अब जब राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव का मामला निपट गया है, लगता है कांग्रेस और संप्रग सरकार में फेरबदल का समय आ गया है। प्राप्त संकेतों से लगता है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अब संगठन में फेरबदल करने के मूड में आ चुकी हैं। खबर है कि कांग्रेस संगठन में कई दिग्गजों को हटाया जाएगा और कुछ के पर कतर दिए जाएंगे। कुछ को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाकर संगठन में लगाया जा सकता है। संगठनात्मक फेरबदल के लिए सोनिया गांधी का वरिष्ठ सलाहकारों से सलाह मशविरा लगभग हो चुका है। यूपी और पंजाब के चुनाव में करारी हार को पार्टी पचा नहीं पा रही है। इस साल और 2013 में कई राज्यों में विधानसभा और आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भी यह जरूरी है कि कांग्रेस अपना संगठन दुरुस्त करे। क्या श्री दिग्विजय सिंह के पर कतरने से यह फेरबदल आरम्भ माना जाए? कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को लेकर मंगलवार को अफवाहों का बाजार गर्म रहा। कहा गया कि उत्तर प्रदेश की हार की वजह से सिंह से उत्तर प्रदेश और असम का प्रभार छीन लिया गया है। एक वजह यह भी सुनने को मिली कि दिग्विजय सिंह से इन राज्यों का प्रभार उनके विवादास्पद बयानों के चलते लिया गया तो दूसरी ओर यह भी सुनने में आया कि अपनी पत्नी की बीमारी की वजह से वह स्वयं ही अपनी इस जिम्मेदारी से मुक्त हो गए हैं। बात बढ़ती देख कांग्रेस महासचिव और मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी को इन सभी बातों का खंडन करने के लिए आगे आना पड़ा। बताया गया कि दिग्विजय सिंह राष्ट्रपति चुनाव को लेकर किसी और काम में व्यस्त हैं पर उन्हें लेकर उलझन तब शुरू हुई जब सोनिया गांधी से मिलने उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद दस जनपथ पहुंचे जबकि राज्य के प्रभारी दिग्विजय सिंह हैं। उससे पहले इलेक्ट्रानिक मीडिया के हाथ कांग्रेस संसदीय दल का वह पत्र लग गया जिसमें सांसदों के साथ सोनिया गांधी की मुलाकात का कार्यक्रम बनाया गया था। इस पत्र और हरिप्रसाद को उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ जाता देखकर इस बात की ऊहापोह बढ़ गई कि क्या सचमुच दिग्विजय से उत्तर प्रदेश और असम का प्रभार ले लिया गया है। सोनिया गांधी इन दिनों कांग्रेस सांसदों से मिल रही हैं। मंगलवार को वह यूपी के सांसदों से मिलीं। खबर है कि कुछ मंत्रियों ने जिनमें ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश और स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद के नाम प्रमुख हैं, ने केंद्र सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा देकर पार्टी की सेवा करने की इच्छा जताई है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव के तुरन्त बाद दोनों केंद्रीय मंत्रिमंडल और कांग्रेस संगठन में बड़ा फेरबदल होगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के लिए कांग्रेस के सहयोगियों का भी दबाव है। श्री प्रणब मुखर्जी के जाने के बाद से वित्त मंत्री का पद भी भरना जरूरी है। लगता है कि दोनों सरकार और संगठन में फेरबदल होगा पर देखें क्या होता है?
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Friday, 20 July 2012
Wednesday, 18 July 2012
सरकार में नम्बर दो की लड़ाई खुलकर सामने आई
मैंने इसी कॉलम में लिखा था कि श्री प्रणब मुखर्जी के संप्रग सरकार से हटने से इस मनमोहन सरकार को चलाना अत्यंत कठिन हो जाएगा। प्रणब दा इस सरकार के संकट मोचक थे, वह हर राजनीतिक समस्या का हल निकाल देते थे। अब मनमोहन सरकार को प्रणब की कमी खलेगी। यह सिलसिला शुरू भी हो गया है। संप्रग सरकार में नम्बर दो का मामला उलझ गया है। यूपीए सरकार में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के बाद उनकी `कुर्सी' के लिए जंग छिड़ गई है। प्रणब के सरकार से बाहर जाने के बाद राकांपा प्रमुख शरद पवार की जगह रक्षा मंत्री एके एंटनी को प्रधानमंत्री के बाद नम्बर दो की जगह देने का मुद्दा संप्रग गठबंधन में कलह का सबब बन गया है। बहुत सोच-समझ कर मुंह खोलने वाले मराठा सरदार पवार ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए बुलाई गई बैठक से दूर रहकर विपक्ष को संप्रग की एकता पर सवाल उठाने का एक और मौका दे दिया है। एनसीपी का कहना है कि कृषि मंत्री शरद पवार यूपीए-एक और दो में कैबिनेट के वरिष्ठता क्रम में प्रणब मुखर्जी के बाद आते थे। मुखर्जी के सरकार से इस्तीफे के बाद नम्बर दो की हैसियत उन्हें ही मिलनी चाहिए। मुखर्जी के इस्तीफे के बाद हुई कैबिनेट बैठक (पहली) में पवार को प्रधानमंत्री के बगल में बिठाया गया था। प्रधानमंत्री कार्यालय की मंत्रियों के क्रम वाली वेबसाइट से भी उनका नाम दूसरे नम्बर पर था। मगर बाद में वेबसाइट ने सूची ही हटा दी गई। उधर बैठक के दो दिन बाद कैबिनेट में मंत्रियों के वरिष्ठता क्रम में बदलाव करते हुए रक्षा मंत्री एके एंटनी को सरकार में नम्बर दो बना दिया गया। इसके विरोध में एनसीपी ने शनिवार को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार तय करने के लिए बुलाई गई यूपीए की बैठक में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया। एनसीपी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक आजादी के बाद यह पहला मौका है जब कैबिनेट के वरिष्ठताक्रम में बदलाव किया गया है। इस नेता ने कहा कि एनसीपी ऐसी पार्टी नहीं है जो छोटे-छोटे मुद्दों पर हंगामा करती रहती है पर ऐसा रवैया हमारा अपमान है और हम यह अपमान बर्दाश्त करने को कतई तैयार नहीं हैं। एनसीपी ने कभी भी इससे पहले कैबिनेट मीटिंग का बहिष्कार या बायकाट नहीं किया, यह पहला मौका है और वजह है शरद पवार का अपमान। विपक्ष ने इसे संप्रग में बिखराव का एक और संकेत करार दिया है। भाजपा महासचिव मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, `कांग्रेस गठबंधन धर्म का पालन करने में असफल रही है। हमें लगता है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद संप्रग टूट जाएगा और देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ेगा।' शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा, `शरद पवार का अनुभव और वरिष्ठता प्रणब मुखर्जी के बराबर है।' एनसीपी के एक नेता ने कहा कि इस मुद्दे पर औपचारिक रूप से पार्टी अपनी तरफ से कांग्रेस से कोई बात नहीं करेगी पर जो हुआ वह बेहद आपत्तिजनक है।
Wednesday, 4 July 2012
प्रधानमंत्री जी अब तो आपके पास कोई बहाना भी नहीं है
श्री प्रणब मुखर्जी को वित्त मंत्री से हटाकर राष्ट्रपति पद पर पहुंचाने की कवायद के पीछे एक बहुत बड़ा कारण यह भी रहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रणब दा के कामकाज से खुश नहीं थे। प्रधानमंत्री कुछ हद तक देश की खराब आर्थिक स्थिति के लिए वित्त मंत्रालय को जिम्मेदार मानते थे। तभी प्रणब को हटाने के लिए डॉ. मनमोहन सिंह बहुत इच्छुक थे। वे सफल भी हुए। अब प्रणब दा वित्त मंत्री नहीं हैं और मनमोहन सिंह ने खुद वित्त मंत्रालय सम्भाल रखा है। अब डॉ. सिंह के पास कोई बहाना नहीं रहता और उन्हें देश की आर्थिक गिरावट को थामने की भूमिका निभानी चाहिए। वह अपनी पुरानी टीम को भी साथ लाने में कामयाब रहे। डॉ. मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्रालय का प्रभार लेने के पहले ही दिन योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी. रंगराजन और प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पुलक चटर्जी के साथ आर्थिक स्थिति, रुपए में आ रही गिरावट, बढ़ती महंगाई और निवेश धारणा मजबूत बनाने पर चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु, वित्त सचिव आर.एस. गुजराल, आर्थिक मामलों के विभाग सचिव आर. गोपालन से भी इन मुद्दों पर चर्चा की। प्रधानमंत्री के वित्त मंत्रालय का प्रभार सम्भालने के पहले तीन दिनों में ही जिस तरह सेंसेक्स साढ़े पांच सौ अंक चढ़ा है और विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजारों में वापसी हुई है उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पिछले एक-डेढ़ सालों से भारतीय अर्थव्यवस्था पर छाए दुर्दिन अब खत्म होने वाले हैं? हमारी अर्थव्यवस्था काफी कठिन दौर से गुजर रही है। वित्त घाटा, चालू खाता घाटा, मुद्रास्फीति और औद्योगिक विकास दर जैसे आर्थिक आंकड़ों की तुलना जिस तरह बार-बार 1991 से की जा रही है, उससे तो लगता है कि और चीजों से ज्यादा सवाल अभी खुद मनमोहन सिंह पर ही हैं। जिस नई भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव खुद मनमोहन सिंह ने 1991 में रखी थी अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। घटक दलों के दबाव में अक्सर यूपीए-2 सरकार वह जरूरी कदम उठा नहीं पाती जो समयानुसार आवश्यक हैं। क्या मनमोहन सिंह ने इस समस्या का भी कोई समाधान सोचा है? सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में फीलगुड का छौंका लगाने के बाद वित्त मंत्रालय का कामकाज सम्भाल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नजर अब देश के खस्ताहाल खजाने पर भी पड़नी चाहिए। सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रहा घाटा एक चुनौती है। सब्सिडी की वजह से बढ़ रहा सरकारी खर्च, विभिन्न वोट खींचने की खर्चीली राजनीतिक स्कीमें इन पर नियंत्रण पाने के उपाय मनमोहन सिंह को ढूंढने होंगे। औद्योगिक गति को कैसे बढ़ाया जाए, देश में आई मंदी और मायूसी दोनों को कैसे दूर किया जाए मनमोहन सिंह के लिए इम्तिहान से कम नहीं है। पूरा देश उनकी ओर देख रहा है। अब तो मनमोहन सिंह यह भी बहाना नहीं कर सकते कि उनके काम और नीतियों में कोई बाधा डाल रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का पूरा हाथ मनमोहन पर है इसलिए अब तो वह यह साबित करें कि वह वाकई एक अर्थशास्त्राr हैं जिनका लोहा भारत सहित पूरी दुनिया मानती है।
Thursday, 28 June 2012
प्रणब मुखर्जी के बिना कांग्रेस और मनमोहन सरकार
श्री प्रणब मुखर्जी ने लगभग चार दशकों से सक्रिय राजनीति से मंगलवार को टा टा कर दिया। उन्होंने वित्त मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया. मंगलवार उनके लिए वित्त मंत्रालय में अंतिम दिन था। अब जब प्रणब दा अपने लम्बे राजनीतिक जीवन से विदा होकर राष्ट्रपति भवन से नई पारी शुरू करना चाहते हैं तो उन्हें इस बात का अफसोस जरूर होगा कि वह देश की अर्थव्यवस्था को ऐसे हाल पर छोड़ रहे हैं जब सामने अंधी सुरंग नजर आ रही है। कुछ घंटों पहले ही उन्होंने रिजर्व बैंक की ओर से बड़ा ऐलान किए जाने की घोषणा की थी, मगर रिजर्व बैंक ने जो उपाय घोषित किए हैं, वह न तो आम जनता में और न ही हमारी अर्थव्यवस्था में कोई नया जोश या दिशा दे सके? कारण चाहे जो भी रहे हों, यूपीए-2 सरकार की शुरुआत से ही निरंतर आर्थिक क्षेत्र में भारत पिछड़ता ही चला गया। बाजार और आर्थिक विश्लेषक, आर्थिक सलाहकार सभी कुछ बड़े नीतिगत फैसलों को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं और यह सब तब होता रहा जब वित्त मंत्रालय की कमान प्रणब मुखर्जी जैसे कद्दावर अर्थशास्त्राr के हाथ में रही हो। अब तो उनकी क्षमता पर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल तो यह भी उठ रहे हैं कि यूपीए-2 में संकट मोचन की भूमिका निभाने वाले प्रणब मुखर्जी के सक्रिय राजनीति से हटने के बाद मनमोहन सरकार को कौन चलाएगा? सवाल यह भी कांग्रेस में किया जा रहा है कि प्रणब दा का विकल्प कौन होगा? यूपीए सरकार में विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज से जुड़े 27 मंत्री समूह (जीओएम) है। इनमें 13 जीओएम की अध्यक्षता दादा करते आए हैं। इसके अलावा उच्चाधिकार प्राप्त मंत्रियों के भी समूह (ईजीओएम) हैं। इनमें से 12 ईजीओएम के अध्यक्ष प्रणब रहे हैं। माना जा रहा है कि जीओएम और ईजीओएम की जिम्मेदारियां संबंधित विभागों के कैबिनेट मंत्रियों को सौंपने पर विचार चल रहा है। फिर यह भी देखना है कि प्रधानमंत्री वित्त मंत्री किसको बनाते हैं? इसको लेकर दो-तीन नामों की ही चर्चा तेज रही है। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी दोनों के विश्वासपात्र हैं। लेकिन 2जी घोटाले और उनके चुनावी विवाद को लेकर पहले से ही वह विवादों में हैं। इसके चलते शायद ही उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी जाए। मोंटेक सिंह आहलूवालिया और सी. रंगराजन के नामों की भी चर्चा है। दोनों प्रधानमंत्री के चहेते हैं पर किसी गैर राजनीतिक को यह पद सौंपना शायद खुद कांग्रेसियों को स्वीकार न हो। ऐसे में वाणिज्य मंत्री आनन्द शर्मा की लॉटरी लग सकती है, क्योंकि उन्हें 10 जनपथ और 7 रेस कोर्स रोड दोनों की आशीर्वाद हासिल है। सरकार और पार्टी को सबसे ज्यादा मुश्किल विपक्ष से तालमेल बिठाने की आ सकती है। अकसर प्रणब मुखर्जी ही यह भूमिका निभाते थे। विपक्षी भी उनकी इज्जत, सम्मान करते थे और जो काम प्रणब करवा लेते थे वह कोई और मौजूदा कांग्रेसी करवा पाए इसमें सन्देह है। प्रणब का पार्टी और सरकार से हटना कांग्रेस के लिए एक नई चुनौती है। लोकसभा चुनावों में ज्यादा समय नहीं बचा है। बचा हुआ कार्यकाल ठीक ठाक निकल जाए यह एक चुनौती होगी।
Sunday, 24 June 2012
यह राष्ट्रपति चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहेगा
राष्ट्रपति भवन की रेस में वित्त मंत्री और यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का पलड़ा भारी है पर इस बार का चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रहा है। अंक गणित प्रणब दा के हक में साफ नजर आ रहा है। मतों का कुल मूल्य 10.98 लाख है। प्रणब मुखर्जी को 6.29 लाख वोट मिलने की उम्मीद है और पीए संगमा को 3.10 लाख वोट मिल सकते हैं। इन वोटों में जद (यू) और शिवसेना के वोट प्रणब दा के हक में शामिल हैं। तृणमूल कांग्रेस ने अभी फैसला नहीं किया। संगमा को राजग (जद (यू)-शिवसेना के बिना) 2,43,000। अन्ना द्रमुक और बीजद 67.000 मत मिल सकते हैं। अंक गणित की दृष्टि से यूपीए उम्मीदवार का जीतना लगभग तय है। इस चुनाव को लेकर जहां राजग तार-तार हो गया वहीं वाम मोर्चा भी बंट गया है। फारवर्ड ब्लॉक ने माकपा के समर्थन की घोषणा की जबकि दो अन्य प्रमुख घटक दल भाकपा और आरएसपी ने मतदान से अलग रहने का फैसला किया है। माकपा में भी मतदान से अलग रहने के फैसले पर चर्चा चल रही थी पर मुखर्जी के नाम पर मुहर लगाने वाली लॉबी ने जमीन-आसमान एक कर दिया और बंगाल की प्रतिष्ठा का हवाला देकर प्रणब के हक में वोट देने का फैसला करवा लिया। जहां तक ममता बनर्जी का सवाल है, हमें लगता है कि अब उनके पास दो ही विकल्प बचे हैं या तो वह वोट ही न डालें या फिर संगमा का अंतत समर्थन करें। संगमा तो दावा कर रहे हैं कि ममता का उन्हें समर्थन मिलेगा। हालांकि पीए संगमा कांग्रेस रणनीतिकारों को कोई बड़ी चुनौती नहीं दिख रहे पर दो एक बातें संगमा के पक्ष में जरूर जा सकती हैं। एक तो वह पूर्वोत्तर राज्यों से आते हैं। वह अपने राज्य मेघालय में सीएम तक की कुर्सी पर बैठ चुके हैं। पूर्वोत्तर राज्य जरूर संगमा का समर्थन कर सकते हैं, फिर वह एक ईसाई हैं। ईसाई धर्म से संबंधित होने का लाभ भी संगमा को मिल सकता है। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर पहले संप्रग और फिर राजग और फिर वाम दलों में जैसा बिखराव हुआ है उससे यही स्पष्ट हो रहा है कि राजनीतिक दलों की नजर आगामी लोकसभा चुनावों पर है। फिलहाल यह कहना कठिन है कि राजनीतिक दलों का मौजूदा समीकरण 2014 के लोकसभा चुनाव तक बना रहेगा या नहीं पर इतना तय है कि दोनों संप्रग और राजग की तस्वीर बदल सकती है। जद (यू) अध्यक्ष शरद यादव ने प्रणब दा के समर्थन की घोषणा करते हुए कांग्रेस से दूरी बनाए रखने की भरसक कोशिश भले ही की है, लेकिन सच यह है कि कांग्रेस विरोध के बल पर अपनी राजनीति चलाने वाले अब उसी के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। आखिर कांग्रेस प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने वाला कोई भी दल यह दावा कैसे कर सकता है कि वह सिद्धांतत कांग्रेस के खिलाफ है? अवाम यह जरूर प्रश्न पूछेगी कि आखिर वह कौन-सी परिस्थिति या मजबूरी थी कि जद (यू) ने भाजपा का साथ छोड़ना बेहतर समझा? आम जनता भाजपा से भी सवाल कर सकती है कि मुख्य विपक्षी दल होते हुए भी देश के इस सर्वोच्च पद के लिए पार्टी को अपना कोई सशक्त उम्मीदवार क्यों नहीं मिला? दोनों यूपीए और राजग को नए समीकरणों की तलाश होगी। प्रणब मुखर्जी की जीत तय है पर उनका चुनाव नए समीकरणों का कारण जरूर बन सकता है।
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, Janta Dal (U), Pranab Mukherjee, Sangama, Vir Arjun
Wednesday, 20 June 2012
राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का तीसरा अध्याय
राष्ट्रपति चुनाव का तीसरा अध्याय आरम्भ हो चुका है। यह चुनाव दोनों कांग्रेस गठबंधन और विपक्ष के लिए अपने-अपने कारणों से राजनीतिक चुनौती बन गया है। पहले बात करते हैं एनडीए की। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के चुनाव लड़ने से इंकार करने से एनडीए में अब आपसी फूट का खतरा बढ़ गया है। एनडीए घटक दलों की दो बैठकें हो चुकी हैं पर कोई रणनीति नहीं बन पा रही। इसकी खास वजह यही समझी जा रही है कि भाजपा के दिग्गज नेता भी यूपीए के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के मुकाबले अपना उम्मीदवार उतारने या न उतारने को लेकर पशोपेश में हैं। यह बहस भी जारी है कि अब जब डॉ. कलाम दौड़ से बाहर हो गए हैं तो क्या ऐसे में लोकसभा के पूर्व स्पीकर पीए संगमा को ही अपना समर्थन दे दिया जाए? भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जा रहे हैं। आडवाणी जी कहते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव लड़ना जरूरी होता है, वह यूपीए उम्मीदवार को निर्विरोध नहीं जिताना चाहते। सूत्रों के अनुसार भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी हार की फजीहत से बचने के लिए उम्मीदवार उतारने के पक्ष में नहीं हैं। अरुण जेटली भी गडकरी के साथ हैं। पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने 2007 का इतिहास याद कराया जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत संख्याबल नहीं होने पर भी मैदान में कूद पड़े थे। उम्मीदवार उतारने के लिए आडवाणी, सुषमा की जिद के पीछे सुब्रह्मण्यम स्वामी का तर्प यह भी है कि हमें राष्ट्रपति चुनाव से आगे की सोचनी चाहिए। अगर हम जयललिता, नवीन पटनायक और ममता बनर्जी को यूपीए से दूर कर लेते हैं तो 2014 के लोकसभा चुनाव में हमें एनडीए को फैलाने का अच्छा अवसर मिलेगा। यह भी कहा जा रहा है कि अगर हम चुनाव पर अड़े रहे तो यूपीए हमें शायद उपराष्ट्रपति का पद दे दे? फिर यह भी कहा जा रहा है कि अब तक भारत के प्रेजीडेंट के लिए कोई निर्विरोध नहीं चुना गया, हर जीतने वाले उम्मीदवार को चुनाव लड़ना पड़ा है और चुनाव लड़ने के बाद ही वह रायसीना हिल्स पहुंचा है। हां अब चुनाव में काका जोगिन्दर सिंह धरतीपकड़ सरीखे के तमाशबीनों के लिए कोई जगह नहीं है। आडवाणी बार-बार 1969 के राष्ट्रपति चुनाव का जिक्र कर रहे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए 1969 का चुनाव कई मायनों में अनोखा रहा जब वीवी गिरि और नीलम संजीवा रेड्डी के बीच कांटे का मुकाबला हुआ था। आडवाणी जी ने कहा कि 1969 का राष्ट्रपति चुनाव ऐतिहासिक था और 2012 का यह चुनाव सनसनीखेज है। उन्होंने कहा कि 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील कर हरवाया था। वह एक असाधारण चुनाव था, यह सनसनीखेज चुनाव है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए तय लग रहे मुकाबले में दूसरी वरीयता के वोटों का गणित अहम साबित हो सकता है। अगर संप्रग प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी को दूसरी ओर से कड़ी टक्कर देने वाला कोई मजबूत उम्मीदवार मैदान में उतरता है तो 1969 की तरह राष्ट्रपति तय करने में निर्णायक साबित हो सकता है। अगर समीकरण बहुत नहीं बदलते हैं तो प्रणब और संगमा में टक्कर हो सकती है। मुखर्जी के नाम पर राजग में सहमति न बनना और संगमा का मैदान में डटे रहने की घोषणा द्वितीय वरीयता के गणित को रास्ता दे रही है। हालांकि अभी तक सिर्प एक बार 1969 में द्वितीय वरीयता निर्णायक साबित हुई है। उस समय वीवी गिरि द्वितीय वरीयता की गिनती से चुनाव जीते थे। विपक्ष यदि प्रणब के खिलाफ एकजुट हो जाता है और आदिवासी वर्ग का होने के कारण दूसरी वरीयता में पीए संगमा को क्रॉस वोट मिल जाएं तो मुकाबला रोचक हो सकता है। मसलन 1969 में कांग्रेस के उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी थे और वीवी गिरि निर्दलीय थे। कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी थी। एक पुरानी कांग्रेस, जिसके मुखिया मोरारजी देसाई थे। दूसरी नई जिसकी कर्ताधर्ता इन्दिरा गांधी थीं। राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी व्हिप लागू नहीं होने का फायदा उठाते हुए इन्दिरा जी ने कांग्रेसियों से आत्मा की आवाज पर मत देने की अपील की। नतीजतन वीवी गिरि को दूसरी वरीयता में ज्यादा मत मिले और वह विजयी हुए। कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का विरोध टीम अन्ना भी कर रही है। टीम का कहना है कि राष्ट्रपति बनने से पहले उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। टीम अन्ना के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने रविवार को जोधपुर में कहा कि मुखर्जी देश के संवैधानिक पद के प्रत्याशी हैं, इसलिए जो इस पद पर बैठे, उसकी छवि साफ-सुथरी होनी चाहिए। साल 2005 को नेवी वॉर रूम लीक मामले में प्रणब की भूमिका पर संदेह है। उन पर चावल निर्यात घोटाले के भी आरोप हैं। इन मामलों में उनकी भूमिका की जांच होनी चाहिए। समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह ने सफाई दी है कि उन्होंने कांग्रेस से कोई डील नहीं की। डील तो दलाल लोग करते हैं। मुलायम कहते हैं कि अगर ममता सोनिया गांधी से मिलने के बाद यह घोषणा नहीं करतीं कि कांग्रेस दो नामों को आगे बढ़ा रही है, प्रणब मुखर्जी और हामिद अंसारी, तो सोनिया गांधी कुछ और ही खेल खेल सकती थीं। अगर 13 जून को 10 जनपथ जाने के पहले तक तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी को ही नहीं मालूम था कि किस उम्मीदवार पर कांग्रेस दाव लगाना चाहती है तो फिर किसको पता था? सोनिया गांधी द्वारा बताए गए दो नामों प्रणब मुखर्जी और हामिद अंसारी को ममता जाहिर नहीं करतीं तो इस पर रहस्य ही बना रहता। 2007 में सोनिया गांधी ने अंतिम समय में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का नामांकन कर यह संदेश दे दिया था कि वे किस प्रकार के व्यक्ति को राष्ट्रपति भवन देखना चाहती हैं। सम्भव था कि अगर ममता कांग्रेस की पसंद को सार्वजनिक नहीं करतीं तो अंतिम समय में सोनिया मीरा कुमार या हामिद अंसारी का नाम घोषित कर देतीं। मुलायम ने कहा कि हम तो हमेशा से प्रणब को चाहते थे पर सोनिया को प्रणब पर विश्वास नहीं था। इस बार राष्ट्रपति चुनाव को लेकर दिन-प्रतिदिन दृश्य बदल रहा है। कुछ भी दावे से कहना मुश्किल है। अभी समय है और भी अध्याय सामने आ सकते हैं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Elections, Hamid Ansari, Mamta Banerjee, Meera Kumar, Pranab Mukherjee, President of India, Sangama, Sonia Gandhi, Vir Arjun
Sunday, 17 June 2012
राष्ट्रपति चुनाव दंगल का दूसरा अध्याय
अगर बृहस्पतिवार का दिन ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव के नाम रहा तो शुक्रवार का दिन निश्चित रूप से सोनिया गांधी के नाम रहा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ममता की चुनौती स्वीकार रकते हुए प्रणब मुखर्जी को यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित कर दिया। यही नहीं, शाम होते-होते मुलायम सिंह यादव अपनी आदत के अनुसार पलटी खा गए और उन्होंने प्रणब के समर्थन की घोषणा कर दी। बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी यूपीए उम्मीदवार के समर्थन की औपचारिक घोषणा कर दी। अंक गणित के हिसाब से प्रणब मुखर्जी का पलड़ा भारी है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुल मत हैं 10,98,882। बहुमत के लिए 5,49,442 वोट चाहिए। संप्रग के पास अब संप्रग+सपा+बसपा+राजद अगर जोड़े जाएं तो 5,71,644 वोट बन जाते हैं जबकि राजग के पास कुल 3,04,785 वोट ही रह जाते हैं। इसलिए आंकड़ों के अनुसार और घोषित समर्थन पोजीशन के बाद श्री प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति बनना तय है। हालांकि ममता बनर्जी अभी भी कह रही हैं कि खेल अभी बाकी है, आगे देखिए होता है क्या? कांग्रेस पार्टी की अब कोशिश है कि प्रणब दा का चयन सर्वसम्मति से हो जाए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रणब के नाम की घोषणा होने के बाद लोकसभा में प्रतिपक्ष नेता सुषमा स्वराज को फोन करके भाजपा का समर्थन मांगा, सोनिया गांधी ने भी घोषणा स्पीच में सभी सांसदों, विधायकों से सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुनने की अपील की। वैसे कहीं बेहतर होता कि कांग्रेस प्रणब दा के नाम की घोषणा से पहले तमाम विपक्ष को विश्वास में लेती। सर्वसम्मति का मतलब होता है कि मिलकर उम्मीदवार का चयन करें न कि आप पहले चयन कर लें और बाद में सर्वसम्मति की बात करें। कांग्रेस ने पूरे मामले में मिसहैंडलिंग की है। उसने राष्ट्रपति पद का मजाक बना दिया है। आज सारा देश दुनिया भारत में सर्वोच्च पद के लिए हो रहे दंगल को देख रहा है। किसी भी शासन प्रणाली में नीतिगत मर्यादा का पालन किया जाना आवश्यक है। इसकी जिम्मेदारी सर्वाधिक सत्तापक्ष की होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक मर्यादाओं की निर्धारण संविधान में ही कर दिया जाता है। दुर्भाग्य तो यह है कि ऐसी संवैधानिक मर्यादाओं का व्यवस्था को चलाने वाले खुद ही उसका उल्लंघन कर रहे हैं। देश की आजादी के बाद पहली बार राष्ट्रपति पद को लेकर इस तरह का दंगल देखने को मिल रहा है। जैसे कि भानुमति के कुनबे में भूकम्प आ गया हो। देश के महामहिम जैसे सर्वोच्च पद के लिए इतनी उठापटक राष्ट्र की राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती। जब से राजनीति में क्षेत्रीय दलों की सहभागिता बढ़ी है तब से देश की जनता की भावनाओं का बलात्कार व स्वार्थ सिद्धि के लिए ब्लैकमेलिंग का सिस्टम चल पड़ा है। आज जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि व पार्टियां अपने-अपने राज्यों के लिए `पैकेज' सिस्टम मिलने पर समर्थन देने की कवायद में जुटे हैं, नेताओं की निजी महत्वाकांक्षाएं स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं पर भारी पड़ती नजर आ रही हैं। संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति देश की विधायिका और कार्यपालिका का प्रधान होता है। बिना उसके हस्ताक्षर के कोई भी विधेयक कानून का रूप नहीं ले सकता। उसी के नाम पर केंद्र सरकार के सारे कामकाज निपटाए जाते हैं पर यह सिर्प अलंकारित सत्य है। सब कुछ तो राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के कहने पर करता है। कायदेनुसार राष्ट्रपति को दलगत राजनीति से ऊपर होना चाहिए। सभी दलों का कर्तव्य होता है कि उसे सबसे ऊपर राष्ट्र के संवैधानिक मुखिया के तौर पर देखें और सम्मान दें। मर्यादा यह कहती है कि राष्ट्रपति वह व्यक्ति हो जो सभी दलों को मान्य हो, जिसकी निष्पक्षता पद की गरिमा व मर्यादा सभी मानें। तात्विक रूप से देखा जाए तो किसी एक नाम पर सहमति होने में किसी भी पार्टी का कोई नफा-नुकसान नहीं है पर सियासत के खेल में राजनीतिक अहंकार व निजी स्वार्थ सिर चढ़कर बोल रहा है। कुल मिलाकर देखा जाए तो श्री प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति पद के लिए सही व्यक्ति हैं। उनका लम्बा अनुभव, काबलियत खुद मुंह से बोलती है। कांग्रेस के संकटमोचक कहे जाने वाले प्रणब दा की सरकार और कांग्रेस पार्टी को कमी जरूर खलेगी। अभी 2014 का चुनाव दूर है। प्रणब दा को ऊपर धकेलने के पीछे भी कारण है। प्रधानमंत्री उन्हें वित्त मंत्रालय से हटाना चाहते थे पर उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कैसे हटाएं? यह किसी से छिपा नहीं कि प्रणब दा और सोनिया गांधी में भी रिश्ते मधुर नहीं। सोनिया उन पर विश्वास नहीं करतीं। फिर कुछ विदेशी ताकतें भी प्रणब से नाराज रहती थीं, उद्योगपति भी खुश नहीं थे। इसीलिए एक तीर से कई शिकार करने की कांग्रेस ने कोशिश की है। प्रणब का चयन इसलिए भी किया गया, क्योंकि कांग्रेस का आंकलन था कि हामिद अंसारी, एपीजे अब्दुल कलाम से जीत नहीं सकते। दूसरा अध्याय निश्चित रूप से सोनिया गांधी और कांग्रेस के नाम रहा। दंगल जारी है। 30 जून तक कई और करवटें ले सकती है भारत की राजनीति।
Anil Narendra, APJ Abdulkalam, Congress, Daily Pratap, Elections, Hamid Ansari, Pranab Mukherjee, President of India, Trinamool congress, Vir Arjun
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Saturday, 16 June 2012
राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय
यूपीए ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं निवर्तमान वित्त मंत्री का नाम तो घोषित कर दिया, उनके राष्ट्रपति चुने जाने में संदेह भी कम है किन्तु एक बात तो स्पष्ट है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की अविश्वसनीयता एक बार फिर जगजाहिर हो गई है। पिछले दो दिनों से ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव की जुगलबंदी ने ऐसा पेंच फंसा दिया था कि कांग्रेस चारों खाने चित हो गई थी। कांग्रेस ने कभी उम्मीद नहीं की होगी कि ममता-मुलायम ऐसा पासा चलेंगे कि जिससे पार्टी के सारे समीकरण ही बदल जाएंगे। देखा जाए तो ममता ने एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश की थी। यह वही मुलायम सिंह यादव हैं जिन्हें कुछ दिन पहले यूपीए-2 का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड पेश करने के लिए सरकार के प्रमुख मंत्रियों के साथ मंच पर खड़ा किया गया और रिपोर्ट को जारी किया गया था। ममता ने कांग्रेस से बदला लेने की कोशिश की थी। कांग्रेस ने यह चेतावनी देने की कोशिश की थी कि ममता आपके पास लोकसभा के 19 सांसद हैं तो हम समाजवादी पार्टी को गले लगाकर उनके 22 सांसदों का समर्थन पा सकते हैं, आप अपनी औकात में रहो। ममता ने एक झटके में कांग्रेस को उसकी औकात दिखाने की कोशिश की। अपने पैनल में सोमनाथ चटर्जी का नाम शामिल करके ममता ने यह भी जता दिया कि वह बंगालियों के खिलाफ नहीं हैं। प्रणब मुखर्जी का समर्थन इसलिए भी करने को ममता को मजबूर किया जा रहा था क्योंकि प्रणब बंगाली हैं और बंगाली होने के नाते ममता उनका समर्थन करने पर मजबूर होंगी पर ममता ने यहां भी कांग्रेस को मात दे दी और सोमनाथ चटर्जी का नाम लेकर इस आलोचना से भी अपने आपको बचा लिया। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की पसंद को खारिज करके ममता-मुलायम ने जो पासा फेंका था वह भले ही मुलायम सिंह की वजह से असफल हो गया किन्तु वह आने वाले दिनों में नए ध्रुवीकरण को जन्म देगा। अंतिम समय में जिस ढंग से दोनों नेताओं ने गुगली फेंकी थी उससे कांग्रेस की न सिर्प परेशानी ही बढ़ी थी बल्कि राष्ट्रपति चुनाव को बहुत पेचीदा बना दिया था। दरअसल राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम लेना एक सोची-समझी रणनीति का परिचायक है। कांग्रेस के अन्दर भी एक ऐसा धड़ा है जो मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से हटाना चाहता है। मनमोहन सिंह का नाम सुझाना एक तरह से संप्रग सरकार के इन दोनों समर्थक दलों द्वारा प्रधानमंत्री में अविश्वास प्रकट करने के समान है। मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी के लिए एक बोझ बन चुके हैं, वह एसेट कम लाइबिलिटी ज्यादा हैं। सभी जानते हैं कि मनमोहन को हटाना इस समय कांग्रेस के लिए सम्भव नहीं है पर ममता-मुलायम ने पंगा जरूर फंसा दिया है। दोनों ने सोनिया गांधी को यह भी स्पष्ट संदेश दे दिया था कि इस मामले में किसी भी निर्णय तक पहुंचने में तृणमूल और सपा की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। ममता और कांग्रेस में तल्खी बढ़ी है। एक कांग्रेसी सांसद अधीर चौधरी ने तो ममता की तुलना मीर जाफर से ही कर दी क्योंकि उन्होंने एक बंगाली (प्रणब मुखर्जी) का विरोध किया है। ममता के इस व्यवहार को सोनिया गांधी भूल नहीं सकतीं, इसलिए दोनों महिलाओं में एक ऐसी दरार पड़ गई है जिसे पाटना आसान नहीं होगा। ममता भी बहुत गुस्से में हैं।
यह तो पहले ही आशंका थी कि मुलायम यूपीए सरकार के सामने सीना तानकर खड़े होने की हैसियत में नहीं हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह कांग्रेस को झटका दिया उससे एक बात तो साफ है कि उनके भरोसे कोई पार्टी या गठबंधन अपनी रणनीति तय नहीं कर सकता।
मुलायम तो तब झुके जब उन्हें लगा कि आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ तलवार लटक रही है और जुलाई में ही कांग्रेसी वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई है तो उन्होंने ममता को गच्चा दे दिया। लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट हो गया है कि ममता की नाराजगी यूपीए से बनी रहेगी जो किसी हद तक जा सकती है।
बहरहाल कांग्रेस को यूपीए घटक दलों एवं बाहर से समर्थन दे रही पार्टियों का प्रणब मुखर्जी के पक्ष में समर्थन तो हासिल हो गया और अब वह चाहेगी कि उसे एनडीए भी समर्थन दे दे ताकि उसके उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए जाएं किन्तु लगता है कि अभी राष्ट्रपति चुनाव तक बहुत सारी राजनीतिक उठापटक होनी है। क्योंकि ममता ने कोलकाता पहुंच कर ऐलान कर दिया कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। मतलब यह कि राष्ट्रपति चुनाव के दंगल का पहला अध्याय ही खत्म हुआ है आगे महादंगल बाकी है।
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, Congress, Daily Pratap, Mamta Banerjee, Mulayam Singh Yadav, Pranab Mukherjee, President of India, Samajwadi Party, Sonia Gandhi, UPA, Vir Arjun
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Tuesday, 12 June 2012
क्या प्रणब मुखर्जी अगले राष्ट्रपति होंगे?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 12 June 2012
अनिल नरेन्द्र
रायसीना हिल्स पर स्थित राष्ट्रपति भवन में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के बाद कौन? यह आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है। तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं पर अब समय आ गया है कि यूपीए अपना उम्मीदवार घोषित करे। राष्ट्रपति पद के लिए वोटों का आंकड़ा कुछ इस तरह का है कि सोनिया गांधी की पसंद भी इस बार चलेगी। प्राप्त संकेतों से लग रहा है कि श्री प्रणब मुखर्जी सोनिया गांधी के पसंदीदा उम्मीदवार हो सकते हैं। खुद प्रणब दा भी लगता है कि राष्ट्रपति बनना चाहते हैं। उन्हें लग रहा है कि इस यूपीए-2 सरकार का भविष्य ज्यादा उज्ज्वल नहीं है। अगले चुनाव तक उनकी उम्र भी 80 के लपेटे में हो जाएगी और इस बात की सम्भावना भी ज्यादा नहीं लग रही कि कांग्रेस फिर सत्ता में आएगी इसलिए उन्हें बेहतर लग रहा है कि वह राष्ट्रपति भवन ही चले जाएं। अगर प्रणब राष्ट्रपति उम्मीदवार होते हैं तो कांग्रेस के सहयोगी दलों को भी एतराज नहीं होगा। विपक्षी दल भी उनके नाम पर सहमति दे सकते हैं। प्रधानमंत्री भी अपना वित्त मंत्री बदलना चाहते हैं। अगले चुनावों में अगर जोड़-तोड़ की सरकार बननी है तो भी कांग्रेस की दृष्टि से प्रणब दा पार्टी के लिए लाभदायक हो सकते हैं। चुनाव आयोग की ओर से बुधवार तक राष्ट्रपति चुनाव के लिए नोटिफिकेशन जारी किया जा सकता है। कांग्रेस सूत्रों की मानें तो नोटिफिकेशन के तुरन्त बाद पार्टी उम्मीदवार का ऐलान सोनिया गांधी कर सकती हैं। डीएमके नेता स्टालिन ने गुरुवार को कहा कि राष्ट्रपति पद के लिए यूपीए उम्मीदवार के बारे में डीएमके ने एके एंटनी को बता दिया है। डीएमके, शरद पवार, अजीत सिंह सभी ने दादा के नाम पर सहमति दे दी है। रहीं ममता बनर्जी तो उनकी पहली पसंद लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार हैं पर बंगाली होने के नाते ममता भी अंतत प्रणब का समर्थन कर देंगी, क्योंकि अगर एक बंगाली रायसीना हिल्स आएगा तो बंगाल की शान बढ़ेगी। दूसरी तरफ इस सरकार का दो साल का कार्यकाल बचा है। प्रणब दा सरकार के संकट मोचन साबित हुए हैं। उन्होंने अनेक बार सरकार की फजीहत होने से बचाया है। ऐसे संवेदनशील वक्त में जब भारत की अर्थव्यवस्था दबाव में है, संकट के दौर में है, प्रणब के कैबिनेट से हटने से कामकाज पर असर पड़ेगा। नए वित्त मंत्री को सक्रिय होने में वक्त लग सकता है। साथ ही सरकार के पास इस पद के लिए फिलहाल कोई मजबूत विकल्प भी तो नहीं है। प्रधानमंत्री खुद यह पद सम्भाल सकते हैं। पी. चिदम्बरम को गृह मंत्रालय से हटाकर वित्त मंत्रालय में ला सकते हैं। रंगराजन को वित्त मंत्री बना सकते हैं इत्यादि-इत्यादि पर यह काम आसान नहीं होगा। यह किसी से छिपा नहीं कि सोनिया गांधी और प्रणब मुखर्जी के आपसी संबंध ज्यादा अच्छे नहीं हैं। प्रणब कभी भी सोनिया के करीबी नहीं रहे। राजीव गांधी का साथ छोड़ने का दुख अब तक कहीं न कहीं सोनिया गांधी को जरूर है। ऐसे में प्रणब सोनिया के स्वाभाविक पसंद शायद नहीं होंगे। मौजूदा राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकाल 24 जुलाई को पूरा हो रहा है। प्रणब मुखर्जी के अलावा कुछ और नाम भी दौड़ में हैं। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, श्री मोती लाल वोरा, डॉ. कर्ण सिंह कांग्रेस से हैं और एनसीपी नेता पीए संगमा भी अपनी दावेदारी पेश करने के लिए खूब भागदौड़ कर रहे हैं। इसके अलावा टुकड़ों में गैर-राजनीतिक हस्तियों की दावेदारी की बात भी सामने आई है। देखें सोनिया गांधी की पसंद कौन होता है।Anil Narendra, Daily Pratap, Hamid Ansari, Pranab Mukherjee, Pratibha Patil, President of India, Vir Arjun
Saturday, 28 April 2012
अगले राष्ट्रपति की रेस शुरू हो चुकी है
बजट सेशन के दूसरे सत्र की शुरुआत के साथ ही राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। देश के सर्वोच्च पद पर इस बार कौन बैठेगा? राजनीतिक दलों ने अभी से एक-दूसरे को टटोलना शुरू कर दिया है। पार्टियां राष्ट्रपति चुनाव को अपने शक्ति प्रदर्शन का लिटमस टेस्ट मान रही हैं। वर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकाल जुलाई के अंतिम हफ्ते में पूरा हो रहा है। फरवरी-मार्च महीने में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम और फिर उसके ठीक बाद 58 राज्यसभा सीटों के लिए एक साथ चुनाव होने के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे। राजनीतिक परिणाम गैर कांग्रेस, गैर बीजेपी दलों के पक्ष में अधिक रहे और इससे थर्ड फ्रंट की दिशा में काम कर मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी जैसे नेता सक्रिय हो गए। वहीं एनसीपी नेता शरद पवार ने भी संकेत दिया है कि वे भी अपनी बात मजबूती से रखेंगे। तथाकथित थर्ड फ्रंट के नेताओं को सक्रिय होते देख दोनों कांग्रेस और भाजपा भी अब अपनी-अपनी पसंद आगे बढ़ाने में जुट गए हैं। कांग्रेस हाई कमान ने यूपीए के उम्मीदवार को ही रायसीना हिल्स पहुंचाने की मुहिम का आगाज कर दिया है। यह शुरुआत सोनिया गांधी ने एनसीपी नेता शरद पवार से की है। भले ही कांग्रेस के उम्मीदवार के नाम पर कोई खुलासा नहीं हुआ है, मगर कयास है कि `नम्बर गेम' देखते हुए प्रणब मुखर्जी कांग्रेस का चेहरा हो सकता है। कांग्रेस जानती है कि उनके नाम पर गैर एनडीए दलों को भी राजी किया जा सकता है। अगर सपा, बसपा, तृणमूल का साथ कांग्रेस को मिल जाता है तो कांग्रेस अपना उम्मीदवार जिता सकती है। किसी कांग्रेसी उम्मीदवार पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को ही यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने का बैकअप प्लान तैयार है। भारतीय जनता पार्टी की पहली पसंद पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम हो सकती है। इस मसले पर भाजपा ने अपने घटक दलों के साथ गैर यूपीए अन्य सियासी दलों का मन टटोलने की प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू कर दी है। भाजपा कलाम के अलावा किसी दूसरे नाम पर उसी सूरत में विचार करेगी जब उसे जीतने के लिए जरूरी समर्थन उनके नाम पर मिलता नजर नहीं आए। राष्ट्रपति चुनाव की घड़ी को भले ही समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव बहुत दूर बता रहे हों, लेकिन पार्टी अपना होमवर्प पूरा करने में जुटी हुई है। 2014 में लोकसभा की चुनावी जंग पर नजर रखते हुए सपा पूरी शिद्दत के साथ मुस्लिम उम्मीदवार की खोज कर रही है। इसी क्रम में मुलायम के निर्देश पर सपा के दो आला नेताओं ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी से गुप्त मुलाकात की थी। दूसरी ओर सपा की पसंदीदा सूची में अब्दुल कलाम का नाम लगभग बाहर हो चुका है। कुरैशी के साथ हामिद अंसारी के नाम पर भी सपा में गम्भीरता से विचार चल रहा है। कांग्रेस में और भी कई नाम चल रहे हैं। एक धड़ा लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को जाति के समीकरणों को देखते हुए आगे बढ़ा रहा है और डॉ. कर्ण सिंह, सुशील शिंदे, फारुख अब्दुल्ला और सैम पित्रोदा जैसे नाम भी उछाले जा रहे हैं। रेस आरम्भ हो चुकी है। फिलहाल यह भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि भारत का अगला राष्ट्रपति कौन होगा।
Anil Narendra, APJ Abdulkalam, BJP, Congress, Daily Pratap, Hamid Ansari, Mulayam Singh Yadav, Pranab Mukherjee, President of India, Samajwadi Party, Vir Arjun
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Saturday, 24 March 2012
क्या मनमोहन, प्रणब और मोंटेक सिंह 28 रुपये में गुजारा कर सकते हैं?
योजना आयोग पता नहीं कौन-सी दुनिया में रहता है। आयोग की गरीबी की नई परिभाषा तो गरीबों का मजाक उड़ाने जैसा है। योजना आयोग के अनुसार गांव में 22.42 रुपये और शहरों में 28.65 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। अगर वह गरीब नहीं तो जाहिर-सी बात है कि वह अमीर है। पिछले साल सितम्बर में योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर गरीबी का जो मानक पेश किए थे उसको लेकर काफी होहल्ला मचा था। उस वक्त गरीब का जो पैमाना तैयार किया गया था उसके अनुसार शहरों में 32 रुपये और गांव में 28 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं माना गया था। आर्थिक विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों के हंगामे पर सरकार गरीबी के नए मानक तैयार करने को राजी हो गई थी। लेकिन सोमवार को गरीबी के जो नए मानक पेश किए वह तो पिछली बार से भी ज्यादा बेतुका और अविश्वसनीय है। सवाल है कि जो व्यक्ति गरीब है उसे मानने में सरकार क्यों हिचकिचा रही है? संसद से लेकर सड़क तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष और मनमोहन सिंह के चहेते मोंटेक सिंह आहलूवालिया (जिन्हें प्रधानमंत्री वित्त मंत्री बनाना चाहते थे) निशाने पर हैं। योजना आयोग के ताजे आंकड़े बता रहे हैं कि देश में गरीबों की संख्या घट गई है और शहरों में जिसकी जेब में 28 रुपये हैं तो वह गरीब नहीं है। इन अजीबोगरीब आंकड़ों पर संसद में भाजपा हो या वाम दल, सभी ने सरकार और मोंटेक सिंह को आड़े हाथों लिया। भाजपा के एसएस आहलूवालिया ने तो यहां तक कह दिया कि क्या प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री रोजना 28 रुपये में गुजारा कर सकते हैं? उन्होंने कहा कि मैं नहीं जानता कौन-सी लाइन खींची जा रही है। 28 रुपये के रोजाना के खर्च को आधार मानकर गरीबी रेखा तय करना ठीक नहीं है। यह गरीबी रेखा नहीं, भुखमरी रेखा है। जद (यू) सांसद शिवानन्द तिवारी ने आरोप लगाया कि योजना आयोग, विश्व बैंक के इशारों पर काम कर रहा है। जद (यू) के शरद यादव ने बुधवार को उस विषय पर बोलते हुए कहा कि योजना आयोग के नए मानदंडों को देश के गरीबों का कूर मजाक है। आयोग के उपाध्यक्ष (मोंटेक सिंह आहलूवालिया) जब भी बोलते हैं तो देश में हाहाकार मच जाता है और महंगाई बढ़ जाती है। योजना आयोग में ऐसे व्यक्ति को बैठाया जाए जो वर्ल्ड बैंक का पूर्व कर्मचारी न होकर जमीनी हकीकत से वाकिफ हो। शरद यादव ने कहा कि मेरी सरकार से विनती है कि योजना आयोग को इस व्यक्ति (मोंटेक सिंह) से छुटकारा दिलाए या योजना आयोग को बन्द कर दें। सुषमा स्वराज ने कहा कि योजना आयोग को क्या दोष देना, दोष तो सरकार का है जो स्वीकार करती है रिपोर्ट। आयोग ने पहले भी उड़ाया था मजाक। रघुवंश प्रसाद सिंह की टिप्पणी भी इन्हीं लाइनों पर थी। गरीबों के साथ इस तरह का मजाक गरीबी उन्मूलन संबंधी योजनाओं पर खड़ा करता है सवाल। मुलायम सिंह यादव ने कहा, `लिखा-पढ़ा नहीं होगा वास्तविक आकलन, इसके लिए दूरदराज गांवों में जाकर देखनी होगी हकीकत।' अगर वास्तविकता तौर पर देखा जाए तो देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रही है। सरकार ने जल्द ही नया खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने की बात कही है। इस कानून के तहत देश के हर गरीब को दो रुपये प्रति किलो गेहूं और तीन रुपये प्रति किलो चावल दिया जाना है। ऐसे में देश की आधी से ज्यादा आबादी को रियायती दरों पर गेहूं-चावल मुहैया कराने से सरकार पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ जाएगा। इसीलिए सरकार गरीबों की संख्या कम करके दिखाना चाहती है। इसके अलावा एक वजह यह भी हो सकती है कि सरकार अपने आर्थिक सुधारों की नीति की सार्थकता सिद्ध करने के लिए भी गरीबों की संख्या कम करके दिखाने का प्रयास कर रही है। जिस हिसाब से इस सरकार की आर्थिक नीतियां चल रही हैं उससे तो अगर खाद्य वस्तुओं की कीमतें सिर्प 10 फीसद बढ़ती हैं तो मेरे भारत महान में तीन करोड़ नए लोग गरीबी रेखा के नीचे आ जाएंगे। हमारा सुझाव है कि हमारे तथाकथित अर्थशास्त्राr मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, मोंटेक सिंह और सी. रंगराजन जैसे दर्जनों इस सरकार के आर्थिक विशेषज्ञ देश के दूरदराज गांवों का दौरा करें और देखें कि आज गरीब आदमी किस परिस्थिति में जीने पर मजबूर है। ऐसा करने के बाद तय करें गरीबों की परिभाषा। ताजी परिभाषा बकवास है, गरीबी से जलों पर नमक छिड़कने समान है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Manmohan Singh, Montek Singh Ahluwalia, Poverty, Pranab Mukherjee, Vir Arjun
Sunday, 11 December 2011
महंगाई की बहस में सुषमा व प्रणब दा की नोकझोंक
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 11th December 2011
अनिल नरेन्द्र
संसद चलते ही विपक्ष ने महंगाई के मोर्चे पर मनमोहन सरकार पर करारा हमला बोल दिया। इस मुद्दे पर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज का भाषण महत्वपूर्ण था। उनके और वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के बीच नोकझोंक भी महत्वपूर्ण रही। यह देखकर अच्छा लगा कि भारत की जनता की सबसे बड़ी समस्या पर दोनों,विपक्ष और सरकार जागरूक हैं और जनता को इससे निजात दिलवाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। सुषमा स्वराज व अन्य विपक्षी नेताओं ने महंगाई पर चर्चा में सरकार की नीतियों, नीयत, वादों और इरादों की धज्जियां उड़ा दीं। बहस की शुरुआत माकपा नेता गुरुदास दासगुप्ता ने की,लेकिन सरकार पर करारा हमला सुषमा ने बोला। जब प्रणब मुखर्जी ने महंगाई दर 11.8 फीसदी से घटकर 6.6 फीसदी आने की बात कही तो सुषमा ने कहा रेहड़ी, बेड़ी और छाबड़ी वाले फीसदी की भाषा नहीं समझते, उन्हें बस यह पता होता है कि कितना पैसा आता है और जाता है। तीखा कटाक्ष करते हुए सुषमा ने कहा कि इस सरकार का अमीरी का पैमाना तो पाव भर आटा, दो तोला दाल, एक चम्मच तेल और एक चुटकी नमक है। देश के 121 करोड़ लोगों को तो दो वक्त की रोटी चाहिए। इसके लिए उनके पास 242 करोड़ हाथ हैं, लेकिन ब्याज दर बढ़ाकर महंगाई घटाएंगे तो इन हाथों का काम जरूर छिन जाएगा। उन्होंने कहा कि राजग के शासन में वित्तमंत्री फीसदी में बजट नहीं देते थे। हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को हार्वर्ड और आक्सफोर्ड वाले नहीं समझ सकते। उन्होंने कहा कि अमेरिका के सामने छवि सुधारने से सुधार नहीं होता,उसके लिए गरीब आदमी की आमदनी सुधरनी चाहिए। मूल्य वृद्धि के लिए सरकार की गलत नीतियों और भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराते हुए सुषमा ने कहा कि अगर सरकार जनता को राहत देने की बजाय निराशा एवं हताशा की बात करती है तो उसे सत्ता से हट जाना चाहिए। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के साथ हुई नोकझोंक में सुषमा ने पलटवार करते हुए कहा कि आंकड़ेबाजी से भूखी जनता का पेट नहीं भरता है। शुक्रवार को भी प्रणब और सुषमा के बीच महंगाई पर नोकझोंक जारी रही। गुरुवार को सुषमा ने प्रणब से कहा था कि पेट आंकड़ों से नहीं भरता,दानों से भरता है। इसके लिए आम आदमी को जद्दोजहद करनी पड़ रही है। शुक्रवार को प्रणब ने विपक्ष खासकर भाजपा पर पलटवार करते हुए कहा कि समय अब (इमोशनल) बातों का नहीं, काम करने का है। अगर महंगाई कम करनी है तो विपक्ष को साथ मिलकर काम करना होगा। वह महंगाई घटाने का कोई सुझाव क्यों नहीं देता? आर्थिक मामलों में सहयोग क्यों नहीं करता?प्रणब दा ने कहा कि क्या विपक्षी नेता चाहते हैं कि हम तेल कम्पनियों पर इतना घाटा थोप दें कि वे एक दिन बन्द हो जाएं। सुषमा से बात करने के लहजे में प्रणब ने कहा कि विपक्ष के लोग खुलकर बताएं कि वे चाहते क्या हैं। वे चाहते हैं कि सब्सिडी बढ़ाई जाए या सब्सिडी कुछ सेक्टरों तक ही सीमित रहे। सरकार जो कर रही है वह उन्हें मंजूर नहीं है। अगर मंजूर नहीं है तो वे सरकार को बताएं कि क्या करना है? बेशक यह सही है कि अगर विपक्ष के पास कुछ ठोस सुझाव हों तो वह सरकार को जरूर दे पर हम प्रणब दा को बताना चाहेंगे कि सरकार चलाना, नीतियां तय करना, जनता को राहत पहुंचाना सरकार का काम है, विपक्ष का नहीं। आज वह अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती। अगर सरकार गम्भीर है तो सबसे पहले अमेरिका परस्त प्रधानमंत्री और उनके सिपहसालार योजना आयोग के अध्यक्ष की नीतियों को ठुकरा दे और उनकी जगह प्रणब दा आप खुद नीतियां बनाएं। आप इन दोनों से कहीं ज्यादा बेहतर अर्थशास्त्रा हैं और राजनेता हैं जो आम आदमी के दुःख-दर्द को बेहतर समझते हैं। अर्थशास्त्रा प्रधानमंत्री ने तो देश का अर्थशास्त्र ही बिगाड़कर रख दिया है।
Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Pranab Mukherjee, Sushma Swaraj, Vir Arjun
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Thursday, 8 December 2011
एफडीआई पर रोल बैक या होल्ड बैक स्थिति स्पष्ट नहीं
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 8th December 2011
अनिल नरेन्द्र
एफडीआई पर स्थिति अभी भी साफ नहीं है। दरअसल मनमोहन सिंह सरकार की नीयत साफ नहीं है। पहले तो ममता बनर्जी से कह दिया कि आप इसको होल्ड पर रखने की घोषणा कर दो पर जब विपक्ष इस बात पर अड़ गया कि सरकार को घोषणा करनी चाहिए न कि एक सहयोगी दल को तो वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, भाजपा के वरिष्ठ नेता एलके आडवाणी और माकपा सांसद सीताराम येचुरी सहित विपक्ष के नेताओं से चर्चा कर बताया कि मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत एफडीआई का फैसला `होल्ड' कर लिया गया है। सभी दलों की सहमति के बाद ही उस पर कोई अंतिम फैसला किया जाएगा यानि कुल मिलाकर सरकार ने इसे वापस नहीं लिया है, होल्ड पर रखा है। रोल बैक नहीं किया है। अरुण जेटली ने मंगलवार को कहा कि भाजपा एफडीआई मुद्दे पर रोल बैक के लिए कोई ढील नहीं देगी। जेटली ने कहा एफडीआई से किसानों, छोटे दुकानदारों और आम लोगों के हितों पर सिर्प विदेशी कम्पनियों का फायदा होगा। एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि बीजेपी सुधार के पक्ष में है, लेकिन ऐसा भी सुधार नहीं चाहिए, जिसमें हित ही नहीं देखा जाए। इस प्रस्ताव के पीछे विदेशी दबाव लग रहा है और हम किसी भी सूरत में इसका समर्थन नहीं करेंगे, क्योंकि इससे भारत के बाजार चीन में बने सस्ते सामान से लद जाएंगे। उधर सीपीएम ने कहा कि होल्ड करने से कोई हल नहीं निकलेगा। पार्टी तब तक इसका विरोध करती रहेगी जब तक इसे वापस नहीं ले लिया जाएगा। माकपा महासचिव प्रकाश करात ने प्रेस कांफ्रेस में कहा कि सरकार की मंशा संसद के शीतकालीन सत्र के बाद इसे लागू करने की है, लेकिन इसे पूरा नहीं होने दिया जाएगा। सरकार पहले इस प्रस्ताव को रद्द करे तभी संसद चल पाएगी।एफडीआई का प्रस्ताव होल्ड पर हो या बोल्ड हो दोनों ही सूरत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह व्यक्तिगत हार है और वह एक बार फिर बुरी तरह एक्सपोज हो गए हैं। अपने इतने वर्षों के कार्यकाल में बतौर पीएम मनमोहन सिंह ने केवल दो मुद्दों पर अपना सब कुछ दाव पर लगाया था। पहली थी अमेरिका से न्यूक्लियर डील और दूसरा यह एफडीआई का प्रस्ताव। प्रधानमंत्री बार-बार यह कहते रहे कि यह प्रस्ताव किसी भी हालत में वापस नहीं होगा, अगर ऐसा हुआ तो सरकार की साख पर धब्बा लगेगा। राजनीतिक क्षेत्रों में यह आम संकेत जा रहा है कि मनमोहन सिंह सरकार ने रिटेल में एफडीआई का फैसला अमेरिकी दबाव में लिया था और इसकी वजह यह है कि भारतीय बहुराष्ट्रीय लॉबी इसी मामले पर काम कर रही थी ताकि इस चालाकी भरी चाल को अमली जामा पहनाया जा सके। इसमें कोई शक नहीं कि वाणिज्य मंत्री आनन्द शर्मा इस मामले को लागू करने के लिए एक ऐसी ही ताकत के रूप में काम कर रहे हैं जिसका इस मामले पर एक खास लॉबी से रिश्ता है। एफडीआई पर कैबिनेट के फैसले के ऐलान करने के शीघ्र बाद वह चेन्नई रवाना हो गए। उन्होंने अपने स्टाफ को एक खास मल्टी नेशनल कम्पनी से सम्पर्प कराने और साथ ही इस निर्णय के समर्थन में किसानों की प्रतिक्रिया जानने के लिए एक आयोजन कराने को भी कहा। यह सब तब पता चला जब एक टीवी चैनल ने अगले ही दिन पंजाब में कुछ किसानों की बाइट्स दिखाई जो इस निर्णय को लेकर अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे। इन किसानों ने सब्जियों के रेट मार्केट की तुलना में ज्यादा मिलने के लिए मल्टी नेशनल कम्पनियों की तारीफ भी की। जनता में यह सन्देश जा रहा है कि मनमोहन सिंह और उनके मंत्री अमेरिका और भारतीय उद्योगपतियों के लिए काम कर रहे हैं। वह इनके हितों को देश की जनता के हितों से ऊपर रख रहे हैं। देखना अब यह है कि इस मुद्दे पर मनमोहन सिंह का अंतिम फैसला क्या होता है, रोल बैक या होल्ड बैक?
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Sunday, 4 December 2011
मनमोहन ने अपनी सरकार, पार्टी व देश को दाव पर लगा दिया है
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Published on 4th December 2011
अनिल नरेन्द्र
क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी देश और संसद का ध्यान ज्वलंत मुद्दों, भ्रष्टाचार, महंगाई, ब्लैक मनी से हटाने के लिए यह खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का मुद्दा लाए हैं? माकपा नेता सीताराम येचुरी तो कम से कम यह मानते हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि सरकार संसद की कार्यवाही में बाधा को जानबूझ कर जारी रख रही है। यह लोकपाल, भ्रष्टाचार, महंगाई आदि मुद्दों पर चर्चा और बहस से बचने की राजनीति का एक हिस्सा है। यह दिन-ब-दिन साफ होता जा रहा है कि सरकार इस सत्र में कामकाज नहीं होने देना चाहती। येचुरी की इस दलील में कुछ दम है। यह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है पर जहां तक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का इस रणनीति में शामिल होने का सवाल है, हमें नहीं लगता कि वह ऐसा करने को अपनी हामी दे सकती हैं। अंदरुनी खबर तो यह है कि सोनिया गांधी व राहुल गांधी मनमोहन सिंह की इस हठधर्मिता से सख्त नाराज हैं। एफडीआई मुद्दे पर फंसी मनमोहन सिंह सरकार को सोनिया गांधी ने उसके हाल पर छोड़ दिया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक दो दिन पहले हुई कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में सोनिया गांधी उस समय झल्ला गईं जब प्रधानमंत्री ने पूरा मामला सोनिया पर छोड़ना चाहा। डॉ. मनमोहन सिंह ने तो दो टूक कहा कि सरकार संसद में मतदान का सामना करे या फिर एफडीआई पर फैसला ले। इस पर पहले से ही नाराज चल रहीं सोनिया गांधी ने कहा कि जब केंद्र को एफडीआई पर निर्णय लेना था तो उनसे क्यों नहीं पूछा गया था और जब स्वयं अपने विवेक पर उन्होंने (प्रधानमंत्री ने) यह फैसला लिया है तो फिर उनको (प्रधानमंत्री) ही इस संकट से निपटना चाहिए। डॉ. मनमोहन सिंह पता नहीं क्यों अपना और अपनी सरकार व पार्टी का सब कुछ इस मुद्दे को लेकर दाव पर लगाने पर तुले हुए हैं। बार-बार वह यह दोहराते नहीं थकते कि अगर उन्होंने एफडीआई को वापस लिया या रोल बैक किया तो उनकी सरकार की साख घटेगी। उन्होंने सरकार के सहयोगी दलों तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के नेताओं से मुलाकात कर कहा कि इस पर वह अपनी जिद्द छोड़ दें, क्योंकि कोई भी फैसला वापस लेने से सरकार की विश्वसनीयता कम होती है। हम डॉ. मनमोहन सिंह से पूछना चाहते हैं कि आपकी और सरकार की विश्वसनीयता है कहां जो कम होगी? आप इतनी-सी बात नहीं समझ रहे कि आज पूरा देश आपके इस निर्णय के खिलाफ है और सड़कों पर उतर आया है। 22 नवम्बर से शुरू हुए संसद के शीतकालीन सत्र में एक दिन भी कामकाज नहीं हुआ है। अगर हम विभिन्न राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, उड़ीसा, प. बंगाल, केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड और उत्तराखंड एफडीआई के विरोध में हैं। सिर्प दिल्ली, आंध्र, अरुणाचल, राजस्थान, हरियाणा, मिजोरम, मणिपुर असम, गोवा और महाराष्ट्र (कांग्रेस शासित) राज्य ही इसके हक में हैं। अगर हम लोकसभा में सांसदों की बात करें तो कुल 543 में से 278 सांसद विरोध में हैं। इनमें भाजपा (115), अकाली दल (4), सपा (22), बसपा (21), जद (यू) (20), तृणमूल (18), लेफ्ट (24), द्रमुक (18), बीजद (14), अन्ना द्रमुक (9), शिवसेना (11) और तेदेपा (6) सांसद। सरकार के साथ कांग्रेस के 207 और एनसीपी के 9 सांसद हैं। अगर कल को वोटिंग की नौबत आई तो कुछ भी हो सकता है। सरकार गिर भी सकती है। प्रधानमंत्री पता नहीं यह क्यों नहीं समझ रहे कि उनके साथ तो उनके गठबंधन सहयोगी भी नहीं हैं। प्रधानमंत्री की तमाम कोशिशों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने दो टूक कह दिया है कि उनकी पार्टी इस फैसले का समर्थन नहीं कर सकती। हालांकि ममता ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी संप्रग सरकार को गिराने के पक्ष में नहीं है। तृणमूल कांग्रेस ही क्यों, हमें नहीं लगता कि कोई भी विपक्षी दल इस समय संप्रग सरकार को गिराने में दिलचस्पी रखता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कोई भी दल देश को मध्यावधि चुनाव में घसीटना नहीं चाहेगा। हां, पर सरदार मनमोहन सिंह ने अपनी जिद्द को पूरा करने के लिए पूरे देश को, अपनी सरकार व अपनी पार्टी को दाव पर जरूर लगा दिया है। यह कहावत है न `सनम हम तो डूबेंगे तुम्हें साथ ले डूबेंगे' फिट बैठती है। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है वह दिन-रात लोकसभा में आंकड़े पूरे करने में लग गई है। कल को अगर वोटिंग की नौबत आए तो सरकार को बचाने के लिए उसके पास पर्याप्त सांसद संख्या होनी चाहिए और यह नौबत केवल एक आदमी की हठधर्मिता के कारण आएगी।Anil Narendra, Bhanwri Devi, CBI, Daily Pratap, Mhipal Maderna, Rajasthan High Court, Sex, Sex Scandal, Vir Arjun
Wednesday, 30 November 2011
सरकार को रिटेल में एफडीआई का फैसला टाल देना चाहिए
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Published on 30th November 2011
अनिल नरेन्द्र
रिटेल क्षेत्र में खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की मंजूरी का मुद्दा मनमोहन सिंह सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक सिरदर्द बन गया है। संसद से लेकर सड़कों तक सरकार को एफडीआई को लेकर तीखे विरोध का सामना करना पड़ रहा है। यूपीए सरकार के मल्टी ब्रांड रिटेल में 57 फीसदी और सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी की इजाजत देकर कैबिनेट ने ऐसी मुसीबत मोल ले ली है कि कांग्रेस के विरोधी तो एक तरफ इस सरकार के कुछ सहयोगी भी इसके खिलाफ लामबंद हो गए हैं। हमें तो यह समझ नहीं आया कि ऐसे समय जब यह सरकार महंगाई, ब्लैक मनी, विदेशों में जमा पैसों को वापस लाने, जन लोकपाल की समस्याओं से घिरी हुई थी तो उसे इसी समय यह एफडीआई का मसला लाना था? सरकार की टाइमिंग पर हैरानी हो रही है। पहले से भ्रष्टाचार, घोटालों, महंगाई के मोर्चे पर संप्रग सरकार की नाकामियों का असर उसकी अगुवाई कर रही कांग्रेस की सेहत पर भी पड़ने लगा है। सरकार के फैसलों के चलते एक के बाद एक नई दिक्कत के पैदा होने से कांग्रेस पार्टी के माथे पर भी बल पड़ने लगा है। पार्टी के लिए सबसे बड़ी परेशानी अगले साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। पंजाब और उत्तराखंड में तो अगले दो-तीन महीने के भीतर चुनाव हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य में चुनाव हैं, जिसमें पार्टी की हार-जीत पर महासचिव राहुल गांधी का बहुत कुछ दाव पर लगा हुआ है। हमें समझ नहीं आया कि प्रधानमंत्री ने यह कैसे सोच लिया कि बिना तैयारी के, होमवर्प किए इतने बड़े कदम को उठाया जाए? इसलिए अचरज फैसले पर नहीं बल्कि इस फैसले के टाइमिंग पर है कि विरोधियों की बारिश के बीच सरकार ने रिटेल की पतंग उड़ाने का जोखिम उठाया है। भारत का (संगठित व असंगठित) खुदरा कारोबार यकीनन बहुत बड़ा है। 2008-09 में कुल खुदरा बाजार 17,594 अरब रुपये का था। यह 2004-05 के बाद से औसतन 12 फीसदी सालाना बढ़ रहा है और 2020 तक 53,517 अरब रुपये का हो जाएगा। नाबार्ड की रिपोर्ट बताती है कि संगठित रिटेल करीब 855 अरब रुपये का है। इसमें 2000 फुट के छोटे स्टोर (सुमिक्षा मॉडल) से लेकर 25,000 फुट तक के मल्टी ब्रांड हाइपर मार्केट (बिग बाजार, स्पेंसर, ईजीडे, रिलायंस) आदि आते हैं। खुदरा कारोबार में तेज ग्रोथ के बावजूद संगठित रिटेल इस अरबों के बाजार में पिछले एक दशक में केवल पांच फीसदी हिस्सा ले पाया है। मगर इस पांच फीसदी हिस्से ने करीब एक करोड़ रोजगार पैदा किए हैं, जो 2020 तक बढ़कर 1.84 करोड़ हो जाएंगे। खुदरा बाजार में विदेशी कम्पनियों का खौफ पुराना है। छोटे देशों में, भीमकाय वॉलमार्ट, चतुर ट्रेस्को और आक्रामक कार्पू जैस रिटेल दिग्गजों के असर की कहानियों से यह डर और बढ़ जाता है क्योंकि संगठित रिटेल अगर उपभोक्ताओं की सुविधा और बेकारों को रोजगार के फूल देता है तो बदले में असंगठित व छोटे व्यापारियों के कारोबार को कांटों में घेर देता है। भारत के मामले में इस खतरे को कुछ तथ्यों के तहत रखने की जरूरत है। भारत में कुल रिटेल का करीब 61 फीसदी हिस्सा खाद्य उत्पादों (अनाज, दाल, फल-सब्जी, दूध, चाय, कॉफी, अण्डा, चिकन, मसाले) के खुदरा कारोबार का है। यह करीब 11,000 अरब रुपये बैठता है। इस कारोबार पर असंगठित क्षेत्र का राज है। रिटेल को लेकर उपभोक्ताओं के व्यवहार को नाबार्ड के एक ताजा सर्वेक्षण में करीब से पकड़ा गया है। देश के 23 शहरों में विभिन्न आयु व आय वर्ग के उपभोक्ताओं के बीच हुआ यह सर्वेक्षण बताता है कि महानगरों में करीब 68 फीसदी अनाज, दाल, मसाले (ग्रोसरी) और 80 से 90 फीसदी फल-सब्जियां, दूध, मीट, अण्डे आदि छोटी दुकानों से खरीदे जाते हैं। दूसरे दर्जे के शहरों में यह प्रतिशत 79 (ग्रोसरी) और 92 से 98 (फल-सब्जियां, दूध आदि) के बीच है अर्थात् रिलायंस, बिग बाजार, स्पेंसर ईजीडे जैसे बड़े विकेता खाद्य उत्पादों के मामले में उपभोक्ताओं का दिल नहीं जीत पाए हैं। खाद्य उत्पादों का कुल कारोबार में संगठित रिटेल दो फीसदी से भी कम है। नाबार्ड के सर्वे के मुताबिक असंगठित विकेता उपभोक्ताओं के घर से औसतन 280 मीटर की दूरी पर स्थित है जबकि संगठित क्षेत्र की दुकानों की पूरी औसतन डेढ़ किलोमीटर है। संगठित रिटेल से महंगाई घटेगी ऐसा भी नहीं लगता। बेशक कुछ मुल्कों में ऐसा हुआ हो पर हमें नहीं लगता कि भारत में इसका महंगाई पर कोई खास असर पड़ेगा। ज्यादातर रिटेलरों की खरीद स्थानीय मंडियों, थोक व्यापारियों, एजेंटों के जरिये होती है और यहां कीमतें कम करने की खास गुंजाइश नहीं होती। इसलिए खाद्य उत्पादों के मामले में संगठित व असंगठित क्षेत्र की कीमतों में कोई फर्प नहीं होता। यही वजह है कि भारतीय उपभोक्ताओं का 60 फीसदी उपयोग खर्च और इस खर्च पर हावी महंगाई को रिटेल क्रांति से कोई मदद नहीं मिली। किसानों को भी इसका कोई बड़ा फायदा नहीं हुआ, क्योंकि भंडारण व आपूर्ति का ढांचा गैर हाजिर है।देश के मध्यम और छोटे शहरों में रेहड़ी-ठेला लगाने, फल-सब्जी बेचने वाले छोटे दुकानदार और किसान अपने भविष्य को लेकर अगर चिंतित हैं तो उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के खुदरा कारोबार से करीब साढ़े तीन करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है और अगर एक परिवार में पांच सदस्य को भी आधार माना जाए तो 18 करोड़ लोग इस खुदरा कारोबार पर आधारित हैं। सरकार के लिए इनकी वैकल्पिक व्यवस्था एक बहुत बड़ा सवाल है। इन प्रश्नों के बावजूद मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार अपने फैसले पर अडिग है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के भीतर और बाहर तीखे विरोध के बावजूद सोमवार को प्रधानमंत्री निवास पर कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि सरकार एफडीआई पर कैबिनेट के फैसले को वापस नहीं लेगी। प्रधानमंत्री निवास पर हुई इस बैठक में सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, आनन्द शर्मा और अहमद पटेल मौजूद थे। राजनीतिक विरोध के चलते रिटेल में विदेशी दुकानें खोलना आसान नहीं दिख रहा है। पश्चिम बंगाल, यूपी के बाद तमिलनाडु द्वारा विदेशी दुकानों की अनुमति नहीं देने की घोषणा से विरोधी राज्यों की संख्या 28 हो गई है। जिन राज्यों ने एफडीआई का खुलकर विरोध किया है उनमें प्रमुख हैंöउत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़। भाजपा, अन्ना द्रमुक, द्रमुक, वाम दल, समाजवादी पार्टी व तृणमूल कांग्रेस सभी इसका विरोध कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह एफडीआई के मुद्दे को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाए और अपने फैसले को टाल दे। अभी इस मुद्दे पर बहस बहुत जरूरी है। इसके फायदे-नुकसान का सही आंकलन होना चाहिए तभी यह स्वीकार्य होगा। केवल संसद में ही नहीं पूरे देश में इस पर सहमति होना जरूरी है।
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Saturday, 19 November 2011
Beware, threat is looming large
Afif Ahsen
India's economy is considered to be among world's fifteen largest economies. Following liberalization and economic reforms policy in 1991, development in India took on wings and India emerged as an economic super power in the world. Prior to reforms, especially Indian industry and business was reeling under government control. In the beginning, reforms were severely opposed, but the protest petered down to large extent after beneficial results of these reforms were visible. But there is still a large section, which has not been benefited with these reforms and is not happy with the reforms.
India's current account balance of payment has been negative since independence. Under the pressure of the balance of payment crisis, in the wake of economic reforms of 90s, Indian exports witnessed an increasing trend. Country's export during 2002-03 was 80.3 %, whereas it was only 66.2% in 1990-91. It, however, came down to 61.4 % only following the great recession in world trade due to global economic crisis. India's constant and fast increasing oil import bill is considered to be an important factor behind the widening current account deficit, which increased to 118.7 billion $ or 9.7% of GDP in 2008-09. India imported crude oil worth 82.1 billion $ during January to October 2010.
India's exports and imports registered a decline of 29.2% and 39.2% respectively during June 2009 due to the global recession towards the end of 2000. This sharp decline was due to the fact that US and EU countries were the most affected by the global financial markets, whose share in Indian exports amounted to more than 60%. But fortunately there were considerable decline in imports in comparison to the exports and due to this India's fiscal deficit was reduced to 25,250 crores of rupees. The decline in oil prices also played an important role in this. In view of worldwide recession, FII started to invest in India with the objective of exploring better sources of income and the resultant decline in exports was, to a large extent was compensated by FDI.
But, after US announcement of increasing the loan accepting limits, FII has started withdrawing its money from India and investing it in US, which has resulted in constant increase in price of dollar vis-à-vis rupee and foreign exchange reserve is constantly shrinking.
According to an RBI report, foreign exchange reserve was 15,43,811 crore rupees in week ending 11th November 2011, which is 20,642 crore rupees less than previous week. Today, the rupee is at the lowest level vis-à-vis dollar in the last 30 months. It appears that a phase of recession has set in, in the Indian economy, which is clearly reflected by the 1.9% decline in industrial production, which is quite high in comparison to two years' decline. This decline in Industrial Production Index for September is quite high to the strong 6.1% for September last year. During this financial year, the Industrial Production Index was stationary at 5% during April to September, where it was 8.2% during the same period of last year. Principal Economic Adviser, Kaushik Basu said that IPI for September are subject of grave concern and he says that global economic situation is responsible for this. Commenting on IPI for September, released on Friday, General Secretary, FICCI, Rajiv Kumar said that the outlook for industrial development has worsen during last few months. Businesses have been adversely influenced by the uncertainty of the economic environ and the negative development in capital goods and non-durable goods sectors reflects the mistrust of consumers. There have been decline of 6.8% in capital goods sector. Negative development has been registered in the readymade garments and textile sector during last few months.
This will adversely affect jobs in the country, as after agriculture, this is the biggest sector providing employment to people. It appears that the reason for this biggest decline in two years is due to increase in interest rates by RBI and unbridled inflation, which has resulted in decline in purchasing power of people. It is surprising that this has happened immediately after the festival season, during which it was expected of people to spend more.
Tax collection by the government has also gone down considerably due to lesser industrial production and increase in production cost. Petrol-prices are being increased daily. This is being done with a view to directly increase the government revenue, resulting in the increase in government's income. Meanwhile, Moody has down-graded the ratings of Indian banks. Reacting irresponsibly, the government has said that this rating is meaningless, as domestic loan provider is in a better position in comparison to its global colleagues. He is not worried. We are not influenced by this downgrading. In view of performance of global banks, we are quite strong and ratings have no meaning for us. Secretary, Financial Services, DK Mittal said that Moody has said that increase in the recession in domestic and foreign economies has been influencing the capitalization of Banks' assets standard and profits. Moody has said in the report that in view of quality, we fear the situation will worsen within next 12 to 18 months. Thus there will be increase in problems of banks during 2012 and 2013 financial years.
Senior BJP leader and former Finance Minister, Yashwant Sinha has expressed concern over country's economic situation. BJP has announced its decision to demand debate in both the Houses on deteriorating economic condition of the country. Expressing dis-satisfaction and concern over industrial development statistics released by the government, Yashwant Sinha said that there is hardly a thing in our economy which could make us happy. He said that condition of our economy is causing concern and the revenue deficit declared in the statistics released by the government, is far from the budget target. He said that if we compare industrial development of this period of last year, with that of April, then we will see that there has been decline of more than five per cent. The former Finance Minister said that on one side the condition of our economy is very grave, while on the other hand our Prime Minister is certifying good work to Heads of the States of other countries.
In an advisory tone, the former Finance Minister has said that the nation expects Prime Minister would call a press conference and explain the country about the economic health of the country. Our country is reeling under grave industrial crisis and our government is not cutting unnecessary and unessential expenditure. It is possible that no road has been constructed in your village, but in cities a single road is being constructed again and again during a year. Old footpaths are demolished and new ones are constructed. Old parks are re-developed, new memorials of departed leaders are constructed, not only departed, but statues of living leaders are installed and whenever the issue of spending on very essential heads comes up, then every government, whether it is state government of the central government, shakes off its responsibility and starts lamenting for the paucity of funds. Our government is lacking funds for its own needs, but it is trying to please other countries and promising them large-hearted aid.
Manmohan Singh has declared aid for Maldives and Pranab Mukherjee is talking of helping Europe and of pulling them out of crisis. In order to improve its financial condition, the government is also trying to get the additional cash reserves with public undertakings transferred to it, so that it can meet its expenses. If the government does not awake to the situation, it appears the country would head from bad to worse and then India will have to face the situation, that is prevailing in US and Europe.
In a couplet, Vasim Barelavi says first priority is to save the house, its decoration comes at a later stage. This fits to the present situation of the country.
Saturday, 8 October 2011
अगला लोकसभा चुनाव कांग्रेस राहुल के नेतृत्व में लड़ेगी
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Published on 8th October 2011
अनिल नरेन्द्र
अब यह साफ होने लगा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी युवराज यानि राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। श्री दिग्विजय सिंह तो बहुत पहले से ही कहते आ रहे हैं कि राहुल गांधी को अब देश की बागडोर सम्भाल लेनी चाहिए पर अब तो मनमोहन सिंह सरकार के नम्बर दो मंत्री व वरिष्ठतम नेता प्रणब मुखर्जी ने कह दिया है कि लोकसभा का अगला चुनाव कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ेगी। पार्टी ने इसके लिए अपनी तैयारी पूरी कर ली है। प्रणब मुखर्जी ने राहुल का नाम आगे करके यह भी जता दिया है कि वह प्रधानमंत्री रेस में शामिल नहीं हैं। यह पता नहीं कि उन्होंने अपने मन से कहा या हालात देखकर दुःखी मन से या फिर खुंदक में। बहरहाल कारण जो भी हो, प्रणब दा का यह कहना बहुत महत्व रखता है। प्रणब के यह कहने के अगले ही दिन पार्टी प्रवक्ता राशिद अल्वी ने इसे आगे बढ़ाते हुए कहा कि राहुल गांधी कांग्रेस का भविष्य है और कांग्रेस देश का भविष्य। अल्वी ने कहा कि 42 वर्षीय राहुल गांधी कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं और तमाम युवा नेताओं में से सबसे कद्दावर। राहुल की ताजपोशी इसलिए भी अब सम्भव लगती है, क्योंकि बेशक श्रीमती सोनिया गांधी की सफल सर्जरी हो गई है और वह ठीक लग रही हैं पर यह बीमारी ऐसी है कि यह सोनिया को चैन से जीने नहीं देगी। स्वास्थ्य के कारण सोनिया की पार्टी गतिविधियों में सक्रियता घटनी ही है। राहुल को आगे करने में पार्टी को यह भी फायदा होगा कि देश का तमाम युवा कांग्रेस के प्रति राहुल के कारण आकर्षित हो सकता है। इस घटनाक्रम से एक और बात उभर कर आती है। वह है निवर्तमान प्रधानमंत्री, डॉ. मनमोहन सिंह की कारगुजारी से पार्टी प्रसन्न नहीं है। मनमोहन सिंह का अपने मंत्रिमंडल पर ही कंट्रोल नहीं, देश को वह क्या कंट्रोल करेंगे। उनके नम्बर दो और तीन में भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ है। उनके दाहिने हाथ को यह नहीं मालूम कि उनका बायां हाथ क्या कर रहा है। एक के बाद एक घोटाले के पर्दाफाश होने के बाद आज कांग्रेस की छवि धरातल पर है। इसे उभारने के लिए कांग्रेस को पार्टी में भारी सर्जरी करने की जरूरत है। केवल राहुल को प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने से काम नहीं चलेगा। राहुल को अपनी टीम खड़ी करनी होगी। इस टीम को आने वाले दिनों में अपनी पोजीशन ग्रहण करनी होगी। यह काम शुरू भी हो चुका है। इस क्रम की शुरुआत पीएमओ पर अपना कंट्रोल करने से हो चुकी है। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधान सचिव के पद पर पुलक चटर्जी की ताजपोशी और पिछले सात सालों से प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव रहे टीके नायर की विदाई और कई अन्य वरिष्ठ अफसरों का कार्यकाल पूरा होने के बाद विदाई होने से न केवल नए चेहरे ही सामने आएंगे बल्कि पीएमओ का एक नया रूप, काम करने का ढंग, सोच भी सामने आएगी। सबसे बड़ी बात कि दस जनपथ का पीएमओ पर फुल कंट्रोल होगा। पुलक चटर्जी दस जनपथ के करीबी विश्वास पात्र हैं, इसलिए उनके काम में कोई हस्तक्षेप या प्रधान सचिव की कोई भी शक्ति यदि नायर को दी गई तो दस जनपथ इसका विरोध करेगा, क्योंकि पुलक को पीएमओ में लाने वाला दस जनपथ ही है। टीके नायर से वैसे भी कांग्रेसी नाखुश थे। 2जी स्पेक्ट्रम मामले पर वित्त मंत्रालय के नोट के संबंध में जिसे बनाने में नायर की बड़ी भूमिका थी। लगता है कि अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव राहुल के लिए ट्रायल के रूप में देखे जाएंगे। इसका मतलब है कि चुनावों तक सोनिया गांधी संगठन की बागडोर धीरे-धीरे राहुल को सौंप देंगी। हाल ही में अपनी बीमारी के दौरान उन्होंने टेस्ट केस के तौर पर राहुल को पार्टी की कमान सौंपी थी। राहुल की उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अग्निपरीक्षा होगी। उनको मिशन 2012 में कितनी सफलता मिलती है इस पर भी कांग्रेस की नजरें टिकी होंगी। कुल मिलाकर अब यह साफ होता जा रहा है कि राहुल गांधी कांग्रेस के अगले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे।2G, Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Pranab Mukherjee, Rahul Gandhi, Vir Arjun
Sunday, 2 October 2011
सोनिया की पहल पर प्रणब-चिदम्बरम में युद्ध विराम
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Published on 2nd October 2011
अनिल नरेन्द्र
मनमोहन सिंह सरकार में चल रही उठापटक को रोकने के लिए अंतत पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को मोर्चा सम्भालना ही पड़ा। संकट मोचक के तौर पर सामने आईं सोनिया गांधी फौरी तौर पर वर्तमान संकट टालने में कामयाब हो गई हैं। लेकिन यह सिर्प फौरी तौर पर है, क्योंकि एक साथ फोटो खिंचवाने से प्रणब मुखर्जी और पी. चिदम्बरम के मतभेद समाप्त होने से रहे। प्रणब दा इन दिनों बहुत नाराज चल रहे हैं। दादा इतने गुस्से में क्यों हैं कि न्यूयार्प में उन्होंने प्रधानमंत्री से त्याग पत्र तक देने की धमकी दे डाली? इसके जवाब में दादा समर्थक कह रहे हैं कि उन पर शक किया गया, नोट प्रकरण को इस तरह से पेश किया गया मानों उन्होंने ही वह जानबूझ कर नोट बनवाया था और फिर उसे लीक करवाया। पार्टी और सरकार के अन्दर सवाल यह भी फैलाए गए कि नोट बनाने की जरूरत क्या थी, जब नोट बन रहा था तो उसी वक्त उसकी भाषा पर गौर क्यों नहीं किया गया, नोट को आगे पीएमओ तक जाने क्यों दिया गया, उसी समय पार्टी नेतृत्व को क्यों नहीं बताया गया? अंदरुनी चर्चाओं के मुताबिक यह सवाल पूछे जा रहे हैं और यह प्रणब दा के हक में जा रहे हैं। यह नोट प्रणब दा की पहल पर नहीं बना। कैबिनेट सैकेट्रिएट, पीएमओ, टेलीकॉम और लॉ मिनिस्ट्री के अफसरों की पहल पर वह आंकलन हुआ और नोट बना। इतने विभागों के अफसर जिस मामले में शामिल हों, उसे कोई भी मंत्री कैसे रोक सकता है और क्यों रोकना चाहिए? यदि प्रणब इस नोट को रोकते या दबाते तो आज खुद भी सवालों के घेरे में आते? यह भी कि एक आरटीआई के जवाब में इस नोट की कॉपी प्रधानमंत्री कार्यालय के एक बड़े अधिकारी की इजाजत से दी गई। कॉपी देने से पहले वित्त मंत्रालय या वित्त मंत्री से पूछा तक नहीं गया और अब जब सब कुछ हो चुका है प्रणब मुखर्जी पर सारा गुनाह थोपा जा रहा है। इस हालत में उन्हें गुस्सा क्यों न आए?अपना मानना है कि यह मामला अभी समाप्त नहीं हुआ। चिदम्बरम की मुश्किलों का अंत नहीं हुआ है। सोनिया के प्रयासों से मामला थमा है, समाप्त नहीं हुआ। प्रणब मुखर्जी ने नोट कैसे तैयार हुआ, किस-किस मंत्रालय से गुजरा, इसका ब्यौरा तो दिया है पर नोट में जो लिखा गया है वह तो झूठ नहीं है। नोट में जो लिखा है उससे चिदम्बरम कटघरे में खड़े हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, जेपीसी में भी अलग से चल रहा है। वहां भी तो इस नोट का संज्ञान लिया जाएगा। आज चिदम्बरम पार्टी के अन्दर अलग-थलग पड़े हैं। उनका समर्थन कांग्रेस पार्टी में इतना शायद नहीं है जितना डीएमके से उन्हें मिल रहा है। वह करुणानिधि के मुख्य प्रतिनिधि इस समय कांग्रेस में काम कर रहे हैं और डीएमके की मुश्किलें कम होने नहीं जा रही हैं। न केवल दयानिधि मारन के खिलाफ सीबीआई नया केस दर्ज करने की तैयारी कर रही है बल्कि 2जी स्पेक्ट्रम केस में सीबीआई ने तिहाड़ जेल में बन्द ए. राजा, उनके पूर्व सचिव चंदोलिया और तत्कालीन टेलीकॉम सचिव सिद्वार्थ बेहुरा के खिलाफ आईपीएस की धारा 409 के तहत मामला चलाने की दलील कोर्ट में दी है। सीबीआई का आरोप है कि इस मामले में राजा और अन्य के खिलाफ जनता के साथ विश्वासघात करने का आपराधिक मामला बनता है। अगर यह आरोप साबित हुआ तो उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। जाहिर है कि इससे द्रमुक खुश तो होने से रहा। उधर राजा ने कोर्ट में चिदम्बरम से बतौर गवाह पूछताछ करने की मांग की है। कटु सत्य तो यह है कि यह मामला खत्म नहीं हुआ है और पार्टी में लगातार यह कहा जा रहा है कि चिदम्बरम की भूमिका पर कोई फैसला सुप्रीम कोर्ट का रुख ही तय करेगा। पीएम और सोनिया गांधी के निर्देश पर सरकार की छवि बचाने के लिए भले ही प्रणब-चिदम्बरम साथ-साथ खड़े होने पर राजी हो गए, लेकिन ऐसा करने में दोनों में हिचक बाकी थी और अब भी है। प्रणब चिदम्बरम से तब से नाराज चल रहे हैं जब से उन्होंने वित्त मंत्रालय की जासूसी करवाई। वह किस्सा प्रणब मुखर्जी भूले नहीं हैं। अब भी चिदम्बरम वित्त मंत्रालय में दखलअंदाजी से बाज नहीं आ रहे। दो दिन पहले उन्होंने एक कार्यक्रम में यह कहा कि अमीर ज्यादा टैक्स भरने के लिए तैयार रहें। सवाल उठता है कि क्या यह मामला गृह मंत्रालय से जुड़ा है? क्या यह वित्त मंत्री के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं है?
2G, Anil Narendra, Daily Pratap, Manmohan Singh, P. Chidambaram, Pranab Mukherjee, Sonia Gandhi, Vir Arjun
Wednesday, 28 September 2011
अब क्या होगा आगे ः नजरें सुप्रीम कोर्ट पर
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 28th September 2011
अनिल नरेन्द्र
देश के लिए कितने दुःख की बात है कि अमेरिका में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से 2जी घोटाले पर प्रश्न पूछे जा रहे हैं। सारी दुनिया में घोटालों की इस सरकार ने पूरे देश की इज्जत मिट्टी में मिला दी है। पता नहीं दुनिया भारत के बारे में क्या सोचती होगी? इधर देश में इस सरकार की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। 2जी घोटाले में रोज नई परतें खुलती जा रही हैं और जैसे-जैसे नए रहस्योद्घाटन हो रहे हैं, पता चल रहा है कि इस घोटाले की ऊपर से नीचे तक सबको खबर थी पर किसी ने भी इसे रोकने की कोशिश नहीं की। बेशक प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री वर्तमान और भूतपूर्व खुद घोटाले में शामिल न भी रहे हों पर इससे तो अब वह भी इंकार नहीं कर सकते कि सब कुछ उनकी जानकारी और कुछ हद तक स्वीकृति से हुआ। प्रधानमंत्री बेशक तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम को क्लीन चिट दे रहे हों और कह रहे हों कि उन्हें गृहमंत्री पर पूरा भरोसा है पर इससे अब बात बनने वाली नहीं। 2जी घोटाले पर पूरी तरह घिर चुकी सरकार के संकटमोचकों के उपाय अब खत्म होने लग हैं। सरकार के शीर्ष नेतृत्व को अब इस घोटाले के जाल से बचाने के लिए यह सिद्ध करना जरूरी है कि पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के फैसले से देश के खजाने को किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ। बीते सप्ताह अदालत के सामने पेश टीआरएआई की रिपोर्ट इसी कोशिश का हिस्सा थी जो औंधे मुंह गिर पड़ी। घोटाले की जांच कर रही संयुक्त समिति भी इसी निष्कर्ष की दिशा में कोशिश कर रही है। राजा के फैसलों में सरकार के शीर्ष नेतृत्व की सहमति को साबित करने वाले तमाम दस्तावेजी सुबूत देश व अदालत के सामने हैं। ए. राजा के निर्णयों से राजस्व के नुकसान का पहलू यदि कानूनी तौर पर साबित हो जाता है तो फिर प्रधानमंत्री व तत्कालीन वित्त मंत्री इस हानि की परोक्ष जिम्मेदारी से शायद ही बच सकें। लाइसेंस लेने वाली एक कम्पनी एस टेल की एक चिट्ठी सरकार के लिए मुसीबत बनेगी। प्रधानमंत्री को मालूम था कि कम्पनियां 2जी स्पेक्ट्रम की ऊंची कीमत देने को तैयार हैं। नवम्बर 2007 में सीधी मनमोहन सिंह को लिखी चिट्ठी में एस टेल ने स्पेक्ट्रम के लिए 6000 करोड़ रुपये का राजस्व देने की पेशकश की थी। कम्पनी ने बाद में इसे बढ़ाकर 13752 करोड़ रुपये तक कर दिया। बाजार से इन संकेतों के बावजूद राजा ने स्पेक्ट्रम को कम कीमत पर बेचा और पीएमओ इस फैसले में राजा के साथ खड़ा रहा। स्पेक्ट्रम में कुल कितना घाटा हुआ या घपला हुआ इस नुकसान की गणना में कैग ने एस टेल की चिट्ठी में प्रस्तावित कीमत को ही प्रमुख मुद्दा बनाया है। राजा के फैसले से प्रधानमंत्री और तब के वित्त मंत्री की अनभिज्ञता का तर्प बिखर गया है। राजा के फैसलों से भ्रष्टाचार तो स्पष्ट है अलबत्ता इस फैसले से राजस्व के नुकसान का तर्प अभी विवादों में है। कैग 1,76,000 करोड़ रुपये का नुकसान का निष्कर्ष दे चुकी है जिसे सरकार ने नकार दिया है। सूत्र बताते हैं कि ताजा जानकारी के बाद यह साबित करने की अंतिम कोशिश होगी कि 2001 की कीमतों पर 2008 में स्पेक्ट्रम बेचने से खजाने को कोई नुकसान नहीं हुआ था। यही अंतिम रास्ता है जिससे भ्रष्टाचार का ठीकरा ए. राजा के सिर फूटेगा और सरकार के शीर्ष नेतृत्व देश का नुकसान कराने की तोहमत से बच सकेगा। वैसे सीबीआई ने राजा पर भ्रष्टाचार का जो मामला बनाया है उसमें यह दर्ज है कि संचार मंत्री के फैसलों से देश को करीब 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। सीबीआई को पूर्व संचार मंत्री व अन्याय पर अभियोग के लिए यह साबित करना होगा कि राजा के फैसलों से खजाने को भारी चपत लगी है। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर लगी हैं। देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की स्पेक्ट्रम में भूमिका की जांच को लेकर क्या निर्णय लेती है। यूपीए और कांग्रेस एक अभूतपूर्व संकट में फंसी हुई है जिसका फिलहाल तो कोई तोड़ नहीं निकल पा रहा है। कांग्रेस केवल इस बात से चिंतित नहीं है कि चिदम्बरम पर हमला किया जा रहा है बल्कि उसकी असली चिंता भाजपा की प्रधानमंत्री को लपेटने की योजना से है। यदि भाजपा एक बार चिदम्बरम के खिलाफ जांच शुरू करवाने में सफल हो गई तो इस जांच की आंच अपने आप प्रधानमंत्री तक पहुंच जाएगी। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई है। देखें अदालत में क्या होता है?2G, A Raja, Anil Narendra, CAG, Corruption, Daily Pratap, Manmohan Singh, P. Chidambaram, Pranab Mukherjee, Prime Minister, Scams, Supreme Court, Vir ArjunSaturday, 24 September 2011
चिदम्बरम सरकार और पार्टी दोनों के लिए लाइबिलिटी बन गए हैं
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 24th September 2011
अनिल नरेन्द्र
पौने दो लाख करोड़ रुपये के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में एक अहम मोड़ आ गया है। अब इस घोटाले के घेरे में तत्कालीन वित्त मंत्री और वर्तमान गृहमंत्री पी. चिदम्बरम भी आ गए हैं। उन पर आरोप विपक्ष या जांच एजेंसी सीबीआई ने नहीं बल्कि वर्तमान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की ओर से लगाए गए हैं। मुखर्जी की ओर से 25 मार्च 2011 को प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदम्बरम चाहते तो 2जी घोटाला रोक सकते थे। लेकिन उन्होंने 30 जनवरी 2008 को ए. राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी। उन्होंने कहा, `मैं अब एंट्री फीस या रेवेन्यू रोटिंग की वर्तमान दरों को रीविजिट (समीक्षा) नहीं करना चाहता।' चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदम्बरम चाहते तो स्पेक्ट्रम की पहले आओ, पहले पाओ की जगह उचित कीमत पर नीलामी की जा सकती थी। 11 पन्नों की यह चिट्ठी आने वाले वक्त में चिदम्बरम के लिए आफत का सबब बन सकती है। यह चिट्ठी आरटीआई के तहत विवेक गर्ग ने हासिल की है। जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने बुधवार को यह पत्र सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एके गांगुली की बैंच के समक्ष दस्तावेज के तौर पर पेश किया। वित्त मंत्रालय में उपनिदेशक पद पर तैनात डॉ. पीजीएस राव ने प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव विनी महाजन को 25 मार्च 2011 को भेजी इस चिट्ठी से साफ है कि प्रणब मुखर्जी ये संकेत देना चाह रहे हैं कि अगर पी. चिदम्बरम अड़ जात तो शायद टेलीकॉम घोटाले के चलते देश को लाखों करोड़ों रुपये का नुकसान न होता। मंत्रालय पीएमओ को भेजी अपनी चिट्ठी में कहता है कि वित्त मंत्रालय 31 दिसम्बर 2008 तक के लाइसेंस 2001 के भाव पर बेचने के लिए तैयार हो गया।
चिदम्बरम पर सीधा आरोप लगता है कि ए. राजा जो कुछ कर रहे थे उसकी सहमति गृहमंत्री को थी। यही नहीं, 30 जनवरी 2008 को उन्होंने ए. राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी। ए. राजा भी शुरू से ही कह रहा है कि मैंने जो कुछ भी किया वह पीएमओ और गृह मंत्रालय की स्वीकृति और जानकारी में किया है। अब यह आरोप तो खुद सरकारी दस्तावेज से साबित होता है। पहले आओ, पहले पाओ की जगह ज्यादा कीमत पर स्पेक्ट्रम की नीलामी की जा सकती थी पर चिदम्बरम ने ऐसा कुछ नहीं किया। कम्पनियों को दिए यूएएस लाइसेंस का प्रावधान 5.1 सरकार को लाइसेंस की शर्तों को किसी भी समय बदलने की इजाजत देता है बशर्ते यह जनहित में हो या सुरक्षा के लिए जरूरी हो पर चिदम्बरम ने ऐसा कुछ नहीं किया। वित्त मंत्रालय ने टेलीकॉम सेक्टर में ग्रोथ के अनुपात फीस तय करने की बात की। राजा इससे सहमत नहीं थे। चिदम्बरम ने इसका भी विरोध नहीं किया। वित्त मंत्रालय 4.4 मेगा हर्ट्स से ऊपर के स्पेक्ट्रम को बाजार भाव में बेचना चाहता था। राजा ने यह सीमा 6.2 मेगा हार्ट्स कर दी। चिदम्बरम इसी पर मान गए। लेकिन किसी भी कम्पनी को 6.2 मेगा हर्ट्स से ऊपर स्पेक्ट्रम दिया ही नहीं गया। होना यह चाहिए था कि सरकार 4.4 मेगा हर्ट्स से ऊपर की नीलामी वाले रुख पर कायम रहती और कम्पनियों से नई दरों पर पैसा वसूलती पर यह भी नहीं हुआ।
यूपीए के अन्दर एक तरह से छिड़े गृह युद्ध से प्रधानमंत्री का परेशान होना स्वभाविक ही है। पीएम आजकल अमेरिका में हैं। मनमोहन सिंह ने प्रणब मुखर्जी और चिदम्बरम दोनों से फोन पर बात की है। गुरुवार शाम चिदम्बरम ने एक बयान जारी कर दोनों नेताओं से बातचीत की जानकारी दी। चिदम्बरम ने कहा कि मैंने प्रधानमंत्री को आश्वस्त किया है कि जब तक वह स्वदेश वापस नहीं लौटते हैं मैं इस विषय पर कोई बयान नहीं दूंगा। मनमोहन सिंह 27 सितम्बर को न्यूयार्प से भारत लौटेंगे। उधर वित्त मंत्री ने भी न्यूयार्प में मीडिया से कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसलिए मैं कुछ नहीं कहूंगा। वहीं केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि चिदम्बरम पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते हैं। वह सरकार के समर्थन के हकदार हैं। केंद्रीय मंत्री अम्बिका सोनी ने भी सरकार में दरार के दावों को खारिज रकते हुए कहा कि जो भी रिपोर्टें आ रही हैं उनमें सच्चाई कम ही है। Šजी स्पेक्ट्रम केस की जांच करने वाली लोक लेखा समिति के अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि चिदम्बरम तुरन्त इस्तीफा दें या उन्हें बर्खास्त किया जाए। सीपीएम ने चिदम्बरम की भूमिका की सीबीआई जांच की मांग की है। उधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा है कि चिदम्बरम 2जी केस में शामिल हैं। यह साफ हो गया है। न्यूयार्प से प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें चिदम्बरम पर पूरा भरोसा है। चौतरफा समस्याओं से घिरी यह यूपीए सरकार के लिए समय दिन प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। चूंकि इस बार सारे आरोप एक सरकारी दस्तावेज के आधार पर लग रहे हैं इसलिए इससे निकलना आसान नहीं होगा इस सरकार के लिए। रहा सवाल पी. चिदम्बरम का तो अब वह सरकार और कांग्रेस पार्टी के लिए एक लाइबिलिटी बनते जा रहे हैं।
2G, A Raja, Anil Narendra, Daily Pratap, Manmohan Singh, P. Chidambaram, Pranab Mukherjee, Salman Khursheed, UPA, Vir Arjun,
चिदम्बरम पर सीधा आरोप लगता है कि ए. राजा जो कुछ कर रहे थे उसकी सहमति गृहमंत्री को थी। यही नहीं, 30 जनवरी 2008 को उन्होंने ए. राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी। ए. राजा भी शुरू से ही कह रहा है कि मैंने जो कुछ भी किया वह पीएमओ और गृह मंत्रालय की स्वीकृति और जानकारी में किया है। अब यह आरोप तो खुद सरकारी दस्तावेज से साबित होता है। पहले आओ, पहले पाओ की जगह ज्यादा कीमत पर स्पेक्ट्रम की नीलामी की जा सकती थी पर चिदम्बरम ने ऐसा कुछ नहीं किया। कम्पनियों को दिए यूएएस लाइसेंस का प्रावधान 5.1 सरकार को लाइसेंस की शर्तों को किसी भी समय बदलने की इजाजत देता है बशर्ते यह जनहित में हो या सुरक्षा के लिए जरूरी हो पर चिदम्बरम ने ऐसा कुछ नहीं किया। वित्त मंत्रालय ने टेलीकॉम सेक्टर में ग्रोथ के अनुपात फीस तय करने की बात की। राजा इससे सहमत नहीं थे। चिदम्बरम ने इसका भी विरोध नहीं किया। वित्त मंत्रालय 4.4 मेगा हर्ट्स से ऊपर के स्पेक्ट्रम को बाजार भाव में बेचना चाहता था। राजा ने यह सीमा 6.2 मेगा हार्ट्स कर दी। चिदम्बरम इसी पर मान गए। लेकिन किसी भी कम्पनी को 6.2 मेगा हर्ट्स से ऊपर स्पेक्ट्रम दिया ही नहीं गया। होना यह चाहिए था कि सरकार 4.4 मेगा हर्ट्स से ऊपर की नीलामी वाले रुख पर कायम रहती और कम्पनियों से नई दरों पर पैसा वसूलती पर यह भी नहीं हुआ।
यूपीए के अन्दर एक तरह से छिड़े गृह युद्ध से प्रधानमंत्री का परेशान होना स्वभाविक ही है। पीएम आजकल अमेरिका में हैं। मनमोहन सिंह ने प्रणब मुखर्जी और चिदम्बरम दोनों से फोन पर बात की है। गुरुवार शाम चिदम्बरम ने एक बयान जारी कर दोनों नेताओं से बातचीत की जानकारी दी। चिदम्बरम ने कहा कि मैंने प्रधानमंत्री को आश्वस्त किया है कि जब तक वह स्वदेश वापस नहीं लौटते हैं मैं इस विषय पर कोई बयान नहीं दूंगा। मनमोहन सिंह 27 सितम्बर को न्यूयार्प से भारत लौटेंगे। उधर वित्त मंत्री ने भी न्यूयार्प में मीडिया से कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसलिए मैं कुछ नहीं कहूंगा। वहीं केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि चिदम्बरम पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते हैं। वह सरकार के समर्थन के हकदार हैं। केंद्रीय मंत्री अम्बिका सोनी ने भी सरकार में दरार के दावों को खारिज रकते हुए कहा कि जो भी रिपोर्टें आ रही हैं उनमें सच्चाई कम ही है। Šजी स्पेक्ट्रम केस की जांच करने वाली लोक लेखा समिति के अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि चिदम्बरम तुरन्त इस्तीफा दें या उन्हें बर्खास्त किया जाए। सीपीएम ने चिदम्बरम की भूमिका की सीबीआई जांच की मांग की है। उधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा है कि चिदम्बरम 2जी केस में शामिल हैं। यह साफ हो गया है। न्यूयार्प से प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें चिदम्बरम पर पूरा भरोसा है। चौतरफा समस्याओं से घिरी यह यूपीए सरकार के लिए समय दिन प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। चूंकि इस बार सारे आरोप एक सरकारी दस्तावेज के आधार पर लग रहे हैं इसलिए इससे निकलना आसान नहीं होगा इस सरकार के लिए। रहा सवाल पी. चिदम्बरम का तो अब वह सरकार और कांग्रेस पार्टी के लिए एक लाइबिलिटी बनते जा रहे हैं।
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