोशल नेटवर्किंग साइटों में देखने को मिली जहां लोग बहुत सहजता से यह टिप्पणी कर रहे थे कि मीडिया तो एंटी इस्टैबलिशमेंट सोच का ही होता है और यह भी कि मीडिया के पास कोई मसाला नहीं इसलिए वह अन्ना हजारे के आंदोलन को हवा दे रहा है, दुनिया में जितने भी परिवर्तन का बड़े आंदोलन हुए हैं, वे आंदोलन आमतौर पर सफल ही तब हुए हैं जब उनमें मीडिया की बढ़चढ़ कर और सक्रिय भूमिका खुलकर सामने आई है। यहां तक कि रूस में सम्पन्न बालशविक क्रांति को भी मीडिया जबरदस्त समर्थन दे रहा था और अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग द्वारा चलाए गए अश्वेत आंदोलन को भी मीडिया ने जबरदस्त समर्थन दिया था तभी अमेरिकी श्वेत इस स्तर तक झुकने को तैयार हुए थे और वह अश्वेतों को भी सम्मान के दो कदम अपने साथ मिलकर चलने पर मजबूर हुए। हाल के दशकों में दक्षिण अफ्रीका के रंगभेदी आंदोलन को भी अगर पूरी दुनिया में समर्थन मिला और दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार रंगभेद के मुद्दे पर झुकने को तैयार हुई तो उसकी बड़ी वजह सिर्प यही थी कि मीडिया नेल्सन मंडेला के रंगभेद के विरुद्ध आंदोलन के साथ थी। अगर मीडिया का समर्थन मंडेला को नहीं मिला होता तो वह जेल की कोठरी में ही खुद रहे होते। वहां से निकलकर अंधकार में डूबे अफ्रीका के सितारे नायक न बनते। क्या मीडिया के बिना किसी समाज की कम से कम आज की तारीख में कल्पना कर सकते हैं? अगर मीडिया शानदार वायडॉग की भूमिका नहीं निभाएगा तो क्या सरकार निभाएगी? क्या यह सांसद निभाएंगे? सरकारें और राजनेता कभी भी स्वतंत्र मीडिया को बर्दाश्त नहीं करते। अक्सर देखा जाता है कि जब मीडिया किसी सरकार की तारीफ करता है तो वह अच्छा हो जाता है और अगर वह सरकार की कमियों को हाई लाइट करे तो विलेन बन जाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अन्ना के आंदोलन को हवा देने का आरोप मीडिया पर लगाया जा रहा है। मीडिया अपना काम कर रहा है जो देशहित में है। जिन देशों में जनवादी, राजनीतिक उभारों और सिविल सोसाइटी को मीडिया का समर्थन नहीं मिलता, वहां लोकतंत्र कभी फलफूल नहीं सकता।

Sunday, 28 August 2011

A historic day for democracy

- Anil Narendra
This day will be remembered as a red letter day in the history of India, as both the houses of the Parliament unanimously declared their resolve to enact the Lokpal Bill, which had evaded enactment for last 43 years. The credit for this revolutionary achievement goes to the movement led by a 74 years old Gandhian, who caused the people of the Nation to rise against the monster of corruption.
Ideological differences between the government and the leaders of the movement were mounting. The government had resorted to every tactic to prove that it was a meaningless and uncalled for movement and for this it gave all sorts of arguments based on constitutional, democratic and parliamentary procedural provisions, but ultimately it had to bow before the wishes of the public of the nation.
In fact, when all the policies of the government failed, it felt that it is being weighed down by public sentiments and it started back channel dialogue and felt that political issues can only be settled politically. That is why, for adopting indifferent attitude two advocate ministers were sidelined and the responsibility of dealing with the movement and its leaders was entrusted to politically matured Pranab Mukherjee, who roped in the senior BJP leader LK Advani in his endeavour. Law and Justice Minister was also there to assist him. Mr Salman Khursheed also associated Sandeep Dikshit, a Member of Parliament with this mission. The need for a dialogue was being felt by both the sides. Meanwhile, an important incident took place. The Team Anna met senior BJP leaders at the residence of Mr Advani on Thursday night. The BJP leaders sought clarifications on certain points, especially on keeping the judiciary out of the purview of Lokpal and Lokpal's non-interference in the conduct of members of Parliament inside the House, on which they were not in agreement with Team Anna.
Team Anna agreed to both the proposals for amendments. Thereafter, BJP came out in open support of the Lokpal Bill of Anna Hazare. This changed the situation. The government was frightened and realized that it has no option but to bow down before it and accept all the proposals put forth by Anna. The situation took an unpleasant turn on Friday, when Rahul Gandhi called Anna's movement totally undemocratic, but it was the prudence of Pranab Babu which saved the situation. Anna has put forward three conditions for a strong Lokpal Bill, namely first, appointment of Lokpal in the Centre and Lokayuktas in States; second, all personnel right from Cabinet Secretary to the accountant be brought under the ambit of Lokpal; and third, citizen charters be prepared.
On Friday itself, the BJP openly said that it would debate on the Bill and it will base its arguments on Anna's Jan Lokpal Bill and it did so. Ms Sushma Swaraj in Lok Sabha and Mr Arun Jaitley in Rajya Sabha, not only fully supported all the three conditions of Anna, but also sharpened all the points raised in Jan Lokpal Bill. The situation had changed altogether. In view of such an attitude of the Opposition, the Congress dared not to oppose the move and next moment Anna was the central to the discussions in both the Houses of Parliament. While underlining the supremacy of Parliament, Ms Sushma in Lok Sabha and MrJaitley in Rajya Sabha also accused all the governments so far, for not getting the Lokpal Bill passed during last 43 years, even after being presented in the Parliament nine times. They also took responsibility of their governments' failures. After the discussions, Mr Pranab Mukherjee reiterated that we had lost the opportunity though we got it nine times. Thus, on one hand the Parliament advised its members for introspection, while members of Team Anna apologized number of times on Saturday that their stage was used to abuse members of Parliament. In any case, the nation has once again established itself as the most vast and vibrant democracy of the world and proved that agreement within dissent, agreement within discord and unanimity within diversities is the unique feature of Indian democracy and this is the greatness of our democracy. Team Anna must be congratulated for the great service they have rendered in awakening this country against corruption, on the other hand, the government and the Parliament too, must also be praised for the resolve they have expressed against corruption. Let us hope that a job pending in the country since 1968 would be completed soon and we would get a new institution of Lokpal.
Anil Narendra, Anna Hazare, Daily Pratap, Lokpal Bill, Parliament, Vir Arjun

लोकतंत्र के लिए ऐतिहासिक दिन


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th August 2011
अनिल नरेन्द्र
आज का दिन लोकतंत्र के लिए इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा क्योंकि 43 वर्षों से जो लोकपाल बिल कानूनी जामा नहीं पहन सका उसको मूर्त रूप देने के लिए सर्वसम्मति से संसद के दोनों सदनों में सदस्यों ने संकल्प व्यक्त किया। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सारा कुछ 74 वर्षीय वृद्ध एक ऐसे गांधीवादी नेता के आंदोलन की वजह से हुआ जिसने देश की जनता की भावनाओं को भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ खड़ा होने के लिए शंखनाद किया।
सरकार और आंदोलनकारी नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद गहराए। सरकार ने संवैधानिक, लोकतांत्रिक एवं संसदीय प्रक्रिया संबंधी व्यवस्थाओं का तर्प देते हुए आंदोलन को निरर्थक एवं असंगत साबित करने के लिए हर सरकारी तरीका अपनाया किन्तु देश की जनता के सामने सरकार को झुकना ही पड़ा।
दरअसल साम, दाम, दण्ड, भेद, की सारी नीतियां अपनाने के बाद जब सरकार पर जन भावनाएं भारी पड़ने लगीं और सरकार ने पर्दे के पीछे से संवाद शुरू किया और महसूस किया कि सियासी मसले सियासत से ही हल किए जा सकते हैं। इसीलिए जो दो वकील मंत्री आंदोलनकारियों के खिलाफ ज्यादा संवेदनहीन रुख अख्तियार किए हुए थे उन्हें दरकिनार करके एक राजनीतिक रूप से परिपक्व व्यक्ति प्रणब मुखर्जी को कमान सौंपी। प्रणब मुखर्जी ने भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी से सहयोग लेना शुरू कर दिया। प्रणब बाबू के साथ विधि एवं न्यायमंत्री सक्रिय रूप से जुड़े थे। सलमान खुर्शीद ने अपने साथ सांसद संदीप दीक्षित को जोड़ा। दोनों तरफ से संवाद की जरूरत महसूस की गई। इसी बीच एक महत्वपूर्ण घटना घटी। बृहस्पतिवार की रात को टीम अन्ना और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की आडवाणी के निवास पर एक बैठक हुई। इस बैठक में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने टीम अन्ना के उन प्रावधानों पर स्पष्टीकरण मांगा जिससे वे असहमत थे। खासकर न्यायपालिका को लोकपाल के तहत न रखना और संसद सदस्यों को सदन के अन्दर विशेषाधिकार पर लोकपाल का हस्तक्षेप न होना। टीम अन्ना भाजपा के दोनों संशोधन के सुझावों पर सहमत हो गई। इसके बाद भाजपा खुलकर अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल के समर्थन में आ गई। इससे स्थिति बदल गई। सरकार सहम गई कि अब उसके सामने झुकने और अन्ना के सारे प्रस्तावों को स्वीकार कर लेने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। एक बार तो स्थिति शुक्रवार को भी बिगड़ी जब राहुल गांधी ने अन्ना के आंदोलन को अलोकतांत्रिक तक बता डाला था किन्तु प्रणब बाबू की सूझबूझ से स्थिति सम्भल गई। अन्ना की तीन शर्तोंöपहली केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति, दूसरी कैबिनेट सचिव से लेकर लेखपाल तक लोकपाल के दायरे में आएं और तीसरी सिटीजन चार्टर बने।
भाजपा ने शुक्रवार को ही इस बात का खुलकर पुरजोर प्रचार किया कि वह सदन में अन्ना के जन लोकपाल बिल को आधार मानकर चर्चा करेगी और किया भी। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने खुलकर न सिर्प अन्ना की तीनों शर्तों का समर्थन किया बल्कि अन्ना के जन लोकपाल बिल के विभिन्न बिन्दुओं को और अधिक धारदार साबित कर दिया। स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। विपक्ष के इस तरह के रुख के बाद कांग्रेस विरोध का साहस नहीं कर सकी और देखते ही देखते संसद के दोनों सदनों में अन्ना छा गए। लोकसभा में सुषमा और राज्यसभा में अरुण जेटली ने संसद की सर्वोच्चता का महिमामंडन तो किया ही साथ ही यह भी कहा कि 43 वर्षों में 9 बार लोकपाल बिल पेश न कर पाने के लिए सभी सरकारें जिम्मेदार हैं। उन्होंने अपनी सरकारों की भी जिम्मेदारी मानी। बहस के बाद प्रणब बाबू ने भी यही बात दोहराई कि हमें 9 बार अवसर मिला किन्तु हमने उसे खो दिया। इस तरह संसद ने जहां एक तरफ अपने गिरेबान में झांकने की नसीहत ली और दी वहीं टीम अन्ना के लोगों ने कई बार शनिवार को अनशन स्थल पर आकर इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि उनके स्टेज से सांसदों के प्रति अपशब्द निकाले गए जिसके लिए उन्हें खेद है। बहरहाल विश्व के सर्वाधिक विशाल लोकतंत्र के रूप में एक बार फिर देश ने अपने आपको स्थापित कर लिया है और यह साबित कर दिया है कि असहमति के बीच सहमति, विषमताओं के बीच सहमति और विभिन्नताओं के बीच एकमत ही भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है और यही है हमारे लोकतंत्र की महानता। टीम अन्ना ने देश को भ्रष्टाचार के विरुद्ध जगाने का जो महान कार्य किया है उसके लिए वह बधाई की पात्र है और सरकार एवं संसद ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो संकल्प व्यक्त किया उसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्दी ही देश में 1968 से लेकर अब तक लम्बित प्रयास पूरा होगा और हमें लोकपाल की नई व्यवस्था हासिल होगी।
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