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Friday, 28 October 2011

सर्वशिक्षा अभियान की सच्चाई


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th October 2011
अनिल नरेन्द्र
मेरा भारत महान। सारी दुनिया में इस समय भारत का डंका बज रहा है। कहा जाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था मौजूदा समय में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है पर जमीनी हकीकत जब हम देखते हैं तो थोड़ा दुःख जरूर होता है कि आज भी एजुकेशन जैसा महत्वपूर्ण क्षेत्र इतना पिछड़ा है? शिक्षा का अधिकार कानून और सर्वशिक्षा अभियान के बावजूद पिछले वर्ष करीब 82 लाख बच्चों का स्कूलों में दाखिला नहीं हो पाया है। इतनी ही नहीं, स्कूलों की दुर्गति का आलम यह है कि लड़कियों के 41 फीसदी स्कूलों में शौचालय तक नहीं है। राज्यों में प्राइमरी शिक्षा पर समीक्षा करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की अध्यक्षता में राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की हुई बैठक में बच्चों के स्कूलों पर गहन समीक्षा हुई। छह से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य रूप से स्कूलों में भेजने के लिए शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया था। इसके लागू होने के एक वर्ष से ज्यादा का समय बीत जाने के बावजूद प्राइमरी शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं है। स्कूलों और शिक्षकों का अभाव तो अलग विषय है। हालत यह है कि अब सर्वशिक्षा अभियान की भी हवा निकल गई है और केंद्र सरकार को उसी से मिलता-जुलता नया अभियान चलाने का फैसला लेना पड़ा मगर इसमें फर्प यह होगा कि इसे गैर सरकारी तंत्र से चलाया जाएगा। अब प्राइमरी स्कूलों में इस तंत्र का सीधा दखल रहेगा। इस तंत्र के स्वयंसेवकों का काम होगा कि वह स्कूल और समाज के बीच सेतु का काम करें। यदि किसी गांव में कोई बच्चा स्कूल नहीं जा रहा है तो उसकी जानकारी इलाके के स्कूल को देनी होगी और बच्चे के घर वालों को जागरूक करना होगा कि वे अपने बच्चे को स्कूल भेजें। सिब्बल ने बताया कि इस अभियान का नाम `शिक्षा का हक' रखा गया है। जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री 11 नवम्बर को करेंगे। इस अभियान के तहत 13 लाख स्कूलों को शामिल किया जाएगा जिनके प्रधानाचार्यों को प्रधानमंत्री की अपील जारी की जाएगी, जिसका संदेश होगा कि वे किसी भी बच्चे को स्कूल जाने से वंचित न होने दें। कपिल सिब्बल ने राज्यों के शिक्षा मंत्रियों से कहा कि वे प्राइमरी स्कूलों की दशा ठीक करें। उन्होंने कई राज्यों में अब भी शिक्षा का अधिकार कानून लागू न करने पर खेद व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि एक वर्ष से कई बार राज्यों से अनुरोध किया जा चुका है मगर केवल 18 राज्यों ने ही इस कानून को लागू किया है। महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और तमिलनाडु जैसे कई बड़े राज्य ऐसे हैं जिन्होंने इस कानून को अब तक लागू नहीं किया है। इसके चलते लाखों बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। स्कूलों के भवनों की दुर्गति और शिक्षकों की कमी पर भी ध्यान देना अतिआवश्यक है। इस समय करीब 44 लाख शिक्षक पूरे देश में काम कर रहे हैं। हमें इस बात की खुशी है कि श्री कपिल सिब्बल ने इस कटु सत्य को उजागर करने की हिम्मत दिखाई। हम उम्मीद करते हैं कि वह दिन पूरे देश में जल्द आएगा जब हर गांव में कोई भी बच्चा स्कूल जाने से वंचित नहीं होगा।
Anil Narendra, Daily Pratap, Education, India, Kapil Sibal, Prime Minister, Vir Arjun

Sunday, 7 August 2011

अन्ना कुछ हद तक अपने मकसद में सफल रहे

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th August 2011
अनिल नरेन्द्र
जन लोकपाल बिल पर सरकार और टीम अन्ना में जंग का ऐलान हो गया है। यह तो होना ही था क्योंकि दोनों पक्षों में कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर मतभेद थे। इधर गुरुवार को सरकार ने लोकसभा में लोकपाल बिल पेश किया तो उधर अन्ना ने बीमार होने के बावजूद महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धी में बिल की प्रतियां जलाकर इसके विरोध का बिगुल बजा दिया। अब टीम अन्ना ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की चेतावनी दी है। बिल जलाने के बाद अन्ना ने एक बार फिर सरकार पर हमला बोल दिया और कहा कि सभी कर्मचारियों और अधिकारियों को लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, `हर राज्य में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हुई तो भ्रष्टाचार पर काबू कैसे पाया जा सकता है?' उन्होंने सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा करते हुए चेतावनी दी कि सरकार के लोकपाल बिल की होली देश के गांव-गांव में जलेगी। 16 अगस्त से अनशन शुरू करने पर अन्ना ने कहा कि यदि देश से भ्रष्टाचार को मिटाना है तो आंदोलन का यह एक अच्छा मौका है और इसे हाथ से निकलने नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा, `युवाओं सहित सभी देशवासियों से इसे आजादी की दूसरी लड़ाई समझकर 16 अगस्त से शुरू हो रहे अनशन में शामिल होने की अपील करता हूं।'
प्रमुख विपक्षी दल ने सरकार द्वारा पेश किए गए लोकपाल बिल की तीखी आलोचना की है। भाजपा नेता व लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कह दिया कि आखिर प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर क्यों रखा जा रहा है? जबकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह खुद कह चुके हैं कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से इस कानून के दायरे में लाए जाने से कोई परहेज नहीं है। कटाक्ष करते हुए सुषमा ने सरकार से पूछा कि आखिर फिर प्रधानमंत्री को वे लोग `पवित्र गाय' मानकर क्यों दायरे से बाहर रखने पर आमादा हैं? भाजपा नेताओं ने कहा है कि वे लोग अपना विरोध संसद की स्थायी समिति के सामने दर्ज करवाकर दबाव डालेंगे कि प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल के दायरे में लाया जाए। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने पलटवार करते हुए भाजपा से पूछा कि जब भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, उस दौर में भाजपा ने यह कानून क्यों नहीं पास करा दिया जबकि एनडीए सरकार के दौर में 2002 में लोकपाल विधेयक बाकायदा लोकसभा में रखा गया था। उस समय इस विधेयक में प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने का प्रावधान किया गया था।
उल्लेखनीय है कि लोकपाल विधेयक पिछले 42 सालों से लटका हुआ है। संसद में इसे पहले भी नौ बार रखा जा चुका है। लेकिन समयसीमा खत्म होने के कारण यह `बेमौत' मारा जाता रहा है। अन्ना के आंदोलन से इतनी उम्मीद तो जरूर बंधी है कि इस बार देर-सबेर विधेयक संसद में पास तो होगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि लोकसभा में पेश किया गया लोकपाल बिल अन्ना और जन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है, लेकिन फिर भी यह एक शुरुआत तो है। वक्त का तकाजा है कि इसे आगे बढ़ाया जाए। अपेक्षाकृत कमजोर ही सही, लोकपाल व्यवस्था का आकार लेना आवश्यक है। निसंदेह सरकार चाहती है कि कहीं अधिक सक्षम और आम लोगों को संतुष्ट करने वाला लोकपाल विधेयक ला सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे नाराज होना स्वाभाविक है। लेकिन तथ्य यह भी हैं कि लोकतंत्र में कई बार कुछ संस्थाओं का निर्माण धीरे-धीरे ही होता है। केंद्रीय सत्ता अन्ना हजारे और उनके साथियों को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करने की इजाजत देने के लिए आना-कानी कर रही है और इसे संसद का अपमान बता रही है। क्या आम जनता के विरोध के संवैधानिक अधिकार का हनन करना संविधान का अपमान करना नहीं है? सरकार अपने विधेयक की बेशक जितनी बढ़ाई करे लेकिन उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अन्ना की मांगों का आम जनता का समर्थन हासिल है। अन्ना फेल नहीं हुए, बेशक वह अपने मकसद में पूरी तरह सफल नहीं हुए पर सरकार को इतना मजबूर करना उनकी एक उपलब्धि है।
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Thursday, 14 July 2011

सरकार सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने में असफल, बाबा रामदेव की जीत


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th July 2011
अनिल नरेन्द्र
अगर केंद्रीय गृह मंत्रालय, श्री कपिल सिब्बल और दिल्ली पुलिस ने यह समझा था कि रामलीला मैदान में आधी रात को सोते लोगों पर की गई लाठीचार्ज इत्यादि को सुप्रीम कोर्ट के जजों से छिपा लेंगे तो वह बहुत बड़ी गलतफहमी में थे। बाबा रामदेव और उनके समर्थकों से उस रात पुलिस ने क्या बर्ताव किया, इसके बारे में माननीय जजों को पहले से ही मालूम था। माननीय न्यायाधीश डॉ. बलबीर सिंह चौहान व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार पहले से ही तैयार आए थे, उन्होंने अपना होमवर्प अच्छे से कर रखा था। उनके तीखे सवाल इस बात की गवाही देते हैं। भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर सत्याग्रह करने पर रामलीला मैदान से बलपूर्वक बेदखल किए गए बाबा रामदेव ने रात के अंधेरे में हुई कार्रवाई का ठीकरा सुप्रीम कोर्ट में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के सिर पर फोड़ने का जहां प्रयास किया वहीं इस कार्रवाई में दिल्ली पुलिस के जवाब पर असंतोष व्यक्त करते हुए माननीय न्यायाधीशों ने नया हलफनामा दाखिल करने को कहा। दोनों जजों ने सोमवार को दिल्ली पुलिस से कुछ सहज सवाल पूछे। न्यायाधीश एक से तीन जून के बीच के घटनाक्रम के साथ ही उन परिस्थितियों के बारे में जानना चाहते हैं जिनकी वजह से पुलिस ने रात के अंधेरे में बाबा और उनके समर्थकों को बलपूर्वक निकाल बाहर करना पड़ा। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान में सत्याग्रह कर रहे बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर चार जून की रात में पुलिस की बर्बर कार्रवाई का स्वत ही संज्ञान लेते हुए इस मामले में छह जून को मनमोहन सिंह सरकार और दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार के आला अफसरों से जवाब-तलब किया था। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता से भी व्यक्तिगत रूप से जवाब-तलब किया है। इससे पहले बाबा रामदेव की ओर से उनके वकील राम जेठमलानी ने गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को निशाना बनाते हुए कहा कि वे रामलीला मैदान में निहत्थे सत्याग्रहियों के खिलाफ हुए बल प्रयोग की जड़ हैं। उन्होंने दावा किया कि चूंकि बाबा रामदेव को दिल्ली से बेदखल करने का कोई आदेश ही नहीं था। इसलिए न्यायालय को गृहमंत्री से व्यक्तिगत रूप से जवाब-तलब करके पता लगाना चाहिए कि इस बारे में कब और किन परिस्थितियों में निर्णय लिया गया था। जेठमलानी ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण तरीके से सत्याग्रह कर रहे व्यक्तियों ने इन ज्यादतियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने का प्रयास किया लेकिन पुलिस ने ऐसा करने से इंकार कर दिया।
दोनों जज न्यायाधीश बीएस चौहान और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार पूरी तैयारी से आए थे, उन्होंने केस के सारे पहलुओं पर गहन अध्ययन किया हुआ था। माननीय जजों ने दिल्ली पुलिस से सवाल किया कि अधिकारियों द्वारा की गई ज्यादतियों के खिलाफ योगगुरु के समर्थकों की शिकायत पर पुलिस ने प्राथमिकी क्यों दर्ज नहीं की थी? शीर्ष न्यायालय ने कहा कि पिछले वाले हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि एक जून से तीन जून के बीच क्या हुआ? उसने कहा कि डीवीडी, चित्रों और दस्तावेजों से स्पष्ट तौर पर पता चलता है कि उस स्थल पर योगाभ्यास करवाया जा रहा था। न्यायालय ने अधिकारियों से इस बात की सफाई देने के लिए कहा कि किन परिस्थितियों के तहत उन्हें रामदेव का यह कार्यक्रम रोकना पड़ा था, पीठ ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि पुलिस ने तम्बुओं से घेरे गए उस स्थल से लोगों को बाहर निकालने के लिए आंसू गैस के गोलों और पानी की धार का इस्तेमाल किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह उम्मीद नहीं की जाती कि किसी घिरे गए हिस्से में आंसू गैस और पानी की धार का प्रयोग किया जाएöक्या ऐसा नहीं था कि रात साढ़े 11 बजे जब लोग सो रहे थे, आपने लाठियां बरसाईं? चित्रों से पता चलता है कि पुलिस आयुक्त किसी से बातचीत कर रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चार जून की पुलिसियाई कार्रवाई को तार-तार कर सरकार को बेनकाब कर दिया। पुलिस का झूठा हलफनामा अदालत को गुमराह नहीं कर सका। पुलिस अपने इस दावे को साबित नहीं कर सकी कि उसने आंसू गैस इसलिए छोड़ी क्योंकि बाबा रामदेव के समर्थक हिंसा पर उतर आए थे और उन्होंने पुलिस पर पथराव किया। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 जुलाई की तारीख निर्धारित की है। बाबा रामदेव को चाहिए कि वह दिल्ली पुलिस को राज बाला की यह हालत करने पर सुप्रीम कोर्ट में आवाज उठाएं। राज बाला जीवन-मरण के बीच लटकी हुई है। बाबा को चाहिए कि वह अगली सुनवाई में महिलाओं समर्थकों से बलात्कार के प्रयास का भी जिक्र करें, जैसा उन्होंने आरोप लगाया है। हम माननीय जजों का धन्यवाद करना चाहते हैं कि वह किसी भी प्रकार के दबाव में नहीं आए और उन्होंने उस काली रात केस में दूध का दूध, पानी का पानी कर दिया है।
Tags: Anil Narendra, Baba Ram Dev, Corruption, Daily Pratap, delhi Police, Kapil Sibal, P. Chidambaram, Ram Lila Maidan, Supreme Court, Vir Arjun

Friday, 17 June 2011

अन्ना के लोकपाल बिल को जोकपाल बिल बनाने का प्रयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th June 2011
अनिल नरेन्द्र
लगता है कि अन्ना हजारे के लोकपाल बिल पर सदी के सबसे बड़े चन्द्र ग्रहण का असर हो गया है, लोकपाल बिल, जोकपाल बिल बनकर रह गया है। देश को बहुत उम्मीद थी कि सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच शायद कोई सहमति बन जाए पर ऐसा नहीं हो सका। अन्ना और उनके साथियों का कहना है कि सरकार हमारी तो दलीलें सुनने को तैयार ही नहीं थी और केवल अपनी बात करती रही। सरकार यह चाहती है कि लोकपाल के नाम पर 11 सदस्यों की एक बॉडी हो, जो ऊंचे लेवल पर कुछ मामलों में भ्रष्टाचार की जांच करे। उसके पास अपनी कोई जांच एजेंसी नहीं होगी जबकि सिविल सोसाइटी चाहती है कि इस बॉडी को सभी लेवल पर भ्रष्टाचार की जांच और सजा तय करने का हक मिले। उसके पास जांच की अपनी मशीनरी हो ताकि वह सरकार से आजाद रहे। प्रधानमंत्री और जजों को जांच के दायरे में लाने पर भी सहमति नहीं बन पाई। दोनों ही पक्षों ने इस बात की पुष्टि की कि 15 जून की इस बैठक में प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और संसद के अन्दर सांसदों के आचरण को प्रस्तावित लोकपाल की जांच के दायरे में लाने के मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं हुई। वार्ता के बाद कपिल सिब्बल ने संवाददाताओं से कहा, हमने फैसला किया है कि 20 और 21 जून को होने वाली अगली बैठक में दोनों पक्ष अपना-अपना प्रस्ताव विचार के लिए रखेंगे। फिर भी दोनों प्रस्तावों पर सहमति नहीं बनी, तो मंत्रिमंडल के समक्ष वोटों का एक संयुक्त प्रस्ताव भेजा जाएगा। इसमें सहमति और असहमति के बिन्दु स्पष्ट रूप से रेखांकित होंगे। उन्होंने कहा कि दोनों प्रस्ताव सार्वजनिक किए जाएंगे। इस प्रक्रिया में सरकार राजनीतिक दलों को भी शामिल करना चाहती है। समिति के सदस्य अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि असहमति के बावजूद हम 20 और 21 जून को बैठक में शामिल होंगे और अपना पक्ष पेश करेंगे ताकि जनता देख सके कि कौन-सा मसौदा उचित है। इस महत्वपूर्ण बैठक से निराश अन्ना हजारे ने बृहस्पतिवार को कहा कि लोकपाल मसौदा विधेयक के दो संस्करण कैबिनेट को भेजने के सरकार के निर्णय पर आश्चर्य है। उन्होंने साफ कहा कि सरकार का सख्त लोकपाल कानून बनाने की कोई मंशा नहीं है और अगर कमजोर कानून बना तो वह 16 अगस्त से फिर अनशन करेंगे। उन्होंने कहा कि जब अप्रैल में मैंने अनशन किया था तो सरकार ने हमारे सभी सुझाव मानने का वादा किया था। अब सरकार अपने वादों से मुकर रही है। बाबा रामदेव के आंदोलन को जिस तरह तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश की गई, अगर वैसा ही हमारे साथ हुआ तो हम इसके लिए तैयार हैं। हम गिरफ्तारी देंगे। लाठी खाने और गोलियां खाने को तैयार हैं। हजारे के साथी अरविन्द केजरीवाल ने कहा, `सरकार एक सख्त कानून बनाने और उसका श्रेय लेने का मौका खो रही है। अब सरकार लोकपाल नहीं बल्कि जोकपाल विधेयक लाना चाहती है। क्या समाज के सदस्य सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं।' इस पर अन्ना हजारे ने कहा कि अगर राष्ट्रहित और समाज हित में कोई बात उठाना `ब्लैकमेल' करना है तो हमें यह आरोप भी स्वीकार है।

यह जितना आपत्तिजनक है उतना ही निराशाजनक कि कांग्रेस पार्टी और केंद्र सरकार बाबा रामदेव के बाद अब अन्ना हजारे के आंदोलन को टांय-टांय फिस्स करने में लगी हुई है। पहले तो कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने फिर स्वयं वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने जिस तरह अन्ना हजारे के रवैये के बहाने उनकी मांगों को खारिज किया उससे इस आशंका की पुष्टि होती है कि सरकार ने भ्रष्टाचार के मुद्दे से देश का ध्यान हटाने के लिए हर हथकंडा अपनाया है। यह हास्यास्पद है कि कांग्रेस अन्ना हजारे को बदनाम करने के लिए कभी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखौटा बताने की हिमाकत करती है तो कभी यह कहती है कि मुट्ठीभर सिविल सोसाइटी के लोग क्या जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से ऊपर हैं? हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि अगर अन्ना हजारे यह चाह रहे हैं कि एक मजबूत लोकपाल बनाया जाए तो आखिर इसमें अनुचित-असंवैधानिक क्या है? यदि कांग्रेस की नजर में विपक्ष और विशेष रूप से भाजपा भ्रष्टाचार के मामले में ईमानदार नहीं तो फिर अन्ना, उनके साथियों और समर्थकों को क्या फेल किया जाने का प्रयास हो रहा है? यदि अन्ना के समर्थन में सिर्प मुट्ठीभर लोग हैं तो फिर यह हड़बड़ाहट क्यों? यदि केंद्रीय सत्ता भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है तो फिर यह प्रतिबद्धता नजर क्यों नहीं आती?

हम सरकार और कांग्रेस पार्टी से सीधा सवाल करना चाहते हैं कि क्या एक बार निर्वाचित होने से ही किसी सरकार और चुने हुए सांसदों, प्रतिनिधियों को अगले पांच साल के लिए भ्रष्टाचार, हत्या, गबन या बलात्कार की इजाजत मिल जाती है? सरकार की सोच तो साफ है, हम पांच साल के लिए चुने गए हैं, हमें राज करने के लिए बस संसद के अन्दर अपनी अर्थमैटिक्स ठीक रखनी है, अंकगणित मैनेज करना है, जनता चीखती है तो चीखती रहे। आखिर कितने दिन चिल्लाएगी, आंदोलन, अनशन करेंगे? असल में यह सरकार जब प्रेशर बनता है तो बौखला जाती है। इसका एक उदाहरण 4 जून को रामलीला मैदान में मिला। हमने देखा कि घबराहट में पहले तो सरकार सारी बातें मान जाती है और बाद में सबसे धीरे-धीरे मुकर जाती है और आंदोलन करने वाले नेताओं को डराने-धमकाने का काम करने लगती है। हमें आश्चर्य नहीं हुआ जब यह खबर आई कि लोकपाल बिल बनाने की मुहिम की अगुवाई कर रहे अन्ना हजारे के ट्रस्ट के खातों पर आयकर विभाग की नजर टेढ़ी हो गई है। लोकपाल पर मसौदा समिति की बैठक से ऐन पहले इनकम टैक्स विभाग के अफसरों ने अन्ना के दफ्तर पर दस्तक दी। सूत्रों के मुताबिक विभाग के अधिकारियों ने ट्रस्ट के दफ्तर जाकर जांच की और करीब पांच घंटे पूछताछ की। सरकार हर हालत में बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के प्रयासों को असफल करेगी। इसके लिए जरूरत के अनुसार वह साम, दाम, दण्ड, भेद सभी हथकंडों व हथियारों का इस्तेमाल करेगी पर अन्ना और बाबा, दोनों ही डरने वाले नहीं और वह जनता की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि भारत की जनता अब जागृत हो चुकी है और यह जो आंधी शुरू हुई है यह रुकने वाली नहीं। सरकार चाहे जितनी कोशिश करे, लोकपाल बिल को जोकपाल विधेयक बनाने की कोशिश करे, हिसाब तो उसे जनता को देना ही होगा।
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Friday, 10 June 2011

प्रधानमंत्री का मंत्रियों पर नकेल कसने की कसरत का स्वागत है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th June 2011
अनिल नरेन्द्र
काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ते चौतरफा दबावों से घिरी मनमोहन सिंह सरकार चिंतित लग रही है। खासकर पीएम डॉ. मनमोहन सिंह। वह अपनी सरकार की गिरती छवि को थामने के लिए अब कदम उठाने की बात कर रहे हैं। इनमें से एक है एक बार फिर अपने मंत्रियों को अपनी सम्पत्ति का खुलासा करने का निर्देश देना। प्रधानमंत्री का यह कदम उच्च स्तर पर शासन में पारदर्शिता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रियों के लिए आचार संहिता जारी की है। इसके तहत हर मंत्री को अपनी और अपने परिजनों की सम्पत्ति के ब्यौरे की घोषणा करनी होगी। इतना ही नहीं, मंत्रियों को अपने हितों की भी जानकारी देनी होगी। मसलन, यदि किसी मंत्री का परिजन विदेशी कम्पनी में कार्यरत है तो इसका पूरा ब्यौरा उन्हें देना होगा तथा सरकार से इसकी पूर्व अनुमति लेनी होगी। राज्यों को भी आचार संहिता लागू करनी होगी। उन्हें 31 अगस्त तक मंत्रियों को अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा देने को कहा गया है।
प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रियों को चिट्ठी लिखकर अपनी सम्पत्ति और सालाना कमाई ही नहीं बल्कि अपने पति या पत्नी के साथ उन पर आश्रित परिजनों के नाम की सम्पत्ति को भी सार्वजनिक करने के लिए कहा गया है। इतना ही नहीं, मंत्रियों को इस बार विशेष रूप से कारपोरेट जगत से अपने कारोबारी रिश्तों और संबंधों का भी खुलासा करने के निर्देश दिए गए है। प्रधानमंत्री की इस चिट्ठी में मंत्रियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि यदि उनके परिवार का कोई सदस्य अपनी कोई फर्म शुरू करता है या फिर किसी कारोबारी फर्म के बोर्ड का सदस्य बनता है तो इस जानकारी का भी उन्हें खुलासा करना होगा। आचार संहिता के तहत सभी मंत्रियों को सम्पत्ति, देनदारियों, व्यापारिक हितों और अन्य किसी आश्रितों के किसी विदेशी सरकार या संगठन के तहत रोजगार संबंधी जानकारी भी देनी होगी। विवरण में समस्त अचल सम्पत्ति, नकदी, आभूषण, शेयर और डिबेंचर का ब्यौरा शामिल है।
कारण कुछ भी रहा हो, चाहे वह बाबा रामदेव के आंदोलन का दबाव रहा हो या फिर अन्ना हजारे का प्रेशर्स, प्रधानमंत्री के इस कदम का हम स्वागत करते हैं। मनमोहन सरकार में कई करोड़पति मंत्री पहले से ही मौजूद हैं। नेशनल इलेक्शन वॉच की एक रिपोर्ट जो मंत्रियों द्वारा 2009 में दाखिल चुनाव हलफनामे पर आधारित है, का कहना है कि श्री प्रफुल्ल पटेल पहले से ही 89.9 करोड़ सम्पत्ति के मालिक हैं। कपिल सिब्बल 31.97 करोड़, विसेंट पाला 25.16 करोड़, वीरभद्र सिंह 22.52 करोड़। यूपीए सरकार में कुल 47 मंत्री करोड़पति हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के खलनायक पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के मामले में पर्दे के पीछे कुछ औद्योगिक घरानों से उनकी साठगांठ, इंडियन प्रीमियर लीग की टीमें खरीदने के लिए शरद पवार की सांसद बेटी सुप्रिया सुले और पूर्व विदेश मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनन्दा पुष्कर की वजह से सरकार की हुई फजीहत शायद प्रधानमंत्री के नए निर्देश का कारण हो सकती है। जहां हम पीएम के इस कदम का स्वागत करते हैं वहीं यह भी कहना चाहते हैं कि नौकरशाहों पर भी नकेल कसनी चाहिए। मंत्रियों से कहीं ज्यादा इन नौकरशाहों ने लूट-खसोट मचा रखी है।
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