योग बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ आगामी साझा अभियान के ठीक पहले शुक्रवार को रामदेव के खास सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को सीबीआई ने पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार से गिरफ्तार कर लिया। बालकृष्ण के खिलाफ फर्जी पासपोर्ट मामले में कोर्ट में हाजिर होने का सम्मन जारी किया गया था। सूत्रों ने कहा कि बालकृष्ण को शुक्रवार को सीबीआई की विशेष अदालत में हाजिर होना था लेकिन वे हाजिर नहीं हुए। इसके बाद उन्हें हरिद्वार में बाबा रामदेव के पतंजलि योग पीठ आश्रम से वहां मौजूद लोगों के विरोध के बीच गिरफ्तार कर लिया गया। फर्जी पासपोर्ट, दोहरी नागरिकता और फर्जी डिग्री मामले में सीबीआई ने पिछले साल 23 जुलाई को एफआईआर दर्ज की थी। इसी महीने 10 जुलाई को बालकृष्ण के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। अदालत ने उन्हें पेश होने के लिए 20 जुलाई तक का समय दिया था। सीबीआई ने जांच में पाया कि बालकृष्ण ने उत्तर प्रदेश के खुर्जी के संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य से मिलकर फर्जी सर्टिफिकेट लिया जिससे पासपोर्ट बनवाया। दोनों के खिलाफ धोखाधड़ी सहित दूसरी धाराओं में मामले दर्ज किए गए। बालकृष्ण के खिलाफ पासपोर्ट कानून के तहत भी प्रकरण दर्ज किया गया। सम्पूर्णानन्द संस्कृत यूनिवर्सिटी से पूछताछ में पता चला कि बालकृष्ण का नाम उनके रिकार्ड में नहीं है। सीबीआई ने बालकृष्ण के सर्टिफिकेट में दिए गए नामांकन क्रमांक को संस्थान के रिकार्ड से मिलाया जिसमें यह नम्बर किसी अन्य विद्यार्थी का पाया गया। इसी यूनिवर्सिटी की फर्जी डिग्री बालकृष्ण ने बनवाई थी। बालकृष्ण की नागरिकता के बारे में भी नेपाल से जानकारी मांगी गई लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं आया है। आचार्य के समर्थकों ने उनकी गिरफ्तारी का देहरादून और हरिद्वार में जबरदस्त विरोध किया, नारेबाजी की और उनकी कार के आगे लेट गए और पतंजलि योग पीठ के सामने हाइवे जाम कर दिया। पुलिस को स्थिति सम्भालने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा। आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी की निन्दा करते हुए बाबा रामदेव ने कहा कि सरकार ने नौ अगस्त के आंदोलन को कुचलने के लिए साजिश के तहत आचार्य को सीबीआई के माध्यम से गिरफ्तार करवाया है। उन्होंने कहा कि आंदोलन से घबराई केंद्र सरकार ने आतंकवादियों की तर्ज पर आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी की है लेकिन इससे आंदोलन कमजोर नहीं होगा। शुक्रवार की रात सहारा ग्रेस में पत्रकारों से मुखातिब बाबा ने कहा कि पहले सीबीआई के जरिये सरकार ने नेपाल सरकार पर दबाव बनाया कि वह बालकृष्ण को नेपाली नागरिकता संबंधी प्रमाण पत्र दें। लेकिन जब नेपाल सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि आचार्य बालकृष्ण भारत के नागरिक हैं तो फिर फर्जी उपाधि का षड्यंत्र रच कर बालकृष्ण को गिरफ्तार कर लिया। रामदेव का कहना है कि संविधान में अनपढ़ों को भी पासपोर्ट हासिल करने का अधिकार है तो आचार्य को पासपोर्ट हासिल करने के लिए फर्जी उपाधि की क्या आवश्यकता है? बालकृष्ण की गिरफ्तारी का लाभ उठाते हुए पूछताछ में रामदेव की आर्थिक व व्यापारी गतिविधियों के बारे में सीबीआई को मदद मिलेगी। इसमें जहां बदले की कार्रवाई की बू आती है वहीं असल टारगेट बाबा लगते हैं। बालकृष्ण तो महज दबाव बनाने वाले एक मोहरा हैं। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव में बहुत फर्प है। अन्ना हजारे एक फकीर हैं जो बहुत साधारण जीवन व्यतीत करते हैं जबकि बाबा हाई प्रोफाइल उद्योगपति बन गए हैं जिनका करोड़ों का कारोबार है और अरबों का साम्राज्य। असल निशाना तो बाबा रामदेव ही हैं।
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Tuesday, 24 July 2012
Tuesday, 22 May 2012
सवाल बाबा रामदेव के ट्रस्टों को 58 करोड़ के नोटिस का
योग गुरु बाबा रामदेव आजकल फिर सुर्खियों में हैं। पिछले कई दिनों से बाबा रामदेव ने विदेशों में जमा देश के काले धन को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित करने का अभियान चला रखा है, जन प्रतिनिधियों के खिलाफ खासकर सांसदों के प्रति सख्त भाषा का प्रयोग करना इसका एक हिस्सा बन चुका है। दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि बाबा रामदेव इस सरकार की आंखों की किरकिरी बन चुके हैं। सरकार ने भी बाबा पर जवाबी हमला करना आरम्भ कर दिया है। सरकार का कहना है कि योग गुरु रामदेव को आयकर चुकाने से मिली छूट खत्म हो गई है। उनके ट्रस्टों को 58 करोड़ रुपये चुकाने का नोटिस थमाया गया है। आयुर्वेदिक दवाएं बेचने से हुई कमाई पर आयकर चुकाने के लिए रामदेव के ट्रस्टों को नोटिस जारी कर दिया गया है। सूत्रों ने बताया कि आंकलन वर्ष 2009-10 के दौरान हुई 120 करोड़ रुपये की कमाई पर कर चुकाने के लिए हरिद्वार स्थित पतंजलि योग पीठ ट्रस्ट, दिव्य योग ट्रस्ट और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को यह नोटिस जारी किया गया है। आयकर विभाग ने इन्हें वाणिज्यिक गतिविधियां मानकर नोटिस दिए हैं। विदेशों में जमा भारतीय नागरिकों के काले धन को देश में वापस लाने की मुहिम चला रहे रामदेव एक ऐसे संगठन के प्रमुख हैं जो भारत और दूसरे देशों में आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण और बिक्री का प्रबंधन करने वाले ट्रस्ट संचालित करते हैं। परमार्थ कार्य करने वाले संगठनों से जुड़े प्रावधानों के तहत पिछले कुछ सालों से उनके ट्रस्टों को आयकर चुकाने से छूट मिली हुई थी। अब आयकर विभाग कहता है कि जांच के बाद उन्होंने पाया कि आयुर्वेदिक दवाओं और इससे जुड़ी दूसरी पाचन सामग्रियों की बिक्री एक वाणिज्यिक गतिविधि है और इन्हें आयकर चुकाने से छूट नहीं मिल सकती। बाबा रामदेव ने इस नोटिस पर सख्त प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मैंने जो मुहिम चलाई हुई है उससे सरकार घबरा चुकी है और आनन-फानन में मुझ पर दबाव डालने का प्रयास कर रही है। मगर वे जिस लक्ष्य को लेकर आगे बढ़े हैं उससे कभी पीछे नहीं हटेंगे। बाबा रामदेव ने कहा कि आयकर विभाग ने 58 करोड़ का कर थोपने का जो नोटिस दिया है, वह एक नियोजित चाल है। आयकर विभाग के निर्णय के खिलाफ आयकर आयुक्त के यहां अपील दायर कर दी गई है। ट्रस्ट पहले भी सही दिशा में चल रही थी और आगे भी सही चलेगी। योग गुरु ने कहा कि सरकार मुझे फांसी देना चाहती है और सेवा करना कोई अपराध नहीं है। आखिर मुझे किस बात की सजा दी जा रही है? मैंने कोई चोरी या देश से गद्दारी नहीं की है। देश से गद्दारी करने वाले व उनकी संतानें तो देश में राज कर रही हैं। वे तो काले धन वापस लाने तथा भ्रष्टाचार को फेंकने की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन इससे सरकार का सिंहासन हिलता है, क्योंकि व्यवस्था पर भ्रष्ट लोगों का कब्जा है। काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर सरकार पर लगातार निशाना साध रहे बाबा की मुश्किलें सिर्फ आयकर नोटिस से ही खत्म नहीं होंगी। प्रवर्तन निदेशालय उनके तमाम ट्रस्टों के खिलाफ विदेश विनियम अधिनियम (फेमा) के उल्लंघन के आरोपों की भी जांच कर रहा है, क्योंकि इन ट्रस्टों की व्यावसायिक गतिविधियां विदेशों में भी जारी है। यह पहली बार नहीं जब बाबा रामदेव की गतिविधियों पर सवाल खड़े हुए हैं। इससे पहले भी उनकी दवाओं की शुद्धता व विश्वसनीयता पर विशेषज्ञ सवाल उठा चुके हैं। बाबा के सबसे विश्वस्त सहयोगी बालकृष्ण की भारतीय नागरिकता पर उठा विवाद अब भी न्यायालय में विचाराधीन है। बाबा को सरकार को चुनौती देने का पूरा अधिकार है और यह भी सही माना जा सकता है कि बाबा के अभियान के खिलाफ सरकार बदले की कार्रवाई पर उतर आई है पर यह भी सच है कि बाबा अपनी दवाओं को कामर्शियल बेसिस पर चला रहे हैं, उनकी ग्लोबल मार्पिटिंग कर रहे हैं और अगर वह इन्हें आधुनिक कामर्शियल एक्टिविटी की तरह चला रहे हैं तो उस पर कर की मांग गलत नहीं हो सकती।
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Saturday, 5 May 2012
...और अब बाबा रामदेव ने संसद को कोसा
यह दुःख की बात है कि कुछ लोग अपनी भड़ास निकालने के लिए कुछ भी कह देते हैं। वह बोलने से पहले यह भी नहीं सोचते कि वह जो कह रहे हैं क्या वह ठीक है, संसद की गरिमा के अनुसार है। मैं योग गुरु बाबा रामदेव की बात कर रहा हूं। अपनी फ्रसट्रेशन में बाबा रामदेव ने गत दिनों छत्तीसगढ़ के दुर्ग में सांसदों को डकैत, हत्यारा और जाहिल बता डाला। इससे पहले टीम अन्ना के अरविन्द केजरीवाल ने भी संसद में बारे में अनॉप-शनॉप कहा था। बाबा रामदेव दुर्ग में बोले कि सांसदों में अच्छे लोग भी हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। लेकिन वहां डकैत, हत्यारे और जाहिल भी हैं। उन्हें किसानों, मजदूरों और लोगों की कोई चिन्ता नहीं है। वे सिर्प पैसे के गुलाम हैं। वे इंसान की शक्ल में शैतान हैं। हमें संसद को बचाना है। हमें भ्रष्ट लोगों को हटाना है। जब बाबा के इस बयान पर संसद में हंगामा हुआ तो बाब बोले, मैं अपने बयान पर कायम हूं। संसद में बैठे अधिकांश सांसद चोर हैं। बाबा के इस बयान पर सांसदों का भड़कना स्वाभाविक ही था। बाबा ने यह बयान मंगलवार को दिया तो बुधवार को ही सभी दलों के सांसदों ने एक सुर में कहा कि इस तरह का अपमान स्वीकार्य नहीं है। सांसदों ने योग गुरु पर जमकर भड़ास निकाली। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कहा कि लगता है बाबा का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है जबकि कांग्रेसी सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी ने कहा कि रामदेव खुद ढोंगी बाबा हैं। ऐसे में उनकी टिप्पणियों पर ज्यादा ध्यान व महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। पूर्व वित्तमंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि सांसदों और दूसरे नेताओं को कोसने का फैशन-सा चल पड़ा है। संसदीय गरिमा के लिए यह चिन्ताजनक पहलू है। हाल के महीनों में कई बार संसद की गरिमा का सवाल खड़ा हुआ है। यह सारा मामला पिछले साल अगस्त में रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के आंदोलन से शुरू हुआ। उस समय फिल्म स्टार ओम पुरी ने सांसदों के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली थी। सांसदों को वह गंवार और घोर नालायक तक कह गए थे। जब संसद में कड़े तेवर दिखाए गए तो ओम पुरी ने माफी मांग ली। फिर आई बारी अरविन्द केजरीवाल की। उन्होंने कह दिया कि ज्यादातर सांसद बलात्कारी, लुटेरे और अपराधी हैं। इस पर संसद की अवमानना का मामला उन पर चल रहा है। इसके बाद भी केजरीवाल संसद के सामने माफी मांगने को तैयार नहीं हुए थे। यह मामला अभी तक लम्बित है। हम बाबा रामदेव की बात से सहमत नहीं हैं। सारे सांसद चोर, बेइमान नहीं हैं। हो सकता है कि कुछ पर आपराधिक मामले दर्ज हों पर इससे आप सभी को गलत नहीं बता सकते। एक लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का होता है। रामदेव और केजरीवाल सरीखे के नेता जनता से क्यों नहीं सीधी बात करते। लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। क्यों नहीं वह जनता को समझाते कि आपराधिक रिकॉर्ड व चरित्र के उम्मीदवारों को वह वोट न दें। लोकतांत्रिक संस्थाओं को यूं गाली निकालना सही नहीं। यूं तो क्या बाबा रामदेव इस बात से इंकार कर सकते हैं कि साधुओं में भी तो इस प्रकार के चरित्र के लोग हैं तो क्या हम सभी साधुओं को गाली दें?
Anil Narendra, Baba Ram Dev, Daily Pratap, Parliament, Vir Arjun
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Sunday, 26 February 2012
4 जून की रात रामलीला मैदान में हुआ था जुल्म
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 26th February 2012
अनिल नरेन्द्र
हमें इस बात की खुशी है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बाबा रामदेव समर्थकों पर 4 जून 2011 को हुए लाठीचार्ज पर सरकार को कड़ी फटकार लगाई है और माना कि उस रात पुलिस कार्रवाई गलत थी। काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर रामलीला मैदान में सत्याग्रह कर रहे बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को 4 जून की रात रामलीला मैदान से बलपूर्वक निकाल बाहर करने की दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र पर कुठाराघात बताते हुए इसके लिए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि रामलीला मैदान में रात को सो रहे सत्याग्रहियों पर दिल्ली पुलिस की बर्बर कार्रवाई जनता और सरकार के बीच कम हो रहे विश्वास का ज्वलंत उदाहरण है। न्यायमूर्ति बलबीर सिंह चौहान और स्वतंत्र कुमार की खंडपीठ ने गुरुवार को अपने फैसले में कहा कि सत्याग्रहियों के खिलाफ बल प्रयोग करके दिल्ली पुलिस ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया। सरकार को दोषी पुलिस अधिकारियों के साथ ही पथराव करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई करने का आदेश दिया है। सरकार को इस कार्रवाई के बारे में तीन महीने के भीतर अदालत में रिपोर्ट देनी है। न्यायाधीशों ने कहा कि 4 जून की रात में हुई घटना को टाला जा सकता था पर पुलिस और प्रशासन ने अपनी ताकत का प्रयोग कर सोते हुए सत्याग्रहियों पर लाठियां बरसाईं जिससे एक महिला की मौत हो गई और कई अन्य जख्मी हुए। अदालत ने सख्त शब्दों में कहा कि पुलिस का काम शांति कायम रखना है लेकिन रामलीला मैदान में उसने शांति भंग करने का ही काम नहीं किया बल्कि सोते हुए सत्याग्रहियों पर लाठियां बरसा कर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन भी किया। न्यायाधीशों ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि दिल्ली पुलिस ने सत्याग्रहियों को रामलीला मैदान से निकाल बाहर करने के लिए बेहद हिंसक तरीका अपनाया, लेकिन दूसरी ओर बाबा रामदेव के समर्थकों ने भी पुलिस पर हिंसक तरीके से पथराव किया जिससे स्थिति और बिगड़ गई। अदालत ने जान गंवाने वाली राजबाला के परिजनों को 5 लाख रुपये, गम्भीर रूप से घायलों को 50-50 हजार रुपये और मामूली रूप से घायलों को 25-25 हजार रुपये बतौर मुआवजा अदा करने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि मुआवजे की इस राशि का 25 फीसदी अंश का भुगतान बाबा रामदेव का ट्रस्ट करेगा।
हम हमेशा से कहते आ रहे हैं कि केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और कुछ अन्य मंत्रियों के इशारों पर दिल्ली पुलिस ने 4 जून को सोते हुए लोगों पर कहर ढा दिया। सरकार और पुलिस कहती रही कि कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ, न कोई जबरन कार्रवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दूध का दूध पानी का पानी हो गया है पर हमारा मानना है कि दिल्ली पुलिस ने उस रात जो भी किया वह गृह मंत्रालय के आदेशों पर किया। असल कसूरवार तो आदेश देने वाले हैं, दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई का विरोध भी किया था। पुलिस ने कहा था कि हम सुबह होते ही शांति से रामलीला मैदान खाली करवा लेंगे पर मनमोहन सरकार के कुछ मंत्रियों ने तो ठान ली थी कि बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को ऐसी मार मारनी है जो वह दोबारा ऐसा करने की जुर्रत न करें।
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हम हमेशा से कहते आ रहे हैं कि केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और कुछ अन्य मंत्रियों के इशारों पर दिल्ली पुलिस ने 4 जून को सोते हुए लोगों पर कहर ढा दिया। सरकार और पुलिस कहती रही कि कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ, न कोई जबरन कार्रवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दूध का दूध पानी का पानी हो गया है पर हमारा मानना है कि दिल्ली पुलिस ने उस रात जो भी किया वह गृह मंत्रालय के आदेशों पर किया। असल कसूरवार तो आदेश देने वाले हैं, दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई का विरोध भी किया था। पुलिस ने कहा था कि हम सुबह होते ही शांति से रामलीला मैदान खाली करवा लेंगे पर मनमोहन सरकार के कुछ मंत्रियों ने तो ठान ली थी कि बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को ऐसी मार मारनी है जो वह दोबारा ऐसा करने की जुर्रत न करें।
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Thursday, 29 December 2011
मायावती को राइट ऑफ करना भारी भूल होगी
उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव तिथियों की घोषणा से यूपी की तमाम विपक्षी पार्टियों में उत्साह आ गया है। सब अपनी-अपनी हांकने में लग गए हैं। सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी को तो उन्होंने मान लिया है कि वह आगामी चुनाव में मुंह की खाएगी। पर हमें नहीं लगता कि मायावती को एक समाप्त फोर्स मानकर चलना समझदारी होगी। अनुमान भले ही मायावती सरकार के बारे में व्यवस्था विरोधी माहौल के लगाए जा रहे हों पर धरातल पर बसपा उतनी कमजोर नहीं है, जितनी उसे कांग्रेस, सपा और भाजपा मानकर चल रही हैं। मायावती ने अपनी चुनावी तैयारियां एक साल पहले से ही शुरू कर दी थीं। सूबे के सभी 403 सीटों पर बसपा ने अपने उम्मीदवार डेढ़ साल पहले ही तय कर दिए थे। यह अलग बात है कि बहन जी ने इनमें से कुछ को बाद में बदला है। पर कांग्रेस, सपा और भाजपा को तो अपने उम्मीदवार फाइनल करने में भी भारी दिक्कतें आ रही हैं और इनमें विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। यह सही है कि बहन जी इस बार मतदाताओं के सामने अपनी किसी विफलता का कोई बहाना नहीं बना पाएंगी। चमत्कार करते हुए मतदाताओं ने 2007 के चुनाव में बसपा को 206 सीटें देकर स्पष्ट बहुमत दिया था। इसी के दम पर मायावती सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। जबकि उनसे पहले की तीन सरकारें न केवल अपना कार्यकाल ही पूरा कर पाईं बल्कि वे भाजपा के समर्थन पर टिकी थीं। इस बार मायावती को पूरे पांच साल तक काम करने की खुली इजाजत मिली हुई थी। इसलिए वे मतदाताओं से अपने काम के आधार पर ही एक और मौका पाने की अपील करेंगी। जहां तक कांग्रेस का सवाल है बेशक राहुल गांधी अपना मिशन 2012 के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं, यूपी सियासत को समझने वालों का कहना है कि कांग्रेस की ज्यादा स्थिति हवाई है। 2009 के लोकसभा चुनाव में 21 सीटों पर जीत मिल जाने से कांग्रेस यह खुशफहमी पाल बैठी है कि यूपी के मतदाता उसे 1989 से पहले की मजबूत जनाधार वाली स्थिति में पहुंचा देंगे। पर कांग्रेस इस तथ्य को नजरअन्दाज कैसे कर सकती है कि 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद जितनी भी विधानसभा बाई इलेक्शन हुई हैं कांग्रेस एक सीट भी नहीं जीत सकी। कहीं दूसरे नंबर पर रही तो कहीं तीसरे नंबर पर। शायद यह जानते हुए कि पार्टी ने अजीत सिंह के आगे घुटने टेकते हुए उनसे चुनावी तालमेल किया है। यह जानते हुए भी इस गठबंधन से अजीत सिंह की पार्टी को ज्यादा फायदा होगा। कांग्रेस की स्थिति तो वहीं की वहीं रहने की संभावना है। मायावती सुनियोजित रणनीति के तहत लगातार कांग्रेस पर ही वार कर रही हैं। दरअसल वह चाहती हैं कि मतदाता को लगे कि मुकाबला बस बसपा और कांग्रेस के बीच ही है। भाजपा और सपा दोनों की जानबूझकर मायावती अनदेखी कर रही हैं। यह जानते हुए कि असल टक्कर बसपा और सपा के बीच होगी। पिछले चुनाव में बसपा को 206, सपा को 91, भाजपा को 51, कांग्रेस को 22 और रालोद को दस सीटें मिली थीं। मुलायम को कमजोर करने के लिए मायावती इस रणनीति पर चल रही हैं कि मुसलमान वोट एकमुश्त किसी को न मिले। सपा से टूटकर यह या तो उनके साथ आए या फिर कांग्रेस के साथ चला जाए। वैसे इस बार पीस पार्टी भी पूरे जोरों के साथ मैदान में उतर रही है और निश्चित रूप से वह मुसलमान वोट काटेगी। इसलिए यह कहा जा सकता है कि इस बार मुस्लिम वोट एकमुश्त किसी को शायद ही मिले। जहां तक बसपा के पुख्ता वोट बैंक का सवाल है हमें नहीं लगता कि यह कहीं और जाने वाला है। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का बहन जी का नारा भले ही अगड़ो के छिटकने की आशंका से इस बार उतनी कामयाब न हो पर दलित और अति पिछड़ी जातियां आज भी उनके साथ हैं। चूंकि मुकाबला बहुकोणीय होगा इसलिए जिसको भी एकमुश्त वोट मिलेगा वही जीत पाएगा पर एक-दो क्षेत्र हैं जहां जरूर बसपा कमजोर पड़ रही है। पहला तो उनकी पार्टी में भारी भ्रष्टाचार है, जिसके चलते मायावती को बहुत से मंत्रियों, सिटिंग विधायकों की टिकटें व कुर्सी काटनी पड़ी है। इससे उन्हें नुकसान हो सकता है। बसपा अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को मामूली बताकर मुद्दे को हलका करने की कोशिश में है पर अन्ना के आंदोलन का इतना असर जरूर हुआ है कि आज पूरे देश में एक भ्रष्टाचारी विरोध माहौल बन गया है। बाबा रामदेव भी इस बार यूपी में दबकर पचार करेंगे। इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है। कुल मिलाकर बहुजन समाज पार्टी बेशक आज की स्थिति को देखते हुए सरकार अपने बूते पर न बना सके पर इसमें हमें तो कोई संदेह नहीं कि बसपा यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में सबसे बड़ा दल बनकर उभरेगी।
Ajit Singh, Anil Narendra, Baba Ram Dev, Bahujan Samaj Party, BJP, Congress, Daily Pratap, Mayawati, RLD, Samajwadi Party, Vir Arjun
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Saturday, 22 October 2011
न तो मैं महंगाई के लिए जिम्मेदार हूं और न ही इसे कम कर सकता हूं
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 22nd October 2011
अनिल नरेन्द्र
श्री मनमोहन सिंह की यह यूपीए सरकार कमाल की सरकार है। इस सरकार में किसी भी मंत्री के जो विचार हों वह उन्हें कह देता है और इसके लिए वह किसी को भी जवाबदेही नहीं है। प्रधानमंत्री ऐसे बयानों को गठबंधन की मजबूरी कहकर टाल देते हैं पर इनसे पता चलता है कि मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में उनकी कितनी इज्जत है और वह कितने शक्तिशाली हैं। उपचुनावों में मिली करार हार के बाद अब कांग्रेस के सहयोगी दलों ने प्रधानमंत्री और कांग्रेस की नीतियों को हार के लिए जिम्मेदार ठहराना आरम्भ कर दिया है। महाराष्ट्र की खड़कवासला विधानसभा सीट पर मिली हार से बौखला गए केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने सीधा प्रधानमंत्री पर ही हमला बोल दिया। पवार ने एक मराठी दैनिक की ओर से मुंबई में आयोजित एक समारोह में कहा कि पिछले दिनों विभिन्न घोटालों के संदर्भ में सरकार ने मजबूत नेतृत्व का प्रदर्शन नहीं किया। पवार ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के संदर्भ में जनता यह सवाल पूछ रही थी कि प्रधानमंत्री पूरे मामले में हस्तक्षेप क्यों नहीं कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि ऐसे समय जबकि नेतृत्व क्षमता प्रदर्शित करने का समय था, केंद्र सरकार की ओर से कुछ नहीं किया गया। उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न घोटालों के कारण जनमत केंद्र सरकार के खिलाफ गया तथा इससे सरकार की साख को धक्का लगा। सरकार की निक्रियता का परिणाम यह हुआ कि न्यायपालिका ने अति सक्रियता दिखाते हुए विभिन्न कदम उठाए। अन्ना हजारे और योग गुरु बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों को सशक्त रूप से अपनी भूमिका निभानी चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करते तो अन्य ताकतों को सामने आने का मौका मिलेगा जो लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए अच्छी बात नहीं है। शरद पवार यहीं नहीं रुके। बुधवार को नई दिल्ली में आर्थिक सम्पादकों के सम्मेलन में बोलते हुए पवार का कहना था कि न तो मैं महंगाई के लिए जिम्मेदार हूं और न ही इसे कम करना मेरा काम है। मैं कृषि मंत्री यानि एक किसान हूं और मेरा काम अनाज पैदा करना है। मेरे मंत्रालय की यह भी कोशिश रहती है कि किसान को उसकी मेहनत का पूरा मूल्य मिले।हमें शरद पवार की बातें सुनकर ज्यादा हैरानी नहीं हुई। यह पहले भी कांग्रेस नेतृत्व पर सीधे हमले कर चुके हैं। अगर ऐसे बयानों का विपक्षी दल फायदा उठाएं तो हैरत नहीं होनी चाहिए। भाजपा पवार के बयान से खुश है। पार्टी का कहना है कि यूपीए डूबता जहाज है और अब इससे भागने की सभी घटक दल कोशिश में जुट गए हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री के साथ बंगलादेश जाने से इंकार के बाद अब ऐसा लगता है कि प्रमुख गठबंधन सहयोगी एवं कृषि मंत्री शरद पवार संप्रग छोड़ने की तैयारी में हैं। सवाल यह है कि जब एक वरिष्ठ मंत्री अपने ही प्रधानमंत्री और सरकार की नीतियों पर इस तरह के सवाल उठाता है तो सामूहिक जिम्मेदारी कहां गई? जिम्मेदारी की बात करें तो श्री पवार तो साफ कहते हैं कि महंगाई कम करना मेरा काम नहीं। अगर यह काम शरद पवार का नहीं तो किसका है और अगर वह अपनी सरकार की नीतियों से इतने ही नाखुश हैं और असहमत हैं तो उन्हें इस सरकार में रहने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। क्यों नहीं शरद पवार मनमोहन सिंह सरकार से त्यागपत्र दे देते। हमें प्रधानमंत्री पर भी दया आती है। जो पीएम अपने वरिष्ठ मंत्रियों पर लगाम नहीं लगा सकता वह पूरे देश को कैसे चला सकता है? जैसे देश चल रहा है वह सबके सामने ही है।
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Thursday, 20 October 2011
अन्ना और उनकी टीम पर चौतरफा हमले
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Published on 20th October 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे और उनकी टीम पिछले कुछ दिनों से चारों तरफ से समस्याओं से घिरती जा रही है। एक-एक करके कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। अन्ना ने खुद मौन व्रत धारण कर लिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि सवालों से परेशान अन्ना ने जवाब न देने के लिए मौन धारण किया है। मंगलवार को उनके सिपहसलार अरविंद केजरीवाल पर लखनऊ में एक व्यक्ति ने चप्पल फेंकी। उत्तर पदेश में अन्ना का संदेश लेकर दौरा कर रहे केजरीवाल राजधानी में गोमती नदी के किनारे झूलेलाल पार्प में आयोजित एक कार्यकम में भाग लेने के लिए कार से उतरकर मंच की तरफ बढ़ ही थे कि 40 वर्षीय जितेन्द्र पाठक नाम के एक व्यक्ति ने उन पर चप्पल फेंककर हमला कर दिया। हमलावर का आरोप है कि केजरीवाल लोगों को बरगला रहे हैं इसलिए उन पर हमला किया है। उसने यह भी कहा है कि वह किसी संगठन अथवा राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं है। फिलहाल जितेन्द्र पाठक पुलिस हिरासत में है। टीम अन्ना के दो पमुख सदस्य पीवी राजगोपाल और राजेन्द्र सिंह ने आंदोलन के राजनीतिक रूप लेने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए मंगलवार को कोर कमेटी से इस्तीफा दे दिया है। उनका दावा है कि यह भ्रम का शिकार हो गई है। उधर मंगलवार को ही कांग्रेस से सुलह करने के पयासों पर तब पानी फिर गया जब अन्ना हजारे के गांव के सरपंच और उनके साथी विशेष रूप से दिल्ली आए ताकि राहुल गांधी से मुलाकात हो सके, के हाथों निराशा लगी जब समय देकर भी राहुल गांधी अन्ना के गांव से आए पतिनिधिमंडल से नहीं मिले। सोमवार को योग गुरु बाबा रामदेव ने टीम अन्ना पर ही पहार कर दिया। उन्होंने कहा कि पशांत भूषण के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। बाबा रामदेव ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को तोड़ने वाली बयानबाजी घातक है। उन्होंने कहा कि सामाजिक आंदोलन में शामिल लोग भी देश को तोड़ने वाले बयान देते हैं जो देश व आंदोलनों के लिए बहुत घातक हैं। उन्होंने अन्ना हजारे को पशांत भूषण के बयान पर अपना रुख स्पष्ट करने की सलाह भी दी। एक सवाल के जवाब में रामदेव ने कहा कि पशांत भूषण के खिलाफ केस दर्ज होना चाहिए। अंत में टीम अन्ना के खिलाफ एक और झटका तब लगा जब सुपीम कोर्ट ने अन्ना हजारे के हिंद स्वराज ट्रस्ट को मिलने वाले सरकारी धन के गलत इस्तेमाल मामले की सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई को मंजूरी दे दी। जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस रंजना देसाई की बैंच ने अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सरकार से जवाब तलब किया। शर्मा ने आरोप लगाया कि साल 1995 में हजारे का ट्रस्ट बना था लेकिन इसे अनियमितता बरतते हुए एक वित्त वर्ष पहले की आर्थिक सहायता दी गई थी। याचिका में कहा गया है कि यह स्पष्ट है कि यह धोखाधड़ी, सरकारी कोष के दुरुपयोग का मामला है जो पतिवादी नंबर चार (हजारे) की ओर से किया गया है। सावंत आयोग की 2005 में आई रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है कि उनके कुछ सहयोगियों या समूह राजनीतिक मित्रों ने ऐसा किया। याचिका में कहा गया है कि ट्रस्ट ने गैरकानूनी तरीके से एक करोड़ रुपए से भी ज्यादा की रकम काउंसिल फॉर एडवांसमेंट ऑफ पीपुल्स एक्शन एंड रूरल टेक्नोलॉजी (कपार्ट) से हासिल की। रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि 1995 में अन्ना ने कपार्ट से और 75 लाख रुपए लिए। याचिकाकर्ता ने कहा कि 2001 में कपार्ट ने पांच करोड़ रुपए ग्रामीण स्वास्थ्य के नाम पर जारी किए। कुल कितना सरकारी धन ट्रस्ट को अनियमित तरीके से दिया गया, इसकी जांच सीबीआई से समुचित तरीके से कराई जानी चाहिए। सुपीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करने पर अपनी हामी भर दी है, केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को जवाब देने का नोटिस जारी कर दिया है। टीम अन्ना पर चारों ओर से हमले होने लगे हैं। अन्ना खुद तो बेदाग हैं पर उनके साथी निश्चित रूप से अन्ना की मूवमेंट को नुकसान पहुंचा रहे हैं।Anil Narendra, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Baba Ram Dev, CBI, Daily Pratap, Digvijay Singh, Lokpal Bill, Prashant Bhushan, Supreme Court, Vir Arjun
Wednesday, 28 September 2011
बाबा रामदेव समर्थकों पर हुई लाठीचार्ज की शिकार राजबाला चल बसीं
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Published on 28th September 2011
अनिल नरेन्द्र
काले धन के मुद्दे पर बाबा रामदेव के अनशन के दौरान रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस द्वारा 4 जून को की गई कार्रवाई में गम्भीर रूप से घायल उनकी एक समर्थक 57 साल की महिला राजबाला का सोमवार को निधन हो गया। राजबाला की रीढ़ की हड्डी में गम्भीर चोटें थीं और तभी से वह यहां जीबी पंत अस्पताल में इलाज करा रही थीं। डाक्टरों के अनुसार राजबाला की सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर मौत हो गई। राजबाला उन अभागिन में से एक थी जो 4 जून को रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थन में बैठी थीं। पुलिस कार्रवाई में बुरी तरह घायल होने के बाद उन्हें 4 जून को ही अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था। उनकी शल्यक्रिया भी हुई थी और वे वेंटिलेंटर पर थी। राजबाला के परिवार और बाबा रामदेव का आरोप है कि राजबाला पुलिस लाठीचार्ज के कारण घायल हुई थी। हालांकि पुलिस इन आरोपों का खंडन करते हुए कह चुकी है कि रामलीला मैदान पर कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ था और प्रदर्शनकारियों के बीच मची भगदड़ के कारण राजबाला की मौत हुई थी। राजबाला की मौत की सूचना पाते ही पंत अस्पताल पहुंचे बाबा रामदेव ने कहा कि राजबाला का बलिदान बेकार नहीं जाने दिया जाएगा। जिन मुद्दों की लड़ाई में उनका बलिदान हुआ, वह आगे भी जारी रहेगी। बाबा ने कहा कि राजबाला की मौत भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शहादत है। राजबाला की मौत के लिए गृहमंत्री पी. चिदम्बरम परोक्ष रूप से जिम्मेदार हैं क्योंकि उन्हीं के कहने पर पुलिस ने 4 जून की रात मेरे समर्थकों पर बर्बरतापूर्ण कार्रवाई की। रामदेव के बयान में दावा किया गया है कि वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने इस मुद्दे पर समर्थन जताया है और कहा है कि दिल्ली पुलिस और उसे निर्देश देने वाले गृहमंत्री को इस मामले में जिम्मेदार ठहराते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाएगा। मौके पर सिविल सोसाइटी के सदस्य मनीष सिसौदिया और राजबाला की पुत्रवधू राकेश कुमारी मलिक ने संवाददाताओं से बातचीत में आरोप लगाया कि राजबाला की मौत पुलिस कार्रवाई के कारण हुई। हर कोई जानता है कि पुलिस ने यह कार्रवाई की थी। हमें हमारी मां वापस चाहिए, क्या वे हमें हमारी मां वापस दे सकते हैं? हमें कोई मुआवजा नहीं चाहिए। आप ऐसी सरकार से क्या उम्मीद रखेंगे, जिसके प्रधानमंत्री या किसी वरिष्ठ मंत्री ने इस मामले में एक शब्द तक नहीं कहा। राकेश कुमारी ने यह भी आरोप लगाया कि राजबाला को जो चोटें आई थीं उनका एमएलसी में जिक्र भी नहीं किया गया। भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने कहा कि इससे पुलिस के सुप्रीम कोर्ट के समक्ष किए गए इस दावे की पोल खुल गई है कि प्रदर्शनकारियों पर कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ था। डाक्टरों ने बताया कि पहले दिन से ही राजबाला की हालत नाजुक बनी हुई थी, उन्हें दवाइयों और लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर ही जीवित रखा जा रहा था। बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर कथित पुलिस कार्रवाई करने के आरोप के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 6 जून को केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट तलब की थी। इस पुलिस कार्रवाई में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों सहित कई लोग घायल हुए थे। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है और हमें यकीन है कि माननीय न्यायाधीश राजबाला की मौत का नोटिस लेंगे और राजबाला की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों पर जरूर कार्रवाई करेंगे। हम राजबाला के परिवार वालों को बताना चाहेंगे कि दुःख की इस बेला में वे अकेले नहीं।Anil Narendra, Baba Ram Dev, Daily Pratap, delhi Police, Human Rights Commission, P. Chidambaram, Raj Bala, Ram Lila Maidan, Supreme Court, Vir Arjun
Tuesday, 13 September 2011
बाबा रामदेव के ट्रस्टों की हो रही है छानबीन
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Published on 13th September 2011
अनिल नरेन्द्र
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई के बाद अब डायरेक्टर जनरल ऑफ सेंट्रल एक्साइज इंटेलीजेंस (डीजीसीईआई) ने भी बाबा रामदेव की घेराबंदी करनी शुरू कर दी है। बाबा के ट्रस्टों द्वारा दी जा रही योग शिक्षा को हेल्थ एंड फिटनेस सर्विसेज के दायरे में रखते हुए डीजीसीईआई ने बाबा के दोनों ट्रस्टों पर तीन करोड़ रुपये सेवा कर देनदारी निकाल दी है। इस बाबत ट्रस्ट के सैकेटरी जनरल आचार्य बालकृष्ण को समन जारी किया गया है। महीने भर पहले एक नोटिस भेज कर आचार्य से उनके ट्रस्ट की कमाई व डोनेशन के बारे में जानकारी मांगी गई थी। हरिद्वार स्थित पतंजलि ट्रस्ट द्वारा दिव्य फार्मेसी, पतंजलि आयुर्वेद, पतंजलि फूड एण्ड हर्बल पार्प लि., वैदिक ब्रॉडकास्टिंग, आदि कम्पनियों का संचालन किया जाता है। डीजीसीईआई सूत्रों के मुताबिक फर्में उत्पाद कर एवं आयकर से मुक्त हैं मगर सेवा कर के दायरे में आती हैं। योग की शिक्षा हेल्थ एण्ड फिटनेस सर्विसेज के दायरे में है, जिस पर 10 प्रतिशत की दर से सेवा कर देय है। इस संबंध में सन् 2007 से पांच वर्षों तक ट्रस्टों द्वारा की गई कमाई का ब्यौरा आचार्य को नोटिस देकर मांगा गया है। खबर है कि आचार्य बालकृष्ण ने इस नोटिस के जवाब में दोनों ट्रस्टों की बैलेंसशीट, डोनेशन और सदस्यों के बारे में जानकारी अधिकारियों को दे दी है। इन जानकारियों के आधार पर योग शिक्षा के जरिये हुई कमाई का आकलन किया गया तो उस पर करीब तीन करोड़ की सेवा कर देयता निकली। इस पर कानपुर स्थित कार्यालय के डिप्टी डायरेक्टर संजय लवानिया नेसर्विस टैक्स एवं सेंट्रल एक्साइज एक्ट 1944 के सैक्शन-14 के तहत आचार्य बालकृष्ण को समन भेजा है। इसमें 16 सितम्बर को सुबह 10 बजे कार्यालय में उपस्थित होकर इस बारे में जवाब देने के लिए कहा गया है।
योग गुरु बाबा रामदेव के निकट सहयोगी आचार्य बालकृष्ण 265 करोड़ रुपये के कारोबार के सर्वेसर्वा हैं। वह 34 कम्पनियों के निदेशक हैं। यह जानकारी गत गुरुवार को सरकार की ओर से लोकसभा में दी गई। कारपोरेट मामलों के राज्यमंत्री आरपीएन सिंह ने एक सवाल के लिखित जवाब में कहा कि योग गुरु रामदेव खुद किसी भी कम्पनी के बोर्ड में शामिल नहीं हैं। उन्होंने कहा कि ताजा उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक देश में ऐसी कई कम्पनियां पंजीकृत नहीं हैं जिनमें बाबा रामदेव निदेशक हों। मंत्री ने कहा कि बालकृष्ण उत्तराखंड में पंजीकृत 23 कम्पनियों के निदेशक हैं जिनका कारोबार 94.84 करोड़ है।
इसके अलावा पांच कम्पनियां उत्तर प्रदेश में (व्यापार पांच लाख), चार दिल्ली में (व्यापार 163.06 करोड़) और एक पश्चिम बंगाल में (व्यापार आठ करोड़) पंजीकृत हैं। वह महाराष्ट्र की एक कम्पनी में निदेशक भी हैं, जिसका कोई व्यापार नहीं बताया गया है। मंत्री ने कहा कि इतने कम समय में कम्पनियों का व्यापार बढ़ने के कारणों की अभी व्याख्या नहीं की जा सकती।
बाबा रामदेव पर हर ओर से सरकारी शिकंजा कसता जा रहा है। उधर बाबा ने फिर से आंदोलन की घोषणा कर दी है। यानि वह फिर से आंदोलन छेड़ेंगे। आगे वाले दिन उनके लिए विशेष चुनौती भरे होंगे।
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Sunday, 4 September 2011
बाबा रामदेव को घेरने में लगी सरकार
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Published on 4th September 2011
अनिल नरेन्द्र
बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन से खार खाई कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार अब इनसे खुंदक निकाल रही है। जब से यह आंदोलन हुए हैं सरकार इनके पीछे हाथ धोकर पड़ गई है। बाबा रामदेव को सरकार अब खुद बाबा को विदेशी मुद्रा विनियम प्रबंधन अधिनियम (फेमा) में घेरने पर उतारू है।
प्रवर्तन निदेशालय ने बाबा रामदेव और उनके ट्रस्ट के खिलाफ फेमा कानून का उल्लंघन करने का केस दर्ज कर लिया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बाबा रामदेव की संस्था पर विदेशों से होने वाले धन के लेन-देन में नियमों की अनदेखी करने के आरोप में यह केस दर्ज किया है। इसके अलावा स्काटलैंड में बाबा को दान में मिले कथित `द्वीप' के प्रकरण की भी पड़ताल की जा रही है।
प्रवर्तन निदेशालय और जांच एजेंसियां यह देखने का प्रयास कर रही हैं कि इस द्वीप को प्राप्त करने में बाबा और उनकी संस्था ने कहीं नियमों की अनदेखी तो नहीं की है। ऐसे में जल्द ही इस मामले में बाबा के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण और योग गुरु के वरिष्ठ प्रबंधकों से पूछताछ के आसार हैं।
प्रवर्तन निदेशालय ने भारतीय रिजर्व बैंक और विदेशी जांच एजेंसियों तथा बैंकों के माध्यम से मिली नकारियों के आधार पर मामले दर्ज किए हैं। ईडी सूत्रों के मुताबिक बाबा रामदेव की संस्था पतंजलि योग पीठ, भारत स्वाभिमान ट्रस्ट और योग मंदिर ट्रस्ट के माध्यम से अनियमित वित्तीय लेन-देन की जानकारी मिली है। इन संस्थाओं ने अमेरिका, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन समेत कई देशों से विदेशी मुद्रा प्राप्त की है और ऐसा करने में बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी हुई है। बताते हैं कि ब्रिटेन से ही एक मामला करीब सात करोड़ रुपये के लेन-देन से जुड़ा है। यह मामला बेनामी सौदे से जुड़ा है। इसके अलावा ब्रिटेन के सामान्य व्यापारियों और फुटकर दुकानदारों से मिलकर भी अवैध वित्तीय लेन-देन के सबूत मिले हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से ईडी को मिले दस्तावेजों के अनुसार बाबा रामदेव की कम्पनियों ने निर्यात से हुई लगभग 1.8 करोड़ रुपये (चार लाख डालर) की आमदनी के बारे में केंद्रीय बैंक को कोई जानकारी नहीं दी है। नियम के मुताबिक निर्यात से विदेशी मुद्रा में हुई आमदनी की सूचना छह महीने के भीतर आरबीआई को देना जरूरी है। बाबा रामदेव से जुड़ी कम्पनियों ने छह महीने के बाद भी आरबीआई को कुछ नहीं बताया।
बाबा रामदेव और उनकी कम्पनियों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा फेमा के तहत मुकदमें से पदाथी स्थित पतंजलि एण्ड हर्बल पार्प में कर्मचारियों में अपने भविष्य को लेकर चिन्ता हो गई है। पदाथी स्थित फूड पार्प में करीब पांच हजार कर्मचारी काम करते हैं। फूड पार्प के आसपास गांवों के लोग भी बड़ी संख्या में कार्य करते हैं। सभी को चिन्ता है कि कहीं ईडी ट्रस्ट के खातों को सीज न कर दे और उनका भविष्य अधर में न पड़ जाए। उधर बाबा रामदेव ने हरिद्वार में कहा कि उन्होंने या उनके ट्रस्ट ने किसी भी तरह के लेन-देन में कोई असंवैधानिक कार्य नहीं किया है। बाबा ने बताया कि अभी तक प्रवर्तन निदेशालय से उन्हें या उनके ट्रस्ट के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की कोई अधिकृत जानकारी नहीं दी गई है। उन्हें इसकी जानकारी मीडिया से मिली है। उन्होंने कहा कि नोटिस मिलने पर माकूल जवाब दिया जाएगा। बाबा रामदेव हरिद्वार के कनखल स्थित दिव्य योग फॉर्मेसी में गुरुवार को पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने या उनके ट्रस्ट ने किसी भी तरह का कोई भी असंवैधानिक काम नहीं किया है और न ही कोई गैर-कानूनी लेन-देन किया है।
Baba Ram Dev, Ram Lila Maidan, Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, ED, Black Money, Corruption,
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Thursday, 1 September 2011
चार जून की बाबा रामदेव पर कार्रवाई किसके आदेश पर?
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Published on 1st September 2011
अनिल नरेन्द्र
चार जून की रात को रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के समर्थकों पर पुलिस की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने बाबा व स्वाभिमान ट्रस्ट से एक हलफनामा दाखिल करने को कहा है जिसमें दिल्ली पुलिस पर वीडियो फुटेज से छेड़छाड़ करने का आरोप साबित हो सके। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एमाकस क्यूरे और वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि यह बड़ा सवाल है कि पहले चार मंत्री बाबा रामदेव से मिलने जाते हैं। इसके चार दिन बाद अचानक उनके अनशन को तोड़ने और आधी रात को धारा-144 लगाकर पुलिस कार्रवाई करती है? आखिर यह किसके आदेश से किया जाता है? श्री धवन ने अन्ना हजारे को 16 अगस्त की सुबह अचानक गिरफ्तार किए जाने का जिक्र भी किया है। एमाकस क्यूरे ने दिल्ली सरकार और पुलिस के हलफनामों से असंतोष जताते हुए यह राज भी खोला कि चार जून की रात सीआरपीएफ ने आदेश का पालन करने से इंकार कर दिया था। जस्टिस बीएस चौहान की बैंच के समक्ष एमाकस क्यूरे, राजीव धवन ने इस मामले में जिला जज से जांच कराए जाने और इस कार्रवाई के दुप्रभावों पर भी विचार करने की मांग रखी। हालांकि पीठ ने बाबा रामदेव के ट्रस्ट भारत स्वाभिमान से दिल्ली पुलिस पर लगाए गए उस आरोप पर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया जिसमें चार जून को हुई इस कार्रवाई के वीडियो फुटेज और सीडी से छेड़छाड़ करने का आरोप पुलिस पर ट्रस्ट की ओर से लगाया गया था। पीठ ने कहा कि अखबारों में आई फोटो और न्यूज चैनलों के वीडियो क्लिपिंग में थोड़ा विरोधाभास है। चार जून की कार्रवाई पर दिल्ली पुलिस बुरी तरह फंस गई है। `इधर कुआं उधर खाई' की स्थिति में फंसी दिल्ली पुलिस के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं। देखें आगे क्या करती है दिल्ली पुलिस?Anil Narendra, Baba Ram Dev, Daily Pratap, delhi Police, Ram Lila Maidan, Supreme Court, Vir Arjun
Friday, 29 July 2011
सरकार मुझे और मेरे सहयोगियों को मिटाने पर तुली है ः बाबा रामदेव
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 29th July 2011
अनिल नरेन्द्र
केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय व दिल्ली पुलिस की तमाम दलीलों को नकारते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान में चार जून को बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर हुई कार्रवाई पर साफ आदेश दिया कि उस रात की सीडी सुप्रीम कोर्ट में पेश की जाए, कोर्ट खुद सीडी को देखेगा और भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों यह सुनिश्चित करेगा। न्यायमूर्ति बीएस चौहान व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने कहा कि वे पांच अगस्त को शाम सवा चार बजे सभी पक्षों के वकीलों की उपस्थिति में घटना की सीडी देखेंगे। कोर्ट ने केंद्र सरकार व अन्य सरकारी एजेंसियों से कहा है कि उन्हें जो भी हलफनामे दाखिल करने हैं वे तीन दिन के भीतर दाखिल कर दें। आठ अगस्त और 16 अगस्त को इस मामले पर सुनवाई की जाएगी। अदालत ने कहा कि आधी रात में निर्दोष लोगों की पिटाई नहीं की जा सकती है, चाहे वे जो भी लोग हों। अदालत सुनिश्चित करेगी कि भविष्य में ऐसा दोबारा न हो। दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि पहले ये साबित हो कि ऐसा हुआ भी था। इस पर न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार ने टिप्पणी की, `कुछ तो हुआ है।' साथ ही अदालत ने चिदम्बरम को नोटिस किए जाने संबंधित दलील पर कहा कि यह मामला अभी ओपन है और पहले हलफनामा दायर करने दिया जाए उसके बाद इस मुद्दे को देखा जाएगा। उधर बाबा रामदेव ने सोमवार को नई दिल्ली के रफी मार्ग स्थित कांस्टीट्यूशनल क्लब में क्रोध से कहा कि केंद्र सरकार को न तो आतंकवाद से मतलब है और न ही भ्रष्टाचार से। उसके केंद्रबिन्दु सिर्प मैं हूं। सरकार मुझे और मेरे सहयोगियों को मिटाने पर तुली है। तरह-तरह से हम लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है। सीबीआई सहित तमाम एजेंसियों को हमारे पीछे लगाया गया है ताकि कोई षड्यंत्र और कुचक्र कर हमारी प्रतिष्ठा को प्रभावित किया जा सके। उन्होंने कहा कि हमारे या योगाचार्य बालकृष्ण के खिलाफ सरकार क्या कार्रवाई करवाएगी। कार्रवाई करनी है तो पहले प्रधानमंत्री और तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम के खिलाफ करे, जिनके नाम भ्रष्टाचार के आरोपी पूर्व केंद्रीय मंत्री ए. राजा ने लिए हैं। स्वामी रामदेव ने कहा कि बालकृष्ण ने कुछ भी गलत नहीं किया और न ही उनकी डिग्री फर्जी है। उन्होंने कहा कि यह कैसा मजाक है, हम विदेश से काला धन लाने की बात करते हैं, हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो हमारे खिलाफ देशद्रोहियों जैसा सलूक किया जा रहा है। चार जून से पहले जो सरकार हमें राष्ट्रभक्त कह रही थी वह मुझे मिटाने पर आज तुली है।फर्जी डिग्री और पासपोर्ट के आरोपों को लेकर सीबीआई बालकृष्ण पर शिकंजा कसती जा रही है। पासपोर्ट मामले में सीबीआई ने केस दर्ज कर लिया है और बालकृष्ण को पकड़ने के लिए जगह-जगह छापे मार रही है। बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण के खिलाफ सख्त रवैया अपनाकर सीबीआई ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि वह एक स्वतंत्र जांच एजेंसी न होकर बल्कि केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने वाला एक हथियार है। हालत यह है कि बालकृष्ण का पासपोर्ट रद्द कराने पर आमादा सीबीआई ने कांग्रेस के पूर्व सांसद सुब्बा का पासपोर्ट रद्द कराने की जरा भी कोशिश नहीं की जबकि इस मामले में वह सुब्बा के खिलाफ चार्जशीट तक दाखिल कर चुकी है। सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी स्वीकार करते हैं कि एमके सुब्बा के खिलाफ आरोप बालकृष्ण से कहीं ज्यादा गम्भीर हैं। सीबीआई ने अभी तक बालकृष्ण की भारतीय नागरिकता पर अंगुली नहीं उठाई है। उसके पास केवल पासपोर्ट कार्यालय में जमा किए बालकृष्ण की शैक्षिक डिग्रियों के फर्जी होने के प्रमाण हैं जबकि सुब्बा के मामले में सीबीआई ने अदालत में चार्जशीट दाखिल कर उसके भारतीय नागरिक नहीं होने का प्रमाण पेश किया है। इसके बावजूद आज तक जांच एजेंसी ने सुब्बा का पासपोर्ट रद्द करने के लिए विदेश मंत्रालय से अनुरोध करने की जरूरत नहीं समझी। यही नहीं, सीबीआई की चार्जशीट के बावजूद सुब्बा न सिर्प व्यावसायिक गतिविधियों को बदस्तूर जारी रखे हुए है बल्कि एक पूर्व सांसद को मिलने वाली सुविधाओं का लाभ भी ले रहा है। मजेदार बात यह है कि बालकृष्ण के फर्जी पासपोर्ट में तत्काल कार्रवाई शुरू करने वाली सीबीआई को सुब्बा के खिलाफ कार्रवाई करने में एक दशक से ज्यादा समय लग गया है। सरकार की नीयत साफ है, बाबा रामदेव ठीक ही कहते हैं कि सरकार उन्हें और उनके सहयोगियों को अब मिटाने पर तुली है।
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Thursday, 14 July 2011
सरकार सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने में असफल, बाबा रामदेव की जीत
अगर केंद्रीय गृह मंत्रालय, श्री कपिल सिब्बल और दिल्ली पुलिस ने यह समझा था कि रामलीला मैदान में आधी रात को सोते लोगों पर की गई लाठीचार्ज इत्यादि को सुप्रीम कोर्ट के जजों से छिपा लेंगे तो वह बहुत बड़ी गलतफहमी में थे। बाबा रामदेव और उनके समर्थकों से उस रात पुलिस ने क्या बर्ताव किया, इसके बारे में माननीय जजों को पहले से ही मालूम था। माननीय न्यायाधीश डॉ. बलबीर सिंह चौहान व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार पहले से ही तैयार आए थे, उन्होंने अपना होमवर्प अच्छे से कर रखा था। उनके तीखे सवाल इस बात की गवाही देते हैं। भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर सत्याग्रह करने पर रामलीला मैदान से बलपूर्वक बेदखल किए गए बाबा रामदेव ने रात के अंधेरे में हुई कार्रवाई का ठीकरा सुप्रीम कोर्ट में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के सिर पर फोड़ने का जहां प्रयास किया वहीं इस कार्रवाई में दिल्ली पुलिस के जवाब पर असंतोष व्यक्त करते हुए माननीय न्यायाधीशों ने नया हलफनामा दाखिल करने को कहा। दोनों जजों ने सोमवार को दिल्ली पुलिस से कुछ सहज सवाल पूछे। न्यायाधीश एक से तीन जून के बीच के घटनाक्रम के साथ ही उन परिस्थितियों के बारे में जानना चाहते हैं जिनकी वजह से पुलिस ने रात के अंधेरे में बाबा और उनके समर्थकों को बलपूर्वक निकाल बाहर करना पड़ा। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान में सत्याग्रह कर रहे बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर चार जून की रात में पुलिस की बर्बर कार्रवाई का स्वत ही संज्ञान लेते हुए इस मामले में छह जून को मनमोहन सिंह सरकार और दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार के आला अफसरों से जवाब-तलब किया था। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता से भी व्यक्तिगत रूप से जवाब-तलब किया है। इससे पहले बाबा रामदेव की ओर से उनके वकील राम जेठमलानी ने गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को निशाना बनाते हुए कहा कि वे रामलीला मैदान में निहत्थे सत्याग्रहियों के खिलाफ हुए बल प्रयोग की जड़ हैं। उन्होंने दावा किया कि चूंकि बाबा रामदेव को दिल्ली से बेदखल करने का कोई आदेश ही नहीं था। इसलिए न्यायालय को गृहमंत्री से व्यक्तिगत रूप से जवाब-तलब करके पता लगाना चाहिए कि इस बारे में कब और किन परिस्थितियों में निर्णय लिया गया था। जेठमलानी ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण तरीके से सत्याग्रह कर रहे व्यक्तियों ने इन ज्यादतियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने का प्रयास किया लेकिन पुलिस ने ऐसा करने से इंकार कर दिया।
दोनों जज न्यायाधीश बीएस चौहान और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार पूरी तैयारी से आए थे, उन्होंने केस के सारे पहलुओं पर गहन अध्ययन किया हुआ था। माननीय जजों ने दिल्ली पुलिस से सवाल किया कि अधिकारियों द्वारा की गई ज्यादतियों के खिलाफ योगगुरु के समर्थकों की शिकायत पर पुलिस ने प्राथमिकी क्यों दर्ज नहीं की थी? शीर्ष न्यायालय ने कहा कि पिछले वाले हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि एक जून से तीन जून के बीच क्या हुआ? उसने कहा कि डीवीडी, चित्रों और दस्तावेजों से स्पष्ट तौर पर पता चलता है कि उस स्थल पर योगाभ्यास करवाया जा रहा था। न्यायालय ने अधिकारियों से इस बात की सफाई देने के लिए कहा कि किन परिस्थितियों के तहत उन्हें रामदेव का यह कार्यक्रम रोकना पड़ा था, पीठ ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि पुलिस ने तम्बुओं से घेरे गए उस स्थल से लोगों को बाहर निकालने के लिए आंसू गैस के गोलों और पानी की धार का इस्तेमाल किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह उम्मीद नहीं की जाती कि किसी घिरे गए हिस्से में आंसू गैस और पानी की धार का प्रयोग किया जाएöक्या ऐसा नहीं था कि रात साढ़े 11 बजे जब लोग सो रहे थे, आपने लाठियां बरसाईं? चित्रों से पता चलता है कि पुलिस आयुक्त किसी से बातचीत कर रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चार जून की पुलिसियाई कार्रवाई को तार-तार कर सरकार को बेनकाब कर दिया। पुलिस का झूठा हलफनामा अदालत को गुमराह नहीं कर सका। पुलिस अपने इस दावे को साबित नहीं कर सकी कि उसने आंसू गैस इसलिए छोड़ी क्योंकि बाबा रामदेव के समर्थक हिंसा पर उतर आए थे और उन्होंने पुलिस पर पथराव किया। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 जुलाई की तारीख निर्धारित की है। बाबा रामदेव को चाहिए कि वह दिल्ली पुलिस को राज बाला की यह हालत करने पर सुप्रीम कोर्ट में आवाज उठाएं। राज बाला जीवन-मरण के बीच लटकी हुई है। बाबा को चाहिए कि वह अगली सुनवाई में महिलाओं समर्थकों से बलात्कार के प्रयास का भी जिक्र करें, जैसा उन्होंने आरोप लगाया है। हम माननीय जजों का धन्यवाद करना चाहते हैं कि वह किसी भी प्रकार के दबाव में नहीं आए और उन्होंने उस काली रात केस में दूध का दूध, पानी का पानी कर दिया है।
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Monday, 4 July 2011
मनमोहन सिंह यह प्रेस कांफ्रेंस न ही करते तो बेहतर था
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की बहुचर्चित प्रेस कांफ्रेंस पता नहीं क्या सोचकर की गई पर हमारी राय में तो फायदे की जगह इससे प्रधानमंत्री को भारी नुकसान ही हुआ है। वह एक कमजोर, निसहाय, गैर राजनीतिक और टेम्परेरी प्रधानमंत्री साबित हुए हैं जिन्होंने अपना सारा दोष या तो मीडिया पर थोप दिया या फिर अपने साथियों पर। इस बहुचर्चित प्रेस कांफ्रेंस से जब वह पांच (विशेषतौर पर चुने हुए) बाहर आए तो टीवी वालों ने वह सारे सवाल पूछ डाले जो देशवासी प्रधानमंत्री से पूछना चाह रहे थे। यह पांच सम्पादक, इनमें से प्रधानमंत्री के बने प्रवक्ता बेशक कुछ क्षणों के लिए सुपर स्टार बन गए हों पर अन्त में मनमोहन सिंह ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रेस को फेस करने की अब उनमें हिम्मत नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने सारे प्रमुख सम्पादकों, टीवी और प्रिंट मीडिया को न बुलाकर केवल उन भरोसेमंद सम्पादकों को ही बुलाया जो उनकी ओर से सारे मुद्दों पर सफाई दे सकें। यही वजह है कि श्री अलोक मेहता बता रहे थे कि प्रधानमंत्री ने सीडब्ल्यूजी घोटाले पर यह कहा, बाबा रामदेव के समर्थकों की पिटाई पर क्या सफाई दी, अन्ना हजारे की मांगों पर यह कहा, राहुल गांधी के लिए गद्दी छोड़ने पर यह कहा, इत्यादि-इत्यादि। न तो प्रधानमंत्री और न ही उनकी पार्टी के प्रवक्ता एक मोटी-सी बात समझ पाए हैं कि एक राजनेता का काम है कि जनता के सवालों का जवाब दें, बार-बार और प्रमुख समस्याओं पर देश को संतुष्ट करें पर हम प्रधानमंत्री को दोष नहीं दे सकते। उन्होंने खुद इस प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वह तमाम जिन्दगी एक नौकरशाह रहे हैं। न तो उन्हें राजनीति की हिज्जों की समझ है और न ही वह चुने हुए प्रधानमंत्री हैं। वह तो प्राइम मिनिस्टर-इन-वेटिंग हैं जो पार्टी के उस फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब बाबा राहुल गद्दी सम्भालने की हामी भरते हैं।
अब देखिए कि माननीय प्रधानमंत्री देश की ज्वलंत समस्याओं पर क्या जवाब देते हैं ः आज का नम्बर वन मुद्दा देश के सामने भ्रष्टाचार और महाघोटाले हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि हम भ्रष्टाचार करते नहीं हो जाता है। मैंने भ्रष्टाचार नहीं किया, ए. राजा, कलमाड़ी, कनिमोझी ने कर लिया। ऐसी सफाई के साथ प्रधानमंत्री ने अफसरी अन्दाज वाली यह तकनीकी दलील दे दी कि सरकार जब फैसले लेती है तब अनिश्चितताएं होती हैं। मतलब ऐसा होगा और हो सकता है कि अनिश्चितता में सरकार निर्णय करती है। उस समय लगता है कि यही ठीक है और फैसला होता है। मगर बाद में सरकार की एकाउंटिंग आडिटर जनरल, संसद और मीडिया फैसलों, फाइलों की जो जांच-पड़ताल करती है वह पोस्ट फैक्टो (यानि परिणाम आने के बाद) वाला होता है, यानि निर्णय के नतीजे की कसौटी पर जांच होती है। उसमें घोटाले का हल्ला होता है। मनमोहन सिंह इतने पर ही नहीं रुके, यह भी कहाöबस 10 में से सात निर्णय अगर मेरे सही हैं तो उसे अच्छा परफोर्मेंस माना जाना चाहिए। क्या मतलब है इस दलील का? क्या मतलब यह है कि यदि उनके बाकी तीन फैसलों में संचार घोटाले, मुकेश अम्बानी और गैस-तेल ब्लॉक देने और कॉमनवेल्थ के तीन महाघोटालों के नतीजे निकलते हैं तो जनता और मीडिया को उस आधार पर महाभ्रष्ट का हल्ला नहीं करना चाहिए। उनका लब्बोलुआब है कि सरकार ने 2जी स्पैक्ट्रम बांटने का जो फैसला लिया या मुकेश अम्बानी के तेल ब्लॉक देने की शर्तों पर जो फैसले हुए, वह उस वक्त की अनिश्चित स्थितियों की बदौलत थी। इसलिए कैग यह हिसाब नहीं लगाए कि उसमें नुकसान हुआ या घोटाला। इस दलील से प्रधानमंत्री ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी हैं।
जाहिर है कि डॉ. मनमोहन सिंह यह दलील दे रहे हैं कि सरकार के फैसलों की समीक्षा करने का न तो मीडिया को कोई हक है और न ही सीएजी को। विडम्बना देखिए, सीएजी ने एक बयान जारी कर कहा है कि उसे परफोर्मेंस आडिट का पूरा अधिकार है। नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) विनोद रॉय ने कहा कि शीर्ष आडिटर के पास कार्य निष्पादन की लेखापरीक्षा (परफोर्मेंस आडिट) का पूरा अधिकार है। इस लिहाज से कैग 2जी स्पैक्ट्रम आवंटन और पेट्रोलियम क्षेत्र में मुनाफा भागीदारी जैसे मुद्दों की लेखा परीक्षा का पूरा अधिकार रखता है। प्रधानमंत्री ने मीडिया पर तो पूरी भड़ास निकाल दी पर अदालतों पर अपना गुस्सा निकालने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। हां, उन्होंने यह जरूर जाहिर कर दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए उद्योगपतियों और उनके अफसरों के खिलाफ कार्रवाई से आहत में हैं। एक मायने में मनमोहन सिंह ने यह संकेत दे दिया कि सुप्रीम कोर्ट की जनहित सक्रियता और भारत की संवैधानिक एकाउंटिंग संस्था कैग के फैसलों से नाराज हैं। इन्हीं की वजह से दरअसल आज भारत के आजादी के बाद इतिहास में यूपीए-2 सरकार सर्वाधिक भ्रष्ट सरकार के मुखिया कहलाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की बदौलत बलवा, राजा और खरबपतियों के पीछे पुलिस पड़ी है। इस पर मनमोहन सिंह व यह तमाम पहलुओं को मीडिया ने यह सोचते हुए दबाए रखा है कि डॉ. मनमोहन सिंह बेचारे और भले हैं। उन्हें चिन्ता है तो केवल उन्हीं क्रोनी पूंजीपतियों की है। तभी सम्पादकों से बात करते हुए वे खरबपतियों की जांच से पुलिस राज का खतरा देखते हैं। भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पहले कभी भ्रष्टाचारी खरबपतियों की चिन्ता में ऐसे तर्प नहीं दिए जैसे बुधवार को मनमोहन सिंह ने दिए। उन्हें जनता की कितनी फिक्र है, वह उनके महंगाई के सवाल पर यह जवाब देने से पता चलता है कि वे क्या कर सकते हैं? अंतर्राष्ट्रीय कमोडिटी के दामों को नियंत्रण करने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। जैसे कोर्टों में तारीखें पड़ती हैं उसी अन्दाज में उन्होंने कह दिया कि अगले साल मार्च तक छह फीसदी हो सकती है मुद्रास्फीति।
आज सारे देश का ध्यान लोकपाल बिल पर टिका हुआ है। सुनिए ऐसे ज्वलंत मुद्दे पर प्रधानमंत्री क्या कहते हैं और क्या कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे तो चाहते हैं कि प्रधानमंत्री का पद लोकपाल के दायरे में आए लेकिन मंत्री नहीं चाहते। प्रधानमंत्री चाहे और मंत्री ओवर रूल करें, क्या यह राजनीतिक लीडरशिप की निशानी है? प्रधानमंत्री देश का लीडर होना तो दूर रहा, अपने मंत्रिमंडल का भी लीडर नहीं है। कैसा बचकाना-सा जवाब है। फिर प्रस्तावित सरकारी लोकपाल बिल के प्रावधानों को देखिए। भारत की बहुसंख्यक यानि 90 फीसदी जनता का पुलिस-बाबू राज में घुटना है। जनता में भ्रष्टाचार के खिलाफ यदि गुस्सा है तो वह छोटे-छोटे सरकारी दफ्तरों में रोजमर्रा की लूट है। ड्राइविंग लाइसेंस लेना हो, पुलिस में एफआईआर दर्ज करानी हो, राशन लेना हो, बिजली-पानी कनेक्शन लेना हो, गैस लेनी हो या मकान का नक्शा पास कराना हो या जीवन-मरण सर्टिफिकेट लेना हो, ऐसे तमाम कामों में जनता सरकारी कर्मचारियों की लूट से आजिज आ चुकी है। उसी को बदलने और जनजीवन की लूट की रोकथाम के चक्कर से सख्त लोकपाल की जनता में चाह है। मगर हुआ उलटा। मनमोहन सरकार ने 95 फीसदी अफसरों और बाबुओं को लोकपाल से बाहर रखवा दिया है। मतलब भ्रष्ट नौकरशाह में 95 फीसदी की सरकारी लोकपाल में प्रोटेक्शन है। महाठगी वाली इस सरकारी ड्राफ्ट में बेशर्मी की हद यह है कि यदि कोई नागरिक बाबू-अफसर के खिलाफ शिकायत करेगा तो उसे बदले की सजा के लिए तैयार रहना होगा। किसी की शिकायत की तो वह अफसर विशेष अदालत में जवाबी शिकायत दर्ज करा सकता है और इस काम के लिए उसे सरकारी वकील भी मुफ्त मिलेगा। जनता के इस दमन शोषण के खिलाफ ही अन्ना हजारे ने लोकपाल का डर बनाने का एक नुस्खा दिया। मगर डॉ. मनमोहन सिंह उसे मान नहीं रहे, क्योंकि उन्हें जनता से क्या लेना-देना?
प्रधानमंत्री ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में एक ऐसी बात कर दी जिससे अंतर्राष्ट्रीय विवाद उत्पन्न हो गया है। उन्होंने कहा कि बंगलादेश की कम से कम 25 फीसदी जनसंख्या जमात-ए-इस्लामी से संबंध और हमदर्दी रखती है और यह भारत विरोधी है और वह आईएसआई के शिकंजे में हैं तथा बंगलादेश में किसी भी समय राजनीतिक घटनाचक्र बदल सकता है। बाद में पीएमओ ने सफाई दी कि यह अनौपचारिक रिमार्प था जिसे तूल नहीं देना चाहिए। डॉ. मनमोहन सिंह ने पिछली बार 2014 तक प्रधानमंत्री बने रहने का भरोसा दिया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें 2014 तक का जनादेश मिला हुआ है, तब तक वे रहेंगे। बुधवार को उनका कहना था, जब भी पार्टी इस बारे में अपना मन बनाएगी, मैं खुशी-खुशी कुर्सी छोड़ दूंगा। मतलब राहुल गांधी की अटकल के बीच डॉ. मनमोहन सिंह ने बता दिया है कि अब 2014 तक प्रधानमंत्री बने रहने की गारंटी नहीं है। सो कुल मिलाकर प्रधानमंत्री की यह प्रेस कांफ्रेंस एक डिजास्टर रही।
अब देखिए कि माननीय प्रधानमंत्री देश की ज्वलंत समस्याओं पर क्या जवाब देते हैं ः आज का नम्बर वन मुद्दा देश के सामने भ्रष्टाचार और महाघोटाले हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि हम भ्रष्टाचार करते नहीं हो जाता है। मैंने भ्रष्टाचार नहीं किया, ए. राजा, कलमाड़ी, कनिमोझी ने कर लिया। ऐसी सफाई के साथ प्रधानमंत्री ने अफसरी अन्दाज वाली यह तकनीकी दलील दे दी कि सरकार जब फैसले लेती है तब अनिश्चितताएं होती हैं। मतलब ऐसा होगा और हो सकता है कि अनिश्चितता में सरकार निर्णय करती है। उस समय लगता है कि यही ठीक है और फैसला होता है। मगर बाद में सरकार की एकाउंटिंग आडिटर जनरल, संसद और मीडिया फैसलों, फाइलों की जो जांच-पड़ताल करती है वह पोस्ट फैक्टो (यानि परिणाम आने के बाद) वाला होता है, यानि निर्णय के नतीजे की कसौटी पर जांच होती है। उसमें घोटाले का हल्ला होता है। मनमोहन सिंह इतने पर ही नहीं रुके, यह भी कहाöबस 10 में से सात निर्णय अगर मेरे सही हैं तो उसे अच्छा परफोर्मेंस माना जाना चाहिए। क्या मतलब है इस दलील का? क्या मतलब यह है कि यदि उनके बाकी तीन फैसलों में संचार घोटाले, मुकेश अम्बानी और गैस-तेल ब्लॉक देने और कॉमनवेल्थ के तीन महाघोटालों के नतीजे निकलते हैं तो जनता और मीडिया को उस आधार पर महाभ्रष्ट का हल्ला नहीं करना चाहिए। उनका लब्बोलुआब है कि सरकार ने 2जी स्पैक्ट्रम बांटने का जो फैसला लिया या मुकेश अम्बानी के तेल ब्लॉक देने की शर्तों पर जो फैसले हुए, वह उस वक्त की अनिश्चित स्थितियों की बदौलत थी। इसलिए कैग यह हिसाब नहीं लगाए कि उसमें नुकसान हुआ या घोटाला। इस दलील से प्रधानमंत्री ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी हैं।
जाहिर है कि डॉ. मनमोहन सिंह यह दलील दे रहे हैं कि सरकार के फैसलों की समीक्षा करने का न तो मीडिया को कोई हक है और न ही सीएजी को। विडम्बना देखिए, सीएजी ने एक बयान जारी कर कहा है कि उसे परफोर्मेंस आडिट का पूरा अधिकार है। नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) विनोद रॉय ने कहा कि शीर्ष आडिटर के पास कार्य निष्पादन की लेखापरीक्षा (परफोर्मेंस आडिट) का पूरा अधिकार है। इस लिहाज से कैग 2जी स्पैक्ट्रम आवंटन और पेट्रोलियम क्षेत्र में मुनाफा भागीदारी जैसे मुद्दों की लेखा परीक्षा का पूरा अधिकार रखता है। प्रधानमंत्री ने मीडिया पर तो पूरी भड़ास निकाल दी पर अदालतों पर अपना गुस्सा निकालने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। हां, उन्होंने यह जरूर जाहिर कर दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए उद्योगपतियों और उनके अफसरों के खिलाफ कार्रवाई से आहत में हैं। एक मायने में मनमोहन सिंह ने यह संकेत दे दिया कि सुप्रीम कोर्ट की जनहित सक्रियता और भारत की संवैधानिक एकाउंटिंग संस्था कैग के फैसलों से नाराज हैं। इन्हीं की वजह से दरअसल आज भारत के आजादी के बाद इतिहास में यूपीए-2 सरकार सर्वाधिक भ्रष्ट सरकार के मुखिया कहलाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की बदौलत बलवा, राजा और खरबपतियों के पीछे पुलिस पड़ी है। इस पर मनमोहन सिंह व यह तमाम पहलुओं को मीडिया ने यह सोचते हुए दबाए रखा है कि डॉ. मनमोहन सिंह बेचारे और भले हैं। उन्हें चिन्ता है तो केवल उन्हीं क्रोनी पूंजीपतियों की है। तभी सम्पादकों से बात करते हुए वे खरबपतियों की जांच से पुलिस राज का खतरा देखते हैं। भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पहले कभी भ्रष्टाचारी खरबपतियों की चिन्ता में ऐसे तर्प नहीं दिए जैसे बुधवार को मनमोहन सिंह ने दिए। उन्हें जनता की कितनी फिक्र है, वह उनके महंगाई के सवाल पर यह जवाब देने से पता चलता है कि वे क्या कर सकते हैं? अंतर्राष्ट्रीय कमोडिटी के दामों को नियंत्रण करने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। जैसे कोर्टों में तारीखें पड़ती हैं उसी अन्दाज में उन्होंने कह दिया कि अगले साल मार्च तक छह फीसदी हो सकती है मुद्रास्फीति।
आज सारे देश का ध्यान लोकपाल बिल पर टिका हुआ है। सुनिए ऐसे ज्वलंत मुद्दे पर प्रधानमंत्री क्या कहते हैं और क्या कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे तो चाहते हैं कि प्रधानमंत्री का पद लोकपाल के दायरे में आए लेकिन मंत्री नहीं चाहते। प्रधानमंत्री चाहे और मंत्री ओवर रूल करें, क्या यह राजनीतिक लीडरशिप की निशानी है? प्रधानमंत्री देश का लीडर होना तो दूर रहा, अपने मंत्रिमंडल का भी लीडर नहीं है। कैसा बचकाना-सा जवाब है। फिर प्रस्तावित सरकारी लोकपाल बिल के प्रावधानों को देखिए। भारत की बहुसंख्यक यानि 90 फीसदी जनता का पुलिस-बाबू राज में घुटना है। जनता में भ्रष्टाचार के खिलाफ यदि गुस्सा है तो वह छोटे-छोटे सरकारी दफ्तरों में रोजमर्रा की लूट है। ड्राइविंग लाइसेंस लेना हो, पुलिस में एफआईआर दर्ज करानी हो, राशन लेना हो, बिजली-पानी कनेक्शन लेना हो, गैस लेनी हो या मकान का नक्शा पास कराना हो या जीवन-मरण सर्टिफिकेट लेना हो, ऐसे तमाम कामों में जनता सरकारी कर्मचारियों की लूट से आजिज आ चुकी है। उसी को बदलने और जनजीवन की लूट की रोकथाम के चक्कर से सख्त लोकपाल की जनता में चाह है। मगर हुआ उलटा। मनमोहन सरकार ने 95 फीसदी अफसरों और बाबुओं को लोकपाल से बाहर रखवा दिया है। मतलब भ्रष्ट नौकरशाह में 95 फीसदी की सरकारी लोकपाल में प्रोटेक्शन है। महाठगी वाली इस सरकारी ड्राफ्ट में बेशर्मी की हद यह है कि यदि कोई नागरिक बाबू-अफसर के खिलाफ शिकायत करेगा तो उसे बदले की सजा के लिए तैयार रहना होगा। किसी की शिकायत की तो वह अफसर विशेष अदालत में जवाबी शिकायत दर्ज करा सकता है और इस काम के लिए उसे सरकारी वकील भी मुफ्त मिलेगा। जनता के इस दमन शोषण के खिलाफ ही अन्ना हजारे ने लोकपाल का डर बनाने का एक नुस्खा दिया। मगर डॉ. मनमोहन सिंह उसे मान नहीं रहे, क्योंकि उन्हें जनता से क्या लेना-देना?
प्रधानमंत्री ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में एक ऐसी बात कर दी जिससे अंतर्राष्ट्रीय विवाद उत्पन्न हो गया है। उन्होंने कहा कि बंगलादेश की कम से कम 25 फीसदी जनसंख्या जमात-ए-इस्लामी से संबंध और हमदर्दी रखती है और यह भारत विरोधी है और वह आईएसआई के शिकंजे में हैं तथा बंगलादेश में किसी भी समय राजनीतिक घटनाचक्र बदल सकता है। बाद में पीएमओ ने सफाई दी कि यह अनौपचारिक रिमार्प था जिसे तूल नहीं देना चाहिए। डॉ. मनमोहन सिंह ने पिछली बार 2014 तक प्रधानमंत्री बने रहने का भरोसा दिया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें 2014 तक का जनादेश मिला हुआ है, तब तक वे रहेंगे। बुधवार को उनका कहना था, जब भी पार्टी इस बारे में अपना मन बनाएगी, मैं खुशी-खुशी कुर्सी छोड़ दूंगा। मतलब राहुल गांधी की अटकल के बीच डॉ. मनमोहन सिंह ने बता दिया है कि अब 2014 तक प्रधानमंत्री बने रहने की गारंटी नहीं है। सो कुल मिलाकर प्रधानमंत्री की यह प्रेस कांफ्रेंस एक डिजास्टर रही।
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Sunday, 3 July 2011
बाबा रामदेव का आत्मविश्वास, मनोबल तोड़ने में केंद्र असफल
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 3rd July 2011
अनिल रेन्द्र
ऐसा नहीं लगता कि केंद्र सरकार बाबा रामदेव का आत्मविश्वास, दृढ़ संकल्प तोड़ पाई है। मनमोहन सरकार ने इस प्रकार के हथकंडे इस्तेमाल कर लिए और कर भी रही है पर बाबा न केवल अपने इरादों पर कायम हैं बल्कि वह इसमें नए मुद्दे भी जोड़ते जा रहे हैं। बाबा मेरठ यात्रा के दौरान गत मंगलवार को केंद्र सरकार से दो सवाल पूछे। पहला-चार जून की शाम तक जो बाबा देवता था, वह अचानक ठग कैसे बन गया? दूसरा-यह कि दिल्ली में उनके अनशन के बाद स्विस बैंक से पांच लाख करोड़ रुपये क्यों निकाले गए? इससे साबित होता है कि निकाली गई धनराशि कांग्रेस, उसके मंत्री और उसके पोषित लोगों की है। बाबा पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस राज में तो पूरी दाल ही काली है। सरकार ने अत्याचार की हदें लांघ दीं। रामलीला मैदान में बहू-बेटियों से बलात्कार तक की कोशिश की गई। आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है। नैतिकता के धरातल पर परिवर्तन की लड़ाई लड़ी जाएगी। अपने ऊपर लग रहे आरोपों पर बाबा रामदेव बोले, जो भी केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएगा, उस पर लांछन लगेंगे और उसका चरित्र हनन होगा। पतंजलि योग पीठ में सब कुछ वैधानिक है।ताजा रिपोर्ट के अनुसार बाबा ने अब अपने अभियान में एक और मुद्दा जोड़ दिया है। हरिद्वार में बाबा ने काले धन और भ्रष्टाचार के साथ ही अवैध खनन को भी अपने एजेंडे में शुमार कर लिया है। उनकी योजना योग साधकों के माध्यम से इसके लिए देशव्यापी जनजागरण अभियान चलाने की है। काले धन के पांच मुख्य स्रोत और उनका समाधान बताना इसका मुख्य उद्देश्य रखा गया है। शुक्रवार से पतंजलि योग पीठ में शुरू हुए योग शिविर में इसका खाका तैयार किया जा रहा है। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की तरफ से बाकायदा पत्र बांटकर योग साधकों को मुहिम से जोड़ने का प्रयास हो रहा है। बाबा ने अपनी मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए बाकायदा जिम्मेदारियां तय कर दी हैं। योग साधकों और समर्थकों को बताया जा रहा है कि देश में 89 प्रकार के खनिज के रूप में लगभग 10 लाख करोड़ रुपये की भू-सम्पदा है, जिसका बड़े पैमाने पर अवैध खनन किया जा रहा है। इस काम में एक लाख से अधिक लोग सक्रिय हैं जबकि देशभर के मात्र 200 लोगों को ही खनन करने की इजाजत मिली हुई है। यह काले धन का सबसे बड़ा स्रोत हैं। बाबा ने काले धन के पांच स्रोत बताए हैं। ये हैं-अवैध खनन, टैक्स की चोरी, रिश्वतखोरी, विकास योजनाओं में हेराफेरी और बड़े और अधिक नोट।
उधर सीबीआई ने कथित गलत सूचना देकर पासपोर्ट बनवाने के सिलसिले में पतंजलि योग पीठ के महामंत्री और बाबा के सहयोगी वैद्य बालकृष्ण से हरिद्वार जाकर पूछताछ की। सीबीआई दल ने हरिद्वार नगर पालिका के दफ्तर जाकर जीवन-मृत्यु रजिस्ट्रार के रिकॉर्ड भी खंगाले। बाबा रामदेव अपने एजेंडे पर चल रहे हैं और मनमोहन सिंह की केंद्र सरकार अपने पर।
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Thursday, 30 June 2011
बाबा रामदेव पर चौतरफा दबाव बनाने का प्रयास
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 30th June 2011
अनिल रेन्द्र
मनमोहन सरकार ने बाबा रामदेव को सबक सिखाने के लिए सभी हथकंडों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। साम, दाम, दण्ड, भेद सभी का इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसा कि सरकार ने कहा था वैसा ही करना आरम्भ कर दिया है। इधर बाबा की सम्पत्तियों की जांच शुरू कर दी है उधर बालकृष्ण के खिलाफ पासपोर्ट मामले में छानबीन आरम्भ हो गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने स्काटलैंड में बाबा रामदेव और उनके संस्थानों की सम्पत्ति या निवेश की जांच शुरू कर दी है। निदेशालय सूत्रों ने बताया कि इस बात की भी जांच की जा रही है कि कहीं उनके निवेश और धन के लेनदेन से विदेशी धन विनियमन कानूनों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है। ईडी की नजर में स्काटलैंड के उस द्वीप पर भी है जो योग गुरु के एक प्रबल समर्थक दम्पत्ति ने उन्हें उपहार में दी थी। `द लिटिल कुबेर आइलैंड' नामक इस द्वीप को बाबा रामदेव के विदेश में स्थित ठिकाने और कल्याण केंद्र के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। सूत्रों के मुताबिक पूरी जांच बाबा रामदेव की ओर से बनाए गए ट्रस्टों में धन की आमद और लेनदेन पर टिकी है। इनमें पतंजलि योग पीठ ट्रस्ट, दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट शामिल हैं। सूत्रों ने बताया कि जांच के दौरान अगर ईडी को किसी तरह की गड़बड़ी मिली तो वह फेमा या प्रीवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर सकता है। बताया जा रहा है कि प्रवर्तन निदेशालय की ओर से यह जांच अलग-अलग आधिकारिक सूत्रों से मिले दस्तावेजों और खुफिया सूचनाओं के आधार पर की जा रही है।
इधर बाबा के ट्रस्टों व सम्पत्तियों की जांच हो रही है तो उधर उनके सहयोगी स्वामी बालकृष्ण के पासपोर्ट की जांच कर रही सीबीआई बरेली पासपोर्ट कार्यालय से जुड़े और लोकल इंटेलीजेंस यूनिट (एलआईयू) के अफसरों से पूछताछ कर रही है। बालकृष्ण का पासपोर्ट बरेली पासपोर्ट कार्यालय से बना हुआ है। इसलिए सीबीआई ने जिस अवधि में पासपोर्ट जारी किया गया, उस समय पासपोर्ट कार्यालय में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों की जानकारी मांगी है। सीबीआई ने इसी तरह बरेली एलआईयू कार्यालय में तैनात अफसरों व कर्मचारियों की जानकारी तलब की है। चूंकि पासपोर्ट के आवेदन फार्म की जांच एलआईयू शाखा द्वारा की जाती है। एलयूआई यह जांच करती है कि आवेदक द्वारा दी गई सूचनाएं सही हैं अथवा नहीं। वह भारतीय नागरिक है या नहीं, उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला तो नहीं, उसका सामान्य आचरण और साख, आदि कैसी है। एलआईयू ने बालकृष्ण के आवेदन फार्म पर कैसे संस्तुति की। सीबीआई इसके लिए जिम्मेदार एलआईयू कर्मियों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति करेगी। इसी तरह पासपोर्ट कर्मियों से यह पूछा जाना है कि उन्होंने किस आधार पर बालकृष्ण के पक्ष में पासपोर्ट जारी किया। इसके लिए सीबीआई दोनों ही विभागों के लोगों को नोटिस भेजने की तैयारी कर रही है। सरकार हर तरह का दबाव बनाने पर जुट गई है ताकि बाबा रामदेव लाइन पर आ जाएं पर जो तेवर बाबा ने दो दिन पहले दिल्ली यात्रा में दिखाए उससे तो नहीं लगता कि बाबा किसी भी दबाव में आने वाले हैं।
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Saturday, 25 June 2011
टीम अन्ना को अंत में दोबारा आंदोलन करने का ही विकल्प रहेगा
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 25th June 2011
अनिल नरेन्द्र
मनमोहन सिंह सरकार गांधीवादी अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की हवा निकालने और उसे फेल करने के लिए सभी हथकंडे अपनाने लगी है। साम, दाम, दण्ड, भेद सभी तरीके अपनाए जा रहे हैं। आजकल दोनों सरकार और कांग्रेस पार्टी के मुख्य वक्ता बने दिग्विजय सिंह कहते हैं कि अन्ना हजारे ने अगर अनशन किया तो उनका हश्र भी बाबा रामदेव की तरह होगा यानि कि उनके आंदोलन को हर हाल में कुचला जाएगा। बुधवार को दिग्विजय सिंह ने कहा कि हजारे के खिलाफ भी वैसे ही सलूक हो सकता है जैसा रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के साथ हुआ। हालांकि यह मौके की नजाकत पर निर्भर करेगा। नए-नए खुलासों और बयानों को लेकर अपनी तुलना विकीलीक्स से किए जाने पर उन्होंने कहा कि विकीलीक्स तो लाजवाब है ही, लेकिन `दिग्गीलीक्स' उससे भी ज्यादा जबरदस्त हैं। पत्रकारों से बातचीत करते हुए दिग्गीलीक्स ने कहा कि अन्ना तो बुजुर्ग नेता हैं और उनके समर्थक उन्हें `चने के झाड़' पर चढ़ाकर अनशन पर बिठा देते हैं जबकि उम्र को देखते हुए उनका अनशन पर बैठना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार की जवाबदेही अन्ना और उनकी टीम के प्रति नहीं जनता के प्रति है। देश में संसदीय प्रणाली सर्वोच्च है और उसी की प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।अन्ना ने दिग्गीलीक्स को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया है। लोकपाल बिल के मसौदे पर रजामंदी की कोशिशें विफल होने के बाद अन्ना हजारे ने बुधवार को कहा कि भ्रष्टाचार पर नेताओं और अफसरों की सांठगांठ पाकिस्तान से भी बड़ा खतरा है। उन्होंने 16 अगस्त से फिर अनशन करने के फैसले को दोहराते हुए कहा कि सरकार और उनकी एजेंसियां उनके आंदोलन को कमजोर करने की कोशिशों में जुट गई है। इसलिए सरकार की ओर से जन लोकपाल के बारे में तरह-तरह के भ्रामक बयान दिए जा रहे हैं। अप्रैल में जन्तर-मन्तर पर पांच दिन और 8 जून को राजघाट पर अनशन देखने के बाद सरकार समझ गई है कि 16 अगस्त से शुरू होने वाला आंदोलन पहले की तुलना में ज्यादा बड़ा होगा। इसलिए तरह-तरह से जनता को गुमराह करने में सरकार जुटी है। अन्ना ने कहा कि 16 अगस्त से दोबारा अनशन शुरू करने से पहले वे देश के अलग-अलग हिस्सों में सघन जागरुकता यात्रा पर जाना चाहते हैं। लेकिन इस कार्यक्रम में उन्हें दिक्कत आ रही है, क्योंकि आने वाले दिनों में उन्हें कई बार अदालतों के चक्कर लगाने होंगे। अगले महीने से पहले से उनके खिलाफ महाराष्ट्र के कुछ नेताओं द्वारा दाखिल किए मुकदमों की तारीखों में पेश होना होगा। उन्होंने कहा कि ये मामले सिर्प मुझे परेशान करने के लिए दाखिल किए गए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने उन्हें परेशान करने के लिए उनके हिन्द स्वराज ट्रस्ट की जांच-पड़ताल शुरू कर दी है। ये सब मेरा ध्यान बंटाने व आंदोलन को कमजोर करने की कोशिशें ही हैं। अन्ना ने यह भी कहा कि वह गांधी जी के अनुयायी हैं। उन्हें सत्याग्रह से कोई नहीं रोक सकता। मैं तो फक्कड़ हूं, मुझे जेल में डाल दो, गोलियों से भून दो मैं पीछे हटने वाला नहीं।
ताजा स्थिति अब यह है कि सरकार ने तमाम राजनीतिक दलों पर सारी बात शिफ्ट कर दी है। लोकपाल बिल पर सरकार ने 3 जुलाई को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इस बैठक के बाद लोकपाल बिल का मसौदा कैबिनेट में जाएगा। वहां से मसौदा फाइनल होने पर इसे संसद के एक अगस्त को शुरू हो रहे मानसून सत्र में पेश कर दिया जाएगा। सरकार के सूत्रों ने बताया कि सर्वदलीय बैठक में सरकार की ओर से बनाए गए मसौदे के साथ हजारे पक्ष की तरफ से बनाया गया मसौदा भी रखा जाएगा। सरकार और अन्ना के बीच लोकपाल बिल पर पिछले दो महीनों में करीब 9 बैठकें हुई हैं। लेकिन आम सहमति नहीं बन पाई। सरकार के मसौदे से असहमत अन्ना हजारे ने 16 अगस्त से फिर अनशन पर जाने की घोषणा की है। अब देखें विपक्षी दलों की बैठक में कोई हल निकलता है। उनके सामने दो मसौदे होंगे। एक जो अन्ना हजारे टीम ने तैयार किया है और दूसरा सरकार ने। हमें नहीं लगता कि यूपीए सरकार अन्ना हजारे की मांगों को किसी हालत में भी स्वीकार करेगी। अन्ना के पास दोबारा आंदोलन करने के अलावा शायद ही कोई अन्य विकल्प रहे।
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Friday, 24 June 2011
प्रणब मुखर्जी की जासूसी का मामला अत्यंत गंभीर मसला है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 24nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
यूपीए सरकार पर लगता है ग्रहण का सबसे ज्यादा असर हुआ है। एक के बाद एक घोटाले में यह सरकार फंसती जा रही है। अभी बाबा रामदेव का मामला, अन्ना हजारे से विवाद सुलटा नहीं कि एक और घोटाला सामने आ गया है। यह घोटाला तो नहीं पर हां अत्यंत गम्भीर मुद्दा जरूर है। यह है केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के कार्यालय में टेपिंग करने का मुद्दा। एक अंग्रेजी पत्र द इंडियन एक्सप्रेस ने एक सनसनीखेज रिपोर्ट छापी है। इसमें बताया गया है कि केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि उनके ऑफिस नॉर्थ ब्लॉक में उनके मेज के नीचे व कम से कम 15 और मेजों के नीचे चूइंगम लगी पाई गई। वित्तमंत्री के कार्यालय में, उनके सलाहकार उमीता पॉल के, निजी सचिव मनोज पन्त, दो कांफ्रेंस कमरों में ऐसी चूइंगम मेजों के नीचे लगी पाई गई हैं। इन चूइंगम के ऊपर ट्रांसमीटर फिट किया जाता है ताकि जो भी बातचीत हो उसे सुना जा सके, उसे टेप किया जा सके। इन चूइंगम पर हालांकि कोई माइक तो नहीं मिला पर निशान जरूर लगे मिले जिससे यह साबित होता है कि प्रणब दा की कोई पूरी जासूसी कर रहा था।
अब देखिए क्या होता है? प्रणब मुखर्जी इसकी शिकायत गृह मंत्रालय से नहीं करते जो आमतौर पर होना चाहिए था, वह सीधे प्रधानमंत्री से करते हैं और उन्हें कहते हैं कि वह मामले की जांच करें। इस घटना से कई बातें उभरकर सामने आती हैं। इससे साफ पता चलता है कि कांग्रेस के अन्दर गड़बड़ है और जबरदस्त खींचतान है। पाठकों को याद होगा कि मैंने इसी कॉलम में दो दिन पहले लिखा था कि कांग्रेस पार्टी में दो खेमे बन चुके हैं। एक खेमा सोनिया गांधी व कांग्रेस पार्टी का है तो दूसरा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनके मंत्रियों का है जो सरकार का पक्ष लेते हैं। यानि पार्टी बनाम सरकार। चूंकि गृहमंत्री चिदम्बरम का प्रणब दा से 36 का आंकड़ा है और दोनों अलग-अलग कैम्प में हैं इसलिए प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री से शिकायत की, गृहमंत्री से नहीं। नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक का क्षेत्र अति सुरक्षित क्षेत्र माना जाता है। अगर वित्त मंत्रालय में किसी ने टेपिंग यंत्र लगाए तो यह कौन हो सकता है? पहली बात तो यह है कि बिना अन्दर के सूत्र के कोई बाहरी ताकत, व्यक्ति इन कार्यालयों में पहुंच ही नहीं सकता, क्योंकि यहां सुरक्षा इतनी कड़ी है। क्या कांग्रेस ने खुद अपने वित्तमंत्री की जासूसी करवाई? सुब्रह्मण्यम स्वामी का तो कहना है कि यह जासूसी पी. चिदम्बरम ने करवाई है। क्या यह काम किसी बाहरी देश का है? जो चूइंगम पाई गई वह विदेशी है। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि कोई विदेशी सरकार या ताकत ने जासूसी करवाई। यह सम्भावना भी है कि किसी औद्योगिक घराने ने यह जासूसी इसलिए करवाई हो ताकि उन्हें पता लग सके कि वित्त मंत्रालय में क्या चल रहा है?
पूरे प्रकरण से कई सवाल खड़े हो गए हैं। मसलन जब प्रणब मुखर्जी को इसका पता था तो उन्होंने आईबी को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी? क्योंकि आईबी के कार्यक्षेत्र में ही यह काम आता है और सर्वेलांस और एंटी सर्वेलांस में वह महारथ रखती है। प्रणब मुखर्जी ने सीबीडीटी को छानबीन के लिए क्यों कहा, क्योंकि उसका यह काम नहीं और उसे मालूम भी नहीं कि ऐसी स्थितियों से कैसे निपटना है। रिपोर्ट के अनुसार सीबीडीटी ने किसी प्राइवेट खुफिया एजेंसी को बुलाकर जांच करवाई। आईबी को इसलिए नहीं बुलाया गया क्योंकि वह गृह मंत्रालय के आधीन है और प्रणब मुखर्जी गृह मंत्रालय को शामिल नहीं करना चाहते थे। बाद में आईबी को बुलाया गया और आईबी ने क्लीन चिट देते हुए कह दिया कि चूइंगम तो मिली है पर माइक्रोफोन कोई नहीं मिला। आईबी तो कहेगी ही? सरकार यह नहीं चाहेगी कि सच सामने आए और इस मामले को दबाने का हर सम्भव प्रयास करेगी। नॉर्थ ब्लॉक व साउथ ब्लॉक कार्यालयों को रोज रात बन्द करने की जिम्मेदारी एक अलग विभाग की है। बिना चॉभियों के यह कार्यालय कब और कैसे खुले ताकि बगिंग डिवाइस फिट की जा सकें? क्या कोई इस विभाग का आदमी मिला हुआ था?
वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी और उनके सलाहकारों की मंत्रालय के अन्दर जासूसी को लेकर जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आरोप लगाया है कि सोनिया गांधी के कहने पर प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई गई। डॉ. स्वामी ने कहा कि सोनिया गांधी के कहने पर हसन अली केस मामले में वित्तमंत्री की जासूसी कराई गई। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने जासूसी कराई। उन्होंने कहा कि उनकी जानकारी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के दबाव में प्रणब मुखर्जी झुकते नजर आ रहे थे। कई बड़े नामों का खुलासा हो सकता था। इसलिए प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई गई। वहीं स्वामी के आरोप के बाद राजनीतिक गहमागहमी तेज हो गई है। लोकसभा विपक्ष के नेता व तेज-तर्रार भाजपा की सुषमा स्वराज ने इस जासूसी कांड को अमेरिका के वॉटरगेट स्कैंडल का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि वित्तमंत्री कार्यालय की जासूसी का मामला अत्यंत गम्भीर है। वित्तमंत्री स्वयं इसे खारिज करने की कोशिश कर सकते हैं, वह किन्हीं दबावों में हो सकते हैं। लेकिन देश असलियत जानना चाहता है। विपक्ष के हमलों को देखते हुए सरकारी तंत्र भी सक्रिय हुआ और सरकार की मीडिया संबंधी मंत्रिमंडलीय समूह ने भी इस बारे में विचार किया। इसके बाद कांग्रेस ने सफाई देने के बजाय भाजपा के आरोपों को उसकी पांच राज्यों के चुनाव में हार की हताशा करार दिया। देश जानना चाहता है कि इसमें सच क्या है? यह अत्यंत गम्भीर मामला है। इस मामले से कई तरह के प्रश्न खड़े हो गए हैं। सरकार को इस मामले में लीपापोती करने की बजाय मंत्रियों की जासूसी करने वालों का खुलासा करना चाहिए। यह मामला देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े होने के अलावा देश की सुरक्षा से भी जुड़ा हो सकता है। मामले की पूरी जांच होनी चाहिए और सच्चाई जनता के सामने आनी ही चाहिए। प्रणब मुखर्जी एक बहुत सुलझे हुए, समझदार मंत्री हैं। अगर उन्हें दाल में कुछ काला नहीं दिखा होता तो वह जांच की मांग करते ही नहीं? और फिर गृह मंत्रालय को छोड़कर सीधा प्रधानमंत्री को शिकायत क्यों की?
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Tuesday, 21 June 2011
दिल्ली पुलिस का सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने वाला हलफनामा
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Published on 21st June 2011
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली पुलिस ने 4 जून की रात को रामलीला मैदान में बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को बलपूर्वक हटाने की कार्रवाई को न्यायोचित ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट में दावा किया है कि बाबा रामदेव को योग शिविर की अनुमति दी गई थी, लेकिन वह इसके विपरीत वहां सत्याग्रह कर रहे थे। दिल्ली पुलिस का दावा है कि बाबा रामदेव द्वारा रामलीला मैदान में कार्यक्रम के आयोजन की शर्तों का उल्लंघन किए जाने के कारण उसके पास अनुमति वापस लेने के अलावा कोई अन्य विकल्प ही नहीं बचा था। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में बाबा रामदेव के समर्थकों पर लाठीचार्ज के आरोपों से इंकार करते हुए कहा है कि भगदड़ में कुछ लोग जख्मी हुए थे। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि बाबा रामदेव पर अपने समर्थकों को भड़काने के लिए मंच का इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हुए दावा किया गया है कि सत्याग्रहियों द्वारा पथराव किए जाने पर पुलिस ने आंसू गैस के सिर्प आठ गोले दागे थे। यह भी कहा गया है कि बाबा रामदेव को रामलीला मैदान में पांच हजार व्यक्तियों के योग शिविर की अनुमति दी गई थी, लेकिन वहां 20 हजार लोग उपस्थित थे। पुलिस का कहना है कि बाबा रामदेव को योग शिविर के आयोजन की अनुमति वापस लेने के बारे में 4 जून की रात को एक बजे सूचित किया गया और उन्हें रामलीला मैदान खाली करने के लिए डेढ़ घंटे का वक्त दिया गया था।
यह निहायत अफसोस की बात है कि दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट को गुमराह कर रही है। पुलिस अपने काले कारनामों को छिपाने का प्रयास कर रही है। प्रत्यक्षदर्शियों व पीड़ितों का कहना है कि दिल्ली पुलिस के आईपीएस स्तर के अधिकारियों ने लोगों को रामलीला मैदान से घसीट-घसीटकर बाहर करने और लाठीचार्ज करने का आदेश दिया था फिर वह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष झूठ क्यों बोल रही है? इन्कम टैक्स के वकील लोकेन्द्र आर्य उस रात रामलीला मैदान में थे। वह आर्यवीर, दिल्ली प्रदेश की ओर से सेवा देने रामलीला मैदान गए थे। लाठीचार्ज में उनके भी चेहरे व पैर में चोटें आईं और उन्हें लोकनायक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लोकेन्द्र आर्य के अनुसार दिल्ली पुलिस के आईपीएस अमित रॉय ने स्पष्ट शब्दों में लाठीचार्ज का आदेश दिया था। अमित रॉय का बिल्ला उनकी वर्दी में लगा था, जिससे उनका नाम मुझे याद है। कुछ पुलिस वालों ने तो बर्बरतापूर्वक व्यवहार करने से पहले अपना बिल्ला छिपा लिया था। इनमें एक महिला आईपीएस अधिकारी भी थीं। उसने सबसे पहले माइक सिस्टम को उखाड़ दिया था और विरोध करने पर आरएएफ व पुलिस के जवानों को लेकर मंच के पास पहुंच गई थी। भाकपा के राष्ट्रीय सचिव डी. राजा का कहना है कि पुलिस झूठ बोल रही है। जन आंदोलनों को कुचलने के लिए सरकार व पुलिस जब भी ऐसे कदम उठाती है तो इसी तरह का कुतर्प देती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पुलिस की मंशा लाठीचार्ज करने की थी ही नहीं, तो वह इतनी संख्या में क्यों गई? इसी से दिल्ली पुलिस के झूठ का पता चलता है।
4 जून की काली रात को याद करके आज भी घायल सिहर उठते हैं। जिस तरह से सोए हुए लोगों पर पुलिस ने लाठियां भांजी थीं। उनका सवाल है कि फिर आज पुलिस क्यों मुकर रही है। अगर लाठी नहीं चली तो लोगों के हाथ-पैर कैसे टूट गए। मीडिया में लाठीचार्ज के फोटो कहां से आए? 70 वर्षीय राज योगी का कहना है कि उन पर लाठी मारी गई थी, लेकिन उन्होंने फिर भी तिरंगा अपने हाथ से नहीं छोड़ा था। यहां तक कि अस्पताल के बैड पर भी वह झंडा पकड़े रहे थे। उनके पेट व पीठ में चोटें आई थीं। राम गोबिंद गुप्ता (36) बताते हैं कि पुलिस की लाठियां लगने से उनका तो दाहिना पैर ही टूट गया था। अभी तक भी उनका प्लास्टर नहीं उतर पाया है। वह कभी भी उस काली रात को नहीं भूल पाएंगे। वह कहते हैं कि दिल्ली पुलिस ने जलियांवाला बाग कांड को भी पीछे छोड़ दिया। उस वक्त तो दिन में गोलियां बरसाई थीं, लेकिन यहां तो सोते वक्त लोगों पर लाठियां चलाई गईं। दिल्ली पुलिस द्वारा सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोलने पर घायल कहते हैं कि इससे खुद ही पुलिस बेनकाब हो गई है। घायल हुए जगदीश (54) बताते हैं कि अगर लाठी नहीं चली तो मीडिया में लाठीचार्ज के फोटो कहां से आए। दर्जनों लोग इसमें घायल हुए। किसी का हाथ टूटा तो किसी का पैर। फिर उस काली रात की सबसे बड़ी भुगतभोगी तो 13 दिन बाद भी जिन्दगी और मौत के बीच झूल रही राजबाला हैं। गुड़गांव की पूर्व निगम पार्षद राजबाला कोमा से बाहर निकल चुकी है। लेकिन अभी भी वेंटिलेटर पर हैं। डाक्टरों के अनुसार वह इशारों-इशारों में बात को समझ रही है, लेकिन स्थिति अभी भी गम्भीर है। जीबी पंत अस्पताल के न्यूरो सर्जरी विभाग के आईसीयू-17 में भर्ती राजबाला के बारे में डाक्टरों का कहना है कि उसके शरीर और मस्तिष्क के बीच संवाद स्थापित नहीं हो पा रहा है। गर्दन की हड्डी टूटने की वजह से मस्तिष्क की नसों को नुकसान पहुंचा है।
भारतीय जनता पार्टी ने भी इस रिपोर्ट को असत्य व गुमराह करने वाली बताई है। पत्रकारों से बातचीत करते हुए पार्टी के दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय कुमार मल्होत्रा व प्रदेशाध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि पुलिस अपने को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी झूठ बोल रही है। उन्होंने दिल्ली पुलिस, केंद्र सरकार व गृहमंत्रालय से निम्नलिखित सवाल पूछे हैंöपुलिस का कहना है कि जीवन और मौत के बीच जूझ रही महिला राजबाला सहित सैकड़ों लोगों के हाथ-पांव भगदड़ के कारण टूटे थे। सवाल यह है कि यदि पुलिस ने समुचित कार्रवाई की थी तो भगदड़ क्यों मची? सत्याग्रह 4 जून की सुबह प्रारम्भ हुआ था जो शांतिपूर्ण, अहिंसक था। इसमें हजारों की संख्या में बच्चे तथा महिलाएं शामिल थीं। गृहमंत्रालय और दिल्ली पुलिस ने सत्याग्रहियों को 6 जून की मध्य रात्रि तक धरने पर बैठने की स्वयं अनुमति दी थी। क्या कारण है कि समयावधि समाप्त होने से पूर्व ही 4/5 जून की रात बगैर चेतावनी दिए रामलीला मैदान खाली कराने का बगैर सोचे-समझे फैसला किया गया? यदि सिर्प मैदान खाली कराने का आदेश था तो पुलिस ने बन्द पंडाल में आंसू गैस के गोले क्यों दागे? बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं पर अकारण, बगैर चेतावनी दिए बर्बर लाठीचार्ज क्यों किया गया? यदि पुलिस ने जुल्म नहीं किया था तो जिन ठेकेदारों ने मैदान में सीसीटीवी कैमरे लगाए थे, उसके यहां दिल्ली पुलिस ने अचानक छापा मारकर उस दिन के पुलिस अत्याचार को रिकार्ड करने वाली 42 सीडियां क्यों जबरिया छीनकर गायब कर दीं? इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के फुटेज बताते हैं कि 4/5 जून की रात को जो बर्बरता हुई उसने जलियांवाला बाग कांड को भी पीछे छोड़ दिया है। पुलिस को रामलीला मैदान खाली कराने के निर्देश थे तब पुलिस ने वहशियाना लुटेरे जैसे बर्ताव करते हुए सत्याग्रहियों के रुपये, जेवर, आदि क्यों लूटे? क्या कारण हैं कि बाबा रामदेव जैसे विश्व प्रसिद्ध योग गुरु को अपनी जान बचाने के लिए महिलाओं के वस्त्र पहनकर महिलाओं के बीच छिपना पड़ा? यदि दिल्ली पुलिस इतनी ही मासूम है तो वह दिन के समय रामलीला मैदान खाली कराने क्यों नहीं गई? रात में जाने का मतलब ही था लोगों को कुचलना और सबूत मिटाना। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के स्टेट कार्डिनेटर डॉ. ज्ञान के अनुसार पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया और अब झूठ बोल रही है। पुलिस का यह कहना कि लोग पत्थर बरसा रहे थे और बेसबॉल का डण्डा लेकर आए थे, सरासर झूठ है। रामलीला मैदान में आने वाला हर व्यक्ति पुलिस जांच से गुजर कर वहां तक पहुंचा था, उस वक्त तो पत्थर व डण्डे नहीं मिले?
सबूत मिटाने और गवाहों को सैट करने के लिए खबर है कि पुलिस अब घायलों का बयान लेने के लिए उनके घरों पर दस्तक दे रही है। पुलिस सरकारी मुआवजे का झुनझुना थमाने के नाम पर घायल हुए लोगों का बयान दर्ज कर रही है। दिल्ली पुलिस ने ऐसे 40 लोगों की सूची तैयार की है, जिन्हें चोटें आई थीं। घायलों या उनके परिजनों द्वारा शंका जताने पर यह भी कहा जा रहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बयान दर्ज करने आए हैं। घायलों द्वारा अपने बयान में किसी पुलिस अधिकारी का नाम लेने पर इन्हें दबी जुबान में धमकी दी जा रही है। पेशे से इन्कम टैक्स वकील लोकेन्द्र आर्य के मुताबिक गुरुवार 16 जून 2011 को दो पुलिस वाले उनके पास आए थे। एक सब-इंस्पेक्टर था और दूसरा हवलदार था। उन्होंने कहा कि आप रामलीला मैदान में घायल हुए थे इसलिए आपका बयान लेना है। सवाल पूछने पर कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट की ओर से बयान दर्ज करने को भेजा हुआ है। उनकी ड्यूटी सुप्रीम कोर्ट के सिक्यूरिटी कंट्रोल रूम में है। यदि आप बयान देंगे तो सरकार आपको मुआवजा देगी। लोकेन्द्र आर्य के मुताबिक मैंने उनसे कहा कि मुझे मुआवजा नहीं चाहिए। जो चोर और भ्रष्टाचारी है। ऐसी सरकार से कुछ नहीं चाहिए।
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यह निहायत अफसोस की बात है कि दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट को गुमराह कर रही है। पुलिस अपने काले कारनामों को छिपाने का प्रयास कर रही है। प्रत्यक्षदर्शियों व पीड़ितों का कहना है कि दिल्ली पुलिस के आईपीएस स्तर के अधिकारियों ने लोगों को रामलीला मैदान से घसीट-घसीटकर बाहर करने और लाठीचार्ज करने का आदेश दिया था फिर वह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष झूठ क्यों बोल रही है? इन्कम टैक्स के वकील लोकेन्द्र आर्य उस रात रामलीला मैदान में थे। वह आर्यवीर, दिल्ली प्रदेश की ओर से सेवा देने रामलीला मैदान गए थे। लाठीचार्ज में उनके भी चेहरे व पैर में चोटें आईं और उन्हें लोकनायक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लोकेन्द्र आर्य के अनुसार दिल्ली पुलिस के आईपीएस अमित रॉय ने स्पष्ट शब्दों में लाठीचार्ज का आदेश दिया था। अमित रॉय का बिल्ला उनकी वर्दी में लगा था, जिससे उनका नाम मुझे याद है। कुछ पुलिस वालों ने तो बर्बरतापूर्वक व्यवहार करने से पहले अपना बिल्ला छिपा लिया था। इनमें एक महिला आईपीएस अधिकारी भी थीं। उसने सबसे पहले माइक सिस्टम को उखाड़ दिया था और विरोध करने पर आरएएफ व पुलिस के जवानों को लेकर मंच के पास पहुंच गई थी। भाकपा के राष्ट्रीय सचिव डी. राजा का कहना है कि पुलिस झूठ बोल रही है। जन आंदोलनों को कुचलने के लिए सरकार व पुलिस जब भी ऐसे कदम उठाती है तो इसी तरह का कुतर्प देती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पुलिस की मंशा लाठीचार्ज करने की थी ही नहीं, तो वह इतनी संख्या में क्यों गई? इसी से दिल्ली पुलिस के झूठ का पता चलता है।
4 जून की काली रात को याद करके आज भी घायल सिहर उठते हैं। जिस तरह से सोए हुए लोगों पर पुलिस ने लाठियां भांजी थीं। उनका सवाल है कि फिर आज पुलिस क्यों मुकर रही है। अगर लाठी नहीं चली तो लोगों के हाथ-पैर कैसे टूट गए। मीडिया में लाठीचार्ज के फोटो कहां से आए? 70 वर्षीय राज योगी का कहना है कि उन पर लाठी मारी गई थी, लेकिन उन्होंने फिर भी तिरंगा अपने हाथ से नहीं छोड़ा था। यहां तक कि अस्पताल के बैड पर भी वह झंडा पकड़े रहे थे। उनके पेट व पीठ में चोटें आई थीं। राम गोबिंद गुप्ता (36) बताते हैं कि पुलिस की लाठियां लगने से उनका तो दाहिना पैर ही टूट गया था। अभी तक भी उनका प्लास्टर नहीं उतर पाया है। वह कभी भी उस काली रात को नहीं भूल पाएंगे। वह कहते हैं कि दिल्ली पुलिस ने जलियांवाला बाग कांड को भी पीछे छोड़ दिया। उस वक्त तो दिन में गोलियां बरसाई थीं, लेकिन यहां तो सोते वक्त लोगों पर लाठियां चलाई गईं। दिल्ली पुलिस द्वारा सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोलने पर घायल कहते हैं कि इससे खुद ही पुलिस बेनकाब हो गई है। घायल हुए जगदीश (54) बताते हैं कि अगर लाठी नहीं चली तो मीडिया में लाठीचार्ज के फोटो कहां से आए। दर्जनों लोग इसमें घायल हुए। किसी का हाथ टूटा तो किसी का पैर। फिर उस काली रात की सबसे बड़ी भुगतभोगी तो 13 दिन बाद भी जिन्दगी और मौत के बीच झूल रही राजबाला हैं। गुड़गांव की पूर्व निगम पार्षद राजबाला कोमा से बाहर निकल चुकी है। लेकिन अभी भी वेंटिलेटर पर हैं। डाक्टरों के अनुसार वह इशारों-इशारों में बात को समझ रही है, लेकिन स्थिति अभी भी गम्भीर है। जीबी पंत अस्पताल के न्यूरो सर्जरी विभाग के आईसीयू-17 में भर्ती राजबाला के बारे में डाक्टरों का कहना है कि उसके शरीर और मस्तिष्क के बीच संवाद स्थापित नहीं हो पा रहा है। गर्दन की हड्डी टूटने की वजह से मस्तिष्क की नसों को नुकसान पहुंचा है।
भारतीय जनता पार्टी ने भी इस रिपोर्ट को असत्य व गुमराह करने वाली बताई है। पत्रकारों से बातचीत करते हुए पार्टी के दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय कुमार मल्होत्रा व प्रदेशाध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि पुलिस अपने को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी झूठ बोल रही है। उन्होंने दिल्ली पुलिस, केंद्र सरकार व गृहमंत्रालय से निम्नलिखित सवाल पूछे हैंöपुलिस का कहना है कि जीवन और मौत के बीच जूझ रही महिला राजबाला सहित सैकड़ों लोगों के हाथ-पांव भगदड़ के कारण टूटे थे। सवाल यह है कि यदि पुलिस ने समुचित कार्रवाई की थी तो भगदड़ क्यों मची? सत्याग्रह 4 जून की सुबह प्रारम्भ हुआ था जो शांतिपूर्ण, अहिंसक था। इसमें हजारों की संख्या में बच्चे तथा महिलाएं शामिल थीं। गृहमंत्रालय और दिल्ली पुलिस ने सत्याग्रहियों को 6 जून की मध्य रात्रि तक धरने पर बैठने की स्वयं अनुमति दी थी। क्या कारण है कि समयावधि समाप्त होने से पूर्व ही 4/5 जून की रात बगैर चेतावनी दिए रामलीला मैदान खाली कराने का बगैर सोचे-समझे फैसला किया गया? यदि सिर्प मैदान खाली कराने का आदेश था तो पुलिस ने बन्द पंडाल में आंसू गैस के गोले क्यों दागे? बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं पर अकारण, बगैर चेतावनी दिए बर्बर लाठीचार्ज क्यों किया गया? यदि पुलिस ने जुल्म नहीं किया था तो जिन ठेकेदारों ने मैदान में सीसीटीवी कैमरे लगाए थे, उसके यहां दिल्ली पुलिस ने अचानक छापा मारकर उस दिन के पुलिस अत्याचार को रिकार्ड करने वाली 42 सीडियां क्यों जबरिया छीनकर गायब कर दीं? इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के फुटेज बताते हैं कि 4/5 जून की रात को जो बर्बरता हुई उसने जलियांवाला बाग कांड को भी पीछे छोड़ दिया है। पुलिस को रामलीला मैदान खाली कराने के निर्देश थे तब पुलिस ने वहशियाना लुटेरे जैसे बर्ताव करते हुए सत्याग्रहियों के रुपये, जेवर, आदि क्यों लूटे? क्या कारण हैं कि बाबा रामदेव जैसे विश्व प्रसिद्ध योग गुरु को अपनी जान बचाने के लिए महिलाओं के वस्त्र पहनकर महिलाओं के बीच छिपना पड़ा? यदि दिल्ली पुलिस इतनी ही मासूम है तो वह दिन के समय रामलीला मैदान खाली कराने क्यों नहीं गई? रात में जाने का मतलब ही था लोगों को कुचलना और सबूत मिटाना। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के स्टेट कार्डिनेटर डॉ. ज्ञान के अनुसार पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया और अब झूठ बोल रही है। पुलिस का यह कहना कि लोग पत्थर बरसा रहे थे और बेसबॉल का डण्डा लेकर आए थे, सरासर झूठ है। रामलीला मैदान में आने वाला हर व्यक्ति पुलिस जांच से गुजर कर वहां तक पहुंचा था, उस वक्त तो पत्थर व डण्डे नहीं मिले?
सबूत मिटाने और गवाहों को सैट करने के लिए खबर है कि पुलिस अब घायलों का बयान लेने के लिए उनके घरों पर दस्तक दे रही है। पुलिस सरकारी मुआवजे का झुनझुना थमाने के नाम पर घायल हुए लोगों का बयान दर्ज कर रही है। दिल्ली पुलिस ने ऐसे 40 लोगों की सूची तैयार की है, जिन्हें चोटें आई थीं। घायलों या उनके परिजनों द्वारा शंका जताने पर यह भी कहा जा रहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बयान दर्ज करने आए हैं। घायलों द्वारा अपने बयान में किसी पुलिस अधिकारी का नाम लेने पर इन्हें दबी जुबान में धमकी दी जा रही है। पेशे से इन्कम टैक्स वकील लोकेन्द्र आर्य के मुताबिक गुरुवार 16 जून 2011 को दो पुलिस वाले उनके पास आए थे। एक सब-इंस्पेक्टर था और दूसरा हवलदार था। उन्होंने कहा कि आप रामलीला मैदान में घायल हुए थे इसलिए आपका बयान लेना है। सवाल पूछने पर कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट की ओर से बयान दर्ज करने को भेजा हुआ है। उनकी ड्यूटी सुप्रीम कोर्ट के सिक्यूरिटी कंट्रोल रूम में है। यदि आप बयान देंगे तो सरकार आपको मुआवजा देगी। लोकेन्द्र आर्य के मुताबिक मैंने उनसे कहा कि मुझे मुआवजा नहीं चाहिए। जो चोर और भ्रष्टाचारी है। ऐसी सरकार से कुछ नहीं चाहिए।
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Sunday, 12 June 2011
अब नॉन पॉलिटिकल मनमोहन सरकार और कांग्रेस पार्टी आमने-सामने
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 12th June 2011
अनिल नरेन्द्र
मुझे मनमोहन सिंह सरकार पर कभी-कभी दया भी आती है कभी निराशा भी। दया इसलिए आती है कि इस सरकार को जो लोग चला रहे हैं वह सभी नॉन पॉलिटिकल (गैर राजनीतिज्ञ) हैं। सबसे ऊपर सोनिया गांधी हैं जो सुपर प्राइम मिनिस्टर हैं और सरकार का रिमोट कंट्रोल हैं। वह नॉन पॉलिटिकल हैं। उनके नीचे हैं प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह जिन्होंने अपनी जिन्दगी में एक भी चुनाव नहीं लड़ा। सोनिया गांधी के मुख्य एडवाइजर अहमद पटेल सरीखे के लोग हैं जो पर्दे के पीछे से फैसले करते हैं, वह भी गैर राजनीतिज्ञ से ही हैं। इसलिए यह सरकार जो भी फैसले करती है उसमें नौकरशाह की बदबू ज्यादा आती है राजनीतिक होने की कम। इसी से निराशा होती है। आप हाल ही में इस सरकार के महत्वपूर्ण फैसले देखिए। चाहे वह अन्ना हजारे का मामला रहा हो, चाहे बाबा रामदेव का। दोनों में भी बड़े बचकाने तरीके से इस मनमोहन सरकार ने मामले को हैंडिल किया। मेरी बात तो छोड़िए अब तो कांग्रेस पार्टी के अन्दर बाबा के प्रकरण को लेकर घमासान छिड़ गया है।
रामलीला मैदान में लगे बाबा रामदेव के योग शिविर को पुलिसिया कार्रवाई के तहत हटाने के बाद कांग्रेस में घमासान छिड़ गया है। इस प्रकरण में अब एक तरीके से कांग्रेस पार्टी और सरकार आमने-सामने आ गए हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और सरकार में मंत्री की कुर्सी सम्भालने वाले कई वरिष्ठ नेता आपस में ही भिड़ गए हैं। सबसे ज्यादा मुखर पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह हैं। दिग्विजय सिंह जितना भला-बुरा बाबा रामदेव को कह रहे हैं, उससे अधिक वे अपनी पार्टी की सरकार के मंत्रियों पर निशाना साध रहे हैं। ताजा आक्रमण उन्होंने वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी पर किया है जबकि सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को भूलकर पर्यटन मंत्री सुबोध कान्त सहाय ने सरकार पर निक्रियता का ही आरोप मढ़ दिया है। दिग्विजय ने प्रणब मुखर्जी और केंद्र के तीन मंत्रियों को बाबा से बातचीत करने के लिए एयरपोर्ट जाने पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि प्रणब ने तो बाबा को लेकर अपना पूरा भविष्य ही दांव पर लगा दिया। सरकार की आलोचना करते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि केंद्र में प्रणब जब से मंत्री हैं, तब रामदेव पैदा भी नहीं हुए थे। मंत्रियों को एयरपोर्ट पर जाकर बाबा को मनाने के बारे में अपनी नाखुशी जताते हुए उन्होंने कहा कि यदि वे मंत्री होते तो कभी रामदेव को नहीं मनाते। यही नहीं, सरकार में कांग्रेस के दिग्गज मंत्रियों के स्वर भी पार्टी के साथ हो लिए हैं। सुबोध कान्त सहाय ने मुख खोला और कहा कि रामलीला मैदान में बाबा के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई पर स्पष्टीकरण में सरकार की तरफ से शिथिलता बरती गई। हालांकि सहाय उन मंत्रियों में शामिल थे, जो सरकार की तरफ से बाबा के साथ बातचीत कर रहे थे। सहाय ने कहा कि जब पहले से ही सरकार की तरफ से तय हो चुका था कि यदि अनशन से बाबा अपने समर्थकों के साथ नहीं हटे, तो उन पर पुलिसिया कार्रवाई की जाएगी। कार्रवाई होने के बाद गृहमंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा चार दिन बाद स्पष्टीकरण दिया गया। इससे जनता में गलत संदेश गया और इससे सरकार और पार्टी, दोनों की छवि खराब हुई।
कांग्रेस के मुख पत्र `कांग्रेस संदेश' तक ने चार मंत्रियों के बाबा को हवाई अड्डे पर रिसीव करने पर कड़ा एतराज जताया है। पार्टी के मुख पत्र होते हुए भी उसने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि क्या चार वरिष्ठ मंत्रियों का हवाई अड्डा जाना जरूरी था? अनिल शास्त्री इस पत्रिका के सम्पादक हैं। सम्पादकीय में कहा गया है कि सरकार का यह कर्तव्य है कि वह नागरिक समाज की मांगों पर अनुकूल रुख अपनाए, लेकिन यह काम इस तरीके से होना चाहिए कि निर्वाचित सरकार की गरिमा एवं उसके न्याय सम्मत अधिकारों का हनन नहीं हो। सम्पादकीय के मुताबिक किसी विशिष्ठ समूह को सड़कों पर संवैधानिक मामलों के बारे में फैसला करने की इजाजत नहीं दी जा सकती और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि कानून निर्माण की कुछ खास प्रक्रिया होती है। `कांग्रेस संदेश' के सम्पादक अनिल शास्त्राr हैं और इसके सम्पादक मंडल में सलमान खुर्शीद और सरबजीत सिंह भी शामिल हैं। दूसरी ओर दिग्विजय के बयान से कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता सहमत नजर नहीं आ रहे हैं। हवाई अड्डे के बारे में मंत्रियों की मजबूरी गिनाते हुए पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सरकार को रामदेव के दिल्ली आने की सूचना थी और इससे पहले ही उन्हें अनशन नहीं करने के लिए मनाने पर जुटी थी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और पर्यटन मंत्री सुबोध कान्त सहाय रामदेव से फोन पर सम्पर्प में थे पर दिल्ली आने से ठीक पहले रामदेव से फोन पर सम्पर्प नहीं हो पा रहा था। जैसे ही सम्पर्प हुआ तब तक रामदेव दिल्ली हवाई अड्डे पहुंच गए और उनसे कई मुद्दों पर बात करने के लिए मंत्रियों ने हवाई अड्डे के वीआईपी लान में बात करना मुनासिब समझा।
कांग्रेस में बढ़ रही खिलाफत का सिलसिला अब प्रदेशों तक पहुंच गया है। प्रादेशिक नेताओं ने भी अब पार्टी रणनीतिकारों को पत्र लिखकर मांग करनी शुरू कर दी है कि पार्टी के जो नेता बाबा रामदेव से जुड़े हैं, उन्हें संगठन व सरकार में महत्व नहीं मिलना चाहिए। उज्जैन से कांग्रेस सांसद प्रेम चन्द गुड्डू ने राज्य प्रभारी व पार्टी महासचिव वीके हरिप्रसाद को पत्र लिखकर यह मांग की है। केंद्रीय मंत्री कमलनाथ का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि जो लोग बाबा रामदेव के चरण धोते हैं, वे सरकार में क्यों बैठे हैं? पार्टी को इस पर गम्भीरता से सोचा चाहिए। वहीं कांग्रेस पार्टी के मुख पत्र `कांग्रेस संदेश' में छपे सम्पादकीय पर भी पार्टी ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है। कांग्रेस महासचिव और मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी ने सम्पादक को चेतावनी दी है कि यह पत्रिका कांग्रेस का मुख पत्र है, यह बात उन्हें याद रखनी चाहिए और इसमें अपने विचार सम्पादक को थोपने का अधिकार नहीं है।
केंद्र सरकार के मिस्टर क्लीन-चेहरे एके एंटनी का पारदर्शिता पर गूढ़ बयान, प्रणब दा की आर्थिक मोर्चे पर घेराबंदी, चिदम्बरम की अचानक रामदेव के बहाने अपनी दृढ़ छवि पेश करने की कोशिशöये चन्द उदाहरण हैं जिनसे कांग्रेस पार्टी में भारी असंतोष का अहसास होता है। दरअसल पार्टी और सरकार, दोनों बाबा रामदेव प्रकरण को लेकर असहज स्थिति में पहुंच चुकी हैं। बाबा रामदेव पर अगली कार्रवाई भी इसी उधेड़बुन के बीच फंसी हुई है। प्रणब पर गुरुवार को एक अखबार में छपी खबर को लेकर भी पार्टी और सरकार में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। सरकार के अन्दर विरोधाभास सामने आ गया है। बाबा की हालत चिन्ताजनक स्थिति में पहुंच गई है। उन्हें जबरन आईसीयू में भर्ती कराया गया है। रामलीला मैदान में पुलिस लाठीचार्ज से प्रभावित राजबाला की हालत अत्यंत गम्भीर हो गई है। सरकार को समझ नहीं आ रहा कि वह अगला कदम उठाए तो क्या उठाए? बाबा को अगर कुछ हो गया तो क्या होगा? अन्त में मुंबई में शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने प्रश्न किया है कि चार जून को पुलिस रामलीला मैदान पर लाठीचार्ज के खिलाफ प्रिन्स राहुल गांधी धरने पर क्यों नहीं बैठे? जब वह भट्टा-पारसौल में पुलिस अत्याचार के खिलाफ धरना दे सकते हैं तो रामलीला मैदान कांड पर क्यों नहीं?
रामलीला मैदान में लगे बाबा रामदेव के योग शिविर को पुलिसिया कार्रवाई के तहत हटाने के बाद कांग्रेस में घमासान छिड़ गया है। इस प्रकरण में अब एक तरीके से कांग्रेस पार्टी और सरकार आमने-सामने आ गए हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और सरकार में मंत्री की कुर्सी सम्भालने वाले कई वरिष्ठ नेता आपस में ही भिड़ गए हैं। सबसे ज्यादा मुखर पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह हैं। दिग्विजय सिंह जितना भला-बुरा बाबा रामदेव को कह रहे हैं, उससे अधिक वे अपनी पार्टी की सरकार के मंत्रियों पर निशाना साध रहे हैं। ताजा आक्रमण उन्होंने वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी पर किया है जबकि सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को भूलकर पर्यटन मंत्री सुबोध कान्त सहाय ने सरकार पर निक्रियता का ही आरोप मढ़ दिया है। दिग्विजय ने प्रणब मुखर्जी और केंद्र के तीन मंत्रियों को बाबा से बातचीत करने के लिए एयरपोर्ट जाने पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि प्रणब ने तो बाबा को लेकर अपना पूरा भविष्य ही दांव पर लगा दिया। सरकार की आलोचना करते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि केंद्र में प्रणब जब से मंत्री हैं, तब रामदेव पैदा भी नहीं हुए थे। मंत्रियों को एयरपोर्ट पर जाकर बाबा को मनाने के बारे में अपनी नाखुशी जताते हुए उन्होंने कहा कि यदि वे मंत्री होते तो कभी रामदेव को नहीं मनाते। यही नहीं, सरकार में कांग्रेस के दिग्गज मंत्रियों के स्वर भी पार्टी के साथ हो लिए हैं। सुबोध कान्त सहाय ने मुख खोला और कहा कि रामलीला मैदान में बाबा के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई पर स्पष्टीकरण में सरकार की तरफ से शिथिलता बरती गई। हालांकि सहाय उन मंत्रियों में शामिल थे, जो सरकार की तरफ से बाबा के साथ बातचीत कर रहे थे। सहाय ने कहा कि जब पहले से ही सरकार की तरफ से तय हो चुका था कि यदि अनशन से बाबा अपने समर्थकों के साथ नहीं हटे, तो उन पर पुलिसिया कार्रवाई की जाएगी। कार्रवाई होने के बाद गृहमंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा चार दिन बाद स्पष्टीकरण दिया गया। इससे जनता में गलत संदेश गया और इससे सरकार और पार्टी, दोनों की छवि खराब हुई।
कांग्रेस के मुख पत्र `कांग्रेस संदेश' तक ने चार मंत्रियों के बाबा को हवाई अड्डे पर रिसीव करने पर कड़ा एतराज जताया है। पार्टी के मुख पत्र होते हुए भी उसने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि क्या चार वरिष्ठ मंत्रियों का हवाई अड्डा जाना जरूरी था? अनिल शास्त्री इस पत्रिका के सम्पादक हैं। सम्पादकीय में कहा गया है कि सरकार का यह कर्तव्य है कि वह नागरिक समाज की मांगों पर अनुकूल रुख अपनाए, लेकिन यह काम इस तरीके से होना चाहिए कि निर्वाचित सरकार की गरिमा एवं उसके न्याय सम्मत अधिकारों का हनन नहीं हो। सम्पादकीय के मुताबिक किसी विशिष्ठ समूह को सड़कों पर संवैधानिक मामलों के बारे में फैसला करने की इजाजत नहीं दी जा सकती और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि कानून निर्माण की कुछ खास प्रक्रिया होती है। `कांग्रेस संदेश' के सम्पादक अनिल शास्त्राr हैं और इसके सम्पादक मंडल में सलमान खुर्शीद और सरबजीत सिंह भी शामिल हैं। दूसरी ओर दिग्विजय के बयान से कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता सहमत नजर नहीं आ रहे हैं। हवाई अड्डे के बारे में मंत्रियों की मजबूरी गिनाते हुए पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सरकार को रामदेव के दिल्ली आने की सूचना थी और इससे पहले ही उन्हें अनशन नहीं करने के लिए मनाने पर जुटी थी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और पर्यटन मंत्री सुबोध कान्त सहाय रामदेव से फोन पर सम्पर्प में थे पर दिल्ली आने से ठीक पहले रामदेव से फोन पर सम्पर्प नहीं हो पा रहा था। जैसे ही सम्पर्प हुआ तब तक रामदेव दिल्ली हवाई अड्डे पहुंच गए और उनसे कई मुद्दों पर बात करने के लिए मंत्रियों ने हवाई अड्डे के वीआईपी लान में बात करना मुनासिब समझा।
कांग्रेस में बढ़ रही खिलाफत का सिलसिला अब प्रदेशों तक पहुंच गया है। प्रादेशिक नेताओं ने भी अब पार्टी रणनीतिकारों को पत्र लिखकर मांग करनी शुरू कर दी है कि पार्टी के जो नेता बाबा रामदेव से जुड़े हैं, उन्हें संगठन व सरकार में महत्व नहीं मिलना चाहिए। उज्जैन से कांग्रेस सांसद प्रेम चन्द गुड्डू ने राज्य प्रभारी व पार्टी महासचिव वीके हरिप्रसाद को पत्र लिखकर यह मांग की है। केंद्रीय मंत्री कमलनाथ का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि जो लोग बाबा रामदेव के चरण धोते हैं, वे सरकार में क्यों बैठे हैं? पार्टी को इस पर गम्भीरता से सोचा चाहिए। वहीं कांग्रेस पार्टी के मुख पत्र `कांग्रेस संदेश' में छपे सम्पादकीय पर भी पार्टी ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है। कांग्रेस महासचिव और मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी ने सम्पादक को चेतावनी दी है कि यह पत्रिका कांग्रेस का मुख पत्र है, यह बात उन्हें याद रखनी चाहिए और इसमें अपने विचार सम्पादक को थोपने का अधिकार नहीं है।
केंद्र सरकार के मिस्टर क्लीन-चेहरे एके एंटनी का पारदर्शिता पर गूढ़ बयान, प्रणब दा की आर्थिक मोर्चे पर घेराबंदी, चिदम्बरम की अचानक रामदेव के बहाने अपनी दृढ़ छवि पेश करने की कोशिशöये चन्द उदाहरण हैं जिनसे कांग्रेस पार्टी में भारी असंतोष का अहसास होता है। दरअसल पार्टी और सरकार, दोनों बाबा रामदेव प्रकरण को लेकर असहज स्थिति में पहुंच चुकी हैं। बाबा रामदेव पर अगली कार्रवाई भी इसी उधेड़बुन के बीच फंसी हुई है। प्रणब पर गुरुवार को एक अखबार में छपी खबर को लेकर भी पार्टी और सरकार में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। सरकार के अन्दर विरोधाभास सामने आ गया है। बाबा की हालत चिन्ताजनक स्थिति में पहुंच गई है। उन्हें जबरन आईसीयू में भर्ती कराया गया है। रामलीला मैदान में पुलिस लाठीचार्ज से प्रभावित राजबाला की हालत अत्यंत गम्भीर हो गई है। सरकार को समझ नहीं आ रहा कि वह अगला कदम उठाए तो क्या उठाए? बाबा को अगर कुछ हो गया तो क्या होगा? अन्त में मुंबई में शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने प्रश्न किया है कि चार जून को पुलिस रामलीला मैदान पर लाठीचार्ज के खिलाफ प्रिन्स राहुल गांधी धरने पर क्यों नहीं बैठे? जब वह भट्टा-पारसौल में पुलिस अत्याचार के खिलाफ धरना दे सकते हैं तो रामलीला मैदान कांड पर क्यों नहीं?
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