एक बार फिर ईरान और अमेरिका में तनाव बढ़ गया है। अमेरिका ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होरमुज जलडमरु मध्य को खुला रखने और परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान के साथ गतिरोध बढ़ने की सूरत में इस्लामिक देश के भीतर तक वॉर करने के लिए फारस की खाड़ी में और अधिक युद्धपोतों तथा लड़ाकू विमानों को रवाना कर दिया है। वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि खाड़ी में सेना की मौजूदगी को और मजबूती प्रदान करने के लिए नई तैनाती का मकसद इजरायल को यह आश्वासन देना है कि अमेरिका ईरान की परमाणु महत्वकांक्षाओं के पर कतरने के प्रति गम्भीर है। अमेरिका द्वारा खाड़ी में नई फौजों को भेजने की रिपोर्ट की इस घोषणा में बाद चर्चा है कि उसने इजरायल पर हमला करने के सक्षम नई रेंज की बैलास्टिक मिसाइल का परीक्षण किया है। ईरान की समाचार समिति इरना ने कहा कि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने मध्य ईरान के काबीर मरुस्थल में दो हजार किलोमीटर तक मार करने में सक्षम शाहाब तीन मिसाइलों का परीक्षण किया है। इरना ने यह भी कहा कि मध्य दूरी तक मारक क्षमता वाली शाहाब तीन के साथ ही ईरान ने 300 से 500 किलोमीटर तक मार करने वाली शाहाब एक और शाहाब दो मिसाइलों का भी परीक्षण किया है। अमेरिकी किसी भी कीमत पर सामरिक जल मार्ग को खुला रखने के लिए प्रतिबद्ध है ऐसा अमेरिकी अधिकारियों का कहना है। रक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि ईरान के लिए सन्देश है कि `इसके बारे में सोचना भी मत।' हमारे पोतों और वाणिज्यिक पोतों को परेशान करने के लिए अपनी नौकाएं भेजने के बारे में सोचना भी नहीं है। हम इन्हें डुबा देंगे। रिपोर्ट में कहा गया कि बसंत ऋतु के बाद से लड़ाकू एफ-22 और एक शराने एफ-15सी युद्ध विमानों को फारस की खाड़ी में दो अलग-अलग अड्डों पर भेजा गया था और इसका मकसद क्षेत्र में पहले से मौजूद लड़ाकू विमानों के बेड़े को मजबूती प्रदान करना था। अन्दर तक मार करने वाले इस रन पर विमानों से अमेरिका के क्षेत्र में तटीय मिसाइल बैटरियों के खिलाफ सैन्य क्षमता मजबूत होगी। ईरान दरअसल अमेरिकी धमकियों से दबने वाला नहीं। अमेरिका और इजरायल को सबसे बड़ी चिन्ता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है। पिछले दिनों ईरान को ब्रिक्स देशों से भी समर्थन मिलने से उसका विश्वास बढ़ा है। ब्राजील, रूस, चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीकाöइन पांच देशों के संगठन ब्रिक्स ने मध्य एशिया संकट पर अमेरिकी दबाव को दरकिनार करते हुए कहा कि वह अंतर्राष्ट्रीय समझौते के दायरे में ईरान के परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के अधिकार को मंजूर करता है। ब्रिक्स के मुताबिक ईरान में जारी चिन्ताजनक हालात को संघर्ष का रूप लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इसके विनाशकारी परिणाम किसी के हित में नहीं होंगे। उसका मानना है कि इस समस्या का समाधान राजनयिक, राजनीतिक तरीके से और संबंधित पक्षों को साफ कहा है कि समस्या का हल मिल बैठ कर निकालें।
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Friday, 6 July 2012
Saturday, 12 May 2012
Hidden agenda of Hillary Clinton’s visit
- Anil Narendra
US Secretary of State, Hillary Clinton's three days visit to India is important on several counts. Generally an American is an expert in killing many birds with one stone. Hillary's visit to West Bengal and giving much importance to Mamata Bannerjee could not be without purpose. Did she come to Kolkata on Prime Minister Manmohan Singh's calling, because Mamata Bannerjee has been a thorn in the flesh for the UPA Government for quite some time. Whether it is Indo-Bangaladesh Teesta Water Treaty or FDI in retail sector, Mamata has always been adamant on her stand. I have referred to these two issues, as Hillary Clinton came to Kolkata direct from Dacca. Her meeting with the Chief Minister of West Bengal, Mamata Bannerjee, is being considered first such exercise by any US Secretary of State. It is clear from her visit that how much importance US attaches to Mamata Bannerjee and her government. On the second day of her visit, Hillary met Mamata Bannerjee at the Government Secretariat at Writers' Building. In fact, this meeting was long awaited, when the Times magazine had included Mamata Bannerjee among most powerful 100 persons of the world and announcement of the India visit of Hillary Clinton. There is nothing unusual in the way Hillary Clinton expressed hopes about solution to the issue of water sharing between India and Bangaldesh on reaching Kolkata from Dacca, but important thing is the issuance of such a statement from Kolkata. Perhaps, she is aware of the fact, that water sharing agreement, especially the Teesta River Water Sharing agreement can only fructify when Mamata Bannerfee adopts favourbale attitude. In fact, she should have expressed her opinion not at Kolkata, but at New Delhi. Before coming to New Delhi, the way she did not even blink her eyes in telling that India should keep off Iran, clarifies that she has an agenda? In fact, India's weak foreign policy has allowed US to further its agenda. US not only want India to keep off Iran, but it is trying its best to stop India from buying crude oil from Iran. The Government of India must categorically tell US that in case India stops buying oil from Iran, then how will it fulfill its needs? The US is just telling India not do this or do that, but has not suggested any alternative to the problem. The US has its own agenda and it always keeps its interests paramount while dealing with other nations. Whether it's Iran or Pakistan, it always frames its policies with keeping its interests in mind and it does not bother about India's interests. This fact must be understood by the Central Government as well as by Didi. Mamata Bannerjee must not vitiate her mind and thoughts with the importance being given to her by Hillary. If Hillary is according undue importance to her, then there must be some policy decision by the US administration as its base.
Thursday, 10 May 2012
हिलेरी क्लिंटन की यात्रा का हिडन एजेंडा?
अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की तीन दिवसीय भारतीय यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। आमतौर पर अमेरिका एक तीर से कई शिकार करता है। हिलेरी का पश्चिम बंगाल आना और ममता को इतना भाव देना बिना किसी ठोस उद्देश्य के नहीं हो सकता। क्या यह पधानमंत्री मनमोहन सिंह के कहने पर कोलकाता आईं? क्योंकि पिछले कई दिनों से ममता बनर्जी यूपीए सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। चाहे मामला भारत-बांग्लादेश का तीस्ता जल संधि का रहा हो, चाहे वह रिटेल में पत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का रहा हो ममता अपने स्टैंड पर अड़ी हुई हैं। मैंने इन दोनों मुद्दों का इसलिए भी जिक किया है क्योंकि हिलेरी क्लिंटन कोलकाता सीधा ढाका से आईं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता के साथ उनकी बैठक को किसी भी अमेरिकी विदेश मंत्री की इस तरह की पहली कवायद माना जा रहा है। हिलेरी की इस यात्रा से साफ हो गया है कि अमेरिकी सरकार बनर्जी और उनकी सरकार को कितनी तवज्जो दे रही हैं। अपने दौरे के दूसरे दिन सोमवार को हिलेरी ने राज्य सचिवालय रायटर्स बिल्डिंग में ममता बनर्जी से मुलाकात की। इस मुलाकात का इंतजार तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 'टाइम' पत्रिका की ओर से दुनिया की सौ सबसे ताकतवर लोगों में शुमार किए जाने और अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के भारत दौरे के एलान के समय से ही था। हिलेरी ने ढाका के बाद कोलकाता आकर जिस तरह यह अपेक्षा जताई कि भारत और बांग्लादेश के बीच जल बटवारे का मुद्दा सुलझे उसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं, लेकिन यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने यह बात कोलकाता में कही। सम्भवत वह इससे अच्छी तरह अवगत हैं कि दोनों देशों के बीच जल बंटवारे और विशेष रूप से तीस्ता नदी का मामला तभी सुलझ सकता है जब ममता बनर्जी अनुकूल रवैया अपनाएंगी। बावजूद इसके उन्हें अपनी अपेक्षा कोलकाता की बजाए नई दिल्ली में व्यक्त करनी चाहिए थी। उन्होंने नई दिल्ली आने से पहले जिस तरह यह स्पष्ट करने में संकोच नहीं किया कि भारत को ईरान से दूर रहना चाहिए उससे यह साफ हो जाता है कि उनका एजेंडा क्या है? विदेश नीति के मोर्चे पर भारत के ढुलमुल रवैए के कारण अमेरिका को अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है। अमेरिका न केवल यह भी चाह रहा है कि भारत ईरान से दूर रहे बल्कि इसके लिए सारे जतन भी कर रहा है कि वह उससे तेल खरीदना भी बंद कर दे। जो बात भारत सरकार को अमेरिका से स्पष्ट करनी चाहिए वह है कि अगर भारत ईरान से तेल खरीदना बंद कर देगा तो अपनी जरूरतें पूरी कैसे करेगा? आखिर अमेरिका कोई वैकल्पिक उपाय तो सुझा नहीं रहा। अमेरिका का अपना एजेंडा है और वह अपने हितों के अनुसार ही काम करता है। उनकी चाहे ईरान हो, चाहे पाकिस्तान हो अपने हितों के अनुसार नीतियां बनती हैं और उसे भारत के हितों की चिंता नहीं है। यह बात केंद्र सरकार को भी समझनी चाहिए और दीदी को भी। ममता को हिलेरी का इतना भाव देने से अपना दिमाग और सोच खराब नहीं करनी चाहिए। अगर हिलेरी उन्हें भाव दे रही हैं तो इसके पीछे अमेरिकी नीति है।
America, Anil Narendra, Daily Pratap, Hillary Clinton, India, Iran, Mamta Banerjee, Pakistan, USA, Vir Arjun
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Thursday, 22 March 2012
क्या सैयद मोहम्मद काजमी पर दिल्ली पुलिस झूठा केस बना रही है?
इजरायली दूतावास की कार में विस्फोट के मामले में गिरफ्तार पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी क्या निर्दोष हैं जिन्हें जबरन दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है या यह हमले में शामिल एक महत्वपूर्ण कड़ी है? यह प्रश्न काजमी की गिरफ्तारी के बाद से ही अखबारों में बना हुआ है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने इजरायल और अमेरिका के कहने पर काजमी को गिरफ्तार किया और उसकी गिरफ्तारी की असल वजह थी कि वह अपनी टीवी रिपोर्टों में मध्य-पूर्व की सही स्थिति पेश करता था जिससे दोनों इजरायल और अमेरिका नाराज थे और उसे रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने यह ड्रॉमा रचा है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य प्रमुख शिया धर्मगुरु मौलाना कल्वे जव्वाद ने लखनऊ में कहा कि दिल्ली के पुलिस आयुक्त इजरायली एजेंट हैं और उनकी सम्पत्ति की जांच होनी चाहिए। मौलना जव्वाद ने मीडिया से कहा कि देश में पिछले करीब 20 वर्षों से बेकसूर मुसलमानों को आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप में गिरफ्तार करने का सिलसिला जारी है। गत 13 फरवरी को दिल्ली में हुए विस्फोट में वरिष्ठ पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी की गिरफ्तारी इसकी नई कड़ी है। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस नए-नए सुबूत पेश कर रही है। मामले की जांच में जुटे सूत्रों ने बताया कि काजमी के ईरान से गहरे रिश्ते होने के पक्के सुबूत मिले हैं। काजमी कई बार ईरान गया था। इस दौरान उसने ब्लास्ट से जुड़े दूसरे ईरानियों से मुलाकात की थी। काजमी ने पुलिस को बताया कि वह 7 जनवरी 2011 को ईरान गया था। इस बार उसकी मुलाकात सैयद अली और अली रजा से हुई थी। सैयद अली ने उसे ईरानी साइंटिस्ट की मौत का बदला लेने की बात कही थी। सैयद ने उसे तेहरान में 3000 डालर और एक मोबाइल फोन भी उपलब्ध कराया। वापस दिल्ली लौटने पर उसकी कई बार सैयद से फोन पर बात हुई। मई 2011 में ईरान से उसे सैयद ने फोन कर इजरायली डिप्लोमेट को निशाना बनाने की बात कही थी। उसे इस हमले के लिए ईरान से आने वाले लोगों के लिए दिल्ली में मदद करने के निर्देश मिले थे। पुलिस का दावा है कि योजना के मुताबिक ईरानी हमलावरों के दिल्ली आने पर काजमी ने उन्हें न सिर्प करोल बाग में फैज रोड स्थित होटल में ठहराया बल्कि इजरायली डिप्लोमेट के आने-जाने का रूट पता करने में भी उनकी मदद की। इसके लिए किराये पर ली गई मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल किया गया। ज्ञात रहे कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने जोरबाग के कर्बला इलाके में रहने वाले फ्रीलांस पत्रकार मोहम्मद काजमी को 6 मार्च को गिरफ्तार किया था। पुलिस आयुक्त ने बताया कि सन् 2011 में जब काजमी ईरान गया था तो इसकी मुलाकात सैयद अली, मोहम्मद रजा और ईरानी अफसर से हुई। मलेशिया में बैठे गैंग के मास्टर माइंड मोहम्मद मसूद के दिशानिर्देश पर सैयद अली और मोहम्मद रजा ने दिल्ली में इजरायली डिप्लोमेट पर हमला करवाने में काजमी को पैसों का लालच दिया। इसके लिए 5500 डालर देने की बात कही गई। काजमी तैयार हो गया और फिर ईरानी अफसर के साथ दिल्ली चला गया। 10 फरवरी को सैयद अहमद, मोहम्मद रजा खान और अब्दुल फजी मेंहदियान भी दिल्ली आ गए। तीनों काजमी के यहां रुके हुए थे। अगले दिन काजमी की आल्टो में बैठकर तीनों ने इजरायल दूतावास के साथ-साथ नई दिल्ली रेंज इलाके का भ्रमण कर हमले की रूपरेखा तैयार की। उधर अफसर ईरानी ने करोल बाग के रहने वाले एक युवक के सहयोग से एक स्कूटी खरीदी। इसी स्कूटी का इस्तेमाल कार में स्टिकी बम लगाने के लिए प्रयोग में लाया गया था। अफसर से मलेशिया में बैठा उसका आका मसूद सम्पर्प में था। उधर मसूद की हां पर 14 फरवरी को बैंकाक और जॉर्जिया में हमला किया गया। इस हमले को मोरादी सईद और मोहम्मद काजी ने अंजाम दिया था। मोहम्मद काजी को बैंकाक पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। वहीं मलेशिया पुलिस के हत्थे सभी धमाकों का मास्टर माइंड मसूद भी चढ़ गया। दिल्ली में हुए ब्लास्ट के 24 घंटे में इजरायल की जांच एजेंसी मोसाद की एक टीम दिल्ली पहुंच गई थी और लगातार जांच कर रही है। पुलिस सूत्रों के अनुसार मोसाद के एजेंट जल्द ही रिमांड पर चल रहे काजमी से पूछताछ कर सकते हैं। वहीं दिल्ली पुलिस पूरे मामले से परदा उठाने के लिए मलेशिया में गिरफ्तार मसूद से भी पूछताछ करने के लिए मलेशिया सरकार से सम्पर्प कर रही है। अब दिल्ली पुलिस सही कह रही है या यह सारी कहानी जबरन बनाई गई है, इसका फैसला तो अदालत में हो ही जाएगा। उम्मीद है कि सच्चाई की जीत होगी। वैसे दिल्ली पुलिस को यह केस अदालत में साबित करना होगा। इससे दिल्ली पुलिस की प्रतिष्ठा जुड़ चुकी है। यह मामला अब पूरी तरह इंटरनेशनल हो चुका है।
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Tuesday, 13 March 2012
इजरायली राजनयिक पर हमले में ईरानी पत्रकार की गिरफ्तारी?
13 फरवरी को नई दिल्ली के अति सुरक्षित क्षेत्रों में से एक औरंगजेब रोड पर इजरायली महिला राजनयिक टाल योहाशुआ की इनोवा कार के पिछले हिस्से में एक मोटर साइकिल सवार ने मैग्नेटिक डिवाइस (स्टिकी बम) लगा दिया था। इसके तत्काल बाद हुए विस्फोट से कार में आग लग गई थी। महिला राजनयिक व कार चालक मनोज घायल हो गए थे। तीन अन्य गाड़ियां भी इसकी चपेट में आई थी, दिल्ली पुलिस ने इस धमाके के सिलसिले में एक ईरानी व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। ईरानी व्यक्ति ने स्वयं को एक न्यूज एजेंसी का पत्रकार बताया है। गिरफ्तार व्यक्ति का नाम सैयद मोहम्मद काजमी (50 वर्ष) है और वह ईरानी न्यूज एजेंसी के लिए काम करता था। पुलिस का कहना है कि सैयद मोहम्मद काजमी की गिरफ्तारी के सुराग बैंकाक से मिले थे। याद रहे कि जिस दिन दिल्ली में कार बम लगाया गया था ठीक उसी दिन बैंकाक में भी एक धमाका करने का असफल प्रयास किया गया था। दिल्ली में हुए धमाके के तार न केवल बैंकाक से ही जुड़े हैं बल्कि जार्जिया से भी जुड़े हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि दूतावास की कार पर हुए बम धमाके की पहली कामयाबी भी इसी का नतीजा है। फिलहाल पुलिस इस हमले के पीछे शामिल संगठन के नाम का खुलासा नहीं कर रही है लेकिन कहीं न कहीं इस हमले के पीछे ईरानी संगठन पूंड्स (क्यूयूडीएस) के हाथ होने की आशंका जरूर जताई जा रही है। दरअसल बैंकाक में हुए विस्फोट के बाद वहां से कुछ संदिग्ध ईरानी फरार हो गए थे, जिनमें एक महिला भी शामिल थी। बैंकाक पुलिस को उस महिला के घर की तलाशी में एक टेलीफोन डायरी मिली थी जिसमें काजमी का मोबाइल नम्बर था। काजमी के खिलाफ कई महत्वपूर्ण सुबूत मिले हैं। आशंका जताई जा रही है कि हमलों के पीछे ईरानी सेना की स्पेशल फोर्स है, जिसे खासतौर से ईरान-इराक युद्ध के समय गठित किया गया था। मोहम्मद अहमद काजमी को सूचनाएं जुटाने के लिए डालर में भुगतान किया गया था। ब्लास्ट में जिस मोटर साइकिल का इस्तेमाल किया गया वह करोल बाग इलाके से किराये पर ली गई थी। हमलावर विदेश से आकर पहाड़गंज के एक होटल में ठहरे थे। बताया जा रहा है कि स्टिकी बम इसी होटल में तैयार किया गया। पूरे मामले का दुःखद पहलू यह है कि विदेशी बाम्बर जिसने औरंगजेब रोड में कार पर बम लगाया था वह गृह मंत्रालय की सुस्ती के कारण उसी दिन इन्दिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से दक्षिण-एशिया के किसी देश की फ्लाइट से भाग गया। 3 बजे के लगभग दोपहर को बम लगाने के 8 घंटे बाद वह निकल गया। गृह मंत्रालय या किसी और सरकारी एजेंसी ने हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन को सूचित नहीं किया कि अमूक व्यक्तियों को रोका जाए, पूछताछ की जाए। गृह मंत्रालय की यह चूक इसलिए भी चिन्ता का विषय है कि बम धमाका होने के तुरन्त बाद इजरायल ने कह दिया था कि हमले के पीछे ईरान का हाथ है। इमिग्रेशन में हर ईरानी को रोक कर तसल्ली करनी चाहिए थी जो नहीं की गई और हमलावर भागने में सफल रहा। इस मामले में गिरफ्तार मोहम्मद अहमद काजमी के परिजनों ने दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस कर कहा है कि पुलिस द्वारा बरामद स्कूटी उनके एक रिश्तेदार की है। करीब दो साल से वह स्कूटी उनके घर पर खड़ी थी। परिवार का कोई सदस्य उस स्कूटी का उपयोग नहीं करता है। मोहम्मद काजमी के दूसरे बेटे शौजब काजमी ने गिरफ्तारी के अरेस्ट मेमो पर हस्ताक्षर के लिए पुलिस का दबाव बनाने का भी आरोप लगाया है। अपने घर पर किसी ईरानी के आकर ठहरने से इंकार किया। परिजनों का यह भी कहना था कि कर्बला मामले में उनके पिता ने सक्रिय भूमिका निभाई है। बीके दत्त कॉलोनी में उनका अकेला मुस्लिम परिवार है। पेशे से पत्रकार मोहम्मद अहमद काजमी मूल रूप से मेरठ निवासी है। वरिष्ठ पत्रकार सैयद नकवी ने मोहम्मद काजमी की गिरफ्तारी को लेकर कठघरे में खड़ा किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इजरायल के इशारे पर पत्रकार को इजरायली दूतावास कार ब्लास्ट में जबरन गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने इसका मुख्य कारण भी दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के इशारे पर अरब मुल्कों में विद्रोह हो रहा है। उसकी सच्चाई को सैयद मोहम्मद अहमद काजमी ने दुनिया के सामने रखा और इसी के कारण अमेरिका और इजरायल के दबाव में दिल्ली पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। दिल्ली पुलिस को अपना केस मजबूत कर लेना चाहिए क्योंकि इस केस पर न केवल देश के अन्दर ही बल्कि दुनिया भी देख रही है। इस केस में दिल्ली पुलिस की प्रतिष्ठा एक बार फिर दांव पर है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Delhi, delhi Police, Iran, Israil, Mohd. Ahmed Kazmi, Terrorist, Vir Arjun
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Wednesday, 22 February 2012
ज्वालामुखी के ढेर पर बैठा मध्य-पूर्व
पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध की ज्वालामुखी के ढेर पर खड़ा होता जा रहा है। परमाणु आयुध बनाने में जुटे ईरान ने जहां अपने युद्धपोत जैद्दाह बन्दरगाह से सीरिया के तट के पास तैनात कर दिए हैं वहीं ईरानी रेवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दो दिवसीय जमीनी सैन्य युद्धाभ्यास शुरू कर अमेरिका और पड़ोसी इजरायल जैसे कट्टर विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी कर ली है। उधर ब्रिटेन ने इजरायल को चेतावनी दी है कि अगर ईरान पर हमला हुआ तो भारी नुकसान की कीमत चुकानी होगी। ये युद्धपोत ईरान ने स्वेज नहर के रास्ते भू-मध्य सागर के किनारे बसे सीरिया भेजे हैं ताकि उसके परमाणु ठिकानों पर किसी भी तरह के हमलों का जवाब दे सकें। इधर उत्तर कोरिया ने भी सैन्य अभ्यास की सूरत में हमले की चेतावनी दे डाली है। ईरान की संवाद समिति इरना ने देश के नौसेना प्रमुख एडमिरल हबीबुल्ला सचारी के हवाले से कहा कि ईरान ने भू-मध्य सागर में अपने युद्धपोत तैनात करके विरोधियों को क्षेत्र में अपनी ताकत का अहसास करा दिया है। उन्होंने बताया कि ईरानी नौसेना इस्लामी क्रांति के बाद दूसरी बार स्वेज नहर के रास्ते भू-मध्य सागर तक पहुंची है। ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड्स का कहना है कि उसने सम्भावित बाहरी खतरों से देश की रक्षा के मद्देनजर अपनी क्षमताएं बढ़ाने के लिए दो दिवसीय एक जमीनी अभ्यास शुरू किया है। यह रेवोल्यूशनरी गार्ड्स ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य इकाई है। गौरतलब है कि ईरान ने अमेरिका और इजरायल की चेतावनियों को नजरंदाज करते हुए उठाया है। अमेरिका के रक्षामंत्री लियोन पैनेटा ने कल ही ईरान को सख्त चेतावनी दी थी कि यदि उसने हरभुज जल संधि बन्द की या परमाणु हथियार बनाए तो उसके खिलाफ कार्रवाई के हर विकल्प खुले हैं। पैनेटा ने कहाöहम स्पष्ट कर चुके हैं कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बना सकता। हम इसे हरगिज बर्दाश्त नहीं करेंगे कि वह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख जलमार्ग हरभुज जल संधि को बन्द करे। इस क्षेत्र से दुनिया के पांचवें हिस्से का तेल व्यापार होता है। यह अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र है। हम ईरान को इसे बन्द करने की इजाजत नहीं देंगे। उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने इराकी तेल भंडार को हड़पने के लिए कुवैत के जरिये इराकी तानाशाह सद्दाम हुसैन को घातक रासायनिक हथियार नष्ट करने के बहाने नेस्तनाबूद कर दिया था जबकि जानमाल और तेल कुओं की भीषण तबाही के बावजूद इराक में ऐसा कोई हथियार नहीं मिला। ईरान को डर सता रहा है कि अमेरिका उसके परमाणु संयंत्रों में घातक हथियार बनाने के बहाने इजरायल के सहयोग से उस पर कभी भी चढ़ाई कर सकता है। ईरान ने भी ऐसे किसी तरह के हमले का मुंहतोड़ जवाब देने की पूरी तैयारी कर ली है। उधर फारस की खाड़ी में तनाव के बीच ब्रिटेन ने इजरायल से कहा है कि ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों को तबाह करने के लिए पहले कोई हमला करने के भारी नकारात्मक पहलू है और ऐसा करना नुकसानदेह साबित हो सकता है। अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार द वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा है कि दरअसल लियोन पैनेटा से बातचीत के बाद हमारे एक पत्रकार ने लिखा है कि पेंटागन प्रमुख का यह मानना है, `इस बात की ठोस आशंका है कि अप्रैल, मई या जून के महीने में इजरायल सरकार ईरान पर हमला करेगी।' मध्य-पूर्व ज्वालामुखी के ढेर पर बैठा है जो किसी भी समय फट सकता है।
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Saturday, 18 February 2012
ईरान के उग्र रूप का पश्चिमी देश क्या जवाब देंगे?
ईरान किसी के आगे झुकने वाला नहीं है। यही उसकी परम्परा रही है और उसी परम्परा पर वह कायम है। पश्चिमी देशों के बढ़ते दबाव का ईरान पर लगता है उल्टा ही असर हुआ है। अब वह पहले से भी उग्र हो गया है। ईरान ने पश्चिमी देशों के खिलाफ बुधवार को सख्त रुख अख्तियार कर लिया। अमेरिका और यूरोपीय देशों की धमकियों को अनदेखा करते हुए उसने न केवल अपने एटमी कार्यक्रम की सफलता का ऐलान किया बल्कि यूरोपीय देशों की तेल सप्लाई रोकने की धमकी भी दे दी। तेहरान में एक समारोह के दौरान ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिका बेवजह की भभकी देता रहता है। उसमें अब कोई दम नहीं बचा है। जरूरत पड़ी तो ईरान उसे सबक भी सिखा सकता है। फारस की खाड़ी में सैन्य ताकत का प्रदर्शन करने के बाद ईरान ने बुधवार को अपने विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम की नुमाइश भी की। पश्चिमी देशों द्वारा लगातार दी जा रही चेतावनियों व प्रतिबंधों को धत्ता बताते हुए ईरान ने दावा किया कि उसने परमाणु रिएक्टर में इस्तेमाल हेने वाले चौथी पीढ़ी के स्वदेशी सेंट्रीफ्यूज (ईंधन छड़ें) बना लिए हैं। खुद राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने उत्तरी तेहरान स्थित परमाणु रिएक्टर में सेंट्रीफ्यूज लगाया। ईरान के सरकारी टीवी ने इसका सीधा प्रसारण किया। महमूद अहमदीनेजाद ने बाद में ऐलान किया कि जल्द ही ईरान दुनिया के चुनिन्दा परमाणु ताकतों में शुमार होगा। उन्होंने कहा कि हमने 9000 सेंट्रीफ्यूज तैयार कर लिए हैं। रिएक्टर में सेंट्रीफ्यूज रॉड लगाने के बाद अहमदीनेजाद ने कहा, `ईरान पर प्रतिबंध लगाए गए हैं और प्रतिबंध लगाए जाने का प्रस्ताव है, लेकिन इससे तेहरान को कोई फर्प नहीं पड़ा है। पश्चिमी देश नहीं चाहते कि ज्ञान और प्रगति पूरी दुनिया में फैले।' जो देश तरक्की करना चाहते हैं उन्हें इन दबावों और अड़चनों से लड़ना पड़ेगा।
ईरान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। इराक, कुवैत के तेल कुओं पर कब्जे वाला फॉर्मूला अमेरिका लगता है यहां भी आजमाना चाहता है। लेकिन रूस, चीन और भारत का साथ नहीं मिलने की वजह से वह सीधी कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। यूरोप का 18 फीसदी कच्चा तेल ईरान से आयात होता है और बुधवार को खबर आई कि ईरान ने नीदरलैंड, इटली, स्पेन, यूनान, पुर्तगाल और फ्रांस की तेल आपूर्ति बन्द करने की धमकी भी दी है। उधर अमेरिका, इजराइल का मानना है कि ईरान एटमी हथियार इसलिए बना रहा है ताकि वह इजराइल पर हमला कर सके। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरान आतंकवाद का सबसे बड़ा निर्यातक है। उसका आतंकी अभियान उजागर हो चुका है। वह हमारे निर्दोष राजनयिकों को नुकसान पहुंचा रहा है। ईरान के खिलाफ लक्ष्मण रेखा खींचनी चाहिए। वह दुनिया की शांति और स्थिरता के लिए खतरा है। अमेरिका भारत पर भी ईरान के खिलाफ खड़ा होने के लिए दबाव बना सकता है पर भारत को इस दबाव में नहीं आना चाहिए। ईरान के साथ संबंधों को कैसे चलाना है, इस पर किसी तीसरे मुल्क की इच्छा नहीं चलेगी। अब देखना यह है कि अमेरिका और यह पश्चिमी देश अहमदीनेजाद की ताजा धमकियों और उसके एटमी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के इरादों से कैसे निपटते हैं? मध्य पूर्व में स्थिति तनावपूर्ण बनती जा रही है। छोटी-सी भी चिंगारी आग में बदल सकती है।
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ईरान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। इराक, कुवैत के तेल कुओं पर कब्जे वाला फॉर्मूला अमेरिका लगता है यहां भी आजमाना चाहता है। लेकिन रूस, चीन और भारत का साथ नहीं मिलने की वजह से वह सीधी कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। यूरोप का 18 फीसदी कच्चा तेल ईरान से आयात होता है और बुधवार को खबर आई कि ईरान ने नीदरलैंड, इटली, स्पेन, यूनान, पुर्तगाल और फ्रांस की तेल आपूर्ति बन्द करने की धमकी भी दी है। उधर अमेरिका, इजराइल का मानना है कि ईरान एटमी हथियार इसलिए बना रहा है ताकि वह इजराइल पर हमला कर सके। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरान आतंकवाद का सबसे बड़ा निर्यातक है। उसका आतंकी अभियान उजागर हो चुका है। वह हमारे निर्दोष राजनयिकों को नुकसान पहुंचा रहा है। ईरान के खिलाफ लक्ष्मण रेखा खींचनी चाहिए। वह दुनिया की शांति और स्थिरता के लिए खतरा है। अमेरिका भारत पर भी ईरान के खिलाफ खड़ा होने के लिए दबाव बना सकता है पर भारत को इस दबाव में नहीं आना चाहिए। ईरान के साथ संबंधों को कैसे चलाना है, इस पर किसी तीसरे मुल्क की इच्छा नहीं चलेगी। अब देखना यह है कि अमेरिका और यह पश्चिमी देश अहमदीनेजाद की ताजा धमकियों और उसके एटमी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के इरादों से कैसे निपटते हैं? मध्य पूर्व में स्थिति तनावपूर्ण बनती जा रही है। छोटी-सी भी चिंगारी आग में बदल सकती है।
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Thursday, 16 February 2012
दिल्ली, तिबलिस और बैंकाक धमाकों का कोई आपसी रिश्ता है?
दिल्ली के अति सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्र में इजराइली दूतावास की कार को निशाना बनाने और जार्जिया की राजधानी में असफल बम विस्फोट के प्रयास के 24 घंटे बाद थाइलैंड की राजधानी बैंकाक में लगातर तीन धमाके साबित करते हैं कि यह दहशतगर्द जब चाहे, जहां चाहे हमले कर सकते हैं। यह भी एक बार फिर साबित होता है कि पूरी दुनिया आज आतंकवाद की जकड़ में फंस चुकी है। मंगलवार को बैंकाक में महज 100 मीटर के दायरे में तीन धमाके हुए। घटना में हमलावर समेत पांच लोग घायल हुए हैं। मौके से मिले पहचान पत्र से हमलावर के ईरानी होने की आशंका है। हमलावर की शिनाख्त मोरादी के रूप में हुई है। उसने राजधानी बैंकाक के भीड़भाड़ वाले इलाके में बम फेंके। तीसरा बम पेड़ से टकराने के कारण मोरादी के ही पैर के पास फटा, जिससे वह खुद भी घायल हो गया। उसके एक और ईरानी मददगार मोहम्मद इजाई को भी गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियों ने हमले की दिल्ली और जार्जिया की घटना से तार जुड़ने की आशंका जताई है। इस घटना में हमलावर सहित तीन थाई पुरुष और एक महिला भी घायल हुईं। थाई प्रधानमंत्री चिंगलक शिनवात्रा ने पुलिस और देश के राष्ट्रीय गुप्तचर एजेंसी को तिहरे विस्फोट के जांच के आदेश दिए हैं। थाई विदेश मंत्री को ईरान से बात करने को कहा है। थाई प्रधानमंत्री शिनवात्रा गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली विशेष अतिथि के रूप में आई थीं। क्या उनकी यात्रा का, दिल्ली में पहले धमाके फिर बैंकाक में धमाके, इनमें कोई आपसी कनैक्शन है? थाई पुलिस के जनरल पांसिटी प्रापावात ने बताया कि सुरक्षा बलों ने राजधानी स्थित हमलावर के किराये के मकान से भी विस्फोटक बरामद किए। स्थानीय मीडिया के मुताबिक ईरानी मूल के नागरिक ने टैक्सी रोककर चालक से कहीं चलने को कहा लेकिन चालक के मना करने से वह नाराज हो गया और उसने टैक्सी पर बम से हमला कर दिया। वहां खड़े पुलिसकर्मियों ने जब वह वाकया देखा तो वे टैक्सी के पास पहुंचे। हमलावर ने पुलिसकर्मियों पर भी बमों से दूसरा हमला कर दिया लेकिन सुरक्षाकर्मियों की किस्मत अच्छी थी और यह बम एक पेड़ से टकरा गया और खुद हमलावर पर आ गिरा। विस्फोट से हमलावर का पैर उड़ गया तथा हमलावर को पकड़ लिया गया। घटनास्थल से एक पासपोर्ट बरामद हुआ जिससे पता चला कि हमलावर का नाम सामरेब मोरादी है और वह ईरान का रहने वाला है। इससे पहले मध्य बैंकाक के इकामाई क्षेत्र में एक घर में विस्फोट हुआ। हमलावर सहित दो और ईरानी इसी घर में किरायेदार के रूप में रहते थे। सरकारी प्रवक्ता थीतिया चासेंग ने कहा कि पुलिस ने रिपोर्ट दी है कि मकान का प्रयोग बम बनाने के लिए किया जाता था। यहां से विस्फोटक पदार्थ और रिमोट कंट्रोल डिटोनेशन डिवाइसिस मिले हैं। फिलहाल बैंकाक की घटना और नई दिल्ली एवं जार्जिया की घटना का कोई संबंध नहीं स्थापित हो सका लेकिन इजराइल के विदेश विभाग के प्रवक्ता चिगाल पालमोर ने यरुशलम में कहा कि हम किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं कर रहे हैं। इन हमलों से ईरान सारी दुनिया की नजरों में आ गया है। पहले से ही अपने विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम की वजह से पश्चिमी देशों की आंखों की किरकिरी बने ईरान के लिए अब यह नई समस्या खड़ी हो गई है। निश्चित रूप से अमेरिका अब ईरान पर और दबाव डालेगा।
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अधिकतर आतंकी हमले 13 तारीख को क्यों?
क्या यह महज एक संयोग है कि भारत में अधिकतर आतंकी बम धमाकों की घटना 13 तारीख को ही होती है या फिर इस 13 का कुछ खास महत्व है? ताजा बम कांड 13 फरवरी को हुआ है। तकरीबन हर धमाका 13 तारीख को ही हुआ है। सितम्बर 2008 को भी राजधानी में 13 तारीख को ही बम ब्लास्ट हुआ था। मुंबई में पिछले साल जुलाई की 13 तारीख को ही सीरियल ब्लास्ट हुए थे। पुणे में जर्मन बेकरी धमाका भी 13 को ही हुआ था। 2001 में संसद भवन परिसर में भी 13 तारीख (दिसम्बर) को ही आतंकी हमला हुआ था। हमारे विशेषज्ञ अब इस बात की जांच में लगे हुए हैं कि 13 तारीख का इन आतंकियों के लिए क्या विशेष महत्व है। पधानमंत्री निवास में जो हमला हुआ वह ठीक उसी पकार का था, जो इसी साल 11 जनवरी को ईरान की राजधानी तेहरान में हुआ था जिसमें ईरान के एक परमाणु वैज्ञानिक मुस्तफा अहमदी रोशन की हत्या की गई थी। उस हमले में भी दो मोटर साइकिल पर सवार दो हत्यारों ने रोशन की पीजो कार पर इसी तरह का स्टिकी बम लगा दिया था। धमाका इतना तेज था कि वैज्ञानिक की मौके पर ही मौत हो गई। नई दिल्ली की घटना में इनोवा सवार सभी यात्री खुशकिस्मत थे कि जल्दी में युवक सही स्थान पर बम नहीं लगा सका। जांच करने वाले अधिकारियों की माने तो अगर यही बम कार के पीछे की बजाए किसी दरवाजे पर लगाया गया होता तो इसमें कहीं अधिक नुकसान होता। बताया जा रहा है कि हमलावर बम को दरवाजे पर लगाने में सफल नहीं होने के कारण पीछे लगा गए। विस्फोट का सारा असर इनोवा कार की पिछली सीट पर पड़ा। हमला इतना जोरदार था कि कार के टुकड़े और बम के स्पिंटर इस्राइली राजनयिक ताल येहोशुवा की पीठ में लगे। अगर यही बम कार के दरवाजे या फ्यूल टैंक के करीब लगाया गया होता तो उनका बचना नामुमकिन था। दाद देनी होगी इनोवा ड्राइवर मनोज शर्मा की। खुद घायल होने के बावजूद मनोज शर्मा ने हौंसला नहीं छोड़ा और गाड़ी से महिला राजनयिक को उतारा, एक ऑटो को रोककर सबसे पहले वह उसे सुरक्षित ठिकाने पर ले गया। इस्राइली दूतावास में पहुंचाने के बाद ताल येहोशुवा को पास के एक पाइवेट अस्पताल में एडमिट कराया गया जहां डाक्टरों ने उसकी पीठ में घुसे लोहे के टुकड़ों को ऑपरेशन से निकाला। राजधानी में औरंगजेब रोड पर इनोवा गाड़ी में स्टिकी बम से धमाके का मामला भले ही देश में पहला मामला हो, हॉलीवुड की फिल्मों में यह आम है। एक निश्चित टारगेट को उड़ाने के लिए इसका इस्तेमाल किया दिखाया जाता है। हॉलीवुड से पभावित होकर बॉलीवुड में भी अब यह पयोग में आने लगा है। स्टिकी बम का इस्तेमाल जेम्स बांड सीरिज फिल्मों के अलावा जासूसी फिल्मों में दिखाया जाता है। सिल्विसटर स्टैलोन की फिल्म स्पेशलिस्ट में स्टिकी बम का इस्तेमाल दिखाया गया है। इस बम की खासियत है लक्ष्य ही को नुकसान पहुंचाना, आसपास इसका कम असर होता है। साइज में यह छोटा होता है और इसे छिपाने व लक्ष्य पर लगाना आसान रहता है। बॉलीवुड में इस बम का इस्तेमाल सन्नी देओल की फिल्म जो बोले सो निहाल में, हाल ही में शाहरुख खान की फिल्म डॉन-2 में किया गया। पुलिस के आला अफसर भी मान रहे हैं कि विदेशी राजनयिकों की गाड़ी को उड़ाने का फॉर्मूला फिल्मों से लिया गया हो सकता है। हालांकि नक्सली इस पकार का बम इस्तेमाल करते हैं पर आतंकवादी जंग में यह भारत में पहली बार इस्तेमाल किया गया है।
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Wednesday, 1 February 2012
Can US ask Israel to attack Iran?
- Anil Narendra
The confrontation between Iran and Western countries is entering a dangerous phase. In Brussels, the European Union, under the leadership of the US has opened a new front against the Iranian leaders. US have been asking the Asian countries to stop importing crude oil from Iran. Iran is being pressurized from all sides and its currency is weakening. In response to the American campaign, Iran has threatened closure of the Strait of Hormuz, situated at the mouth of Persian Gulf. The Iranian threat has created concern in the world oil markets. Military experts are, however, questioning the ability of Iran to close the Strait. But, US and its allies have already warned Iran of stern action, in case he closes the Strait. The UAAS Abraham Lincoln along with British and French warships has entered the Persian Gulf without any resistance from Iran. Almost half of oil produced in the world is transported by tankers through identified sea lines. Though this oil blockade in the Strait of Hormouz in the Persian Gulf is temporary, yet it can escalate the energy cost world over to new heights. Terming the decision regarding restriction on purchase of the Iranian oil as unfair, Iran has said that this decision will have to be reversed very soon. Iran has clarified that its nuclear programme is for fulfilling its energy needs and it would continue with it in the face of all restrictions. Meanwhile, announcing the EU decision, Nicolas Sarkozi, the French President, Angela Merkel and the British Prime Minister, David Cameroon said in a joint statement that our message was clear. We have no enmity towards the Iranian people. But the Iranian leadership has failed to restore the trust of the international community regarding the peaceful nature of their nuclear programme. The European leaders have made it clear that they would not agree to Iran procuring nuclear weapons. The three leaders asked Iran to stop its sensitive nuclear activities immediately and called upon it to fully fulfill its international obligations.
The US is also afraid that Israel may take advantage of the situation and attack Iran. Quoting Pentagon sources, the Wall Street Journal has said that US President Barak Obama, Secretary of Defence, Leon Panetta and other senior officials have sent messages to Israel, warning it of grave consequences of attack on Iran. Obama also talked to Israeli President, Benjamin Netanyahu on phone. A few days earlier, an Iranian nuclear scientist was killed in a car bomb blast in Tehran. Iran had called Israel responsible for this attack. Immediately after the attack, an Iranian official said that the way, two motorcycle-borne assailants targeted the vehicle with magnetic bomb, was similar to the modus operendi adopted in killing of three other scientists during last two years. There were even anti-US slogans in the Iranian Parliament. The tension prevailing between Iran and these Western countries does not augur well for the rest of the world. If oil supply is obstructed, it would have its effect on India also. If it comes to war with Israel, then Iran would try to take Israel head on. On the other hand, America may use Israel in attacking Iran. The greatest threat from the Iranian nuclear programme is for Israel and it would never like Iran to become a nuclear country. In case, Israel takes military action against Iran, other Arab countries in the Middle East might be compelled to join hands with Iran against Israel. If it happens, already disturbed Middle East might become more disturbed. In fact, it has been the American policy to take control of the oil reserves of Arabian countries on one pretext or the other. Let us hope this confrontation is avoided.
The US is also afraid that Israel may take advantage of the situation and attack Iran. Quoting Pentagon sources, the Wall Street Journal has said that US President Barak Obama, Secretary of Defence, Leon Panetta and other senior officials have sent messages to Israel, warning it of grave consequences of attack on Iran. Obama also talked to Israeli President, Benjamin Netanyahu on phone. A few days earlier, an Iranian nuclear scientist was killed in a car bomb blast in Tehran. Iran had called Israel responsible for this attack. Immediately after the attack, an Iranian official said that the way, two motorcycle-borne assailants targeted the vehicle with magnetic bomb, was similar to the modus operendi adopted in killing of three other scientists during last two years. There were even anti-US slogans in the Iranian Parliament. The tension prevailing between Iran and these Western countries does not augur well for the rest of the world. If oil supply is obstructed, it would have its effect on India also. If it comes to war with Israel, then Iran would try to take Israel head on. On the other hand, America may use Israel in attacking Iran. The greatest threat from the Iranian nuclear programme is for Israel and it would never like Iran to become a nuclear country. In case, Israel takes military action against Iran, other Arab countries in the Middle East might be compelled to join hands with Iran against Israel. If it happens, already disturbed Middle East might become more disturbed. In fact, it has been the American policy to take control of the oil reserves of Arabian countries on one pretext or the other. Let us hope this confrontation is avoided.
Tuesday, 31 January 2012
ईरान पर क्या अमेरिका इजराइल से हमला करवा सकता है?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 30th January 2012
अनिल नरेन्द्र
ईरान बनाम पश्चिम देश लड़ाई खतरनाक दौर में आती जा रही है। यूरोपीय संघ ने अमेरिका के नेतृत्व में ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के लिए ब्रुसेल्स में ईरानी नेतृत्व के खिलाफ नया मोर्चा खोल दिया है। अमेरिका एशियाई देशों से भी ईरान से कच्चे तेल का आयात रोकने का आग्रह कर रहा है। इससे ईरान पर चौतरफा दबाव बन रहा है और उसकी मुद्रा कमजोर हो रही है। अमेरिकी मुहिम के जवाब में ईरान के अधिकारियों ने फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित होर्मुज जलडमरू बन्द करने की धमकी दी है। ईरान की इस धमकी की वजह से विश्वभर के तेल बाजारों में चिन्ता है। हालांकि सैन्य विशेषज्ञ ईरान की जलडमरू बन्द करने की क्षमता पर साल उठा रहे हैं। लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी पहले ही जलडमरू मध्य बन्द करने पर तीव्र कार्रवाई करने की चेतावनी दे चुके हैं। ब्रिटेन और फ्रांस के जंगी जहाजों के साथ अमेरिका का विमानवाहक पोत यूएएएस अब्राहम लिंकन बिना किसी प्रतिरोध के फारस की खाड़ी में प्रवेश कर गया। दुनिया के कुल तेल उत्पादन का आधा हिस्सा तय समुद्री मार्गों से टैंकरों द्वारा ले जाया जाता है। हालांकि फारस की खाड़ी में होर्मुज जलडमरू मध्य पर यह प्रतिबंध अस्थायी है फिर भी इस प्रतिबंध की वजह से दुनिया में ऊर्जा की लागत में काफी वृद्धि हो सकती है। ईरान ने उससे कच्चा तेल खरीदने पर प्रतिबंध लगाने के फैसले को पूरी तरह अनुचित बताते हुए कहा है कि इसे जल्द ही वापस लेना पड़ेगा। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए है और वह तमाम प्रतिबंधों के बावजूद जारी रहेगा। दूसरी ओर यूरोपीय संघ की घोषणा करते हुए फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सर्कोजी, जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल और ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने एक संयुक्त बयान में कहा कि हमारा संदेश साफ है। हमारी ईरानी जनता के साथ कोई लड़ाई नहीं है। लेकिन ईरानी नेतृत्व अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण प्रवृत्ति के बारे में अंतर्राष्ट्रीय विश्वास बहाल करने में नाकाम रहा है। यूरोपीय नेताओं ने कहा कि हम ईरान का परमाणु हथियार हासिल करना स्वीकार नहीं करेंगे। तीनों नेताओं ने ईरान के नेतृत्व से उसकी संवेदनशील परमाणु गतिविधियां तत्काल बन्द करने और अपनी अंतर्राष्ट्रीय बाध्यताओं को पूरी तरह पालन करने का आह्वान किया।
अमेरिका को इस बात की आशंका भी है कि कहीं इस विवाद का फायदा उठाते हुए इजराइल ईरान पर हमला न कर दे। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने पेंटागन सूत्रों के हवाले से बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, रक्षामंत्री लियोन पेनेटा और अन्य शीर्ष अधिकारियों ने इजराइली नेताओं को कई निजी संदेश भेजे हैं जिसमें हमले के गम्भीर नतीजों की चेतावनी दी गई है। ओबामा ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतात्याहू से फोन पर बात भी की है। कुछ दिन पहले तेहरान में एक कार बम विस्फोट में ईरान के एक परमाणु वैज्ञानिक की मौत हो गई थी। ईरान ने इस हमले के लिए इजराइल को जिम्मेदार ठहराया था। ईरान के एक अधिकारी ने इस हमले के फौरन बाद कहा कि दो लोगों ने एक मोटरसाइकिल पर आकर जिस तरह वाहन को मैग्नेटिक बम से अपना निशाना बनाया, वह तरीका वैसा ही है जैसा पिछले दो साल में तीन और वैज्ञानिकों को निशाना बनाने के लिए अपनाया था। ईरान की संसद में अमेरिकी मुर्दाबाद, इजराइल मुर्दाबाद के नारे तक लगे। ईरान और इन पश्चिमी देशों के बीच चल रहा तनाव सारी दुनिया के लिए खतरे का संकेत है। अगर तेल सप्लाई प्रभावित होती है तो भारत भी प्रभावित हो सकता है। ईरान का प्रयास होगा कि अगर लड़ाई की नौबत आती है तो वह इजराइल से पंगा लेना चाहेगा। दूसरी ओर अमेरिका भी इजराइल के माध्यम से ईरान पर हमला करवा सकता है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम से सबसे ज्यादा खतरा इजराइल को ही है और वह किसी भी कीमत पर ईरान को एक परमाणु सम्पन्न देश बनने से रोक सकता है। अगर इजराइल ईरान के खिलाफ किसी भी प्रकार की सैनिक कार्रवाई करता है तो सम्भव है कि मध्य पूर्व के अन्य अरब देश ईरान का साथ देने पर मजबूर हो जाएं। अगर ऐसा होता है तो पहले से ही डिस्टर्वड मध्य पूर्वी और डिस्टर्व हो जाएगा। अमेरिका की तो खैर यह नीति पुरानी है कि अरब देशों के तेल भंडारों पर उल्टे-सीधे बहाने बनाकर कब्जा करे। उम्मीद करते हैं कि टकराव टल जाए।
America, Anil Narendra, Daily Pratap, Iran, Israil, Vir Arjun
अमेरिका को इस बात की आशंका भी है कि कहीं इस विवाद का फायदा उठाते हुए इजराइल ईरान पर हमला न कर दे। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने पेंटागन सूत्रों के हवाले से बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, रक्षामंत्री लियोन पेनेटा और अन्य शीर्ष अधिकारियों ने इजराइली नेताओं को कई निजी संदेश भेजे हैं जिसमें हमले के गम्भीर नतीजों की चेतावनी दी गई है। ओबामा ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतात्याहू से फोन पर बात भी की है। कुछ दिन पहले तेहरान में एक कार बम विस्फोट में ईरान के एक परमाणु वैज्ञानिक की मौत हो गई थी। ईरान ने इस हमले के लिए इजराइल को जिम्मेदार ठहराया था। ईरान के एक अधिकारी ने इस हमले के फौरन बाद कहा कि दो लोगों ने एक मोटरसाइकिल पर आकर जिस तरह वाहन को मैग्नेटिक बम से अपना निशाना बनाया, वह तरीका वैसा ही है जैसा पिछले दो साल में तीन और वैज्ञानिकों को निशाना बनाने के लिए अपनाया था। ईरान की संसद में अमेरिकी मुर्दाबाद, इजराइल मुर्दाबाद के नारे तक लगे। ईरान और इन पश्चिमी देशों के बीच चल रहा तनाव सारी दुनिया के लिए खतरे का संकेत है। अगर तेल सप्लाई प्रभावित होती है तो भारत भी प्रभावित हो सकता है। ईरान का प्रयास होगा कि अगर लड़ाई की नौबत आती है तो वह इजराइल से पंगा लेना चाहेगा। दूसरी ओर अमेरिका भी इजराइल के माध्यम से ईरान पर हमला करवा सकता है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम से सबसे ज्यादा खतरा इजराइल को ही है और वह किसी भी कीमत पर ईरान को एक परमाणु सम्पन्न देश बनने से रोक सकता है। अगर इजराइल ईरान के खिलाफ किसी भी प्रकार की सैनिक कार्रवाई करता है तो सम्भव है कि मध्य पूर्व के अन्य अरब देश ईरान का साथ देने पर मजबूर हो जाएं। अगर ऐसा होता है तो पहले से ही डिस्टर्वड मध्य पूर्वी और डिस्टर्व हो जाएगा। अमेरिका की तो खैर यह नीति पुरानी है कि अरब देशों के तेल भंडारों पर उल्टे-सीधे बहाने बनाकर कब्जा करे। उम्मीद करते हैं कि टकराव टल जाए।
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Tuesday, 3 January 2012
US ready to invade Iran
- Anil Narendra
Relations between Iran and US have taken a further nose-dive in the wake of Iran shooting down an American drone and making its public display. The Iranian TV showed the inspection of RQ-170 Sentinel drone by Iranian military officers. US President, Barak Obama requested the Iranian President to return the drone, but Iran was not prepared for it. Then, there was the matter of European Union sanctions against Iran. The EU has decided to put fresh sanctions against 180 Iranian officials and companies in the wake of the controversial Iranian nuclear programme.
The recent meeting of EU Foreign Ministers in Brussels also agreed on certain steps aimed at Iranian energy sector. These sanctions are being placed after the UN report that had linked Iranian nuclear programmes with the development of nuclear weapons. Britain had already announced the expulsion of all Iranian diplomats. In a retaliatory move, Iran declared to block the Strait of Hormuz, in case international community try to curb its oil exports. This warning was given by the Iranian Vice President, Reza Rahimi, who said that if the Western countries tried to restrict its oil exports, Iran would not allow a drop of oil to pass through the Strait of Hormuz. Iran is the fourth largest oil exporter in the world. The oil proceeds provide Iran money and political power and make available required help in continuing its nuclear programme. The world community is also aware of this Iranian strategy. In view of this, the Foreign Ministers of European Union expressed the possibilities of sanctions on Iranian oil exports. It will, however, not be easy for Iran to block the Strait of Hormuz. Besides Iranian Navy, navies of some other Western countries are also stationed in the Strait. The US has strongly reacted over the Iranian threat. The Pentagon spokesman George Little has said that the Strait of Hormuz is not only important for the security and stability of the region, but it is also the life line for the economies of Gulf countries including that of Iran.' The Strait is also very important for the US as it brings all its oil through this route. The US Navy has said that it would not tolerate this. Moreover, the Strait of Hormuz connect Oil producing countries like Bahrain, Kuwait, Qatar, Saudi Arabia and UAE to the Indian Ocean. Reacting to the Iranian threat, the Spokesman of the US Navy's Fifth Fleet said, 'We are always prepared to tackle any action taken with ill intention'. US keeps its Naval Fleet stationed in the Strait to facilitate movement of oil on this route. Earlier, an Vice Spokesman of the US State Department, Mark Toner has said that the objective of the Iranian threat is to divert attention from its nuclear programme.
Saturday, 31 December 2011
ईरान पर हमला करने के लिए अमेरिका तैयार है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 31st December 2011
अनिल नरेन्द्र
ईरान और अमेरिका के संबंध दरअसल तब से ज्यादा खराब हुए हैं जब से ईरान ने अमेरिकी ड्रोन विमान गिराकर उसका खुला प्रदर्शन किया। ईरानी टीवी ने दिखाया कि किस तरह ईरानी सैनिक अधिकारी आरक्यू-170 सेंटिनेल ड्रोन का निरीक्षण कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरानी राष्ट्रपति से अपील भी की कि वह ड्रोन को लौटा दें पर ईरान इसके लिए तैयार नहीं था। इसके बाद आया यूरोपीय संघ के ईरान पर प्रतिबंध का मामला। यूरोपीय संघ ने ईरान के विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम की वजह से 180 ईरानी अधिकारियों और कम्पनियों पर ताजा प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की हाल में ब्रुसेल्स में हुई बैठक में ईरान के ऊर्जा क्षेत्र को लक्ष्य बनाकर कुछ अन्य कदमों पर भी सहमति हुई। ये प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट के बाद लगाए जा रहे हैं जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को परमाणु हथियारों के विकास से जोड़ा गया था। ब्रिटेन ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि वह लंदन से ईरान के साथ सभी कूटनीतिज्ञों को निष्कासित कर रहा है। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कहा कि अगर उसके परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाने के इरादे से उसके तेल निर्यात पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने रोक लगाई तो वह स्टेट ऑफ हार्मुज बन्द कर देगा। ईरान की तरफ से यह चेतावनी देश के उपराष्ट्रपति रजा रहीमी ने दी। रहीमी ने कहा कि अगर पश्चिमी देशों ने ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाया तो फिर खाड़ी देशों का एक भी बूंद तेल स्टेट ऑफ हार्मुज से नहीं गुजरेगा। ईरान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल निर्यातक है। तेल की बिक्री से ईरानी सरकार को पैसा, राजनीतिक ताकत मिलती है और साथ ही परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने के लिए जरूरी मदद भी मिलती है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भी ईरान की इस रणनीति के बारे में जानकारी है। इसी के चलते यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों ने ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की सम्भावना जाहिर की है। हालांकि स्टेट ऑफ हार्मुज को बंद करना ईरान के लिए आसान नहीं होगा। खाड़ी में ईरान के अलावा और भी देशों की नौसेनाएं तैनात हैं। ईरान की धमकी पर अमेरिका ने कड़ी जवाबी प्रतिक्रिया दी है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के प्रवक्ता जॉर्ज लिटिल का कहना है, `स्टेट ऑफ हार्मुज न सिर्प इस इलाके की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि ये ईरानी समेत खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है।' अमेरिका के लिए यह रास्ता बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी रास्ते से वह तेल ले जाता है। अमेरिकी नौसेना ने कहा कि वह इसको बर्दाश्त नहीं करेगा। स्टेट ऑफ हार्मुज खाड़ी और तेल उत्पादक देशोंöबहरीन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, यूएई को हिन्द महासागर से जोड़ता है। ईरान की धमकी पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े की प्रवक्ता ने कहा, `हम लोग गलत नीयत से उठाए गए किसी भी कदम से निपटने के लिए हमेशा तैयार हैं।' तेल के आवागमन को जारी रखने के लिए अमेरिका खाड़ी में अपना एक नौसैनिक बेड़ा रखता है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय के उपप्रवक्ता मार्प टोनर ने कहा था कि ईरानी धमकी का मुख्य उद्देश्य उनके परमाणु कार्यक्रम के असल मुद्दे से ध्यान हटाना है।
ईरान और अमेरिका के संबंध दरअसल तब से ज्यादा खराब हुए हैं जब से ईरान ने अमेरिकी ड्रोन विमान गिराकर उसका खुला प्रदर्शन किया। ईरानी टीवी ने दिखाया कि किस तरह ईरानी सैनिक अधिकारी आरक्यू-170 सेंटिनेल ड्रोन का निरीक्षण कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरानी राष्ट्रपति से अपील भी की कि वह ड्रोन को लौटा दें पर ईरान इसके लिए तैयार नहीं था। इसके बाद आया यूरोपीय संघ के ईरान पर प्रतिबंध का मामला। यूरोपीय संघ ने ईरान के विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम की वजह से 180 ईरानी अधिकारियों और कम्पनियों पर ताजा प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की हाल में ब्रुसेल्स में हुई बैठक में ईरान के ऊर्जा क्षेत्र को लक्ष्य बनाकर कुछ अन्य कदमों पर भी सहमति हुई। ये प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट के बाद लगाए जा रहे हैं जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को परमाणु हथियारों के विकास से जोड़ा गया था। ब्रिटेन ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि वह लंदन से ईरान के साथ सभी कूटनीतिज्ञों को निष्कासित कर रहा है। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कहा कि अगर उसके परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाने के इरादे से उसके तेल निर्यात पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने रोक लगाई तो वह स्टेट ऑफ हार्मुज बन्द कर देगा। ईरान की तरफ से यह चेतावनी देश के उपराष्ट्रपति रजा रहीमी ने दी। रहीमी ने कहा कि अगर पश्चिमी देशों ने ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाया तो फिर खाड़ी देशों का एक भी बूंद तेल स्टेट ऑफ हार्मुज से नहीं गुजरेगा। ईरान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल निर्यातक है। तेल की बिक्री से ईरानी सरकार को पैसा, राजनीतिक ताकत मिलती है और साथ ही परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने के लिए जरूरी मदद भी मिलती है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भी ईरान की इस रणनीति के बारे में जानकारी है। इसी के चलते यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों ने ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की सम्भावना जाहिर की है। हालांकि स्टेट ऑफ हार्मुज को बंद करना ईरान के लिए आसान नहीं होगा। खाड़ी में ईरान के अलावा और भी देशों की नौसेनाएं तैनात हैं। ईरान की धमकी पर अमेरिका ने कड़ी जवाबी प्रतिक्रिया दी है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के प्रवक्ता जॉर्ज लिटिल का कहना है, `स्टेट ऑफ हार्मुज न सिर्प इस इलाके की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि ये ईरानी समेत खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है।' अमेरिका के लिए यह रास्ता बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी रास्ते से वह तेल ले जाता है। अमेरिकी नौसेना ने कहा कि वह इसको बर्दाश्त नहीं करेगा। स्टेट ऑफ हार्मुज खाड़ी और तेल उत्पादक देशोंöबहरीन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, यूएई को हिन्द महासागर से जोड़ता है। ईरान की धमकी पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े की प्रवक्ता ने कहा, `हम लोग गलत नीयत से उठाए गए किसी भी कदम से निपटने के लिए हमेशा तैयार हैं।' तेल के आवागमन को जारी रखने के लिए अमेरिका खाड़ी में अपना एक नौसैनिक बेड़ा रखता है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय के उपप्रवक्ता मार्प टोनर ने कहा था कि ईरानी धमकी का मुख्य उद्देश्य उनके परमाणु कार्यक्रम के असल मुद्दे से ध्यान हटाना है।
ईरान और अमेरिका के संबंध दरअसल तब से ज्यादा खराब हुए हैं जब से ईरान ने अमेरिकी ड्रोन विमान गिराकर उसका खुला प्रदर्शन किया। ईरानी टीवी ने दिखाया कि किस तरह ईरानी सैनिक अधिकारी आरक्यू-170 सेंटिनेल ड्रोन का निरीक्षण कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरानी राष्ट्रपति से अपील भी की कि वह ड्रोन को लौटा दें पर ईरान इसके लिए तैयार नहीं था। इसके बाद आया यूरोपीय संघ के ईरान पर प्रतिबंध का मामला। यूरोपीय संघ ने ईरान के विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम की वजह से 180 ईरानी अधिकारियों और कम्पनियों पर ताजा प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की हाल में ब्रुसेल्स में हुई बैठक में ईरान के ऊर्जा क्षेत्र को लक्ष्य बनाकर कुछ अन्य कदमों पर भी सहमति हुई। ये प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट के बाद लगाए जा रहे हैं जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को परमाणु हथियारों के विकास से जोड़ा गया था। ब्रिटेन ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि वह लंदन से ईरान के साथ सभी कूटनीतिज्ञों को निष्कासित कर रहा है। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कहा कि अगर उसके परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाने के इरादे से उसके तेल निर्यात पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने रोक लगाई तो वह स्टेट ऑफ हार्मुज बन्द कर देगा। ईरान की तरफ से यह चेतावनी देश के उपराष्ट्रपति रजा रहीमी ने दी। रहीमी ने कहा कि अगर पश्चिमी देशों ने ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाया तो फिर खाड़ी देशों का एक भी बूंद तेल स्टेट ऑफ हार्मुज से नहीं गुजरेगा। ईरान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल निर्यातक है। तेल की बिक्री से ईरानी सरकार को पैसा, राजनीतिक ताकत मिलती है और साथ ही परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने के लिए जरूरी मदद भी मिलती है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भी ईरान की इस रणनीति के बारे में जानकारी है। इसी के चलते यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों ने ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की सम्भावना जाहिर की है। हालांकि स्टेट ऑफ हार्मुज को बंद करना ईरान के लिए आसान नहीं होगा। खाड़ी में ईरान के अलावा और भी देशों की नौसेनाएं तैनात हैं। ईरान की धमकी पर अमेरिका ने कड़ी जवाबी प्रतिक्रिया दी है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के प्रवक्ता जॉर्ज लिटिल का कहना है, `स्टेट ऑफ हार्मुज न सिर्प इस इलाके की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि ये ईरानी समेत खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है।' अमेरिका के लिए यह रास्ता बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी रास्ते से वह तेल ले जाता है। अमेरिकी नौसेना ने कहा कि वह इसको बर्दाश्त नहीं करेगा। स्टेट ऑफ हार्मुज खाड़ी और तेल उत्पादक देशोंöबहरीन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, यूएई को हिन्द महासागर से जोड़ता है। ईरान की धमकी पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े की प्रवक्ता ने कहा, `हम लोग गलत नीयत से उठाए गए किसी भी कदम से निपटने के लिए हमेशा तैयार हैं।' तेल के आवागमन को जारी रखने के लिए अमेरिका खाड़ी में अपना एक नौसैनिक बेड़ा रखता है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय के उपप्रवक्ता मार्प टोनर ने कहा था कि ईरानी धमकी का मुख्य उद्देश्य उनके परमाणु कार्यक्रम के असल मुद्दे से ध्यान हटाना है।
Thursday, 8 December 2011
क्या ईरान ने अमेरिका के अत्याधुनिक ड्रोन विमान को मार गिराया है?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 8th December 2011
अनिल नरेन्द्र
क्या ईरान ने अमेरिका का सबसे आधुनिक चालक रहित विमान `आरक्यू-170 ड्रोन' को मार गिराया है? ईरान ने रविवार को दावा किया था कि उसने अमेरिका के ड्रोन विमान आरक्यू-170 को अपने पूर्वी हिस्से में मार गिराया है। न्यूयार्प टाइम्स के मुताबिक अमेरिकी खुफिया विमानों के बेड़े में आरक्यू-170 सबसे अत्याधुनिक तकनीक वाला विमान है। अखबार का कहना है कि आरक्यू-170 विमानों की तैनाती हाल ही में की गई थी और इसने ही एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के ठिकाने के ऊपर इस साल की शुरुआत में उड़ान भरी थी, लेकिन पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली इसे पकड़ नहीं पाई थी यानि कि पाकिस्तानी राडार इसे डिटेक्ट नहीं कर सके। अमेरिका को अब यह चिन्ता सता रही है कि ईरान अमेरिकी तकनीक तक आंशिक पहुंच बनाने में सक्षम हो गया है। अमेरिका को इस बात का डर है कि इस अत्याधुनिक ड्रोन विमान में लगे यंत्रों का ईरान को पता चल जाएगा, इसमें क्या तकनीक अपनाई गई है इसकी ईरान को जानकारी हो जाएगी। हालांकि अभी तक ईरान सरकार ने गिराए गए विमान की कोई तस्वीर जारी नहीं की है। अपुष्ट सूत्रों का दावा है कि एक साइबर अटैक की वजह से यह विमान गिराया गया। इसका क्या मतलब है यह समझ नहीं आया। हो सकता है कि आने वाले दिनों में इसका पता चले। दूसरी ओर अमेरिकी अधिकारी अब भी मानने को तैयार नहीं कि इस ड्रोन विमान को ईरान गिराने में सक्षम है। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के एक अधिकारी ने कहा कि हमारे पास इसके कोई सुबूत नहीं हैं कि इस विमान को दुश्मन ने मार गिराया है पर अगर ईरान ने वाकई इस अत्याधुनिक विमान को मार गिराया है तो यह साधारण बात नहीं है और अमेरिकी रक्षा विभाग के लिए यह एक भारी धक्का है। महत्वपूर्ण सवाल तो यही है कि क्या ईरान इतना सक्षम हो गया है कि वह अमेरिकी तकनीक को भी भेद सके? न्यूयार्प टाइम्स के मुताबिक अमेरिकी खुफिया विमानों के बेड़े में आरक्यू-170 सबसे अत्याधुनिक तकनीक वाला विमान है। यह वही विमान है जिसने ओसामा बिन लादेन के एबटाबाद स्थित अड्डे की निगरानी की थी बल्कि इसी के माध्यम से व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने दफ्तर में बैठकर लादेन के खिलाफ नेवी सील्स की सारी कार्रवाई देखी थी। इसी विमान में ऐसे अत्याधुनिक वीडियो कैमरे लगे हुए हैं जो ओबामा को लाइव फीड पहुंचा रहे थे। सम्भवत ईरान के गुप्त एटमी ठिकानों या मिसाइलों की तलाशी के मिशन पर इस ड्रोन विमान को लगाया गया था। हालांकि अमेरिका की अगुवाई वाली इंटरनेशनल सिक्यूरिटी असिस्टेंट्स फोर्स (आईएसएएफ) ने एक बयान में कहा कि ईरान जिस ड्रोन का जिक्र कर रहा है, वह एक अमेरिकी टोही विमान हो सकता है, जो पिछले हफ्ते पश्चिमी अफगानिस्तान में उड़ रहा था। आईएसएएफ ने कहा कि ड्रोन विमान को ऑपरेट करने वाले उस पर से कंट्रोल खो बैठे थे। उसने ड्रोन विमान या उसके खोने की वजह के बारे में हालांकि कुछ भी नहीं बताया। इस विमान को रिमोट के जरिये कंट्रोल किया जाता है। उधर अमेरिका के एक अन्य अखबार लॉस एंजिलिस टाइम्स के मुताबिक अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने बताया कि बीते महीने तेहरान के करीब एक सैन्य ठिकाने पर विस्फोट, अमेरिका, इसराइल और अन्य देशों के खुफिया अभियान का हिस्सा था।America, Anil Narendra, Daily Pratap, Iran, Pentagon, USA, Vir Arjun, White House
Saturday, 3 December 2011
ईरान-ब्रिटेन के रिश्ते खतरनाक मोड़ पर
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 3rd December 2011
अनिल नरेन्द्र
ईरान की राजधानी तेहरान में मंगलवार को ब्रिटिश दूतावास पर हुए प्रदर्शनकारियों के हमले से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ना स्वाभाविक ही था। उल्लेखनीय है कि अमेरिका और सुरक्षा परिषद ने ब्रिटिश दूतावास पर हमले की निन्दा की है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान सरकार से अनुरोध किया है कि वह इस हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार करे। उन्होंने कहा यह बताना अहम है कि ईरान में ब्रिटिश दूतावास पर हमले की घटना से हम सभी व्यथित हैं। इस तरह का आचरण मंजूर नहीं है। यह एक बुनियादी अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी है जिसका सभी देशों को पालन करने की जरूरत है। गौरतलब है कि मंगलवार को तेहरान में जो हुआ उसने 1979 में उस हमले की याद ताजा कर दी जो अमेरिकी दूतावास पर प्रदर्शनकारियों ने किया था। उस हमले के बाद अमेरिकी दूतावास के 50 कर्मचारियों को काफी दिनों तक बंधक बनाए रखा था। दोनों में अन्तर बस इतना है कि ब्रिटेन के छह लोगों को इस बार जल्दी ही छुड़ा लिया गया और पुलिस ने दो घंटे के अन्दर ही दूतावास से छात्रों को खदेड़ दिया। बेशक इस हमले के लिए ईरान सरकार ने ब्रिटेन से माफी मांग ली है पर दोनों देशों के बीच इधर मुश्किल से धुरी पर आए रिश्ते लगभग टूटने की कगार पर आ गए हैं और ब्रिटेन ने तेहरान से सभी राजनयिक वापस बुला लिए हैं और बुधवार को ईरानी दूतावास के कर्मियों और राजनयिकों को लन्दन छोड़ने का फरमान सुना दिया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा कि दूतावास पर हमले के लिए ईरान को गम्भीर नतीजे भुगतने होंगे। विदेश मंत्री विलियम हेग ने बुधवार को घोषणा की कि तेहरान में ब्रिटिश दूतावास पर हुए हमले के विरोध में ब्रिटेन से ईरान के सभी राजनयिकों को निष्कासित कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि लन्दन स्थित ईरानी दूतावास को तुरन्त बन्द करने के आदेश दे दिए गए हैं। बीबीसी के अनुसार ईरान के राजनयिकों को ब्रिटेन छोड़ने के साथ राजनयिक रिश्तों का स्तर घटाने की घोषणा करते हुए ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खुमैनी ने ब्रिटेन पर सीधा हमला बोलते हुए उसे पश्चिमी साम्राज्यवादी घमंड का प्रतीक बताया था। ईरान-ब्रिटेन रिश्ते इस्लामी क्रांति के बाद कई नाजुक दौरों से गुजरे हैं क्योंकि ईरान अमेरिका को शैतान मानता है और ब्रिटेन को अमेरिका का ऐसा सहयोगी जो बढ़चढ़ कर उसका साथ देता है। हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ईरान परमाणु बम बनाने के करीब है और उसने यूरेनियम को संवर्द्धित करने की क्षमता अर्जित कर ली है। पश्चिमी देशों को यह डर सता रहा है कि अगर ईरान के पास परमाणु क्षमता आ जाती है तो उसके निशाने पर अमेरिका, ब्रिटेन और इसराइल होंगे। इसके अलावा ईरान की बढ़ती शक्ति सऊदी अरब को भी नहीं भाती। कारण यह है कि सऊदी अरब में मुसलमानों के सबसे बड़े धार्मिक स्थल मक्का और मदीना हैं और यह इस्लाम का मूल केंद्र हैं। ईरान शिया मुसलमानों का गढ़ है और उसकी राज-व्यवस्था सऊदी अरब को चुनौती-सी लगती है। सऊदी अरब को यह भी लगता है कि एक ताकतवर ईरान खाड़ी के शिया बहुल देशों को भी अपने प्रभाव में लेने की फिराक में है। पिछले दिनों मध्य पूर्व के कुछ देशों में जो आंदोलन चले हैं वह शियाओं ने ही चलाए हैं और कई मुल्कों में शिया हावी हो रहे हैं। सुन्नी सऊदी को यह भी खतरा सता रहा है। अमेरिका ईरान से भयभीत है और ईरान को अपनी हद तक रखने के लिए कभी उसके परमाणु कार्यक्रम को रुकवाने के लिए उस पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से प्रतिबंध लगवाता है तो कभी उसे सीधी धमकियां देने पर उतर आता है। जहां हम ईरान की दुश्वारी को समझ सकते हैं वहीं तेहरान में हुए ब्रिटिश दूतावास पर हमले की निन्दा करते हैं। विएना सम्मेलन की प्रतिज्ञाओं और शपथ जो ईरान ने भी ली है, के अनुसार उस पर अपने देश में विदेशी दूतावासों और दूतावास कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है जिसे सुनिश्चित करने में वह विफल रहा है। ऐसे हमलों से ईरान खुद अपने आपको विश्व समुदाय से अलग-थलग कर रहा है।America, Anil Narendra, Daily Pratap, Iran, Security Council, Vir Arjun
Friday, 14 October 2011
ईरानी फिल्म हीरोइन को एक साल की कैद और 90 कोड़े की सजा
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 14th October 2011
अनिल नरेन्द्र
हमने अफगानिस्तान में तालिबान की महिलाओं पर अत्याचारों के बारे में तो सुना था पर ईरान जैसे देश के इस प्रकार की कूरता को सुनकर जरूर अचम्भा हुआ। आज के जमाने में किसी महिला को कोड़े मारे जाएं हजम करना थोड़ा मुश्किल है पर ईरान में ऐसा ही एक किस्सा हुआ है। ईरान की एक फिल्म अभिनेत्री को 90 कोड़े मारने और एक वर्ष कैद की सजा सुनाई गई है। अभिनेत्री पर आरोप है कि उसने ऐसी फिल्म में अभिनय किया है जो देश के कलाकारों पर लगे प्रतिबंध को दर्शाती है। ईरान में विपक्ष की एक वेबसाइट के मुताबिक मर्जिया वफामेहर को `माई तेहरान फॉर सेल' नामक फिल्म में अभिनय करने के लिए एक वर्ष कैद और 90 कोड़े मारे जाने की सजा शनिवार को सुनाई गई। यह फिल्म एक युवा अभिनेत्री की कहानी कहती है जो ईरान में अभिनय पर पाबंदी लगा दिए जाने के बाद गुपचुप तरीके से अपने शौक को जिन्दा रखती है। यह फिल्म ईरान में प्रतिबंधित है लेकिन चोरी छिपे यहां इसका प्रसार जारी है। इसे ईरान के कट्टरपंथी खेमे की तरफ से कड़ा विरोध करना पड़ रहा है। ईरानी एक्ट्रेस मर्जिया वफामेहर का अपराध बस इतना है कि उन्होंने एक ऐसी फिल्म में काम किया जिसमें देश के कलाकारों की जिन्दगी को दर्शाया गया है। मर्जिया का दोष स्पष्ट नहीं किया गया है पर उन्हें मिली सजा से दुनियाभर में सनसनी पैदा कर दी है। `माई तेहरान फॉर सेल' फिल्म की शूटिंग ईरान की राजधानी तेहरान में हुई है। यह एक ऐसी यंग एक्ट्रेस की कहानी है जिसके स्टेज वर्प पर सरकार ने बैन लगा दिया है। इस फिल्म में आधुनिक शहरी ईरान की अनदेखी झलक भी है। यह फिल्म बताती है कि बन्द दरवाजों के भीतर ईरान के युवा किस तरह जीते हैं। इस फिल्म को 2009 में इंडिपेंडेंट प्रिट इनसाइड फिल्म अवार्ड भी मिला है। पिछले साल ट्राइमीडिया फिल्म फेस्टिवल में भी इसने बेस्ट फीचर फिल्म के लिए ज्यूरी अवार्ड जीता था। फिल्म की ईरान-आस्ट्रेलिया मूल की ग्रेनाज मौसवी ने डायरेक्ट किया है। फिल्म आस्ट्रेलिया के एडिलेड की कम्पनी सियान फिल्म ने बनाई है। ईरान की एक्ट्रेस इस फिल्म में बिना हिजाब के हैं और उनके सिर को गंजा भी दिखाया गया है। इस मामले में सबसे पहले उन्हें इस साल जुलाई में गिरफ्तार किया गया था तभी से वह जेल में बन्द है। हालांकि सरकार ने मर्जिया पर लगे आरोपों को जाहिर नहीं किया पर `द एज' के मुताबिक फिल्म को ईरान में दिखाने के लिए अप्रूवल नहीं मिला था और इसे अवैध तरीके से बांटा जा रहा है। वैसे मर्जिया के पति नासीर तगवई खुद ईरान के जाने-माने फिल्मकार हैं। उनका कहना था कि इस फिल्म को सरकार से इजाजत लेने के बाद ही बनाया गया था। उनके वकील ने सजा के खिलाफ अपील की है। एक आजाद, आधुनिक मुल्क में किसी शख्स के बदन पर 90 कोड़ों की कल्पना भी करना आज की तारीख में मुश्किल है। यह खबर पढ़कर खौफ पैदा होता है। ऐसा कैसे हो सकता है? फिल्म के डायरेक्टर ग्रेनाज मौसवी ने कहा कि मर्जिया पर लगे आरोप बेबुनियाद हैं। फिल्म बनाने को लेकर जितने भी परमिट लिए गए थे, उन्हें हम कोर्ट में दिखा चुके हैं।Anil Narendra, Daily Pratap, Iran, Iran Film Actress, Vir Arjun
Wednesday, 22 June 2011
अफगानिस्तान में 10 साल पहले अमेरिका घुसा क्यों था?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 22nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में तेजी से राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। अमेरिका ने अब वहां से भागने के उपायों पर अमल करना आरम्भ कर दिया है। हाल के दिनों में दो ऐसी खबरें आई हैं जिनसे यह साफ होता है कि वहां कुछ खेल चल रहा है। पहली खबर जो आई वह यह थी कि भारत सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्य देशों ने प्रतिबंधों के लिहाज से एक ऐसी सूची को मंजूरी दी है जिसमें तालिबान और अलकायदा को अलग-अलग नजरिये से देखा जाएगा। इसका मकसद तालिबान और अफगानिस्तान में सुलह के प्रयासों में शामिल करने से जुड़ा है। इस संबंध में सुरक्षा परिषद ने गत शुक्रवार रात पूर्ण बहुमत से दो प्रस्ताव पारित किए। इनमें प्रतिबंधों को लेकर तालिबान के लिए अलकायदा से एक अलग सूची की बात की गई है। इस कदम के बाद अब अलकायदा और तालिबान आतंकवादियों को अलग-अलग पैमानों पर तोला जाएगा। दूसरी घटना है अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई का यह कहना कि अमेरिका तालिबान से बातचीत कर रहा है। इस सम्पर्प के बारे में यह सम्भवत पहली आधिकारिक पुष्टि है। करजई ने काबुल में एक सम्मेलन में कहा कि तालिबान के साथ बातचीत शुरू हो गई है। बातचीत अच्छी चल रही है। विदेशी सेनाएं विशेषकर अमेरिका खुद ही बातचीत कर रहा है। अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में चल रहा युद्ध 10वें साल में प्रवेश कर गया है और वहां पर इस संघर्ष के राजनीतिक समाधान की आवाज तेज होती जा रही है।अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने जो खुलासा किया है वह अफगानिस्तान के लिए जितना खतरनाक है, उतना ही अमेरिका की स्वार्थपरता और दोहरेपन का एक और सबूत भी है। अफगानिस्तान के खिलाफ अमेरिका ने आखिर युद्ध क्यों छेड़ा था? जहां तक हम समझ सके हैं कि 9/11 हमलों के लिए अमेरिका अलकायदा और तालिबान को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें सबक सिखाने के लिए यह युद्ध छेड़ा गया था। पिछले 10 सालों में पहले तो अमेरिका ने इसी तालिबान हुकूमत को सत्ता से हटाया और अब वही तालिबान अच्छा हो गया है और उसे दोबारा सत्ता सम्भालने की तैयारी हो रही है। हम राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिका की मजबूरी समझ सकते हैं। उन्होंने घोषणा कर रखी है कि 2014 तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की पूरी वापसी होनी है इसलिए वह आनन-फानन में समस्या का हल निकालना चाहते हैं। इसी के तहत तालिबान से बातचीत शुरू की है, जो हालांकि अभी शुरुआती दौर में है। अमेरिका के जेबी संगठन संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान और अलकायदा पर इसीलिए पुरानी व्यवस्था तोड़ते हुए जो संदेश दिया है उसका लब्बोलुआब यही है कि अगर अलकायदा का साथ छोड़कर तालिबान अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहयोगी बनता है तो उसे `माफी' दे दी जाएगी।
हमें थोड़ा आश्चर्य इस बात पर भी है कि आखिर भारत ने क्या सोचकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी? क्या भारत की नजरों में भी तालिबान एक अच्छा संगठन बन गया है जिससे भारत को अब कोई खतरा नहीं है? सवाल यह नहीं कि तालिबान कैसा है, सवाल यह है कि एक आतंकी संगठन जिसने अपना एजेंडा सार्वजनिक किया हो उससे आप समझौते की बात कर रहे हो, वह भी बकवास शर्तों पर? मामला तो यह है कि एक आतंकी संगठन से बातचीत कर अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसके तमाम फैसलों के पीछे सिर्प उसका अपना स्वार्थ होता है, उसे इस बात की कतई परवाह नहीं कि इस फैसले का भारत-पाकिस्तान-ईरान मुल्कों पर क्या असर पड़ेगा? न ही उसे अब वैश्विक आतंकवाद से कोई लेना-देना है। विद्रुप तो यह है कि इस बातचीत में अफगान सरकार को भी शामिल नहीं किया गया। खुद अफगान मानते हैं कि यह अत्यंत घातक कदम होगा और मुल्क फिर 2001 से पहले की स्थिति में पहुंच जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा नुकसान भारत को भी होगा। भारत द्वारा अफगानिस्तान में चल रही विभिन्न पुनर्निर्माण योजनाओं को भारी झटका लगेगा। इससे करजई सरकार की छवि, कार्यक्षमता और भविष्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा पर अमेरिका को इन सबसे क्या लेना-देना है। इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि एक दशक पहले जिस अमेरिका ने `वॉर ऑन टेरर' का नारा देकर अफगानिस्तान में इसलिए प्रवेश किया था कि अलकायदा और तालिबान को समाप्त कर सके, आज वह उसे उन्हीं आतंकियों के हवाले करने के बारे में सोच रहा है ताकि उसे अफगानिस्तान से भागने का रास्ता मिल जाए?
Tag: 9/11, Afghanistan, Al Qaida, America, Anil Narendra, Daily Pratap, India, Iran, Osama Bin Ladin, Pakistan, Security Council, Taliban, UNO, USA, Vir Arjun
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