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Thursday, 15 September 2022

रूसी सेना पर भारी पड़ती यूव्रेन सेना

पड़ती यूव्रेन सेना रूस-यूव्रेन युद्ध के दो सौ दिन बीतने के बाद भी रूस यूव्रेन को पूरी तरह से जीत नहीं पाया है। यूव्रेन के प्रमुख औदृाोगिक शहर खारकीव में कमजोर पड़ती अपनी सेना को देखते हुए रूस ने अपने सैनिकों को वापस बुलाने की घोषणा की है। सोशल मीडिया पर यूव्रेन के सैनिकों के नए इलाकों पर झंडे लहराने की तस्वीरों की बाढ़ सी आ गईं है। रूस के सैनिकों द्वारा छोड़े गए मोर्चो और बर्बाद सैन्य वाहनों की तस्वीरें भी खूब वायरल की जा रही हैं। यूव्रेन की सेना का दावा है कि उसने जवाबी हमलों में रूस के कब्जे वाले कम से कम तीन हजार वर्ग किलोमीटर इलाके को मुक्त करा लिया है। यूव्रेन में रूस आव्रामक कार्रवाईं पूर्वी यूव्रेन में कर रहा है। अगर यूव्रेन के दावों की पुष्टि हो जाती है तो इसका मतलब ये है कि इससे पहले से मुक्त कराए गए इलाकों से तीन गुणा और इलाकों को मुक्त करा लिया है। हालांकि रूस की सेना ने पुष्टि की है कि उसके सैनिक फिर से संगठित होने के लिए ही पीछे हटे हैं। यूव्रेन के सैन्य बलों ने रूस के पीछे छोड़ दिए गए एक वाहन की तस्वीर 11 सितम्बर को जारी की। यूव्रेन के सैन्य बलों का दावा है कि उन्होंने वुपियानस्क और इजियूम पर नियंत्रण कर लिया है। ये रूस के कब्जे में आए अहम शहर थे जो आपूर्ति रूट के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। रूस की सेना ने अपने सैन्य बलों की इन शहरों से पीछे हटने की पुष्टि करते हुए कहा कि ऐसा करने से रूस के सैनिकों को फिर से संगठित होने का मौका मिलेगा। रूस के सैनिक अब रूस समर्थक अलगावादियों के नियंत्रण वाले इलाके में गए हैं। रूस की सेना ने एक तीसरे अहम शहर बालक्लिक से भी अपनी सेना के पीछे हटने की पुष्टि की है। यूव्रेन की सेना प्रमुख के प्रेस आफिस के मुताबिक जवाबी कार्रवाईं में रूस के भारी सैन्य वाहन भी यूव्रेन की सेना के कब्जे में आए हैं। यूव्रेन के राष्ट्रपति ब्लादिमीर जेलेंस्की ने घोषणा की है कि खारकीव क्षेत्र में तीस कस्बे और गांव फिर से यूव्रेन के नियंत्रण में आ गए हैं। रायटर्स को एक वीडियो प्राप्त हुआ है जिसमें यूव्रेन के सैनिक बालक्लिक में दिखाईं दे रहे हैं। रूस का मुकाबला करने के लिए अमेरिका की ओर से यूव्रेन को नाइट विजन उपकरण, समंदर उपकरण, एम 142 राकेट सिस्टम, एम 777 होवित्जर, गोला-बारूद, स्ट्रिंगर मिसाइल, हार्पूर मिसाइल, बख्तरबंद गािड़या, औररेबेन ड्रोन आदि की आपूर्ति की गईं। न्यूजीलैंड ने एल 119 होवित्जर तोप व अन्य आधुनिक हथियार दिए। प्रांस, स्वीडन, जर्मनी से एंटी टैंक हथियार, मिसाइल, होवित्जर तोपों, कनाडा नीदर लैंड, फिनलैंड, ब्रिटेन आदि ने अरबों की खेप भेजी। इसके अलावा यूव्रेन की मदद करने वाले देशों में बैल्जियम, नीदरलैंड, चैक रिपब्लिक, पुर्तगाल, ग्रीस, रोमानिया, इटली, तुर्की, स्विटजरलैंड आदि देश भी शामिल हैं। ——अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 19 June 2012

विरोध से शुरू हुआ है ब्लादिमीर पुतिन का तीसरा कार्यकाल

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 June 2012
अनिल नरेन्द्र
रूस में राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की क्या सत्ता पर पकड़ ढीली होती जा रही है? पुतिन ने 7 मई को अपना तीसरा राष्ट्रपति का कार्यकाल आरम्भ किया है। वर्ष 2000 में बोरिस येल्तसिन को हराकर पुतिन पहली बार रूस के राष्ट्रपति बने थे। 2004 में उन्होंने दोबारा चुनाव जीता। वे 2008 में भी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ते यदि संवैधानिक बाधा बीच में नहीं आती। इसे दूर करने के लिए पुतिन प्रधानमंत्री बन गए और अपने विश्वसनीय दमित्री मेदवेदेव को देश का राष्ट्रपति बनवा दिया। तीसरी बार शपथ लेने के तत्काल बाद पुतिन ने प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव को बिठा दिया। यह दोनों नेताओं के बीच सत्ता की भागीदारी को लेकर समझौते के तहत किया गया। खुफिया एजेंसी केजीबी के अधिकारी के तौर पर काम कर चुके पुतिन अपना यह कार्यकाल पूरा करते हैं तो वह स्टालिन के बाद सोवियत संघ और रूस में सबसे ज्यादा समय तक राष्ट्रपति का पद सम्भालने वाले नेता बन जाएंगे पर गत दिनों पुतिन के खिलाफ हजारों लोग मास्को की सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारी `पुतिन के बिना रूस' और `पुतिन चोर है' के नारे व बैनर लेकर सड़कों पर उतर आए। यह वर्तमान कार्यकाल में पुतिन के खिलाफ सबसे बड़ा प्रदर्शन था। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि मार्च में राष्ट्रपति का चुनाव जीतने के लिए पुतिन ने धांधलेबाजी की और जबरदस्ती चुनाव जीता। इससे पहले पुलिस ने कई विपक्षी नेताओं के घरों पर छापे मारे और मंगलवार की इस रैली, मार्च को रोकने का हर प्रयास किया। वर्तमान तीसरे कार्यकाल के आरम्भ से ही पुतिन का विरोध शुरू हो गया। विपक्ष तभी से कह रहा है कि पुतिन ने इन चुनावों में सरकारी तंत्र का बेजा इस्तेमाल करते हुए फर्जीवाड़ा किया। पुतिन ने विवाद का कोई हल ढूंढने की बजाय आंदोलन का लगातार उपहास उड़ाया। उन्होंने कई बार यह दोहराया कि इस आंदोलन के पीछे विदेशी हाथ है। पुतिन के इस रवैये से लोगों के बीच उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन गई जो किसी भी कीमत पर सत्ता हथियाना चाहते हैं। राष्ट्रपति पुतिन को अब चाहिए कि वह अपनी विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए अविलम्ब चुनाव सुधार करने चाहिए ताकि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता आए। वे जब तक चुनाव सुधारों की दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाएंगे, विरोध के स्वर शायद ही शांत हों। यदि यह ऐसा कर पाते हैं तो यह रूस के राजनीतिक इतिहास का बड़ा बदलाव होगा। कमजोर राजनीतिक व्यवस्था के अलावा रूस में एक बहुत बड़ी समस्या भ्रष्टाचार बन गया है। खुद पुतिन स्वीकार करते हैं कि देश व्यवस्थागत भ्रष्टाचार से ग्रसित है। भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने रूस को भ्रष्टाचार के मामले में 178 देशों की सूची में 154वें स्थान पर रखा है जबकि भारत की रैंकिंग 87वीं है। यही नहीं, एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर के बैंकों में अभी जितना काला धन जमा है, उसमें सबसे ज्यादा पैसा भारतीयों का है तो दूसरे नम्बर पर रूसी हैं। रूस में भी भ्रष्टाचार आम जिन्दगी का हिस्सा बन चुका है। ट्रैफिक पुलिस और डाक्टरों से लेकर ऊंचे स्तर तक ज्यादातर कर्मचारियों में रिश्वतखोरी की परम्परा आम हो चली है। सेना तक में अब भ्रष्टाचार आ गया है। देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने की चुनौती राष्ट्रपति पुतिन के सामने मुंह फाड़ कर खड़ी है। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से भी रूस बच नहीं सका। बेरोजगारी और गरीबी की समस्या दिनोंदिन गम्भीर होती जा रही है पर अच्छा संकेत यह है कि रूस में सुधार हो रहा है। देश में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने लगा है और देश की मुद्रा रुबल धीरे-धीरे स्थिर होता जा रही है। आर्थिक संकट से लड़ने के लिए खर्च की गई 30 खरब रुबल की भारी-भरकम रकम असर दिखाने लगी है। देश ने अनाज निर्यात करने की क्षमता पुन हासिल कर ली है। फिर भी पुतिन को देश की अर्थव्यवस्था को पुराने मुकाम तक पहुंचाने के लिए बड़ी मशक्कत करनी होगी। राष्ट्रपति पुतिन को यह समझने की जरूरत है कि हर स्तर पर जवाबदेही और पारदर्शिता की संस्कृति लानी होगी। यदि पुतिन ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं तो उन्हें सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस को फिर से मजबूती से खड़ा करने वाले नेता के रूप में याद किया जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि `स्ट्रांग मैन' कहे जाने वाले पुतिन रूस को उस ऊंचाई तक पहुंचाने में कामयाब होंगे जो एक समय सोवियत संघ तक पहुंच गई थी।
Anil Narendra, Daily Pratap, Russia, Valadimir Putin, Vir Arjun

Saturday, 12 May 2012

विरोध प्रदर्शनों के बीच पुतिन तीसरी बार राष्ट्रपति बने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12 May 2012
अनिल नरेन्द्र
रूस में बड़ा जनादेश हासिल करने वाले लोकप्रिय नेता ब्लादिमीर पुतिन ने सोमवार को तीसरी बार रूस के राष्ट्रपति का पद्भार सम्भाला। कभी रूस को समृद्धि की बुलंदियों पर ले जाने का सपना दिखाने वाले इस नेता ने इस बार लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने का ऐलान किया। यह तीसरा मौका है जब पुतिन ने रूस की सत्ता सम्भाली है। इससे पहले 2000 से 2008 तक वह राष्ट्रपति थे, इसके बाद के चार साल तक वह प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता का एक बड़ा केंद्र बने रहे। पुतिन ने कहा कि मैं शपथ लेता हूं कि रूस के राष्ट्रपति के तौर पर मैं अपने नागरिकों के अधिकारों और आजादी का सम्मान एवं सुरक्षा करूंगा। शपथ लेने के तत्काल बाद पुतिन ने प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव का नाम प्रस्तावित किया। यह दोनों नेताओं के बीच सत्ता की भागीदारी को लेकर हुए समझौते के तहत किया गया। माना जा रहा है कि रूसी संसद का निचला सदन ड्यूमा का एक विशेष सत्र बुलाकर प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव के नाम पर औपचारिक रूप से पुष्टि हो जाएगी पर पुतिन की शपथ ग्रहण समारोह विवादों से नहीं बच सका। शपथ ग्रहण समारोह के बीच मास्को में लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। विपक्ष के नेता बोरिस नेमरसोव सहित 120 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। रविवार से अभी तक 400 लोगों से अधिक को गिरफ्तार किया जा चुका है। कुछ पश्चिमी देश भी पुतिन के आलोचक रहे हैं। सत्ता से चिपकने के पुतिन के प्रयासों की पश्चिमी देशों में आलोचना होती रही है पर पुतिन ने इनकी कभी परवाह नहीं की। शपथ लेने के बाद पुतिन ने दिए अपने संक्षिप्त भाषण में कहा कि रूस राष्ट्रीय विकास के एक नए दौर में पहुंच गया है। हमें अपने नए स्तर के लक्ष्यों को निर्धारित करना होगा। आने वाले वर्षों में रूस का भविष्य लम्बे समय के लिए निर्धारित होगा। उन्होंने कहा कि मेदवेदेव ने आधुनिकीकरण को नई गति ही है और रूस में बदलाव जारी रहेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि रूस के लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करना जरूरी है। मैं इसे अपनी जिन्दगी का लक्ष्य मानता हूं। अपने लोगों की सेवा करना हमारी प्रतिबद्धता है। राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद पुतिन ने अपने पहले बयान में अमेरिका से कहा कि अमेरिका इस बात की गारंटी दे कि उसका मिसाइल रोधी तंत्र रूस के खिलाफ नहीं है। शपथ ग्रहण के फौरन बाद रूस का परमाणु सूटकेस पुतिन के सुपुर्द कर दिया गया। सोमवार को मास्को में आने वाले दिनों के लिए इस बारे में पुतिन ने अपनी सरकार का नजरिया साफ कर दिया। नए आदेश के अनुसार रूस अमेरिका के साथ और गहरे संबंध चाहता है, लेकिन वो अपने अंदरूनी मामलों में किसी भी तरह की कोई दखलंदाजी कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। रूस अमेरिका के साथ संबंधों को सही तौर पर सामरिक स्तर पर ले जाना चाहता है लेकिन वो ऐसा एक बराबरी के रिश्ते के आधार पर करना चाहता है जहां दोनों देश एक के हितों का सम्मान करें। जहां रूसियों को पुतिन से बहुत उम्मीदें हैं वहीं उनके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं। देश के अन्दर और बाहर दोनों स्तरों पर पुतिन को होशियारी से कदम रखने होंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि पुतिन ने रूस की गिरती छवि को कुछ हद तक सम्भाला है। सभी रूस को एक मजबूत, सशक्त देश देखना चाहते हैं। अमेरिका की बढ़ती दादागिरी को चैक में रखने के लिए भी एक मजबूत रूस की जरूरत है और पुतिन यह काम कर सकते हैं पर इसके लिए यह भी जरूरी है कि वह देश के अन्दर असंतोष को समाप्त करने का प्रयास करें। जनता की जायज मांगों पर ध्यान दें। रूस की जनता ने जो विश्वास पुतिन पर किया है उम्मीद है कि वह इस पर खरा उतरेंगे।
रूस में बड़ा जनादेश हासिल करने वाले लोकप्रिय नेता ब्लादिमीर पुतिन ने सोमवार को तीसरी बार रूस के राष्ट्रपति का पद्भार सम्भाला। कभी रूस को समृद्धि की बुलंदियों पर ले जाने का सपना दिखाने वाले इस नेता ने इस बार लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने का ऐलान किया। यह तीसरा मौका है जब पुतिन ने रूस की सत्ता सम्भाली है। इससे पहले 2000 से 2008 तक वह राष्ट्रपति थे, इसके बाद के चार साल तक वह प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता का एक बड़ा केंद्र बने रहे। पुतिन ने कहा कि मैं शपथ लेता हूं कि रूस के राष्ट्रपति के तौर पर मैं अपने नागरिकों के अधिकारों और आजादी का सम्मान एवं सुरक्षा करूंगा। शपथ लेने के तत्काल बाद पुतिन ने प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव का नाम प्रस्तावित किया। यह दोनों नेताओं के बीच सत्ता की भागीदारी को लेकर हुए समझौते के तहत किया गया। माना जा रहा है कि रूसी संसद का निचला सदन ड्यूमा का एक विशेष सत्र बुलाकर प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव के नाम पर औपचारिक रूप से पुष्टि हो जाएगी पर पुतिन की शपथ ग्रहण समारोह विवादों से नहीं बच सका। शपथ ग्रहण समारोह के बीच मास्को में लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। विपक्ष के नेता बोरिस नेमरसोव सहित 120 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। रविवार से अभी तक 400 लोगों से अधिक को गिरफ्तार किया जा चुका है। कुछ पश्चिमी देश भी पुतिन के आलोचक रहे हैं। सत्ता से चिपकने के पुतिन के प्रयासों की पश्चिमी देशों में आलोचना होती रही है पर पुतिन ने इनकी कभी परवाह नहीं की। शपथ लेने के बाद पुतिन ने दिए अपने संक्षिप्त भाषण में कहा कि रूस राष्ट्रीय विकास के एक नए दौर में पहुंच गया है। हमें अपने नए स्तर के लक्ष्यों को निर्धारित करना होगा। आने वाले वर्षों में रूस का भविष्य लम्बे समय के लिए निर्धारित होगा। उन्होंने कहा कि मेदवेदेव ने आधुनिकीकरण को नई गति ही है और रूस में बदलाव जारी रहेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि रूस के लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करना जरूरी है। मैं इसे अपनी जिन्दगी का लक्ष्य मानता हूं। अपने लोगों की सेवा करना हमारी प्रतिबद्धता है। राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद पुतिन ने अपने पहले बयान में अमेरिका से कहा कि अमेरिका इस बात की गारंटी दे कि उसका मिसाइल रोधी तंत्र रूस के खिलाफ नहीं है। शपथ ग्रहण के फौरन बाद रूस का परमाणु सूटकेस पुतिन के सुपुर्द कर दिया गया। सोमवार को मास्को में आने वाले दिनों के लिए इस बारे में पुतिन ने अपनी सरकार का नजरिया साफ कर दिया। नए आदेश के अनुसार रूस अमेरिका के साथ और गहरे संबंध चाहता है, लेकिन वो अपने अंदरूनी मामलों में किसी भी तरह की कोई दखलंदाजी कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। रूस अमेरिका के साथ संबंधों को सही तौर पर सामरिक स्तर पर ले जाना चाहता है लेकिन वो ऐसा एक बराबरी के रिश्ते के आधार पर करना चाहता है जहां दोनों देश एक के हितों का सम्मान करें। जहां रूसियों को पुतिन से बहुत उम्मीदें हैं वहीं उनके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं। देश के अन्दर और बाहर दोनों स्तरों पर पुतिन को होशियारी से कदम रखने होंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि पुतिन ने रूस की गिरती छवि को कुछ हद तक सम्भाला है। सभी रूस को एक मजबूत, सशक्त देश देखना चाहते हैं। अमेरिका की बढ़ती दादागिरी को चैक में रखने के लिए भी एक मजबूत रूस की जरूरत है और पुतिन यह काम कर सकते हैं पर इसके लिए यह भी जरूरी है कि वह देश के अन्दर असंतोष को समाप्त करने का प्रयास करें। जनता की जायज मांगों पर ध्यान दें। रूस की जनता ने जो विश्वास पुतिन पर किया है उम्मीद है कि वह इस पर खरा उतरेंगे।
Anil Narendra, Daily Pratap, Russia, Valadimir Putin, Vir Arjun

Tuesday, 3 April 2012

मास्को ः तेजी से बदलता मास्कोवाबाद

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3 April 2012
अनिल नरेन्द्र
मार्च के ठंडे शुक्रवार को मास्को के बीचो-बीच गुजरने वाली बोलशाया तातरस्काया स्ट्रीट पर सन्नाटा पसरा है। यह सड़क रूस की राजधानी की सबसे पुरानी मस्जिद के पास से गुजरती है। मास्को में आजकल 20 लाख से ज्यादा मुसलमान रहते हैं और काम करते हैं। यह अब यूरोप में मुस्लिम लोगों का सबसे बड़े शहरों में से एक हो गया है और कुछ मस्जिदें इतनी बड़ी आबादी के लिए काफी नहीं ंहैं। जुमे की नमाज के दौरान इस ऐतिहासिक इमारत में लोगों का जमघट लगा है और हजारों लोग खुले में बर्पबारी के बीच नमाज अता करने पर मजबूर हैं। ज्यादातर मुसलमान मध्य एशिया के पूर्व सोवियत गणराज्यों से आम युवा आप्रवासी हैं। गरीबी और संघर्ष ने उन्हें रूस में नई जिन्दगी शुरू करने के लिए मजबूर किया है। लाखों उज्बेक, ताजिक और किरगिज लोग मास्को में नौकरियां कर रहे हैं। उज्बेकिस्तान से आए युवा अलबेक कहते हैं, `हम इस बात के आभारी हैं कि मास्को में इतनी मस्जिदें हैं।' लेकिन दूसरे कुछ लोग कहते हैं कि प्रशासन मुसलमानों की जरूरतों की अनदेखी कर रहे हैं। शहर की ऐतिहासिक मस्जिद के इमाम हसन का मानना है कि मौजूदा सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। वे कहते हैं, `हम प्रशासन से और मस्जिदें बनवाने की अनुमति मांग रहे हैं लेकिन वह हमारी बात नहीं मान रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि लोगों को अब खुले में बारिश और बर्प के बीच नमाज पढ़नी पड़ रही है।' मास्को की पुरानी ततार मस्जिद की अब नई इमारत बनाई जा रही है लेकिन इसके बावजूद भी सभी नमाजियों के लिए यह जगह कम पड़ रही है। पुरानी मस्जिद के पास टहल रही दो युवा महिलाओं ने बीबीसी संवाददाता को बताया कि मास्को बढ़ रहा है और ज्यादा से ज्यादा आप्रवासियों को आकर्षित कर रहा है जिसमें कई मुसलमान हैं। रूस में गिरिजाघर भी बनाए जा रहे हैं। इसलिए मुसलमानों को भी मस्जिद बनाने से रोका नहीं जाना चाहिए। लेकिन कई रूसियों को डर है कि अधिक विदेशियों के होने की वजह से रूस की संस्कृति और जीवनशैली बदल रही है। एक राष्ट्रीय संगठन रुसावेट के कार्यकर्ता यूरी गोसर्की कहते हैं, `लोग मजाक कर रहे हैं कि मास्को अब मास्कोवाबाद बन गया है। अब सड़कों पर स्लाविक देशों के चेहरे नहीं दिखाई देते। हमें इस्लामिक देशों से आए लोगों पर आपत्ति नहीं है लेकिन हमें इन मुसलमानों को रोकना होगा।' पहले रूस में मुसलमान आप्रवासियों पर हमले हुआ करते थे लेकिन अब इनकी संख्या में काफी कमी आई है। रूसी मानवाधिकार संगठन सोवा के अनुसार जातीय हमलों में 2011 के दौरान सात लोगों की मौत हुई है और 28 लोग घायल हुए हैं जबकि 2008 में इन हमलों में मरने वालों की संख्या 57 थी। बाहर से आए अधिकतर लोगों को वह काम करने में कोई संकोच नहीं है जिसे स्थानीय लोग करने में हिचकिचाते हैं। पूरे शहर में हलाल दुकानों और कैफे का जाल-सा बिछ गया है। इनमें महंगे रेस्तरां से लेकर जहां एक बार के खाने की कीमत 10,000 रुपये तक है, सस्ते टेक अवे भी शामिल है। जहां मध्य एशियाई लोगों को सिकी हुई तंदूरी रोटियां मिल जाती हैं, समोसे भी बनते हैं। हलाल समोसा रूस का सबसे लोकप्रिय टेक अवे बन गया है। रूस में बड़ी संख्या में लोग इस्लाम धर्म अपना रहे हैं। एक केंद्र में धर्म बदलने वाली मुस्लिम महिलाओं का पंजीकृत किया जाता है। इस्लाम हमेशा से रूस का दूसरा बड़ा धर्म रहा है लेकिन वह इतना दृष्टिगोचर कभी नहीं रहा जितना आज है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Moscow, Muslim, Russia, Vir Arjun

Sunday, 1 April 2012

ब्रिक्स ने अमेरिकी साम्राज्य को सीधी चुनौती दी है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 April 2012
अनिल नरेन्द्र
नई दिल्ली में सम्पन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन से दुनिया के वर्ल्ड आर्डर का नक्शा बदल सकता है। ब्रिक्स इस दृष्टि से सफल सम्मेलन रहा। इस सम्मेलन में ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका और भारत ने पहली बार अमेरिकी और पश्चिमी दादागीरी को खुली चुनौती दी है। अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के आर्थिक व राजनीतिक प्रभुत्व को चुनौती देते हुए ब्रिक्स देशों के समूह ने एक विकास बैंक बनाने और घरेलू मुद्राओं में व्यापार की पहल की है। इन पांच देशों ने फैसला किया है कि इन देशों के व्यापारियों को अब एक-दूसरे के साथ पैसे का लेन-देन करने के लिए अपने देश की करंसी को डालर में तब्दील नहीं करना पड़ेगा। वे आपस में लोकल करंसी में ही माल की खरीद-फरोख्त कर सकेंगे। इससे फायदा यह होगा कि अपनी करंसी को डालर में एक्सचेंज करने के एवज में जो कमीशन चार्ज कटता था, वह अब नहीं कटेगा यानि अगर माल उधार लेना है तो भुगतान भी उसी करंसी में करने का समझौता किया जा सकता है। इस कदम से भारत के उन लोगों को सबसे ज्यादा फायदा होगा जो चीन के साथ व्यापार करते हैं। उन्हें चीन का सामान डालर की वजह वहां की करंसी युआन में लेना होगा और चीनी भी भारत का सामान रुपये में ले सकते हैं यानि डालर बॉय-बॉय युआन इन। अमेरिकी दादागीरी को सीधी चुनौती ब्रिक्स ने ईरान के मामले में दी है। ईरान के मसले पर ब्रिक्स ने एकजुटता दिखाते हुए अमेरिका से कहा है कि बातचीत से राजनीतिक मसलों को सुलझाए और भारत ने कहा कि ऐसे राजनीतिक कदम नहीं उठाए जिससे पेट्रोलियम की कीमतों में अस्थिरता पैदा हो। पांच देशों (भारत, ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका) की शिखर बैठक के बाद जारी साझा बयान में ईरान और सीरिया जैसे राजनीतिक मसलों पर आम राय से अमेरिकी दादागीरी का विरोध किया गया। बयान में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के ईरान के अधिकार को मान्यता देकर अमेरिकी रवैये को सीधी चुनौती दी गई है। ईरान के खिलाफ अमेरिका और यूरोपीय देशों की ओर से लागू पाबंदी को भारत से भी लागू करने के अभूतपूर्व दबाव के मद्देनजर ब्रिक्स देशों के इस साझा बयान से भारत की ईरान नीति को बल मिला है। ब्रिक्स देशों के बीच पिछले चार सालों से चल रही शिखर बैठकों का यह पहला प्रैक्टिकल नतीजा निकला है। बैठक में न सिर्प ईरान जैसे राजनतिक मसलों पर अमेरिकी नीतियों को चुनौती दी गई बल्कि व्यापार में डालर का दबदबा कम करने के लिए दूरगामी असर वाला समझौता भी किया गया। सांस्कृतिक एवं भौगोलिक मित्रता के बावजूद दुनिया में तेजी से उभरते इन पांच प्रमुख आर्थिक देशों के समूह ब्रिक्स अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। ब्रिक्स देशों में दुनिया की 40 फीसदी आबादी रहती है। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इनकी हिस्सेदारी 2000 में 16 फीसदी थी जो 2010 में बढ़कर करीब 25 फीसदी हो गई। दिलचस्प बात यह है कि ब्रिक्स के मंच पर भारत के तेवर भी कड़े हो गए और पहली बार ईरान से इतर अमेरिका ही नहीं पश्चिम परस्त आर्थिक नीतियों का विरोध भी भारत और चीन ने यह कहकर किया कि जब मंदी की गिरफ्त में अमेरिका और विकसित देशों की विकास दरें घटीं तब भारत-चीन ने न सिर्प विकास दर को बरकरार रखा बल्कि उसमें वृद्धि भी की जिससे दुनिया की अर्थव्यवस्था पटरी पर रही। महत्वपूर्ण यह भी कम नहीं कि पहली बार भारत-चीन ने मिलकर माना कि डब्ल्यूटीओ की नीतियां सिर्प विकसित देशों का हित साधती हैं। विश्व बैंक से लेकर आईएमएफ तक अमेरिकी परस्त है। इसलिए डेवलपमेंटल बैंक की जरूरत है यानि जिस अर्थनीति की चकाचौंध तले अमेरिका दुनिया को कई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों के जरिये आर्थिक सुधार का पाठ पढ़ाता रहा है उसका विरोध भारत ने अगर पहली बार किया तो ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका ने भी अपने संकटों को जी-8 से लेकर जी-20 तक के घेरे में रखा। जिसका समर्थन रूस और चीन ने किया यानि पहली बार विकल्प का सवाल आर्थिक नीतियों के जरिये उठा तो अमेरिकी विस्तार को रोकने के लिए एशिया के ताकतवर देश एक साथ खड़े दिखे। आतंक पर नकेल कसने के नाम पर इराक युद्ध से लेकर अफगानिस्तान तक में जो अमेरिकी पैठ शुरू हुई और दुनिया अमेरिकी वर्ल्ड आर्डर के अनुरूप चलने पर मजबूर हुई उसमें पहली बार सेंध चीन, रूस और भारत ने मिलकर लगाया है। अब देखना यह है कि अपने साम्राज्य को मिलने वाली ब्रिक्स चुनौती का अमेरिका और पश्चिमी देश क्या जवाब देते हैं?
Anil Narendra, Brazil, BRICS, China, Daily Pratap, India, Russia, South Africa, Vir Arjun

BRICS directly challenges US hegemony

- Anil Narendra
The recently concluded BRICS Summit in New Delhi can alter the shape of the world order. BRICS was a successful conference in this regard. Brazil, Russia, China, South Africa and India, for the first time have challenged the US hegemony. Challenging the economic and political supremacy of US and the West, the BRICS countries have taken initiatives to establish a development Bank and trade in their national currencies. These five countries have decided that traders of these countries would no more be required to convert their national currencies into dollars for money transactions amongst them. They would be able to trade in their own currencies. They would be benefitted in the sense that they would not be required to pay the commission earlier charged for exchange in dollars, which means that if you are purchasing goods on credit, then you can have a deal for payment in that currency. This measure would benefit the most to the people who trade with China. They would be able to trade for Chinese goods in local currency of Yuan instead of dollars and Chinese will be able to trade in rupees for Indian goods, which means dollar out and yuan in. The direct challenge to US hegemony has been given by BRICS countries on the issue of Iran. Displaying solidarity on Iran issue, the BRICS countries have asked US to sort out political issues with talks. India has said that no such political measure should be adopted, which may lead to instability in petrol prices. The joint statement issued at the conclusion of the BRICS summit (India, Brazil, Russia, China and South Africa) has opposed the US hegemony with the consensus on issues like Iran and Syria. In the statement, the right to peaceful uses of nuclear energy by Iran has been recognized, thus US attitude in this regard has directly been challenged. In view of unprecedented pressure on India to adopt the sanctions imposed by US and European countries against Iran, the joint statement has
strengthened India's Iran policy. This is the first solid outcome of the BRICS summits over last four years. The Summit, not only challenged US policies on political issues, but it concluded an agreement of far-reaching impact in weakening the dominance of dollar. With their cultural and geographical closeness, this fast emerging group of five countries, BRICS has braced itself for a new role in the global economic and political arena. Alost 40 percent of world population lives in
BRICS countries. The share of these countries in global GDP has also risen to about 25 percent in 2010 from 16 percent in 2000. It is interesting to note that India's attitude has also hardened on global platform and for the first time, India and China have opposed not only policy on Iran, but US and pro-West policies saying that it were India and China who not only maintain their growth rates, but enhance these rates that helped the keeping the world economy on rails. This is also not less important that India and China both have accepted that the WTO policies favour only the interests of developed countries. All ranging from World Bank to IMF favour US. In view of this a development bank is needed. It shows that India has, for the first time opposed US that have been sermonizing about economic reforms under its economic policies through a number of international economic institutions, whereas Brazil, South Africa also restricted their crisis to G-8 to G-20. Russia and China supported it, which means that all powerful countries of Asia, for the first time stood together to stop the US expansion, when an alternative posed itself. China] Russia and India collectively for the first time made a dent in the US penetration that started with Iraq war to Afghanistan in the name of war on terror and countries of the world were forced to follow the US world order. Let us wait for the reaction of US and West to the challenge to their empire from BRICS countries.
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Tuesday, 6 March 2012

रूस में पुतिन का जीतना ही सबसे अच्छा विकल्प है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6 March 2012
अनिल नरेन्द्र
रविवार को रूस में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान हुआ है। इस चुनाव में वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन के अलावा 4 अन्य प्रत्याशी मैदान में हैं। ब्लादिमीर पुतिन वर्ष 2000 में पहली बार राष्ट्रपति चुने गए थे। उन्होंने अपने दो कार्यकाल पूरे किए थे और फिर रूसी कानून के तहत उन्होंने राष्ट्रपति का पद छोड़ा था। इस बीच दमित्री मेदवेदेव ने राष्ट्रपति का पद सम्भाला था और पुतिन खुद प्रधानमंत्री बन गए थे। 59 वर्षीय पुतिन जो कभी रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी के जासूस थे, का राष्ट्रपति बनना तय है। माना जा रहा है कि पुतिन दो-तिहाई बहुमत से जीतेंगे पर इस बार का कार्यकाल पहले के कार्यकालों से ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने की सम्भावना है। क्योंकि पिछले कुछ दिनों से रूस में असंतोष नजर आ रहा है। पुतिन के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन हुए। हाल के दिनों में संसदीय चुनावों में गड़बड़ी के आरोपों और उनके शासन के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रदर्शन हुए हैं। पुलिस भी चुनावों के बाद किसी तरह की अशांति से निपटने के लिए तैयारी कर रही है। अमेरिका के घटते रुतबे एवं आर्थिक संकट से जूझते यूरोप के साथ अटलांटिक जगत अपनी चमक तेजी से खोता जा रहा है। दुनिया की धुरी एशिया-प्रशांत क्षेत्र की ओर खिसक रही है। इस दृष्टि से एक स्थिर रूस पूरे क्षेत्र को बल प्रदान कर सकता है। पुतिन ने रूस को मजबूत किया है और धीरे-धीरे लाइन से उतरती रूसी गाड़ी को कुछ हद तक वापस लाइन पर लाने में सफलता पाई है। भारत के लिए भी एक सशक्त रूस इसके हित में होगा। राष्ट्रपति पुतिन के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती आबादी में गिरावट है। विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि ने पुतिन का सिरदर्द बढ़ा दिया है पर उनकी सर्वाधिक चिन्ता जनसांख्यिकीय कम जन्मदर और कार्यशील पुरुष कर्मचारियों-मजदूरों की उच्च मृत्युदर से भूराजनीतिक शून्यता पैदा हो रही है। फिलहाल पुतिन ने खासकर पुरुषों में शराबखोरी की वज्रपाती दर रोकने के लिए एक नया अभियान चलाया है। उन्होंने उन महिलाओं को विशेष भत्ता देने की घोषणा की है, जिनके दो से अधिक बच्चे हैं। पुतिन के पैकेज में सभी रूसी नागरिकों को आवास और शिक्षा की बेहतर सुविधाएं प्रदान करना शामिल हैं। उन्होंने एक स्मार्ट आव्रजन नीति अपनाने की बात कही है, जिसके जरिये विदेश में रहने वाले रूसी मूल के लोगों को मातृभूमि पर लौटने के लिए लुभाया जाएगा। जनमत सर्वेक्षणों के ताजा नतीजों में प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन के राष्ट्रपति पद के लिए हो रहे चुनाव में दो-तिहाई मतों से स्पष्ट जीत दर्ज कराने की बात कही गई है। रूस में चुनावी रुझान से जुड़े बेहद सटीक आंकड़े देने वाले लेवादा सेंटर ने बताया है कि पुतिन को इस चुनाव में 63 से 66 फीसदी वोट मिल सकते हैं। रूस और यूकेन की सुरक्षा एजेंसियों ने रूस में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले ब्लादिमीर पुतिन की हत्या की साजिश को नाकाम कर दिया। समाचार डेली टेलीग्रॉफ के अनुसार षड्यंत्रकारी अपराधियों के गिरोह को यूकेन के शहर ओडेसा में हिरासत में लिया गया। गिरोह राष्ट्रपति चुनाव के ठीक बाद मास्को में पुतिन की हत्या का षड्यंत्र बना रहा था। बताया जाता है कि चेचन विद्रोहियों के कथित सरगना एडम ओस्माचेव ने स्वीकार किया है कि षड्यंत्र उमारोव के आदेश पर किया गया था, जो उत्तरी काकेइनस क्षेत्र में रूस के शासन के खिलाफ आंदोलनरत् इस्लामिक गतिविधियों का अमीर है। चैनल वन ने ओस्माचेव को हिरासत में यह कहते हुए दिखाया है, अंतिम लक्ष्य मास्को की यात्रा और पुतिन की हत्या था। पुतिन का प्रयास है कि वह रूस को उसके गौरवमय इतिहास को फिर से दोहराएं।
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Friday, 10 February 2012

पश्चिमी देश अपनी राय सीरिया पर नहीं थोप सकते

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th February  2012
अनिल नरेन्द्र
सीरिया के अंदरूनी हालात बहुत खराब हैं। वहां एक गृह युद्ध छिड़ा हुआ है। वहां राष्ट्रपति बशर अल असद की सेना व उनका तख्ता पलटने में लगे विद्रोहियों में जमकर लड़ाई हो रही है। मंगलवार को विभिन्न शहरों में हुई कार्रवाई में दर्जनों लोग मारे गए। राष्ट्रपति असद के सैनिकों ने होम्स शहर में मोर्टारों से हमला किया जबकि राजधानी के समीप स्थित जावदानी शहर में भी आक्रामक कार्रवाई की। उधर सरकारी मीडिया ने दावा किया कि उत्तर-पश्चिमी इदलिब प्रांत में हथियारबंद आतंकियों के हमले में तीन सैनिक मारे गए। सरकारी फोर्सेज विद्रोहियों पर हेलीकाप्टरों और टैंकों से कार्रवाई कर रहे हैं। राजधानी दमिश्क के इर्द-गिर्द शहर विद्रोहियों के कब्जे में आ गए हैं। गत मार्च से करीब 7000 व्यक्तियों की मौत हो चुकी है। पिछले दिसम्बर को अरब लीग ने संघर्ष रोकने के लिए 200 आब्जर्वर भेजे थे पर यह भी हिंसा रोकने में नाकाम रहे। विद्रोहियों की मदद अमेरिका और कुछ पश्चिमी देश कर रहे हैं। सीरिया में अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित अमेरिका ने अपना दूतावास बन्द कर दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैंड ने मंगलवार को कहा कि सीरिया में अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट फोर्ड समेत दूतावास के सभी कर्मचारियों को वापस बुला लिया गया है। छह खाड़ी देशों की सहयोग परिषद ने भी सीरिया पर दबाव बढ़ाते हुए दमिश्क से अपने राजनयिकों को वापस बुलाने और अपने यहां सीरिया के राजदूतों को वापस भेजने का निर्णय लिया है। उधर सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद ने एक बार फिर देश में हिंसा रोकने और विपक्ष से बात करने का वादा किया। अल असद ने यह भरोसा सीरिया के दौरे पर गए रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव को दिलाया। लेकिन सीरियाई विपक्ष ने कहा है कि राष्ट्रपति खोखले वादे कर रहे हैं। सीरिया में रूसी विदेश मंत्री के स्वागत में हजारों की भीड़ दमिश्क की सड़कों के किनारे जमा होकर किया। लोग सड़कों के किनारे और शहर के मुख्य चौराहों पर झंडे लेकर खड़े थे और उसे हिलाकर सर्गेई लावरोव का इस्तकबाल किया। विद्रोही पिछले मार्च से राष्ट्रपति असद का तख्ता पलटने की साजिश में जुटे हुए हैं पर इतने दिन बीतने के बाद भी वह जीत नहीं पाए। कारण साफ है, सीरिया की सेना और जनता का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह असद के साथ है। सीरिया लीबिया नहीं जिस पर आसानी से तख्ता पलट हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र भी देश में अमन-शांति के प्रयास कर रहा है पर वह भी विफल रहा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जो प्रस्ताव लाया गया था, असल में वह अरब लीग से ही प्रेरित था। तकरीबन दो दशक बाद सुरक्षा परिषद में लौटे भारत ने इस प्रस्ताव के समर्थन में वोट दिया। इसका यह मतलब नहीं कि भारत ने पश्चिमी देशों का पिछलग्गू बनकर यह कदम उठाया। दरअसल उसका यह कदम अरब लीग और सीरिया के साथ उसके ऐतिहासिक संबंधों पर आधारित है। यही नहीं, सीरिया के खिलाफ खड़े गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल के बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई में तकरीबन 50 लाख भारतीय काम करते हैं। इन सबसे बड़ी बात यह है कि भारत लोकतंत्र के समर्थन और शांति स्थापना के पक्ष में है और चाहता है कि सीरिया के नेतृत्व का फैसला उस देश के लोग ही करें। बेशक यूरोपीय देशों और अमेरिका की नजर सीरिया के तेल पर हो सकती है पर सीरिया पर कौन राज करेगा इसका फैसला केवल वहां की जनता ही कर सकती है।
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Friday, 30 December 2011

रूस में भगवत गीता पर पतिबंध की तलवार हटी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th December 2011
अनिल नरेन्द्र
रूस में रहने वाले हिंदुओं ने बुधवार को एक कानूनी लड़ाई जीत ली। रूसी पांत साइबेरिया के शहर तोमस्क की एक अदालत ने हिंदू धर्मग्रंथ श्रीमद् भगवत गीता के रूसी संस्करण को पतिबंधित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत के इस फैसले से रूस सहित दुनियाभर के हिंदुओं व भारतीयों में हर्ष की लहर दौड़ना स्वाभाविक ही था। फैसले से खुश रूसी हिंदू कौंसिल के अध्यक्ष और इस्कॉन नेता साधु पिय दास ने कहा कि छह महीने तक चले कानूनी दाव-पेंच के बाद हम जीत गए। न्यायाधीश ने गीता पर रोक की मांग वाली याचिका कि भगवत गीता का रूसी भाषा में संस्करण सामाजिक कटुता बढ़ाने और दूसरे धर्मों के लोगों के पति घृणा फैलाता है और गीता के रूसी संस्करण को भी उग्रवादी सामग्री में शामिल किया जाए को सिरे से खारिज कर दिया। इस्कॉन की ओर से दलील दी गई कि भगवत गीता हिंदू धर्म की एक पवित्र पुस्तक है और यह अनुवादित संस्करण में एसी भक्तिवेदांता स्वामी पभुपाद की टिप्पणियां है। इस्कॉन सदस्यों ने आरोप लगाया कि रूस का आर्थोडॉक्स चर्च अदालती मामले के पीछे है और वह हमारी गतिविधियों को मिश्रित करना चाहता है। फैसले पर विदेश मंत्रालय के पवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने कहा कि हम इस संवेदनशील मुद्दे के विवेकापूर्ण समाधान की सराहना करते हैं और इस पकरण के समापन का स्वागत करते हैं। उन्होंने कहा कि भारत रूस में अपने सभी मित्रों के पयत्नों की सराहना करता है जिनकी वजह से यह नतीजा सम्भव हो सका। उन्होंने कहा कि एक बार फिर पदर्शित करता है कि भारत और रूस के लोगों को एक-दूसरे की संस्कृति की गहरी समझ है और हमारी सभ्यता के साझे मूल्यों का महत्व कम करने के किसी भी पयास को हम हमेशा खारिज करेंगे। हम रूस की जनता और रूस की सरकार का शुकियाअदा करते हैं कि इस बिना वजह की बहस को समाप्त करने में उन्होंने मदद की। जय श्री कृष्ण।
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Thursday, 22 December 2011

रूस में आखिर क्यों हो रहा है भगवत गीता का विरोध?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd December 2011
अनिल नरेन्द्र
यह अत्यन्त दुख की बात है कि रूस में भगवत गीता जैसे महान धार्मिक ग्रंथ को कुछ लोग एक उग्रवादी ग्रंथ बताकर उस पर पतिबंध लगवाने का पयास कर रहे हैं। रूस के साइबेरिया में तोस्सक की अदालत में इस्कॉन के संस्थापक एसी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा लिखित भगवत गीता यथारूप के रूसी अनुवाद पर पतिबंध लगाने के लिए जून माह से ही मामला चल रहा है। इस मामले में अदालत द्वारा सोमवार को फैसला दिया जाना चाहिए था। अब यह फैसला 28 दिसम्बर तक के लिए टल गया है। अदालत में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इसका कथ्य सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाला है। रूस के लोकपाल औम्बुसचैन ब्लादिमीर लुकिन ने अपना बयान जारी करके घोषणा की थी कि इस्कॉन के संस्थापक एसी भक्तिवेदांत स्वामी द्वारा लिखित `भगवत गीता एज इट इज' विश्वभर में पतिष्ठित पुस्तक है और रूस में इस पर पतिबंध लगाने की मांग अस्वीकार्य है। उधर रूस में रह रहे भारत, बांग्लादेश, मारिशस, नेपाल आदि देशें के हिंदुओं ने आपातकालीन बैठक में अपने हितों की रक्षा के लिए `हिंदू काउंसिल ऑफ रूस' बनाया है। इधर भारत में सड़कों से लेकर संसद में यह मुद्दा गरमाया हुआ है। लोकसभा में जब इस मुद्दे पर बहस चल रही थी तो पतिबंध के विरोध में एक ऐसे नेता खड़े हुए जिनसे कभी भी यह उम्मीद नहीं थी कि वह इस पतिबंध का विरोध करेंगे। मैं राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू पसाद यादव की बात कर रहा हूं। सोमवार को लोकसभा में गीता और गंगा पर चल रही बहस के दौरान लालू सरकार पर विफर पड़े। धुर समाजवादी लालू पर अचानक धर्म का रंग चढ़ जाने से उनके विरोधी भी दंग रह गए और कुछ ने तो चुटकी भी ली। भाजपा ने कहा कि जनता ने उन्हें रिटायर कर दिया है इसलिए अब उन पर आध्यात्मिक रंग चढ़ गया है। हालांकि काफी सदस्यों ने रूस में पतिबंध का विरोध किया पर लालूजी का अंदाज सबसे जुदा रहा। उन्होंने गीता के विरुद्ध रूस में चलाई जा रही मुहिम को हफ्ता भरी साजिश बताया। सदस्यों द्वारा इस बारे में रोष पकट किए जाने के दौरान लालू बीच-बीच में बोलो कृष्ण भगवान की जय का उद्घोष करते रहे। इस मसले को लालू के साथ ही मुलायम सिंह और भाजपा के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी ने बेहद गम्भीर बताते हुए पधानमंत्री से हस्तक्षेप करने की मांग की। हंगामे के कारण लोकसभा दो घंटे तक स्थगित रही। लेकिन लालू इस मामले को सदन के बाहर सरकार पर दबाव बनाने के लिए अपने विरोधियों को साधते नजर आए। मीडिया से भी उन्होंने सहयोग मांगा। जब उनसे पूछा गया कि लालू जी आप तो समाजवादी नेता हैं। गीता पर आप इस कदर उद्धेलित क्यों हैं, फिर क्या था लालू भाजपा पर विफर पड़े। कहा कि भगवान कृष्ण, राम और गीता-रामायण भाजपा का ट्रेड मार्प है क्या? उन्होंने कहा कि कृष्ण और गीता तो यदुवंशियों से जुड़ी है। वे हमारे आराध्य हैं। भाजपा वाले राम और कृष्ण को भूल चुके हैं। लालू जी ने ठीक कहा कि भगवान कृष्ण, भगवान राम, गीता-रामायण हमारे आराध्य हैं और हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। इन पर हमला भारत की संस्कृति, भारत के जीवनशैली पर हमला है। पर यहां एक बात जो मुझे लगती है कि रूस में जो विरोध हो रहा है वह स्वामी पभुपंत के अनुवादित भगवत गीता का हो रहा है। हो सकता है कि रूस में एक वर्ग इस अनुवादित गीता से सहमत न हो। उन्होंने संस्कृत और हिंदी में गीता का विरोध नहीं किया। मुझे यकीन है कि जो ग्रंथ सदियों से मानव के मार्गदर्शक रहे हैं उन पर यह अनुचित विवाद जल्द समाप्त हो जाएगा। खुद रूसी सरकार इस विरोध को नाजायज मान रही है और निश्चित रूप से रूसी अदालत भी इस विरोध को खारिज कर देगी। जय श्रीकृष्ण। फिर मुझे विश्वास ही नहीं यकीन है कि हमारे रूसी भाई उस कट्टरपंथ की ओर देश को फिर नहीं ले जाना चाहेंगे जिसे उन्होंने इतनी मेहनत, मशक्कत से निकाला है।
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Thursday, 15 December 2011

क्या रूस में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे अमेरिकी हाथ है?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th December 2011
अनिल नरेन्द्र
रूस में मौजूदा प्रधानमंत्री ब्लादीमिर पुतिन के एकछत्रवादी शासन और हाल में ही ड्यूमा के लिए सम्पन्न हुए चुनावों में हुई कथित धांधलियों को लेकर जनता का क्रोध थमता नहीं दिख रहा है और विपक्षी दलों ने रविवार को भी विरोधी रैलियां निकाली। गौरतलब है कि रूस में चार दिसम्बर को आयोजित हुए ड्यूमा चुनावों में कुल मिलाकर सात दलों ने शिरकत की थी। चुनावी परिणामों की घोषणा होने के बाद पुतिन की अध्यक्षता वाली यूनाइटेड रशिया पार्टी को सबसे अधिक लगभग 50 फीसदी मत और ड्यूमा में 238 सीटें हासिल हुई हैं। इन चुनावों में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (केपीआरएफ) 20 फीसदी मत और 92 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है। रूस के राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने हाल के चुनाव में मतों की हेराफेरी के आरोपों पर हजारों लोगों के प्रदर्शन के बाद रविवार को मामले की जांच के आदेश दिए। मेदवेदेव ने फेसबुक पर लिखा, `मैं न तो इन रैलियों में लगाए जाने वाले नारों से सहमत हूं, न ही बयानों से।' हालांकि मैंने मतदान केंद्रों पर चुनावी कानून के पालन संबंधी सभी सूचनाओं की जांच के आदेश दिए हैं। गौरतलब है कि पिछले हफ्ते हुए संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री पुतिन के खिलाफ 50000 से भी अधिक नागरिक सड़कों पर उतर आए और उन्हें सत्ता से हटने और निष्पक्ष चुनाव कराने की मांग की। इस पर मेदवेदेव ने लिखा,`लोगों के पास अपने विचार अभिव्यक्त करने का अधिकार है, जो उन्होंने किया। यह अच्छा है कि सब कानून के दायरे में हुआ।'
सवाल यह है कि क्या जनता का गुस्सा जायज है और वाकई ही चुनावों में धांधली हुई है या फिर कोई सोची-समझी रणनीति के तहत पुतिन के खिलाफ बने वातावरण को हवा देने में लगा है। प्रधानमंत्री ब्लादीमिर पुतिन ने देश में हो रहे व्यापक प्रदर्शनों के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन को जिम्मेदार ठहराया है। पुतिन ने आरोप लगाया कि पश्चिमी राष्ट्र देश में चुनाव को प्रभावित करने के लिए करोड़ों डालर खर्च कर रहे हैं। पुतिन ने कहा कि यूरोपीय पर्यवेक्षकों आर्गेनाइजेशन फॉर सिक्यूरिटी एण्ड को-ऑपरेशन (ओएससीई) की रिपोर्ट देखने से पहले ही हिलेरी ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठा दिए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री ने विपक्षी कार्यकर्ताओं के सुर तय कर दिया है और उनकी पीठ पर अमेरिकी विदेश विभाग का हाथ है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को रूस का परमाणु शक्ति सम्पन्न होना पच नहीं रहा है इसलिए वह घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी भरे स्वर में कहा, `हम अपनी घरेलू प्रक्रिया को प्रभावित करने नहीं दे सकते और अपनी सप्रभुता की रक्षा के लिए कृतसंकल्प हैं।' पुतिन के आरोपों में कितना दम है यह तो हम नहीं जानते पर हां अमेरिका का यह स्टाइल रहा है। गत महीनों में मध्य पूर्व में भी ऐसे ही प्रदर्शन हुए थे और कहा यही जाता है कि अमेरिका का इनके पीछे हाथ व समर्थन था। वहां का उद्देश्य और रूस का उद्देश्य समान है। सभी जगहों अमेरिका को शासक की स्वतंत्र नीति पसंद नहीं थी और वह मौजूदा शासन का तख्ता पलटना चाहते थे। रूस में भी पुतिन के कुछ मुद्दों पर लिए स्टैंड से अमेरिकी विदेश विभाग खुश नहीं है। वैसे रूस में सरकार समर्थित एक वेबसाइट ने अमेरिकी सरकार और स्वतंत्र निर्वाचन पर्यवेक्षक `गोलोस' के बीच ई. मेल के आदान-प्रदान का विवरण प्रकाशित किया है। `लाइफ न्यूज' की वेबसाइट पर गोलोस को मिलने वाली अमेरिकी मदद का उल्लेख किया गया है। प्रधानमंत्री पुतिन ने गुरुवार को अमेरिकी विदेश विभाग पर रूस में विरोध प्रदर्शनों को हवा देने के आरोप के बाद यह खुलासा हुआ है। वेबसाइट ने लिखा, `पहले सिर्प यह कहा जाता था कि गोलोस को मदद मिलती है और अब हमारे पास सबूत हैं।' उधर एक विशेषज्ञ मैक्सिम गोनचारोव ने कहा कि माइक्रो-ब्लागिंग वेबसाइट ट्विटर पर हमला रूसी प्रशासन की मिलीभगत से हुआ है। आखिर क्या वजह है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद कमजोर रूस को एक सशक्त रूस बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पुतिन के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं? सोवियत संघ के जमाने में जब रेडियो या टेलीविजन स्वान लेक (एक तरह का संगीत) के अलावा कुछ और नहीं चलाता था तो इसका मतलब यह समझा जाता था कि देश में कोई राजनीतिक संकट आने वाला है। इसकी तुलना आज के इस हालत से की जा सकती है कि यदि रूस में जब भी कोई इंटरनेट खोलता है तो वेब-ब्राउसर डियानल ऑफ सर्विस बतलाता है। यानि कहा जा सकता है कि एक बार फिर रूस में राजनीतिक संकट के संकेत मिल रहे हैं। हाल के प्रदर्शनों में 1000 से अधिक लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। मास्को समेत देश के 30 शहरों में विशाल प्रदर्शन पुतिन और मेदवेदेव के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए। पिछले 12 वर्षों में रूस में जब भी प्रदर्शन हुए उनमें लोग शामिल नहीं हुआ करते थे। लोग राजनीति को कम अहमियत देते थे। उनका एक मात्र मकसद अपनी जिन्दगी में स्थिरता लाना होता था। रूसी जनता सोवियत संघ के विघटन से पहले क्षेत्र को नियंत्रित करने वाली सरकार और नब्बे के दशक की कड़वी यादों को भुला देना चाहती है पर कटु सत्य तो यह है कि जब इस बार चुनाव हुए तो लोगों को लगा कि शासक वर्ग उनकी स्थिति का फायदा उठा रहा है। चुनावों में वाकई धांधली हुई है या यह अमेरिका का पुतिन के खिलाफ एक हथियार है, कहना मुश्किल है पर इतना तय है कि रूस में एक बार फिर अस्थिरता का दौर आरम्भ हो चुका है और हम उम्मीद करते हैं कि ब्लादीमिर पुतिन और मेदवेदेव इसको नियंत्रण में ला सकेंगे।
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Friday, 9 December 2011

रूस में ब्लादीमिर पुतिन का गिरता लोकप्रियता ग्रॉफ


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th December 2011
अनिल नरेन्द्र
मिखाइल गोर्बाच्योव की उदारवादी नीतियों व आर्थिक उदारीकरण के कारण और वर्षों से दबी राजनीतिक विरोध की चिंगारी की वजह से महान सोवियत संघ का विघटन हो गया और महान सोवियत एम्पायर 15 स्वतंत्र उपराज्यों में विखंडित हो गई। इन परिस्थितियों में 31 दिसम्बर 1999 को अचानक राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया जिससे ब्लादीमिर पुतिन देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति बन गए। फरवरी 2000 में लम्बी लड़ाई के बाद रूसी सेनाओं ने चेचन विद्रोहियों को परास्त करते हुए राजधानी ग्रोज्नी पर अधिकार कर लिया। पुतिन के इस कदम से उनकी लोकप्रियता में भारी इजाफा हुआ। 26 मार्च 2000 को पुतिन ने राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया। इसके पश्चात उन्होंने सत्ता का केंद्रीकरण शुरू किया और प्रांतीय गवर्नरों और व्यावसायिक घरानों की बढ़ती ताकत पर अंकुश लगाया। यद्यपि आर्थिक दृष्टिकोण से रूस ने पुतिन के काल में कोई विशेष तरक्की तो नहीं की परन्तु ब्लादीमिर पुतिन ने सोवियत विखंडन के बाद रूस को पहली बार राजनीतिक स्थिरता का माहौल जरूर प्रदान किया। इसी वजह से पुतिन मार्च 2004 में फिर रूस के राष्ट्रपति बने। गत सप्ताह रूस में संसदीय चुनाव हुए। इसमें प्रधानमंत्री ब्लादीमिर पुतिन की यूनाइटेड रशिया पार्टी को तगड़ा आघात लगा है। संसद के निचले सदन ड्यूमा में नवीनतम आंकड़ों के अनुसार उसे पूरे 50 प्रतिशत वोट भी नहीं मिले हैं। अलबत्ता 450 सदस्यीय सदन में उसे 238 सीटों का साधारण बहुमत तो जरूर प्राप्त हो गया है मगर पहले की तरह उतना बहुमत नहीं जिसके बल पर वे अपनी इच्छा से कोई संविधान में संशोधन कर सकें। चार साल पहले के 64 प्रतिशत वोट और 315 सीटों से अगर तुलना करें तो साफ है कि पुतिन और उनकी पार्टी की लोकप्रियता काफी घटी है। दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टी का वोट प्रतिशत 11 से बढ़कर 20 के लगभग पहुंच गया है। उस पर भी तुर्रा यह कि विरोधी पार्टियों और यूरोपीय चुनाव पर्यवेक्षकों ने चुनाव में हेराफेरी का आरोप लगाया है। ड्यूमा चुनावों में धांधलियों का आरोप लगाते हुए सोमवार को रूस की राजधानी मास्को में व्यापक स्तर पर धरने-प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारी देश में पिछले 12 वर्षों से चले आ रहे पुतिन एकछत्रवादी शासन का विरोध कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने पुतिन बगैर रूस और क्रांति की मांग सरीखे नारों से मास्को की पुरानी प्राचीरों को झकझोर कर रख दिया। ड्यूमा चुनावों में रूस की दूसरी सबसे बड़ी और मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (केपीआर) के महासचिव गेन्नादी किगानोव ने सोमवार को संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि उनकी पार्टी चुनाव में बड़े पैमाने पर हुई धांधलियों को लेकर चिंतित है और सभी आंकड़ों की जांच कर रही है। बदकिस्मती से अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भी चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठा दिए हैं, जिसे रूस के सबसे ताकतवर नेता ब्लादीमिर पुतिन शायद ही बर्दाश्त करें। इन चुनाव नतीजों का असर अगले साल मार्च में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों पर पड़ सकता है जिसमें पुतिन खड़ा होना चाहते हैं। पुतिन दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं रह सकते थे, अत उन्होंने 2008 में दमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बनवा दिया और खुद उनके प्रधानमंत्री बन गए। तब भी दुनिया जानती थी कि असली ताकत तो पुतिन के पास ही है। पिछले कुछ समय से पुतिन अमेरिका की लाइन पर नहीं चल रहे। हो सकता है कि इसी वजह से अमेरिका उन्हें पसंद नहीं कर रहा। हालांकि पुतिन का वह करिश्मा तो नहीं रहा जो पहले था पर आज भी वह अकेले नेता नजर आते हैं जो रूस की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ा सकते हैं। रूस को अमेरिका को जवाब देने के लिए पुतिन जैसा नेता ही चाहिए। देखना यह है कि इस संसदीय चुनाव के नतीजों से लेकर अगले राष्ट्रपति चुनाव तक ब्लादीमिर पुतिन कैसे अपनी गिरती लोकप्रियता को सम्भालते हैं और पुन राष्ट्रपति बनते हैं? रूस के हित में तो है कि रूस एक मजबूत देश बनकर फिर से दुनिया में अपनी जगह बनाए पर भारत व गैर पश्चिमांचली देशों के लिए भी एक मजबूत रूस फायदेमंद होगा और ऐसा करने के लिए फिलहाल पुतिन से बेहतर कोई और रूसी नेता नहीं दिख रहा। पुतिन को अपनी गलतियों पर आत्मचिन्तन करना चाहिए और उन्हें सुधारने का प्रयास करना होगा।
Anil Narendra, Daily Pratap, Russia, Valadimir Putin, Vir Arjun,