आतंकवादी गतिविधियों को जारी रखने के लिए आर्थिक फंडिंग बहुत जरूरी होती है। पैसे से ही सारा काम चलता है। आतंकवादी संगठन अपनी इकाइयों तक धनराशि पहुंचाने के लिए विभिन्न तरीके अपनाते हैं। इनमें हवाला और बैंक सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं। आमतौर पर बैंक अपने खातेदारों पर कड़ी नजर रखते हैं पर कुछ बैंक हैं जो अपने निजी फायदे के लिए संदिग्ध अकाउंटों की गतिविधियों को नजरअंदाज कर देते हैं। काले या संदिग्ध पैसे के लेन-देन को रोकने के लिए अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोशिशें हो रही हैं। सरकारों को यह समझ आ रहा है कि काले धन का लेन-देन केवल कारोबार के लिए ही नहीं हो रहा उसका संबंध आतंकवाद और अंतर्राष्ट्रीय अपराध से भी है। अमेरिका ने पाया है कि हांगकांग बैंक (एचएसबीसी) के जरिए भारत सहित दुनियाभर के देशों तक आतंकियों और ड्रग्स माफिया तक धन पहुंचा रहा है। ऊपरी सदन सीनेट उपसमिति के चेयरमैन सीनेटर कार्ल लेविन ने 340 पेज की रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि एचएसबीसी ने अपने अमेरिकी बैंक द्वारा खुद से जुड़े दूसरे देश के बैंकों के ग्राहकों को डॉलर अमेरिका भेजने में मदद की। बैंक ने सउदी अरब के अल रजही बैंक के साथ भी कारोबार किया। इस बैंक के मुख्य संस्थापक को पहले अलकायदा का संरक्षण मिला हुआ था। उसने सउदी अरब और बांग्लादेश के उन बैंकों के डॉलर और बैंकिंग सेवा प्रदान की जो आतंकियों को धन उपलब्ध कराने से जुड़ रहे हैं। बैंक पर सबसे पहले शक तब हुआ जब 2007-08 के दौरान मैक्सिको से जुड़े एचएसबीसी से एचएसबीसी-यूएस को 7 अरब डॉलर भेजे गए। दूसरे मैक्सिकन बैंकों से यह राशि दोगुनी से भी ज्यादा थी। इसमें बड़ा हिस्सा ड्रग्स तस्करी का था। जांच में यह बात सामने आई कि एचएसबीसी (लंदन स्थित हैडक्वाटर सहित) के जरिए मैक्सिको, 4सउदी अरब और बांग्लादेश से अरबों डॉलर का संदिग्ध धन अमेरिका आया। जनवरी 2009 में एचएसबीसी ने अपनी हांगकांग शाखा को डॉलर के अलावा रुपया, थाई और विदेशी मुद्रा अल रहजी को आपूर्ति करने का अधिकार दिया। 2010 में एचएसबीसी ने पैसा ट्रांसफर करने के लिए नई स्कीम `एचएसबीएल फास्ट कैश' लांच की। इस स्कीम के तहत सउदी अरब के रियाद से पाकिस्तान के सबसे बड़े बैंक हबीब की किसी भी शाखा में पैसा तुरन्त ट्रांसफर किया जा सकता था। इस स्कीम के तहत पैसा पाने या भेजने वाले का किसी भी बैंक में अकाउंट होना भी जरूरी नहीं था। अमेरिकी सरकार लम्बे समय से यह कोशिश कर रही है कि आतंकवादियों को मिलने वाले पैसे के स्रोत बन्द किए जाएं। इन स्रोतों में हवाला कारोबार जैसे गैर-कानूनी तंत्र हैं, साथ ही कुछ बैंक और कुछ देश भी दोषी हैं, जहां आर्थिक नियम ढीले हैं, टैक्स चोरों के लिए जिन देशों को स्वर्ग माना जाता है, उन देशों में जो कारोबार होता है, उसमें सिर्प टैक्स बचाने वाले उद्योगपति, हथियार सौदागर और बड़े व्यापारी ही नहीं होते, आतंकवादी और संगठित अपराधी भी होते हैं। यह माना जाता है कि दाउद इब्राहिम जैसे माफिया का पैसा इन्हीं रास्तों से भारत में आता है और कानूनी धंधों में उनका निवेश होकर वह सफेद हो जाता है। इसी तरह एचएसबीसी जैसे बैंकों के अधिकारी भी ज्यादा मुनाफे के लालच में आतंकवादियों और अपराधियों, माफिया द्वारा बैंक के गलत इस्तेमाल को अनदेखा कर देते हैं। अगर भारत को भी आतंकवाद और संगठित अपराध से प्रभावी ढंग से निपटना है तो जरूरी है कि ऐसे कदम अविलम्ब उठाए जाएं जिससे संदिग्ध और गैर-कानूनी कारोबार पर अंकुश लग सके। अमेरिकी सरकार अगर धमकाती है तो एचएसबीसी जैसे संगठन चुपचाप समर्पण कर देते हैं और माफी मांगने, सजा भुगतने व जरूरी एहतियाती कदम उठाने को तैयार हो जाते हैं, वहीं भारत सरकार किसी गलत कारोबार पर नकेल कसने की सोचती है तो उसे यह डर दिखाया जाता है कि इससे विदेशी निवेश घट जाएगा, अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में बदनामी होगी पर ऐसे कदम उठाने के लिए भारत सरकार को इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करना होगा जो अब तक तो नजर नहीं आया।
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Wednesday, 25 July 2012
Tuesday, 3 July 2012
बिना सरकार की मिलीभगत से कराची का कंट्रोल रूम नहीं बन सकता था
सउदी अरब का भारत को धन्यवाद करना चाहिए कि उसने हमको अबू जिंदाल जैसे खूंखार आतंकी को सौंपा। जिंदाल के ताजा कबूलनामे से भारत को मुम्बई हमले में पाकिस्तान का सीधा हाथ होने का सबूत मिला है। भारत हमेशा कहता रहा है कि 26/11 हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ है पर दुनिया मानने को तैयार नहीं थी। जिंदाल के बयानों से पता चलता है कि 26/11 के पीछे पूरी तरह पाक एजेंसियों को न केवल जिम्मेदारी सौंपी गई थी बल्कि उनके निर्देश में ही इस साजिश का ताना-बाना बुना गया। उल्लेखनीय है कि आतंकवाद और विशेषकर मुम्बई के 26/11 के हमले के मुद्दे पर भारत द्वारा अनेक बार सबूत सौंपे जाने के बाद भी पाकिस्तान उन्हें लगातार यह कहकर खारिज करता आ रहा है कि पुख्ता सबूत नहीं है। भारत ने शुक्रवार को कहा कि मुम्बई में 2008 के आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए आतंकवादियों को निर्देश देने के लिए पाकिस्तान के सरकारी तंत्र की मदद से बनाए गए जिस कराची नियंत्रण कक्ष में सैयद जबीउद्दीन अंसारी उर्प अबू जिंदाल था, वहां उसके साथ अन्य लोगों के अलावा लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक हाफिज सईद भी मौजूद था और यह बात और किसी ने नहीं बल्कि भारत के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कही। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा कि जिस कराची नियंत्रण कक्ष से जिंदाल मुम्बई में आतंकी हमला करने वाले दस आतंकवादियों को पल-पल निर्देश दे रहा था, बिना पाकिस्तान के सरकारी अमले के समर्थन के नियंत्रण कक्ष स्थापित ही नहीं किया जा सकता था। उन्होंने कहा कि जिस तरह भारत पाकिस्तान के पूर्व गृहमंत्री रहमान मलिक की इस बात से सहमत है कि जिंदाल भारतीय नागरिक है और वह कट्टरपंथी भी भारत में ही बना, उसी तरह पाकिस्तान को भी यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि जिंदाल वहां गया था, उस संगठन में शामिल रहा जिसने मुम्बई में हमला करने वाले आतंकवादियों को प्रशिक्षण दिया था। नियंत्रण कक्ष में बैठे हमले के मास्टर माइंडों में वह भी शामिल था। पाकिस्तान को यह भी स्वीकारना चाहिए कि जिंदाल को पाकिस्तान सरकार ने एक फर्जी पासपोर्ट जारी किया। जिंदाल के पास पाकिस्तान के दो पहचान पत्र भी थे। वह दावा करता है कि वह पाकिस्तानी है। पाकिस्तान में अबू जिंदाल को बहुत ही सुरक्षित पनाहगाह मिली हुई थी। अबू जिंदाल का पकड़ा जाना महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। वस्तुत जिंदाल से पूछताछ में मुम्बई आतंकी हमले से जुड़ी कई ऐसी जानकारियां मिल रही हैं जो अब तक जांच कार्य में एक प्रश्न बनी हुई थीं। इतना तो तय है कि जिंदाल लश्कर में महत्वपूर्ण व्यक्ति था। उसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी और वह जिम्मेदारी थी मुम्बई में आतंकी हमले को अंजाम देने वाले अजमल कसाब सहित दसों आतंकवादियों को हिन्दी सिखाना और प्रशिक्षित करना। उन्हें यह सिखाना कि मुम्बई वाले कैसे दिखते और बोलते हैं और किस तरह मुम्बईवासी की तरह दिखा जा सकता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस केस में भी पाकिस्तान सब आरोपों का खंडन कर अपने आपको पाक-साफ बताने का प्रयास करेगा पर जिंदाल की गिरफ्तारी और बयान और अजमल कसाब का हमारे हाथ में पहले से ही होना मुम्बई हमलों में पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेनकाब करने के लिए महत्वपूर्ण है।
Sunday, 1 July 2012
गिरफ्तार आतंकी अबू जिंदाल है अबू हमजा नहीं, दोनों अलग-अलग हैं
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के हत्थे चढ़ा आतंकी अबू जिंदाल भारत के लिए डेविड हेडली, तहव्वुर हुसैन राणा और अजमल कसाब से भी ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। कसाब को तो 26/11 की टेनिंग की जानकारी थी, हेडली और राणा को मुम्बई हमले की साजिश के बारे में ही पता था पर अबू जिंदाल ऐसा शख्स है जो 26/11 हमले की नहीं बल्कि देश में हुई कई आतंकी घटनाओं का चश्मदीद और कर्ताधर्ता रहा है। यहां यह बताना जरूरी है कि जिस आतंकी को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है वह अबू जिंदाल है, अबू हमजा नहीं है। यह दोनों अलग-अलग दो व्यक्ति हैं। भारत ने पाकिस्तान को आइना दिखाते हुए अबू हमजा के नाम पर बरगलाने की कोशिश पर विराम लगा दिया है। भारत का साफ कहना है कि अबू हमजा और अबू जिंदाल दोनों अलग-अलग हैं। भारत ने अबू जिंदाल को गिरफ्तार कर लिया है और पाकिस्तान को सौंपी गई मुख्य वांछितों की सूची में 40वें नम्बर वाला व्यक्ति अबू हमजा है। इसलिए वो अबू हमजा होने की बात कहकर पाकिस्तान भ्रम पैदा करने से बाज आए। 26/11 मुम्बई हमले के इकलौते जिन्दा आतंकी अजमल कसाब की सुरक्षा पर पहले से ही करोड़ों खर्च हो रहे हैं। अब अबू जिंदाल के पकड़े जाने की बड़ी कामयाबी के बाद सुरक्षा एजेंसियों को उसकी सिक्यूरिटी को लेकर चिन्ता सताने लगी है। खबर तो यह भी है कि लश्कर-ए-तैयबा दोनों कसाब और जिंदाल को मारने का प्रयास कर सकता है, क्योंकि दोनों 26/11 की सारी परतों से पर्दा हटा सकते हैं। फिलहाल जिंदाल दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की हिरासत में है। मगर अगले सप्ताह उसे मुम्बई पुलिस की हिरासत में भेजे जाने की सम्भावना है जहां उसे कड़ी पूछताछ के बाद आर्थर रोड जेल में भेजा जाएगा। यहां आतंक के गुरु-चेले का आमना-सामना होगा। आर्थर रोड जेल में पहले से बुलैट प्रूफ जेल में बन्द अजमल कसाब की सुरक्षा पर अब तक सरकार 36 करोड़ से अधिक खर्च कर चुकी है और यह खर्च अब भी जारी है। दरअसल मुम्बई हमले के पीछे आज तक पाकिस्तान किसी भी तरह की साजिश रचने या हाथ होने से इंकार करता रहा है। मगर अजमल कसाब का कबूलनामा पाकिस्तान की दोगली चाल का पर्दाफाश कर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर किरकिरी कर गया। मुम्बई हमले में सबसे अहम बड़ी कड़ी बने कसाब को सबूत के तौर पर सही सलामत रखना भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की मजबूरी बन चुकी है। वहीं अबू जिंदाल के पकड़े जाने पर एक और कड़ी जुड़ गई है। दोनों पर आतंकी खतरे को देखते हुए भारत सरकार किसी भी तरह की कोताही शायद ही बरतना चाहे। सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो लश्कर-ए-तैयबा इस फिराक में है कि या तो दोनों को किसी तरह छुड़ा लिया जाए या मार दिया जाए ताकि भारत सरकार के पास हमले से जुड़ा कोई पुख्ता गवाह न बचे। अबू जिंदाल से आजकल चल रही पूछताछ काफी अहम है। अबू की सुरक्षा के लिए अर्द्ध सैनिक बलों के 50 कमांडो तैनात किए गए हैं। स्पेशल सेल भी इसकी सुरक्षा में तैनात है। एनआईए व खुफिया एजेंसियों के लोग अब जिंदाल से पूछताछ कर रहे हैं। जिंदाल ने एक पाकिस्तानी युवती से औरंगाबाद में शादी की थी और औरंगाबाद में ही विस्फोटों के एक जखीरा बरामद होने के बाद 2006 में देश छोड़कर पहुंचे जिंदाल ने वहीं की ही एक युवती से शादी कर ली थी। उसका एक बच्चा भी है। वह युवती लश्कर से संबंध रखने वाले एक व्यक्ति की बेटी है। उसकी पत्नी और बच्चा अभी कराची में ही हैं। मराठी, उर्दू, हिन्दी व अरबी का ज्ञान रखने वाले अबू जिंदाल को कश्मीर से बीड़ पहुंचे एक व्यक्ति ने लश्कर-ए-तैयबा से जोड़ा था। गुजरात दंगों के बाद जेहादी बन चुके अबू जिंदाल ने लश्कर के आकाओं के सम्पर्प में आने के बाद उनके इशारों व हुकम पर कई आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम दिया।
Friday, 15 June 2012
हमने कतील को इसलिए मारा क्योंकि उसने गणपति मंदिर में बम रखा था
पुणे की यरवदा जेल में गत शुव््रावार को जेल के अन्दर ही इंडियन मुजाहिद्दीन के संदिग्ध आतंकवादी मोहम्मद कतील सिद्दीकी की हत्या कर दी गईं। सिद्दीकी जर्मन बेकरी कांड, चिन्ना स्वामी स्टेडियम सहित कईं आतंकी विस्फोटों का आरोपी था। कतील को शुव््रावार को ही अदालत में पेश किया जाना था। पुलिस के मुताबिक कतील की हत्या दो वैदियों—शरद मोहाले और आलोक भालेराव ने की। भालेराव ने इसे माना भी है। कतील सिद्दीकी की हत्या में अंडरवल्र्ड का हाथ माना जा रहा है। एटीएस के अधिकारी ने इस ओर इशारा भी किया है।
पुलिस अब अंडरवल्र्ड एंगल पर छानबीन कर रही है। सूत्रों के मुताबिक सम्भव है कि कतील सिद्दीकी की हत्या दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन में छिड़ी जंग का हिस्सा हो। सिद्दीकी की हत्या में कहा जा रहा है कि सम्भव है कि छोटा राजन का हाथ हो। ज्ञात रहे कि 1993 में मुंबईं सीरियल धमाकों के बाद दाऊद और छोटा राजन अलग-अलग हो गए थे और दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए। दाऊद इब्राहिम अब पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईंएसआईं से पूरी तरह मिल चुका है और दोनों मिलकर भारत पर हमले करवा रहे हैं। छोटा राजन के चेले भारत नेपाली, विजय शेट्टी और रवि पुजारी जिन्होंने अपने गैंग बना लिए हैं, अब दाऊद के गुर्गो को निशाना बना रहे हैं। सूत्रों के अनुसार शरद मोहाले और आलोक भालेराव ने पूछताछ के दौरान पुलिस को बताया है कि उन्होंने सिद्दीकी का कत्ल इसलिए किया क्योंकि सिद्दीकी ने उनके भगवान गणपति के मंदिर को उड़ाने की कोशिश की थी और वह देशद्रोही गतिविधियों में शामिल था। हालांकि अभी तक वुछ दावे से तो नहीं कहा जा सकता कि हत्या क्यों हुईं पर इतना तय लगता है कि यह अंडरवल्र्ड जंग का एक हिस्सा जरूर है। सम्भव है कि सिद्दीकी को जेल में मारने की किसी ने सुपारी दी हो। चूंकि दोनों वैदी पहले से ही यरवदा जेल में थे इसलिए उन्हें जेल की गतिविधियों के बारे में सब वुछ मालूम था। कतील के परिवार वाले इस हत्या की सीबीआईं जांच की मांग कर रहे हैं। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि वह इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में अजा लगा सकते हैं। मारा गया कतील सिद्दीकी आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने से पहले एक प्लम्बर यानी नल को ठीक करने का काम करता था। उसने दिल्ली पुलिस द्वारा वुछ समय पहले गिरफ्तार होने पर बताया था कि वह लालगंज दरभंगा का रहने वाला है। उसने बताया कि उसका 2008 में दिल्ली में इमरान उर्प शाहरुख, हबीब उर्प इकबाल भट्टकल, शाहिद उर्प रियाज भट्टकल से सम्पर्व हुआ। यह लोग बटला हाउस मुठभेड़ और मुसलमानों से हो रहे अत्याचार की बातें करते रहते थे। इसी वजह से मैंने इंडियन मुजाहिद्दीन में शामिल होने का पैसला किया। अक्तूबर 2009 को मैं कोलकाता गया और वहां से पाकिस्तान जाने का कार्यंव््राम था। उसने जर्मन बेकरी की फरवरी 2010 में जाकर रेकी करना कबूल किया था। इसके अलावा दागदू राधे गणेश मंदिर में जाकर एक बैग रखा जिसमें बम था पर मुझे बैग रखते वुछ भक्तों ने देख लिया इसलिए हम विस्फोट नहीं कर पाए। उसने चिन्ना स्वामी स्टेडियम में बम रखने की बात भी स्वीकार की थी। बम रखने के बाद वह दरभंगा भाग गया था।
Thursday, 14 June 2012
पेनेटा की चेतावनी से बौखलाया पाकिस्तान
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 14 June 2012
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान को दी गई अब तक की सबसे सख्त चेतावनी में अमेरिका ने गत गुरुवार को कहा कि पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों और खासकर खूंखार हक्कानी नेटवर्प को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया कराए जाने की वजह से उसका धैर्य जवाब देने की सीमा तक पहुंच गया है। यह चेतावनी अमेरिकी रक्षा मंत्री लियोन पेनेटा ने दी, जो अफगानिस्तान की अघोषित यात्रा पर पहुंचे। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में तब तक शांति हासिल करना मुश्किल है जब तक पाकिस्तान में सुरक्षित पनाहगाह रहेंगे। हक्कानी नेटवर्प को निशाना बनाते हुए पेनेटा ने कहा यह बढ़ी हुई चिंता का विषय है कि सीमा के उस पार हक्कानी नेटवर्प का सुरक्षित पनाहगाह अब भी है। पाकिस्तान को सीमा के इस पार हमारे सुरक्षा बलों पर हमले करने वाले आतंकवादियों पर कार्रवाई करनी है। पेनेटा ने अपनी एशिया यात्रा के अंतिम चरण में अफगानिस्तान की यात्रा की। अपनी यात्रा के तहत पेनेटा ने वियतनाम से लेकर भारत तक की यात्रा की लेकिन उन्होंने पाकिस्तान की यात्रा नहीं की। यह दोनों देशों के बीच बढ़ता तनाव और तल्खी का स्पष्ट संकेत है। पेनेटा ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादियों के खिलाफ ड्रोन हमले जारी रहेंगे। पेनेटा की इस चेतावनी की पाकिस्तान में भयंकर पतिकिया हुई है। वाशिंगटन में पाकिस्तानी राजदूत शेरी रहमान ने कहा कि पेनेटा की टिप्पणी से द्विपक्षीय मतभेदों को दूर करने की संभावना कम होगी। शेरी ने कहा कि अमेरिकी पशासन की ओर से इस तरह के सार्वजनिक बयान को पाकिस्तान ने बहुत गंभीरता से लिया है। उन्होंने कहा कि इससे संबंधों को सुधारने की पूरी पकिया में ऐसा मोड़ आएगा जिससे गतिरोध खत्म करने के पयास में लगे लोगों के पास मामूली मौका बचेगा। पाकिस्तान की बौखलाहट का इसी से पता चलता है कि अखबार डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा है कि अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों में पैबंद लगाने की कवायदें जारी हैं पर इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी रक्षा मंत्री लियोन पेनेटा के उन भड़काऊ बयानों को सही ठहराया जाए, जो उन्होंने हाल ही में पाकिस्तान के मामले में दूसरे मुल्कों की राजधानियों में दिए हैं। उन्होंने काबुल में कहा कि अमेरिका अब अपने सब्र की हद तक पहुंच गया है। वहीं नई दिल्ली वह माकूल जगह नहीं थी जहां अमेरिका-पाकिस्तान तनाव पर खुलकर चर्चा होती या ऑपरेशन ओसामा की जानकारी पाकिस्तान से छिपाने पर कोई मजाक किया जाए। वह भी तब, जब हिन्दुस्तान को एशिया में नई अमेरिकी फौजी कूटनीति का अहम साझीदार बताया जा रहा है। पेनेटा ने जिस तरह के अलफाज इस्तेमाल किए और इसके लिए जिन ठिकानों को चुना, उनसे हमारी फौज में अमेरिका के खिलाफ तल्खी बढ़ेगी। गलत जगह पर पेनेटा के गलत बयानों ने कट्टरपंथी जमातों में हिन्दुस्तानी-अमेरिकी मुखालफत ने चिंगारी का काम किया है। अमेरिकी अब पाकिस्तान के अंदर छिपे आतंकवादियों और उनके ठिकानों पर ड्रोन हमले करने लगे हैं। जून महीने के पहले सप्ताह में अमेरिका ने तीन ड्रोन हमले किए। इनमें एक में अलकायदा का दूसरे नंबर का सरगना अल लिबी मारा गया। पेनेटा की स्पष्ट चेतावनी के बाद पाकिस्तान के अंदर ड्रोन हमले और तेज होंगे और अमेरिका की बौखलाहट बढ़ेगी। राष्ट्रपति बराक ओबामा इस समय दोहरे दबाव में हैं। एक तरफ तो उन्हें अफगानिस्तान से 2014 तक अमेरिकी सैनिक बलों को हटाना है और दूसरी तरफ ओबामा को दोबारा राष्ट्रपति चुनाव जीतना है। इन वजहों से आने वाले महीनों में अमेरिकी कार्रवाई तेज होगी। पाकिस्तान के लिए यह चुनौतीपूर्ण दौर होगा। वह इस बढ़ते तनाव को कैसे हैंडल करता है यह तो समय ही बताएगा।America, Anil Narendra, Daily Pratap, Pakistan, Terrorist, USA, Vir Arjun
Sunday, 10 June 2012
Laden informer sentenced to 33 years of jail
Anil Narendra
Recently, a Pakistani Court convicted Dr Shakeel Afridi of treason and sentenced him to 33 years of jail. He was the person, who had helped US intelligence agency CIA in locating and killing Al Qaeda Chief Osama bin Laden. We were shocked to hear about this decision of the Court and found it very strange. Mutahir Zeb Khan, the Political Representative of the Khyber tribal area, told the Pak newspaper Dawn that Shakeel was produced before a four-member tribal Court, which sentenced him to 33 years of imprisonment and a fine of Rs 32 lakh. Later, Shakeel was sent to Peshawar Central Jail. Instead of Pakistan criminal code, Shakeel was tried under the Pontier Crime Regulation Act of British era. Under the Act, there is no provision of capital punishment for treason. Dr Shakeel had carried out an immunization programme under the directions of the CIA to enable them to collect blood samples of Osama and his family members. It was on the basis of the evidence thus collected that US was able to kill Osama bin Laden in a raid in May, last year. This action by Pakistan has once again proved that Pakistan is not sincere in his fight against terrorism. It also proves that in the heart of the hearts, Pakistan is sympathetic towards terrorists of all hues, whether they are from al Qaeda or from LeT, and maintains contact with them. Pakistan is bent upon to take revenge on all persons, who had been helpful in eliminating the most wanted terrorist of the world. Perhaps, Dr Shakeel would have been honoured in other parts of the world for his daring act, but in Pakistan, he is being considered as a traitor, who has helped a foreign intelligence agency against national interests. If this episode reveals the double game of Pakistan, then it has also created embarrassment for US, who failed to protect its 'source' or the informer. This episode will further add to the deterioration of relations between Pakistan and US. The US Secretary of State, Hillary Clinton had called this decision as unjust and un-called for. Meanwhile, a Panel of the US Senate has also reduced the aid being given to Islamabad. Hillary said that injustice had been done to Afridi. She regretted his conviction. He had provided invaluable help, on the basis of which one of the most notorious killers of the world could be eliminated. It was, in fact, in the interest of Pakistan, in the interest of the US and in the interest of the whole world. Meanwhile, PPP Chief Bilawal Bhutto has said that extending cooperation to any foreign intelligence agency is against the laws of any country. In a case for spying for Israel, US had sentenced life imprisonment. Ours is an independent Judiciary, which was restored by the PPP. A new chapter has been added in the deteriorating relations between Pakistan and US. We think this action by Pakistan will enhance the morale of terrorists.
Saturday, 9 June 2012
आतंकी साए और प्राकृतिक आपदाओं के बीच अमरनाथ यात्रा
हर साल की तरह एक बार फिर अमरनाथ यात्रा आतंकियों के निशाने पर है। हमारे सुरक्षा बलों ने कुछ संदेश सरहद के उस पार से सुने हैं जिनमें कहा गया है कि आतंकी यात्रा को निशाना बनाने की तैयारी में हैं। चिन्ता की बड़ी वजह यह भी है कि ओसामा बिन लादेन और अब लिबी की हत्या के बाद कश्मीर में आतंकी गतिविधियां तेज होने की चेतावनी मिली है पर बाबा अमरनाथ के भक्तों पर इन धमकियों का कोई असर नहीं पड़ा है। यही कारण है कि एक माह में पंजीकरण कराने वालों ने सवा तीन लाख का आंकड़ा पार कर लिया है। सुरक्षा एजेंसियां इस बात की पुष्टि कर रही हैं कि जिन 30 से 40 आतंकियों के इस ओर घुस पाने की पुष्टि हुई है उनका मुख्य निशाना यात्रा है पर बावजूद इसके यात्रा में शामिल होने वाले भक्तों में कोई कमी नहीं आई। हालांकि आतंकी धमकियों को बिल्कुल नजरंदाज भी नहीं किया जा सकता है। वर्ष 1993 की अमरनाथ यात्रा उन लोगों को अभी भी याद है जिन्होंने पहली बार इस यात्रा पर लगे प्रतिबंध के बाद `हरकतुल अंसार' के हमलों को सहन किया था। तब तीन श्रद्धालुओं की जानें गई थीं। पहले हमले के 10 सालों बाद हुए भीषण हमले में 11 भक्तों की मौत हुई थी। इन 10 साल में कोई भी साल ऐसा नहीं बीता था जब आतंकी हमलों और मौतों से अमरनाथ यात्रा चर्चा में न आई हो लेकिन बावजूद इसके यात्रा आज भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। सुरक्षा बल यात्रा को हर हाल में महफूज बनाने में जुट गए हैं। राज्य सरकार और प्रशासन के लिए यह किसी चुनौती से कम इसलिए नहीं है कि वर्ष 1993 के बाद के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि शायद ही कोई साल ऐसा रहा हो जब आतंकी हमले में श्रद्धालुओं की मौतें न हुई हों और जो वर्ष बचा वह प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ गया। अर्थात् अगर आतंकवादियों के हाथों से बच गए तो कुदरत के हाथों से नहीं बच सके। सुरक्षा बलों के लिए चुनौती पहले से कहीं ज्यादा हो गई है। पहले यात्रियों की संख्या बमुश्किल 54 हजार के आंकड़े को ही पार कर पाती थी। मगर 1993 के प्रथम आतंकी प्रतिबंध ने लोगों को इसकी ओर आकर्षित होने पर मजबूर कर दिया। नतीजा वर्ष 1993 से वर्ष 2002 की यात्रा का औसत भाग लेने वालों का आंकड़ा दो लाख का रहा है। जैसे-जैसे अमरनाथ यात्रा पर प्रतिबंध और हमले बढ़ते रहे यात्रा में शामिल होने वाले भक्तों की संख्या में भी इजाफा होता गया। असल में कई धार्मिक संगठनों ने भी इसे एक चुनौती के रूप में लेते हुए हजारों लोगों को शामिल होने की अपीलें कीं। यही कारण था कि वर्ष 1996 में जब बजरंग दल के 50 हजार के करीब सदस्य अमरनाथ यात्रा में हिस्सा लेने पहुंचे तो सारी व्यवस्थाएं चरमरा गईं और प्राकृतिक आपदा ने भी यात्रा को घेर लिया। तीन सौ के करीब श्रद्धालु प्राकृतिक आपदा के शिकार हुए। बाबा अमरनाथ यात्रा का एक रोचक तथ्य यह रहा है कि यह यात्रा आतंकी हमलों के कारण ही आकर्षण का केंद्र बनी थी अगर आतंकी हमलों में मरने वालों की संख्या इतनी नहीं थी जितनी प्राकृतिक आपदा में मारे गए। हम उम्मीद करते हैं कि सारे विवादों के बावजूद इस साल की यात्रा सुखद रहेगी और सुरक्षित भी। जय बाबा अमरनाथ। हर-हर महादेव।
Amarnath Yatra, Anil Narendra, Daily Pratap, Jammu Kashmir, Terrorist, Vir Arjun
Amarnath Yatra, Anil Narendra, Daily Pratap, Jammu Kashmir, Terrorist, Vir Arjun
Friday, 1 June 2012
लादेन की खबर देने वाले डा. अफरीदी को 33 साल कैद
गत दिनों अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराने के अभियान में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का साथ देने वाले पाकिस्तानी डा. शकील अफरीदी को एक अदालत ने देशद्रोही करार देते हुए 33 साल की कैद की सजा सुना दी। हमें यह फैसला सुनकर आश्चर्य भी हुआ और अजीबोगरीब भी लगा। खैबर कबाइली क्षेत्र के राजनीतिक पतिनिधि मुताहिर जेबखान ने पाकिस्तानी अखबार `डान' को बताया कि शकील को चार सदस्यीय कबाइली अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें 33 साल की कैद और 3.2 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। सजा सुनाए जाने के बाद शकील को पेशावर स्थित केन्द्राrय कारागार भेज दिया गया। शकील को पाकिस्तान अपराध संहिता की बजाए ब्रिटिश कालीन कानून, पंटियर काइम रेगुलेशन एक्ट के तहत दोषी करार दिया गया। इस एक्ट के तहत राजद्रोह के मामले में मौत की सजा का पावधान नहीं है। डा. शकील ने सीआईए के निर्देश पर एबटाबाद में एक टीका अभियान चलाया था, ताकि इसकी मदद से ओसामा और उसके परिवार के सदस्यों के डीएनए नमूने लिए जा सकें। अभियान से मिले सबूतों के आधार पर ही अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के खिलाफ बीते मई महीने में कार्रवाई कर उसे मार गिराया था। पाकिस्तान द्वारा उठाए गए इस कदम से यह फिर साबित हो जाता है कि पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने के पति गंभीर नहीं है। यह भी साबित होता है कि अंदरखाते पाकिस्तान हर वर्ग के आतंकवादी चाहे वह अलकायदा से हो या फिर लश्कर से हो, संबंध और सहानुभूति रखता है। पाकिस्तान उस आदमी से बदला ले रहा है जिसने दुनिया के मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट को खत्म करने में मदद की थी। दुनिया के किसी और कोने में शायद डा. अफरीदी का सम्मान किया जाता पर पाकिस्तान में वह एक देशद्रोही है जिसने देश के खिलाफ एक विदेशी खुफिया एजेंसी की मदद की। अगर पाकिस्तान की डबल गेम इस किस्से से एक्सपोज होती है तो अमेरिका पर भी सवाल उठते हैं कि वह अपने `सोर्स' यानि मुखबिर को बचा नहीं पाया। इस किस्से से पाकिस्तान और अमेरिकी रिश्तों में और तनाव बढ़ेगा। अमेरिका की विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने फैसले को अन्यायपूर्ण तथा अवांछित बताया। साथ ही अमेरिकी सीनेट के एक पैनल ने इस्लामाबाद को दी जाने वाली सहायता में कटौती भी कर दी। हिलेरी ने कहा कि अफरीदी के साथ जो किया गया है वह अन्यायपूर्ण है। उन्हें दोषी ठहराए जाने पर अफसोस है। उन्होंने जो मदद की वह दुनिया के सर्वाधिक कुख्यात हत्यारों में से एक का खात्मा करने में कारगर रही। यह स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के, हमारे और पूरी दुनिया के हित में था। दूसरी ओर पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने कहा कि विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ सहयोग करना किसी भी देश के कानून के खिलाफ है। अमेरिका में इजराइल के लिए जासूसी करने पर उम्रकैद की सजा दी गई। हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका है जिसे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने बहाल किया है। पाकिस्तान और अमेरिका के पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में यह एक और अध्याय जुड़ गया है। हमारी राय में पाकिस्तान का यह कदम आतंकवादियों के उत्साह को बढ़ाने वाला है।
Tuesday, 15 May 2012
पाकिस्तान आतंकवाद जवाबदेही अधिनियम-2012
अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में दरार बढ़ती जा रही है। अमेरिका पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान के खिलाफ वह हथियार इस्तेमाल करना चाह रहा है जिससे पाकिस्तान को तकलीफ हो, पाकिस्तान को चुभे। यह है डॉलर। अब अमेरिका पाकिस्तान पर डॉलर के माध्यम से कंट्रोल करना चाहता है। अमेरिका एक नया कानून ला रहा है। इसके तहत किसी अमेरिकी की मौत में पाक स्थित आतंकी संगठनों या खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ होने पर अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक मदद में कटौती होगी। प्रति अमेरिकी नागरिक की कीमत 5 करोड़ डॉलर (करीब 250 करोड़ रुपये) की कटौती का प्रस्ताव है। अमेरिका के किसी भी नागरिक की अगर आतंकी हमले में मौत हो जाती है तो पाकिस्तान को 5 करोड़ डॉलर का हर्जाना भरना पड़ सकता है। यह राशि अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता से काटी जाएगी। अमेरिकी कांग्रेस में पेश एक विधेयक में यह प्रस्ताव किया गया है। अमेरिकी कांग्रेस सदस्य वाना राहेराबेकर की ओर से यह बिल पेश किया गया है। इसे पाकिस्तान आतंकवाद जवाबदेही अधिनियम-2012 का नाम दिया गया है। विधेयक में कहा गया है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के आतंकवादियों के समूहों से गहरे रिश्ते हैं। पाक आधारित आतंकी संगठन अमेरिकी नागरिकों की हत्या कर रहे हैं। अमेरिका के हर नागरिक की हत्या के बदले पाकिस्तान की सहायता राशि से काटे जाने वाली रकम संबंधित पीड़ित परिवार को दी जाएगी। बिल पेश करते हुए राहेराबेकर ने कहा कि पाकिस्तान ने दशकों से आतंकवादियों का समर्थन किया है। पाक की मदद पर ही इन आतंकियों की भारत और अफगानिस्तान पर हमला करने की हिम्मत होती है। बिल के तहत अमेरिकी रक्षा विभाग को अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मारे जाने वाले उन नागरिकों की सूची तैयार करनी होगी जिनकी मौत में पाक के आतंकी संगठन या आईएसआई का हाथ साबित होगा। राहेराबेकर ने कहा कि अमेरिका बहुत लम्बे समय से पाकिस्तान की आर्थिक मदद कर रहा है। इसके बावजूद आतंकी संगठनों को पाक की मदद जारी है। उनकी खुफिया एजेंसियों ने लादेन को हमसे छिपाकर रखा, लेकिन अब इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। ऐसे ही आरोपों के बीच 2011 के अन्त में अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद में से 70 करोड़ डॉलर (37.48 अरब रुपये) की कटौती कर दी थी। अमेरिकी ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के पूर्व अध्यक्ष माइक मुलेन ने हाल में दावा किया कि सितम्बर 2011 में आईएसआई के कहने पर हक्कानी नेटवर्प ने अफगानिस्तान में अमेरिकी दूतावास को निशाना बनाया था। जून 2011 में काबुल स्थित इंटर कांटिनेंटल होटल पर आतंकी हमले के पीछे भी आईएसआई का हाथ था। अमेरिका लगातार पाकिस्तान पर ड्रोन हमले कर रहा है। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इसका कड़ा विरोध किया पर अमेरिका इसे रोकने पर तैयार नहीं है। उधर पाकिस्तान ने अपनी सरजमीं के जरिये अफगानिस्तान में नॉटो बलों के लिए जरूरी सामान भेजने वाले ट्रकों पर रोक लगा दी है। अब पाकिस्तानी अधिकारियों ने सामान भेजने वाले हर ट्रक और कनटेनर पर 1100 अमेरिकी डॉलर वसूलने की पेशकश की है। बीते नवम्बर महीने में नॉटो की ओर से किए गए हवाई हमलों में दर्जनों पाकिस्तानी सैनिकों की मौत के बाद आपूर्ति के रास्ते बन्द कर दिए गए थे। भारत की बात की एक तरह पुष्टि हुई है। भारत हमेशा से कहता रहा है कि पाक सरकार, सेना अमेरिकी आर्थिक मदद का दुरुपयोग कर रहा है। वह इन पैसों को अपने आतंकी ढांचे को मजबूत करने में लगा रहा है। इस पैसे से वह आतंकी संगठनों को मदद करता है और उनके निशाने पर भारत, अफगानिस्तान और खुद अमेरिका है। अगर यह विधेयक पारित होता है और अमेरिका अपने इरादों पर अडिग रहता है तो निश्चित रूप से पाकिस्तानी टेरर नेटवर्प की कमर टूटेगी पर अकसर देखा गया है कि अमेरिका धमकी तो दे देता है पर जब अमल की बारी आती है तो बहाने बनाकर निकलने का प्रयास करता है। देखें पाकिस्तान इस ताजे प्रस्ताव पर क्या प्रतिक्रिया देता है?
अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में दरार बढ़ती जा रही है। अमेरिका पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान के खिलाफ वह हथियार इस्तेमाल करना चाह रहा है जिससे पाकिस्तान को तकलीफ हो, पाकिस्तान को चुभे। यह है डॉलर। अब अमेरिका पाकिस्तान पर डॉलर के माध्यम से कंट्रोल करना चाहता है। अमेरिका एक नया कानून ला रहा है। इसके तहत किसी अमेरिकी की मौत में पाक स्थित आतंकी संगठनों या खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ होने पर अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक मदद में कटौती होगी। प्रति अमेरिकी नागरिक की कीमत 5 करोड़ डॉलर (करीब 250 करोड़ रुपये) की कटौती का प्रस्ताव है। अमेरिका के किसी भी नागरिक की अगर आतंकी हमले में मौत हो जाती है तो पाकिस्तान को 5 करोड़ डॉलर का हर्जाना भरना पड़ सकता है। यह राशि अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता से काटी जाएगी। अमेरिकी कांग्रेस में पेश एक विधेयक में यह प्रस्ताव किया गया है। अमेरिकी कांग्रेस सदस्य वाना राहेराबेकर की ओर से यह बिल पेश किया गया है। इसे पाकिस्तान आतंकवाद जवाबदेही अधिनियम-2012 का नाम दिया गया है। विधेयक में कहा गया है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के आतंकवादियों के समूहों से गहरे रिश्ते हैं। पाक आधारित आतंकी संगठन अमेरिकी नागरिकों की हत्या कर रहे हैं। अमेरिका के हर नागरिक की हत्या के बदले पाकिस्तान की सहायता राशि से काटे जाने वाली रकम संबंधित पीड़ित परिवार को दी जाएगी। बिल पेश करते हुए राहेराबेकर ने कहा कि पाकिस्तान ने दशकों से आतंकवादियों का समर्थन किया है। पाक की मदद पर ही इन आतंकियों की भारत और अफगानिस्तान पर हमला करने की हिम्मत होती है। बिल के तहत अमेरिकी रक्षा विभाग को अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मारे जाने वाले उन नागरिकों की सूची तैयार करनी होगी जिनकी मौत में पाक के आतंकी संगठन या आईएसआई का हाथ साबित होगा। राहेराबेकर ने कहा कि अमेरिका बहुत लम्बे समय से पाकिस्तान की आर्थिक मदद कर रहा है। इसके बावजूद आतंकी संगठनों को पाक की मदद जारी है। उनकी खुफिया एजेंसियों ने लादेन को हमसे छिपाकर रखा, लेकिन अब इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। ऐसे ही आरोपों के बीच 2011 के अन्त में अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद में से 70 करोड़ डॉलर (37.48 अरब रुपये) की कटौती कर दी थी। अमेरिकी ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के पूर्व अध्यक्ष माइक मुलेन ने हाल में दावा किया कि सितम्बर 2011 में आईएसआई के कहने पर हक्कानी नेटवर्प ने अफगानिस्तान में अमेरिकी दूतावास को निशाना बनाया था। जून 2011 में काबुल स्थित इंटर कांटिनेंटल होटल पर आतंकी हमले के पीछे भी आईएसआई का हाथ था। अमेरिका लगातार पाकिस्तान पर ड्रोन हमले कर रहा है। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इसका कड़ा विरोध किया पर अमेरिका इसे रोकने पर तैयार नहीं है। उधर पाकिस्तान ने अपनी सरजमीं के जरिये अफगानिस्तान में नॉटो बलों के लिए जरूरी सामान भेजने वाले ट्रकों पर रोक लगा दी है। अब पाकिस्तानी अधिकारियों ने सामान भेजने वाले हर ट्रक और कनटेनर पर 1100 अमेरिकी डॉलर वसूलने की पेशकश की है। बीते नवम्बर महीने में नॉटो की ओर से किए गए हवाई हमलों में दर्जनों पाकिस्तानी सैनिकों की मौत के बाद आपूर्ति के रास्ते बन्द कर दिए गए थे। भारत की बात की एक तरह पुष्टि हुई है। भारत हमेशा से कहता रहा है कि पाक सरकार, सेना अमेरिकी आर्थिक मदद का दुरुपयोग कर रहा है। वह इन पैसों को अपने आतंकी ढांचे को मजबूत करने में लगा रहा है। इस पैसे से वह आतंकी संगठनों को मदद करता है और उनके निशाने पर भारत, अफगानिस्तान और खुद अमेरिका है। अगर यह विधेयक पारित होता है और अमेरिका अपने इरादों पर अडिग रहता है तो निश्चित रूप से पाकिस्तानी टेरर नेटवर्प की कमर टूटेगी पर अकसर देखा गया है कि अमेरिका धमकी तो दे देता है पर जब अमल की बारी आती है तो बहाने बनाकर निकलने का प्रयास करता है। देखें पाकिस्तान इस ताजे प्रस्ताव पर क्या प्रतिक्रिया देता है?
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अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में दरार बढ़ती जा रही है। अमेरिका पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान के खिलाफ वह हथियार इस्तेमाल करना चाह रहा है जिससे पाकिस्तान को तकलीफ हो, पाकिस्तान को चुभे। यह है डॉलर। अब अमेरिका पाकिस्तान पर डॉलर के माध्यम से कंट्रोल करना चाहता है। अमेरिका एक नया कानून ला रहा है। इसके तहत किसी अमेरिकी की मौत में पाक स्थित आतंकी संगठनों या खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ होने पर अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक मदद में कटौती होगी। प्रति अमेरिकी नागरिक की कीमत 5 करोड़ डॉलर (करीब 250 करोड़ रुपये) की कटौती का प्रस्ताव है। अमेरिका के किसी भी नागरिक की अगर आतंकी हमले में मौत हो जाती है तो पाकिस्तान को 5 करोड़ डॉलर का हर्जाना भरना पड़ सकता है। यह राशि अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता से काटी जाएगी। अमेरिकी कांग्रेस में पेश एक विधेयक में यह प्रस्ताव किया गया है। अमेरिकी कांग्रेस सदस्य वाना राहेराबेकर की ओर से यह बिल पेश किया गया है। इसे पाकिस्तान आतंकवाद जवाबदेही अधिनियम-2012 का नाम दिया गया है। विधेयक में कहा गया है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के आतंकवादियों के समूहों से गहरे रिश्ते हैं। पाक आधारित आतंकी संगठन अमेरिकी नागरिकों की हत्या कर रहे हैं। अमेरिका के हर नागरिक की हत्या के बदले पाकिस्तान की सहायता राशि से काटे जाने वाली रकम संबंधित पीड़ित परिवार को दी जाएगी। बिल पेश करते हुए राहेराबेकर ने कहा कि पाकिस्तान ने दशकों से आतंकवादियों का समर्थन किया है। पाक की मदद पर ही इन आतंकियों की भारत और अफगानिस्तान पर हमला करने की हिम्मत होती है। बिल के तहत अमेरिकी रक्षा विभाग को अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मारे जाने वाले उन नागरिकों की सूची तैयार करनी होगी जिनकी मौत में पाक के आतंकी संगठन या आईएसआई का हाथ साबित होगा। राहेराबेकर ने कहा कि अमेरिका बहुत लम्बे समय से पाकिस्तान की आर्थिक मदद कर रहा है। इसके बावजूद आतंकी संगठनों को पाक की मदद जारी है। उनकी खुफिया एजेंसियों ने लादेन को हमसे छिपाकर रखा, लेकिन अब इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। ऐसे ही आरोपों के बीच 2011 के अन्त में अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद में से 70 करोड़ डॉलर (37.48 अरब रुपये) की कटौती कर दी थी। अमेरिकी ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के पूर्व अध्यक्ष माइक मुलेन ने हाल में दावा किया कि सितम्बर 2011 में आईएसआई के कहने पर हक्कानी नेटवर्प ने अफगानिस्तान में अमेरिकी दूतावास को निशाना बनाया था। जून 2011 में काबुल स्थित इंटर कांटिनेंटल होटल पर आतंकी हमले के पीछे भी आईएसआई का हाथ था। अमेरिका लगातार पाकिस्तान पर ड्रोन हमले कर रहा है। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इसका कड़ा विरोध किया पर अमेरिका इसे रोकने पर तैयार नहीं है। उधर पाकिस्तान ने अपनी सरजमीं के जरिये अफगानिस्तान में नॉटो बलों के लिए जरूरी सामान भेजने वाले ट्रकों पर रोक लगा दी है। अब पाकिस्तानी अधिकारियों ने सामान भेजने वाले हर ट्रक और कनटेनर पर 1100 अमेरिकी डॉलर वसूलने की पेशकश की है। बीते नवम्बर महीने में नॉटो की ओर से किए गए हवाई हमलों में दर्जनों पाकिस्तानी सैनिकों की मौत के बाद आपूर्ति के रास्ते बन्द कर दिए गए थे। भारत की बात की एक तरह पुष्टि हुई है। भारत हमेशा से कहता रहा है कि पाक सरकार, सेना अमेरिकी आर्थिक मदद का दुरुपयोग कर रहा है। वह इन पैसों को अपने आतंकी ढांचे को मजबूत करने में लगा रहा है। इस पैसे से वह आतंकी संगठनों को मदद करता है और उनके निशाने पर भारत, अफगानिस्तान और खुद अमेरिका है। अगर यह विधेयक पारित होता है और अमेरिका अपने इरादों पर अडिग रहता है तो निश्चित रूप से पाकिस्तानी टेरर नेटवर्प की कमर टूटेगी पर अकसर देखा गया है कि अमेरिका धमकी तो दे देता है पर जब अमल की बारी आती है तो बहाने बनाकर निकलने का प्रयास करता है। देखें पाकिस्तान इस ताजे प्रस्ताव पर क्या प्रतिक्रिया देता है?
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Saturday, 7 April 2012
नौटंकीबाज पाकिस्तान
जब मैंने यह खबर पढ़ी कि पाकिस्तान की एक अदालत ने अलकायदा के पूर्व सरगना ओसामा बिन लादेन के परिवार के 14 सदस्यों को 9 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया क्योंकि उन पर आरोप है कि वह गैर कानूनी तरीके से पाक आए और रहे तो मुझे हंसी आ गई। पाकिस्तान को नौटंकी करने की आदत-सी बन गई है। बिन लादेन की तीन बीवियों और दो बेटियों को औपचारिक रूप से 3 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। तीन बीवियों में से सबसे छोटी अमाल अबदल फतेह यमन की और बाकी दो सऊदी अरब की निवासी हैं। पिछले साल 2 मई को एबटाबाद में अमेरिकी कमांडोज ने लादेन को मार दिया था, इन्हें वहीं से पकड़ा गया था। अब यह किसी से छिपा नहीं कि ओसामा बिन लादेन वर्षों से पाकिस्तान में रह रहा था और उसका सीधा सम्पर्प पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ बना हुआ था। ब्रिटेन के अखबार द टेलीग्रॉफ ने दोबारा सक्रिय हुई खोजी इंटरनेट वेबसाइट विकीलीक्स द्वारा प्रकाशित किए गए 50 लाख नए दस्तावेज से इसकी पुष्टि की है। इन दस्तावेजों में बताया गया है कि आईएसआई के कम से कम 12 अधिकारियों को लादेन के एबटाबाद स्थित सुरक्षित ठिकाने में छिपे होने की जानकारी थी। खबर तो यह भी आई है कि अपनी मौत से पहले ओसामा एबटाबाद के जिस मकान में रह रहा था, उसे बनवाने के लिए आईएसआई ने खासतौर पर एक आर्पिटेक्ट नियुक्त किया था। अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने खुफिया सूत्र के हवाले से लिखा है कि लादेन के इस ठिकाने पर लश्कर-ए-तोयबा के लोग भी आते-जाते रहते थे। रिपोर्ट में लिखा है कि पाकिस्तान की सैन्य अकादमी के पास बने लादेन के एबटाबाद स्थित ठिकाने के असली दस्तावेज तो गायब हो गए हैं लेकिन इसके आर्पिटेक्ट को आईएसआई ने नियमित तौर पर नियुक्त किया था। आर्पिटेक्ट को यह कहकर नियुक्त किया गया था कि एक उच्चपदस्थ अतिविशिष्ट व्यक्ति इस मकान में रहने आ रहा है। यही नहीं, ओसामा बिन लादेन एबटाबाद में अपने चार बच्चों के साथ रहता था और उसके इनमें से दो बच्चों का जन्म एबटाबाद के सरकारी अस्पताल में हुआ था और फिर भी पाकिस्तान यह दावा करे कि उसे ओसामा के पाकिस्तान में रहने की जानकारी नहीं यह हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? यह किसको बेवकूफ बना रहे हैं? आज तक पाकिस्तान ने किसी भी बात को कबूला है? यह तो दाऊद इब्राहिम को भी नहीं जानते। बार-बार यही कहते हैं कि दाऊद पाकिस्तान में नहीं जबकि सारी दुनिया जानती है कि दाऊद कराची के क्लिफटन एरिया में वर्षों से रहता है और वहीं से अपनी गतिविधियां चला रहा है। अब लादेन की बीवी और बच्चों को जेल में यह कहकर डालना कि वह अवैध तरीके से पाकिस्तान में रह रहे थे, यह नौटंकी नहीं तो और क्या है? पर अब पाकिस्तान की नौटंकी एक्सपोज हो चुकी है, सारी दुनिया उसे जान चुकी है इसलिए शायद ही कोई अब यह माने कि पाक सेना, आईएसआई और पाक सरकार को यह मालूम नहीं था कि एबटाबाद में कौन रह रहा है।
Abbotabad, Anil Narendra, Daily Pratap, Osama Bin Ladin, Pakistan, Terrorist, Vir Arjun
Abbotabad, Anil Narendra, Daily Pratap, Osama Bin Ladin, Pakistan, Terrorist, Vir Arjun
Thursday, 5 April 2012
हाफिज सईद मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट लिस्ट में दूसरे नंबर पर पहुंचा
देर आए दुरुस्त आए। इतने दिन के बाद आखिर अमेरिका को भी यह समझ आ गया है कि ओसामा बिन लादेन के बाद आज की तारीख में दुनिया में सबसे खतरनाक आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा बन गया है और उसका मुखिया हाफिज सईद दुनिया का मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट। अमेरिका ने सोमवार रात हाफिज सईद के सिर पर 10 मिलियन डॉलर (करीब 50 करोड़ रुपए) का इनाम घोषित किया है। हाफिज सईद मुंबई पर हुए 26/11 के हमलों का मास्टर माइंड है और वह पाकिस्तान में रहकर अपनी आतंकी गतिविधियां चला रहा है। उसके निशाने पर अमेरिका, भारत पमुख हैं। भारत ने सईद को लेकर कई बार पाकिस्तान पर दबाव बनाया पर पाकिस्तान ने हमेशा मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। पाकिस्तान ने हमेशा यही बहाना बनाया कि सईद के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है। हाफिज सईद ने इनाम के ऐलान के बाद पाकिस्तानी चैनलों में कहा कि हम किसी खोह या कंदरा में छिप कर नहीं बैठे हैं और अगर अमेरिका में साहस है तो वह हमें गिरफ्तार कर ले। यही नहीं सईद ने इनाम घोषणा के बाद अमेरिका पर जोरदार हमला बोला। उसने कहा कि पाकिस्तान के रास्ते होने वाली नाटो आपूर्ति रोके जाने और ड्रोन हमलों के खिलाफ देशव्यापी विरोध से वाशिंगटन हताश था। अल जजीरा चैनल ने हाफिज सईद के हवाले से कहा, हम गुफाओं में नहीं छिपे बैठे हैं जो हमें खोजने के लिए इनाम रखे जाएं। सईद ने कहा, मुझे विश्वास है कि या तो अमेरिका को बहुत सीमित जानकारी है और वह भारत द्वारा दी जा रही गलत सूचनाओं के आधार पर फैसले ले रहा है या फिर वह हताश है। अमेरिका की रिवार्ड्स फॉर जस्टिस वेबसाइट ने हाफिज सईद को अरबी और इंजीनियरिंग का पूर्व पाध्यापक तथा जमात-उद-दावा का संस्थापक सदस्य बताया है। वेबसाइट के अनुसार यह चरमपंथी इस्लामी संगठन है जिसका मकसद भारत के कुछ हिस्सों और पाकिस्तान में इस्लामी शासन स्थापित करना है। लश्कर-ए-तैयबा इस संगठन की लड़ाकू शाखा है। अमेरिका की वर्तमान मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट सूची में हाफिज सईद का नंबर दूसरा है, पहले पर अयमन अल जवाहिरी। यह अलकायदा पमुख है जिन पर 2.5 करोड़ डॉलर का इनाम है। अमेरिका के इस कदम का भारत ने स्वागत किया है। एक तरह से यह भारत के उन आरोपों की पुष्टि है कि लश्कर का यह पमुख आज की तारीख में सबसे ज्यादा खतरनाक आतंकी है। भारत के केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने कहा कि अमेरिका का कदम इस बात को साबित करता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देता है। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कहा कि अमेरिका का यह कदम मुंबई हमलों के दोषियों को सजा दिलाने और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखने की अमेरिका और भारत की पतिबद्धता जाहिर करता है। यह घोषणा ऐसे समय आई है जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी अजमेर शरीफ में जियारत करने के लिए भारत आ रहे हैं। हमारे पधानमंत्री ने जरदारी के लिए लंच रखने की योजना बनाई है। उम्मीद है कि लंच में बातचीत के दौरान मनमोहन सिंह जरदारी के साथ इस ताजा घोषणा पर भी चर्चा करेंगे। उधर पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक ने कहा कि हमें अमेरिका की तरफ से इनाम के ऐलान की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, Hafiz Saeed, Lashkar e Toeba, Pakistan, Terrorist, 26/11, Asif Ali Zardari,
Tuesday, 13 March 2012
इजरायली राजनयिक पर हमले में ईरानी पत्रकार की गिरफ्तारी?
13 फरवरी को नई दिल्ली के अति सुरक्षित क्षेत्रों में से एक औरंगजेब रोड पर इजरायली महिला राजनयिक टाल योहाशुआ की इनोवा कार के पिछले हिस्से में एक मोटर साइकिल सवार ने मैग्नेटिक डिवाइस (स्टिकी बम) लगा दिया था। इसके तत्काल बाद हुए विस्फोट से कार में आग लग गई थी। महिला राजनयिक व कार चालक मनोज घायल हो गए थे। तीन अन्य गाड़ियां भी इसकी चपेट में आई थी, दिल्ली पुलिस ने इस धमाके के सिलसिले में एक ईरानी व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। ईरानी व्यक्ति ने स्वयं को एक न्यूज एजेंसी का पत्रकार बताया है। गिरफ्तार व्यक्ति का नाम सैयद मोहम्मद काजमी (50 वर्ष) है और वह ईरानी न्यूज एजेंसी के लिए काम करता था। पुलिस का कहना है कि सैयद मोहम्मद काजमी की गिरफ्तारी के सुराग बैंकाक से मिले थे। याद रहे कि जिस दिन दिल्ली में कार बम लगाया गया था ठीक उसी दिन बैंकाक में भी एक धमाका करने का असफल प्रयास किया गया था। दिल्ली में हुए धमाके के तार न केवल बैंकाक से ही जुड़े हैं बल्कि जार्जिया से भी जुड़े हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि दूतावास की कार पर हुए बम धमाके की पहली कामयाबी भी इसी का नतीजा है। फिलहाल पुलिस इस हमले के पीछे शामिल संगठन के नाम का खुलासा नहीं कर रही है लेकिन कहीं न कहीं इस हमले के पीछे ईरानी संगठन पूंड्स (क्यूयूडीएस) के हाथ होने की आशंका जरूर जताई जा रही है। दरअसल बैंकाक में हुए विस्फोट के बाद वहां से कुछ संदिग्ध ईरानी फरार हो गए थे, जिनमें एक महिला भी शामिल थी। बैंकाक पुलिस को उस महिला के घर की तलाशी में एक टेलीफोन डायरी मिली थी जिसमें काजमी का मोबाइल नम्बर था। काजमी के खिलाफ कई महत्वपूर्ण सुबूत मिले हैं। आशंका जताई जा रही है कि हमलों के पीछे ईरानी सेना की स्पेशल फोर्स है, जिसे खासतौर से ईरान-इराक युद्ध के समय गठित किया गया था। मोहम्मद अहमद काजमी को सूचनाएं जुटाने के लिए डालर में भुगतान किया गया था। ब्लास्ट में जिस मोटर साइकिल का इस्तेमाल किया गया वह करोल बाग इलाके से किराये पर ली गई थी। हमलावर विदेश से आकर पहाड़गंज के एक होटल में ठहरे थे। बताया जा रहा है कि स्टिकी बम इसी होटल में तैयार किया गया। पूरे मामले का दुःखद पहलू यह है कि विदेशी बाम्बर जिसने औरंगजेब रोड में कार पर बम लगाया था वह गृह मंत्रालय की सुस्ती के कारण उसी दिन इन्दिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से दक्षिण-एशिया के किसी देश की फ्लाइट से भाग गया। 3 बजे के लगभग दोपहर को बम लगाने के 8 घंटे बाद वह निकल गया। गृह मंत्रालय या किसी और सरकारी एजेंसी ने हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन को सूचित नहीं किया कि अमूक व्यक्तियों को रोका जाए, पूछताछ की जाए। गृह मंत्रालय की यह चूक इसलिए भी चिन्ता का विषय है कि बम धमाका होने के तुरन्त बाद इजरायल ने कह दिया था कि हमले के पीछे ईरान का हाथ है। इमिग्रेशन में हर ईरानी को रोक कर तसल्ली करनी चाहिए थी जो नहीं की गई और हमलावर भागने में सफल रहा। इस मामले में गिरफ्तार मोहम्मद अहमद काजमी के परिजनों ने दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस कर कहा है कि पुलिस द्वारा बरामद स्कूटी उनके एक रिश्तेदार की है। करीब दो साल से वह स्कूटी उनके घर पर खड़ी थी। परिवार का कोई सदस्य उस स्कूटी का उपयोग नहीं करता है। मोहम्मद काजमी के दूसरे बेटे शौजब काजमी ने गिरफ्तारी के अरेस्ट मेमो पर हस्ताक्षर के लिए पुलिस का दबाव बनाने का भी आरोप लगाया है। अपने घर पर किसी ईरानी के आकर ठहरने से इंकार किया। परिजनों का यह भी कहना था कि कर्बला मामले में उनके पिता ने सक्रिय भूमिका निभाई है। बीके दत्त कॉलोनी में उनका अकेला मुस्लिम परिवार है। पेशे से पत्रकार मोहम्मद अहमद काजमी मूल रूप से मेरठ निवासी है। वरिष्ठ पत्रकार सैयद नकवी ने मोहम्मद काजमी की गिरफ्तारी को लेकर कठघरे में खड़ा किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इजरायल के इशारे पर पत्रकार को इजरायली दूतावास कार ब्लास्ट में जबरन गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने इसका मुख्य कारण भी दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के इशारे पर अरब मुल्कों में विद्रोह हो रहा है। उसकी सच्चाई को सैयद मोहम्मद अहमद काजमी ने दुनिया के सामने रखा और इसी के कारण अमेरिका और इजरायल के दबाव में दिल्ली पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। दिल्ली पुलिस को अपना केस मजबूत कर लेना चाहिए क्योंकि इस केस पर न केवल देश के अन्दर ही बल्कि दुनिया भी देख रही है। इस केस में दिल्ली पुलिस की प्रतिष्ठा एक बार फिर दांव पर है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Delhi, delhi Police, Iran, Israil, Mohd. Ahmed Kazmi, Terrorist, Vir Arjun
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Saturday, 3 March 2012
लश्कर-ए-तोयबा की रणनीति में परिवर्तन
नब्बे के दशक में लश्कर-ए-तोयबा आतंकवादियों को पाकिस्तान के जेहादी अड्डों से भारत धकेलता रहा। मकसद था कश्मीर में तोड़फोड़ करना। इसके बाद पाक सरकार ने आतंकवाद को बाकायदा एक स्टेट पॉलिसी बनाकर आतंकवादियों को भारत के शेष भागों में हमले करवाने की नीति बनाई। इसी के तहत सन 2000 में लाल किले पर हमला हुआ और 2001 में भारतीय संसद पर और 2008 में मुंबई हमले हुए। इन हमलों में आईएसआई ने लश्कर के माध्यम से भारत स्टेट के खिलाफ हमले करवाए। इन हमलों में कुछ आतंकी पाकिस्तान से विशेष रूप से आए तो कुछ यहीं भारत से शामिल हुए पर अब लगता है कि लश्कर ने अपनी रणनीति में थोड़ी तब्दीली की है। 26/11 हमलों के बाद उसने 10 आतंकियों को मुंबई में हमला करने भेजा था पर अब वह पाकिस्तान से आतंकी न भेजकर यहीं भारत से ही जेहादियों से हमले करवा रहा है। वह भारत से हमदर्द जेहादियों को उठाता है और उन्हें पाकिस्तान ले जाकर पूरी ट्रेनिंग देकर वापस भेजकर हमला करवा रहा है। बुधवार को दिल्ली पुलिस ने जिन दो आतंकवादियों को गिरफ्तार किया है, उससे आईएसआई और लश्कर की नई नीति के संकेत मिलते हैं। राजधानी दिल्ली में एक प्रसिद्ध बाजार सहित 18 जगह धमाके की साजिश थी। लेकिन जम्मू-कश्मीर, झारखंड और दिल्ली पुलिस के साझा अभियान ने समय रहते बड़े धमाके होने से राजधानी को बचा लिया। साजिश को अंजाम देने की तैयारी में जुटे लश्कर-ए-तोयबा के दो आतंकियों को दबोच लिया गया। मूल रूप से जम्मू-कश्मीर के निवासी बताए जा रहे दोनों बम बनाने में माहिर हैं। इनके पास से बरामद मैमोरी कार्ड में कुछ ऐसी तस्वीरें कैद हैं, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए सुबूत के तौर पर काम आएंगी। मसलन पाकिस्तान में संचालित आतंकी प्रशिक्षण केंद्र, आईईडी (इप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाते हुए। उनके कब्जे से एके 47 राइफल, विस्फोटक पदार्थ, आपत्तिजनक दस्तावेज सहित बहुत कुछ सामान बरामद हुआ है। इनका इरादा दिल्ली की चांदनी चौक मार्केट में विस्फोट करना था। सूत्रों के अनुसार उनमें एक जम्मू-कश्मीर निवासी एहतेशाम है और दूसरा हजारी बाग निवासी शफाकत है। यह दोनों पाकिस्तान में लश्कर के कैम्पों में ट्रेनिंग ले चुके हैं। जानकारी मिली है कि हजारी बाग के जिस शख्स को हिरासत में लिया गया है, वह एहतेशाम का नजदीकी रिश्तेदार है और कई सालों से झारखंड में आ बसा था। झारखंड पुलिस ने इस शख्स से लम्बी पूछताछ की है। पूछताछ के दौरान इस शख्स ने बताया कि लश्कर के आका दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में भयानक विस्फोट कराने की तैयारी में जुटे हुए हैं। एहतेशाम हजारी बाग में रहने वाले शफाकत और कुछ अन्य लोगों की मदद से वहीं पर खतरनाक बम तैयार करता था, जिन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाना था। बुधवार को जिन आतंकियों को पकड़ा गया है वे दिल्ली के तुगलकाबाद में किराये के मकान में रहते थे। जब इन्हें सीमापार से निर्देश मिला था कि वे दिल्ली के किसी भीड़भाड़ वाले इलाके में बम विस्फोट करें तो इसके लिए इन लोगों ने चांदनी चौक की क्लॉथ मार्पिट का चुनाव किया। यहां शाम के वक्त हजारों लोगों की भीड़ रहती है। पूछताछ के दौरान पकड़े गए आतंकियों ने जानकारी दी है कि यदि वे लोग पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ते तो बुधवार की शाम चांदनी चौक विस्फोटों से दहल जाता। प्लान था 18 जगहों पर विस्फोट करने का। वे केवल भीड़भाड़ वाले स्थान पर विस्फोट करके दहशत फैलाना चाहते थे। आतंकी मंसूबों को नाकाम करने के लिए दिल्ली, झारखंड, जम्मू-कश्मीर की पुलिस तथा केंद्र की सुरक्षा एजेंसियों को बधाई। बेहतर समन्वय से यह सम्भव हो सका।
Anil Narendra, Bomb Blast, Daily Pratap, Delhi, ISI, Lashkar e Toeba, Terrorist, Vir Arjun
Wednesday, 22 February 2012
ऐसी स्थिति में तो हम लड़ चुके आतंकवाद की चुनौती से
यह दुःख की बात है कि आतंकवाद से प्रभावी ढंग से लड़ने के लिए तैयार किए जा रहे राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) पर भी राजनीतिक ग्रहण लग गया है। उल्लेखनीय है कि सुरक्षा पर कैबिनेट कमेटी (सीसीए) ने इस साल 11 जनवरी को आतंकवाद से निपटने के लिए शक्तिशाली राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी केंद्र (एनसीटीसी) के गठन की घोषणा की। यह एजेंसी एक मार्च 2012 को अस्तित्व में आ जाएगी। यह आतंकी खतरों का पता लगाने के अलावा सर्च ऑपरेशन और सन्देह के आधार पर लोगों को गिरफ्तार कर सकेगी। इसको यह शक्तियां गैर-कानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून से प्राप्त होंगी। आतंकी मॉड्यूल का पता लगाना, आतंकियों और उनके सहयोगियों का पता लगाना इसका मकसद है। यह सीबीआई, एनआईए, नेटग्रिड समेत सातों केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों से सूचनाएं प्राप्त कर सकेगी। इसका मुखिया डायरेक्टर कहलाएगा जो आईबी एडिशनल डायरेक्टर के समकक्ष स्तर का होगा। एनसीटीसी सूचना एकत्र करने के लिए दूसरी एजेंसी पर निर्भर रहेगी। आधे दर्जन से ज्यादा गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने इस केंद्र के गठन पर आपत्ति जताई है और आशंका है कि आतंकियों के खिलाफ खड़े किए जा रहे इस एकीकृत कमान की कहीं भ्रूणहत्या न हो जाए। इस प्रस्तावित आतंक निरोधी केंद्र को राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप और संविधान की मर्यादा का उल्लंघन बताया जा रहा है। इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि एनसीटीसी नाम से चर्चा में आए इस राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र के खिलाफ ठीक उस समय आवाज बुलन्द हो रही है जब उसके विधिवत काम करने का समय नजदीक आ गया है। क्या यह महज एक दुर्योग है कि एक मार्च से सक्रिय होने जा रहे एनसीटीसी के खिलाफ राज्य सरकारों की सक्रियता यकायक बढ़ गई है। चन्द दिन पहले तक केवल ममता बनर्जी और नवीन पटनायक को ही यह केंद्र रास नहीं आ रहा था लेकिन अब सारे भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों व तमिलनाडु की मुख्यमंत्री को भी यह लगने लगा है कि राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण होने जा रहा है। हमारी राय में इस केंद्र का विरोध करने वालों के कारणों में भी दम है। कुछ मायनों में तो यह पोटा से भी ज्यादा खतरनाक है। बिना राज्यों को सूचना दिए इसमें किसी को भी गिरफ्तार करने का जो प्रावधान है, उससे राज्यों का भयभीत होना समझ आता है। इस यूपीए सरकार और विशेषकर गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की विश्वसनीयता इतनी गिर चुकी है कि इन पर अब कोई विश्वास करने को तैयार नहीं। अगर यही करना था तो पोटा को हटाया ही क्यों? 26/11 के हमलो के बाद देश में एक माहौल ऐसा बना था कि अगर उसी समय इस केंद्र को स्थापित किया जाता तो शायद इतना विरोध नहीं होता पर संप्रग सरकार सोती रही और इतने साल निकल गए, अब आकर उसे होश आया है। इस विरोध की असलियत में राज्यों का यह डर छिपा है कि केंद्र सरकार इस कानून के तहत अपना राजनीतिक एजेंडा उन पर थोप सकती है। यह आतंक निरोधी व्यवस्था केंद्र के खुफिया विभाग `इंटेलीजेंस ब्यूरो' के तहत चलेगी और राज्यों को आशंका है कि सीबीआई की तरह इसे भी कहीं केंद्र की सत्ता पर काबिज दल के हित-पोषण का साधन न बना दिया जाए। ऐसी स्थिति में तो हम लड़ चुके आतंकवाद से।
Anil Narendra, CBI, Daily Pratap, Mamta Banerjee, NCTC, P. Chidambaram, Terrorist, Vir Arjun
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Tuesday, 21 February 2012
अमेरिकी संसद को उड़ाने की साजिश नाकाम कर दी गई
अमेरिका ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि वह 9/11 आतंकी हमले के बाद कितनी चौकस है। उसका आतंक विरोधी अभियान तब रंग लाया जब एफबीआई ने अमेरिकी संसद (कैपिटल हिल) को उड़ाने की साजिश को नाकाम कर दिया। अमेरिका के न्याय विभाग के मुताबिक आत्मघाती हमला करके अमेरिकी संसद को उड़ाने की साजिश रचने वाले मोरक्को के एक शख्स को गिरफ्तार किया है। 29 वर्षीय अमीन अल खलीफी के तौर पर की गई है। खलीफी को शुक्रवार अमेरिकी संसद के पार्किंग लॉट से गिरफ्तार किया गया। खलीफी एक बमों से भरी बैल्ट पहनकर व हाथ में सब-मशीनगन लेकर अमेरिकी संसद को उड़ाना चाहता था। उसे यह नहीं मालूम था कि जो बमों से लदी बैल्ट उसको दी गई और जो हथियार दिए गए वह सब नकली थे। दरअसल एफबीआई ने एक स्टिंग ऑपरेशन के तहत बहुत पहले से ही अपने एक एजेंट को अलकायदा के उस गिरोह में शामिल करने में सफलता पा ली थी। वही अंडर कवर एजेंट अलकायदा का कार्यकर्ता बनकर खलीफी की गतिविधियों पर नजर रखता रहा। उसी ने खलीफी को यह नकली हथियार दिए और जब वह अपने प्लान के मुताबिक कैपिटल हिल की पार्किंग एरिया में पहुंचा तो उसे रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। अमेरिका की एफबीआई और ज्वाइंट टैरेरिज्म टास्क फोर्स का यह संयुक्त अभियान सफल रहा। खलीफी को सामूहिक विनाश के हथियार का इस्तेमाल करके जन सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने और आम जनता पर गोलीबारी करने की कोशिश का आरोपी बनाया गया है। अमेरिकी अटार्नी नील मैक्ब्राइड ने कहा कि खलीफी को लग रहा था कि वह अलकायदा के लिए काम कर रहा है लेकिन वह अलकायदा का छद्म अभियान चला रही एफबीआई के शिकंजे में फंस चुका था। खलीफी का आरोप सिद्ध हो जाता है तो उसे आजीवन कारावास की सजा मिल सकती है। अदालती दस्तावेजों के अनुसार खलीफी 1999 में वीजा पर अमेरिका आया था लेकिन वीजा की अवधि समाप्त होने के बावजूद वह यहां टिका रहा और उसने कभी भी अमेरिका की नागरिकता हासिल करने के लिए आवेदन नहीं दिया था। एफबीआई के जनवरी 2011 के हलफनामे में बताया गया कि एक विश्वसनीय सूत्र ने उसे बताया कि खलीफी ने वर्जीनिया के एक घर पर कुछ लोगों से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान एक व्यक्ति ने उसे एके 47 और दो रिवाल्वर तथा कुछ विस्फोटक दिए। खलीफी ने हथियार लेते हुए कहा कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध दरअसल मुसलमानों के खिलाफ युद्ध है और हमें युद्ध के लिए तैयार हो जाना चाहिए। खलीफी को एक रेस्तरां पर हमला करना था लेकिन पिछले माह उसने अपनी योजना बदली दी और उसने संसद भवन पर हमला करने की मंशा जताई थी। उसने पश्चिम वर्जीनिया में बाकायदा हमले का अभ्यास भी किया था। संसद पर हमला करने के लिए उसने 17 फरवरी का दिन चुना था। पिछले माह उसने कैपिटल हिल के आसपास चक्कर लगाकर उपयुक्त स्थान की तलाश भी कर ली थी। लेकिन उसे हमले से पहले ही धर लिया गया। अमेरिका की सुरक्षा और गुप्त व्यवस्था इतनी मजबूत है, यह एक बार फिर साबित हो गया।
9/11, America, Anil Narendra, Daily Pratap, Terrorist, USA, Vir Arjun
9/11, America, Anil Narendra, Daily Pratap, Terrorist, USA, Vir Arjun
Wednesday, 15 February 2012
बेशक धमाका दिल्ली में हुआ पर निशाने पर था इजराइल
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 15th February 2012
अनिल नरेन्द्र
दिल्ली में पिछले कई महीनों से कोई आतंकी घटना नहीं घटी थी और हमें लगने लगा था कि अंतत हमारी सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकवाद पर कुछ हद तक काबू पा लिया है। सात सितम्बर 2011 को दिल्ली हाई कोर्ट में बम धमाका हुआ था जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई थी और दर्जनों घायल हुए थे। बेशक सोमवार को जो धमाका हुआ वह अत्यन्त गम्भीर है। बेशक इसमें किसी की मौत तो नहीं हुई पर कई और दृष्टियों से यह हाई कोर्ट परिसर में हुए धमाके से ज्यादा चिन्तापूर्ण है। सबसे पहली बात तो यह है कि धमाका ऐसी जगह हुआ जो देश की सर्वाधिक सुरक्षित जगह मानी जाती है। प्रधानमंत्री निवास से महज 400 मीटर की दूरी पर सोमवार दोपहर इजराइली दूतावास की कार में जोरदार विस्फोट हो गया। धमाके के बाद कार में आग लग गई जिससे उसमें सवार एक इजराइली महिला अधिकारी सहित चार लोग घायल हो गए। मोटरसाइकिल सवार आतंकी ने मैग्नेटिक डिवाइस (स्टिकी बम) से चलती इनोवा गाड़ी में धमाका किया। इस कार के बगल में चल रही दो अन्य कारें भी क्षतिग्रस्त हो गईं। इस घटना में इजराइली राजनयिक, उसका चालक व इंडिका कार में सवार दो अन्य लोग जख्मी हो गए। गम्भीर रूप से घायल राजनयिक को चन्द्रगुप्त मार्ग स्थित प्राइमस अस्पताल में आईसीयू में रखा गया है। शेष तीनों घायलों को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जिस जगह पर धमाका हुआ वह वीवीआईपी इलाका है जहां दोनों तरफ बड़े-बड़े नेता व मंत्रियों के बंगले हैं। पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता के मुताबिक दूतावास में एडमिनिस्ट्रेटिव अटैची के पद पर तैनात महिला टाल येहोशुवा 3, औरंगजेब रोड स्थित अमेरिकन स्कूल में पढ़ रहे अपने बच्चों को लेने जा रही थी तभी दोपहर बाद करीब 3.16 बजे औरंगजेब रोड स्थित केंद्रीय मंत्री मुकुल वासनिक की कोठी के सामने उनकी चलती इनोवा कार (109 सीडी 35) में धमाका हो गया। पुलिस को मिले एक चश्मदीद ने बताया कि लाल रंग की मोटरसाइकिल पर सवार हैल्मेट लगाए युवक ने चलती कार में पीछे से मैग्नेटिक डिवाइस चिपकाई और तेजी से फरार हो गया। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक जिस तरह के बम का इस्तेमाल इस हमले में हुआ वह पहली बार देखा गया है। इसे स्टिकी बम कहा जाता है। आमतौर पर सेना ही इसका इस्तेमाल करती है। स्टिकी बम ऐसा बम होता है जिसे चलते-चलते किसी वाहन पर चिपका दिया जाता है। इसमें चिपकन का काम बम के साथ लगी मैग्नेट यानि चुम्बक करती है जो कार की लोहे की बॉडी पर हल्के से छूते ही सख्ती से चिपक जाती है। दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि इसमें प्लास्टिक विस्फोटक का इस्तेमाल हल्केपन के लिए किया गया है। साथ ही बम फटने की टाइम सेटिंग मैकेनिज्म भी अपने में नया है। इस प्रकार के बम का इस्तेमाल होना हमारी सुरक्षा के लिए एक गम्भीर चुनौती है। जाहिर है कि यह बम या तो विदेश से लाया गया है या फिर सेना के किसी डिपो से चुराया गया है। मैंने फिल्मों में देखा है कि इस प्रकार के बम को चलते टैंक पर चिपका दिया जाता है जिससे टैंक उड़ जाता है। यह विस्फोट महज एक इत्तेफाक नहीं था। सोमवार को ही जार्जिया की राजधानी तिब्लिसी स्थित इजराइली दूतावास पर ऐसा ही हमले की कोशिश हुई। इजराइली रेडियो ने कहा है कि एक कर्मचारी ने विस्फोटों से लैस एक कार दूतावास के पास देखी थी और इसने पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने वहां पहुंचकर बम को निक्रिय कर दिया। बाद में इस घटना की जानकारी दूतावास को दी गई। इसके बाद दुनियाभर के इजराइली दूतावासों को अलर्ट जारी किया है। उल्लेखनीय है कि हाल के महीनों में अजरबैजान, थाइलैंड और अन्य स्थानों पर भी इजराइली ठिकानों पर हमले की साजिश नाकाम की गई है। थाइलैंड में तो पिछले माह एक हिजबुल्ला से जुड़े लेबनान के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था। उसके पास से विस्फोटक बरामद भी हुए थे। चूंकि निशाने पर इजराइली थे इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि इसके पीछे इस्लामिक कट्टरपंथियों का हाथ हो सकता है। इजराइली प्रधानमंत्री ने घटना की जानकारी देते हुए कहा कि इसके पीछे आतंकी संगठन हिजबुल्ला और ईरान का हाथ है। इसके पहले 26/11 के मुंबई आतंकी हमले में खबद हाउस को निशाना बनाया गया था जहां सात इजराइली मारे गए थे। हिजबुल्ला लेबनान का मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन और राजनीतिक दल है। रविवार को उसके एक टॉप नेता इमाद मुग्निया की चौथी बरसी थी। मुग्निया एक मिसाइल अटैक में मारा गया था। हिजबुल्ला ने मुग्निया की मौत के लिए इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद को जिम्मेदार ठहराकर बदला लेने की कसम खाई है। ईरान में भी एक उच्च कोटि के वैज्ञानिक को पिछले दिनों मिसाइल हमले में मार दिया गया था। ईरान ने भी इजराइल का हाथ होने का आरोप लगाया था। इस हमले में एक ईरानी आतंकी संगठन अमाद मधुनियाह का नाम भी आ रहा है। अब तक देश में जितनी भी आतंकी वारदातें हुई हैं, उसमें कभी इस संगठन का नाम नहीं आया। हालांकि पुलिस का मानना है कि संगठन का मुख्य उद्देश्य इजराइली नागरिकों को नुकसान पहुंचाना था। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि ईरान ने पाकिस्तानी आतंकियों के जरिये वारदात को अंजाम दिया होगा। इस सिलसिले में ज्यादा शक हिजबुल मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तोयबा पर जाता है। हमें याद रखना चाहिए कि 26/11 मुंबई हमलों में भी इजराइली नागरिकों को निशाना बनाया गया था। वारदात के पीछे कोई भी हो पर यह भी तय है कि उन्हें स्थानीय मदद जरूर मिली है। क्योंकि मोटरसाइकिल सवार एक हिन्दुस्तानी ही होगा। मैग्नेट बम का उपयोग न केवल दिल्ली पुलिस बल्कि तमाम सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिन्ता का कारण होना चाहिए। अब तक इस तरह के बमों का उपयोग ईरान और कुछ अरब देशों में होता पाया गया है। सूत्रों की मानें तो दिल्ली में हुए इस हमले में नाइट्रोग्लिसरीन, सल्फर व पोटाशियम क्लोरेट का इस्तेमाल किया गया है। नाइट्रोग्लिसरीन का उपयोग इसी तरह के विस्फोट कराने में किया जाता है। अरब देशों और इजराइल के बीच की लड़ाई में अब भारत भी आ गया है। सोमवार को यह घटना हमारे अंदरूनी कारणों से नहीं हुई है, यही चिन्ता की बात है। इजराइल इस हमले का बदला जरूर लेगा। ईसाई बनाम इस्लाम लड़ाई आज की नहीं हजारों वर्षों पुरानी है। ईरान पर किसी भी समय अब इजराइल-अमेरिका हमला कर सकते हैं। कहीं दिल्ली के इस विस्फोट से मामला और ज्यादा न बढ़ जाए?
Anil Narendra, Daily Pratap, Delhi Bomb Case, Delhi High Court, Israil, Terrorist, Vir Arjun
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Thursday, 15 December 2011
आईएसआई को देश के अन्दर से पूरी मदद मिलती है
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Published on 15th December 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई भारत के खिलाफ छेड़े अपने अभियान को आगे बढ़ाने से बाज नहीं आ रही। वह कुछ न कुछ करती ही रहती है पर हमारी सुरक्षा एजेंसियां भी चुस्त और तैयार रहती हैं। हाल ही में इंडियन मुजाहिद्दीन के सात आतंकवादियों को पकड़ने और बड़े नेटवर्प का खुलासा करने के बाद दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा व स्पेशल सेल की विशेष टीम को एक और बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। विशेष टीम ने पाक खुफिया एजेंसी के दो एजेंटों को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया है। इनमें एक महिला है। इनके पास से पाकिस्तानी पहचान पत्र व पासपोर्ट के अलावा भारतीय पासपोर्ट व पहचान पत्र भी मिले हैं। आईएसआई ने इन्हें भारत में ठिकाना बनाना और यहां की गुप्त सूचनाएं हासिल करने के लिए भेजा था। सोमवार को दोनों को तीस हजारी स्थित एसीएमएम विनोद यादव की कोर्ट में पेश किया गया, यहां से 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। डीसीपी अशोक चांद के मुताबिक पुलिस को सूचना मिली थी कि दो पाकिस्तानी नागरिकों ने नेपाल बार्डर से भारत में प्रवेश किया है। ये गोरखपुर के पास सोनौली बार्डर से होते हुए गोरखधाम एक्सप्रेस से दिल्ली आ रहे हैं। सूचना मिलते ही स्पेशल सेल सक्रिय हो गया और दोनों को दिल्ली रेलवे स्टेशन से दबोच लिया। सवाल यह उठता है कि इनके पास न केवल भारतीय पासपोर्ट ही थे पर उन पर भारत में प्रवेश की मोहर नहीं लगी थी? यह कैसे सम्भव हुआ? सोफिया के पास एक पाक सरकार द्वारा जारी नागरिकता प्रमाण पत्र भी मिला है। इसके साथ कुछ संदिग्ध दस्तावेज मिले हैं जिनमें चिप इमरान के नाम से गुजरात से जारी ड्राइविंग लाइसेंस, भारतीय मतदाता पहचान पत्र, यूसुफ के नाम से जारी भारतीय पैनकार्ड, यूसुफ लफ्गाजीवाला के नाम से अहमदाबाद से वर्ष 1986 में जारी भारतीय पासपोर्ट भी बरामद हुआ। इमरान ने पूछताछ में बताया कि वह मूल रूप से अहमदाबाद (गुजरात) का रहने वाला है। लेकिन वर्ष 1988 में वह पाकिस्तान चला गया था और वहां की नागरिकता ग्रहण कर ली थी। जब वह पाकिस्तान में था तो आईएसआई ने उससे सम्पर्प किया कि अगर वह भारत जाकर उनके लिए काम करे तो उसे काफी रुपयों की मदद मिलेगी। इमरान के राजी होने पर मार्च 2011 में उससे कहा गया कि वह भारत जाकर एक महिला को वहां का रेजीडेंट एजेंट बनाए। इसी योजना के तहत वह भारत आया था। यहां से दोनों को आगरा जाना था। इमरान उसे आगरा छोड़कर वापस पाकिस्तान लौट जाता। महिला आगरा में रहकर वहां के लोगों के साथ घुलमिल कर अपना ठिकाना बना लेती। किन्तु दिल्ली में ही दोनों को दबोच लिया गया। यह हैरानी की बात है कि न केवल भारत-पाकिस्तान आना-जाना इतना इन लोगों के लिए मामूली बात है, जब चाहे चले जाएं, जब चाहे वापस आ जाएं पर भारतीय दस्तावेज भी इनके आसानी से बन जाते हैं। हम आईएसआई को तो दिन-रात कोसते रहते हैं पर अपने घर को नहीं देखते जहां कि लचर व्यवस्था के कारण आईएसआई अपने मंसूबों में कामयाब होती है।
Anil Narendra, Daily Pratap, ISI, Terrorist, Vir Arjun
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Saturday, 3 December 2011
आईएम के खतरनाक मॉड्यूल का पर्दाफाश
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Published on 3rd December 2011
अनिल नरेन्द्र
एंटी टेरेरिस्ट ऑपरेशंस में हमारी सुरक्षा एजेंसियों को एक शानदार सफलता मिली है। पाकिस्तानी आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिद्दीन का जूनियर कहे जाने वाले इंडियन मुजाहिद्दीन आतंकी संगठन के नापाक इरादों का खुलासा हुआ है। भारतीय खुफिया तंत्रों की सहायता तथा अंतर्राष्ट्रीय पुलिस तालमेल के चलते बिहार, चेन्नई व दिल्ली की स्पेशल सेल और क्राइम ब्रांच ने आधा दर्जन आतंकवादियों को गिरफ्तार किया है। दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने इंडियन मुजाहिद्दीन के विशाल नेटवर्प का भी भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने जिन छह आतंकवादियों को पकड़ा है उनमें एक पाकिस्तानी भी है। इन लोगों ने जामा मस्जिद गोली कांड, पुणे में जर्मन बेकरी व बेंगलुरु में चिन्नास्वामी स्टेडियम में ब्लास्ट को अंजाम दिया था, कम से कम ऐसा दिल्ली पुलिस का दावा है। इन आतंकवादियों के पास से दो एके-47 राइफल, 50 से ज्यादा कारतूस, विस्फोटक पदार्थ, डेटोनेटर व दो लाख रुपये के नकली नोट बरामद हुए हैं। गिरफ्तार आतंकवादियों में मोहम्मद आदिल उर्प अजमल, मोहम्मद कतिल सिद्दीकी उर्प सज्जन, मोहम्मद इरशाद खान, गौहर अजीज अहमद जमाली और अब्दुर रहमान शामिल हैं। ये सभी इंडियन मुजाहिद्दीन के नेटवर्प से जुड़े थे। मोहम्मद आदिल पाकिस्तान का रहने वाला है। वह अगस्त 2010 में भारत आया था। दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा के उपायुक्त अशोक चांद की देखरेख में स्पेशल सेल के एसीपी कुमार यादव, निरीक्षक ललित मोहन नेगी, हृदय भूषण एवं उपनिरीक्षक चंदिका प्रसाद व 35 पुलिसकर्मियों की टीम ने इन आतंकियों का भंडाफोड़ किया। पुलिस के मुताबिक इन आतंकियों ने वर्ष 2010 में 13 फरवरी को बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में ब्लास्ट, 17 अप्रैल को पुणे के जर्मन बेकरी ब्लास्ट व 19 सितम्बर को जामा मस्जिद के बाहर विदेशी नागरिकों पर हुई गोली कांड को अंजाम दिया था। दिल्ली पुलिस ने केंद्रीय खुफिया एजेंसियों, पश्चिम बंगाल, बिहार व तमिलनाडु पुलिस की मदद से इन छह आतंकवादियों को पकड़ा। स्पेशल सेल को 22 नवम्बर को सूचना मिली थी कि इंडियन मुजाहिद्दीन का एक मॉड्यूल दिल्ली में सक्रिय है। इस सूचना की जांच के दौरान पुलिस ने आनन्द विहार बस अड्डे के पास से मोहम्मद कतिल उर्प सज्जन को गिरफ्तार किया। दिल्ली में 2008 में सीरियल बम धमाकों के बाद हुए बटला हाउस एनकाउंटर के बाद राजनीतिक आरोपों के चलते ठंडी पड़ी दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल को एक बार फिर वहीं से लीड मिली। दरअसल जिस बटला हाउस के चलते दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा शहीद हो गए और उसके बाद जो आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, उसने स्पेशल सेल की हिम्मत तोड़ दी। सेल का मनोबल बढ़ाने के लिए एक ज्वाइंट टीम बनाई गई। इस टीम में सेल के बेहतरीन अफसरों के साथ क्राइम ब्रांच और एसीपी संजीव यादव को जोड़ा गया। टीम का नेतृत्व क्राइम ब्रांच के डीसीपी अशोक चांद को सौंपा गया। आईएम के इस मॉड्यूल के भंडाफोड़ में सबसे पहले आनन्द विहार से पकड़े गए मोहम्मद कतिल सिद्दीकी दरअसल बटला हाउस में ही रह रहा था। लेकिन उसे चुपचाप वहां से निकालकर आनन्द विहार ले जाकर गिरप्तार किया गया। जहां हम दिल्ली पुलिस को इस शानदार सफलता की बधाई देना चाहते हैं, वहीं यह कहना भी जरूरी है कि यह विभिन्न राज्य पुलिस की आपस के बेहतर तालमेल का नतीजा है। विभिन्न जांच एजेंसियों और पुलिस में तालमेल का अभाव रहा है। यह प्रसन्नता की बात है कि अब यह दूर हो रहा है। पिछले कुछ दिनों से पुलिस की बात पर सीधा विश्वास करना थोड़ा कठिन-सा हो रहा है। कई केसों में पाया गया है कि वाहवाही लूटने के लिए पुलिस गिरफ्तारी तो बता देती है पर जैसे ही केस अदालत में जाता है, उड़ जाता है। हम उम्मीद करते हैं कि इस केस में पुलिस मुजरिमों का अपराध साबित कर पाएगी और उन्हें सजा दिलवाने में कामयाब रहेगी।Anil Narendra, Daily Pratap, delhi Police, Indian Mujahideen, Terrorist, Vir Arjun
Monday, 14 November 2011
क्या शहीदों के मानवाधिकार नहीं हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि हम उनके मानवाधिकारों की बात नहीं करते जो दूसरों की सुरक्षा करते हुए आतंकी हमले में मारे जाते हैं। क्या कभी हमने उनके मानस को समझने की भी कोशिश की है। संसद पर हुए हमले में भी पांच सिपाही मारे गए थे। लेकिन हम उनके मानवाधिकारों को भूल गए हैं। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर आवश्यक रूप से शोध होना चाहिए और जानना चाहिए कि पीड़ितों की क्या हालत है। जस्टिस जीएस सिंघवी और एसजे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने यह सवाल खालिस्तान आतंकी देवेन्द्रपाल सिंह भुल्लर के वकील से किए। भुल्लर के वकील ने भुल्लर की दया याचिका में हुई देरी की उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन बताकर फांसी के बदले उम्र कैद की मांग कर रहे थे। देवेन्द्रपाल सिंह भुल्लर के नई दिल्ली में किए एक बम हमले में नौ सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई थी और 29 लोग घायल हुए थे। कानून तोड़ने वालों के मानवाधिकारों की वकालत बढ़ने की खबरों के बीच सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी भुखमरी, किसानों की आत्महत्या और आतंकी कार्रवाई में मारे गए जवानों के मानवाधिकारों की बात कोई क्यों नहीं करता? सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर मानवाधिकार संगठनों, समर्थकों के साथ-साथ सरकारों को भी गौर करना चाहिए कि आखिर आतंकी हिंसा में मारे गए आम लोगों, एक सुरक्षाकर्मियों के मानवाधिकारों की चिन्ता उन्हें क्यों नहीं होती? दया याचिकाओं के निपटारे में आवश्यकता से अधिक देरी एक विचारणीय मुद्दा अवश्य है, लेकिन इस देरी को आधार बनाकर आतंकियों के मानवाधिकारों का उल्लेख का कोई मतलब नहीं है। निराशाजनक बात तो यह है कि हमारे भारत महान में ऐसे अनेक संगठन खड़े हो गए हैं जो आतंक पीड़ित आम लोगों और सुरक्षाकर्मियों को भूलकर आतंकवादियों के अधिकारों का हवाला देते थकते नहीं। अब यह प्रवृत्ति केवल संगठनों तक ही सीमित नहीं रह गई इसमें अब कुछ राजनीतिक दल भी वोट बैंक के चक्कर में शामिल हो गए हैं। खास बात यह है कि ये राजनीतिक दल फांसी की सजा पाए आतंकियों के पक्ष में सिर्प इसलिए खड़े हो जाते हैं ताकि वोट बैंक की राजनीति को मजबूत किया जा सके। यह राजनीति न्याय का उपहास उड़ाने और आतंक पीड़ितों को व्यथित करने वाली तो है ही, आतंकवादियों को बल प्रदान करने वाली भी है। देवेन्द्रपाल सिंह की फांसी की सजा के सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय कुछ भी हो, लेकिन उसने इस सन्दर्भ में जिस तरह संसद पर हुए हमले के दौरान मारे गए सुरक्षाकर्मियों का उल्लेख करते हुए यह सवाल किया कि क्या किसी ने इन बहादुर सिपाहियों के परिवार वालों की भावनाओं या उन पर क्या गुजर रही होगी इसकी भी जानकारी ली या सोचा या फिर वोट बैंक के चक्कर में इन्हें भी भुला दिया।
दुनिया के किसी देश में सजा दिलवाने की प्रक्रिया में इतना समय नहीं लगता जितना हमारे देश में लगता है और इसी देरी से कई विवाद पैदा हो जाते हैं और आतंकियों को नई-नई दलीलें देने का मौका मिल जाता है। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि इस समय राष्ट्रपति के समक्ष 19 दया याचिकाएं विचाराधीन हैं। 2009 में मनमोहन सिंह सरकार के फिर से सत्तारूढ़ होने पर दया याचिकाओं को लेकर नीति तैयार की गई। इस नीति के तहत राष्ट्रपति के पास पेन्डिंग याचिकाओं को एक-एक करके वापस बुलाया गया। समीक्षा के बाद दोबारा राष्ट्रपति को भेजा गया। इस कारण दो साल में 32 दया याचिकाओं में से 13 का निपटारा हो सका। इस समय पेन्डिंग 19 में से 14 याचिकाएं राष्ट्रपति सचिवालय में हैं जबकि पांच गृह मंत्रालय के पास विचाराधीन पड़ी हैं। ट्रायल कोर्ट के फैसले की तारीख के हिसाब से सबसे पुरानी दया याचिका को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जा रहा है। केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि दया याचिकाओं में देरी का आरोप लगाने वाले मुजरिमों की याचिका पर अब और देरी नहीं की जानी चाहिए। केंद्र के अनुसार अनावश्यक देरी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता लेकिन विलम्बता के आधार पर फांसी को असंवैधानिक भी नहीं कहा जा सकता। अदालत अपराध की गम्भीरता और वीभत्सता को नजरंदाज नहीं कर सकती। फांसी की सजा का मकसद भुल्लर जैसे आतंकवादियों को हतोत्साहित करना है। सम्भावित अपराधियों के मन में कानून का भय हो, इसके लिए विधान में मृत्युदंड आवश्यक माना गया है।
Anil Narendra, Bhullar, Daily Pratap, Human Rights Commission, Martyres, Sikh Terrorist, Supreme Court, Terrorist, Vir Arjun
दुनिया के किसी देश में सजा दिलवाने की प्रक्रिया में इतना समय नहीं लगता जितना हमारे देश में लगता है और इसी देरी से कई विवाद पैदा हो जाते हैं और आतंकियों को नई-नई दलीलें देने का मौका मिल जाता है। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि इस समय राष्ट्रपति के समक्ष 19 दया याचिकाएं विचाराधीन हैं। 2009 में मनमोहन सिंह सरकार के फिर से सत्तारूढ़ होने पर दया याचिकाओं को लेकर नीति तैयार की गई। इस नीति के तहत राष्ट्रपति के पास पेन्डिंग याचिकाओं को एक-एक करके वापस बुलाया गया। समीक्षा के बाद दोबारा राष्ट्रपति को भेजा गया। इस कारण दो साल में 32 दया याचिकाओं में से 13 का निपटारा हो सका। इस समय पेन्डिंग 19 में से 14 याचिकाएं राष्ट्रपति सचिवालय में हैं जबकि पांच गृह मंत्रालय के पास विचाराधीन पड़ी हैं। ट्रायल कोर्ट के फैसले की तारीख के हिसाब से सबसे पुरानी दया याचिका को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जा रहा है। केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि दया याचिकाओं में देरी का आरोप लगाने वाले मुजरिमों की याचिका पर अब और देरी नहीं की जानी चाहिए। केंद्र के अनुसार अनावश्यक देरी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता लेकिन विलम्बता के आधार पर फांसी को असंवैधानिक भी नहीं कहा जा सकता। अदालत अपराध की गम्भीरता और वीभत्सता को नजरंदाज नहीं कर सकती। फांसी की सजा का मकसद भुल्लर जैसे आतंकवादियों को हतोत्साहित करना है। सम्भावित अपराधियों के मन में कानून का भय हो, इसके लिए विधान में मृत्युदंड आवश्यक माना गया है।
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Wednesday, 9 November 2011
26/11 मुंबई हमलों का मास्टर माइंड थी आईएसआई
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 9th November 2011
अनिल नरेन्द्र
बीबीसी ने दो हिस्सों में हाल ही में एक कार्यक्रम प्रसारित किया जिसे `सीकेट पाकिस्तान' नाम दिया गया था। कार्यक्रम के पहले हिस्से में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सलाहकार रहे सीआईए अधिकारी ब्रस रडिल को कोट किया गया है। उन्होंने मुंबई हमले के वक्त राष्ट्रपति को सूचित किया था, `हर अंगुली पाकिस्तान की ओर उठ रही है। यह एक निर्णायक क्षण है।' पाक से आए आतंकवादियों ने 26 नवम्बर 2008 को मुंबई के कई प्रमुख स्थानों पर हमला किया था। उस वक्त ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए थे हालांकि उन्होंने शपथ नहीं ली थी। अमेरिकी व्यवस्था के अनुसार उन्होंने जनवरी 2009 में शपथ ली थी। रडिल ने कहा, `मैंने पाकिस्तानी राष्ट्रपति से कहा कि वे हमारे साथ दोहरा खेल खेलना बन्द करें। उनसे यह भी कहा गया कि पाक सालों से अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ ऐसा कर रहा है। उसके आगे भी ऐसा ही करते रहने का अंदेशा है।' रडिल ने कहा, `इन हमलों में हर जगह लश्कर-ए-तोयबा की छाप नजर आती है। हमलों की शुरुआत से लगने लगा कि लश्कर की करतूत है।' उन्होंने कहा कि एक बार जब आप लश्कर से इन हमलों को जोड़ते हैं तो आप इसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी जोड़ेंगे। इस कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में कहा गया है, `सीआईए को यह जानकारी मिली थी कि मुंबई के हमले में आईएसआई सीधे तौर पर शामिल थी।' काबुल में जुलाई 2008 में विस्फोट से लदी कार को भारतीय दूतावास के निकट उड़ा दिया गया था। इस हमले में 58 लोग मारे गए थे और 141 घायल हुए थे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति के कार्यकाल में काम कर चुके माइक वाल्ट्सं का कहना है, `सूचना और सिलसिलेवार घटनाक्रमों से पूरी तरह स्पष्ट हो गया था कि काबुल में विस्फोट करने वाले हक्कानी नेटवर्प को पाक का समर्थन मिला हुआ था।' उस वक्त काबुल में ब्रिटिश राजदूत शेरर्ड कोपेर कोलेस ने कहा कि आईएसआई का एक छोटा धड़ा हक्कानी नेटवर्प के सम्पर्प में है। इनके बारे में पश्चिमी देशों को कभी जानकारी नहीं मिली। इस कार्यक्रम में तालिबान के कुछ स्वयंभू कमांडरों ने खुलासा किया कि ब्रिटेन और अमेरिका के सैनिकों के खिलाफ तालिबान की लड़ाई में पाक का समर्थन मिलता है। एक स्वयंभू कमांडर मुल्ला अजीजुल्ला के मुताबिक आतंकवादियों के लिए प्रशिक्षण शिविर चला रहे विशेषज्ञ आईएसआई के सदस्य हैं। उनका किसी न किसी तरह इस खुफिया एजेंसी से जुड़ाव है। उसने कहा कि वे पहले हमें विस्फोटों के बारे में बताते हैं, उसके बाद हम लोगों को व्यवहारिक जानकारियां दी जाती हैं। प्रशिक्षण के समय वे शिविर में मौजूद रहते हैं। बीबीसी तो अपनी स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है। उनका हर प्रोग्राम सोच समझकर दिया जाता है। जब बीबीसी कहता है कि आईएसआई मुंबई हमलों का मास्टर माइंड थी तो यह सही ही है।
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