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Thursday, 22 February 2024

तेजस्वी और राहुल गांधी की जोड़ी

शुक्रवार को कांग्रेsस नेता राहुल गांधी के साथ आरजेडी के तेजस्वी यादर भी भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल हुए। राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान गुरुवार को दूसरी बार बिहार पहुंचे थे। पिछले महीने यानि जनवरी में भी राहुल गांधी दो दिनों के लिए बिहार के सीमाचंल इलाके में पहुंचे थे। उस दौरान 29 जनवरी को आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और 30 जनवरी को तेजस्वी यादव को ईडी ने पूछताछ के लिए बुलाया था। शुक्रवार को रोहतास में राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में तेजस्वी यादव ने इस बात का जिक्र और दावा भी]िकया कि उन्हें राहुल गांधी की सभा में शामिल होने से रोकने के लिए ही प्रवर्तन निदेशालय ने घंटों पूछताछ के लिए बैठा रखा था। यानि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में 16 फरवरी को पहली बार राष्ट्रीय जनता दल का कोई शीर्ष नेता शामिल हुआ है। बिहार में पिछले महीने 28 जनवरी को ही नीतीश कुमार ने महागठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए से हाथ मिला लिया था। इस तरह से बिहार में आने वाले लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के सामने बड़ी चुनौती होगी। बिहार विधानसभा में नीतीश सराकर के फ्लोर टेस्ट के दौरान तेजस्वी यादव ने दावा किया था कि वो बिहार में नरेन्द्र मोदी को रोक कर दिखाएंगे। बिहार ने साल 2020 sमें हुए विधानसभा चुनावों में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी (75 सीटें) बनकर उतरी थी। तेजस्वी यादव ने लालू प्रसाद यादव के बिना ही खुद को और पार्टी के बिहार में ताकतवर बनाए रखा है। लालू औ तेजस्वी को हमेशा से बिहार के एक वर्ग की सहानुभूति मिली है। मुस्लिम, यादव और मंडल समर्थकों का वर्ग है जो लालू के साथ खड़ा है। लालू को सजा हुई तो उसमें भी लालू के समर्थक उनके साथ खड़े नजर आए। यह इतना बड़ा समर्थन है की बिहार में बीजेपी आज तक अकेले लालू को हटा नहीं पाई है। बिहार में यह समर्थन अब तेजस्वी के साथ है। तेजस्वी के साथ जातीय समीकरण के अलावा भी युवाओं का एक वर्ग नजर आता है और नीतीश के पाला बदलने से उनकी सहानुभूति तेजस्वी के साथ बड़ी है। बिहार में राहुल गांधी ने तेजस्वी यादव को ड्राइविंग सीट दे दी है और यह कहा जाता है कि बिहार में तेजस्वी यादव किसी भी गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती होंगे। विधानसभा चुनाव में तेजस्वी के सामने बूढ़ा घोड़ा या थका हुआ घोड़ा हो सकता है। जब]िक लोकसभा चुनाव में राहुल और मोदी है। मोदी के लिए यह तीसरा चुनाव होगा। इस]िलए उनके लिए भी यह चुनाव बहुत आसान नहीं होगा। माना जाता है कि बिहार में जेडीयू के विपक्षी गठबंधन से निकलने के बाद कांग्रेsस और आरजेडी मिलकर सेक्यूलर और मुस्लिम वोटों का विभाजन रोक सकते हैं। जातिगत सर्वे के मुताबिक राज्य में 17 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। तेजस्वी और राहुल की मुलाकात की एक खास तस्वीर में राहुल गांधी और तेजस्वी एक ही गाड़ी में सवार हैं और ड्राइविंग सीट पर तेजस्वी यादव हैं। यह एक सांकेतिक तस्वीर है कि बिहार में विपक्ष का नेतृत्व तेजस्वी करेंगे और कांग्रेस सहयोगी की भूमिका में होगी। यही नहीं विपक्ष के इंडिया गठबंधन में हाल में जो कुछ हुआ उससे सबक लेते हुए कांग्रेस तेजस्वी यादव को काफी महत्व और सम्मान भी देती दिख रही है। तेजस्वी और हालु दोनों इस बात की एहमियत जानते हैं कि बिहार में युवाओं के लिए रोजगार एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। राहुल ने सेना में अगेन वोट का मुद्दा उठाया। राहुल-तेजस्वी की जोड़ी क्या गुल खिलाती है।

Tuesday, 13 June 2023

राहुल गांधी के अमेरिका दौरे से क्या हासिल हुआ?

अब सवाल यह है कि राहुल गांधी को अमेरिकी दौरे से क्या लाभ हुआ? कांग्रोस पाटा के प्रावक्ता अखिलेश प्राताप सिह कहते हैं—दुनिया ने उनको बड़े चाव से सुना और दुनिया में बहुत अच्छा असर छोड़ कर आए हैं राहुल गांधी। राहुल जी कांग्रोस पाटा के अध्यक्ष रह चुके हैं और संसद की सदस्यता गंवाने के बाद वो अमेरिका गए थे। अखिलेश प्राताप सिह आगे कहते हैं—आज की तारीख में राहुल गांधी आधिकारिक तौर पर तो वुछ नहीं हैं, न संगठन में, न सरकार में और न ही सदन में। लेकिन उनकी दुनिया में एक जगह है, उनकी एक आवाज है, विजन है जिसे दुनिया जानना चाहती है। उन्होंने कहा कि इस बात को न तो भारत में नजरंदाज कर सकते हैं न दुनिया में। कोईं नेता ऐसा है जो सत्ता से हट जाएं और इतने चाव से कोईं उनको सुनने जाता हो? भाजपा को ही देख लीजिए, किसी पूर्व पीएम को किसी ने पूछा है? राहुल गांधी का अमेरिका का दौरा ऐसे समय हुआ है, जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कामयाबी से पाटा का मनोबल बढ़ा है और पाटा अगले साल आम चुनाव की तैयारी में जुटी हुईं है, तो क्या चुनाव में इसका लाभ मिल सकता है, के जवाब में दक्षिणपंथी राजनीतिक विदेश नीति विशेषज्ञ और भाजपा के सदस्य डॉ. सुब्रोधमल दत्ता कहते हैं। संक्षेप में राहुल गांधी की अमेरिका यात्रा का विश्लेषण किया जाए, तो ऐसा लगता है कि अमेरिका में भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक दर्शकों के सामने वुछ सस्ते राजनीतियां आधारहीन स्टंट के अलावा उन्हें राजनीतिक रूप से वुछ भी हासिल नहीं हुआ है। लेकिन अखिलेश प्राताप सिह के मुताबिक अमेरिका के दौरे से राहुल गांधी की बातें और उनके विचार दुनिया वालों तक पहुंचे हैं और इसलिए उनका यह दौरा कामयाब रहा। वह कहते हैं—राहुल गांधी को दुनिया की हर फील्ड के लोग सुनना और उनकी राय जानना चाहते हैं। उनको सुनने के बाद सबको लगता है कि हर फील्ड में उनकी जानकारी कितनी गहरी है। वो लोग भी राहुल जी को सुनने के बाद स्वीकार कर रहे हैं कि इस आदमी में देश और दुनिया को एक नईं दिशा देने की क्षमता है और विजन भी। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा की नजरों में राहुल गांधी के अमेरिका के दौरे से उन्हें कोईं फायदा नहीं हुआ है। डॉ. दत्ता कहते हैं—पािम के साथ राहुल गांधी का रोमांस उन्हें खूबसूरत रोमांटिक कहानी नहीं देता। बल्कि उनकी भारत वापसी पर उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। वाशिगटन में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही कहते हैं कि भारतीय विपक्षी नेता राहुल गांधी का अमेरिकी दौरा बड़े मामलों में सफल रहा। वह बताते हैं कि पहला, नौ वर्ष में पहली बार उन्होंने वाशिगटन डीसी में भारतीय प्राधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा एक और आवाज को नीति बनाने वालों के सामने लाया है, दूसरा, उनके दौरे ने नौ वर्षो में पहली बार उन हजारों भारतीय अमेरिकियों को एक अवसर प्रादान किया जो मोदी की राजनीति से खुद को अलग देखते हैं और अलग-अलग शहरों में बड़े समूहों में इकट्ठा होते हैं और एकजुटता का प्रादर्शन करते हैं। ——अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 6 June 2023

राहुल के बयान पर इतना हंगामा क्यों?

इस सम्पादकीय और पूर्व के अन्य संपादकीय देखने के लिए अपने इंटरनेट/ब्राउजर की एड्रेस बार में टाइप करें पूूज्://हग्त्हाह्ंत्दु.ंत्दुेज्दू.म्दस् कांग्रोस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने वाशिगटन डीसी के नेशनल प्रोस क्लब में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा कि मुस्लिम लीग पूरी तरह से सैक्यूलर पाटा है। राहुल गांधी से पूछा गया था कि क्या केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग से कांग्रोस का गठबंधन धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ नहीं है? इसी के जवाब में राहुल ने कहा—मुस्लिम लीग के साथ धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ जैसी कोईं बात नहीं है। मुझे लगता है कि जिस व्यक्ति ने यह सवाल भेजा है, उसने मुस्लिम लीग को ठीक से पढ़ा नहीं है। वाशिगटन के नेशनल प्रोस क्लब में राहुल गांधी भारत से जुड़े कईं सवालों का जवाब दे रहे थे। बता दें कि वाशिगटन नेशनल प्रोस क्लब में प्रोस कांप्रोंस सबके बस की नहीं। वहां इतने टेढ़े-सीधे सवाल पूछे जाते हैं कि अच्छों-अच्छों की हवा निकल जाती है। खैर! उनके यूव््रोन पर रूसी हमले में भारत के रुख को लेकर भी सवाल पूछा गया था। राहुल ने मोदी सरकार की नीति का समर्थन किया। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईंयूएमएल) केरल की क्षेत्रीय राजनीतिक पाटा है और यह पारंपरिक रूप से कांग्रोस की अगुवाईं वाले गठबंधन यूडीएफ में शामिल रहती है। राहुल गांधी ने अमेरिका दौरे में जो वुछ कहा है, उसे लेकर भाजपा खफा है और राहुल पर गंभीर आरोप लगा रही है। भाजपा नेता अमित मालवीय ने निशाना साधते हुए कहा कि वायनाड में स्वीकार्यं बनी रहने के लिए यह राहुल गांधी की मजबूरी है कि मुस्लिम लीग को सैक्यूलर कहें। मालवीय ने ट्वीट कर कहा है—जिन्ना की मुस्लिम लीग धर्म के आधार पर भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार है और राहुल गांधी इसे सैक्यूलर कह रहे हैं। राहुल गांधी भले ही कम पढ़े-लिखे हैं, लेकिन यहां वह चालाकी कर रहे हैं। वायनाड में स्वीकार्यं बने रहने के लिए यह उनकी मजबूरी है। अमित मालवीय के इस ट्वीट के जवाब में कांग्रोस प्रावक्ता सुप््िराया श्रीनेत ने लिखा है, हेलो फजा खबर के सौदागर आपको आधी रात तक जागते देख अच्छा लगा। मालवीय के ट्वीट पर पवन खेड़ा ने भी जवाब दिया है। पवन खेड़ा ने कहा—अनपढ़ हो भाईं? केरल की मुस्लिम लीग और जिन्ना की मुस्लिम लीग में फर्व नहीं मालूम? जिन्ना वाली मुस्लिम लीग वो जिसके साथ तुम्हारे पूर्वजों ने गठबंधन किया है। दूसरी वाली मुस्लिम लीग वो जिसके साथ भाजपा ने गठबंधन किया था। साल 2012 में नागपुर नगर निगम चुनाव में मेयर का पद हासिल करने के लिए भाजपा के इंडियन यूनियन ऑफ मुस्लिम लीग से समर्थन लेने का भी हवाला दिया है। नागपुर नगर निगम चुनाव में भाजपा 62 सीटें जीती थी। 145 सदस्यों के सदन में बहुमत के लिए 73 सदस्यों की जरूरत थी। भाजपा ने मुस्लिम लीग के दो सदस्यों और 10 निर्दलीय सदस्यों की बदौलत बहुमत का आंकड़ा पार किया था। भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान के गठन का आंदोलन चलाने वाली ऑल इंडिया मुस्लिम लीग को भंग कर दिया गया था। पाकिस्तान के गठन के बाद मोहम्मद अली जिन्ना देश के गवर्नर जनरल बने थे। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान को शुरुआती छह प्राधानमंत्री दिए। केरल की आईंयूएमएल लंबे समय से कांग्रोस की गठबंधन सहयोगी है और केरल में विपक्षी यूडीएफ गठबंधन का हिस्सा है। वर्तमान केरल विधानसभा में पाटा के 18 विधायक हैं। ——अनिल नरेन्द्र

Thursday, 30 March 2023

बर्खास्तगी विदेशी मीडिया की नजरों में

कांग्रोस नेता राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द होने को लेकर प्रातिव््िरायाओं का दौर जारी है। आपराधिक मानहानि के इस मामले में सूरत की एक अदालत ने राहुल को दो साल जेल की सुजा सुनाईं जिसके बाद उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द हो गईं है। राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी और कहा कि मामला कोर्ट का है और इस बारे में यहां कोईं बात नहीं करूंगा। हालांकि उन्होंने प्राधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अडाणी समूह के बीच संबंधों का मुद्दा उठाया और कईं सवाल पूछे। राहुल गांधी ने आरोप लगाया—मेरी सदस्यता रद्द की गईं क्योंकि पीएम मेरे अगले (संभावित) भाषण से डरे हुए थे। वो उस अगली स्पीच से डरे हुए थे जो अडाणी पर होने वाली थी। राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द होने के मुद्दे पर विदेशी मीडिया ने भी कमेंट किया है। ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने शीर्षक दिया है—मानहानि मामले में भारतीय विपक्षी नेता संसद से निष्कासित। अखबार लिखता है कि भारत के विपक्षी नेता राहुल गांधी को मानहानि मामले में सजा मिलने के 24 घंटे के बाद संसद से निष्कासित कर दिया गया। राहुल तुरन्त जेल नहीं जाएंगे, क्योंकि उन्हें जमानत मिल चुकी है। अगर उच्च न्यायालय उनकी सजा पर स्टे लगा देता है तो वो लोकसभा सदस्यता के लिए फिर से योग्य हो जाएंगे। अखबार ने राजनीतिक मामलों के शोधकर्ता आसिम अली के हवाले से लिखा है कि वो भाजपा के राहुल गांधी पर ध्यान वेंद्रित करने से हैरान हैं। मुझे नहीं समझ आ रहा है कि यह वैसी रणनीति है, क्योंकि इससे राहुल और कांग्रोस को ही फायदा हो सकता है। भाजपा राहुल से असुरक्षित है और इससे कांग्रोस की यह बात साबित होती है कि सरकार मोदी की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकती। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्व टाइम्स ने शीर्षक दिया है—राहुल गांधी को संसद से निष्कासित करके मोदी को भारत की बहु-संप्रादाय की परंपरा को खत्म करने वाला हिन्दू राष्ट्रवादी नेता बताया था जो देश के लोकतंत्र को खत्म कर सकता है। शुव््रावार को मोदी के सहयोगियों ने उनका यह काम पूरा कर दिया। अखबार के मुताबिक पीएम मोदी के संभावित प्रातिद्वंद्वियों को मात देने के लिए उनके सहयोगियों ने यह सबसे बड़ा कदम उठाया है और विरोध की आवाज के खिलाफ कार्रवाईं की है। वाशिंगटन पोस्ट लिखता है—भारत ने मोदी के आलोचक राहुल गांधी को संसद से निकाला। वो हाल के महीनों में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर और मोदी सरकार पर भारत के लोकतंत्र की छवि बिगाड़ने का आरोप लगाकर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करते रहे हैं। पिछले साल राहुल गांधी ने एक लोकप््िराय एकता मार्च निकाला था और मोदी सरकार पर देश को बांटने का आरोप लगाया था। विपक्ष पीएम मोदी की राजनीतिक पाटा (भाजपा) को हाल के सालों में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हेट स्पीच और हिसा बढ़ाने का दोषी मानते हैं। हालांकि भाजपा इन आरोपों से इंकार करती है और उनके समर्थक कहते हैं कि गुजरात से एक चाय बेचने वाले के बेटे ने देश की स्थिति में सुधार किया है। ——अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 21 March 2023

मुझे संसद में बोलने का मौका मिले

कांग्रोस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी में लंदन ने दिए उनके भाषण पर संसद में जारी सत्तापक्ष के संग्राम पर पलटवार करते हुए कहा कि संसद में अडाणी मुद्दे पर उनके उठाए गए सवालों से भटकाने के लिए सरकार की ओर से यह तमाशा किया जा रहा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा—मैं एक सांसद हूं और मेरे ऊपर संसद में आरोप लगे हैं। मैं संसद में ही आरोपों का जवाब दूंगा। यदि देश में लोकतंत्र है तो मुझे सदन में बोलने का मौका मिलेगा। लंदन से लौटे राहुल गुरुवार को लोकसभा पहुंचे, मगर सदन तत्काल स्थगित कर दिया गया। उसके बाद उन्होंने लोकसभा में कांग्रोस के नेता अधीर रंजन चौधरी के साथ जाकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और अपना पक्ष रखने के लिए समय देने का अनुरोध किया। बाद में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा—मैंने स्पीकर से अनुरोध किया है कि सरकार के चार-चार मंत्रियों ने मुझ पर जो आरोप लगाए हैं, सांसद होने के नाते मेरा अधिकार है कि मैं सदन में इसका जवाब दूं। स्पीकर ने मेरी बातें सुनीं, पर कोईं स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला। हालांकि मैंने आस नहीं छोड़ी है। शायद मुझे बोलने का मौका मिले। राहुल ने यह भी कहा कि उन्होंने लंदन में वुछ भी भारत विरोधी बात नहीं कही है। संसद में गतिरोध को लेकर राहुल ने कहा—यह पूरी कसरत ध्यान भटकाने के लिए है। असल में सरकार अडाणी मुद्दे पर डरी हुईं है, इसलिए यह पूरा तमाशा रचा गया है। उधर स्पीकर ओम बिरला पूरे हंगामे से सख्त नाराज हो गए। शुव््रावार को जैसे ही कार्यंवाही आरंभ हुईं राहुल गांधी को बोलने देने की मांग करते हुए कांग्रोस के कईं सांसद बेल में आ गए। इसके बाद सत्तापक्ष के लोगों ने भी राहुल के लंदन में दिए बयानों को लेकर माफी की मांग करते हुए अपनी सीटों पर ही हंगामा करना शुरू कर दिया। करीब 20 मिनट चले हंगामे के दौरान अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा—मैं सभी को बोलने का मौका दूंगा, लेकिन सिर्प तभी जब सदन में व्यवस्था बनी रहेगी। सांसदों ने उनकी अपील अनसुनी कर दी। इसके बाद पूरे दिन के लिए सदन स्थगित कर दिया गया। वहीं कांग्रोस नेताओं का आरोप है कि लोकसभा में कार्यंवाही के दौरान जानबूझ कर संसद टीवी पर सीधे प्रासारण की आवाज रोक दी गईं। कांग्रोस का कहना है कि ऑडियो म्यूट कर संसद में आवाजें दबाईं गईं हैं, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है। वहीं लोकसभा सचिवालय ने इसके पीछे तकनीकी गड़बड़ी का हवाला दिया है। कांग्रोस के महासचिव जयराम रमेश ने ट्वीट किया—सत्तापक्ष के हंगामे के बीच विपक्षी सदस्यों ने पाटा के सांसद राहुल गांधी को बोलने देने की मांग उठाईं। मगर इस कार्यंवाही के प्रासारण के दौरान अचानक आवाज बंद हो गईं। लोकतंत्र में यह वैसी व्यवस्था है? राहुल गांधी पर सत्तापक्ष के मंत्रियों ने गंभीर आरोप लगाए हैं, हमारा मानना है कि राहुल को अपना पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए। अगर हमारे देश में लोकतंत्र मजबूत है तो सभी को अपना पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए।

Sunday, 22 July 2012

क्या राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद सम्भालने के लिए तैयार हैं?

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने गुरुवार को कहा कि वह पार्टी और सरकार में अब अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं लेकिन यह सब कब होगा, इस बारे में अंतिम निर्णय कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री को तय करना है। राहुल पिछले दस वर्षों से भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं पर उन्होंने यह पहली बार कहा है कि वह और सक्रिय भूमिका निभाने को अब तैयार हैं। उनका बयान कांग्रेस अध्यक्ष व उनकी मां सोनिया गांधी के यह कहे जाने के बाद आया है कि बड़ी भूमिका के बारे में निर्णय राहुल को ही लेना है। वर्ष 2014 में होने वाले आम चुनाव में प्रधानमंत्री के रूप में राहुल को पेश करने की अटकलों के बीच कांग्रेस के नेताओं ने हाल के दिनों में पार्टी को मुख्य धारा में लाने के लिए राहुल से अपील की थी। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद यह मांग कर चुके हैं पर मामले ने तूल तब पकड़ा जब सलमान खुर्शीद ने यह कह दिया कि राहुल से कोई वैचारिक निर्देश नहीं मिल रहा है और अब तक राहुल के विचारों तथा सोच का बहुत छोटा हिस्सा देखने को मिला है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह मालूम है कि बतौर पीएम यह उनकी आखिरी पारी है। पार्टी में भी यह आम धारणा बन चुकी है कि मनमोहन सिंह 2014 में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव नहीं जितवा सकते। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राहुल गांधी को एक बार नहीं अनेक बार सरकार में शामिल होने का निमंत्रण दिया मगर राहुल गांधी तैयार नहीं हुए। कहा तो यहां तक जाता है कि पार्टी का एक वर्ग चाहता है कि राहुल गांधी सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी सम्भाले मगर राहुल गांधी में आत्मविश्वास की कमी कहें या फिर कांग्रेस की इस गठबंधन सरकार में मजबूरियों की वजह से राहुल अपने आपको बड़ी भूमिका के लिए तैयार नहीं कर पा रहे। दरअसल हमें लगता है कि उनमें आत्मविश्वास की कमी है। फिर उन्होंने बिहार, उत्तर प्रदेश व पंजाब में पार्टी का चुनाव लड़वाया तीनों जगह कांग्रेस की बुरी हार हुई। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग नई नहीं है। जब से सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद लेने से इंकार किया है और अपनी जगह मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनवाया है तब से यह कहा जाता रहा है कि वे राहुल गांधी को पार्टी की बागडोर सम्भालने के लिए तैयार कर रही हैं। इसलिए इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि राहुल गांधी को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बनाया जाए। इस तरह सोनिया गांधी धीरे-धीरे पार्टी की बागडोर अपने पुत्र को सौंपना शुरू कर सकती हैं और वे पार्टी के संरक्षक की भूमिका में भी बनी रह सकती हैं। कांग्रेस का यह गुण हो या दोष पर यह उसकी हकीकत है कि वह नेहरू-गांधीवंश से जुड़कर ही एकजुट और मजबूत रहती है। आखिर क्या कारण है कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा बनाकर कांग्रेस से अलग हुए शरद पवार उस यूपीए गठबंधन में सहर्ष शामिल हो गए जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं? यूपीए सरकार सब तरह के भ्रष्टाचार और घोटालों में चाहे आज कितनी ही फंसी क्यों न हो पर कांग्रेसियों को भरोसा है कि कांग्रेस का आज भी कोई विकल्प नहीं है। दरअसल एक अरसे से कांग्रेस किसी न किसी करिश्मे के ही सहारे चल रही है। अस्सी के दशक में उभरी और बदलते रूपों में आज भी जारी जमीनी राजनीति के मुहावरे कांग्रेसी नेताओं की समझ में नहीं आते। गांव-मोहल्ले के स्तर का नेटवर्प खड़ा करना और लोगों के छोटे-मोटे काम करा देना उनके स्टेटस से मिल नहीं खाता। वे इसे जाति, क्षेत्र, सप्रदाय की औछी राजनीति बताते हैं, हालांकि बात बन जाने की उम्मीद हो तो खुद इनमें से कोई भी फार्मूला अपनाने से नहीं हिचकते। उनकी एक मात्र इच्छा यही रहती है कि उनके पास कोई ऐसा करिश्माई नेता और कोई चमत्कारी विचारधारा हो, जिसकी मदद से सत्ता पके हुए आम की तरह उनके मुंह में टपक जाए। जिस नेहरू-गांधी वंशवाद पर देश में इतनी बातें होती हैं उसकी जमीन इसी सोच से तैयार होती है। यूपीए गठबंधन राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों में बेशक एनडीए पर आंकड़ों में भारी पड़ जाए पर उससे जमीनी हकीकत का दूर-दूर तक संबंध नहीं। आज यह नहीं कहा जा सकता कि जमीनी हकीकत यूपीए या कांग्रेस के हक में है। इसलिए अगर राहुल गांधी कोई बड़ी भूमिका सम्भालते हैं तो उनका पहला काम 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए संगठन को कारगर ढंग से खड़ा करने का होगा। राहुल गांधी यूपीए सरकार में चाहे जितनी भी बड़ी जिम्मेदारी सम्भाल लें, लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, विकास और जनहित से जुड़े अन्य मोर्चों पर यह सरकार अपने बचे दो सालों में ऐसा कोई चमत्कार शायद ही कर पाए, जो 2014 में लोगों को इसकी वापसी के लिए पोलिंग बूथों पर लाइन लगाने को मजबूर कर दे। एक परिपक्व लोकतंत्र अपने राजनेताओं से संयम, विनम्र और दूरदर्शी होने की मांग करता है। 2009 के आम चुनावों में राहुल जब उत्तर प्रदेश से 22 एमपी अपनी स्वच्छ छवि से निकाल लाए थे, तो यह उनकी इसी अलग छवि के जरिए हासिल की गई गेम चेंजर भूमिका के चलते सम्भव हुआ था। कांग्रेस के अन्दर भी राहुल गांधी को नेतृत्व सौंपने पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अभी राहुल को प्राइमरी का ज्ञान तो है नहीं और ऐसे में उन्हें देश का नेतृत्व सौंपे जाने जैसी बात बचकानी-सी लगती है। बताया जा रहा है कि वरिष्ठ कांग्रेसियों में राहुल को जिम्मेदारी सौंपने को लेकर उत्साह नहीं है। यूपी, बिहार, पंजाब में राहुल प्रचार के दौरान पार्टी की बद से बदतर स्थिति के बावजूद उनका बड़ी भूमिका सम्भालना अब समय से पूर्व की जल्दबाजी न हो जाए? पार्टी की एक लॉबी का स्पष्ट मत है कि पहले राहुल संगठन में बड़ी भूमिका लें और सरकार में कैबिनेट मंत्री बनकर सरकार चलाने का अनुभव लें। राहुल गांधी की ओर से खुद आगे आकर बड़ी जिम्मेदारी लेने की बात कहने के बाद इन सम्भावनाओं को बल मिलना स्वाभाविक ही है कि वह 2014 की लोकसभा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन बात तब बनेगी जब वह अगले चुनावों तक यूपीए-2 के बचे दो सालों के कार्यकाल के दौरान कुछ ठोस कर दिखाने में सफल होते हैं?

Sunday, 13 May 2012

ऐसी लीपापोती समीक्षा से कांग्रेस का कोई भला नहीं होगा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13 May 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चुनाव हारी इसकी समीक्षा करने के लिए पिछले कई दिनों से कांग्रेस में आत्म मंथन चल रहा है। कई बैठकें हुईं, कई कमेटियां बनीं पर अंत में नतीजा वही सिफर निकला। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लीपापोती करते हुए कहा कि पार्टी में गुटबाजी और अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। हमने सोचा था कि सोनिया जी पार्टी के लिए हार के जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई करेंगी पर उन्होंने ऐसा न करना बेहतर समझा और डरा-धमका कर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया। ऐसी चेतावनियां सोनिया पहले भी दे चुकी हैं। बुराड़ी में दो साल पहले हुए कांग्रेस के सम्मेलन में सोनिया गांधी ने कार्यकर्ताओं से गुटबाजी छोड़ कमर कसने को कहा था। पिछले साल दिल्ली में भी पार्टी के एक सम्मेलन में सोनिया ने पद की लालसा करने वालों पर चुटकी लेते हुए कहा था कि कांग्रेस में सबका नंबर आता है। सोनिया के कथन का कांग्रेसियों पर कोई असर नहीं हुआ और न ही उन्होंने सोनिया की बात को संजीदगी से ही लिया, नतीजा सामने है। कांग्रेस पिछले दो साल में बिहार, यूपी, पंजाब, गोवा हार चुकी है। आंध्र प्रदेश में भी उसकी हालत खस्ता है। राजस्थान में गहलोत सरकार के हालात भी दुरुस्त नहीं हैं। मुंबई नगर पालिका रही हो या फिर दिल्ली नगर निगम सब जगह कांग्रेस को झटके पर झटके लग रहे हैं। बिहार और यूपी में तो चुनावी कमान राहुल गांधी के हाथों में थी पर सोनिया ने खुद पर और राहुल पर जिम्मेदारी लेकर एक नए विवाद को जन्म देने से पहले ही खत्म कर दिया और इससे पहले कि कोई राहुल पर उंगली उठाए, मामले को समाप्त कर दिया। यह ठीक है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की धुरी चुनाव है लेकिन जिस आधार पर चुनावी कामयाबी मिलती है और उसकी सोच व कार्यपद्धति भी मायने रखती है। उसके जरिए ही सत्ता मिलती है जो जनकल्याण के काम को सम्भव करा पाती है। कांग्रेस को यह समझ विरासत में मिली है, फिर भी वह हाल के दशक में अगर इससे डिगी हुई लगती है तो इस पर उसको गम्भीरता से आत्म मंथन करना चाहिए पर आत्म मंथन ऐसा नहीं होना चाहिए जिसका कोई अर्थ ही नहीं निकले। मौजूदा हालात में यह कहना दुखद है कि कांग्रेस भी अपनी कमजोरी और पराजय के कारणों पर बस मंथन कहने भर के लिए करती है। वास्तविक अर्थों में वह ऐसा करने से हिचकिचाती है। अगर कांग्रेस गम्भीर होती तो विभिन्न प्रदेशों में समय-समय पर हुई पराजयों और उसकी समीक्षा के लिए गठित समितियों की तरफ से गिनाए जाने वाले कारण अब तक दूर कर लिए गए होते। निश्चित रूप से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को यह मालूम है कि प्रदेश में सभी क्षत्रपों के अपने-अपने गुट हैं और आम कार्यकर्ताओं की जगह उनके ही चापलूस हैं जिनसे ही वे घिरे रहते हैं। वे आम कार्यकर्ताओं के भी नेता हैं, ऐसा नहीं मानते। सम्भवत इसका एक कारण नेताओं के कार्यकर्ताओं में जोश भरने की जगह अपने स्वार्थ हावी होना है। वे यह मान कर चलते हैं कि वोट डलवाने के लिए गांधी परिवार काफी है। इसके आगे न तो उन्हें महंगाई का न भ्रष्टाचार का और न ही बढ़ती बेरोजगारी मुद्दा हो सकती है। इनके सामने बुनियादी सुविधाएं जैसे बिजली, पानी है पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल, लोकायुक्त की नियुक्ति जरूरी है। विडम्बना यह है कि कांग्रेसी छुट भैया यह भी नहीं समझना चाहते कि अब गांधी परिवार का वह करिश्मा नहीं रहा। पहले बिहार और फिर उत्तर प्रदेश ने यह जता दिया है गांधी परिवार वोट खींचू या चुनाव जिताने-जीतने की गारंटी अब नहीं है। सारा जोर लगाकर भी गांधी परिवार की तीसरी पीढ़ी के वारिस उत्तर प्रदेश में दृश्य प्रवर्तक नहीं हो सके। बिहार ने तो सिरे से राहुल गांधी को खारिज कर दिया। इसलिए कि उनकी टीम के बाकी नेताओं ने कुछ ठोस काम ही नहीं किया और जनमानस में वह यह विश्वास पैदा नहीं कर सके कि कांग्रेस को वोट देने में ही उनकी भलाई है। गौर तो इस पर होना चाहिए था कि टीम राहुल सरजमीनी कम हवाई ज्यादा क्यों रही? पर पार्टी अध्यक्ष ने राहुल को केंद्र में रखकर चुनावी समीक्षा नहीं की। अगर कांग्रेस वाके ही पार्टी में सुधार चाहती है तो हार के सही कारणों पर चर्चा करने का साहस दिखाए और कसूरवार नेताओं पर सख्त कार्रवाई करे ताकि पार्टी के बाकी नेताओं में एक भय पैदा हो सके। कांग्रेस को अगर इस साल होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में चुनावों को फतह करना है तो उसे केंद्र में अपनी लुंज-पुंज मनमोहन सरकार की कमियों पर भी गौर करना चाहिए। अनुशासनहीनता और गुटबाजी से परहेज की नसीहत को पालन लायक बनाने के लिए उदाहरणों का ऐसा आधार दिया जाना चाहिए ताकि उस पर पार्टी की निष्ठा टिक सके। यह लीपापोती समीक्षा का कोई फायदा नहीं।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, State Elections, Vir Arjun

Thursday, 12 April 2012

Zardari not mandated to provide categorical assurance

- Anil Narendra
President of Pakistan did not visit India on India's invitation, but he came on his own. He came to Ajmer Sharif on a pilgrimage and pilgrimage he did perform. He came to Delhi, because there was no other way to reach Ajmer. He could not have gone direct to Ajmer from Pakistan. When he had to come to Delhi, how could India ignore diplomatic protocol? The Prime Minister of India held a lunch in his honour. Both the leaders had a closed-door meeting for 40-45 minutes. Later, it was informed that India raised the issue of terrorism, especially the issue of bringing Hafiz Saeed to books. It is being reported that Dr Manmohan Singh emphasised upon punishing the perpetrators of 26/11. The Prime Minister also drew President Zardari's attention to the need to curb the terrorism against India being perpetrated from the Pak soil. Zardari Saheb, on the other hand, emphasised upon the need to resolve issues like Kashmir, Sir Creek, Siachin. Pakistan also raised the issue of imprisonment of Pak Scientist, Khalil Chishti, but Mnmohan Singh did not think it appropriate to raise the issue of death sentence to Sarabjit Singh. Opinions may differ, but we think that Zardari's India visit is not of much significance. These days, Zardari's condition in his country is very vulnerable. He is sandwiched between Army on one hand and Supreme Court on the other. The popularity graph of Zardari is also at the lowest. When he is under such a tremendous pressure in his country, then for what he has come to Ajmer Sharif to pray for? He was accompanied by his son also. He, in a way, introduced his son, Bilawal on the international scene. Zardari Saheb would like to see Prince Bilawal to take the reins of the country after him. It is also being said that the meeting of princes of both the countries was a success. It was reported that Prime Minister and President Zardari had a one-to-one meeting which lasted for about 40 minutes. We doubt that a meeting just for 40 minutes could cover various issues like Kashmir, terrorism, Siachin, Sir Creek, Visa facilities, Hafiz Saeed, punishment to the perpetrators of 26/11, from bilateral trade to Cricket and could lead to any important decision. At this stage, it can only be said that these issues were discussed casually and a future road map was chalked out. At present, Zardari Saheb is not in a position to make any commitment on behalf of his country, as the real power in Pakistan lies with the Pak Army. It is the Army that decides about Pakistan's policies on different issues. History is witness to the fact that Pakistani leader make promises during their visits to India, but once they return to Pakistan they go back on their words. When Zardari's father-in-law, Zulfikar Ali Bhutto came to India for brokering the Simla Agreement, he made tall promises, but he denied all the promises made, once he reached Pakistan. As on date, Zardari Saheb doesn't have the mandate which authorize him to negotiate with India on any issue. The meeting was bereft of any hope for either side. Mr. Zardari is badly ridden with numerous problems. In fact, India's PM is also has his problems, but the problems, Zardari is facing are different from those of India's. Pakistan's problem is not only its Army and the Intelligence agency, but internal situation of that country has also made things worse. A new crisis brewing before it, is that of deteriorating relations with US. Though, Pakistan appears to challenge the US, reason for which is the increasing anger among Pakistanis about US. It is also not possible for Pakistan to fight with whole world with the support of China alone. That is why, now Pakistan wants to mend fences with India. Some people have even claimed that some body has prodded Zardari to visit India. These days, barring terrorism, some change in Pakistan's attitude regarding trade etc., have been witnessed, but Pakistan must realize that India's most serious complaint against Pakistan relates to the abetting terrorism against it from the Pakistani soil and Zardari is not capable to take action to curb terrorism. In a statement, he had said that his views on Hafiz Saeed are identical with those of the Pakistan Government's. His another important statement was that he had been asked to leave Pakistan. In other words, these statements indicate that India should not expect much from him. Army Chief Kayani and ISI and Jehadi leaders are the real power in Pakistan.

Wednesday, 11 April 2012

जरदारी कुछ ठोस आश्वासन की स्थिति में हैं ही नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11 April 2012
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भारत के बुलावे पर भारत नहीं आए। वह अपनी मर्जी से भारत आए। जियारत करने वह अजमेर शरीफ आए और जियारत ही उन्होंने की। दिल्ली तो उन्हें इसलिए आना पड़ा, क्योंकि रास्ता यही बनता था। वह सीधे अजमेर तो जा नहीं सकते थे। जब वह दिल्ली आ ही रहे थे तो भारत अपनी मेहमाननवाजी को कैसे भूल सकता था। भारत के प्रधानमंत्री ने उनके लिए दोपहर का लंच रखा। दोनों नेताओं में बन्द कमरे में 40-45 मिनट बातचीत भी हुई। बाद में कहा गया कि भारत ने आतंकवाद और विशेषकर हाफिज सईद पर कार्रवाई का मुद्दा उठाया। मनमोहन सिंह ने 26/11 के गुनाहगारों को दंडित करने पर भी जोर दिया बताया जा रहा है। भारत के खिलाफ पाक जमीं से सिर उठा रहे आतंकवाद को कुचलने की जरूरत पर भी पीएम ने सदर जरदारी का ध्यान खींचा। उधर जरदारी साहब ने कश्मीर-सर क्रीक, सियाचिन मुद्दों को सुलझाने पर जोर दिया। पाक वैज्ञानिक खलील चिश्ती की कैद का मसला पाक की ओर से उठाया गया पर मनमोहन सिंह ने सरबजीत की फांसी का मुद्दा उठाना उचित नहीं समझा। अपनी-अपनी राय हो सकती है। हमारा मानना यह है कि राष्ट्रपति जरदारी की इस यात्रा का कोई खास महत्व नहीं है। आज की तारीख में उनकी अपने मुल्क में स्थिति बहुत कमजोर है। एक तरफ सेना और दूसरी तरफ पाक सुप्रीम कोर्ट। जरदारी साहब की लोकप्रियता भी जीरो है। ऐसे समय जब उन पर अपने मुल्क में इतना दबाव हो तो वह पता नहीं अजमेर शरीफ क्या दुआ मांगने आए? साथ बेटे को भी ले आए। बेटे बिलावल को भी एक तरह से अंतर्राष्ट्रीय सीन पर इंट्रोड्यूस करा दिया। जरदारी साहब का प्रयास यही होगा कि उनके बाद युवराज बिलावल पाक में सत्ता सम्भाले। कहा यह भी जा रहा है कि दोनों मुल्कों के युवराजों का आपस में मिलना अच्छा रहा। बताया गया कि प्रधानमंत्री मनमोहन और सदर जरदारी के बीच 40 मिनट की वन टू वन बातचीत हुई। इसमें हमें तो संदेह है कि महज 40 मिनट की बातचीत में कश्मीर, आतंकवाद, सियाचिन, सर क्रीक, वीजा सुविधा, हाफिज सईद, 26/11 के दोषियों को सजा दिलवाना, व्यापार से लेकर क्रिकेट आदि मुद्दों पर विस्तार से और किसी नतीजे पर पहुंच सकने लायक वार्ता हो सकती है, बस अभी तो यह कहा जा सकता है कि इन मुद्दों पर सरसरी चर्चा हुई और भविष्य का रोड मैप तैयार हुआ। जरदारी साहब आज इस स्थिति में नहीं कि वह किसी भी मुद्दे पर किसी भी प्राकर की कमिटमेंट कर सकें। पाकिस्तान में असल सत्ता पाक सेना के पास है। वही फैसला करती है कि किस मुद्दे पर पाकिस्तान की क्या पॉलिसी होनी है। इतिहास इस बात का भी गवाह है कि पाकिस्तानी लीडर भारत में तो वादा कर देते हैं पर अपने वतन पहुंचने पर वादे से मुकर जाते हैं। जरदारी के ससुर जुल्फिकार अली भुट्टो जब शिमला समझौते के लिए आए थे तो तरह-तरह की बातें, वादे करके गए थे पर पाकिस्तान लौटते ही सबसे मुकर गए। जरदारी साहब के पास आज की तारीख में वह मैनडेट ही नहीं कि वह किसी भी मुद्दे पर भारत से बातचीत कर सकें। इस बैठक से न तो इधर और न ही उधर कोई खास उम्मीद थी। जरदारी साहब आज अपने घर में बुरी तरह समस्याओं से घिरे हुए हैं। वैसे देखा जाए तो भारत के पीएम भी कम घिरे नहीं हैं पर पाकिस्तान में जिस प्रकार की समस्या जरदारी झेल रहे हैं वह भारत से भिन्न हैं। पाकिस्तान की मुश्किल उसकी सेना और खुफिया एजेंसी ही नहीं, उसके अंदरूनी हालात भी हैं। उसके सामने नया संकट अमेरिका से खराब रिश्ते का भी है। हालांकि पाकिस्तान अमेरिका को चुनौती देता दिख रहा है, लेकिन इसका प्रमुख कारण पाकिस्तान में अमेरिका के प्रति बढ़ रही नाराजगी है। पाकिस्तान अकेले चीन के समर्थन पर सारी दुनिया से नहीं लड़ सकता। इसलिए भी पाकिस्तान का अब प्रयास है कि पड़ोसी भारत से रिश्ते सुधरें। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा है कि जरदारी किसी के इशारे पर भारत आए। पिछले कुछ दिनों से आतंकवाद का मुद्दा छोड़कर व्यापार आदि क्षेत्रों में पाकिस्तान के रवैये में थोड़ी तब्दीली आई है पर पाकिस्तान को यह समझना होगा कि भारत की उससे सबसे बड़ी शिकायत आतंकवाद को अपनी सरजमीं में बढ़ावा देना है और इस पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण आसिफ जरदारी लगाने में सक्षम नहीं हैं। एक बयान में उन्होंने कहा था कि हाफिज सईद पर उनकी राय वही है जो पाकिस्तान सरकार की है। उनकी दूसरी महत्वपूर्ण टिप्पणी यह थी कि उन्हें पाकिस्तान से जाने के लिए कह दिया गया था। ये दोनों बयान प्रकारांतर से यह भी कहते थे कि भारत उनसे बहुत उम्मीद न करे। बात सही भी है। सेनाध्यक्ष कयानी और आईएसआई व जेहादी नेता ही पाक सत्ता प्रतिष्ठा में असल कर्ताधर्ता हैं।
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Monday, 9 April 2012

राहुल लगे यूपी चुनाव के पोस्टमार्टम में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9 April 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करारी हार से कांग्रेस हाई कमान अभी तक उभर नहीं सका। राहुल गांधी तो ऐसे कोपभवन में गए हैं कि अब वह यूपी के किसी दलित के घर खाना खाते नजर नहीं आ रहे। हार के एक महीने के बाद अब राहुल ने चुनावों का पोस्टमार्टम करने की हिम्मत जुटाई है। पिछले दो दिनों से राहुल हारे हुए सिपाहियों को बुलाकर पूछ रहे हैं कि आखिर हम क्यों हारे? हार के कारणों की तलाश में जुटे राहुल ने हारे हुए उम्मीदवारों से यह पूछा कि आखिर क्या वजह रही कि पूरी मेहनत के बाद भी पार्टी का शर्मनाक प्रदर्शन रहा? हारे हुए उम्मीदवारों ने कई कारण गिनाएं। तकरीबन सभी ने कुछ मुद्दों पर बहुत जोर दिया। पहला तो था कि कमजोर संगठन बहुत भारी पड़ा। गलत उम्मीदवार का चयन एक हार का कारण बना। इसके साथ प्रचार में राजनीतिक चूक का मुद्दा उठाकर हारे हुए सिपाहियों ने कुछ केंद्रीय मंत्रियों पर जमकर भढ़ास निकाली। पराजित उम्मीदवारों ने कहा कि कानून मंत्री को मुस्लिम आरक्षण का वादा करना पार्टी पर बहुत भारी पड़ा। इसी तरह श्रीप्रकाश जायसवाल का यह बयान कि अगर किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा मतदाताओं को बहुत चुभा और उन्होंने प्रतिक्रिया स्वरूप समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दे दिया। बेनी प्रसाद वर्मा का मुस्लिम कोटे में सब कोटा भी मतदाताओं खासकर मुस्लिमों को बेवकूफ बनाने का एक असफल प्रयास माना गया। कमजोर संगठन के मुद्दों पर उम्मीदवार रहे सुरेन्द्र गोयल ने कहा कि दूसरी कतार के कुछ बड़े नेताओं ने निरर्थक बयानबाजी की, इससे काफी नुकसान हुआ। कुछ अन्य नेताओं ने भी यही आरोप दोहराया। इशारा दिग्विजय सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, सलमान खुर्शीद, श्रीप्रकाश जायसवाल जैसे नेताओं के विवादित बयानों की ओर था। बाहरी लोगों को टिकट देने का मामला बैठक में आया तो आपस में ही बहस हो गई। क्योंकि ज्यादातर फौज चुनाव में बाहर से ही इकट्ठा हुई थी। समीक्षा बैठक में आए लोगों में भी ज्यादा ऐसे ही थे जो चुनाव के दौरान कांग्रेसी हुए थे। गुरुवार को राहुल ने उन पराजित उम्मीदवारों से बातचीत की जिन्होंने इस चुनाव में 20 हजार या उससे ज्यादा वोट हासिल किए। पराजित उम्मीदवारों को एक प्रश्नावली भी दी गई जिसमें 13 सवाल पूछे गए। जैसे उन्हें चुनाव में केंद्रीय नेतृत्व, प्रदेश कांग्रेस समिति, प्रदेश अध्यक्ष, महिला कांग्रेस और सेवा दल से क्या सहयोग मिला? हालांकि पूरे सूबे में घूमने वाले और कड़ी मशक्कत करने वाले राहुल गांधी को किसी ने सीधा निशाना तो नहीं बनाया पर हां, उनके मैनेजरों पर सवाल जरूर उठाए। स्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में अपने ऊटपटांग बयानों के लिए चर्चा में रहे कांग्रेसी नेताओं की वाट लगनी तय है। सोनिया और राहुल दोनों ने साफ कर दिया है कि इन बयानों से चुनाव में पार्टी को नुकसान हुआ और अब नए कर्मठ चेहरों को आगे लाया जाएगा। राहुल को इस बात के लिए कड़ी आलोचना सहनी पड़ी कि वे सिर्प चन्द नेताओं से ही घिरे रहते थे जिससे पूरा परिपेक्ष उनके सामने नहीं आ पाता था।
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Sunday, 25 March 2012

क्या कहती है यूपी की हार पर कांग्रेस की गोपनीय रिपोर्ट?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 March 2012
अनिल नरेन्द्र
हाल ही में खत्म हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार पार्टी नेतृत्व पचा नहीं पा रहा है। बावजूद कड़ी मशक्कत के पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। पार्टी को सबसे ज्यादा चिन्ता सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र और युवराज राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में हार की है। इस हार के कारणों को जानने के लिए पार्टी ने कई रिपोर्टें तैयार कराई हैं। राहुल गांधी के करिश्मे का फायदा न मिल पाने के लिए जहां कांग्रेस नेतृत्व कमजोर संगठन, गलत टिकटों का बंटवारा बता रहा है वहीं हकीकत कुछ और ही उभरकर आ रही है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के लिए बनी एक विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि पार्टी के युवराज राहुल गांधी की मंडली भी हार के लिए जिम्मेदार है। इसमें कहा गया है कि एक-दूसरे से बेहद ईर्ष्या करने वाले लोगों के छोटे लेकिन प्रभावशाली गुट और राजनीतिक दमखम की कमी वाले उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने से चुनाव के नतीजे पार्टी के लिए निराश करने वाले रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि जातिवाद और वरिष्ठ नेताओं के अहंकार को भी हार का कारण माना गया है जिसकी वजह से जमीनी कार्यकर्ता चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बजाय तटस्थ रहा। कांग्रेस की इस हार की `पोस्टमार्ट्म' की इस पहली रिपोर्ट में सूबे के 33 सीटों पर फोकस किया गया है। इन सभी सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है, जहां राहुल के करीबियों ने दखल देकर अपनी मर्जी के उम्मीदवारों को टिकट दिलाए थे। इन सभी सीटों पर कांग्रेस के पर्यवेक्षकों द्वारा चुने गए उम्मीदवारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई। फिरोजाबाद में सिरसागंज सीट का उदाहरण सामने है जहां कांग्रेस उम्मीदवार हरिशंकर यादव महज 4224 वोट लेकर पांचवें स्थान पर रहे। पर्यवेक्षकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की पहली पसंद ठाकुर दलबीर सिंह तोमर थीं। राहुल ने विशेष जोर देकर यादव को टिकट दिलवाया। इसी तरह एटा जिले में अलीगंज सीट पर पार्टी के उम्मीदवार रज्जन पाल सिंह 8160 मतों के साथ पांचवें स्थान पर रहे। इस सीट पर पार्टी के आब्जर्वर ने बिजनेसमैन सुभाष वर्मा को टिकट की वकालत की थी। लोध राजपूत से ताल्लुक रखने वाले वर्मा जिला पंचायत के सदस्य भी हैं। वे इस विधानसभा क्षेत्र में लोध समुदाय के एकमात्र उम्मीदवार थे, जो 27,000 लोध वोटरों के अधिकतर वोट हासिल कर सकते थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उपेक्षा से उन्होंने पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ ही काम किया और उसे हरवाने में जुट गए। प्रदेश के एक मुस्लिम सांसद ने कहा कि जो रिपोर्टें अब मिल रही हैं हम लोगों को तो पहले से ही पता था। इस बारे में राहुल गांधी को भी सचेत किया गया था लेकिन उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया। मुस्लिम नेता के रूप में केवल सलमान खुर्शीद को आगे बढ़ाया गया जबकि मुस्लिम उन्हें अपना नेता मानते ही नहीं हैं। इसी तरह राहुल गांधी ने समाजवादी पार्टी से आए रशीद मसूद और बेनी प्रसाद वर्मा को अहमियत दी जबकि यह लोग दूसरे दलों से आए थे और इसी वजह से कांग्रेस कार्यकर्ता इस चुनाव में दूर रहा। प्रदेश के कई सांसद और नेता यह चाहते हैं कि हार के जिम्मेदार लोगों को सजा दी जाए जिन लोगों को इस चुनाव में अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यकों वाली सीटों को जीतने के लिए लगाया गया था, उन पर गाज गिरनी चाहिए।
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Tuesday, 13 March 2012

Nehru-Gandhi Family charm vanishes

Anil Narendra
Assembly election results for five States have been disappointing for the Congress Party on the one hand, and on the other these have proved a high voltage shock for the Nehru-Gandhi family. When asked about her reactions, the Congress President Sonia Gandhi told media on Wednesday that wrong selection of candidates and weak Party organization in UP led to the miserable performance of the Party. She said that defeat and victory are the way of life; we have lost Rai Bareilly and Amethi seats earlier also, etc. Meanwhile, her son Rahul Gandhi has accepted the responsibility for Party's election debacle. If it is a normal defeat, then question arises as to why a review is required? If Rahul has taken the responsibility, then the matter almost ends, but the question which was not replied to by Sonia Gandhi, is still there – does this defeat indirectly impact the Nehru-Gandhi family? The Congress has thrown in its present and future in UP. Rahul shouldered the election campaign, whereas the entire Gandhi-Wadra family (including children) entered the fight to save the family fort of Amethi-Rai Bareilly. People have completely rejected Nehru-Gandhi-Wadra family in Uttar Pradesh. Despite Rahul Gandhi's herculean efforts, the Congress has returned to the position of 2007 in UP. On the other hand, in the areas where Priyanka along with her husband and children took the command of the electioneering, the Congress had difficulty in saving its face. Rahul Gandhi organized more than 200 rallies. Sonia Gandhi also addressed many rallies. Party might have been able to secure more seats than 22 Assembly seats in 2007, but if we compare these with the Lok Sabha elections of 2009, then it would be sufficiently worrisome for Congress and Rahul Gandhi himself. The Rahul wave had been totally ineffective in UP and it is a bad omen for the Congress. When the elections in all these five States are being considered as the semi-final for power in the 2014 General Elections, the big jolt, that the Party has received in other States excepting Manipur, is an indication of people's apathy towards the UPA government at the Centre, especially  for the Congress.  Another shock for the Congress is the fact that the young SP leader Akhilesh has outweighed Rahul Gandhi who had been championing the cause of youths.  In fact, it would not be wrong to say that for the present, Mulayam Singh family has outweighed the Nehru-Gandhi family.  Not only the youth would be cause of concern for the Congress, but it would have to worry about Muslim votes, which have gone en masse in favour of Samajwadi Party, whereas the Congress leaders had left no stone unturned to win these votes. The blow to charismatic image of Rahul Gandhi in UP after Bihar, has led to concern in the Party. The UP election results have, however, confirmed that the magic of Nehru-Gandhi family has faded. Rahul had, with great fanfare entered into an alliance with the Rashtriya Lok Dal of Ajit Singh, but it did not prove beneficial to the Party. Performance of the Congress in Amethi-Rai Bareilly, considered to be the stronghold for Nehru-Gandhi family, has been a big blow for the Party, as in the last elections, it had secured 7 out of 10 seats in the area, when Mayawati tsunami had hit the area. This time, loosing all the five assembly seats in the parliamentary constituency of Sonia Gandhi and securing just two seats in the Rahul Gandhi parliamentary constituency and clean sweep in the district Sultanpur are the personal defeats for the Nehru-Gandhi family. Rahul Gandhi had left no stone unturned in the electioneering in the UP Assembly elections. He stayed continuously in UP for 46 days and held 211 rallies and 18 big road shows. No doubt, Rahul Gandhi has accepted the responsibility for this embarrassing defeat, but other Congress leaders, however, are not prepared to accept it as a defeat for the Nehru-Gandhi family. Boastful General Secretary Digvijay Singh has welcomed these results and called these the defeat of corrupt BSP. This is another thing that during the elections, Congress had targeted SP rather than BSP. The Party also lost on the Phulpur Lok Sabha seat  near Allahabad, of Pandit Jawaharlal Nehru, Indira Gandhi seat of Rai Berreilly, Amethi seat of Sanjay Gandhi and Rajeev Gandhi. It appears that the party organizers got an inkling of Party's weaker position. That is why Priyanka was brought here, but Party failed to open its account in Sonia Gandhi parliamentary constituency. The way the people of the area have rejected the Nehru-Gandhi family, will have far reaching impact on the Centre.

Saturday, 10 March 2012

नेहरू-गांधी परिवार का हवाई करिश्मा हवा-हवाई हो गया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 March 2012
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम जहां कांग्रेस पार्टी के लिए निराशाजनक हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम नेहरू-गांधी परिवार के लिए बहुत बड़ा व्यक्तिगत झटका है। जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई तो बुधवार को दिल्ली में मीडिया को उन्होंने कहा कि यूपी में उम्मीदवारों का गलत चयन और उत्तर प्रदेश में कमजोर संगठन पार्टी के खराब प्रदर्शन का कारण बना। उन्होंने कहाöहार-जीत तो होती रहती है, हम रायबरेली और अमेठी में पहले भी हारे हैं इत्यादि-इत्यादि। उधर सुपुत्र राहुल गांधी ने हार की सारी जिम्मेदारी ले ली। अगर यह हार सामान्य है तो प्रश्न उठता है कि समीक्षा की जरूरत क्या है? वैसे भी जब राहुल ने जिम्मेदारी ले ली है तो मामला खत्म-सा है पर जिस बात का सोनिया ने जवाब नहीं दिया वह है कि क्या यह हार नेहरू-गांधी परिवार पर सीधी आंच नहीं लाती? कांग्रेस ने वर्तमान और भविष्य सब कुछ उत्तर प्रदेश में झोंक दिया। राहुल ने पूरे प्रदेश का अभियान अपने कंधों पर ढोया तो अमेठी-रायबरेली का घरेलू किला बचाने के लिए पूरा गांधी-वाड्रा परिवार (बच्चे भी शामिल) मैदान में उतर गए। उत्तर प्रदेश की जनता ने नेहरू-गांधी वाड्रा परिवार को सिरे से खारिज कर दिया। राहुल के भागीरथी प्रयासों के बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 2007 की हालत में ही पहुंच गई है, वहीं प्रियंका ने जिन इलाकों में अपने पति और बच्चों के साथ प्रचार की कमान संभाली वहां तो कांग्रेस के लिए इज्जत बचानी भी मुश्किल हो गई। राहुल गांधी ने 200 से अधिक रैलियां की। सोनिया गांधी ने भी कई रैलियां की। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव की 22 सीटों की तुलना में पार्टी को भले ही ज्यादा सीटें मिली हों पर यदि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव को देखें तो यह कांग्रेस और स्वयं राहुल गांधी को परेशान करने के लिए काफी होगा। राहुल लहर का असर न होना कांग्रेस के लिए अशुभ संकेत है। ऐसे में जबकि इन पांच राज्यों के चुनाव को वर्ष 2014 के सत्ता के सिंहासन का सेमीफाइल कहा जा रहा था तो मणिपुर को छोड़कर अन्य जगह पार्टी को झटका लगना इस बात का संकेत है कि केंद्र की यूपीए सरकार विशेषकर कांग्रेस को लेकर लोगों में बहुत ज्यादा उत्साह नहीं है। गांधी परिवार के लिए एक झटका यह भी है कि युवाओं की बात करने वाले राहुल गांधी पर सपा के युवा नेता अखिलेश यादव भारी पड़े। देखा जाए तो यह कहना गलत न होगा कि फिलहाल तो नेहरू-गांधी परिवार पर मुलायम यादव परिवार भारी पड़ा। कांग्रेस के लिए चिन्ता की बात केवल युवा ही नहीं होगी बल्कि जिन मुस्लिमों के मतों को अपने पाले में करने के लिए कांग्रेसी नेताओं ने दिन-रात एक किए, उसकी भी बड़ी संख्या ने कांग्रेस की जगह सपा को चुना। बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में राहुल की करिश्माई छवि को झटका लगना पार्टी के अन्दर चिन्ता का विषय बन गया था। अब उत्तर प्रदेश के परिणामों ने तो इस पर मोहर लगा दी कि नेहरू-गांधी परिवार का जादू समाप्त हो गया है। राहुल ने बड़ी धूमधाम से अजीत सिंह की रालोद से गठबंधन किया था। इस गठबंधन से उलटा पार्टी को नुकसान ही हुआ। पार्टी के लिए नेहरू-गांधी परिवार के गढ़ माने जाने वाले अमेठी-रायबरेली में कांग्रेस का प्रदर्शन इस लिहाज से बड़ा झटका है कि पिछले चुनावों में जब मायावती की आंधी चली थी तब भी इस क्षेत्र से पार्टी ने 10 में से 7 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली की पांचों विधानसभा सीटें हारना और राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में मात्र दो सीटें जीतना तथा सुल्तानपुर जिले में पार्टी का सूपड़ा साफ होना नेहरू-गांधी परिवार की व्यक्तिगत हार है। राहुल गांधी ने दिन-रात एक कर दिया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश में लगातार 46 दिन रुककर 211 रैलियां और 18 बड़े रोड शो किए। इस शर्मनाक परिणाम की बेशक राहुल गांधी ने जिम्मेदारी ले ली हो लेकिन कांग्रेस के दूसरे नेता इसे गांधी परिवार की हार मानने को तैयार नहीं हैं। बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह ने इन नतीजों पर खुशी जताई और कहा कि भ्रष्टाचारी बसपा की हार हुई है। यह बात अलग है कि चुनाव के दौरान कांग्रेस के मुख्य निशाने पर बसपा से ज्यादा सपा थी। जिस इलाहाबाद के पास फूलपुर से पंडित जवाहर लाल नेहरू, रायबरेली से इन्दिरा गांधी, अमेठी से संजय गांधी और राजीव गांधी लोकसभा में पहुंचते रहे वहां से भी पार्टी विफल रही। लगता है कि पार्टी की हिलती चूलों की भनक पार्टी प्रबंधकों को पहले से ही लग गई थी। इसीलिए यहां पर प्रियंका को उतारा लेकिन सोनिया के संसदीय क्षेत्र में पार्टी का खाता तक नहीं खुला। प्रदेश की जनता ने गांधी परिवार के हवाई करिश्में को जिस तरह से नकारा है, उसके केंद्र तक में खासे प्रभाव पड़ेंगे।
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Thursday, 8 March 2012

माया के खिलाफ नैगेटिव वोट और अखिलेश की आंधी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8 March 2012
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के डिब्बे खुल चुके हैं। नया इतिहास रचा गया है। कारणों के लम्बे-चौड़े विश्लेषण होने लगे हैं। मोटे तौर पर जो प्रमुख कारण मुझे लगे वह कुछ इस प्रकार हैं। पहले बात हम करते हैं उत्तर प्रदेश की। यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थे कि साइकिल ने हाथी को रौंद दिया। समाजवादी पार्टी की जीत का सबसे बड़ा कारण था मायावती सरकार के खिलाफ नैगेटिव वोट। यूपी की जनता ने तय कर लिया था कि मायावती की बसपा सरकार को हटाना था और सामने विकल्प के रूप में अखिलेश यादव नजर आए। अखिलेश यादव प्रदेश की जनता की नब्ज को पहचानने में सफल रहे। जीतोड़ मेहनत की और जमीन पर चलने वाले अखिलेश ने एक नई उम्मीद पैदा की। मेहनत तो राहुल गांधी ने भी कम नहीं की। उन्होंने भी दो महीने से यूपी की खाक छानी, 200 से ज्यादा रैलियां की पर जनता ऐसा नेता चाहती थी जिसके पास वह जाकर अपनी नाली, बिजली, पानी की समस्या कह सके। वह हर बार राहुल से आकर दिल्ली में तो कह नहीं सकते थे। राहुल की कड़ी मेहनत पर यूपी की कांग्रेसी इकाई ने सारा पानी फेर दिया। चुनावी माहौल तो राहुल ने बना दिया पर फसल काटने के लिए संगठन तैयार नहीं था। न कोई बूथ कमेटी थी न ही जिला कमेटी। जिन मुसलमानों को खुश करने के लिए कांग्रेस ने हर हथकंडा अपनाया, उन्होंने मुलायम की झोली में जाना बेहतर समझा। मुस्लिम वोट सपा, कांग्रेस और बसपा में बंटा, एकमुश्त किसी को नहीं गया पर बहुमत सपा के साथ गया। मायावती अपनी हार के लिए खुद जिम्मेदार हैं। उनका तानाशाह तरीका जनता को नहीं भाया। महारानियों की तरह उनके व्यवहार से खुद उनकी पार्टी वाले दुःखी थे। मुझे तो नहीं लगता कि दलित वोट भी पूरी तरह से बसपा को मिला। आखिर वह वोट देते भी क्यों? जिन दलितों के उद्धार के लिए मायावती शासन में आईं, उसी दलित को कॉलेज में एक क्लर्प की नौकरी पाने के लिए चार लाख रिश्वत देनी पड़ी थी। लोग भूखों मर रह थे और बहनजी हाथी बनवाने में लगी हुई थीं। पिछले पांच सालों में न तो किसी कॉलेज में चुनाव हुआ और न ही स्थानीय निकायों का चुनाव। सारी चुनावी प्रक्रिया ठप कर दी बहन जी ने। युवाओं में आक्रोश था। किसानों की जमीनें बिल्डरों को औने-पौने भाव में लुटा दीं और पैसा बनाने की फैक्टरी बन गई बसपा। फिर बहुजन समाज पार्टी में मायावती का विकल्प क्या था? उन्होंने कभी दूसरी पंक्ति की लीडरशिप खड़ा करने का प्रयास किया। कोई युवा चेहरा था उनके पास पेश करने को? विकल्प के रूप में युवा चेहरा नजर आया अखिलेश यादव का। नेता जी (मुलायम) शायद अपने बलबूते पर यह चुनाव न जीत पाते। आज भी उनके गुंडे राज को कोई नहीं भूला। 2007 में उनका इसीलिए सफाया किया गया था, क्योंकि हर थाने में, हर गांव में, तहसील में मुलायम खड़ा मिला। दरअसल सपा के वर्पर सत्ता में आने से सभी मुलायम बन जाते हैं और वही गुंडा राज आ जाता है। इसी से दुःखी जनता ने मायावती को चांस दिया था। अखिलेश यादव के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी अपने कार्यकर्ताओं पर लगाम रखना। आते ही दो स्थानों पर तो गोली चल चुकी है, मारपीट हो चुकी है। यूपी की जनता ने यह साबित कर दिया है कि रणनीतियों से ज्यादा वह नीतियों को प्राथमिकता देती है। भाजपा को यही रणनीति चाट गई। इस बार का सारा यूपी का चुनाव राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लड़ा। संजय जोशी, नितिन गडकरी ने उम्मीदवारों से लेकर रैलियों तक सब कुछ संघ के इशारों पर हुआ। संघ ने कहा कि आडवाणी सहित किसी बड़े नेता को दिल्ली, गुजरात से नहीं बुलाना, नहीं बुलाया गया। उमा भारती को जबरदस्ती लाकर यूपी के नेताओं में घमासान करा दिया। भाजपा इस चुनाव में विभाजित पार्टी की तरह उतरी और नतीजा सामने है। इस चुनाव में भाजपा की इतनी हार नहीं हुई है जितनी संघ की हुई है। भाजपा तो पहले से भी ज्यादा गिर गई। इसी रणनीति, गलत नीतियों की वजह से उत्तराखंड में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। उत्तराखंड की विडम्बना देखिए कि वह रमेश पोखरियाल निशंक चुनाव जीत गए जिन्हें भ्रष्ट होने के आरोप में हटाया गया और वह भुवनचन्द खंडूरी चुनाव हार गए जिनकी ईमानदार छवि पर भाजपा ने दाव लगा दिया। इससे तो शायद बेहतर होता कि निशंक को ही बनाए रखते और चुनाव से तीन महीने पहले उठाकर पार्टी को नुकसान पहुंचा दिया। इस चुनाव में पर्सनेलिटी का बड़ा योगदान रहा है। पंजाब में प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन अमरिन्दर सिंह आमने-सामने थे, जहां बादल अत्यंत मिलनसार, जनता के दुःख-दर्द में साथ देने वाले हैं वहीं कैप्टन का महाराजा स्टाइल बदला नहीं। उन्होंने वही शाही अन्दाज में चुनाव लड़ा। जब जनता को बादल और अमरिन्दर में से एक को चुनने का समय आया, उन्होंने बादल को प्राथमिकता दी। पंजाब में अकालियों के खिलाफ माहौल था पर कांग्रेस उसका फायदा नहीं उठा सकी। 44 साल में यह पहली बार है कि सत्तारूढ़ पार्टी-गठबंधन फिर से चुनाव जीता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नतीजे खासकर बहुमत का दावा करने वाली कांग्रेस के लिए बेहद निराशाजनक और चिन्ताजनक है। पार्टी को कहां तो दिग्विजय सिंह जैसे बड़बोले नेता 125 सीटों का दावा करते नहीं थकते थे, कांग्रेस को सिर्प 28 सीटें ही मिल सकीं। अगर लोकसभा चुनाव में 22 सीटें जीतने वाली इस पार्टी का आंकलन था कि इस बिनाह पर उसे 100 सीटें तो मिलनी चाहिए। सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल जिसने पश्चिमी उत्तर प्रदश में आंधी का दावा किया कुल नौ सीटें ही जीत सकी जो पिछले जीत से भी कम हैं। चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन की हद तो तब हो गई जब उसके गढ़ कहे जाने वाले अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में कांग्रेस सभी पांचों सीट हार गई जबकि इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक देने वाले महासचिव राहुल गांधी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाले जिले अमेठी में कांग्रेस पांच में से तीन सीटें गंवा बैठी। अमिता सिंह जैसी दिग्गज अमेठी में हार गईं। तमाम ड्रॉमे करने के बावजूद सलमान खुर्शीद अपनी पत्नी लुइस खुर्शीद की जमानत नहीं बचा सके। चुनाव में अपने बड़बोलेपन के लिए सुर्खियों में बने रहे केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा दरियाबाद चुनावी होड़ में तीसरे पायदान पर रहे। वैसे अगर दिग्गजों की हार की बात करें तो भाजपा का हाल भी कांग्रेस जैसा रहा। सिवाय उमा भारती के चुनावी मैदान में उतरे सभी क्षत्रप चुनाव हार गए। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही, पूर्व अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र, विधानमंडल के नेता ओम प्रकाश सिंह तथा पूर्व प्रदेशाध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी को पराजय का मुंह देखना पड़ा।
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Friday, 24 February 2012

चुनाव आयोग के अधिकारों में कटौती का इरादा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th February  2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश चुनाव में अन्य राजनीतिक दलों के खिलाफ जोर आजमाइश कर रही कांग्रेस का एक मोर्चा चुनाव आयोग के खिलाफ भी खुलता नजर आ रहा है। दरअसल कांग्रेस पार्टी कानपुर के जिला अधिकारी की ओर से पार्टी महासचिव राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश से सख्त खफा है। पार्टी जहां इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती देगी वहीं चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र को भी कतरने की तैयारी कर रही है। बताते हैं कि मंत्रिमंडलीय समूह आचार संहिता को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से हटाने का एजेंडा तैयार कर रहे हैं। इससे पहले केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा भी आचार संहिता मामले में आयोग को परोक्ष रूप से चुनौती दे चुके हैं। शुरुआती दौर में चुनाव आयोग भले ही बसपा और अकाली दल के नेताओं के निशाने पर रहा हो, लेकिन अब लड़ाई चुनाव आयोग बनाम कांग्रेस हो गई है। कांग्रेस के अब निशाने पर है मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी हैं। वैसे मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने अक्खड़ रवैये से एक बार फिर टीएन शेषन की याद दिला दी है। एक दौर में जिस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त शेषन ने अपनी धमक से तमाम दलों को चुनाव आयोग की ताकत दिखा दी थी, कुछ उसी तरह का काम कुरैशी कर रहे हैं। शायद यही बात कांग्रेस के आला नेताओं को हजम नहीं हो रही। ऐसे में चुनाव आयोग के पर कतरने की गुपचुप तैयारियों की खबरों से विवाद खड़ा हो गया है। एक अंग्रेजी अखबार ने दो दिन पहले खुलासा किया था कि केंद्र सरकार आदर्श चुनाव संहिता आदि के मामले में चुनाव आयोग के अधिकार कम करने की पहल करने वाली है। इस खबर में कुरैशी की राय भी बता दी गई थी। कुरैशी ने कहा है कि यदि सरकार ऐसी कोई कोशिश करेगी तो इससे आदर्श चुनाव संहिता का पालन कराना और कठिन काम हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के अधिकारों को कम करने की कोई कोशिश जनता पसंद नहीं करेगी। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली का कहना है कि सरकार की ऐसी कोशिश सरासर राजनीतिक बेशर्मी है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि हाल में चुनाव आयोग ने कानून मंत्री सलमान खुर्शीद को भी आदर्श चुनाव संहिता उल्लंघन के मामले में कठघरे में खड़ा किया था। इस पर उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी। एक और मामले में केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा भी ऐसे ही मामले में फंसे हैं। राहुल गांधी भी कानपुर में चुनाव संहिता को ठेंगा दिखाकर फंस गए हैं। इसकी खीज उतारने की तैयारी की जा रही है। हमें नहीं मालूम कि मनमोहन सरकार क्या वाकई ही ऐसा कोई कदम उठाने की सोच रही है? अगर सोच रही है तो वह गलत सोच रही है। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसका काम स्वतंत्र, निष्पक्ष और साफ-सुथरे चुनाव कराना है और ऐसा ही वह कर भी रही है। ऐसा नहीं कि मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी खासतौर पर कांग्रेस को ही टारगेट कर रहे हैं। उनके निशाने पर सभी दल हैं जो आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं। भारत के लोकतंत्र की मजबूती का एक बड़ा कारण है स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और इस काम में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका चुनाव आयोग की है। जनता चुनाव आयोग के अधिकारों में कटौती स्वीकार नहीं कर सकती। बेहतर है सरकार अगर उसका ऐसा करने का कोई इरादा है तो उसे त्याग दे।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Election Commission, Rahul Gandhi, S.Y. Qureshi, Salman Khursheed, Vir Arjun

Thursday, 23 February 2012

क्या राहुल गांधी अब गिरफ्तार होंगे?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23th February  2012
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस के महासचिव युवराज राहुल गांधी आदर्श चुनाव संहिता उल्लंघन के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं। तीन दिन तक चली रस्साकशी के बाद सोमवार को 35 किमी लंबा रोड शो निकाल कर राहुल गांधी जिला पशासन के भी निशाने पर आ गए हैं। जिला पशासन ने इसे आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए कैंट थाने में राहुल और कांग्रेस जिलाध्यक्ष महेश दीक्षित सहित 40 अन्य के खिलाफ धारा 188, 283 और 290 के तहत एफआईआर दर्ज करा दी है। इस मामले में जो एफआईआर दर्ज हुई है उसमें ऐसी धाराएं लगाई गई हैं जिसमें गिरफ्तारी का खतरा है। लिहाजा राहुल गांधी गिरफ्तार भी किए जा सकते हैं। इससे बचने के लिए उन्हें अग्रिम जमानत लेनी पड़ सकती है। इस मामले को लेकर राजनीतिक खींचतान बढ़ना स्वाभाविक ही है। कांग्रेस के पवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि किसी तरह का गैर कानूनी काम रोड शो में नहीं हुआ। वैध पचार अभियान लोकतांत्रिक अधिकार का बुनियादी हिस्सा है। ऐसे में उत्तर पदेश सरकार मनमानी नहीं कर सकती। यूपी कांग्रेस नेताओं का कहना है कि ये कार्रवाई बसपा सरकार के इशारे पर की गई है। डीएम ने पूरे मामले की जानकारी संबंधित चुनाव आयोग के अधिकारी, पर्यवेक्षक और शासन को दे दी थी। कांग्रेस की जिला इकाई ने रोड शो के लिए पशासन से अनुमति मांगी थी, लेकिन जिलाधिकारी ने इसे खारिज कर दिया था। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह के तेवर तल्ख हो गए हैं। उन्होंने कल मीडिया से कहा कि मुख्यमंत्री मायावती के इशारे पर जिला पशासन उनकी पार्टी के खिलाफ फरेब करने पर लगा है। राहुल गांधी ने लखनऊ में सफल रोड शो किया था, इससे कांग्रेस की हवा बनी थी। इसी को लेकर कानपुर के पशासन को लखनऊ से निर्देश दिए गए थे कि किसी भी हालत में कानपुर में लखनऊ जैसा सफल रोड शो न हो पाए। इसके बावजूद सफल रोड शो हो गया तो खीझकर पशासन ने तमाम आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। कांग्रेस को चुनौती है कि यदि अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया तो उन्हें महंगा पड़ेगा। जिन धाराओं में केस दर्ज किया गया है उनमें आरोपियों को 6 महीने की सजा हो सकती है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में राहुल और उनके साथियों को अग्रिम जमानत लेनी पड़ेगी। वरना गिरफ्तारी का खतरा बना रहेगा। खबर आई है कि आरपार की लड़ाई के लिए तैयार कांग्रेस राहुल के खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज कराने के लिए हाईकोर्ट तक जाएगी। चूंकि मामला अब राजनीतिक बन गया है इसीलिए भाजपा भी इसमें कूद पड़ी है। भाजपा पवक्ता शाहनवाज हुसैन का कहना है कि कांग्रेस नेताओं की आदत बन गई है कि बार-बार चुनाव आयोग के नियमों को ठेंगा दिखाना। पहले कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कारनामा किया। इसके बाद केंद्रीय मंत्री बेनी पसाद वर्मा ने आचार संहिता की धज्जियां उड़ाईं और अब कानपुर में राहुल गांधी ने रोड शो के नाम पर चुनाव आयोग के नियम तोड़े। इस पर पशासन ने कार्रवाई की तो कांग्रेस दादागीरी पर उतर आई है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। मामला अब आगे बढ़ेगा, देखें क्या होता है?
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Monday, 20 February 2012

The Angry Young Man of Congress

- Anil Narendra
We have witnessed many faces of the Congress prince Rahul Gandhi during the Assembly election campaign in Uttar Pradesh. We have seen a mild mannered, calm and quite Rahul Gandhi, who had been sharing food with Dalit families and had been sensitive to their sufferings, but today we are witnessing a different bearded face of Rahul Gndhi dramatically tearing off documents on the stage. With the passage of time, the increasing anger of Rahul Gandhi has not only started surfacing, but his aggressive postures have become sharper. Now, he has even started publicly expressing his anger by tearing off papers on the stage. Perhaps he is trying to convey a message to the youth of UP that 'this uncomplaining attitude of yours will not help you, if you want to survive in the present age, make noise so that your voice could be heard'. It is this posture of his, which has earned the status of an angry young man for him in the Congress Party. Besides being 'the prince' of Congress, Rahul is also the only star campaigner for the Congress for the Assembly elections. In fact, this time whole of the Gandhi Family has thrown its weight in UP elections. Sonia Gandhi, Priyanka Gandhi and Robert Wadra, all the three have come out in the open. This is something unprecedented for the Gandhi Family. However, Congress is keeping its fingers crossed and waiting for the Rahul magic to work. That is why, with the completion of election-phases in UP, enthusiasm of the Congress is also increasing. The Congress has, even started claiming that elections in UP have now been restricted to Rahul vs others, that is why leaders of SP, BSP and BJP have started targeting Rahul Gandhi in their speeches. It appears that Prince Rahul has taken a vow to take the Congress to the seat of power in UP single-handedly and when he comes across obstacles on his way, he becomes angry. Meanwhile, he has also learnt the politics of cashing on this anger. So, whenever he exhibits aggressiveness, the audience applauds him. It happened during the election meeting at Lucknow, the other day. With slightly grown beard, Rahul Gandhi took mike in his hand at the election meeting at DAV College courtyard and started speaking like a Bollywood hero. Angry Rahul said that both the SP and BSP have been making empty promises in these years, which have made your condition bad to worse. I have in my hand a list of promises made by SP, which promises of electricity, roads, employment, if they come to power. If they fail to provide employment, they promise unemployment allowance at enhanced rate. This is the list, which the SP provided to the people during last elections. You need employment, not a list of promises. That is why I am tearing this list. Then, like a hero, he tore the paper in his hands into many pieces and threw it in the air. This action by Rahul has created a new controversy. BJP President, Nitin Gadkari said that by doing so, Rahul has exhibited his immaturity. It shows that he is still unaware of political nuances. Best comment came from SP President Akhilesh Yadav, who called Rahul's anger a drama and a stunt. Sometimes, he tears papers and sometimes he asks the audience to leave his meeting. I'm afraid; he may not jump off from the stage one day. What effect the anger of Rahul Gandhi will have, will be known only after the counting of the votes.

Sunday, 19 February 2012

कांग्रेस के नए एंग्री यंग मैन राहुल गांधी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th February  2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान हमने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के कई रूप देख लिए हैं। कहां तो एक शांत-सौम्य चेहरा जो दलितों के घर रोटी-पानी खाकर उनके दर्द को समझने वाला शालीन स्वभाव का था और कहां वह अब दाढ़ी बढ़ाकर फिल्मी अन्दाज में मंच पर कागज फाड़ रहे हैं। वक्त की रफ्तार के साथ राहुल का गुस्सा थोड़ा और बढ़ने के साथ ही न सिर्प दिखने लगा है बल्कि उनके तेवरों की आक्रामकता भी बढ़ गई है। यहां तक कि अब वह मंच से ही कागज फाड़कर गुस्से का सार्वजनिक अहसास भी कराने लगे हैं। शायद वह यूपी के युवाओं को फलसफा देना चाहते हैंö`ये खामोश मिजाजी तुम्हें जीने नहीं देगी, इस दौर में जीना है तो कोहराम मचा दो।' इनके इसी तेवर पर कांग्रेस ने उन्हें `एंग्री यंग मैन' का तमगा पहना दिया है। राहुल कांग्रेस के `युवराज' तो हैं ही साथ-साथ वह कांग्रेस पार्टी के चुनावी अभियान के अकेले सुपर स्टार भी हैं। वैसे इस बार गांधी परिवार ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल, प्रियंका व रॉबर्ट वाड्रा सभी इस बार मैदान में आ गए। इतनी ताकत तो गांधी परिवार ने शायद ही पहले कभी झोंकी हो। खैर! कांग्रेस को राहुल के करिश्मे का इंतजार है। यही वजह है कि यूपी में जैसे-जैसे चरणों में चुनाव सम्पन्न हो रहा है, कांग्रेस का उत्साह भी बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस तो अब दावा कर रही है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव अब केवल राहुल बनाम अन्य होकर रह गया है, इसलिए सपा, बसपा से लेकर भाजपा तक के नेता अपने भाषणों में केवल राहुल गांधी पर निशाना साध रहे हैं। लगता है कि राहुल बाबा ने तो सपना पाल लिया है कि इस चुनाव में कांग्रेस को अपने दम पर सिंहासन तक पहुंचाएंगे और ऐसे में जब उन्हें ज्यादा भव-बाधाएं दिखाई पड़ती हैं तो उन्हें गुस्सा आ जाता है। अब इस गुस्से को भुनाने की राजनीतिक कला भी उन्होंने सीख ली है। सो, अब वे जब एंग्री युवा लीडर के तेवर दिखाते हैं तो दर्शक खूब तालियां पीटते हैं। कुछ ऐसा ही उस दिन लखनऊ की एक चुनावी सभा में हुआ। डीएवी कॉलेज के प्रांगण में एक चुनावी सभा में, हल्की दाढ़ी उगाए राहुल गांधी ने माइक थामा। इसके बाद वे किसी बॉलीवुड नायक की तरह बोल पड़े। चेहरे पर गुस्से के भाव लेकर वे बोले कि सपा और बसपा ने सालों से केवल वादे किए हैं। हकीकत में कुछ नहीं किया। इसी के चलते आपके हाल बदतर हुए हैं। मेरे हाथ में सपा की चुनावी लिस्ट है। यही कि चुनाव जीते, तो सड़कें देंगे, बिजली देंगे, रोजगार देंगे। यदि रोजगार नहीं दे पाए तो बढ़ा हुआ बेरोजगारी भत्ता देंगे। यह वही लिस्ट है, जो पिछले चुनाव में भी सपा ने आम लोगों को दी थी। आम लोगों को काम चाहिए वादों की लिस्ट नहीं। ऐसे में सपा की यह लिस्ट फाड़ रहा हूं। यह कहकर उन्होंने हीरोगीरी के अन्दाज में हाथ में लिया कागज फाड़कर नीचे फेंक दिया। राहुल के इस एक्शन पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि ऐसा करके राहुल ने अपना बचपना दिखाया है। लगता यही है कि उन्हें अभी राजनीति की समझ नहीं है। सबसे अच्छा कमेंट सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का था। अखिलेश ने कहा राहुल का गुस्सा नाटक है और स्टंट है। कभी पर्चा फाड़ते हैं तो कभी श्रोताओं को अपनी सभा से चले जाने को कहते हैं। कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन वह मंच से ही कूद जाएं। राहुल गांधी के यह तेवर क्या रंग खिलाते हैं, इसका तो मतों की गिनती पर ही पता चलेगा।
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Saturday, 21 January 2012

सोनिया, राहुल के बाद अब पियंका भी उतरीं मैदान में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21th January  2012
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस के युवा महासचिव और युवा सम्राट राहुल गांधी ने उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव में दिन-रात एक कर दी है। अपने मिशन 2012 को पूरा करने के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे राहुल। आजकल वह बुंदेलखंड के दौरे पर हैं। दुख यह है कि उनकी मीटिंगों में भीड़ कम आ रही है। पूर्वांचल के मुकाबले बुंदेलखंड में भीड़ का आमाद कांग्रेस के लिए चिंता का सबब है। भारी संख्या में पड़ी खाली कुर्सियों को देख कांग्रेस आलाकमान इसलिए भी चिंतित है क्योंकि न केवल भीड़ कम आ रही है बल्कि राहुल को कई जगह विरोध भी झेलना पड़ा। पिछले दिनों राहुल पूर्वी उत्तर पदेश के दौरे पर थे। गोरखपुर, आजमगढ़, मऊ और बलिया में उतनी भीड़ नहीं जुटी जितनी की उम्मीद की जा रही थी। यूपी में कांग्रेस का सारा दारोमदार सोनिया गांधी परिवार पर टिका हुआ है। इसीलिए तमाम कांग्रेसी दिग्गज अपने परिवार की साख बचाने के लिए गांधी परिवार की पतिष्ठा को आगे करने की कोशिश में हैं। जमीनी सच्चाई का हवाला देकर राहुल गांधी से जातिवादी और धार्मिक आधार पर बयानबाजी करवा चुके ये नेता अब इसी उत्तर पदेश के चुनाव में अपना हुकुम का इक्का चलाने के लिए मैदान बनाने में जुट गए हैं। यह हुकुम का इक्का है पियंका गांधी वाढरा। पियंका पर अमेठी व रायबरेली के बाहर भी हर हाल में रैली कराने के लिए सभी दिग्गज नेता और केन्द्राrय मंत्रियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। दरअसल उत्तर पदेश के सभी कांग्रेसी नेता यह मान रहे हैं कि एक-दो फीसदी मत भी अगर कांग्रेस के पक्ष में पलट जाए तो नतीजे पूरी तरह बदले हुए होंगे। उनका यह भी मानना है कि वोटों का इतना पतिशत पलटने में पियंका पूरी तरह सक्षम हैं। पियंका गांधी वाढरा का सबसे बड़ा आकर्षण उनका व्यक्तित्व स्वर्गीय इंदिरा गांधी जैसा होना है। चुनाव पचार के दौरान जब वह बात करते हुए मुस्कुराती हैं तो पास खड़ी औरतें कहती हैं, बिटिया ऐसे ही मुस्कुराती रहना, मुस्कान तुम पर अच्छी लगती है। यह मुस्कुराहट ही पियंका को अपनी दादी इंदिरा की सबसे करीबी झलक देती है। लोग उनमें बहुत कुछ इंदिरा गांधी जैसा पाते हैं। चेहरे की बनावट, वैसे ही नाक और पावर ड्रेसिंग का स्टाइल। इंदिरा जी की पुरानी तस्वीरें पियंका के आज के दिनों की याद कराती नजर आती हैं। अगर कुछ अलग है तो वह इस मुस्कुराहट में गाल पर पड़ने वाला डिम्पल। बॉलीवुड के बड़े सितारे जॉन इब्राहिम पियंका को देश की सबसे खूबसूरत महिला बताते हैं। पार्टी पचार में जब पियंका उतरती हैं तो सबसे पहले अपनी दादी की याद कराती हैं। इंदिरा की तरह ही वह लोगों के साथ घुलमिल जाती हैं। जब वह किसी सभा में आ रही होती हैं तो वहां बैठी जनता कहती है देखो इंदिरा जी आ रही हैं। पियंका ने पता नहीं अनजाने में या सोची समझी रणनीति के तहत अपने बालों का स्टाइल भी दादी इंदिरा गांधी की तरह रखा हुआ है। राहुल और पियंका दोनों को देखने भीड़ आती है पर सवाल यह है कि क्या जो लोग सभा में आते हैं वह कांग्रेस के वोटर हैं? राहुल की कोशिशों से यूपी में कांग्रेस की स्थिति पहले से अच्छी हुई है। अब पियंका के आने से यह और अच्छी होने की कई कांग्रेसी उम्मीद लगाए बैठे हैं। कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत चुनाव में झोंक दी है। सोनिया गांधी, राहुल और अब पियंका। देखें इनका मतदाताओं पर क्या असर पड़ता है?
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Tuesday, 27 December 2011

तो बिछ गई है पांच राज्यों में चुनावी बिसात

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th December 2011
अनिल नरेन्द्र
देश की भावी रणनीति तय करने वाले उत्तर पदेश समेत पांच राज्यों में बिछ गई है चुनाव की बिसात। शनिवार को चुनाव आयोग ने पांचों राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा कर दी। उत्तर पदेश में 5 चरणों में चुनाव होंगे। यहां चार फरवरी, आठ फरवरी, 11 फरवरी, 15 फरवरी, 19 फरवरी, 23 फरवरी और 28 फरवरी को मतदान होगा। जबकि उत्तराखंड और पंजाब में एक ही चरण में 30 जनवरी को मतदान होगा। गोवा में तीन मार्च और मणिपुर में 28 जनवरी को मतदान कराया जाएगा। पाचों राज्यों के चुनावों की मतगणना एक ही दिन चार मार्च को होगी। चुनाव आयोग द्वारा तय की गई पांच राज्यों की चुनावों की तारीखों से कांग्रेस पार्टी तो खुश होगी। उसे केन्द्र सरकार द्वारा घोषित हालिया जन लुभावन योजनाओं का लाभ मिलने की उम्मीद है और जाड़े का मौसम होने के चलते साग-सब्जी तथा दूसरी खाद्य वस्तुओं के दाम कम हो जाने का फायदा भी उसे दिख रहा है। मणिपुर और गोवा जैसे छोटे राज्यों में उसे सत्ता विरोधी जनमत का सामना करना है। वहीं पंजाब और उत्तराखंड में वह सत्ताधारी दलों की अकेली विकल्प है। यानि सत्ता विरोधी मतों का उसे सीधा लाभ मिलेगा। यदि मणिपुर और गोवा में सरकार में होने का उसे नुकसान होता है तो उसकी कुछ हद तक भरपाई वह पंजाब और उत्तराखंड में कर सकती है। मणिपुर और गोवा के मुकाबले में दोनों राज्य ज्यादा सियासी महत्व नहीं रखते। कांग्रेस अध्यक्ष तो यहां तक कह चुकी हैं कि पंजाब और उत्तराखंड में उनकी पार्टी सत्ता बदलेगी। असल सवाल तो उत्तर पदेश का है। उत्तर पदेश में किसी तरह अपनी खोई जमीन को वापस पाने की कवायद में जुटे दोनों पमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा की चुनावी तैयारियां बाकी राज्यों में पिछड़ सी गई हैं। खासतौर से पंजाब और उत्तराखंड में जहां दोनों दलों का सीधा मुकाबला है पर यहां दोनों दल ही अभी तक अपने उम्मीदवारों का चयन तक नहीं कर सके। दरअसल, चुनावी कैलेंडर के लिहाज से पंजाब और उत्तराखंड में पहले चुनाव होने थे, लेकिन सभी ने भांप लिया था कि उत्तर पदेश में भी समय से पहले चुनाव हो सकते हैं। यही कारण है कि राज्य के दो पमुख दल बसपा और सपा हैं या फिर भाजपा और कांग्रेस सभी ने अपनी पूरी ताकत उत्तर पदेश में झोंक दी थी। रोड शो से लेकर रैलियां, आरोप-पतिआरोप, दावों और राज्य की बसपा व केन्द्र की कांग्रेस सरकार के बीच लोक-लुभावन घोषणाओं की जंग करीब तीन महीने पहले से ही छिड़ गई थी। उत्तर पदेश में 28 फरवरी तक चलने वाले चुनाव का असर केन्द्राrय बजट के कार्यकमों में भी पड़ सकता है। दरअसल गोवा चुनाव के कारण 3 मार्च तक लागू आचार संहिता के बीच ही बजट सत्र भी होगा और 29 फरवरी तक दोनों रेल व आम बजट पेश करने की बाध्यता भी होगी। लिहाजा केन्द्र को आचार संहिता की आंच से बचने के लिए सीमित रास्तों को तलाशना होगा जिसमें संबंधित राज्यों के लिए घोषणाएं टालने या विशेष परिस्थितियों में रेल और आम बजट पेश करने का समय या तिथि बदलने की उम्मीद को भी नकारा नहीं जा सकता। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने राज्य में चुनाव की तिथियों में परिवर्तन करने की मांग की है। उनका कहना है कि जनवरी में उत्तराखंड में कड़ाके की ठंड होती है और दूसरा 30 जनवरी को शहीद दिवस होता है। इस दिन चुनाव करवाना ठीक नहीं है। उत्तराखंड में 30 जनवरी को ही मतदान है जबकि वहां की विधानसभा का कार्यकाल 12 मार्च तक का है। उत्तर पदेश की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 20 मई 2012, पंजाब विधानसभा का 14 मार्च, उत्तराखंड का 12 मार्च, मणिपुर का 15 मार्च और गोवा विधानसभा का 14 जून तक है। सामान्य तौर पर उत्तराखंड के चुनाव फरवरी और मार्च के पहले हफ्ते सम्पन्न कराए जाते हैं लेकिन इस बार जनवरी में ही कराए जा रहे हैं। कांग्रेस की सारी जान यूपी में टिकी हुई है। पार्टी के दोनों शीर्ष नेता सोनिया व राहुल इसी सूबे से सांसद हैं। राहुल गांधी जमकर मेहनत कर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर पदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पार्टी ने रालोद से भी हाथ मिलाया है। मुस्लिम वोटों को घेरने के लिए पार्टी ने साढ़े चार फीसदी आरक्षण का कार्ड खेला है। पिछली बार कांग्रेस को 12 फीसदी मुसलमानों ने वोट दिया था इस बार उसे यह आंकड़ा बढ़ने की उम्मीद है। बुनकरों के लिए मोटा आर्थिक पैकेज, किसानों के लिए दो बड़ी सिंचाई योजनाओं की घोषणा केन्द्र सरकार कर चुकी है। उसका लाभ भी उसे मिलने की उम्मीद है। ऐसे में उसे अगड़ी जातियों, खासकर ब्राह्मणों को बसपा से तोड़ने में सफलता मिलने की उम्मीद पार्टी को है। पार्टी के दोनों पदेश अध्यक्ष तथा विधानमंडल दल के नेता ब्राह्मण हैं, रीता बहुगुणा जोशी और पमोद तिवारी जबकि ठाकुर नेता के रूप में पदेश पभारी हैं दिग्विजय सिंह। कांग्रेस को एक वर्ग की मुराद कि चुनाव जल्दी हो चुनाव आयोग ने पूरी कर दी है।
हर सत्तारूढ़ पार्टी को एंटी एनकंवैंसी फैक्टर के भूत से निपटना होता है। कुछ हद तक बहुजन समाज पार्टी को भी इसका नुकसान हो सकता है। बहनजी द्वारा काफी सिटिंग एमएलए के टिकट काटने से पार्टी में विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। बसपा का मूल आधार गरीब और कमजोर दलित वर्ग है। भ्रष्टाचार, पार्प, मूर्तियां बनाना भी पार्टी के खिलाफ चुनावी मुद्दे होंगे। सपा सुपीमो मुलायम सिंह यादव की पार्टी पहले से बेहतर हुई है। उनके युवा बेटे ने एक युवा नेता के तौर पर अपनी यात्राओं से पार्टी के लिए अच्छा माहौल बनाया है, उन्होंने अपनी धाक जमाई है। मुसलमान वोटों पर अब भी मुलायम सिंह की पकड़ बरकरार है। राजपूत भी उनके साथ हैं। बसपा का मुकाबला मुलायम ही कर सकते हैं ऐसी हवा बनाकर सपा को फायदा मिलने की उम्मीद है। मुलायम की मिलनसार छवि पतिद्वंद्वियों पर भारी पड़ सकती है पर उनका इतिहास उनके खिलाफ जरूर रहेगा। पार्टी थाने चलाती है, यह छवि टूट नहीं पाई है। मुसलमान वोटों का बंटवारा तय है। कांग्रेस, बसपा में यह वोट बटेगा, मुलायम यह नहीं मान कर चल सकते कि मुस्लिम वोट एक ब्लाक उन्हें पड़ेगा। रही बात भाजपा की पार्टी को उम्मीद है कि मुस्लिमों को आरक्षण का मुद्दा उसके हक में जाएगा। सवर्ण वोट का धुवीकरण होगा। अन्ना हजारे के आंदोलन का सबसे ज्यादा फायदा उसें ही मिलने का चांस है। राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र और आडवाणी की यात्राओं से सरकार विरोधी माहौल जो बना है, भाजपा को उम्मीद है कि चुनाव में पार्टी को इसका फायदा मिलेगा पर राज्य में स्थानीय नेताओं के आपसी संघर्ष पार्टी को भारी पड़ सकता है। कुल मिलाकर अब जब मतदान की तिथि की घोषणा हो चुकी है तो सभी राज्यों में सियासत तेज होगी। कांग्रेस के लिए जहां उत्तर पदेश सबसे बड़ी चुनौती होगी वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए पंजाब व उत्तराखंड में अपनी सरकारों को पुन जिताना जरूरी होगा। वैसे उत्तराखंड में आज तक कोई सत्तारूढ़ पार्टी फिर से अगली बार नहीं जीती। क्या पता इस बार यह इतिहास भुवनचन्द्र खंडूरी बदल दें।
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