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Saturday, 9 June 2012

आतंकी साए और प्राकृतिक आपदाओं के बीच अमरनाथ यात्रा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9 June 2012
अनिल नरेन्द्र
हर साल की तरह एक बार फिर अमरनाथ यात्रा आतंकियों के निशाने पर है। हमारे सुरक्षा बलों ने कुछ संदेश सरहद के उस पार से सुने हैं जिनमें कहा गया है कि आतंकी यात्रा को निशाना बनाने की तैयारी में हैं। चिन्ता की बड़ी वजह यह भी है कि ओसामा बिन लादेन और अब लिबी की हत्या के बाद कश्मीर में आतंकी गतिविधियां तेज होने की चेतावनी मिली है पर बाबा अमरनाथ के भक्तों पर इन धमकियों का कोई असर नहीं पड़ा है। यही कारण है कि एक माह में पंजीकरण कराने वालों ने सवा तीन लाख का आंकड़ा पार कर लिया है। सुरक्षा एजेंसियां इस बात की पुष्टि कर रही हैं कि जिन 30 से 40 आतंकियों के इस ओर घुस पाने की पुष्टि हुई है उनका मुख्य निशाना यात्रा है पर बावजूद इसके यात्रा में शामिल होने वाले भक्तों में कोई कमी नहीं आई। हालांकि आतंकी धमकियों को बिल्कुल नजरंदाज भी नहीं किया जा सकता है। वर्ष 1993 की अमरनाथ यात्रा उन लोगों को अभी भी याद है जिन्होंने पहली बार इस यात्रा पर लगे प्रतिबंध के बाद `हरकतुल अंसार' के हमलों को सहन किया था। तब तीन श्रद्धालुओं की जानें गई थीं। पहले हमले के 10 सालों बाद हुए भीषण हमले में 11 भक्तों की मौत हुई थी। इन 10 साल में कोई भी साल ऐसा नहीं बीता था जब आतंकी हमलों और मौतों से अमरनाथ यात्रा चर्चा में न आई हो लेकिन बावजूद इसके यात्रा आज भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। सुरक्षा बल यात्रा को हर हाल में महफूज बनाने में जुट गए हैं। राज्य सरकार और प्रशासन के लिए यह किसी चुनौती से कम इसलिए नहीं है कि वर्ष 1993 के बाद के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि शायद ही कोई साल ऐसा रहा हो जब आतंकी हमले में श्रद्धालुओं की मौतें न हुई हों और जो वर्ष बचा वह प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ गया। अर्थात् अगर आतंकवादियों के हाथों से बच गए तो कुदरत के हाथों से नहीं बच सके। सुरक्षा बलों के लिए चुनौती पहले से कहीं ज्यादा हो गई है। पहले यात्रियों की संख्या बमुश्किल 54 हजार के आंकड़े को ही पार कर पाती थी। मगर 1993 के प्रथम आतंकी प्रतिबंध ने लोगों को इसकी ओर आकर्षित होने पर मजबूर कर दिया। नतीजा वर्ष 1993 से वर्ष 2002 की यात्रा का औसत भाग लेने वालों का आंकड़ा दो लाख का रहा है। जैसे-जैसे अमरनाथ यात्रा पर प्रतिबंध और हमले बढ़ते रहे यात्रा में शामिल होने वाले भक्तों की संख्या में भी इजाफा होता गया। असल में कई धार्मिक संगठनों ने भी इसे एक चुनौती के रूप में लेते हुए हजारों लोगों को शामिल होने की अपीलें कीं। यही कारण था कि वर्ष 1996 में जब बजरंग दल के 50 हजार के करीब सदस्य अमरनाथ यात्रा में हिस्सा लेने पहुंचे तो सारी व्यवस्थाएं चरमरा गईं और प्राकृतिक आपदा ने भी यात्रा को घेर लिया। तीन सौ के करीब श्रद्धालु प्राकृतिक आपदा के शिकार हुए। बाबा अमरनाथ यात्रा का एक रोचक तथ्य यह रहा है कि यह यात्रा आतंकी हमलों के कारण ही आकर्षण का केंद्र बनी थी अगर आतंकी हमलों में मरने वालों की संख्या इतनी नहीं थी जितनी प्राकृतिक आपदा में मारे गए। हम उम्मीद करते हैं कि सारे विवादों के बावजूद इस साल की यात्रा सुखद रहेगी और सुरक्षित भी। जय बाबा अमरनाथ। हर-हर महादेव।
Amarnath Yatra, Anil Narendra, Daily Pratap, Jammu Kashmir, Terrorist, Vir Arjun

Thursday, 29 December 2011

माता वैष्णो देवी की बढ़ती महिमा ः एक करोड़ करेंगे दर्शन

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th December 2011
अनिल नरेन्द्र
माता वैष्णो देवी की मान्यता बढ़ती जा रही है। हालांकि यह यात्रा आसान नहीं पर इससे माता के भक्तों पर कोई असर नहीं पड़ता। उत्तर भारत का यह निश्चित रूप से सबसे बड़ा तीर्थस्थल बन गया है। 2011 में यहां श्रद्धालुओं की संख्या एक करोड़ पार कर जाएगी। हालांकि वैष्णो देवी स्थापना बोर्ड को पिछले साल ही यह संख्या पार करने की उम्मीद थी पर उसे 87 लाख की संख्या वाले नए रिकॉर्ड से ही संतोष करना पड़ा। लेकिन इस साल यह संख्या एक करोड़ पार कर लेगी। यह तब है कि जब इस समय कश्मीर के साथ-साथ कटरा और वैष्णो देवी में भी कड़ाके की सर्दी पड़ रही है। साल के अंतिम सप्ताह में तो इतनी भीड़ होती है कि श्रद्धालुओं के लिए रहने की जगह कम पड़ जाती है। बेशक बोर्ड ने सारे रास्ते पर भारी व्यवस्था कर रखी है पर पहाड़ी इलाका होने के कारण पशासनिक मुश्किलें तो आती ही हैं। भारी सर्दी, बारिश के कारण फिसलन भी माता के भक्तों के कदम नहीं रोक पा रही है। यह इसी से साबित होता है कि अभी भी पतिदिन 15 से 16 हजार श्रद्धालु दर्शनार्थ आ रहे हैं। वैसे श्राइन बोर्ड के अधिकारियों को सर्दी की छुट्टियों में इस भीड़ में इजाफा होने की उम्मीद है और इसी उम्मीद के साथ ही यह भी आस बंध गई है कि यात्रा का आंकड़ा नया रिकार्ड बनाएगा। वैसे तो यह रिकॉर्ड पिछले साल ही बढ़ जाता पर पिछले साल घाटी में असंतोष पत्थर बाजी इत्यादि से श्रद्धालु रुक गए। बहुत से लोग डर गए और यह नहीं समझ पाए कि कश्मीर घटी के हालातों का कटरा, वैष्णो देवी पर असर नहीं पड़ता। फिर कई बार यह चेतावनी दी गई कि वैष्णो देवी आतंकवादियों के निशाने पर है, ने भी श्रद्धालुओं के बढ़ते कदमों को रोका। लोगों ने अपनी तय की हुई यात्राएं कैंसिल कर दी। पर इस साल एक करोड़ संख्या पार करने से श्राइन बोर्ड में भारी उत्साह है, होना भी चाहिए। यात्रियों की सुविधा में हमेशा सुधार का तत्पर श्राइन बोर्ड नई-नई स्कीमें ला रहा है। इनमें एक है कटरा के बेस कैम्प से लेकर वैष्णो देवी भवन और भवन से लेकर भैरो घाटी तक रोप वे की स्कीम। यह स्कीम जोरों से चल रही है। इससे उन यात्रियों को जरूर सुविधा हो जाएगी जो उम्र या बीमारी की वजह से पहाड़ पर नहीं चढ़ सकते। इसके साथ ही कटरा से लेकर भवन तक के 13 किलोमीटर के रास्ते पर सुविधाओं को बढ़ाया जा रहा है। दरअसल बढ़ती भीड़ के कारण हर बार श्राइन बोर्ड की व्यवस्थाएं कम पड़ जाती हैं। खासकर गर्मियों की छुट्टियों और नवरात्रों में भीड़ के कारण उसे हर बार शर्मिंदा होना पड़ता है। पर यह भी सच्चाई है कि श्राइन बोर्ड की तमाम कोशिशों के बावजूद भक्तों की शिकायतें अब भी बरकरार हैं। सबसे ज्यादा शिकायतें भक्तों की पवित्र गुफा के भीतर माता की पिंडियों के दर्शनार्थ मिलने वाले के समय के पति है। भारी भीड़ के कारण पंडित उन्हें इतना भी समय माता के दरबार के सामने नहीं देते कि वह अपनी दिल की मुराद कह सकें। इसलिए कुछ भक्त तो गुफा में घुसते ही अपनी मुराद मांगना शुरू कर देते हैं। पर पंडों को भी दोष नहीं दिया जा सकता जब भक्तों की भीड़ इतनी ज्यादा हो जाएगी तो उन्हें जल्दबाजी करनी ही पड़ती है। कुछ वर्ष पहले सुपीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में माता वैष्णो देवी स्थापना बोर्ड के सरकारी संस्थान होने का दावा करने वाली एक विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद अब वैष्णो देवी स्थापना बोर्ड एक गैर सरकारी संस्था मानी गई और उसके खिलाफ कोई रिट याचिका नहीं की जा सकती। जय माता दी।
Anil Narendra, Daily Pratap, Jammu Kashmir, Mata Vaishno Devi, Vir Arjun

Tuesday, 25 October 2011

कश्मीर से एएफएसपीए हटाने की मांग


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th October 2011
अनिल नरेन्द्र
जम्मू-कश्मीर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटाने को लगता है कि एक बार फिर उच्चस्तर पर चर्चा और इसे हटाने की गलती करने का प्रयास शुरू हो चुका है। कश्मीर नीति हमेशा से इस सरकार की ढुलमुल रही है। कश्मीर के मुद्दे पर नियुक्त तीन वार्ताकारों की सिफारिशों को आधार बनाकर केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम भी काफी हद तक यह दांव खेलने का मन बना चुके हैं। पिछले साल राज्य के कुछ हिस्सों से सैनिकों को हटाने और उसके बाद से राज्य में हालात सामान्य रहने का एक प्रयोग भी सफल माना जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, उनके पिता एवं केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला और अलगाववादी नेता इस मुद्दे पर एक हैं। यह सभी चाहते हैं कि राज्य से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटाया जाए जबकि सेना की राय इसके खिलाफ है। एक तरह से इस मुद्दे पर जम्मू-कश्मीर सरकार, गृह मंत्रालय एक तरफ है, रक्षा मंत्रालय और सेना दूसरी तरफ। क्या कोई सुरक्षा कर्मी दोनों हाथों को पीठ पीछे रखकर खूंखार, बंदूकधारी आतंकियों का मुकाबला कर सकता है? और अगर उसके हाथों में बंदूक देकर उसे सामने से फायर करने वाले पर गोली न चलाने का हुक्म दिया जाए तो वह क्या लड़ाई करेगा। कुछ ऐसी ही स्थिति उमर अब्दुल्ला अपने राज्य में चाहते हैं और चिदम्बरम उनकी हां में हां मिला रहे हैं। सेना का कहना है कि इन अधिकारों के बिना कश्मीर में आतंक का मुकाबला बहुत मुश्किल है। एक वरिष्ठ सेना अधिकारी ने कहा कि आप खुद सोचें जिन आतंकवादियों के मुकाबले में आपको खुद पचड़े में पड़ने का खतरा हो तो आप उनसे मुकाबला कैसे कर सकते हैं। क्या आप जिस आतंकी का मुकाबला करने जा रहे हैं क्या वह आप पर फूल बरसाएगा? सेना मुख्यालय के सूत्रों का कहना है कि सीमापार अभी भी 50 से अधिक आतंकी शिविर चल रहे हैं। इतना ही नहीं, सीमापार करीब 100 से अधिक आतंकी घुसपैठ के लिए तैयार बैठे हैं। घुसपैठ से लेकर आतंकी हमलों का भी खतरा बना हुआ है। फिर आतंकी पहले की तुलना में हर साल `हाई टेक' होते जा रहे हैं। आतंकियों के पास न केवल उच्चस्तर के हथियार, नाइफ, कटर, इलैक्ट्रॉनिक उपकरण मिल रहे हैं बल्कि उच्च तकनीकी से तैयार किए विस्फोटकों आदि को तैयार करने में माहिर हो रहे हैं। आतंकियों का प्रशिक्षण भी कमांडो स्तर का हो रहा है और वे भारतीय भाषाओं को सीखकर आते हैं। एक नया फैक्टर जिसका हमें ध्यान रखना होगा वह यह है कि पाक अधिकृत कश्मीर में बहुत से चीनी सैनिक मौजूद हैं जो इन आतंकियों को हर सम्भव मदद दे रहे हैं। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के इस सीमावर्ती राज्य में सेना के सामने लगातार चुनौतियां बढ़ रही हैं। आज अगर जम्मू-कश्मीर में थोड़ी-सी शांति है तो वह सेना की प्रभावी रणनीति के कारण है। सेना के अधिकारों में कटौती की मांग करने वालों के सामने देश की सुरक्षा से ज्यादा अपने वोट बैंक की नीति ज्यादा हावी लग रही है। उमर अब्दुल्ला अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। केंद्र सरकार को उनकी हर मांग पर हां में हां नहीं मिलानी चाहिए। गृह मंत्रालय को रक्षा मंत्रालय से गम्भीरता से इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए और जो भी फैसला लेना है वह देश हित में होना चाहिए, महज किसी राजनीतिक दल की वोट बैंक रणनीति को बढ़ाने के लिए नहीं होना चाहिए। देश की सुरक्षा सर्वोपरि है।
AFSPA, Anil Narendra, Daily Pratap, Indian Army, Jammu Kashmir, Terrorist, Umar Abdullah, Vir Arjun

Saturday, 15 October 2011

प्रशांत भूषण की उनके चैम्बर में जमकर पिटाई


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th October 2011
अनिल नरेन्द्र
सुप्रीम कोर्ट के वकील और टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण पर बुधवार को तीन युवकों ने उनके सुप्रीम कोर्ट चैम्बर में घुसकर जमकर पिटाई कर दी। हमलावरों ने प्रशांत भूषण को कुर्सी से उठाकर जमीन पर गिराया और लात-घूसों से पीटने लगे। वहां मौजूद लोगों ने एक हमलावर इन्दर वर्मा को पकड़ लिया और पुलिस को सौंप दिया। बाकी दो फरार हो गए। प्रशांत भूषण के चेहरे व गर्दन पर चोट आई हैं। राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई। रात में तिलक मार्ग थाने में तीनों हमलावरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई। जिस समय यह तीन हमलावरों ने प्रशांत भूषण के चैम्बर के अन्दर घुसकर उन पर हमला किया उस समय वह एक न्यूज चैनल को इंटरव्यू दे रहे थे। लिहाजा यह हमला कैमरे में कैद हो गया और शाम तक हर चैनल में दिखाया जाने लगा। हमलावरों ने बाद में पर्चे भी फेंके और कहा कि कुछ दिनों पहले कश्मीर पर दिए गए प्रशांत भूषण के बयान से वह नाराज थे और इसका विरोध करने के लिए उन्होंने यह हमला किया। दरअसल वह प्रशांत भूषण द्वारा 26 सितम्बर को वाराणसी में दिए उस बयान से नाराज थे जिसमें उन्होंने कहा था कि सेना के दम पर कश्मीरियों को बहुत दिनों तक दबाव में नहीं रखा जा सकता। कश्मीर का भविष्य तय करने के लिए जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए। गिरफ्तार इन्दर वर्मा ने खुद को श्रीराम सेना का प्रदेश अध्यक्ष बताया और हमले के बाद जो पर्चे बांटे उस पर लिखा था ः कश्मीर हमारा था, हमारा है और हमारा रहेगा। तुम कश्मीर तोड़ोगे तो हम तुम्हारा सिर तोड़ देंगे। वन्दे मातरम्। हमला करने वाले युवकों को बृहस्पतिवार को पटियाला हाउस अदालत में पेश किया गया। तेजिन्द्र पाल सिंह बग्गा सहित दो अन्य को अदालत ने एक दिन के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया। बग्गा ने कहा कि उसे अपने किए पर कोई शर्मिंदगी नहीं है और चेतावनी दी कि वह प्रशांत पर फिर हमला कर सकते हैं। भूषण के हमलावरों की अदालत में पेशी के दौरान कुछ लोगों ने अन्ना समर्थकों पर हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि हमलावरों में भगत सिंह क्रांति सेना और श्रीराम सेना के कार्यकर्ता शामिल थे। जब पुलिस वहां पहुंची तो हमलावर भाग खड़े हुए। इस झड़प के दौरान दो लोग घायल भी हो गए। तेजिन्द्र पाल सिंह बग्गा ने फेसबुक पर अपनी प्रोफाइल में एक तस्वीर लगाई है जिसमें वह श्री श्री रविशंकर के साथ खड़ा है। भगत सिंह क्रांति सेना के निशाने पर छह और लोग हैं। इनमें अरुंधति रॉय, स्वामी अग्निवेश के अलावा कश्मीरी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारुख और यासीन मलिक शामिल हैं। भगत सिंह क्रांति सेना एक साल पहले बनाई गई थी। इससे पहले वह भाजपा में ही शामिल थी।
समाजसेवी अन्ना हजारे के प्रशांत भूषण के कश्मीर पर दिए गए बयानों की निन्दा की मांग करते हुए अखिल भारतीय आतंकवाद निरोधक मोर्चा के अध्यक्ष मनिंदर सिंह बिट्टा ने कहा कि भूषण ने अपने बयान से कश्मीर के लिए प्राण देने वाले हजारों शहीदों का अपमान किया है। उन्होंने कहा कि मैं इस हमले की निन्दा करता हूं, यह गलत है पर भूषण का बयान निन्दनीय है। बिट्टा ने कहा कि इस तरह के बयान से कस्मीर में लड़ने वाले और अपनी जान देने वाले शहीदों का अपमान करना है। अपने ही घर से निर्वासित कर दिए गए उन कश्मीरी पंडितों और अन्य लोगों का भी अपमान है, जो आज भी शिविरों में रह रहे हैं। प्रशांत भूषण ने कहा था, सरकार को कश्मीर से सेना वापस बुला लेना चाहिए। सरकार इस बात के लिए वोटिंग करवाए कि कश्मीरी भारत के साथ रहना चाहते हैं अथवा नहीं। उन्होंने कहा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि अन्ना सही काम कर रहे हैं लेकिन उनके साथ जो लोग हैं वह सही नहीं है। स्वामी अग्निवेश का सच सबके सामने है। प्रशांत के बयानों के लिए अन्ना को उनकी निन्दा करनी चाहिए। बिट्टा ने कहा कि ऐसे बयान देश तोड़ने वाले हैं। देश की जनता इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। बेहतर हो कि प्रशांत भूषण ऐसे बयानों से बचें।
Anil Narendra, Anna Hazare, Attack on Prashant Bhushan, Civil Society, Daily Pratap, Jammu Kashmir, Lokpal Bill, Prashant Bhushan, Vir Arjun

शिवानी की हत्या किसने और क्यों करवाई, इन सवालों का क्या जवाब है?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th October 2011
अनिल नरेन्द्र
इंडियन एक्सप्रेस की युवा पत्रकार शिवानी भटनागर की 23 जनवरी 1999 को उसके पटपड़गंज स्थित घर में हत्या कर दी गई थी। यह हत्या किसने करवाई, क्यों करवाई और क्या यह किसी साजिश के तहत किया गया मर्डर था, यह आज भी सवाल बने हुए हैं। यह तो साबित होता है कि हत्या करने वाला प्रदीप शर्मा था पर हत्या का मकसद क्या था? क्या उसने अकेले अपने दम पर हत्या को अंजाम दिया? यह सवाल हत्याकांड के 11 साल बाद फिर जिन्दा हो गए हैं। इन सवालों को उठाने के साथ दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आरके शर्मा, श्री भगवान और सत्य प्रकाश को बरी कर दिया है। वैधानिक साक्ष्यों के आधार पर प्रदीप शर्मा को हत्यारे होने की पुष्टि कर दी है और उसे उम्र कैद की सजा को हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है। चारों ने सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की हुई थी। जस्टिस बीडी अहमद और जस्टिस मनमोहन सिंह की डिवीजन बैंच ने कहा है कि साक्ष्यों से साबित होता है कि प्रदीप ने शिवानी के फ्लैट में दाखिल होकर हत्याकांड को अंजाम दिया पर हत्या का मकसद साफ नहीं है। उसने हत्याकांड को अकेले अंजाम दिया, हत्या कराने के पीछे आरके शर्मा की साजिश थी या नहीं या किसी दूसरे की, ऐसे कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब कोर्ट को नहीं मिले हैं। प्रदीप को हत्या के बदले तीन लाख रुपये की सुपारी की बात भी साबित नहीं हो सकी। डिवीजन बैंच ने कहा कि आरके शर्मा, श्री भगवान और सत्य प्रकाश का षड्यंत्र साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य नहीं हैं। न ही उनके आपसी संबंध साबित होते हैं। साक्ष्य के तौर पर दाखिल अभियुक्तों के कॉल रिकार्ड्स रहस्यमय प्रतीत होते हैं। उनके साथ छेड़छाड़ की आशंका के अलावा कई समस्याएं हैं। इनके चलते उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इन टिप्पणियों से दिल्ली पुलिस की जांच पर सवालिया निशान लग गए हैं। दिल्ली पुलिस ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। पुलिस के स्थायी अधिवक्ता पवन शर्मा ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे और उनका मानना है कि प्रदीप के हत्यारे होने की पुष्टि पुलिस के लिए महत्वपूर्ण आधार है।
शिवानी भटनागर की हत्या 23 जनवरी 1999 को आईपी एक्सटेंशन के नवपुंज अपार्टमेंट्स स्थित फ्लैट में की गई थी। केस की गुत्थी लम्बे समय तक उलझी रही। आखिरकार पुलिस ने हरियाणा कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आरके शर्मा, सत्य प्रकाश और श्री भगवान, वेद प्रकाश और वेद प्रकाश उर्प कालू को गिरफ्तार करके गुत्थी सुलझाने का दावा किया। अभियोजन पक्ष के अनुसार शिवानी की हत्या आरके शर्मा के षड्यंत्र पर हुई थी। हत्याकांड को अंजाम प्रदीप शर्मा ने दिया। वह नवपुंज अपार्टमेंट के एंट्री रजिस्टर से गलत पता और अपना फर्जी नाम लिखकर दाखिल हुआ था और शादी की मिठाई देने के बहाने घर में घुसा। शिवानी चाय बनाने रसोई में गई तो तवे का वॉर व रसोई में चाकुओं से हमला कर दिया। बाद में बेसुध हालत में बिजली के तार से गला घोंटकर हत्या कर दी। शिवानी को अभी भी इंसाफ का इंतजार है। शिवानी भटनागर की तरह राजधानी में और भी चर्चित हत्याकांड हुए हैं जिनमें इंसाफ मिलना बाकी है। मॉडल जेसिका लाल की 29 अप्रैल 1999 की रात वीना रमानी के टेमरीन्ड कोर्ट नामक कुतुब रोड स्थित रेस्टोरेंट में एक हाई-प्रोफाइल पार्टी के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। तफ्तीश में कांग्रेस के प्रभावशाली नेता विनोद शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा उर्प मनु शर्मा समेत तीन युवकों का नाम सामने आया। मनु शर्मा दिसम्बर 2006 से तिहाड़ जेल में सजायाफ्ता कैदी के तौर पर सजा काट रहे हैं। फैशन डिजाइनर पुंजुम बुद्धिराजा की 20 मार्च 1999 को दाऊद इब्राहिम के कथित गुर्गे रोमेश शर्मा के दक्षिण दिल्ली स्थित जय माता फार्म हाउस पर हत्या कर दी गई। हाई कोर्ट ने 15 दिसम्बर 2009 को रोमेश शर्मा को पुंजुम की हत्या के आरोप में बरी कर दिया। ताजा स्थिति ः पुंजुम की हत्या के चारों दोषी सुरेन्द्र, हेमचन्द, संतराम और रमेश जेल में उम्र कैद की सजा काट रहे हैं जबकि इन चारों की अपील सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। दिल्ली विश्वविद्यालय में एलएलबी तृतीय वर्ष की छात्रा प्रियदर्शनी मट्टू, 23 जनवरी 1996 को अपने वसंत पुंज स्थित घर में मृत पाई गई। दिल्ली हाई कोर्ट ने 30 अक्तूबर 2006 को संतोष को कॉलेज छात्रा के साथ बलात्कार व उसकी निर्मम हत्या के जुर्म में फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 6 अक्तूबर 2010 को पलटते हुए उम्र कैद में तब्दील कर दिया था। संतोष कुमार शर्मा अक्तूबर 2006 से ही तिहाड़ जेल में बन्द हैं। नैना साहनी युवा कांग्रेस नेता सुशील शर्मा की पत्नी थी। 2 जुलाई 1995 को सुशील ने नैना की गोली मारकर हत्या कर दी थी और शव को तंदूर में डाल दिया। इस मामले में 7 नवम्बर 2003 को अदालत ने सुशील को फांसी की सजा सुनाई थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने सुशील की सजा को बरकरार रखा था। पिछले एक दशक से ज्यादा समय से सुशील शर्मा तिहाड़ में बन्द है और उसकी सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील लम्बित है।
Anil Narendra, Anna Hazare, Attack on Prashant Bhushan, Civil Society, Daily Pratap, Jammu Kashmir, Lokpal Bill, Prashant Bhushan, Vir Arjun

Tuesday, 11 October 2011

फारुख और उमर अब्दुल्ला दोनों ही कठघरे में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11th October 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ दिनों से कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सुर्खियों में हैं। कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस के एक नेता की रहस्यमय परिस्थितियों में हुई मौत पर सियासत चल रही है। सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रेंस के एक नेता सईद मोहम्मद यूसुफ की मौत से एक भारी विवाद खड़ा हो गया है। यूसुफ का आरोप है कि उसने नेशनल कांफ्रेंस के दो नेताओं से कुल एक करोड़ 15 लाख रुपये लिए थे। उन दो नेताओं से उक्त पैसे की एवज में सरकार में कुछ काम करवाने का वादा किया था। काम नहीं हुआ तो विवाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तक पहुंचा। शिकायतकर्ता और आरोपी को मुख्यमंत्री के कैम्प ऑफिस बुलाया गया। बाद में यूसुफ की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। इस दौरान एक चश्मदीद गवाह सामने आ गया है। चश्मदीद का दावा है कि फारुख अब्दुल्ला उमर सरकार में किसी को मंत्री बनाने या विधायक बनाने के लिए पैसे वसूलते थे। घटना के चश्मदीद और नेशनल कांफ्रेंस के ही कार्यकर्ता सलमान रेशी ने न्यूज चैनलों को दिए अपने बयान में दावा किया है कि मौत से पहले उमर अब्दुल्ला और यूसुफ के बीच पैसे के लेन-देन को लेकर झगड़ा हुआ था। रेशी का कहना है कि वह पैसा एक पार्टी वर्पर ने मंत्री बनने के लिए फारुख अब्दुल्ला को दिया था। उनका दावा है कि मुख्यमंत्री निवास में उमर और यूसुफ की मुलाकात के दौरान वह मौजूद था। फारुख अब्दुल्ला ने इसका खंडन किया है। रेशी का दावा है कि जब यूसुफ उमर से मिलने गए थे तो वह ठीक थे। मुख्यमंत्री निवास से बाहर आने के बाद उनकी हालत खराब थी। रेशी ने कहा कि उस दिन उमर ने यूसुफ से पूछा कि क्या उन्हें भट्ट से पैसे मिले हैं, इसके बाद यूसुफ ने उमर से कहा कि वह उनके पास वाले कमरे में अकेले में बात करना चाहता है। उमर ने उनकी बात नहीं मानी। यूसुफ ने तब कहा कि वह इस मामले को सुलझाने के लिए फारुख अब्दुल्ला का इंतजार करना चाहते हैं।
कश्मीर के प्रमुख विपक्षी दल पीडीपी ने उमर अब्दुल्ला के त्यागपत्र की मांग करते हुए जबरदस्त हंगामा कर रखा है। आरोपों से घिरे पिता-पुत्र यानि फारुख और उमर अब्दुल्ला व उनकी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन की सियासत में अलग-थलग पड़ते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के ज्यादातर नेता जहां इस मुद्दे पर चुप हैं, वहीं कई निजी बातचीत में मुख्यमंत्री के इस्तीफे की इच्छा जाहिर कर रहे हैं। एक अन्य सहयोगी पीपुल्स डेमोकेटिक फोरम (पीडीएफ) ने इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं माकपा नेता मोहम्मद यूसुफ तारीगामी और निर्दलीय रशीद ने भी सदन में इस मामले पर बहस के लिए प्रमुख विपक्षी दल पीडीपी की मांग का समर्थन किया है। बीते तीन साल की राजनीति में शायद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने खुद को कभी इतना असहाय महसूस नहीं किया होगा, जितना मौजूदा माहौल में कर रहे हैं। रहस्यमय परिस्थितियों में मारे गए यूसुफ के परिजनों ने शनिवार को तीन तस्वीरें जारी कीं। इन तस्वीरों के माध्यम से परिजनों ने यह बताने की कोशिश की है कि यूसुफ के चेहरे पर यातना के निशान साफ नजर आ रहे हैं। एक तस्वीर यह भी दर्शाती है कि यूसुफ मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारुख अब्दुल्ला का खास था। पुलिस दावा कर रही है कि यूसुफ की मौत हार्ट अटैक से हुई है जबकि श्रीनगर के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट ने मामले की जांच शुरू कर दी। इसमें तो कोई संदेह नहीं लगता कि दिवंगत नेकां कार्यकर्ता सैयद मोहम्मद यूसुफ फारुख और उमर, दोनों को करीब से जानता था। किसी न किसी लेवल पर पैसों का लेन-देन भी हुआ। सवाल इतना रह जाता है कि 30 सितम्बर को पुलिस हिरासत में यूसुफ की मौत कैसे हुई? हार्ट अटैक से या फिर...।
Anil Narendra, Daily Pratap, Farooq Abdullah, Jammu Kashmir, Umar Abdullah, Vir Arjun

Friday, 16 September 2011

कश्मीरी महिलाओं का जेहादियों के खिलाफ मार्च


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th September 2011
अनिल नरेन्द्र
आज की तारीख में पाकिस्तान भी उतना ही इन जेहादियों से परेशान होगा जितनी बाकी दुनिया है। पाकिस्तान के अन्दर इन कट्टरपंथियों ने एक तरफ सरकार के नाक में दम कर रखा है वहीं आम जनता भी इनसे आजिज आ चुकी है। आए दिन कराची, क्वेटा, एबटाबाद में बम फटते रहते हैं। कोई भी सुरक्षित नहीं है।
जब मस्जिदों में बम फटेंगे, बच्चों का अपहरण होगा तो जनता में सुरक्षा की भावना कैसे होगी। पिछले दिनों ऐसी खबरें आई जिनसे पता चलता है कि इन जेहादियों से जनता कितनी तंग आ चुकी है और इनकी पाकिस्तानी सुरक्षा कर्मियों में किस हद तक घुसपैठ हो चुकी है। बीबीसी ने बताया कि पिछले हफ्ते सैकड़ों लोगों ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर जिसे आजाद कश्मीर भी कहा जाता है, में दर्जनों महिलाओं ने जेहादी गुटों की बढ़ती हुई गतिविधियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और मांग की कि चरमपंथियों को इलाके से निकाला जाए। यह प्रदर्शन पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के नीलम घाटी में हुआ। एक हफ्ते के भीतर घाटी में चरमपंथ के खिलाफ यह दूसरा प्रदर्शन था। नीलम घाटी जेहादियों का मुख्य केंद्र है और स्थानीय लोगों के मुताबिक इसी इलाके से जेहादी घुसपैठ करते हैं। यह प्रदर्शन ऐसे वक्त में किया गया है जब नीलम घाटी में नियंत्रण रेखा पर भारत और पाकिस्तान के सैनिकों के बीच गोलीबारी की घटना हुई थी जिसमें चार पाकिस्तानी सैनिकों सहित पांच लोग मारे गए थे और एक भारतीय सैनिक घायल हो गया था। महिलाओं ने लगभग चार किलोमीटर मार्च करते हुए दावा किया कि हाल के दिनों में नीलम घाटी में चरमपंथियों की गतिविधियां बढ़ गई हैं और वह कथित रूप से सीमा पार कर भारत प्रशासित कश्मीर में प्रवेश कर रहे हैं। उनका कहना था कि चरमपंथियों की बढ़ती हुई गतिविधियों से उन्हें चिन्ता है कि नियंत्रण रेखा पर भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच पिछले आठ सालों से जारी युद्धविराम खतरे में पड़ सकता है और फिर से गोलीबारी शुरू हो सकती है।
प्रदर्शनकारी मांग कर रहे थे कि नियंत्रण रेखा पर शांति स्थापित की जाए। जेहादी गुटों की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जाए और उन्हें घाटी से निकाल दिया जाना चाहिए। एक प्रदर्शनकारी महिला चांद बीबी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, `हमें खतरा है कि मुजाहिद्दीन नियंत्रण रेखा के उस पार जाते हैं और वहां भारतीय सेना को तंग करते हैं और फिर भारतीय सेना हम पर फायरिंग करती है।' उनका कहना था कि नियंत्रण रेखा पर 2003 में हुए युद्धविराम के बाद उनका जीवन सामान्य हो गया है लेकिन अब नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी को वह बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं।
गत सप्ताह पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी शहर क्वेटा में दो आत्मघाती विस्फोट हुए। इनमें कम से कम 26 लोगों की मौत हो गई और 82 लोग घायल हो गए। यह हमला अर्द्धसैनिक बल के डीआईजी के घर को निशाना बनाकर किए गए थे। मरने वालों में ब्रिगेडियर की पत्नी, सेना के चार अधिकारी और दो बच्चे भी शामिल हैं। इससे पहले खबर आई थी कि अफगानिस्तान में आतंकियों ने पाकिस्तान के 30 बच्चों को बंधक बना लिया। ये बच्चे ईद के मौके पर पिकनिक मनाने गए हुए थे और अनजाने से अफगानिस्तान के पूर्वी प्रांत कुनार चले गए
थे। ऐसी हरकतें आए दिन पाकिस्तान में होती ही रहती हैं। जनता परेशान हो चुकी है। दुःख इस बात का है कि पाकिस्तान सरकार का नियंत्रण धीरे-धीरे खिसकता जा रहा है और कट्टरपंथी हावी होते जा रहे हैं। कश्मीरी महिलाओं ने पाकिस्तानी आवाम की पीढ़ा का प्रदर्शित करने का साहस दिखाया है।

Saturday, 30 July 2011

Arrest of Ghulam Fai once again unmasks Pakistan

 - Anil Narendra
Everyone knew about the highly influential Pakistan lobby in US and thanks to this lobby that even after knowing everything, the US administration continued economic and military aid to Pakistan, but it was not aware of the powers working behind this lobby. A few days ago, the US administration arrested another of its citizen, who under the garb of an NGO, was working for the Pak intelligence agency-ISI and was spending money on anti-India propaganda with open hands. As a Director of the NGO, `Kshmiri American Council’ Fai was receiving regularly millions of rupees through hawala transactions and was using this money to inciting American Congressmen against India on Kashmir issue. Ghulam Fai, is the second American of Pak origin, who has recently been arrested by the US authorities. Earlier, terrorist David Hadley was arrested. There has been an astounding revelation that Fai used to organize seminars on Kashmir in America at the behest of ISI and a number of renowned Indians have been participating in these seminars. According to sources, renowned journalist, Dilip Padgaonkar, appointed as interlocutor on the issue of Jammu and Kashmir by the government of India had also attended these seminars. Seminars organized with ISI’s directions and funds have seen a number of Indians including renowned journalist Kuldip Nayyar, separatist leader Mirwaiz Umer Farooq, journalist Gautam Navalakha, Harinder Baweja, Manoj Joshi, Hameeda Naeem, Ved Bhasin, JD Mohammed as participants. These were not only platforms for discussions on Kashmir issue, but pro-Pakistan resolutions were also adopted in there. In fact, for last 25 years, Fai was engaged in reorienting world views on Kashmir. He was trying to internationalize the Kashmir issue, accusing India of heaping injustices on Kashmiris and to establish conspirational links far and wide. According to FBI, Fai is the Executive Director of US-based Kashmir American Council. He is managing its affairs as per dictats of ISI. Fai has been charged of spying for ISI, influencing the viewpoints of Kashmir specialists, politicians, journalists and eminent opinion leaders with a view to garner their support to Pakistan’s view point through the organization of seminars. According to FBI, a number of US Senators have also been contributing to his such efforts. After the arrest of Fai by the FBI, the heat was also felt in India, when it was revealed that a number of eminent Indian personalities have been attending these seminars in US on his invitations. Intelligence sources claim that people used to feel elevated on receiving invitations to attend his seminars. Invitees were paid hefty sums for attending these seminars, in addition to the compensation for US return fare and boarding-lodging in US. A resolution also used to be passed at the conclusion of the seminar, which used to strengthen Pakistan’s viewpoint. Dilip Padgaonkar has admitted his going to US to attend his seminar. He said that he had visited US on Fai’s invitation long back, but he was unaware of his ISI connections. What a coincidence that Fai was arrested at the time, when the US Secretary of State, Hillary Clinton was on a visit to India. In fact, US had known the truth about Fai for last at least six years. Fai was once detained with a huge amount of cash and was extensively interrogated also. India has been demanding action against Fai and his NGO for quite some time. There was no apparent source of income, still Fai was leading an ostentatious life. It may not be surprising that Fai had given maximum contribution to the Republican Senator Dan Burton, notorious for his extreme anti-India stand. The election funds of the present US President, Barak Obama have also been the beneficiary of his donations. Pakistan had been trying to influence US for putting pressure on India for Kashmir referendum. Fai had also penetrated the UN. He was the most vocal advocate of separatist Kashmiri leaders and his arrest must have come as a blow to them. Fai’s would be the second high-profile trial after the Hadley-Rana trial in Chicago. Now the question is that will US succeed pressurizing ISI to check such activities and find more about all ISI contacts? May be Ghulam Fai has direct links with various terror groups. Let us wait and watch about the outcome of the trial.

आईएसआई से 18 करोड़ लिए और वह ही तय करती थी एजेंडा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th July 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एजेंट गुलाम नबी फई को बुधवार को अमेरिकी अदालत ने एक लाख डालर (करीब 45 लाख रुपये) के मुचलके पर जमानत दे दी। उसे नजरबंदी में रखने का आदेश दिया गया। उसके पैरों में रेडियो टैग बांधा जाएगा, जिससे उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। अमेरिकी संघीय एजेंसी एफबीआई ने बीते सप्ताह फई को आईएसआई से धन लेकर अनुचित ढंग से कश्मीर पर अमेरिकी नीति को प्रभावित करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। अलेक्जेंड्रिया की जिला अदालत के न्यायाधीश रावेल्स जोंस ने फई को जमानत देने और रेडियो टैग के साथ नजरबंद रखने का आदेश दिया। भारत के कश्मीर में जन्मे फई को वर्जीनिया के फेरफेक्स स्थित अपनी पत्नी के साथ अपने आवास में रहने की अनुमति दी गई है। फई और उसकी चीनी मूल की पत्नी को पासपोर्ट जमा करने को कहा गया है। फई ने कहा है कि कश्मीर के लोगों को अमेरिका से डरना नहीं चाहिए। उसने एक लिखित बयान में कहा, `कश्मीर के लोगों को यह सोचकर डरने की जरूरत नहीं कि विश्व शक्तियां और खासकर अमेरिका उन्हें निराश करेगा।' फई के वकील ने जमानत मिलने पर उसके द्वारा लिखित बयान की प्रति वितरित की। फई ने कहा, `जम्मू-कश्मीर राज्य के लोगों के प्रति मेरी आजीवन प्रतिबद्धता है। चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि में हो। मेरी प्रतिबद्धता उन्हें भी अपने भविष्य का फैसला करने के लिए आत्मनिर्णय का अधिकार हासिल करने में मदद करने की है।'
इससे पहले गुलाम फई ने अदालत में कहा कि मैं आईएसआई के इशारों पर काम करता था और आईएसआई से मैंने 40 लाख डालर (करीब 18 करोड़ रुपये) लिए। फई के वकीलों ने हालांकि दलील दी कि कश्मीरी अमेरिकी काउंसिल (केएसी) के प्रमुख फई ने हमेशा स्वतंत्र कश्मीर का समर्थन किया। एफबीआई एजेंट सारा वेब लिंडेन ने अदालत को बताया कि फई की हर बैठक का एजेंडा और भाषण आईएसआई तय करती थी। अमेरिकी अटार्नी गार्डन क्रोमबर्ग ने आरोप लगाया कि फई पिछले दो दशक से अमेरिका में आईएसआई के एजेंट के तौर पर काम कर रहा था। हलफनामे में आरोप लगाया गया कि केएसी अपने आपको ऐसा कश्मीरी संगठन बताता है, जो कश्मीरियों द्वारा संचालित होता है और उसे अमेरिकियों से पैसा मिलता है जबकि तीन सेंटरों में से एक `कश्मीर सेंटर' आईएसआई और पाकिस्तान सरकार के कुछ लोग संचालित कर रहे हैं। दो अन्य सेंटर लन्दन और ब्रुसेल्स में स्थित हैं। भारत सरकार को इस केस में विशेष दिलचस्पी लेनी चाहिए ताकि उसे पता चले कि पाकिस्तान किस-किस लेवल में ऑपरेट करता है। दुःख की बात तो यह है कि भारत के नामी-गिरामी पत्रकार गुलाम फई के आईएसआई प्रायोजित, फंडित कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं।
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Friday, 29 July 2011

...और अब पाकिस्तान ने ग्लैमर का सहारा लिया


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th July 2011
अनिल नरेन्द्र
तमाम दुनिया में अपनी गिरती छवि से परेशान पाकिस्तान ने अब ग्लैमर का सहारा लिया है। पाकिस्तान की नई विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार एक मॉडल ज्यादा लगती हैं बनिस्पत एक विदेश मंत्री के। विदेश मंत्री बनने के बाद पहली विदेश यात्रा उनकी और कहीं से नहीं शुरू हुई बल्कि भारत से। हिना रब्बानी खार 34 साल की हैं। वह पाकिस्तान की पहली महिला विदेश मंत्री हैं। अभी कुछ दिन पहले ही यानि 20 जुलाई को उन्होंने पद्भार सम्भाला था। हिना पाकिस्तान के नेता मलिक गुलाम नूर रब्बानी खार की बेटी हैं। वह 2001 में विदेश से होटल मैनेजमेंट की डिग्री लेकर आई थीं और 2002 से ही राजनीति में सक्रिय रहकर परिवार की परम्परा आगे बढ़ा रही हैं। हिना बिजनेसमैन फिरोज गुलजार की पत्नी हैं और उनके दो बेटे और एक बेटी है। हिना खुद भी एक बड़े व्यावसायिक कारोबार की मालकिन हैं। पिछले पाकिस्तानी फॉरेन मिनिस्टरों की तरह सफारी सूट वाले ओल्डमैन नहीं बल्कि बला-सी खूबसूरत मॉडल जैसी 34 साल की हिना ने भारत में हलचल मचा दी है। यूं तो पाकिस्तान के कई मंत्री भारत आते रहते हैं पर जिस तरह हिना ने भारत के यूथ को प्रभावित किया है वैसा शायद किसी और पाकिस्तानी नेता ने नहीं किया। आमतौर पर पाक की महिला अफसर या नेता किसी गैर मर्द से हाथ नहीं मिलातीं, केवल आदाब के लिए ही हाथ ऊपर उठाती हैं। लेकिन रब्बानी ने यह रवायत तोड़ डाली। उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया और इस तरह से उन्होंने संदेश देने की कोशिश भी की कि अब उनके मुल्क की चाल-ढाल भी बदल गई है पर बेशक पाकिस्तान ने अब ग्लैमर का सहारा लिया हो पर उसका एजेंडा नहीं बदला। हिना ने पहले दिन से ही कश्मीर मुद्दे को मुख्य एजेंडा बनाने की कोशिशें शुरू कर दीं। इन्दिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट से उतरने के बाद वह सीधा पाक उच्चायुक्त गईं। वहां पहले से ही अलगाववादी नेता सैयद अली गिलानी और मीर वाइज फारुख उनका इंतजार कर रहे थे। सबने मिल बैठकर कश्मीर पर चर्चा की। हिना ने सोमवार को लाहौर में जेकेएलएफ नेता यासीन मलिक से भी भेंट की थी। हैदराबाद हाउस में भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के साथ वार्ता में हिना ने स्पष्ट संकेत दे दिए कि आज भी पाकिस्तान वार्ता का मुख्य एजेंडा कश्मीर है। भारत को यह समझ लेना चाहिए कि पाक का एजेंडा नहीं बदला। चेहरे बदल गए हों, ग्लैमर्स मॉडल विदेश मंत्री बन गई हों पर आज भी कश्मीर राग ही प्राथमिकता है। भारत हमेशा से मेहमाननवाजी के लिए जाना जाता है। हमें हिना का गर्मजोशी से स्वागत करना चाहिए पर उनके ग्लैमर पर नहीं जाना चाहिए और अपने मुद्दों को प्रभावी ढंग से रखना चाहिए। वैसे एक इस्लामिक देश में जहां औरतों पर सख्त पाबंदियां हों, बुर्का पहनने पर बल दिया जाता हो, वहां एक खूबसूरत महिला जो सूट पहन रखी हो, हाथ मिलाती हो क्या यह अपने आपमें एक विरोधाभास नहीं? जिस देश में कट्टरपंथियों का राज हो वहां हिना कैसे? हिना रब्बानी खार को पाकिस्तान का विदेश मंत्री बनाए जाने पर जमीयत उलेमा-ए-इस्लामी पार्टी ने नाराजगी जताई है। पार्टी के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने रब्बानी की नियुक्ति की आलोचना करते हुए कहा कि एक महिला को यह पद देना `बुद्धिमानीपूर्ण' फैसला नहीं है। हमें इस निर्णय पर आपत्ति है। हमें यह नहीं पता है कि हिना रब्बानी किस तरह से कूटनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करेंगी। वे एक महिला उद्यमी हैं और उनके पास कोई कूटनीतिक तथा राजनीतिक अनुभव नहीं है। ऐसे में यह बुद्धिमानीपूर्ण फैसला नहीं है।
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Wednesday, 27 July 2011

गुलाम फई की गिरफ्तारी से फिर बेनकाब हुआ पाकिस्तान


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th July 2011
अनिल नरेन्द्र
सभी जानते थे कि अमेरिका में पाकिस्तान लॉबी बहुत प्रभावशाली है और पिछले कई वर्षों में इसी लॉबी के कारण सब कुछ जानते हुए भी अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान की आर्थिक, सैनिक मदद करता चला आ रहा है पर यह नहीं पता था कि इस लॉबी के पीछे कौन-कौन-सी शक्तियां काम कर रही हैं। गत दिनों अमेरिका ने अपने एक और नागरिक को गिरफ्तार किया है जो दशकों से एक एनजीओ की आड़ में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम कर रहा था और कश्मीर पर भारत विरोधी प्रचार के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा था। `कश्मीरी अमेरिकन काउंसिल' नामक इस एनजीओ के डायरेक्टर के रूप में गुलाम नबी फई आईएसआई से हवाला के जरिये करोड़ों रुपये नियमित रूप से पाता था और इसका इस्तेमाल अमेरिकी सांसदों को कश्मीर पर भारत के खिलाफ भड़काने के लिए करता था। गुलाम फई ऐसे दूसरे पाकिस्तानी मूल के अमेरिकन हैं जिन्हें हाल में अमेरिका ने गिरफ्तार किया है। इससे पहले आतंकी डेविड हेडली गिरफ्तार हुए थे। चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई है कि फई आईएसआई के इशारों और पैसों से अमेरिका में कश्मीर पर सेमिनार आयोजित करता था और इस आयोजन में बहुत से नामी भारतीय भी हिस्सा लेते रहे हैं। सूत्रों के अनुसार भारत सरकार ने प्रख्यात पत्रकार दिलीप पडगांवकर को जम्मू-कश्मीर मामले में प्रमुख वार्ताकार बनाया है वह भी फई के सेमिनार में हिस्सा ले चुके हैं। आईएसआई के सहयोग से आयोजित होने वाले सेमिनारों में भाग लेने वालों में प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैयर, अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारुख, राजेन्द्र सच्चर, पत्रकार गौतम नवलखा, हरिन्दर बवेजा, मनोज जोशी, हमीदा नईम, वेद भसीन, जेडी मोहम्मद समेत तमाम भारतीय रहे हैं। सेमिनार में न केवल कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा होती थी बल्कि पाकिस्तान का समर्थन करने वाला प्रस्ताव भी पारित होता था। फई दरअसल सेमिनार के बहाने पिछले 25 सालों से दुनिया का कश्मीर पर नजरिया बदलने में लगा हुआ था। उसकी कोशिश इसके माध्यम से कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना, भारत को कश्मीरवासियों के साथ अन्याय करने का दोषी बनाना तथा दूर तक षड्यंत्र के तार जोड़ने की थी। एफबीआई के मुताबिक फई अमेरिका से चलने वाले कश्मीर अमेरिकन परिषद का कार्यकारी निदेशक हैं। वह इसे आईएसआई के इशारे पर चला रहा है। फई पर आईएसआई के लिए जासूसी करना, उसके इशारे पर पाकिस्तान के कश्मीर पर रुख को समर्थन देने के इरादे से विशेषज्ञों, राजनीतिज्ञों, पत्रकारों तथा समाज के अगुवा लोगों के लिए सेमिनार आयोजित करके लोगों का नजरिया बदलने का आरोप है। एफबीआई के अनुसार उसके इस प्रयास का कई अमेरिकी सीनेटर भी हिस्सा रहे हैं। फई को एफबीआई द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद भारत में इसकी आंच पहुंची और पता चला कि कई भारतीय नामचीन हस्तियां भी उसके बुलावे पर अमेरिका का दौरा करती रही हैं। खुफिया सूत्र बताते हैं कि सेमिनार में भाग लेने के लिए फई के नियंत्रण पर लोगों को काफी फख्र होता था। इसके लिए अमेरिका आने-जाने, सेमिनार में भाग लेने, रहने-खाने के अलावा इसमें भाग लेने के एवज में मोटी धनराशि मिलती थी। सेमिनार के अन्त में एक प्रस्ताव भी पारित होता था और उसमें पाकिस्तान का समर्थन करने वाली राय को बल देने वाला प्रस्ताव भी पारित होता था। दिलीप पडगांवकर ने फई द्वारा आयोजित सेमिनार में उसके बुलावे पर अमेरिका जाने की बात मानी है। उन्होंने कहा कि वह बहुत पहले फई के नियंत्रण पर वहां गए थे, लेकिन उन्हें फई के आईएसआई के साथ जुड़े होने की कोई जानकारी नहीं थी। क्या यह महज संयोग था कि गुलाम फई की गिरफ्तारी ऐन ऐसे मौके पर हुई जब अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत यात्रा पर थीं। अमेरिका को कम से कम छह साल पहले से गुलाम की हकीकत मालूम थी। एक बार तो फई को भारी-भरकम रकम (नकदी) के साथ पकड़ा गया था और उससे गहन पूछताछ भी हुई थी। भारत काफी समय से फई और उनके एनजीओ के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा था। कमाई का कोई प्रत्यक्ष स्रोत नहीं दिखने के बावजूद गुलाम फई अमेरिका में रईसों की जिन्दगी बसर करता था। आश्चर्य नहीं कि धुर भारत विरोधी के रूप में कुख्यात रिपब्लिकन सांसद डैन बर्टन को गुलाम ने सबसे अधिक चन्दा दिया था। वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा भी अनजाने में अपने चुनाव अभियान में गुलाम फई से चन्दा ले चुके हैं। पाकिस्तान गुलाम के जरिये अमेरिका को इस बात के लिए राजी करना चाहता था कि वह भारत पर दबाव डाले कि कश्मीर में जनमत संग्रह होना चाहिए। फई की पैठ तो संयुक्त राष्ट्र में भी थी। गुलाम कश्मीरी अलगाववादियों का तो वह सबसे बड़ा एम्बेसेडर था और इसकी गिरफ्तारी से इन भारत विरोधी तत्वों के होश उड़ने स्वाभाविक ही हैं। डॉ. गुलाम फई का मुकदमा शिकागो में हेडली-राणा मुकदमे के बाद अमेरिका में दूसरा हाई-प्रोफाइल मुकदमा होगा। अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका आखिरकार पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी पर इस बात का दबाव डालने में सफल होगा कि वह इस प्रकार की गतिविधियों पर अंकुश लगाए, आईएसआई के सारे सम्पर्कों का पता लगाए? हो सकता है कि गुलाम फई के आतंकी संगठनों से भी सीधे संबंध हों। देखें मुकदमे में क्या-क्या उभरकर आता है?
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Sunday, 22 May 2011

Pakistan plays Beijing card again

Anil Narendra
Estranged Pakistan has once again played its Beijing card. Pak Prime Minister, Yousuf Raza Gilani is in Beijing these days to pay his obeisance. For quite some time, China has been the most dependable friend for Pakistan. In the presence of Gilani, China warned US to keep away from Pakistan. China also assured Pakistan of going to any extent to ensure its security and providing all types of assistance and also said that America cannot harm Pakistan’s sovereignty. This information has been given by a Pak English Daily The Nation. According to a media report, China has clearly warned US that any attack on Pakistan will be considered as an attack on it. This warning comes in the wake of US operation in Abbotabad against al Qaeda Chief, Osama bin Laden. The Chinese Foreign Minister also communicated this warning-laden message during Sino-US political talks and discussions on economic affairs in Washington. America has also been advised to respect the sovereignty and integrity of Pakistan. The Chinese Prime Minister, Wen Jiabao told this to Yousuf Raza Gilani during the formal talks at Great Hall of the People.
China is the biggest businessman in the world. It does not do any favour without getting a price for it. If, today, it is supporting Pakistan openly, then it is gradually grabbing land in PoK too. And, Pakistan is handing over our land to the Chinese. China has already grabbed thousands of kilometer of land. GOC-in-C Northern Command, Lt Gen KT Parnaik, recently said in a Seminar that the presence of Chinese troops in PoK is continuously increasing and Chinese troops have been stationed on LoC. China is involved in a number of road, airport and hydro-power projects in PoK. Unfortunately, India tops the list of enemies of both Pakistan and China. US is second to us in the list. It may be noted that during the Indo-China war of 1962, China had occupied 38,000 sq. Km. area in the Northern sector of Aksai Chin. Next year, in order to pressurize India, Pakistan, under a pact handed over 5120 sq Km land in PoK for development. Military experts consider this area, strategically and politically very important.
Pakistan has always been playing the Beijing card to pressurize the US. China has helped Pakistan from nuclear to all types of assistance. Although China would not like to annoy America by its deeds, but for it, India has little significance. Pakistan has always been serving its interest by blackmailing other. Sometimes it blackmails America by staging war against al Qaeda-Taliban and sometime by playing Chinese card.

पाकिस्तान ने फिर खेला बीजिंग कार्ड

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
 Published on 22 May 2011
अनिल नरेन्द्र
चारों तरफ से घिरे पाकिस्तान ने एक बार फिर अपना बीजिंग कार्ड खेल दिया है। आजकल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी बीजिंग माथा टेकने गए हुए हैं। चीन पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान का सबसे विश्वासपात्र देश बना हुआ है। चीन ने गिलानी की मौजूदगी में अमेरिका को चेतावनी दे डाली। चीन ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि वो पाकिस्तान से दूर रहे। इसके साथ ही चीन ने पाकिस्तान को आश्वासन दिया कि वो पाकिस्तान की रक्षा और मदद के लिए कुछ भी करेगा और अमेरिका पाकिस्तान की सप्रभुता को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। पाकिस्तान के एक अंग्रेजी अखबार `द नेशन' ने ये जानकारी दी है। मीडिया की एक खबर में कहा गया है कि एबटाबाद में अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के खिलाफ चलाए गए अमेरिकी अभियान के सन्दर्भ में चीन ने साफतौर पर चेतावनी दी है कि पाकिस्तान पर किए गए किसी भी हमले को चीन पर हमले की तरह समझा जाएगा। चेतावनी भरा यह संदेश वाशिंगटन में चीन-अमेरिका राजनीतिक वार्ता तथा आर्थिक मामलों पर हुई बातचीत के दौरान औपचारिक रूप से चीनी विदेश मंत्री ने भी दे दिया। अमेरिका को पाकिस्तान की सप्रभुता और एकता का सम्मान करने की नसीहत भी दी है। चीन के प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ ने यूसुफ रजा गिलानी को ग्रेट हाल ऑफ द पीपुल्स में अपनी औपचारिक बातचीत के दौरान इस बारे में बताया।
चीन दुनिया का सबसे बड़ा बनिया है। वह बिना कीमत लिए कोई भी काम नहीं करता। अगर आज वह पाकिस्तान का इतना खुला समर्थन कर रहा है तो उसकी कीमत में पाक अधिकृत कश्मीर की जमीन को धीरे-धीरे हड़पता जा रहा है। पाकिस्तान कश्मीर के हमारे हिस्से को चीन को थमाता जा रहा है। चीन ने पहले से ही हजारों किलोमीटर के क्षेत्र को अपने कब्जे में कर रखा है। भारत के उत्तरी सेना कमांडर ले. जनरल केटी पटनायक ने हाल में एक सेमिनार में कहा कि पीओके में चीनी सैनिकों की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है और एलओसी में इन सैनिकों की मौजूदगी है। समझा जाता है कि चीन पीओके में लगातार निर्माण कराता जा रहा है। चीन पीओके के अन्दर अनेक सड़क, हवाई अड्डे और हाइड्रो-पॉवर परियोजनाओं में शामिल है। भारत दुर्भाग्य से आज चीन और पाकिस्तान दोनों का दुश्मन नम्बर वन है। अमेरिका का नम्बर हमारे बाद आता है। उल्लेखनीय है कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान चीन ने उत्तरी इलाके के 38 हजार वर्ग किलोमीटर अक्साई चिन के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। इसके अगले साल पाकिस्तान ने भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए चीन से एक समझौता करके पीओके को 5120 वर्ग किमी क्षेत्र चीन को विकास के लिए सौंप दिया था। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र सुरक्षा के लिहाज से राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।
पाकिस्तान अमेरिका को आंख दिखाने के लिए हमेशा बीजिंग कार्ड खेलता है। चीन ने पाकिस्तान को परमाणु से लेकर हर तरह की मदद दी है। हालांकि खुले तौर पर चीन कोई ऐसा काम शायद न करे, जिससे अमेरिका नाराज हो जाए पर भारत उसकी किसी गिनती में नहीं। पाकिस्तान ने हमेशा ब्लैकमेलिंग करके अपना उल्लू साधा है, कभी अमेरिका को अलकायदा-तालिबान के खिलाफ लड़ाई का नाटक करके और कभी चीनी कार्ड खेलकर।

Sunday, 8 May 2011

भारत के लिए तो लादेन से ज्यादा लश्कर खतरनाक है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 07 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
ओसामा बिन लादेन के मरने से बेशक अमेरिका ने थोड़ी राहत महसूस की हो पर जहां तक भारत का सवाल है, हमें लादेन के मरने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। हमारे लिए तो लश्कर-ए-तोयबा अलकायदा से ज्यादा बड़ा खतरा है। बिन लादेन से पाकिस्तान का आतंकी ढांचा भी प्रभावित नहीं होगा। आज भी पाकिस्तान में लश्कर, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिद्दीन, हरकत उल अंसार जैसे दर्जनों आतंकी संगठनों के शिविर जारी हैं। इस समय पाकिस्तान में लगभग 37 आतंकी शिविर मौजूद हैं। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय हार्ड कोर आतंकियों की संख्या लगभग 2300 है। इसके अलावा लगभग 900 से अधिक भाड़े के विदेशी आतंकी भी मौजूद हैं। जम्मू-कश्मीर में इस समय पाकिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर, अफगानिस्तान, मिस्र, सूडान, यमन, बहरीन, बंगलादेश, ईरान और इराकी मूल के विदेशी आतंकी मौजूद हैं।
दरअसल भारतीय खुफिया एजेंसियों की नजर में ओसामा के अलकायदा और लश्कर-ए-तोयबा के बीच कोई अन्तर नहीं है। लश्कर पर भारतीय डोजियर कहता है कि इस आतंकी संगठन के अलकायदा और तालिबान से गहरे रिश्ते हैं। इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में ईद समेत धार्मिक समारोहों में मारे जाने वाले जानवरों की खालों से करोड़ों रुपये कमाने के अलावा चन्दे व सदस्यता शुल्क, आदि से अपने विस्तार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करते हैं। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के मनशेरा में पवनोढेरी में मौजूद लश्कर का प्रशिक्षण केंद्र एक बार में 500 लोगों को प्रशिक्षण देता है। मुजफ्फराबाद, लाहौर, पेशावर, इस्लामाबाद, रावलपिण्डी, कराची, मुल्तान, क्वेटा, गुजरांवाला, सियालकोट, गिलगित समेत कई बड़े शहरों में लश्कर के 2000 से ज्यादा भर्ती केंद्र और दफ्तर हैं। उनके पास आधुनिक हथियारों के साथ ही उन्नत संचार यंत्र भी हैं। खुफिया सूत्रों के मुताबिक घाटी में फिरौती और संचार के लिए लश्कर के आतंकी वाइस इंटरनेट प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करते हैं जिसके कारण मोबाइल फोन पर नम्बर तक नहीं आता।
संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध के बावजूद जमात-उद-दावा और लश्कर समेत 19 अलग-अलग नामों से चल रहे इस आतंकी संगठन का कारोबार इसकी ताकत का अहसास कराता है। संयुक्त राष्ट्र में लश्कर के 2005 और पाकिस्तान में 2002 से प्रतिबंध होने के बावजूद इसका मुखिया हाफिज सईद ओसामा बिन लादेन की मौत पर शोक सभाएं आयोजित करने से बाज नहीं आया। भारत में सिमी, इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठनों के सहारे आतंकवाद को आउटसोर्सिंग का मॉडल भी लश्कर विकसित कर चुका है। बंगलादेश में जमात उल मुजाहिद्दीन और हरकत उल जिहाद अल इस्लामी (हूजी) के तार भी लश्कर से सीधे जुड़े हुए हैं। मुंबई आतंकी हमले ने अमेरिका को भी अब यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि लश्कर का विस्तार और पश्चिमी देशों को निशाना बनाने की उनकी हसरतें खतरे का सबब हैं। लश्कर आतंकियों ने मुंबई हमले में इजरायलियों के लिए महत्वपूर्ण खसड़ हाउस और पश्चिमी पर्यटकों के पसंदीदा होटल ताज होटल को निशाना बनाकर इसकी बानगी भी दे दी है। भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी ही लड़ाई लड़नी होगी। हां, हम अमेरिका पर यह दबाव जरूर डाल सकते हैं कि वह पाकिस्तान में मौजूद टेरर फैक्टरियों को नष्ट करे या हमारी मदद करे।

Friday, 22 April 2011

भाजपा में बढ़ता असंतोष व अनुशासनहीनता को कौन रोके?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 22 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

किसी भी सियासी दल के लिए अनुशासन बहुत जरूरी होता है। उस पार्टी के नेतृत्व में इतनी क्षमता बर्दाश्त और कार्यकर्ताओं से लगातार सम्पर्प बनाए रखने की काबलियत होनी चाहिए। अगर नेताओं में अहंकार आ जाए और वह सत्ता में इतने गैर-जवाबदेही हो जाएं कि उन्हें न तो पार्टी की परवाह हो, न ही कार्यकर्ता की तो उस पार्टी में विद्रोह और असंतोष फैल जाता है। एक समय में भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों से बची हुई थी पर वर्तमान पार्टी नेतृत्व बुरी तरह से विभिन्न कारणों से फेल होता नजर आ रहा है। हम देख रहे हैं कि भाजपा की विभिन्न राज्य ईकाइयों में असंतोष, अनुशासनहीनता बढ़ती जा रही है। भाजपा में इन दिनों कई राज्यों में बगावत का माहौल है। देश के उत्तरी छोर जम्मू-कश्मीर से लेकर पंजाब, राजस्थान, दिल्ली व झारखंड तक पार्टी के अन्दर जारी गुटबाजी अब खुलकर सतह पर आ गई है। कहीं तो यह खुली बगावत का रूप ले चुकी है तो कहीं अन्दर ही अन्दर असंतोष पनप रहा है। पार्टी आलाकमान ने हर तरफ स्थिति सम्भालने के लिए अपने सिपाही भेजे हैं मगर ज्यादातर मामलों में इनकी कोशिशें अभी तक फेल ही हुई हैं।
पार्टी को सबसे बड़ा झटका जम्मू में लगा। अमरनाथ आंदोलन के बाद जनता ने भाजपा पर भरोसा करते हुए उसे 11 विधायकों की बम्पर जीत दी। पार्टी अपना आधार बढ़ाने की तैयारी कर रही थी कि सात विधायकों की क्रॉस वोटिंग से उसके पांव तले जमीन खिसक गई। सूत्रों से पता चला है कि विधायकों के भीतरघात के पीछे प्रदेश अध्यक्ष शमशेर सिंह का रवैया भी बड़ी वजह है। ये नेता लम्बे अरसे से अपनी शिकायत संगठन के कार्यकर्ताओं को पहुंचा रहे थे मगर मामला हाथ से निकल गया। खिसयाए नेतृत्व ने सभी 11 विधायकों का इस्तीफा ले लिया है। उधर पार्टी आलाकमान की नाक के नीचे राजधानी दिल्ली में भी हालात बिगड़ते जा रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता की नए मेयर के चुनाव में खुली छूट देना पार्टी के लिए सिरदर्द साबित हुआ है। पार्टी के प्रभारी महासचिव अरुण जेटली आजकल सातवें आसमान पर हैं। उन्हें न तो दिल्ली भाजपा की कोई परवाह है, न ही कार्यकर्ताओं की। विधायक, कार्यकर्ता करें तो क्या करें?
झारखंड में तो पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा अपनी ही सरकार के खिलाफ बेमियादी धरने पर बैठ गए। मामला था प्रदेश में अतिक्रमण हटाने के अदालत के आदेश का। सिन्हा पीड़ित लोगों की तरफदारी से धरने पर बैठ गए और अर्जुन मुंडा सरकार से मांग कर दी कि इसके लिए अध्यादेश जारी करके लोगों को राहत दे। पंजाब में पार्टी गठबंधन में मतभेद के चलते स्वास्थ्य मंत्री लक्ष्मी कान्ता चावला का इस्तीफा लेने की बार-बार कोशिश कर रही है मगर कामयाब नहीं हो सके। राजस्थान में भी नेता विपक्ष वसुंधरा राजे ने प्रदेश प्रमुख अरुण चतुर्वेदी की ओर से गठित टीम पर एतराज किया। नतीजतन पार्टी को कई नाम बदलने पड़ गए। कर्नाटक व उत्तराखंड में तो पार्टी की अंदरुनी उठापटक रोज की बात हो गई है। प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कबूल किया कि इन सारी चीजों से लगता है कि संगठन को और मजबूत करने की जरूरत है लेकिन इसे इस सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। कई प्रदेशों में पार्टी सिफर थी। सवाल यह है कि भाजपा में आई इस गिरावट को थामेगा कौन? केंद्रीय नेतृत्व या तो खुद गुटबाजी में व्यस्त है या फिर नेताओं का सत्ता भोग सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। आज यह उस पार्टी को भी भूल गए हैं जिसकी बदौलत ये नेता यहां तक पहुंचे हैं।