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Friday, 18 May 2012

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अंतिम अभियुक्त ए. राजा की जमानत

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 May 2012
अनिल नरेन्द्र
हाल के वर्षों में देश की राजनीति में भूचाल लाने वाले एक लाख 76 हजार करोड़ रुपये के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में गिरफ्तार मुख्य आरोपी और जेल में बन्द आखिरी अभियुक्त पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए. राजा को अंतत अदालत से जमानत मिल गई। दिल्ली की तिहाड़ जेल में सवा साल बिताने के बाद ए. राजा बाहर आकर अगले दिन ही संसद में भी पहुंच गए। 49 वर्षीय राजा काफी खुश दिख रहे थे लेकिन उन्होंने संसद भवन में खड़े पत्रकारों से कोई बातचीत नहीं की। ए. राजा को 2 फरवरी 2011 को गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने ए. राजा को 20 लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के दो बांड पर जमानत देने का आदेश दिया। जमानत मिलने के बाद राजा ने कहा कि उनके खिलाफ मामला झूठा और मनगढ़ंत है और कानून के आधार पर टिकने वाला नहीं है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में गिरफ्तारी के बाद जमानत के लिए आवेदन न करना ए. राजा की एक सोची-समझी चाल थी। उन्होंने इस मामले में अभियुक्त कम बल्कि एक पेशेवर वकील की तरह ज्यादा काम किया। मामले की नजाकत व मीडिया को अटैंशन न देखते हुए उन्होंने जमानत की अर्जी नहीं दी और पूरे 15 महीने जेल में रहे। राजा को मालूम था कि सीबीआई ने उन्हें पूरे केस का सूक्षधार बना रखा है और जब भी जमानत के लिए वह आवेदन करेंगे सीबीआई यही दलील पेश करेगी। इसलिए उन्होंने सीबीआई को चार्जशीट दाखिल करने दी। इतना ही नहीं, उन्होंने चार्जशीट पर संज्ञान लेने तथा ट्रायल शुरू होने के बाद भी जमानत की अर्जी नहीं दी। यहां तक कि डीएमके सांसद तथा पार्टी प्रमुख की बेटी कनिमोझी की जमानत के बाद भी उन्होंने आवेदन नहीं किया जबकि सांसद को मिली जमानत उनके आवेदन का ठोस आधार बन सकता था। उन्होंने आवेदन तब किया जब गत सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने मामले के अंतिम अभियुक्त पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और निजी सचिव आरके चंदोलिया को जमानत दे दी। इस रणनीति का फायदा यह है कि राजा के खिलाफ अदालतों की टिप्पणियां नहीं हैं। यहां तक कि जमानत देते हुए सीबीआई कोर्ट ने कहा कि राजा सुबूतों से छेड़छाड़ नहीं कर सकते क्योंकि सभी सुबूत दस्तावेजों की शक्ल में हैं। राजा के लिए कोर्ट का यह सकारात्मक रुख है जो ट्रायल के दौरान उनके पक्ष में जाएगा। वैसे ए. राजा जमानत पर ऐसे वक्त बाहर आए हैं जब स्पेक्ट्रम घोटाले से उठती आंच ने उनके पूर्व टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन और तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम तक को अपनी चपेट में ले लिया है। मारन पर आरोप हैं कि टेलीकॉम मंत्री रहते उन्होंने एक देशी टेलीकॉम कम्पनी एयरसेल की बाहें उमेढकर उसे मलेशिया की एक कम्पनी के हाथों बिकने पर मजबूर किया और एवज में इस विदेशी कम्पनी से करीब छह सौ करोड़ रुपये रिश्वत के रूप में बटोरे। लेकिन हाल के खुलासे तो और गम्भीर है, जिनमें चिदम्बरम के साथ उनके बेटे कार्ती चिदम्बरम का नाम भी उछला है और पता चला है कि इस विदेशी कम्पनी को लाभ पहुंचाने के लिए देश के सख्त कानूनों को कैसे ताक पर रख दिया गया। संसद में चिदम्बरम जब अपनी सफाई में भावुक होकर कहते हैं कि चाहे मेरी छाती में खंजर भोंक दो लेकिन मेरी ईमानदारी पर शक मत करो तब उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उनके वित्त मंत्री रहते एक विदेशी कम्पनी देश के कानून से कैसे खेल गई? भारत के कानून से खिलवाड़ करने और सरकार से धोखाधड़ी करने के स्पष्ट सुबूतों के बावजूद क्यों नहीं `मैक्सिस' का लाइसेंस कैंसिल कर उसके खिलाफ मुकदमा चलाया गया? चिदम्बरम ने संसद में साफ इंकार कर दिया कि उनके या परिवार के किसी सदस्य के पास किसी भी टेलीकॉम कम्पनी के शेयर रहे हैं। तब उन्हें यह भी बताना चाहिए कि एयरसेलöमैक्सिस सौदे में उनके बेटे कार्ती चिदम्बरम का नाम किन हालात में उछला है? ए. राजा की जमानत पर प्रतिक्रिया देते हुए अभियुक्तों के वकील माजिद मेमन का कहना है कि सीबीआई के केस में दम नहीं है और वह अदालत की सख्त जांच झेल नहीं पाएगी। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसी कह रही है कि 2जी स्पेक्ट्रम को बेचने में 1.75 लाख करोड़ का घोटाला हुआ लेकिन क्या उसके पास इसका कोई दस्तावेजी सुबूत है? अभी तक की कार्रवाई में सीबीआई ने इस तरह का साक्ष्य पेश नहीं किया है। इससे मुझे कुछ समय पहले एक राजनेता से हुई बात याद आ गई। नेता ने कहा कि अगर कोई पालिटीशियन किसी भी आरोप में जेल जाने को तैयार है तो वह साफ बच सकता है। कहीं ए. राजा का यही किस्सा न हो? जेल तो वह हो आए पर देश को 1.75 लाख करोड़ की रिकवरी में भी उतनी दिलचस्पी है जितनी सजा काटने में। क्या सीबीआई इस रकम को कभी रिकवर कर सकेगी?
2G, A Raja, Anil Narendra, Daily Pratap, P. Chidambaram, Vir Arjun

Sunday, 5 February 2012

झटकों पर झटके झेलने के आदी मनमोहन सिंह और उनकी सरकार

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th February  2012
अनिल नरेन्द्र
मनमोहन सिंह सरकार को सुप्रीम कोर्ट से लगातार झटके लगते ही जा रहे हैं। शीर्ष अदालत द्वारा यूपीए-2 को इस तीसरे झटके को मिलाकर पांचवां झटका है। बृहस्पतिवार का झटका इसलिए ज्यादा उद्वेलित करने वाला है, क्योंकि सीएजी ने 1.67 लाख करोड़ रुपये के 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले को उजागर कर सनसनी फैलाई थी कि प्रधानमंत्री स्वयं ए. राजा के बचाव में आए थे और पूरी सरकार पहले सीएजी फिर पीएसी के पीछे पड़ गई थी। कटु सत्य तो यह है कि यूपीए सरकार ने बेशकीमती स्पैक्ट्रम को रेवड़ी की तरह बांट दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूपीए-घ्घ् को बृहस्पतिवार को यह तीसरा झटका था। इससे पहले मुख्य सतर्पता आयुक्त पर पीजे थॉमस की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया था। तब भी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की आलोचना हुई थी क्योंकि सीवीसी की चयन समिति में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज की आपत्ति को नजरअंदाज कर दिया गया था यह सीधे तौर पर पीएम के लिए झटका था। सुप्रीम कोर्ट ने 2जी मामले में ही दोषियों पर मुकदमा चलाने की अनुमति देने में देर लगाने को गलत करार दिया और इस सीमा को अधिकतम चार महीने की सीमा तय कर दी। इस मुद्दे में भी पीएमओ की किरकिरी हुई थी। इस बार भी पीएमओ कठघरे में है। तीसरा और ऐतिहासिक फैसला बृहस्पतिवार को आया जो सबसे बड़ा झटका है। इस बार भी प्रधानमंत्री और तत्कालीन वित्तमंत्री कठघरे में हैं क्योंकि जब सीएजी ने यह मामला उठाया था और मीडिया ने इसे उछाला तो प्रधानमंत्री ने राजा को निर्दोष बताया था और बार-बार उन्हें बचाने की कोशिश की थी। जब बात ज्यादा बढ़ी तो वह जेल भेज दिए गए। तब मनमोहन सिंह ने बचाव में यह दलील दी कि गठबंधन सरकार के सामने ऐसी मजबूरियां होती हैं। ताजा फैसले ने 2जी स्पैक्ट्रम की प्रक्रिया को ही गलत करार दिया है यानि कि वह गलत और पक्षपाती था। सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री ने इस गैर कानूनी-गलत प्रक्रिया को डिफैंड किन बेसिस पर किया? क्या उन्हें नैतिक आधार पर अब अपने पद से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए? और कितनी विपरीत टिप्पणियों का इंतजार करेंगे मनमोहन सिंह? इससे पहले भी जब यूपीए-घ् का शासन था तब भी सुप्रीम कोर्ट ने मनमोहन सरकार को दो बार तगड़े झटके दिए थे। एक बार जब बिहार में एनडीए को सरकार बनाने का मौका न देकर राष्ट्रपति शासन लगाया था तब कोर्ट ने राज्यपाल के व्यवहार को असंवैधानिक करार दिया था। दूसरी बार झारखंड में भी यही स्थिति रही। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद शिबू सोरेन को इस्तीफा देना पड़ा था और एनडीए की सरकार बन गई थी। कांग्रेस पार्टी और संप्रग सरकार के लिए एक साथ एक नहीं बल्कि तीन मोर्चे खुल गए हैं। सबसे पहले उत्तर प्रदेश चनाव, दूसरे पी. चिदम्बरम का भविष्य और तीसरे दोनों को बचाने में संप्रग गठबंधन की चिन्ता। उत्तर प्रदेश चुनाव से ठीक पहले 122 टेलीकॉम लाइसेंस रद्द होने के बाद कांग्रेस पूरी ताकत से अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम का बचाव तो कर रही है लेकिन इसके सियासी असर को लेकर उसकी जान हलक में जरूर अटकी होगी। कांग्रेस और सरकार दोनों ने मान लिया है कि अब उसके पास इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अख्तियार करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। इन्हीं सब पहलुओं पर चर्चा करने के लिए कांग्रेस के सर्वोच्च नेताओं की कोर कमेटी की बैठक हुई। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस नेतृत्व मान रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से विपक्ष को चुनाव से पहले भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक हथियार तो मिल ही गया है। जिस तरह से कपिल सिब्बल ने अपनी प्रेस वार्ता के दौरान द्रमुक कोटे के दूरसंचार मंत्री रहे ए. राजा पर ठीकरा फोड़ा है उससे कहीं एक और नया मोर्चा न खुल जाए। ममता और शरद पवार ने पहले ही नाक में दम कर रखा है। अब पूरे घोटाले के लिए राजा को अकेले जिम्मेदार ठहराना पहले से नाराज द्रमुक को और उकसाना है। कहीं पहले से लगी आग और न भड़क जाए?
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Saturday, 4 February 2012

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को सुनाए दूरगामी महत्वपूर्ण फैसले

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th February  2012
अनिल नरेन्द्र
यकीनन बृहस्पतिवार का दिन सुप्रीम कोर्ट के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन था। अदालत को तीन अहम मुद्दों पर अपना फैसला देना था। तीनों ही बहुत महत्वपूर्ण थे जिनके दूरगामी असर होने हैं। बृहस्पतिवार को सबसे महत्व फैसला 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले का था। इस पर देश और दुनिया की निगाहें टिकी थीं। इस घोटाले में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की कथित भूमिका की सीबीआई जांच, दूरसंचार कम्पनियों के लाइसेंस निरस्त करने और 2जी मामले की निगरानी के लिए एसआईटी गठित करने की मांग पर फैसला आना था। इन सबको छोड़कर एक और महत्वपूर्ण घटना थी उस जज के रिटायर होने का आखिरी दिन जिन्होंने 15 महीनों में सुप्रीम कोर्ट की उस बैंच की शोभा बढ़ाई जिसने हर उस रसूखदार को जेल की हवा खिलाई जिसके बारे में आम आदमी सोच भी नहीं सकता था। मैं बात कर रहा हूं जस्टिस एके गांगुली की जिनका अपने कार्यकाल का अंतिम दिन था बृहस्पतिवार। जस्टिस गांगुली की बेबाक टिप्पणियां इतिहास में दर्ज हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों मुद्दों पर अपना फैसला सुना दिया। पहला, कम्पनियों के 122 लाइसेंस रद्द करना और सात कम्पनियों पर भारी जुर्माना। दूसरा, चिदम्बरम के मामले में फैसला निचली अदालत पर छोड़ना और तीसरा सीबीआई जांच की निगरानी का काम सीवीसी की देखरेख में करना। तीनों फैसलों के दूरगामी असर होना लाजिमी है। शीर्ष अदालत ने तीन कम्पनियों पर पांच-पांच करोड़ रुपये का जुर्माना ठोंका है और चार कम्पनियों पर 50-50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। अदालत ने यह भी कहा है कि यदि सरकार की नीति जनहित के खिलाफ है तो अदालत कर सकती है अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग। कोर्ट के इस फैसले का मतलब है कि तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा के समय में लाइसेंस हासिल करने वाली कम्पनियां प्रभावित होंगी। कोर्ट ने कहा कि 10 जनवरी 2008 को लाइसेंस मनमाने और असंवैधानिक तरीके से जारी किए गए थे जिन्हें जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वहीं शीर्ष अदालत ने पी. चिदम्बरम की कथित भूमिका की जांच की मांग पर निर्णय निचली अदालत पर छोड़ दिया। पटियाला हाउस स्थित विशेष अदालत को दो हफ्ते में फैसला सुनाने को कहा गया है। सम्भव है कि विशेष अदालत अपना फैसला शनिवार, चार फरवरी को ही सुना दे। शीर्ष अदालत ने टेलीकॉम नियामक `ट्राई' को निर्देश दिया है कि वह दो माह में 2जी लाइसेंस आवंटन के लिए नई सिफारिशें दे। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एके गांगुली की पीठ ने सरकार से ट्राई की सिफारिशों पर एक माह के अन्दर अमल करने को कहा है। फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए याचिकाकर्ता जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि यह सरकार की सामूहिक विफलता है। उसने चेतावनियों की अनदेखी की। भाजपा नेता अरुण जेटली का कहना है कि यह एक व्यक्ति का नहीं बल्कि यूपीए सरकार का निर्णय था। ट्राई के अध्यक्ष जेएस शर्मा ने कहा कि इस फैसले से पांच फीसदी उपभोक्ताओं पर असर पड़ेगा यानि मोबाइल कॉलें अब महंगी हो जाएंगी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। निश्चित रूप से विपक्ष इसे भुनाने का प्रयास करेगा और उसे एक ऐसा नया मुद्दा मिल गया है जिससे यूपीए सरकार की फजीहत बढ़ जाएगी। चूंकि यह दूरगामी फैसले हैं, इनके प्रभाव को समझने में भी टाइम लगेगा पर इस फैसले से उद्योग जगत में भूचाल आ गया है। उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी कि इतनी प्रभावशाली औद्योगिक कम्पनियों को यह दिन भी देखना पड़ेगा। इस बीच एक टीवी चैनल के साथ बातचीत में डॉ. स्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर गम्भीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि 2जी मामले में 60 फीसदी रकम सोनिया गांधी ने ली है और इसका सुबूत उनके पास है। अब सबकी नजरें चार फरवरी को पटियाला हाउस स्थित विशेष अदालत पर टिकी हुई हैं जिसने पी. चिदम्बरम के भाग्य का निर्णय सुनाना है। चिदम्बरम की निजी सियासत इस फैसले पर टिकी है। कुछ हद तक यूपीए सरकार का भी भविष्य इस पर टिका है। अगर चिदम्बरम पर केस चलता है तो निश्चित रूप से इसका प्रभाव मनमोहन सरकार पर जरूर पड़ेगा। देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों से सरकार कैसे लड़ती है?
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Saturday, 17 December 2011

चौतरफा घिरते गृहमंत्री पी. चिदम्बरम


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17th December 2011
अनिल नरेन्द्र
गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को घेरने के लिए 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद विपक्ष के हाथ एक और मुद्दा लग गया है। एक टीवी चैनल आईबीएन-7 ने खुलासा किया है कि दिल्ली के एक होटल कारोबारी के खिलाफ तीन एफआईआर वापस लेने के मामले में अपने पद का दुरुपयोग किया है। आरोप है कि यह होटल व्यवसायी चिदम्बरम का मुवक्किल रह चुका है। मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार एसपी गुप्ता, चेयरमैन सन एयर होटल (नई दिल्ली) पर आरोप है कि उन्होंने वीएलएस फाइनेंस को करोड़ों का चूना लगाया। उन्होंने राजीव गांधी के नाम पर एक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया, जिसकी संरक्षक सोनिया गांधी को बनाया था। कुछ सांसदों के फर्जी लैटरपेड का इस्तेमाल किया गया। गृह मंत्रालय ने 9 मई को यह निर्देश देने का फैसला किया कि गृह सचिव को दी गई गुप्ता की याचिका के आधार पर एफआईआर रद्द की जाए। सन एयर होटल मालिक एसपी गुप्ता के खिलाफ पूर्व के फैसले को वापस लेने का निर्णय उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना ने किया। दिल्ली सरकार की विज्ञप्ति के अनुसार, `अभियोजन विभाग के निदेशक की सिफारिशों के आलोक में इस मामले को फिर से उपराज्यपाल के पास भेजा गया जिसमें यह सिफारिश की गई कि मामले को आगे नहीं बढ़ाने के पूर्ण निर्णय पर जोर नहीं डाला जाएगा और सुनवाई मामले के दोष-गुण के आधार पर किया जाएगा।' दिल्ली सरकार के अनुसार उपराज्यपाल ने 15 दिसम्बर 2011 को इस सिफारिश को मंजूरी दे दी। सरकार द्वारा फैसले को निरस्त करने का मतलब साफ है कि आरोप सही है। चिदम्बरम ने एसपी गुप्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने के लिए दबाव डाला और इस तरह उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया। मामला इसलिए भी ज्यादा गंभीर बन जाता है कि जो फर्जी ट्रस्ट बनाया गया वह स्वर्गीय राजीव गांधी के नाम था और उसके संरक्षक में सोनिया गांधी का नाम दिया गया था। ऐसे आदमी की सिफारिश करने से पहले खुद चिदम्बरम को सोचना चाहिए था कि वह क्या करने जा रहे हैं। पी. चिदम्बरम एक के बाद एक विवाद में फंसते जा रहे हैं। आखिर सरकार और पार्टी कब तक उनका बचाव करेगी। अगर किसी अदालत ने चिदम्बरम के खिलाफ कोई टिप्पणी कर दी तो क्या स्थिति बनेगी? वैसे भी सरकार बहुत कमजोर स्थिति में है, चौतरफा दबाव में है। ऐसे में एक और सिरदर्द? सरकार को चाहिए कि चिदम्बरम को अब अपने आपको खुद को डिफेंड करने दे। सरकार के ऊपर और बहुत प्रेसिंग समस्याएं हैं उन पर ज्यादा ध्यान दें। बहरहाल विपक्ष के हाथ एक नया मुद्दा जरूर लग गया है और ऐसा नहीं लगता कि वह पी. चिदम्बरम को अब आसानी से छोड़ेगी।
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Saturday, 10 December 2011

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसते पी. चिदम्बरम

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th December 2011
अनिल नरेन्द्र
केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के सितारे आजकल गर्दिश में चल रहे हैं। उनकी वजह से संप्रग सरकार और कांग्रेस पार्टी की फजीहत बढ़ती ही जा रही है। बृहस्पतिवार को सीबीआई की अदालत ने डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी की उस याचिका को मंजूर कर लिया जिसमें चिदम्बरम के खिलाफ 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में दो गवाहों से पूछताछ की मांग की गई थी। अदालत ने दोनों गवाहों को पेश करने की इजाजत दे दी, लेकिन यह भी कहा कि पहले डॉ. स्वामी खुद गवाही देंगे और अगर उनकी गवाही में दम हुआ तो आगे की कार्रवाई होगी। स्वामी की संतोषजनक गवाही के बाद ही दोनों गवाहों की पेशी होगी। एक गवाह श्री खुल्लर वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं और दूसरे गवाह एससी अवस्थी सीबीआई में संयुक्त निदेशक हैं। गौरतलब है कि पी. चिदम्बरम 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के वक्त वित्तमंत्री थे। स्वामी के मुताबिक 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ियों की पूरी जानकारी चिदम्बरम को थी। वे चाहते तो घोटाला रुक सकता था। दरअसल तत्कालीन वित्त सचिव डी. सुब्बाराव द्वारा 6जुलाई 2008को लिखे एक पत्र के लीक होने के बाद से ही चिदम्बरम पर राजनीतिक हमले तेज हो गए। सुब्बाराव के पत्र से चिदम्बरम और पूर्व दूरसंचार मंत्री ए.राजा की स्पेक्ट्रम आवंटन, स्पेक्ट्रम उपयोग चार्ज, मूल्य निधारण समेत तमाम पहलुओं पर चर्चा की पुष्टि होती है। पत्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन वित्तमंत्री के बीच मुद्दे पर विस्तार से चर्चा का भी जिक्र है। डॉ.स्वामी का दावा है कि चिदम्बरम पर लगाए आरोपों का उनके पास पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं और वह अदालत में इसे साबित कर सकते हैं। तत्कालीन वित्तमंत्री चाहते तो 2जी लाइसेंस पाने वाली कम्पनियों के इक्विटी बेचे जाने को रोक सकते थे पर उन्होंने इसकी सहमति दी। यह बात 5 नवम्बर 2008 को ए. राजा द्वारा लिखे गए नोट से पता चलता है। राजा का यह नोट स्वामी को सौंपे गए 400 दस्तावेजों का हिस्सा है। जाहिर है कि इस नोट के सामने आने से चिदम्बरम की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में चिदम्बरम की भूमिका को लेकर यह दूसरा बड़ा रहस्योद्घाटन है। इससे पहले कैबिनेट सचिवालय को वित्त मंत्रालय की ओर से भेजे गए उस नोट से बवाल मच चुका है, जिसमें कहा गया था कि चिदम्बरम चाहते तो वित्तमंत्री रहते हुए घोटाले को रोक सकते थे। अदालत के आदेश के बाद चिदम्बरम एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं। चिदम्बरम के इस्तीफे की मांग पर भारी हंगामे के चलते बृहस्पतिवार को संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही बाधित रही। विपक्ष का कहना है कि उनके पद पर रहते 2जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच प्रभावित होगी। विपक्ष की मांग को दरकिनार करते हुए कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों में चिदम्बरम या सरकार के खिलाफ कोई बात नहीं है। संसद की कार्यवाही बाधित करने के लिए विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए खुर्शीद ने कहा कि विपक्ष नहीं चाहता कि सरकार महंगाई के मोर्चे पर सरकार अपनी उपलब्धियों को बताए। खुद पी.चिदम्बरम ने बृहस्पतिवार को किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया और पत्रकारों द्वारा बार-बार पूछने पर कोई रिएक्शन नहीं दिया। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है बेशक पब्लिक में तो पार्टी चिदम्बरम का साथ दे रही है पर अन्दरखाते वह समझ रही है कि चिदम्बरम फंसते जा रहे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसे होने के अलावा उनके चुनाव को भी चुनौती का मुद्दा अदालत में है। उसका फैसला भी जल्द आ सकता है। अगर 17दिसम्बर को सीबीआई अदालत में जज ओपी सैनी स्वामी की दलीलों से सहमत हो गए तो दोनों गवाहों को पेश होने का आदेश दिया जाएगा। डॉ.स्वामी के पास चिदम्बरम को फंसाने के दस्तावेजों के होने का दावा भी पुख्ता हो सकता है। अगर चिदम्बरम के खिलाफ कोई भी कार्रवाई हुई तो सरकार और पार्टी को उन्हें बचाना मुश्किल हो सकता है। अगले कुछ दिन न केवल पी. चिदम्बरम के लिए ही मुश्किल भरे हैं बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी के लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं।
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Saturday, 26 November 2011

2जी घोटाले में कारपोरेटों को मिली जमानत


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th November 2011
अनिल नरेन्द्र
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले में पहली बार किसी को जमानत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पांच कारपोरेट आरोपियों को जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट से जमानत पाने वाले हैं ः संजय चन्द्रा, विनोद गोयनका, हरि नायर, गौतम दोषी और सुरेन्द्र पिपारा। आरोपियों ने निचली अदालत और हाई कोर्ट में जमानत अर्जी खारिज होने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में आरोपियों के खिलाफ आर्थिक अपराध का आरोप है और अगर यह साबित होता है तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को खतरा हो सकता है। लेकिन सीबीआई ने यह नहीं कहा कि जमानत पर छूटने के बाद आरोपी सुबूतों को प्रभावित कर सकते हैं। हम ऐसा कोई कारण नहीं देखते जिससे कि आरोपी को कस्टडी में रखा जाए और वह भी तब जब इस मामले में छानबीन पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। आरोपी छह महीने से ज्यादा जेल में हैं और इस मामले में इन्हें कस्टडी में रखने का कोई मकसद पूरा नहीं होता। ऐसे में आरोपियों को 5-5 लाख रुपये की जमानत राशि पर जमानत देने का आदेश दिया जाता है। कोर्ट ने जमानत देने के साथ-साथ कुछ शर्तें भी लगाई हैं। इन्हें जमानत दिए जाने के बाद कनिमोझी समेत 6 आरोपियों को जमानत मिलने की उम्मीद हो गई है। 2जी घोटाले में अभी भी 2 फरवरी से ए. राजा बन्द हैं। कनिमोझी 20 मई से तिहाड़ में हैं। शरद कुमार (एमडी कलैंग्नार टीवी) भी 20 मई से बन्द हैं। आरके चंदोलिया (ए. राजा के प्राइवेट सचिव) 2 फरवरी को जेल गए थे। सिद्धार्थ बेहुरा, पूर्व टेलीकॉम सैकेटरी भी 2 फरवरी से ही बन्द हैं। शाहिद उस्मान बलवा, स्वान के प्रोमोटर 2 फरवरी से तिहाड़ में है। आसिफ बलवा (शाहिद के भाई) 29 मार्च से जेल में हैं। राजीव अग्रवाल डायरेक्टर कुसेगांव फूड्स एण्ड वेजिटेबल्स प्राइवेट लिमिटेड 29 मार्च को जेल गए थे। करीम मोरानी जो एक फिल्म निर्माता हैं और शाहरुख खान के दोस्त भी हैं 30 मार्च से तिहाड़ में हैं।
किसी आपराधिक मामले में आरोपी को कितनी अवधि तक न्यायिक हिरासत यानि जेल में रखा जाए और कब उसे जमानत मिलनी चाहिए, यह सवाल अक्सर उठता है। इन दिनों भी इस सवाल पर बहस जारी है। कुछ दिन पहले दिग्विजय सिंह ने भी यह सवाल उठाते हुए कहा था कि किसी आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल होने के बाद उसे जेल में करने का कोई औचित्य नहीं है, इसलिए उसे जमानत मिलनी ही चाहिए। हालांकि उनके इस बयान की काफी आलोचना भी हुई थी। कहा गया कि वे अदालतों को निर्देशित करने की कोशिश कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह चूंकि एक विवादित राजनेता हैं इसलिए उनके बयान पर टीका टिप्पणी स्वाभाविक ही है पर कुछ समय पहले खुद सुप्रीम कोर्ट की एक तीन सदस्यीय पीठ ने कहा था कि वह बहुचर्चित मामलों में आरोपियों को जमानत न देने की अदालतों की कथित नई प्रवृत्ति की पड़ताल करेंगे, क्योंकि यह प्रवृत्ति उस स्थापित न्यायिक सिद्धांत के खिलाफ है, जो कहता है कि `जमानत नियम है और जेल उपवाद है।' सुप्रीम कोर्ट की यह पहल निश्चित ही सराहनीय है लेकिन सवाल उठता है कि सिर्प हाई प्रोफाइल केसों पर ही क्यों। छोटे-मोटे मामलों में भी आरोपियों को अदालतों का वर्षों तक चक्कर लगाने पड़ते हैं। जब इन्हें जमानत मिलती है या केस का फैसला आता है उस वक्त तक वह सजा से ज्यादा समय तो जेल में बिता देते हैं। तिहाड़ जेल में अंडर ट्राइलों की संख्या देखें तो पाएंगे कि निचली अदालतों की बेल न देने की वजह से यह जेल में बन्द हैं। जहां तक 2जी स्पेक्ट्रम केस का संबंध है जेल भेजना तो ठीक है पर इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है पैसों की रिकवरी और इस दिशा में न तो सरकार और न ही सीबीआई कोई ठोस कदम उठा रही है। एक लाख 60-70 हजार करोड़ के इस घोटाले में आपने दर्जनों लोगों को अन्दर तो कर दिया पर जो पैसा इन्हेंने लूटा, जो देश की सम्पत्ति है उसका क्या हुआ? कनिमोझी और अन्य की अब जमानत हो जाएगी। केस वर्षों तक चलता रहेगा। अन्त में कुछ को सजा भी हो सकती है पर मूल प्रश्न वही आता है कि लूटी धनराशि की रिकवरी कैसे होगी?
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Friday, 25 November 2011

चिदम्बरम का बहिष्कार सोची-समझी रणनीति के तहत है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th November 2011
अनिल नरेन्द्र
संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होते ही पहले दिन से सियासी गर्मी की आंच गरमाने लगी है। सत्र की शुरुआत महंगाई और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के बहिष्कार से हुई। बुधवार को लोकसभा में वामदलों के नोटिस पर महंगाई पर होने वाली बहस में भी सदन का पारा गरम रहेगा। बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर विपक्षी दलों के स्थगन प्रस्ताव की चर्चाओं के बीच वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने स्वीकार किया कि उम्मीद के मुताबिक परिणाम हासिल नहीं हो सके। उन्होंने जैसी उनकी अब आदत-सी बन गई महंगाई का ठीकरा मांग एवं आपूर्ति में असंतुलन, डालर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट व अन्य अंतर्राष्ट्रीय कारणों को छोड़ दिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि मुद्रास्फीति की दर मार्च 2012 के अन्त तक 6-7 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। प्रणब दा के बयान से विपक्ष भड़क उठा। पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने मुखर्जी के बयान को आंकड़ों का जाल और जनता को दिग्भ्रमित करने वाला बताते हुए चेतावनी दे डाली कि अगर महंगाई का यही हाल रहा तो लोग जल्द हिंसा पर उतर आएंगे। एनडीए ने सदन के पहले दिन ही यह संकेत भी दे दिया कि वह गृहमंत्री पी. चिदम्बरम का बहिष्कार के अपने फैसले पर पूरी तरह अमल करेंगे। हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने गृहमंत्री को बचाने का पूरा प्रयास किया। मनमोहन सिंह ने कहा, जहां तक गृहमंत्री के बहिष्कार की बात है मुझे उम्मीद है कि राजनीतिक दल इस तरह के किसी कदम से बचेंगे, क्योंकि गृहमंत्री के बहिष्कार की कोई वजह नजर नहीं आती। दूसरी ओर राजग द्वारा चिदम्बरम के बहिष्कार को पूरी तरह से जायज बताते हुए भाजपा ने कहा कि यह विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में प्रधानमंत्री के नाम लिखे वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के नोट के सार्वजनिक होने के मद्देनजर ऐसा किया जाना स्वाभाविक कदम है। भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने संवाददाताओं से कहा कि कांग्रेस पूर्व में जॉर्ज फर्नांडीस के साथ ऐसा कर चुकी है जब निर्दोष जॉर्ज को उन्होंने छह महीने तक बोलने नहीं दिया था। अब यह विदित है कि अगर चिदम्बरम ने पहल की होती तो यह घोटाला रोका जा सकता था। चिदम्बरम को भाजपा 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में उतना ही जिम्मेदार मानती है, जितना ए. राजा को। भाजपा का कहना है कि जब चिदम्बरम वित्तमंत्री थे उस वक्त राजा जो भी कर रहे थे उन सभी के बारे में न सिर्प चिदम्बरम को जानकारी थी बल्कि उन्होंने राजा का समर्थन भी किया। उन्होंने राजा के उठाए कदमों को अपनी सहमति दी। अगर वह चाहते तो उसी वक्त ही इस घोटाले को होने से रोक सकते थे। भाजपा ने अपने आरोपों का आधार वित्त मंत्रालय के इस साल प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे उस नोट को भी बनाया है जो इस साल 25 मार्च को भेजा गया था। इस नोट से साफ हो जाता है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन नीलामी की बजाय `पहले आओ पहले पाओ' की नीति पर बनाने के लिए भी वित्तमंत्री के रूप में चिदम्बरम ने ही अपनी मंजूरी दी थी। यही नहीं, राजा ने बाकायदा चिदम्बरम को इस बारे में पत्र भी लिखा और बैठक भी की थी। ऐसे में चिदम्बरम इस घोटाले के लिए उतने ही जिम्मेदार हैं, जितने कि राजा। दरअसल चिदम्बरम का बहिष्कार करके राजग ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। सरकार और चिदम्बरम के लिए एक एम्बैरिसिंग स्थिति हो गई है। वहीं चिदम्बरम को पसंद न करने वाली टीम अन्ना के लोग, बाबा रामदेव और तमिलनाडु की सीएम जयललिता तक भी एक मैसेज गया है। बहिष्कार का टाइमिंग मानना पड़ेगा कि अच्छा है। जनता पार्टी के अध्यक्ष
डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी की अपील पर यह मामला कोर्ट में है। चिदम्बरम की लोकसभा सीट भी खतरे में है। क्योंकि उनके चुनाव के खिलाफ एक याचिका का फैसला कभी भी आ सकता है। डॉ. स्वामी की डिमांड पर सीबीआई को 2जी से जुड़े कागजात भी देने पड़े हैं। स्वामी दावा कर रहे हैं कि चिदम्बरम को पूरी जानकारी थी और वह इसे दस्तावेजों के साथ साबित भी कर सकते हैं। एनडीए ने सिर्प दबाव ही नहीं बनाया बल्कि एक सियासी मैसेज भी दिया है। बाबा रामदेव और उनके साथ रामलीला मैदान में बैठे लोगों पर पुलिस कार्रवाई के पीछे गृहमंत्री के आदेश माने जा रहे थे। रामदेव समर्थकों की तरह टीम अन्ना के भी काफी लोग मानते हैं कि अन्ना और साथियों की गिरफ्तारी और उसके बाद मामले को उलझाने में गृहमंत्री और मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल का मेन रोल था। उधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता तो अपने ही राज्य में चिदम्बरम को एक आंख नहीं भातीं। यह भी गौरतलब है कि गत रविवार को जयललिता की पहल पर अन्नाद्रमुक के थंबुदुरई रामलीला मैदान में लाल कृष्ण आडवाणी की रैली में आए थे। इसके एक दिन बाद चिदम्बरम के बहिष्कार का फैसला हो गया। जयललिता सम्भव है कि भविष्य में एनडीए के साथ जुड़ जाएं। कुल मिलाकर भाजपा को लगता है कि उनकी बहिष्कार की नीति सही दिशा में सही कदम है।
2G, A Raja, Anil Narendra, BJP, CBI, Congress, Daily Pratap, Jayalalitha, L K Advani, P. Chidambaram, Rath Yatra, Vir Arjun

Sunday, 20 November 2011

नेताओं के दबाव के कारण जांच एजेंसियों की साख पर बट्टा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th November 2011
अनिल नरेन्द्र
हमारी जांच एजेंसियों द्वारा विभिन्न केसों में की गई जांच अदालतों में ठहर नहीं पा रही है। इससे प्रश्न उठता है कि क्या राजनीतिज्ञ जांच एजेंसियों की केसों की जांच को प्रभावित करते हैं? राजनीतिक दबाव के चलते चाहे वह दिल्ली पुलिस हो, एनआईए हो या फिर सीबीआई ही क्यों न हो पिछले एक पखवाड़े में कम से कम चार ऐसे केस सामने आए हैं जिनमें अदालतों ने इन एजेंसियों को फटकार लगाई है और इनके जांच करने के तरीके और निष्कर्ष दोनों पर सवाल उठाए हैं। पहला केस मालेगांव बम विस्फोट का है। एक अदालत ने वर्ष 2006 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में नौ आरोपियों में से सात को रिहा कर दिया। एनआईए ने कहा कि सलमान फारसी, शब्बीर मोहम्मद जाहिद और फारुगुई अंसारी को मुंबई के आर्थर रोड जेल से रिहा कर दिया गया। औपचारिकता पूरी होने के बाद एक अन्य आरोपी अबरार अहमद को भी वामदुला जेल से रिहा कर दिया। मामले के दो अन्य आरोपियों आसिफ खान और मोहम्मद अली को भी जमानत तो मिल गई पर इन्हें रिहा नहीं किया गया क्योंकि वे 2006 के मुंबई ट्रेन सिलसिलेवार विस्फोटों में भी आरोपी हैं। मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने रिहाई का विरोध नहीं किया। एनआईए ने तर्प दिया कि मक्का मस्जिद बम विस्फोट मामले में गिरफ्तार स्वामी असीमानन्द के खुलासे के बाद उसने ताजा साक्ष्यों के अलावा पूर्व की जांच एजेंसी एटीएस और सीबीआई द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों की समीक्षा की थी। एनआईए ने कहा, `तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर काफी सोच विचार के बाद सभी नौ आरोपियों के जमानत, आवेदनों का विरोध नहीं करने का फैसला किया गया जिन्हें पूर्व में गिरफ्तार किया गया था और आरोपी बनाया गया था।'
दूसरा केस सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में गुजरात के पूर्व गृह राज्यमंत्री अमित शाह की कथित भूमिका पर सीबीआई को कड़ी फटकार लगाई है। सीबीआई ने कई अनाम पत्रों को शाह की फिरौती रैकेट में कथित भूमिका से जुड़ी शिकायतों के तौर पर पेश किया। एजेंसी के इस कदम को न्यायालय ने किसी को खुश करने का कदम बताया। न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की पीठ ने कहा, `यह स्पष्टतया किसी को खुश करने के लिए उठाया गया कदम है, जो बिल्कुल गलत है।' सीबीआई ने अमित शाह के खिलाफ ऐसी लगभग 200 शिकायतें पेश की थीं, जिन्हें देखने के बाद पीठे ने कहा, `आपने (सीबीआई) ने हमसे कहा है कि प्रदेश सरकार ने इन शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं की। इन पत्रों पर कोई कार्रवाई की ही नहीं जा सकती। ये शिकायतें पूरी तरह बकवास लग रही हैं।' सीबीआई ने गुजरात उच्च न्यायालय की ओर से शाह को जमानत दिए जाने की चुनौती दी है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, `आपको हमारा सबसे अच्छा जांचकर्ता माना जाता है। अब आपको इन कमियों का जवाब देना होगा।' सुनवाई के दौरान शाह ने आरोप लगाया कि वह राजनीतिक साजिश का शिकार हुए हैं और सीबीआई ने उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया है। शाह के वकील राम जेठमलानी ने कहा कि शाह राजनीतिक साजिश का शिकार हुए हैं और सीबीआई भी उसका एक भाग है।
तीसरा केस भी सीबीआई से संबंधित है। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की सुनवाई कर रही विशेष न्यायाधीश ओपी सैनी की अदालत में माननीय जज महोदय ने सीबीआई से साक्ष्यों को नष्ट करने में लग रहे आरोपों पर जानकारी मांगी है। सीबीआई को 23 नवम्बर तक जवाब देना है। सीबीआई पर आरोपियों ने कहा कि आरोप तय करने के आदेश में गलतियां और विरोधाभास हैं। निष्पक्ष सुनवाई के लिए उनमें सुधार की जरूरत है। आरोपी विनोद गोयनका ने सीबीआई पर आरोप लगाया है कि गवाह को अनाधिकृत तौर पर बुलाकर साक्ष्य प्रभावित किए जा रहे हैं। बुधवार को गवाही दे रहे रिलायंस अधिकारी एएन सेथुरमन ने बताया था कि उसके बयान के साथ छेड़छाड़ की गई है। गवाह ने दावा किया कि उसने हरी नायर के हस्ताक्षर की कभी भी पहचान नहीं की। इसके बावजूद सीबीआई ने इसे पेश कर दिया है। गोयनका के वकील माजिद मेनन ने कहा कि गवाह की याददाश्त ताजा करने के नाम पर सीबीआई द्वारा अपनाई गई कार्रवाई मामले को प्रभावित करने की तरह है। उन्होंने कहा कि सीबीआई को आदेश दिया जाए कि याददाश्त ताजा करने के नाम पर गवाह या साक्ष्यों को प्रभावित न करें।
चौथा केस हमारी दिल्ली पुलिस से संबंधित है। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को साफ कर दिया कि कैश फॉर वोट मामला भ्रष्टाचार का नहीं बल्कि महज एक स्टिंग ऑपरेशन था। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे साबित हो कि मामले के अभियुक्त तीन सांसदों ने रिश्वत मांगी या ली। इतना ही नहीं, अगर वे रिश्वत लेते तो चुपचाप लेते न कि टीवी चैनल के समक्ष लेकर उसे इस प्रकार संसद में पेश करते। वही हमारी संसद सर्वोच्च है और संसद द्वारा गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने भी साक्ष्य न होने पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। अदालत ने यह टिप्पणी भाजपा के मौजूदा सांसद अशोक अर्गल तथा दो पूर्व सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर सिंह भगोरा सहित सभी छह अभियुक्तों की जमानत स्वीकार करते हुए की। जस्टिस एमएल मेहता ने अपने फैसले में कहा कि दर्ज प्राथमिकी और आरोप पत्र का अध्ययन करने से वह महसूस करते हैं कि सांसदों व अन्य के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है। इसके अलावा सीएफएसएल की रिपोर्ट से भी साफ है कि टीवी चैनल की ओर से स्टिंग ऑपरेशन की सीडी व ऑडियो में किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई। किसी भी सांसद और अन्य ने कथित रिश्वत की राशि से फायदा नहीं उठाया। अदालत ने यह भी कहा कि वही दूसरी ओर अभियोजन पक्ष का केस भी यही है कि उक्त सांसद व अन्य अभियुक्तों का उद्देश्य मात्र कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की मिलीभगत का पर्दाफाश करना था।
उक्त केसों से साफ है कि राजनीतिज्ञों के दबाव के कारण हमारी जांच एजेंसियों की साख पर बट्टा लग रहा है। राजनेता जबरन अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जांच एजेंसियों पर नाजायज दबाव डलवाकर झूठे केस बनवाते हैं जो अदालतों में जाकर उड़ जाते हैं। दुःखद पहलू यह है कि यह सिलसिला चलता रहेगा और जल्द एक भी एजेंसी ऐसी नहीं रहेगी जिसकी जांच पर जनता विश्वास कर सके।
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Saturday, 5 November 2011

कनिमोझी की जमानत रद्द होना कांग्रेस पर भारी पड़ सकता है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th November 2011
अनिल नरेन्द्र
द्रमुक प्रमुख करुणानिधि को बहुत उम्मीद थी कि इस बार उनकी बेटी कनिमोझी को अदालत जमानत दे देगी। उन्होंने इसकी भूमिका भी तैयार की। हाल ही में करुणानिधि इसी काम को लेकर दिल्ली आए थे। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात भी की थी जिसके बाद ही केंद्र सरकार के नियंत्रण वाली सीबीआई ने कनिमोझी की जमानत याचिका का विरोध न करने की बात अदालत में की। इसके बावजूद अदालत ने बृहस्पतिवार को कनिमोझी सहित अन्य की जमानत याचिका रिजैक्ट कर दी। अदालत ने कनिमोझी, कलैगनार टीवी प्रबंधक निदेशक शरद कुमार, कुसेगांव फ्रूट्स एण्ड वेजीटेबल्स के निदेशक आसिफ बलवा और राजीव अग्रवाल एवं बॉलीवुड फिल्म निर्माता करीम मोरानी की जमानत अर्जियां खारिज कर दीं। आरोपी पिछले 9 से पांच महीने जेल में बिता चुके हैं। कनिमोझी 20 मई से जेल में बन्द हैं। पांच आरोपियों के अलावा अदालत ने पूर्व संचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा, पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के पूर्व निजी सचिव आरके चांदोलिया तथा स्वान टेलीकॉम के शाहिद उस्मान बलवा की जमानत अर्जियों को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहाöमामले से जुड़े तथ्य और आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप बहुत गम्भीर प्रवृत्ति के हैं, जिनका देश की अर्थव्यवस्था पर गम्भीर प्रभाव पड़ा। न्यायाधीश ओपी सैनी ने महिला होने के नाते छूट देने की कनिमोझी के वकील की दलील पर कहा कि आमतौर पर माना जाता है कि महिलाएं सामाजिक व आर्थिक तौर पर कमजोर होती हैं, इसलिए सीआरपीसी की धारा 437 के तहत महिलाओं को कुछ बेनिफिट दिए जाते हैं लेकिन कनिमोझी सांसद हैं और समाज के ऊपरी तबके से हैं। ऐसे में उनके साथ भेदभाव जैसी बात नजर नहीं आती। ट्रायल 11 नवम्बर से शुरू होगा। कनिमोझी की जमानत न होने पर उनके वकील राम जेठमलानी ने इसे न्याय की विफलता करार दिया। जेठमलानी ने कहा कि न्यायाधीश ने जो किया है वह न्याय की गम्भीर विफलता है। मैं समझता हूं कि न्यायाधीश ने सम्भवत तय कर लिया कि कोई राहत नहीं दी जानी चाहिए। सिर्प उच्चतम न्यायालय द्वारा ही राहत मिले तो मिले। उन्होंने कहा कि मुझे उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय जल्दी ही इसे सही कर देगी।
कनिमोझी की जमानत याचिका खारिज होने का कांग्रेस-द्रमुक संबंधों पर सीधा असर डाल सकती है। दोनों दलों की दोस्ती खतरे में पड़ती दिखाई दे रही है। मामले की गम्भीरता को भांपते हुए बृहस्पतिवार को ही तमिलनाडु के कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से पूरे प्रकरण पर बातचीत की। हालांकि कांग्रेस ने अनौपचारिक रूप में फिलहाल गठबंधन पर इसका कोई असर न पड़ने की उम्मीद जताई है पर सूत्रों का कहना है कि द्रमुक नेताओं को इस बात का मलाल है कि सरकार की ओर से कनिमोझी के बचाव में मजबूत कोशिश नहीं की गई। एक तरह से उनको उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया गया। इस बात को द्रमुक नेता वायदा खिलाफी की तरह मान रहे हैं। सम्भव है कि डीएमके जल्द कांग्रेस के साथ रहना है या नहीं फैसला कर सकती है। यहां यह भी गौरतलब है कि द्रमुक कोटे के दोनों मंत्रियों के स्थान पर अभी कोई मंत्री नियुक्त नहीं किया गया है। लाख कोशिशों के बाद भी डीएमके ने नए नाम नहीं भेजे हैं। लिहाजा कांग्रेस को अभी भी इस बात की आशंका है कि नए मंत्रिमंडल विस्तार में भी द्रमुक नेताओं से बात करने को कहा गया है। इस बात के लिए भी रणनीति बन रही है कि द्रमुक के समर्थन वापसी की स्थिति में नए राजनीतिक दलों से बात की जाए। छह सांसदों वाले राष्ट्रीय लोकदल से बात लगभग पक्की है। चौ. अजीत सिंह को नए विस्तार में जगह मिलनी लगभग पक्की है। इसके अलावा सपा और बसपा कांग्रेस के पास अतिरिक्त विकल्प हैं। अगर द्रमुक समर्थन वापस लेता है और उधर ममता बनर्जी भी पेट्रोल के दामों में वृद्धि को लेकर समर्थन वापस लेती हैं तो कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। मायावती भी आसानी से मानने वाली नहीं। उनका ऐसे समय समर्थन देना जब यूपी विधानसभा चुनाव सिर पर है, एक चुनौतीपूर्ण फैसला होगा। भगवान राम को गाली देना करुणानिधि पर भारी पड़ रहा है।
2G, Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, DMK, kani Mozhi, Karunanidhi, Shahid Balwa, UPA, Vir Arjun

Thursday, 3 November 2011

क्या नीरा राडिया देश से भागने की तैयारी में है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd November 2011
अनिल नरेन्द्र
 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की इतनी बारीकी जानकारी अगर नीरा राडिया के टेप से उजागर न होते तो शायद कभी पता नहीं चलती। नीरा राडिया के रतन टाटा, मुकेश अम्बानी, वीर सांघवी, बरखा दत्त इत्यादि से हुई बातचीत को अगर टेप नहीं किया जाता तो इतनी डिटेल्स का पता नहीं चलता। इस दृष्टि से नीरा राडिया का इस घोटाले को उजागर करने में अच्छा योगदान रहा। अब खबर आई है कि नीरा राडिया ने अचानक इस कारोबार को छोड़ने का फैसला किया है। नीरा राडिया ने बहुचर्चित जनसम्पर्प परामर्श देने वाली अपनी कम्पनी वैष्णवी कम्युनिकेशन को बन्द करने का फैसला किया है। पिछले साल राडिया की बातचीत लीक होने के बाद वह सुर्खियों में रही। हालांकि उनके खिलाफ कोई आरोप पत्र तो दाखिल नहीं किया गया है लेकिन सीबीआई ने उन्हें भी गवाह बनाया है। नीरा ने एक बयान में कहा कि परिवार के प्रति जवाबदेही तथा स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए मैंने किसी भी ग्राहक के साथ अनुबंध का नवीनीकरण नहीं करने तथा परामर्श सेवा कारोबार से हटने का निर्णय किया है। खबर है कि नीरा राडिया ने तमाम वैष्णवी कम्युनिकेशन के कर्मचारियों को 10 साल का तोहफा कम्पनी बन्द होने के रूप में दिया है। कम्पनी की स्थापना के 10 साल पूरे हो रहे थे कि एक दिन पहले ही राडिया ने बिजनेस बन्द करने का ईमेल भेज दिया। अब ज्यादातर कर्मचारियों को नई नौकरी के लिए परेशान होना पड़ सकता है। राडिया की कम्पनी वैष्णवी कम्युनिकेशंस प्रा. लि. 2001 में बनाई गई थी। बाद में इसे सिर्प टाटा ग्रुप का पीआर वर्प देखने का जिम्मा देकर तीन कम्पनियां और बनाई गईं। मुकेश अम्बानी की रिलायंस का काम देखने के लिए `न्यूकॉम' और बाकी कम्पनियों का काम देखने के लिए `विटकॉम' और `नोएसिस।' चारों कम्पनियों में करीब 200 कर्मचारियों को अब नई नौकरी तलाशनी पड़ेगी। ग्रुप के साथ पहले जुड़े रहे कुछ लोगों को इस सारे मामले में कोई लम्बा प्लान दिख रहा है, जिसे समझने में वक्त लग सकता है।
नीरा राडिया के फैसले से सीबीआई असमंजस की स्थिति में है। सीबीआई ने नीरा राडिया को एक गवाह बना रखा है। सीबीआई का कहना है कि राडिया को अदालत को अपने फैसले के बारे में बताना पड़ेगा, हालांकि सीबीआई अपने गवाहों पर किसी प्रकार का दबाव तो नहीं बना सकती पर अंतिम फैसला तो अदालत में ही होगा। सीबीआई को यह भी शक है कि नीरा राडिया देश छोड़कर विदेश जाकर बस सकती है। उल्लेखनीय है कि आयकर विभाग ने 2008-09 में नीरा राडिया की बातों को टेप करके मामले का पर्दाफाश किया था। आयकर विभाग भी राडिया के भागने से परेशान-हैरान है। क्योंकि अभी तो उन्हें इन्कम टैक्स की चोरी केस का आंकलन भी करना है कि नीरा राडिया को कितना टैक्स जमा करना है। सम्भव है कि अदालत उन्हें देश छोड़ने से मना कर दे या कोई सरकारी एजेंसी उन्हें देश छोड़कर भागने से रोके।
2G, Anil Narendra, CBI, Daily Pratap, Neera Radia, Ratan Tata, Vir Arjun

Thursday, 13 October 2011

मारन का नंबर आ गया है पर रतन टाटा अभी भी बचे हुए हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th October 2011
अनिल नरेन्द्र
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में करुणानिधि एंड कंपनी का एक विकेट डाउन होने वाला है। ए. राजा, कनिमोझी के बाद पूर्व मंत्री दयानिधि मारन का नंबर है। दयानिधि मारन पर सीबीआई का फंदा कसा जा चुका है। इस मामले में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज करा दी है। सीबीआई की एफआईआर में दयानिधि मारन के साथ उनके भाई कलानिधि मारन, मलेशिया के मैक्सिस ग्रुप के चेयरमैन टी आनंद कृष्णन व निदेशक रॉल्फ मार्शल समेत तीन कंपनियों को आरोपी बनाया गया है। रविवार को एफआईआर दर्ज करने के बाद जांच एजेंसी ने सोमवार को मारन के दिल्ली और चेन्नई स्थित आवास व दफ्तरों पर छापा मारा। एफआईआर के अनुसार संचार मंत्री रहते हुए दयानिधि मारन ने अनिवासी भारतीय उद्योगपति एस शिवशंकरन पर एयरसेल को बेचने के लिए दबाव डाला। एयरसेल स्पेक्ट्रम आवंटन को मारन ने लगभग दो साल तक लटकाए रखा और स्पेक्ट्रम तभी दिया गया जब शिवशंकरन ने एयरसेल को मलेशियाई कंपनी मैक्सिस ग्रुप को बेच दिया। यही नहीं 14 सर्पिल में एक साथ स्पेक्ट्रम मामले के बाद मैक्सिस ग्रुप की सहयोगी कंपनी एस्ट्रो ने मारन परिवार की कंपनी सन डायरेक्ट में लगभग 600 करोड़ रुपए का निवेश किया। आरोप है कि एस्ट्रो ने सन डायरेक्ट के शेयर को बाजार भाव से अधिक कीमत पर खरीद कर परोक्ष रूप से मारन को रिश्वत दी।
2जी स्पेक्ट्रम में घोटाले की जांच अभी चल ही रही है। जनसंपर्प एजेंसी चलाने वाली नीरा राडिया और उनके कानटेक्ट्स की जांच अभी भी अधूरी चल रही है। नीरा राडिया के टेप जब जनता के सामने उजागर हुए तब पूरे देश को यह जानकर गहरा धक्का लगा कि जो मंत्री सरकार चलाते हैं और जनता जिन्हें समझती है कि इन्हें देश के पधानमंत्री चुनते हैं वह मंत्री पधानमंत्री द्वारा न चुने जाकर देश के पमुख औद्योगिक घराने द्वारा बनाए जाते हैं और यह घराने अपने पसंदीदा नेताओं को मंत्री बनवाने के लिए किस तरह से और किस स्तर तक जाकर लाबिंग करते हैं, यह नीरा राडिया मामले के बाद सामने आया। नीरा पकरण में देश के पमुख औद्योगिक घराने टाटा का नाम सामने आया कि राडिया टाटा घराने के लिए काम करती है और उनके राजनैतिक तथा व्यापारिक हितों का कितना ध्यान रखती है। लेकिन यह खुलासा सिर्प एक सिरा था। राडिया टेप मामले का दूसरा सिरा 2जी स्पेक्ट्रम महाघोटाले से जाकर जुड़ गया। इस महाघोटाले में टाटा की भूमिका पर कैग ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है। राडिया पकरण में होना तो यह चाहिए था कि सरकार यह सुनिश्चित करती कि भविष्य में अब ऐसा संदर्भ न जाए कि सरकार किसी भी औद्योगिक घराने से पभावित है। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ है। 2जी घोटाले की जांच से जिस पकार से रतन टाटा को बाहर किया जा रहा है वह निश्चित ही देश की जनता के सामने सरकार और औद्योगिक घराने की दुरभिसंधि का दूसरा झटका है। यूपीए सरकार के लिए 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला किसी दलदल से कम साबित नहीं हो रहा है। सरकार इससे निकालने के लिए भले ही जितने पयास करती है उतना ही इसमें धंसती चली जा रही है। इस घोटाले में रोज ही नए-नए नाम सामने आ रहे हैं। मारन बंधुओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। इसी पकार एस्सार ग्रुप के रुइया बंधुओं को भी सीबीआई जल्द लपेटने वाली है। एस्सार से पूर्व रिलायंस, यूनीटेक, स्वान और वीडियोकॉन जैसी कंपनियों के बड़े अधिकारी तिहाड़ में पहुंच चुके हैं। हाल ही में वित्त मंत्रालय द्वारा पधानमंत्री कार्यालय को भेजी गई चिट्ठी से गृहमंत्री पी. चिदंबरम का नाम भी सामने आया है। हालांकि इस घोटाले के सूत्रधार ए राजा पहले भी इस तरफ कई बार इशारा कर चुके थे लेकिन राजा के आरोप की बदले की भावना के तहत लगाया गया आरोप माना गया। लेकिन इस महाघोटाले के पकरण में सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि टाटा की भूमिका उन सभी औद्योगिक घराने से ज्यादा व्यापक और स्पष्ट है पर अभी तक कोई जांच या आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया? टाटा पर इस घोटाले में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का न सिर्प आरोप है बल्कि काफी पुख्ता सबूत भी है। लेकिन रतन टाटा का सरकार से विपक्ष तक में कितना पभाव है यह इसी से साफ है कि टाटा घराना इस महाघोटाले की जांच के दायरे से लगभग बाहर है। इस महाघोटाले में टाटा की भूमिका पर सबसे पहले उंगली कैग ने उठाई। कैग ने अपनी रिपोर्ट में टाटा टेलीसर्विसिज की वजह से सरकारी राजस्व को 19.074 करोड़ रुपए का नुकमसान होने का दावा किया है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में टाटा की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की है। टाटा की इस महाघोटाले में भूमिका जगजाहिर है कि ए राजा को दूरसंचार मंत्री बनवाने के लिए टाटा ने नीरा राडिया के माध्यम से किस पकार लाबिंग की। पूर्व दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन ने रतन टाटा से संबंध मधुर नहीं थे और यूपीए के पथम कार्यकाल में टाटा को मारन का सहयोग नहीं मिला था। अत रतन टाटा नहीं चाहते थे कि दयानिधि मारन फिर से दूरसंचार मंत्री बनें। लेकिन सच तो यह है कि टाटा ने सिर्प लाबिंग ही नहीं की बल्कि एक तरीके से घूस के तौर पर डीएमके पमुख करुणानिधि को चेन्नई में करोड़ों की जमीन उपहार में दी और बाद में उस जमीन पर भवन का निर्माण भी करवाया। इसी सब का पभाव था कि ए राजा के मंत्री रहते रतन टाटा को 2जी लाइसेंस देने के लिए मंत्रालय ने किसी भी नियम की परवाह नहीं की। हमारा मानना है कि रतन टाटा की विस्तार से जांच होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो यह जांच और घोटाले का पूरा पर्दाफाश नहीं होगा। नीरा राडिया के टेपों की पता नहीं क्यों जांच और उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही?
2G, Anil Narendra, CBI, Daily Pratap, Dayanidhi Maran, DMK, Karunanidhi, Ratan Tata, Tata Teleservices, Vir Arjun

Saturday, 8 October 2011

अगला लोकसभा चुनाव कांग्रेस राहुल के नेतृत्व में लड़ेगी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8th October 2011
अनिल नरेन्द्र
अब यह साफ होने लगा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी युवराज यानि राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। श्री दिग्विजय सिंह तो बहुत पहले से ही कहते आ रहे हैं कि राहुल गांधी को अब देश की बागडोर सम्भाल लेनी चाहिए पर अब तो मनमोहन सिंह सरकार के नम्बर दो मंत्री व वरिष्ठतम नेता प्रणब मुखर्जी ने कह दिया है कि लोकसभा का अगला चुनाव कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ेगी। पार्टी ने इसके लिए अपनी तैयारी पूरी कर ली है। प्रणब मुखर्जी ने राहुल का नाम आगे करके यह भी जता दिया है कि वह प्रधानमंत्री रेस में शामिल नहीं हैं। यह पता नहीं कि उन्होंने अपने मन से कहा या हालात देखकर दुःखी मन से या फिर खुंदक में। बहरहाल कारण जो भी हो, प्रणब दा का यह कहना बहुत महत्व रखता है। प्रणब के यह कहने के अगले ही दिन पार्टी प्रवक्ता राशिद अल्वी ने इसे आगे बढ़ाते हुए कहा कि राहुल गांधी कांग्रेस का भविष्य है और कांग्रेस देश का भविष्य। अल्वी ने कहा कि 42 वर्षीय राहुल गांधी कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं और तमाम युवा नेताओं में से सबसे कद्दावर। राहुल की ताजपोशी इसलिए भी अब सम्भव लगती है, क्योंकि बेशक श्रीमती सोनिया गांधी की सफल सर्जरी हो गई है और वह ठीक लग रही हैं पर यह बीमारी ऐसी है कि यह सोनिया को चैन से जीने नहीं देगी। स्वास्थ्य के कारण सोनिया की पार्टी गतिविधियों में सक्रियता घटनी ही है। राहुल को आगे करने में पार्टी को यह भी फायदा होगा कि देश का तमाम युवा कांग्रेस के प्रति राहुल के कारण आकर्षित हो सकता है। इस घटनाक्रम से एक और बात उभर कर आती है। वह है निवर्तमान प्रधानमंत्री, डॉ. मनमोहन सिंह की कारगुजारी से पार्टी प्रसन्न नहीं है। मनमोहन सिंह का अपने मंत्रिमंडल पर ही कंट्रोल नहीं, देश को वह क्या कंट्रोल करेंगे। उनके नम्बर दो और तीन में भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ है। उनके दाहिने हाथ को यह नहीं मालूम कि उनका बायां हाथ क्या कर रहा है। एक के बाद एक घोटाले के पर्दाफाश होने के बाद आज कांग्रेस की छवि धरातल पर है। इसे उभारने के लिए कांग्रेस को पार्टी में भारी सर्जरी करने की जरूरत है। केवल राहुल को प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने से काम नहीं चलेगा। राहुल को अपनी टीम खड़ी करनी होगी। इस टीम को आने वाले दिनों में अपनी पोजीशन ग्रहण करनी होगी। यह काम शुरू भी हो चुका है। इस क्रम की शुरुआत पीएमओ पर अपना कंट्रोल करने से हो चुकी है। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधान सचिव के पद पर पुलक चटर्जी की ताजपोशी और पिछले सात सालों से प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव रहे टीके नायर की विदाई और कई अन्य वरिष्ठ अफसरों का कार्यकाल पूरा होने के बाद विदाई होने से न केवल नए चेहरे ही सामने आएंगे बल्कि पीएमओ का एक नया रूप, काम करने का ढंग, सोच भी सामने आएगी। सबसे बड़ी बात कि दस जनपथ का पीएमओ पर फुल कंट्रोल होगा। पुलक चटर्जी दस जनपथ के करीबी विश्वास पात्र हैं, इसलिए उनके काम में कोई हस्तक्षेप या प्रधान सचिव की कोई भी शक्ति यदि नायर को दी गई तो दस जनपथ इसका विरोध करेगा, क्योंकि पुलक को पीएमओ में लाने वाला दस जनपथ ही है। टीके नायर से वैसे भी कांग्रेसी नाखुश थे। 2जी स्पेक्ट्रम मामले पर वित्त मंत्रालय के नोट के संबंध में जिसे बनाने में नायर की बड़ी भूमिका थी। लगता है कि अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव राहुल के लिए ट्रायल के रूप में देखे जाएंगे। इसका मतलब है कि चुनावों तक सोनिया गांधी संगठन की बागडोर धीरे-धीरे राहुल को सौंप देंगी। हाल ही में अपनी बीमारी के दौरान उन्होंने टेस्ट केस के तौर पर राहुल को पार्टी की कमान सौंपी थी। राहुल की उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अग्निपरीक्षा होगी। उनको मिशन 2012 में कितनी सफलता मिलती है इस पर भी कांग्रेस की नजरें टिकी होंगी। कुल मिलाकर अब यह साफ होता जा रहा है कि राहुल गांधी कांग्रेस के अगले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे।
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Tuesday, 4 October 2011

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अनिल अम्बानी की भूमिका?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th October 2011
अनिल नरेन्द्र
सीबीआई ने दावा किया है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में रिलायंस धीरुभाई अम्बानी ग्रुप के मुखिया अनिल अम्बानी की भूमिका की आगे जांच करने की जरूरत है और उन्हें क्लीन चिट नहीं दी गई। आरएडीएजी अध्यक्ष अनिल अम्बानी को क्लीन चिट दिए जाने से संबंधित खबरें आने के बाद सीबीआई ने रविवार को अपने प्रवक्ता के माध्यम से इस बारे में स्थिति स्पष्ट की है। सीबीआई ने कहा कि अनिल अम्बानी की भूमिका की जांच इसलिए भी करनी जरूरी है क्योंकि तिहाड़ जेल में बन्द उनके तीन शीर्ष अधिकारियों ने किसी भी तरह के गलत काम में शामिल होने से इंकार किया है। सीबीआई ने कहा कि रिलायंस अनिल धीरुभाई अम्बानी ग्रुप के तीन गिरफ्तार वरिष्ठ अधिकारी जांच के दौरान दिए गए अपने बयानों से मुकर गए हैं इसलिए वास्तविक लाभान्वितों का पता लगाने के लिए आगे जांच की जा रही है। सीबीआई ने कहा है कि आरएडीएजी के तीन अधिकारियों गौतम दोषी, सुरेन्द्र पीपारा और हरि नायर ने आपराधिक संहिता प्रक्रिया की 161 धारा के तहत दिए गए अपने वक्तव्य में फैसले के लिए पूरी जिम्मेदारी ली थी लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय में वे इससे मुकर गए। सीबीआई की ओर से पेश वकील केके वेणुगोपाल ने न्यायाधीश जीएस सिंघवी तथा एके गांगुली की खंडपीठ के समक्ष कहा कि उन्होंने फैसले की सारी जिम्मेदारी ली थी लेकिन उच्च न्यायालय में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान वह बोले कि हम तो केवल कर्मचारी थे और हमें कोई लाभ नहीं मिला। सीबीआई ने अदालत को इस घोटाले में अम्बानी, टाटा ग्रुप, वीडियोकॉन के स्वामित्व वाली डेटम तथा अटार्नी जनरल जीई वाहनवती के खिलाफ विभिन्न आरोपों में अपनी जांच की विस्तृत जानकारी दी और कहा कि अनिल अम्बानी के खिलाफ जांच जारी है लेकिन उसे इस घोटाले में अन्य के खिलाफ अभियोजयता संबंधी कोई साक्ष्य नहीं है। जांच एजेंसी द्वारा दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में कहा गया है कि स्वान टेलीकॉम में 9.9 फीसदी शेयर के मामले को लेकर अनिल अम्बानी और अन्य कर्मचारियों की भूमिका की जांच की जा रही है। ये शेयर मारीशस की कम्पनी डेल्फी को बेचे गए थे। सीबीआई ने जांच की प्रगति के बारे में 29 सितम्बर को उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत `स्थिति पत्र' में कहा है कि जांच में ऐसा कोई मौखिक या लिखित सबूत नहीं मिला है जिससे लगता है कि विभिन्न कम्पनियों के पुनर्गठन और धन के हस्तांतरण में अनिल अम्बानी संलिप्त हैं। सीबीआई ने यह जवाब इस मामले में याचिका दायर करने वाले वकील प्रशांत भूषण की ओर से अदालत को दिए गए एक पत्र के जवाब में दिया। अदालत में सीबीआई ने कहा कि याचिकाकर्ता ने इस पत्र के उसकी जांच की निष्पक्षता और ईमानदारी के बारे में गलत राय पैदा करने की कोशिश की है। जनता जानना चाहती है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में श्री अनिल अम्बानी की सही भूमिका क्या थी? अगर सीबीआई की जांच पर शक किया जा रहा है तो इसके लिए वह खुद जिम्मेदार है जो बार-बार विरोधाभास बयान दे रही है। कभी क्लीन चिट देती है तो कभी कहती है कि आगे जांच करना जरूरी है और हमने अनिल अम्बानी को कोई क्लीन चिट नहीं दी?

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Sunday, 2 October 2011

सोनिया की पहल पर प्रणब-चिदम्बरम में युद्ध विराम



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2nd October 2011
अनिल नरेन्द्र
मनमोहन सिंह सरकार में चल रही उठापटक को रोकने के लिए अंतत पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को मोर्चा सम्भालना ही पड़ा। संकट मोचक के तौर पर सामने आईं सोनिया गांधी फौरी तौर पर वर्तमान संकट टालने में कामयाब हो गई हैं। लेकिन यह सिर्प फौरी तौर पर है, क्योंकि एक साथ फोटो खिंचवाने से प्रणब मुखर्जी और पी. चिदम्बरम के मतभेद समाप्त होने से रहे। प्रणब दा इन दिनों बहुत नाराज चल रहे हैं। दादा इतने गुस्से में क्यों हैं कि न्यूयार्प में उन्होंने प्रधानमंत्री से त्याग पत्र तक देने की धमकी दे डाली? इसके जवाब में दादा समर्थक कह रहे हैं कि उन पर शक किया गया, नोट प्रकरण को इस तरह से पेश किया गया मानों उन्होंने ही वह जानबूझ कर नोट बनवाया था और फिर उसे लीक करवाया। पार्टी और सरकार के अन्दर सवाल यह भी फैलाए गए कि नोट बनाने की जरूरत क्या थी, जब नोट बन रहा था तो उसी वक्त उसकी भाषा पर गौर क्यों नहीं किया गया, नोट को आगे पीएमओ तक जाने क्यों दिया गया, उसी समय पार्टी नेतृत्व को क्यों नहीं बताया गया? अंदरुनी चर्चाओं के मुताबिक यह सवाल पूछे जा रहे हैं और यह प्रणब दा के हक में जा रहे हैं। यह नोट प्रणब दा की पहल पर नहीं बना। कैबिनेट सैकेट्रिएट, पीएमओ, टेलीकॉम और लॉ मिनिस्ट्री के अफसरों की पहल पर वह आंकलन हुआ और नोट बना। इतने विभागों के अफसर जिस मामले में शामिल हों, उसे कोई भी मंत्री कैसे रोक सकता है और क्यों रोकना चाहिए? यदि प्रणब इस नोट को रोकते या दबाते तो आज खुद भी सवालों के घेरे में आते? यह भी कि एक आरटीआई के जवाब में इस नोट की कॉपी प्रधानमंत्री कार्यालय के एक बड़े अधिकारी की इजाजत से दी गई। कॉपी देने से पहले वित्त मंत्रालय या वित्त मंत्री से पूछा तक नहीं गया और अब जब सब कुछ हो चुका है प्रणब मुखर्जी पर सारा गुनाह थोपा जा रहा है। इस हालत में उन्हें गुस्सा क्यों न आए?
अपना मानना है कि यह मामला अभी समाप्त नहीं हुआ। चिदम्बरम की मुश्किलों का अंत नहीं हुआ है। सोनिया के प्रयासों से मामला थमा है, समाप्त नहीं हुआ। प्रणब मुखर्जी ने नोट कैसे तैयार हुआ, किस-किस मंत्रालय से गुजरा, इसका ब्यौरा तो दिया है पर नोट में जो लिखा गया है वह तो झूठ नहीं है। नोट में जो लिखा है उससे चिदम्बरम कटघरे में खड़े हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, जेपीसी में भी अलग से चल रहा है। वहां भी तो इस नोट का संज्ञान लिया जाएगा। आज चिदम्बरम पार्टी के अन्दर अलग-थलग पड़े हैं। उनका समर्थन कांग्रेस पार्टी में इतना शायद नहीं है जितना डीएमके से उन्हें मिल रहा है। वह करुणानिधि के मुख्य प्रतिनिधि इस समय कांग्रेस में काम कर रहे हैं और डीएमके की मुश्किलें कम होने नहीं जा रही हैं। न केवल दयानिधि मारन के खिलाफ सीबीआई नया केस दर्ज करने की तैयारी कर रही है बल्कि 2जी स्पेक्ट्रम केस में सीबीआई ने तिहाड़ जेल में बन्द ए. राजा, उनके पूर्व सचिव चंदोलिया और तत्कालीन टेलीकॉम सचिव सिद्वार्थ बेहुरा के खिलाफ आईपीएस की धारा 409 के तहत मामला चलाने की दलील कोर्ट में दी है। सीबीआई का आरोप है कि इस मामले में राजा और अन्य के खिलाफ जनता के साथ विश्वासघात करने का आपराधिक मामला बनता है। अगर यह आरोप साबित हुआ तो उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। जाहिर है कि इससे द्रमुक खुश तो होने से रहा। उधर राजा ने कोर्ट में चिदम्बरम से बतौर गवाह पूछताछ करने की मांग की है। कटु सत्य तो यह है कि यह मामला खत्म नहीं हुआ है और पार्टी में लगातार यह कहा जा रहा है कि चिदम्बरम की भूमिका पर कोई फैसला सुप्रीम कोर्ट का रुख ही तय करेगा। पीएम और सोनिया गांधी के निर्देश पर सरकार की छवि बचाने के लिए भले ही प्रणब-चिदम्बरम साथ-साथ खड़े होने पर राजी हो गए, लेकिन ऐसा करने में दोनों में हिचक बाकी थी और अब भी है। प्रणब चिदम्बरम से तब से नाराज चल रहे हैं जब से उन्होंने वित्त मंत्रालय की जासूसी करवाई। वह किस्सा प्रणब मुखर्जी भूले नहीं हैं। अब भी चिदम्बरम वित्त मंत्रालय में दखलअंदाजी से बाज नहीं आ रहे। दो दिन पहले उन्होंने एक कार्यक्रम में यह कहा कि अमीर ज्यादा टैक्स भरने के लिए तैयार रहें। सवाल उठता है कि क्या यह मामला गृह मंत्रालय से जुड़ा है? क्या यह वित्त मंत्री के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं है?
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Friday, 30 September 2011

आफेंस इज दी बेस्ट डिफेंस


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अंग्रेजी में एक कहावत है "आफेंस इज दी बेस्ट डिफेंस" यानि कि आक्रमण करना सबसे अच्छा बचाव है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसी तकनीक को अपनाया लगता है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच से झुलस रही केंद्र की यूपीए सरकार के रणनीतिकार जहां डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए हैं वहीं अमेरिका से स्वदेश लौटते ही डॉ. मनमोहन सिंह ने विपक्ष पर जमकर हमला बोल दिया और विपक्ष के मंसूबों और इरादों की हवा निकालने का प्रयास किया है। विपक्ष पर सरकार को अस्थिर करने और जबरदस्ती देश को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने का आरोप प्रधानमंत्री ने लगाकर पूरे मामले को एक नई दिशा देने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री ने यह जवाबी हमला हवा में एयर इंडिया के विमान से ही शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि हम पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे और मध्यावधि चुनाव नहीं होगा। मंत्रिमंडल के सदस्यों में टकराव की बातें मीडिया की कल्पना है। पी. चिदम्बरम पर मुझे पहले भी पूरा भरोसा था और आज भी है। न्यूयार्प में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने के बाद फ्रैंकफर्ट से नई दिल्ली जाते हुए विमान में पत्रकारों से बात करते हुए मनमोहन सिंह ने माना कि बिगड़ती अर्थव्यवस्था का असर भारत पर भी हुआ है। मुद्रास्फीति हमारी सबसे बड़ी समस्या है लेकिन हम स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। डॉ. सिंह ने स्वीकार किया कि उनकी सरकार की छवि के बारे में जनता के बीच समस्या हो सकती है जिसे सही करना जरूरी है।
सरकार को अस्थिर कर देश को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने के विपक्ष पर लगाए प्रधानमंत्री के आरोप पर भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर सरकार गिरेगी तो अपने कुकर्मों से, हमें साजिश करने की जरूरत नहीं है और न ही ऐसा करने के लिए हमारे पास पर्याप्त संख्या बल है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि प्रधानमंत्री ने विदेश से लौटते ही आरोप लगाया है कि विपक्ष सरकार को अस्थिर करने में जुटा है। सुषमा ने कहा कि सरकार के अस्थिरता की ओर बढ़ने का ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ने की बजाय बेहतर यह होगा कि प्रधानमंत्री अपने घर को दुरुस्त करने की फिक्र करें। सुषमा ने कहा कि सरकार और उनके मंत्रियों को लेकर जो भ्रष्टाचार के खुलासे हो रहे हैं उन्हें विपक्ष ने नहीं गढ़ा है बल्कि उन कुकर्मों को खुद उनके द्वारा संचालित सरकार की एजेंसियों ने ही उजागर किया है। अरुण जेटली ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल घोटाला, यह विपक्ष ने नहीं किया। नोट के बदले वोट कांड से विपक्ष लाभान्वित नहीं हुआ। अस्थिरता की ओर बढ़ने का कारण सरकार में नेतृत्व का गंभीर संकट होना है। यह सरकार स्वयं विध्वंसक मोड़ में है। भाजपा के दोनों नेताओं ने दावा किया कि वित्त मंत्रालय के नोट से साबित हो चुका है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला में जो अपराध तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा ने किया वही अपराध हूबहू चिदम्बरम ने भी किया। उन्होंने कहा कि इस घोटाले में प्रधानमंत्री को कहीं भी अंधेरे में नहीं रखा गया था बल्कि उन्हें राजा और चिदम्बरम ने हर कदम की बाकायदा जानकारी दी। प्रधानमंत्री की यह रणनीति कितनी सार्थक साबित होगी यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे पर एक तरह से उन्होंने यह बयान देकर खुद अपनी सरकार के जीवन पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जब प्रधानमंत्री खुद ही मध्यावधि चुनाव की बात करने लगे तो इसका जनता-जनार्दन में क्या संदेश जाएगा, आप खुद ही समझदार हैं।
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Wednesday, 28 September 2011

अब क्या होगा आगे ः नजरें सुप्रीम कोर्ट पर



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th September 2011
अनिल नरेन्द्र
देश के लिए कितने दुःख की बात है कि अमेरिका में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से 2जी घोटाले पर प्रश्न पूछे जा रहे हैं। सारी दुनिया में घोटालों की इस सरकार ने पूरे देश की इज्जत मिट्टी में मिला दी है। पता नहीं दुनिया भारत के बारे में क्या सोचती होगी? इधर देश में इस सरकार की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। 2जी घोटाले में रोज नई परतें खुलती जा रही हैं और जैसे-जैसे नए रहस्योद्घाटन हो रहे हैं, पता चल रहा है कि इस घोटाले की ऊपर से नीचे तक सबको खबर थी पर किसी ने भी इसे रोकने की कोशिश नहीं की। बेशक प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री वर्तमान और भूतपूर्व खुद घोटाले में शामिल न भी रहे हों पर इससे तो अब वह भी इंकार नहीं कर सकते कि सब कुछ उनकी जानकारी और कुछ हद तक स्वीकृति से हुआ। प्रधानमंत्री बेशक तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम को क्लीन चिट दे रहे हों और कह रहे हों कि उन्हें गृहमंत्री पर पूरा भरोसा है पर इससे अब बात बनने वाली नहीं। 2जी घोटाले पर पूरी तरह घिर चुकी सरकार के संकटमोचकों के उपाय अब खत्म होने लग हैं। सरकार के शीर्ष नेतृत्व को अब इस घोटाले के जाल से बचाने के लिए यह सिद्ध करना जरूरी है कि पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के फैसले से देश के खजाने को किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ। बीते सप्ताह अदालत के सामने पेश टीआरएआई की रिपोर्ट इसी कोशिश का हिस्सा थी जो औंधे मुंह गिर पड़ी। घोटाले की जांच कर रही संयुक्त समिति भी इसी निष्कर्ष की दिशा में कोशिश कर रही है। राजा के फैसलों में सरकार के शीर्ष नेतृत्व की सहमति को साबित करने वाले तमाम दस्तावेजी सुबूत देश व अदालत के सामने हैं। ए. राजा के निर्णयों से राजस्व के नुकसान का पहलू यदि कानूनी तौर पर साबित हो जाता है तो फिर प्रधानमंत्री व तत्कालीन वित्त मंत्री इस हानि की परोक्ष जिम्मेदारी से शायद ही बच सकें। लाइसेंस लेने वाली एक कम्पनी एस टेल की एक चिट्ठी सरकार के लिए मुसीबत बनेगी। प्रधानमंत्री को मालूम था कि कम्पनियां 2जी स्पेक्ट्रम की ऊंची कीमत देने को तैयार हैं। नवम्बर 2007 में सीधी मनमोहन सिंह को लिखी चिट्ठी में एस टेल ने स्पेक्ट्रम के लिए 6000 करोड़ रुपये का राजस्व देने की पेशकश की थी। कम्पनी ने बाद में इसे बढ़ाकर 13752 करोड़ रुपये तक कर दिया। बाजार से इन संकेतों के बावजूद राजा ने स्पेक्ट्रम को कम कीमत पर बेचा और पीएमओ इस फैसले में राजा के साथ खड़ा रहा। स्पेक्ट्रम में कुल कितना घाटा हुआ या घपला हुआ इस नुकसान की गणना में कैग ने एस टेल की चिट्ठी में प्रस्तावित कीमत को ही प्रमुख मुद्दा बनाया है। राजा के फैसले से प्रधानमंत्री और तब के वित्त मंत्री की अनभिज्ञता का तर्प बिखर गया है। राजा के फैसलों से भ्रष्टाचार तो स्पष्ट है अलबत्ता इस फैसले से राजस्व के नुकसान का तर्प अभी विवादों में है। कैग 1,76,000 करोड़ रुपये का नुकसान का निष्कर्ष दे चुकी है जिसे सरकार ने नकार दिया है। सूत्र बताते हैं कि ताजा जानकारी के बाद यह साबित करने की अंतिम कोशिश होगी कि 2001 की कीमतों पर 2008 में स्पेक्ट्रम बेचने से खजाने को कोई नुकसान नहीं हुआ था। यही अंतिम रास्ता है जिससे भ्रष्टाचार का ठीकरा ए. राजा के सिर फूटेगा और सरकार के शीर्ष नेतृत्व देश का नुकसान कराने की तोहमत से बच सकेगा। वैसे सीबीआई ने राजा पर भ्रष्टाचार का जो मामला बनाया है उसमें यह दर्ज है कि संचार मंत्री के फैसलों से देश को करीब 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। सीबीआई को पूर्व संचार मंत्री व अन्याय पर अभियोग के लिए यह साबित करना होगा कि राजा के फैसलों से खजाने को भारी चपत लगी है। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर लगी हैं। देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की स्पेक्ट्रम में भूमिका की जांच को लेकर क्या निर्णय लेती है। यूपीए और कांग्रेस एक अभूतपूर्व संकट में फंसी हुई है जिसका फिलहाल तो कोई तोड़ नहीं निकल पा रहा है। कांग्रेस केवल इस बात से चिंतित नहीं है कि चिदम्बरम पर हमला किया जा रहा है बल्कि उसकी असली चिंता भाजपा की प्रधानमंत्री को लपेटने की योजना से है। यदि भाजपा एक बार चिदम्बरम के खिलाफ जांच शुरू करवाने में सफल हो गई तो इस जांच की आंच अपने आप प्रधानमंत्री तक पहुंच जाएगी। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई है। देखें अदालत में क्या होता है?2G, A Raja, Anil Narendra, CAG, Corruption, Daily Pratap, Manmohan Singh, P. Chidambaram, Pranab Mukherjee, Prime Minister, Scams, Supreme Court, Vir Arjun

Sunday, 25 September 2011

राक्षसों को मारने के लिए लक्ष्मण रेखा पार करनी पड़ती है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th September 2011
अनिल नरेन्द्र
ऐसा लग रहा है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला मनमोहन सिंह सरकार पर भारी पड़ रहा है। जहां एक ओर सरकार के अन्दर वरिष्ठतम मंत्रियों की खींचतान बढ़ती जा रही है वहीं सरकार और सीबीआई में भी मतभेद उभरकर सामने आ रहे हैं। केंद्र सरकार में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले प्रणब मुखर्जी जो इस समय वित्त मंत्री हैं, के तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम जो वर्तमान में गृहमंत्री हैं, के बीच शीत युद्ध अब उजागर हो चुका है। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के इस घमासान से पार्टी और सरकार में जिस तरह से असहज स्थिति बनी है वह कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सरकार के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं। पार्टी इस बार मसले को पहले से कहीं ज्यादा गम्भीर मान रही है क्योंकि 2जी मामला सरकार के गले की फांस बन गया है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट वित्त मंत्रालय के नोट का संज्ञान लेता है तो स्थिति सरकार के लिए अत्यंत गम्भीर बन सकती है। कांग्रेस के एक महासचिव के मुताबिक इस बार सरकार के नम्बर दो मंत्री के महकमे की ओर से विवादित तथ्य सामने आए हैं। लिहाजा यह आसानी से नहीं निपटाया जा सकेगा। पार्टी का मानना है कि प्रणब और चिदम्बरम की आपसी खींचतान से सरकार की पहले से ही खराब छवि और ज्यादा खराब हो रही है।
उधर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी को लेकर अदालत केंद्र और सीबीआई में मतभेद भी सामने आ गए हैं। केंद्र ने बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट में जांच पर निगरानी जारी रखने का विरोध किया था, वहीं सीबीआई ने दलील दी कि निगरानी जारी रहनी चाहिए। केंद्र सरकार ने यहां तक कह दिया कि वह (सुप्रीम कोर्ट) 2जी घोटाले के मामले में गृहमंत्री पर सुनवाई नहीं कर सकती। उसने कोर्ट से कहा कि वह इस मामले में आदेश पारित कर लक्ष्मण रेखा पार न करे। यह सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों को चुनौती देना था पर सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि आप लक्ष्मण रेखा की बात कर रहे हैं, यदि सीता ने लक्ष्मण रेखा पार नहीं की होती तो रावण मारा नहीं जाता। लक्ष्मण रेखा राक्षसों को मारने के लिए ही पार की जाती है, ऐसा लोग कहते हैं। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एके गांगुली की बैंच ने यही नहीं कहा बल्कि सरकार और सीबीआई के मामले में हो रही जांच में टालमटोल करने पर भी फटकार लगाई। इसके बाद सीबीआई के वकील ने कहा कि अदालत जांच का आदेश देती है तो वह उसका पालन करेगी। उसने यहां तक आश्वासन दिया कि वह सुब्रह्मण्यम स्वामी की भूमिका के बारे में अदालत में दाखिल दस्तावेजों की भी जांच को तैयार है। दरअसल अदालत ने परोक्ष रूप से संकेत दिया कि शीर्ष पदों पर बैठे आरोपियों को सजा दिलवाने के लिए वह पुराने फैसलों को नजरअंदाज कर जांच जारी रख सकती है। इससे पहले न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली की पीठ के समक्ष केंद्र की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पीपी राव ने शीर्ष अदालत के पुराने फैसलों का हवाला देकर निगरानी की तय लक्ष्मण रेखा होने की दलील दी थी। पीठ ने राव से ही पूछ लिया कि आखिर क्यों अदालत की ओर से जांच की निगरानी का चलन शुरू हुआ? विनीत नारायण के मामले तक हमने यह नहीं सुना था। यह चलन इसलिए शुरू हुआ क्योंकि दुर्भावना का स्वरूप बड़ा होता गया और पारम्परिक तरीके कमजोर पड़ गए। जहां एक ओर तो सरकार इस घोटाले में अदालत की निगरानी जारी रखने पर एतराज कर रही है वहीं दूसरी ओर सीबीआई की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने कहा कि जांच अदालत की निगरानी में ही जारी रहनी चाहिए। इस पर पीठ ने केंद्र से पूछा कि सॉलिसिटर जनरल ने पहले अदालत की ओर से निगरानी पर सहमति जताई थी, अब यदि सरकार अपना बयान वापस ले रही है तो बताए? जवाब में राव ने कहा कि वह सॉलिसिटर जनरल के बयान को वापस नहीं ले रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में हुई कार्रवाई से जहां सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के मतभेद उभर कर सामने आए हैं वहीं सरकार और सीबीआई के भी मतभेद सामने आ गए हैं।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के बीच युद्ध अब खुलकर सामने आ चुका है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सीबीआई द्वारा चार्जशीट दायर करने के एक सप्ताह पहले ही वित्त मंत्रालय के उस नोट का बाहर आना जिसमें यह कहा गया हो कि तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम स्पेक्ट्रम के मूल्य को लेकर ए. राजा से सहमत थे, आने वाली घटनाओं की ओर संकेत है और यह भी कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के दफ्तर में जासूसी प्रकरण के बाद किस तरह से प्रणब और चिदम्बरम के बीच कटु युद्ध छिड़ा हुआ है। सभी की नजरें अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा अमेरिका से लौटने पर टिकी हुई हैं। देखें प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस नए झंझट से कैसे निपटते हैं?
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Saturday, 24 September 2011

चिदम्बरम सरकार और पार्टी दोनों के लिए लाइबिलिटी बन गए हैं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th September 2011
अनिल नरेन्द्र
पौने दो लाख करोड़ रुपये के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में एक अहम मोड़ आ गया है। अब इस घोटाले के घेरे में तत्कालीन वित्त मंत्री और वर्तमान गृहमंत्री पी. चिदम्बरम भी आ गए हैं। उन पर आरोप विपक्ष या जांच एजेंसी सीबीआई ने नहीं बल्कि वर्तमान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की ओर से लगाए गए हैं। मुखर्जी की ओर से 25 मार्च 2011 को प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदम्बरम चाहते तो 2जी घोटाला रोक सकते थे। लेकिन उन्होंने 30 जनवरी 2008 को ए. राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी। उन्होंने कहा, `मैं अब एंट्री फीस या रेवेन्यू रोटिंग की वर्तमान दरों को रीविजिट (समीक्षा) नहीं करना चाहता।' चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदम्बरम चाहते तो स्पेक्ट्रम की पहले आओ, पहले पाओ की जगह उचित कीमत पर नीलामी की जा सकती थी। 11 पन्नों की यह चिट्ठी आने वाले वक्त में चिदम्बरम के लिए आफत का सबब बन सकती है। यह चिट्ठी आरटीआई के तहत विवेक गर्ग ने हासिल की है। जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने बुधवार को यह पत्र सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एके गांगुली की बैंच के समक्ष दस्तावेज के तौर पर पेश किया। वित्त मंत्रालय में उपनिदेशक पद पर तैनात डॉ. पीजीएस राव ने प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव विनी महाजन को 25 मार्च 2011 को भेजी इस चिट्ठी से साफ है कि प्रणब मुखर्जी ये संकेत देना चाह रहे हैं कि अगर पी. चिदम्बरम अड़ जात तो शायद टेलीकॉम घोटाले के चलते देश को लाखों करोड़ों रुपये का नुकसान न होता। मंत्रालय पीएमओ को भेजी अपनी चिट्ठी में कहता है कि वित्त मंत्रालय 31 दिसम्बर 2008 तक के लाइसेंस 2001 के भाव पर बेचने के लिए तैयार हो गया।
चिदम्बरम पर सीधा आरोप लगता है कि ए. राजा जो कुछ कर रहे थे उसकी सहमति गृहमंत्री को थी। यही नहीं, 30 जनवरी 2008 को उन्होंने ए. राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी। ए. राजा भी शुरू से ही कह रहा है कि मैंने जो कुछ भी किया वह पीएमओ और गृह मंत्रालय की स्वीकृति और जानकारी में किया है। अब यह आरोप तो खुद सरकारी दस्तावेज से साबित होता है। पहले आओ, पहले पाओ की जगह ज्यादा कीमत पर स्पेक्ट्रम की नीलामी की जा सकती थी पर चिदम्बरम ने ऐसा कुछ नहीं किया। कम्पनियों को दिए यूएएस लाइसेंस का प्रावधान 5.1 सरकार को लाइसेंस की शर्तों को किसी भी समय बदलने की इजाजत देता है बशर्ते यह जनहित में हो या सुरक्षा के लिए जरूरी हो पर चिदम्बरम ने ऐसा कुछ नहीं किया। वित्त मंत्रालय ने टेलीकॉम सेक्टर में ग्रोथ के अनुपात फीस तय करने की बात की। राजा इससे सहमत नहीं थे। चिदम्बरम ने इसका भी विरोध नहीं किया। वित्त मंत्रालय 4.4 मेगा हर्ट्स से ऊपर के स्पेक्ट्रम को बाजार भाव में बेचना चाहता था। राजा ने यह सीमा 6.2 मेगा हार्ट्स कर दी। चिदम्बरम इसी पर मान गए। लेकिन किसी भी कम्पनी को 6.2 मेगा हर्ट्स से ऊपर स्पेक्ट्रम दिया ही नहीं गया। होना यह चाहिए था कि सरकार 4.4 मेगा हर्ट्स से ऊपर की नीलामी वाले रुख पर कायम रहती और कम्पनियों से नई दरों पर पैसा वसूलती पर यह भी नहीं हुआ।
यूपीए के अन्दर एक तरह से छिड़े गृह युद्ध से प्रधानमंत्री का परेशान होना स्वभाविक ही है। पीएम आजकल अमेरिका में हैं। मनमोहन सिंह ने प्रणब मुखर्जी और चिदम्बरम दोनों से फोन पर बात की है। गुरुवार शाम चिदम्बरम ने एक बयान जारी कर दोनों नेताओं से बातचीत की जानकारी दी। चिदम्बरम ने कहा कि मैंने प्रधानमंत्री को आश्वस्त किया है कि जब तक वह स्वदेश वापस नहीं लौटते हैं मैं इस विषय पर कोई बयान नहीं दूंगा। मनमोहन सिंह 27 सितम्बर को न्यूयार्प से भारत लौटेंगे। उधर वित्त मंत्री ने भी न्यूयार्प में मीडिया से कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसलिए मैं कुछ नहीं कहूंगा। वहीं केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि चिदम्बरम पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते हैं। वह सरकार के समर्थन के हकदार हैं। केंद्रीय मंत्री अम्बिका सोनी ने भी सरकार में दरार के दावों को खारिज रकते हुए कहा कि जो भी रिपोर्टें आ रही हैं उनमें सच्चाई कम ही है। Šजी स्पेक्ट्रम केस की जांच करने वाली लोक लेखा समिति के अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि चिदम्बरम तुरन्त इस्तीफा दें या उन्हें बर्खास्त किया जाए। सीपीएम ने चिदम्बरम की भूमिका की सीबीआई जांच की मांग की है। उधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा है कि चिदम्बरम 2जी केस में शामिल हैं। यह साफ हो गया है। न्यूयार्प से प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें चिदम्बरम पर पूरा भरोसा है। चौतरफा समस्याओं से घिरी यह यूपीए सरकार के लिए समय दिन प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। चूंकि इस बार सारे आरोप एक सरकारी दस्तावेज के आधार पर लग रहे हैं इसलिए इससे निकलना आसान नहीं होगा इस सरकार के लिए। रहा सवाल पी. चिदम्बरम का तो अब वह सरकार और कांग्रेस पार्टी के लिए एक लाइबिलिटी बनते जा रहे हैं।
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Wednesday, 3 August 2011

धमकियों पर उतरे मनमोहन सिंह पहले ही दिन चित्त

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd August 2011
अनिल नरेन्द्र
संसद का मानसून सत्र आरम्भ हो गया है। इस सत्र में आरोपों-प्रतिआरोपों की जबरदस्त बारिश होगी यह तय है। पहले ही दिन से यह शुरू हो गया। आमतौर पर शालीनता और कूल स्वभाव के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बौखलाहट में विपक्ष पर सीधा हमला बोल दिया। सोमवार से मानसून सत्र शुरू होने से पहले ही मनमोहन सिंह ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि हमें किसी मुद्दे पर चर्चा कराने का खौफ नहीं है। हम हर विषय पर बहस कराने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। यहां तक तो बात समझ में आती है पर इससे आगे प्रधानमंत्री ने जो कहा वह जरूर समझ से बाहर है। डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि हमारे पास विपक्षी खेमे को शर्मिंदा करने वाले बहुत सारे राज हैं। प्रधानमंत्री के इस हमले से विपक्ष बिफर गया। भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि एक तरफ तो प्रणब मुखर्जी, पवन बंसल और राजीव शुक्ला जैसे सरकार के प्रतिनिधि संसद को सुचारू रूप से चलाने का अनुरोध कर रहे हैं वहीं उनके नेता धमकियों पर उतर आए हैं। जब भाजपा नेता से इस बारे में पूछा गया तो नकवी ने कहा कि संसद चले और सभी कामकाज सुचारू रूप से चले ऐसी हमारी इच्छा है लेकिन सरकार टकराव और अहंकारी मुद्रा में है। उन्होंने कहा कि पहले उन्हें (प्रधानमंत्री) को मुर्दे उखाड़ने तो दीजिए फिर देखेंगे। पहले ही दिन सरकार एक ऐसी ओट से चारों खाने चित्त हुई जहां से शायद उसे उम्मीद नहीं रही होगी।
टीम अन्ना ने सरकार पर हल्ला बोल दिया। डॉ. मनमोहन सिंह की दूसरी पारी का दूसरा दिन ही मानसून सत्र ऐसा होगा किसी ने सपनों में भी नहीं सोचा होगा। गांधीवादी अन्ना हजारे पक्ष ने सोमवार को दावा किया कि केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र चांदनी चौक सहित नागपुर, वर्धा और अमरावती के मतदाताओं ने लोकपाल विधेयक के सरकार के मसौदे को नामंजूर कर सामाजिक कार्यकर्ताओं के जन लोकपाल विधेयक का समर्थन किया है। अन्ना ने दावा किया कि सिब्बल के निर्वाचन क्षेत्र के 85 फीसदी मतदाता हजारे पक्ष के जन लोकपाल विधेयक के पक्ष में हैं और 82 फीसदी मतदाता चाहते हैं कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाए। अन्ना ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण है जो देशवासियों को सही लोकशाही का रास्ता दिखाता है। यह जनमत संग्रह बताता है कि `सोशल ऑडिट' बहुत जरूरी है। हम चाहते हैं कि पूरे देश में इस तरह का जनमत संग्रह हो। नतीजे बताते हैं कि सिब्बल के निर्वाचन क्षेत्र में 88 फीसदी लोग संसद के भीतर सांसदों के आचरण और 86 फीसदी लोग उच्च न्यायपालिका को प्रस्तावित लोकपाल के दायरे में रखने के पक्षधर हैं। प्रश्नावली के जरिये 83 फीसदी मतदाताओं ने कहा कि संसद में लोकपाल विधेयक पर सांसदों को अपनी पार्टी के रुख के बजाय जनाकांक्षाओं के अनुरूप मतदान चाहिए।
टेलीकॉम घोटाला में एक बार फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम सामने आया है। सोमवार को ही आरोपी शाहिद बलवा की ओर से दी गई दलील में उसके वकीलों ने कहा कि पीएम को 2जी स्पैक्ट्रम आवंटन प्रक्रिया की पूरी जानकारी थी। बलवा ने तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी और सालिसिटर जनरल जी. वाहनवती का भी नाम लिया कि उन्हें भी आवंटन प्रक्रिया के संवाद की पूरी जानकारी थी। बलवा ने अपनी दलील को पुख्ता करने के लिए ए. राजा की उस चिट्ठी का भी जिक्र किया जो उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखी थी। बलवा ने सीबीआई पर पक्षपात का भी आरोप लगाया और कहा कि वह टाटा को बचाने की कोशिश में अन्य लोगों पर हाथ डाल रही है। बलवा के वकीलों ने यहां तक कहा कि ये स्पैक्ट्रम आवंटन पॉलिसी सरकार की थी और यही वजह है कि कहीं भी उसका विरोध नहीं किया गया। हर कदम पर उसे अनुमति मिलती गई। न तो प्रधानमंत्री और न ही अभी के संचार मंत्री ने किसी स्टेज पर ये कहा है कि इस पॉलिसी से सरकार को नुकसान हुआ है, फिर वे कटघरे में क्यों हैं?
इस मानसून सत्र की शुरुआत हंगामी हुई है। इस समय तो समूचा विपक्ष अपने-अपने कारणों से कांग्रेस पार्टी और सरकार से नाराज है। यह सत्र ठीकठाक से निकल जाए, यह प्रधानमंत्री और उनके सिपहसालारों के लिए चुनौती है। संसद के अन्दर और संसद के बाहर दोनों ही जगहों पर सरकार के खिलाफ मोर्चा गरम है। देखें सरकार कैसे निपटती है।

Tuesday, 2 August 2011

चंदोलिया ने घसीटा नीरा राडिया और रतन टाटा को

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2nd August 2011
अनिल नरेन्द्र
2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में आरोपी पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा के निजी सचिव रहे आरके चंदोलिया ने विशेष अदालत में सीबीआई पर आरोप लगाया है कि जांच एजेंसी उनके विरुद्ध गवाही देने के लिए गवाहों पर नाजायज दबाव बना रही है। सीबीआई उन्हें झूठे मामले में फंसाने की भी कोशिश कर रही है। शनिवार को पटियाला हाउस में सीबीआई ओपी सैनी की विशेष अदालत में चंदोलिया की ओर से जिरह पूरी कर ली गई। अब सोमवार को स्वान टेलीकॉम के प्रमोटर शाहिद उस्मान बलवा अपने बचाव में दलीलें देंगे। चंदोलिया के वकील विजय अग्रवाल ने कहा कि चंदोलिया की गिरफ्तारी के वक्त सीबीआई के पास उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं था, न ही जांच एजेंसी ने किसी भी गवाह को पेश किया। इस तरह इस साल 2 फरवरी को हुई उनकी गिरफ्तारी पूर्णत गैर-कानूनी थी। अग्रवाल ने कहा कि जिन लोगों को छोड़ दिया गया या जिन्हें गवाह बनाया जा रहा है, उन्हें विशेष अदालत में आरोपी के तौर पर होना चाहिए था। शुक्रवार को स्पेक्ट्रम मामले में चंदोलिया ने अपनी दलील में खुद को निर्दोष बताया और कहा कि उन्होंने तो सिर्प अपने बॉस के निर्देशों का पालन किया था। साथ ही नीरा राडिया और रतन टाटा को भी लपेटा। चंदोलिया के वकील ने सीबीआई के विशेष न्यायाधीश ओपी सैनी से कहा कि राजा के कथित सहयोगी असीरवदम आचारी ने कथित तौर पर कलेंग्नर टीवी को टाटा स्काई डीटीएच में लाने की साजिश रची और इसके लिए राजा और नीरा राडिया के बीच सम्पर्प का काम किया। इसमें नीरा राडिया को आरोपी बनाया जाना चाहिए। दलील के दौरान चंदोलिया के वकील ने कहा कि बातचीत के दौरान नीरा ने जब समझौते के सन्दर्भ में बात की, आचारी ने उनसे कहीं भी नहीं पूछा कि वह किस बारे में बात कर रही हैं। इससे पता चलता है कि आचारी को राजा की ओर से किए जा रहे कलेंग्नर टीवी और टाटा के बीच समझौते के बारे में जानकारी थी। इसे देखते हुए टाटा, नीरा और आचारी सहित कलेंग्नर टीवी को इस मामले में आरोपी बनाया जाना चाहिए। टाटा और नीरा राडिया बड़े लोग हैं और सीबीआई उन्हें छू तक नहीं पा रही लेकिन आचारी को क्यों नहीं? चंदोलिया ने कहा कि वे तो रोजमर्रा के कामकाज में ए. राजा की सहायता करने वाले अधिकारी मात्र थे। उनके वकील ने कहा कि मेरे मुवक्किल के बॉस ए. राजा थे। चंदोलिया ने तो सिर्प उनके निर्देशों का पालन किया। बॉस के निर्देशों का पालन करने के लिए एक सहायक मात्र थे। क्या वे (चंदोलिया) अपने बॉस से सवाल कर सकते थे? चंदोलिया ने कहा कि वह द्रमुक, कलेंग्नर टीवी या किसी दूरसंचार कम्पनी से जुड़े व्यक्ति नहीं हैं। उन्होंने सीबीआई को चुनौती दी भी कि वह सबूत के रूप में कोई भी एक दस्तावेज पेश करे जिस पर उन्होंने हस्ताक्षर किए हों।
अब तक विभिन्न गवाहों पर नजर डालें तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। पहले बात करते हैं खुद ए. राजा की। राजा ने 25/7/2011 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम का नाम घसीटा। आरोप ः स्वान, यूनिटेक की हिस्सेदारी कम किए जाने के बारे में जानते थे। 26/7/2011 को अटार्नी जनरल जीई वाहनवती (तत्कालीन सॉलिसिटर जनरल) पर राजा ने आरोप लगाया कि पहले आओ, पहले पाओ की नीति में राजा के बदलावों को मंजूरी दी। नीरा राडिया के टेप सार्वजनिक होने से 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में नेताओं, उद्योगपतियों, पत्रकारों के खेल की डरावनी तस्वीर सामने आई। इन टेपों से पता चला कि वह टाटा और अम्बानी जैसी कम्पनियों के लिए लॉबिंग का काम करती थी। टाटा समूह की सभी 90 कम्पनियों का विज्ञापन और जनसम्पर्प काम नीरा राडिया की कम्पनी वैष्णवी कम्युनिकेशन के पास था। 27/7/2011 को सिद्धार्थ बेहुरा ने भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव पर आरोप लगाया कि उन्होंने स्पेक्ट्रम लाइसेंस शुल्क की समीक्षा नहीं की। मामला पेचीदा होता जा रहा है। सीबीआई विशेष अदालत के जज ओपी सैनी इस केस को कैसे निपटाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।
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