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Wednesday, 6 June 2012

जमानत देने पर जज को करोड़ों की घूस का पेचीदा मामला


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6 June 2012
अनिल नरेन्द्र
देश के लिए यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि भ्रष्टाचार से अब हमारी ज्यूडिश्यिरी यानि न्यायपालिका भी नहीं बच सकी। बेशक अभी इक्का-दुक्का मामले ही प्रकाश में आए हैं पर यह संकेत देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता। विशेष सीबीआई अदालत के जज टी. पट्टामिरामा राव को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के आरोपों में निलंबित कर दिया है। राव ने खनन कारोबारी जनार्दन रेड्डी को जमानत दी थी। सीबीआई ने एक बैंक लॉकर से करीब एक करोड़ 80 लाख रुपये मिलने का दावा किया है, जिसकी चॉभियां पट्टामिरामा राव के बेटे के पास थीं। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट रजिस्ट्रार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि सीबीआई मामले के प्रथम अतिरिक्त विशेष न्यायाधीश पट्टामिरामा राव के खिलाफ मिली सूचना पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने जनहित में उन्हें निलंबित कर दिया है। विशेष न्यायाधीश पट्टामिरामा राव ने पिछले महीने ही ओएमसी अवैध खनन मामले के आरोपी कर्नाटक के पूर्व मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी को जमानत दे दी थी जबकि इस मामले के एक अन्य आरोपी और आईएएस अधिकारी वाई. श्रीलक्ष्मी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हालांकि सीबीआई की अपील पर हाई कोर्ट ने रेड्डी को जमानत देने वाले आदेश को पांच जून तक निलंबित कर दिया था। रजिस्ट्रार ने कहा कि न्यायाधीश के खिलाफ मिली सूचना पर विचार के बाद हाई कोर्ट ने फैसला किया कि जनहित में उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित करना जरूरी है। आदेश में कहा गया है कि विशेष न्यायाधीश पट्टामिरामा राव प्रस्तावित अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी नहीं होने तक निलंबित रहेंगे। इस बीच सीबीआई ने हैदराबाद में एक बैंक लॉकर से करीब 1.80 करोड़ रुपये मिलने का दावा किया है। एजेंसी को संदेह है कि पैसा रेड्डी का था और अवैध रिश्वत के तौर पर दिया गया था। मामला फिर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा गया जिन्होंने राव के निलंबन का आदेश दिया। तेदेपा प्रमुख एन. चन्द्रबाबू नायडू और कांग्रेस सांसद चिरंजीवी समेत पार्टी के अन्य नेताओं ने न्यायपालिका को प्रभावित करने की कोशिशों की खबरों पर स्तब्धता जाहिर की और इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए उचित कार्रवाई की मांग की।
केंद्र सरकार ने उच्च न्यायपालिका में जजों के व्यवहार को विनियमित करने वाले न्यायाधीश मानक एवं जवाबदेही बिल 2010 में संशोधन के संकेत दिए हैं। बिल में जजों के खिलाफ शिकायत करने और उन्हें हल्की सजाओं का प्रावधान है। यह बिल 29 मार्च को लोकसभा में पारित हो गया, जिसे अब राज्यसभा में पेश किया जाना है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस वर्मा ने बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के एक कार्यक्रम में बिल पर कड़ा गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने कहा कि न्यायिक जवाबदेही से वह स्वयं को बेइज्जत और कमतर महसूस कर रहे हैं। सरकार का इस तरह से जजों के व्यवहार को विनियमित करना उचित नहीं है। मौजूदा व्यवस्था यानि न्यायाधीश जांच कानून 1968 में भ्रष्ट जजों को संसद में लाए गए महाभियोग के जरिये हटाया जा सकता है। जवाबदेही बिल इस कानून की जगह लेगा। चूंकि यह मामला अदालतों और जजों से संबंधित है, हम इस पर किसी प्रकार की टिप्पणी नहीं कर सकते पर जज भी देश से ऊपर नहीं हैं।

Thursday, 31 May 2012

कांग्रेस के हाथों से फिसलता आंध्र प्रदेश ः गिरफ्तारी की राजनीति

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 31 May 2012
अनिल नरेन्द्र
आंध्र प्रदेश के पूर्व लोकप्रिय मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के सांसद बेटे जगनमोहन रेड्डी की भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तारी पर हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यह तो होना ही था। जगनमोहन रेड्डी बहुत दिनों से कांग्रेस नेतृत्व की आंख में किरकिरी बने हुए थे। तीन दिन की गहन पूछताछ के बाद सीबीआई ने आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले आंध्र की हाई कोर्ट ने भी जगन को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया था। जगन से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में राज्य के अनेक नेता, अफसर, उद्योगपति और बिचौलिये पहले ही सीबीआई के शिकंजे में आ चुके थे। इसलिए जगन की पूछताछ और गिरफ्तारी की भविष्यवाणी पहले से ही चल रही थी। चर्चा तो यह थी कि पिता की कुर्सी की ताकत पर रातोंरात अरबपति बने इस युवा नेता को सीबीआई पहले ही दिन सलाखों के पीछे डाल देगी, लेकिन सीबीआई ने यह काम तीसरे दिन किया। इस विलम्ब के पीछे कहीं इस धारणा को निर्मूल करना तो नहीं था कि जगन को सलाखों में डालने की वजह भ्रष्टाचार से अधिक आंध्र की राजनीति में छुपी है। इसमें कोई शक नहीं कि राजशेखर रेड्डी की हादसे से मौत के बाद से बेटे जगन ने कांग्रेस के नाक में दम कर रखा था। कहते हैं कि हेलीकाप्टर हादसे से मौत के बाद राजशेखर रेड्डी का अंतिम सस्कार भी नहीं हुआ था कि वहां शोक प्रकट करने गए कांग्रेस के आला नेताओं के आगे जगन ने खुद को पिता की कुर्सी का वारिस होने की इच्छा प्रकट कर दी थी। पार्टी आला कमान को यह गंवारा नहीं था, क्योंकि पिता की ताकत पर अकूत दौलत के मालिक बन बैठे जगन के भ्रष्टाचार के किस्सों से अधिक उसे जगन की आसमानी महत्वाकांक्षा का डर था। यह विचित्र है कि गिरफ्तारी से जगन को सहानुभूति का लाभ मिलने और कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान हेने के आसार जताए जा रहे हैं। इस विरोधाभास के लिए किसी हद तक खुद कांग्रेस जिम्मेदार है। उसने कभी यह प्रदर्शित नहीं किया कि जगनमोहन रेड्डी की अवैध कमाई उसके लिए चिन्ता की कोई बात है। उसे परेशानी तब महसूस हुई जब जगन की महत्वाकांक्षा हिलोरे लेने लगी और वे अपने पिता के राजनीतिक उत्तराधिकारी का दावा कर बैठे। यह महज इत्तेफाक नहीं कहा जा सकता कि जगनमोहन रेड्डी के खिलाफ सीबीआई जांच तब शुरू हुई जब उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर वाईएसआर कांग्रेस के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली। आंध्र प्रदेश कांग्रेस का गढ़ रहा है। 2004 और पिछले चुनावों में भी उसे सबसे ज्यादा सीटें इसी राज्य से मिलीं। लेकिन राजशेखर रेड्डी के दिवंगत होने के बाद राज्य में जितने भी उपचुनाव हुए उन सब में कांग्रेस को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी है। तेलंगाना में टीआरएस की बड़ी ताकत उसके लिए अलग सिरदर्द बनी हुई है। 12 जून को राज्य में लोकसभा की एक और विधानसभा की 18 सीटों पर उपचुनाव होने हैं। राजनीतिक पंडितों का ख्याल है कि उपचुनावों में भी कांग्रेस की झोली खाली रह सकती है। अगले लोकसभा चुनाव में भी अब कांग्रेस वह उम्मीद नहीं कर सकती जो सफलता उसे पिछले चुनाव में मिली थी। कुल मिलाकर कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश एक चुनौती बनती जा रही है।
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Sunday, 25 March 2012

उपचुनावों के परिणाम कांग्रेस और भाजपा के लिए चिन्ता पैदा करते हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 March 2012
अनिल नरेन्द्र
ताजा उपचुनावों के नतीजे अगर कांग्रेस के लिए चिन्ता का विषय थे तो आंध्र प्रदेश की सात विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में उसके सूपड़ा साफ होने की खबर तो पार्टी के लिए अशुभ संकेत है। यह उपचुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए भी अच्छे संकेत नहीं दे रहे। गुजरात को भाजपा अपना गढ़ मानती है और कर्नाटक में भी वह करीब चार साल से सत्ता में है। लेकिन इन राज्यों में उसे हार का मुंह देखना पड़ा है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस और भाजपा ही प्रमुख प्रतिद्वंद्वी हैं, इसलिए भी यह पराजय भाजपा के लिए अधिक तकलीफदेह साबित हो सकती है। कर्नाटक की उडुपी-चिकमंगलूर लोकसभा सीट मुख्यमंत्री सदानन्द गौड़ा की थी। मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था। जाहिर है इस सीट को बरकरार रखना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल था। मगर यहां उसे कांग्रेस के हाथों 45,000 से ज्यादा वोटों से मात खानी पड़ी। साफ है कि सत्ता की खातिर पार्टी के भीतर चल रही जोड़-तोड़, कलह, भ्रष्टाचार के आरोपों और विधानसभा में अश्लील वीडियो देखे जाने की घटना से खराब हुई छवि का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है। अनुशासन का दम भरने वाली पार्टी के लिए आज अनुशासनहीनता ही सबसे बड़ी समस्या बन गई है। गुजरात में मानसा विधानसभा सीट भाजपा के हाथ से निकलकर कांग्रेस की झोली में आना मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भी झटका है। गौरतलब यह भी है कि मानसा विधानसभा सीट गांधी नगर लोकसभा क्षेत्र में आती है जिसका प्रतिनिधित्व लाल कृष्ण आडवाणी करते हैं। लेकिन यह पहला मौका नहीं जब भाजपा के इस गढ़ में सेंध लगाने में कांग्रेस को कामयाबी मिली है। पिछले साल नवम्बर में नगर निकाय चुनाव में भी भाजपा की दुर्गति हुई थी। इस साल के अन्त में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए मानसा की हार जहां नरेन्द्र मोदी के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए वहीं कांग्रेस जरूर इससे उत्साहित होगी। आंध्र प्रदेश कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा गढ़ रहा है। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने यहां 95 फीसदी सीटें जीतकर राजनीति के पंडितों को चकरा दिया था। लेकिन इसके करिश्माई नेता स्वर्गीय राजशेखर रेड्डी की अकस्मात मृत्यु और उनके पुत्र जगन मोहन रेड्डी के कांग्रेस से अलग होने के बाद उसका पराभाव शुरू हो गया। इसके बाद राज्य में 17 विधानसभा और दो लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हो चुके हैं जिसमें सत्ताधारी कांग्रेस का पूरी तरह सूपड़ा साफ हुआ है। जहां कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई वहीं भाजपा जैसी पार्टी जिसका सूबे में ज्यादा असर नहीं है वह भी तीन सीटें जीत चुकी है। केंद्र सरकार में बड़े घोटालों के खुलासे के बाद कांग्रेस को महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली में हुए उपचुनावों में भी जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा है जहां उसकी सरकारें हैं। चन्द रोज पहले ही मुंबई नगर निगम के चुनावों में भी उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा था यानि हर उस जगह से कांग्रेस को बुरी खबर मिल रही है जहां उसके पास अच्छी ताकत है। केरल में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के सहयोगी दल कांग्रेस (जेकब) ने अपनी सीट बरकरार रखी। यह परिणाम कांग्रेस के लिए खास महत्व रखता है क्योंकि राज्य में उसके नेतृत्व वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार मामूली बहुमत पर टिकी है। तमिलनाडु और उड़ीसा में भी एक-एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में गए हैं। वैसे उपचुनाव परिणाम को हर हाल में आम रुझान का संकेत तो नहीं माना जा सकता पर कई राज्यों से वहां के मतदाताओं के मिजाज का जरूर कुछ संकेत मिलता ही है और यह संकेत न तो कांग्रेस के लिए अच्छे हैं और न ही भारतीय जनता पार्टी के लिए।
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Sunday, 27 November 2011

सरकार के नक्सल विरोधी अभियान में महत्वपूर्ण उपलब्धि



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th November 2011
अनिल नरेन्द्र
सरकार को अपने एंटी-नक्सली आपरेशंस में एक शानदार सफलता मिली है। सीपीआई (माओवादी) की मिलिट्री यूनिट के मुखिया और पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव उर्प किशन जी को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया है। सुरक्षा बलों के हाथों मुठभेड़ में मौत की गृह मंत्रालय द्वारा पुष्टि के साथ ही भारत में `नक्सल आंदोलन' का एक अध्याय खत्म हो गया। सीआरपीएफ की नक्सल विरोधी कमांडो बटालियन 207 कोबरा के जवानों ने किशन जी को मौत के घाट उतारा है। मूल रूप से आंध्र प्रदेश का रहने वाला कोटेश्वर राव उर्प किशन जी लम्बे समय से नक्सल आंदोलन से जुड़ा था। पिछले तीन साल से उसने पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार की नाक में दम कर रखा था। सूत्रों के अनुसार किशन जी ने दो नक्सली माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी और पीपुल्स वॉर ग्रुप के आपस में विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। करीब छह साल पहले हुए इस विलय के कारण नक्सलियों की ताकत काफी बढ़ गई थी। किशन जी के दोनों नेपाल के माओवादियों और उनके जरिये चीन से भी सम्पर्प में था। करीमगंज जिले के नाफपल्ली गांव से नक्सलवाद का सफर शुरू करने वाला किशन जी गुरिल्ला युद्ध में माहिर था। उसने सम्भाल रखी थी बंगाल से महाराष्ट्र तक की कमान। उसका मुख्य उद्देश्य था पश्चिमी मदिनापुर, बाकुड़ा व पुरुलिया बेल्ट को झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ से जोड़ना। किशन जी की मौत के बाद नक्सली हिंसा से ग्रसित राज्यों, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ व आंध्र प्रदेश में शुक्रवार को हाई अलर्ट घोषित किया गया है। नक्सली हमले की आशंका को देखते हुए यह हाई अलर्ट घोषित किया गया है। छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त महानिदेशक राम निवास ने बताया कि नक्सली बदले की कार्रवाई कर सकते हैं। पुलिस को डर है कि नक्सली थाना व 40,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके में आम लोगों को निशाना बना सकते हैं। बस्तर के आंतरिक इलाकों में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती है। किशन जी की मौत से नक्सली-माओवादी समस्या तो खत्म नहीं होगी पर यह जरूर है कि यह इनके लिए एक बहुत बड़ा झटका है जिससे उन्हें उभरने में वक्त जरूर लगेगा। सरकार की नक्सल विरोधी कार्रवाई में यह एक शानदार उपलब्धि जरूर है।
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Friday, 8 July 2011

गले की फांस बनता तेलंगाना मुद्दा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8th July 2011
अनिल रेन्द्र
चारों तरफ समस्याओं से घिरी यूपीए सरकार अब एक और समस्या में फंस गई है। कांग्रेस नेतृत्व और सरकार के लिए नई समस्या पृथक तेलंगाना की मांग है। आंध्र प्रदेश के पृथक तेलंगाना प्रदेश को लेकर स्थिति गम्भीर मोड़ पर आ खड़ी हुई है। सोमवार तक कांग्रेस के 10 सांसदों और 47 विधायकों ने अपने-अपने इस्तीफे भेज दिए हैं। तेलंगाना राज्य बनवाने के लिए सभी दलों ने राजनीतिक मुहिम तेज कर दी है। विरोधी दल टीडीपी के भी 37 विधायकों ने विधानसभा स्पीकर को इस्तीफा भेज दिया है। भाजपा और कांग्रेस के विधायकों ने भी अपने इस्तीफे सौंप दिए हैं। इस्तीफा देने वालों में 9 सांसद भी हैं। कांग्रेस पार्टी के लिए अलग तेलंगाना का गठन गले की फांस बन गया है, जो न तो उगलते बन रहा है और न ही निगलते। यह बात कांग्रेस के प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने भी स्वीकार की है। हालांकि तेलंगाना की मांग नई नहीं है। तेलंगाना राज्य की मांग 50 साल से भी ज्यादा पुरानी है मगर हर सरकार इसे टालती रही है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सत्ता में शामिल तेलुगूदेशम का दबाव था तो अपने घोषणा पत्र में तेलंगाना की मांग का समर्थन करने वाली यूपीए सरकार तथाकथित सर्वसम्मति न बना पाने के कारण इस मांग को पूरा करने में असफल रही और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता चन्द्रशेखर राव को मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा। अपनी मांग को लेकर की गई उनकी भूख हड़ताल की पृष्ठभूमि में दिसम्बर 2009 में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने तेलंगाना राज्य बनाने का आश्वासन दिया था जिसके बाद न्यायमूर्ति बीएन कृष्णा समिति का गठन किया गया था, जिसके अध्ययन के बाद कोई एक राय न देकर कई विकल्प सुझाए। इस बीच केंद्र सरकार तेलंगाना की मांग को एक बार फिर भूल गई। अब जब यह मांग फिर शुरू हुई है और इस्तीफों का सिलसिला फिर आरम्भ हुआ है तो कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार एक बार फिर सोचने पर मजबूर हुई है। सरकार पांव पूंक-पूंक कर रख रही है। दरअसल मनमोहन सरकार को समझ नहीं आ रहा कि वह करे तो क्या करे? यदि वह अलग तेलंगाना का गठन करती है तो फिर कम से कम 6 स्वतंत्र राज्यों की मांग तेजी से उठेगी और यदि नहीं करती तो फिर आंध्र प्रदेश के साथ-साथ दिल्ली की सरकार पर भी संकट आ सकता है। कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद ने माना कि स्थिति जटिल है पर उन्हें उम्मीद है कि वह अपने सांसदों और विधायकों को मना लेंगे। वे उनकी भावनाओं को समझ रहे हैं और उन्हें थोड़ा इंतजार करने की सलाह दे रहे हैं। मनमोहन सरकार हो सकता है कि अन्ना हजारे मुद्दे की तरह इस मुद्दे पर भी सर्वदलीय बैठक बुलाए जिसमें तेलंगाना के मुद्दे पर दूसरे दलों की राय जानी जा सकती है। कांग्रेस और सरकार को डर इस बात का है कि अगर तेलंगाना की मांग स्वीकार की जाती है तो बुंदेलखंड, हरित प्रदेश, रुहेलखंड, पूर्वांचल विदर्भ, रॉयल सीमा और कोंकण जैसे क्षेत्रों में स्थिति बिगड़ने की सम्भावना बढ़ जाएगी जो कि फिलहाल कांग्रेस नहीं चाहती। दूसरी ओर आगर वह इस मांग को खारिज करती है तो बहुत बड़ा जोखिम उठाना होगा। आंध्र प्रदेश में जगन पहले से ही मुख्यमंत्री किरण रेड्डी की नाक में दम किए हुए हैं। केंद्र द्वारा मांग अस्वीकार करने से न केवल किरण रेड्डी सरकार ही गिर सकती है बल्कि आने वाले समय में उसके करीब एक दर्जन से अधिक सांसद कम हो जाएंगे और आने वाले समय में इस सबसे मजबूत गढ़ में कांग्रेस बेहद कमजोर हो जाएगी। कांग्रेस को मामले का लटकाने में ही फायदा है पर सवाल यह है कि क्या पृथक तेलंगाना की मांग करने वाले ऐसा होने देंगे?
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Tuesday, 28 June 2011

पुट्टापर्थी सत्य साईं बाबा का खजाना


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th June 2011
अनिल रेन्द्र
आंध्र प्रदेश के अनन्तपुर जिले में पुलिस ने एक वाहन से 35 लाख रुपये कैश बरामद किए और इसके ड्राइवर को गिरफ्तार किया था। माना जा रहा है कि यह रकम सत्य साईं सेंट्रल ट्रस्ट की थी और चोरी से बाहर भिजवाई जा रही थी। इससे पहले जब सत्य साईं बाबा का निजी चैम्बर खोला गया तो वहां से निकले खजाने ने सभी को चौंका दिया था। सत्य साईं बाबा के निजी कमरे से 98 किलो सोना, 317 किलो चांदी और 11.5 करोड़ रुपये कैश मिला था। पुट्टापर्थी के सत्य साईं बाबा जब जीवित थे तो हवा में हाथ घुमाकर सोने-चांदी के आभूषण, हाथ घड़ी और भभूत निकालकर लोगों को `चमत्कृत' करने की कहानियां चर्चा में रहती थीं लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि उनकी मौत के बाद इस रहस्यमय तरीके से इतनी दौलत निकलेगी। कमरे से निकले धन की कुल कीमत अरबों रुपये में आंकी गई है। अनुमानत 40 हजार करोड़ की सत्य साईं की अकूत सम्पत्ति में इतना धन वैसे तो कुछ भी नहीं लेकिन लोगों को उनकी मायानगरी के एक कमरे में कुबेर के ऐसे खजाने का `दर्शन' सम्भवत पहली बार हुआ होगा। देश में काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बने मौजूदा माहौल में इतना ही धन अगर किसी नौकरशाह या नेता के घर पर मिल जाता तो तूफान खड़ा हो जाता और उसे काले धन की संज्ञा दी जाती। लेकिन धर्मगुरुओं और बाबाओं की शरण में पहुंच जाने पर जैसे मनुष्यों के पाप धुल जाने की मान्यता है, वैसे ही शायद धन का काला रंग भी धुल जाता होगा। 28 मार्च को जब सत्य साईं बाबा को अस्पताल में भर्ती कराया गया था तो इस कमरे को बन्द कर दिया गया था। तब से इस कमरे के रहस्य को जानने की उत्सुकता लोगों में थी लेकिन शायद ही यह कल्पना की होगी कि उनके आराम करने वाले निजी कमरे में इतना धन छुपा होगा। इसलिए उनकी मृत्यु के 51 दिन बाद गुरुवार की सुबह जब उनके इस रहस्यमय कमरे को खोला गया तो देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह गईं। सत्य साईं बाबा जब जीवित थे तो इस कमरे में झांकने की किसी को इजाजत नहीं थी। इसलिए उनके बेहद करीबियों को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि सत्य साईं बाबा नोटों, सोने, चांदी, हीरे और जवाहरात के बीच नींद लेते थे। आंध्र प्रदेश की सरकार के लिए अब यह समस्या बन गई है कि इस धन का किया क्या जाए? सत्य साईं बाबा ने अपनी कोई वसीयत नहीं लिखी। जो संस्थाएं चल रही हैं वे तो वैसी ही चलती रहेंगी पर इस नकदी, सोने इत्यादि का विवाद जरूर पैदा हो गया है।
भारत सरकार के आयकर विभाग ने एक गोपनीय रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी संख्या में ट्रस्ट और संस्थाएं आयकर छूट कानून का उल्लंघन कर रही हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बहुत से ट्रस्ट धार्मिक और धर्मार्थ कार्य करने की बजाय चैरिटी में मिले पैसों का इस्तेमाल अपना व्यापार और कारोबार बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। गौरतलब है कि आयकर विभाग ने 2009-10 में आयकर कानून में एक नया ब्लॉज जोड़ा था। इसके मुताबिक अगर कोई ट्रस्ट दान से मिली राशि का इस्तेमाल धार्मिक कार्यों के अलावा अपने व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए करता है तो उसे कर में छूट का लाभ नहीं मिलेगा। सूत्रों के मुताबिक आयकर विभाग की कर छूट इकाई ने बड़ी संख्या में ऐसे ट्रस्टों के बारे में पता लगाया गया है जो चैरिटी के पैसों का इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए कर रहे हैं। ऐसी संस्थाओं की जांच की जा रही है। आयकर विभाग ने देशभर के सभी मुख्य आयुक्तों से भी कहा है कि वे ऐसे ट्रस्टों की पहचान करें जिनका पंजीकरण धार्मिक और धर्मार्थ संस्था के तौर पर कराया गया है लेकिन वे चैरिटी ब्लॉज का उल्लंघन करते हैं। इन संस्थाओं को आयकर कानून की धारा 11 और 12 के तहत कर छूट का लाभ हासिल है। सत्य साईं बाबा के कुछ भक्तों का दावा है कि देशी और विदेशी अनुयायियों ने बाबा को सैकड़ों करोड़ों रुपये नकद, आभूषण, हीरे और अन्य वस्तुएं उपहार में दी थीं। भक्तों के मुताबिक बाबा जब अस्पताल में थे तो ज्यादातर नकदी और अन्य कीमती वस्तुएं प्रशांति निलमय से बाहर भेज दी गई। उल्लेखनीय है कि सत्य साईं बाबा का गत 24 अप्रैल को निधन हो गया था।
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