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Tuesday, 24 April 2012

सियाचिन पर जनरल कयानी के बयान की विश्वसनीयता?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान में सेना और जरदारी सरकार में मतभेद हैं इसका एक उदाहरण हमें पाक सेनाध्यक्ष अशफाक परवेज कयानी के ताजा सियाचिन संबंधी बयान से मिलता है। बहुत कम पब्लिक में बोलने वाले जनरल कयानी ने पिछले दिनों कहा कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को सियाचिन से अपनी सेना वापस बुला लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को सियाचिन के मुद्दे को बातचीत से सुलझाना चाहिए। ज्ञात हो कि सियाचिन में इस महीने की शुरुआत में हिमस्खलन में 125 पाक सैनिक सहित 139 लोग दब गए थे। जहां हमें इस बात का दुख है कि इतने पाक सैनिकों की मृत्यु हुई और हम उनके परिवारों के दुख में शरीक हैं वहीं हम यह भी कहना चाहेंगे कि हमें जनरल कयानी की बातों पर ज्यादा यकीन नहीं है। इधर जनरल कयानी का बयान आया तो उधर कुछ देर बाद ही पाक विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण दे दिया कि सियाचिन मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख में कोई तब्दीली नहीं हुई। इससे सवाल उठता है कि क्या जनरल कयानी के सियाचिन के उस जगह दौरे जहां बर्प में धंसने से पाक सैनिकों की मौत हुई थी वह इस अति दुर्गम स्थल पर मौत के तांडव के प्रति उनकी महज जज्बाती प्रतिक्रिया थी? क्या हम इसका यह मतलब भी निकाल सकते हैं कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की भारत के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशों को पाक सेना का समर्थन प्राप्त है? संयोग से पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी जरदारी की भारत यात्रा का समर्थन किया और सरकार से मांग की कि सियाचिन मुद्दे का हल ढूंढने के लिए वह अपनी ओर से पहल करें। मुश्किल यह है कि पाकिस्तान की कथनी और करनी में बहुत फर्प है। पाकिस्तान से मिलने वाले विरोधाभास संदेश अकसर दुविधा पैदा कर देते हैं। वैसे हाल में पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं। मसलन गृहमंत्री रहमान मलिक का भारत को आगाह करना कि तालिबानी आतंकवादी भारत में घुसपैठ कर सकते हैं और इसे रोकने के लिए पाकिस्तान भारत से पूरा सहयोग करने को तैयार है। लेकिन इन्हीं रहमान मलिक ने नवाज शरीफ के इस सुझाव की निन्दा कर दी कि पाकिस्तान को एकतरफा कदम उठाते हुए सियाचिन से अपनी फौज हटा लेनी चाहिए। ऐसे सन्दर्भों की वजह से हम जनरल कयानी की बातों को गम्भीरता से नहीं ले सकते। जो देश अपने अस्तित्व को भारत से दुश्मनी के सन्दर्भ में परिभाषित करता रहा हो और जहां विभाजन के अपूर्ण एजेंडे को पूरा करने की बातें खुलेआम कही जाती हों, वहां के सेनाध्यक्ष की ऐसी बातों पर सहज विश्वास न होना स्वाभाविक ही है। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान ने कम से कम तीन बार सियाचिन से भारत की फौजों को हटाने के लिए असफल सैन्य अभियान किए। यहां का मौसम इतना जानलेवा है कि युद्ध की बनिस्पत हिमस्खलन और शीत से ज्यादा लोग मरते हैं। दोनों ही देशों को यहां अपनी रक्षा सेनाओं पर जितना खर्च करना प़ड़ता है, उसकी तुलना में उन्हें कोई खास लाभ नहीं। भारत का कहना है कि हम अपनी सेनाओं की वापसी पर बातचीत कर सकते हैं पर इससे पहले दोनों भारत और पाक की फौजें इस समय कहां-कहां हैं, इसे अडेंटीफाई किया जाए और यह करने को पाक तैयार नहीं है।
Anil Narendra, Daily Pratap, General Kayani, Indo Pak War, Pakistan, Siachin, Vir Arjun

Thursday, 19 January 2012

जनरल वीके सिंह ने रचा एक नया इतिहास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th January  2012
अनिल नरेन्द्र
विडम्बना देखिए कि दोनों पड़ोसी देशों में थलसेनाध्यक्ष सुर्खियों में हैं। अगर भारत में सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह बनाम भारत सरकार लड़ाई खुलकर सामने आ गई है तो पड़ोसी पाकिस्तान में थलसेनाध्यक्ष जनरल अशफाक कयानी की प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी की सरकार के बीच सत्ता संघर्ष सुर्खियों में है। फर्प सिर्फ इतना है कि जनरल सिंह एक व्यक्तिगत मुद्दे पर सरकार से लड़ रहे हैं और जनरल कयानी सत्ता की लड़ाई लड़ रहे हैं। खैर! हम बात करते हैं अपने जनरल वीके सिंह की। जनरल सिंह ने अन्तत वह काम कर दिया है जो भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। वह भारत सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चले गए हैं। अपनी जन्मतिथि के दावे को खारिज किए जाने के रक्षा मंत्रालय के फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। देश के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी सेना प्रमुख ने सरकार के फैसले को अदालत में चुनौती दी है। रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में सेना प्रमुख की इस दलील को खारिज कर दिया था कि वे 1951 में पैदा हुए थे, 1950 में नहीं। समझा जाता है कि अपनी याचिका में जनरल सिंह ने कहा है कि उम्र विवाद उनके लिए कार्यकाल का नहीं बल्कि सम्मान और ईमानदारी का मामला है क्योंकि वे 13 लाख सैनिकों वाले बल का नेतृत्व करते हैं। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है इसलिए केस के तर्कों, तथ्यों पर विचार नहीं हो सकता पर मोटे तौर पर उलझन यह है कि सेना की फाइलों में जनरल सिंह की दो अलग-अलग जन्मतिथि दर्ज हैं। जहां उनके मैट्रिक के सर्टिफिकेट और अन्य दस्तावेजों में यह तारीख 10 मई 1951 है। रक्षा मंत्रालय ने उनकी सेवाओं के ज्यादातर मौकों पर इसे स्वीकार भी किया है। दूसरी ओर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के प्रवेश फार्म में उनकी जन्मतिथि 10 मई 1950 दर्शाई गई है। सेना की एक्यूटेंट ब्रांच के अनुसार सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह की जन्मतिथि 10 मई 1951 है जबकि सैन्य सचिव शाखा के अनुसार यह 10 मई 1950 है। इससे न केवल जनरल सिंह के कार्यकाल में एक साल का फर्प पड़ता है बल्कि उनके उत्तराधिकारी की लाइन में भी बड़ा परिवर्तन हो सकता है। यह बहुत दुर्भाग्य की बात है कि एक थलसेनाध्यक्ष को अपनी बात मनवाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने पड़े। यह इस यूपीए सरकार की मिसहैंडलिंग का एक और ज्वलंत उदाहरण हैं। सरकार को मामला यहां तक पहुंचने ही नहीं देना चाहिए था। जनरल सिंह के सुप्रीम कोर्ट जाने से न केवल यह स्पष्ट हो गया कि सरकार सहज समाधान खोजने में नाकाम रही बल्कि यह भी साफ हो गया कि अपने स्वाभाव के अनुरूप उसने एक और विवादास्पद मामले को लटकाए रखा। सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस विवाद का निपटारा चाहे जैसा हो, हर कोई यह महसूस करेगा कि शीर्ष स्तर के सैन्य अधिकारी की उम्र को लेकर एक तो कोई विवाद उपजना नहीं चाहिए था और यदि वह उपजा तो उसका समाधान सद्भावनापूर्ण तरीके से होना चाहिए था। वहीं जनरल वीके सिंह के सुप्रीम कोर्ट जाने पर इस तर्प को महत्ता देना कठिन है कि आम भारतीय नागरिक की तरह वह भी अदालत जा सकते हैं, क्योंकि यह मामला थलसेनाध्यक्ष द्वारा सरकार को सुप्रीम कोर्ट में खींचने का बन गया है। यह शोभनीय प्रसंग नहीं कि जन्मतिथि को लेकर ही सही, थलसेनाध्यक्ष और सरकार सुप्रीम कोर्ट मेंआमने-सामने होंगे। भले ही यह रेखांकित करने की कोशिश की जाए कि जनरल सिंह आम नागरिक की हैसियत से अदालत गए हैं, लेकिन इस तथ्य की अनदेखी नहीं हो सकती कि वह 13 लाख सैन्यकर्मियों का नेतृत्व कर रहे भारतीय थलसेना के सर्वोच्च अधिकारी हैं। जहां इस प्रकरण से सेना, सरकार दोनों की छवि और मनोबल पर असर पड़ेगा वहीं राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस को इसके दुप्रभाव से बचने का प्रयास अब करना होगा। सरकार की गलती का कहीं कांग्रेस पार्टी को सियासी नुकसान न हो जाए। पांच राज्यों के चुनाव सिर पर हैं और पंजाब, उत्तराखंड जैसे राज्यों में जहां से बहुत सैनिक आते हैं और जहां बहुत रिटायर्ड सैनिक हैं पर इसका क्या असर पड़ता है यह कांग्रेस रणनीतिकारों के लिए चिन्ता का सबब बन सकता है। इस घटना से चुनाव के जातीय समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Geelani, General Kayani, General V.k. Singh, Indian Army, Vir Arjun

Monday, 16 January 2012

Pak Civilian Government and Military and Judiciary and Imran Khan on collision path

- Anil Narendra
Last fortnight, I had written two articles on Pakistan in this column. In the first article, I had concluded that with the return of Zardari from Dubai, the situation in Pakistan could turn explosive. The article was written, when Asif Ali Zardari had suddenly fled to Dubai. My second article, titled 'Pakistan on cross road' came on 4th January. Both of my predictions are coming true. The political scenario in Pakistan is fast changing and it is difficult to understand the secret political games being played there. But, certain things are quite clear. Pakistan Army and ISI are not prepared to tolerate Zardari and Gilani. Zardari and Gilani are confronting Kayani and Pasha. Both are abusing each other and trading allegations. Tahrik-e-Insaf Party Chief and former cricketer, Imran Khan is at the centre. Imran's popularity graph is fast rising. It appears that he has the support of Army and the ISI. Army would like Imran to take reigns of power in the country in his hands. Then, the judiciary has also emerged as an important factor. Chief Justice Iftikhar Chowdhary appears to be playing in the hands of the Army. It was on the behest of the Army that the Chief Justice had played important role in the removal of General Parvez Musharraf. With the support of the Army, the Judiciary got Musharraf implicated in a number of cases in such a manner that he had no option but to flee Pakistan. Remaining behind curtains, the Army was able to achieve its objective. Now, same situations are being created for Asif Ali Zardari. It may be recalled that two days' before the memo gate episode, the Judiciary had gone to the extent of saying that Prime Minister Gilani was not an honest man, which led to confrontation between the Government and the Judiciary. The Supreme Court has proved a thorn in the flesh for Zardari. The Supreme Court has made it clear to Gilani that this was the last opportunity for the Government to re-open the corruption cases against Zardari. The Supreme Court had warned the Prime Minister and the President on Tuesday that in case they fail to end 'high profile corruption', they may have to face action against them. The signals were quite clear. If Zardari remains in Pakistan, he could be sent to jail. Now let us talk about US. Relations between the US and the Pakistan have gone sour. The bitterness which set in, in their relations soon after the Osama raid, has further increased. We feel that US will not like Army rule in Pakistan. It is not in favour of Army rule in Pakistan, but it is also not happy with Zardari. General elections are still quite far. America is in a fix and unable to decide its course of action. General Parvez Musharraf is also planning to return from London this month. He has been warned, in case he returns to Pakistan, he would be put behind the bars. But Musharraf has reiterated his resolve to return home. A section of Pak Army wants that reigns of Army be handed over to Musharraf once again. In the last, comes the Pakistani awam. Unfortunately, in this political game, the awam appear to be ignored, whereas the expectations of Pak awamt are the most important factor. But, it is certain that the awam is very much disillusioned with the Zardari-Gilani Government. The corruption has reached to such an extent that Mr ten percent has graduated to Mr cent percent. Awam says that the Government has looted the country and bleeded the treasury. The situation in Pakistan has reached to an explosive level. It is fast heading towards a failed state, but a stable Pakistan is not only is in awam's favour, but for whole of the world including India. We hope that soon Pakistan would return to stability and the awam of Pakistan would win in the end.

Saturday, 14 January 2012

पाक सरकार बनाम सेना बनाम ज्यूडिश्यरी बनाम इमरान में भयंकर लड़ाई जारी है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th January  2012
अनिल नरेन्द्र
पिछले एक पखवाड़े में मैंने इसी कॉलम में पाकिस्तान को लेकर दो लेख लिखे थे। पहला था कि अगर जरदारी दुबई से वापस पाकिस्तान लौटे तो एक निहायत खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है। यह लेख तब लिखा था जब आसिफ अली जरदारी अचानक दुबई भाग गए थे। दूसरा लेख तो 4 जनवरी को लिखा था उसका शीर्षक था चौराहे पर खड़ा पाकिस्तान। मेरी दोनों बातें सत्य साबित हो रही हैं। पाकिस्तान में सियासी माहौल इतनी तेजी से बदल रहा है कि समझ नहीं आ रहा कि दरअसल अन्दर ही अन्दर खेल क्या हो रहा है? कुछ बातें तय हैं। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई अब आसिफ जरदारी और यूसुफ रजा गिलानी को अब एक मिनट भी बर्दाश्त नहीं करना चाहती। जरदारी और गिलानी एक तरफ तो कयानी और पाशा एक तरफ। दोनों ही एक-दूसरे को गाली दे रहे हैं, आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। बीच में खड़े हैं तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के मुखिया व पूर्व क्रिकेटर इमरान खान। इमरान खान की लोकप्रियता का ग्रॉफ तेजी से बढ़ रहा है। हमें लगता है कि उन्हें आर्मी और आईएसआई का भी समर्थन अन्दर खाते मिल रहा है। आर्मी चाहेगी कि इमरान खान के हाथों पाकिस्तान की सत्ता सौंपी जाए। एक बहुत बड़ा फैक्टर पाकिस्तान की न्यायपालिका है। चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी लगता है कि आर्मी के हाथों खेल रहे हैं। जनरल परवेज मुशर्रफ को हटाने में भी जस्टिस चौधरी ने सेना के कहने पर उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। सेना ने पाकिस्तानी ज्यूडिश्यरी के माध्यम से मुशर्रफ को केसों में ऐसा फंसाया कि वह भागने पर मजबूर हो गए। सेना सामने भी नहीं आई और उसका काम हो गया। अब भी आसिफ जरदारी को उसी चक्रव्यू में फांसा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि मेमो गेट प्रकरण में दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री गिलानी के बारे में यहां तक कह दिया था कि वह कोई ईमानदार व्यक्ति नहीं हैं। इससे सरकार और ज्यूडिश्यरी आमने-सामने आ गए। जरदारी के लिए सुप्रीम कोर्ट एक बड़ी सिरदर्द बन गई है। सुप्रीम कोर्ट ने गिलानी से साफ कह दिया है कि आसिफ जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले फिर से खोलने का आखिरी मौका है। मंगलवार को पाक सुप्रीम कोर्ट ने पीएम और राष्ट्रपति को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर `हाई प्रोफाइल करप्शन' रोकने में वह नाकाम रहे तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। इशारा साफ था। जरदारी अगर पाकिस्तान में डटे रहे तो वह जेल तक जा सकते हैं। अब बात करते हैं अमेरिका की। अमेरिका और पाकिस्तान के बीच रिश्ते निहायत खराब हो गए हैं। ओसामा रेड के बाद से ही आपसी तल्खी शुरू हुई जो बढ़ती ही गई। हमें लगता है कि अमेरिका पाकिस्तान में सेना का शासन अब बर्दाश्त नहीं करेगी। वह सैनिक शासन नहीं चाहता पर वह जरदारी से भी खुश नहीं है। चुनावों में अभी देरी है। इसलिए उसे भी समझ नहीं आ रहा कि वह क्या करे। जनरल परवेज मुशर्रफ भी इसी महीने लंदन से लौटने की बात कर रहे हैं। उन्हें चेतावनी दी गई है कि अगर वह पाकिस्तान लौटेंगे तो उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाएगा। मुशर्रफ ने कहा कि वह पाकिस्तान हर हालत में लौटेंगे। पाक सेना का एक वर्ग यह भी चाहता है कि सेना की कमान एक बार फिर मुशर्रफ को सौंप दी जाए। अन्त में है पाकिस्तानी आवाम। बदकिस्मती से शतरंज के इस सियासी खेल में वह कहीं भी शामिल नहीं है जबकि सबसे महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तानी आवाम क्या चाहती है होना चाहिए। इतना तय है कि वह आसिफ जरदारी-गिलानी सरकार से बेहद परेशान है। भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है कि मिस्टर टेन पर्सेंट अब मिस्टर सेंट पर्सेंट बन चुके हैं। आवाम का कहना है कि सरकार ने देश को लूट लिया है और सरकारी खजाना खाली हो गया है। कुल मिलाकर पाकिस्तान की स्थिति विस्फोटक है। वह बड़ी तेजी से एक फेल स्टेट की ओर बढ़ रहा है और एक स्थिर पाकिस्तान न केवल पाकिस्तानी आवाम के हक में है बल्कि भारत सहित शेष दुनिया के लिए भी। हम उम्मीद करते हैं कि पाकिस्तान जल्द स्थिरता की ओर लौटेगा और अंतिम विजय पाकिस्तानी आवाम की ही होगी।
Anil Narendra, Asif Ali Zardari, Daily Pratap, Geelani, General Kayani, Imran Khan, Pakistan, Vir Arjun

Saturday, 7 January 2012

Pakistan on Dangerous Cross Roads

- Anil Narendra
The year 2012 might prove very crucial for Pakistan. Pakistan is struggling on a number of fronts simultaneously. On political front, President Asif Ali Zardari and Tehrik-e-Insaf are at logger heads. Popularity graph of Imran is shooting upwards. The second front is open between Army Chief General Ashfaq Parvez Kayani and Pakistan's intelligence agency, ISI Chief General Shuja Ahmed Pasha. That is why, General Kayani has negated the possibility of military rule in Pakistan, but in view of widening distance and mistrust between these two, it is difficult to say anything. Meanwhile, the Pakistan Parliamentary Committee has started investigating the memogate issue. The Pakistan Parliamentary Committee, entrusted with the investigation of the confidential letter (memogate) sent, has decided to issue summons to the-then Pakistan Ambassador to US, Hussain Haqqani, the US national of Pakistan origin, businessman Mansoor Eijaz and ISI Chief General Shuja Pasha. All these three could be asked to be present in person at the next meeting of the Parliamentary Committee, scheduled to be held on 10th January 2012. In the wake of the killing of Osama bin Laden in Pakistan in a US attack on 2nd May last year, it appears that Pakistan politics has entered a stormy phase. After this action in the internal politics of Pakistan, apprehending a military coup, President Asif Ali Zardari had written a letter to the US Administration seeking help. There is no indication of an early end to this storm in the Pak politics. Meanwhile, the Supreme Court of Pakistan has rejected Government's plea to handover the investigation of memogate episode to a Parliamentary Committee. Instead, the Supreme Court has constituted a three-member Committee to investigate the matter and submit its report within four weeks. All the three members of the Committee are Chief Justices of Islamabad, Baluchistan and Sindh High Courts. The Party in power, PPP is not happy with this decision of the Supreme Court and the Government will be requesting the Court to reconsider its decision, but the most serious matter is the deteriorating relations between Pakistan and US. In its report on Monday, the New York Times said, "America is now realizing the truth that the extensive security partnership with Pakistan has come to an end. Under such circumstances, US officials are, in a very limited sense, trying to save the anti-terror alliance. They are, however, aware that it would make the US capability to attack terrorists very complicated and supply in Afghanistan would be badly affected. A US Think Tank has crossed all the limits. This influential US Think Tank has said that the probable threats, US would be facing in 2012 include war with Pakistan. On the basis of interaction with the US officials and experts, The Council on Foreign Relations Centre for Preventive Action in America has prepared a list of probable threats, which US is likely to face during 2012. With reference to attack or anti-terror operations, Pakistan is quite up in this list. This list of America has been released at a time, when Pak Prime Minister Yousuf Raza Gillani has openly challenged US and NATO. After a meeting with the Army Chief Ashfaq Parvez Kayani, Gillani has warned US and NATO that Pakistan Army is completely prepared to deal with any threat, as such Pakistan will retaliate with its full strength to any attempt to violate its sovereignty. At present, Pakistan has stopped NATO supplies and any future decision in this regard is to be taken by the Cabinet. All told, it can be said that Pakistan is standing at dangerous cross roads. We hope that politicians in Pakistan would succeed in tackling these serious challenges and all these apprehensions would prove wrong.

Wednesday, 4 January 2012

निहायत खतरनाक चौराहे पर खड़ा पाकिस्तान

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th January  2012
अनिल नरेन्द्र
2012 का साल पाकिस्तान के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। पाकिस्तान एक साथ कई मोर्चों पर जद्दोजहद कर रहा है। सियासी मोर्चे पर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी बनाम इमरान की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की खुली जंग छिड़ गई है। इमरान की लोकप्रियता का ग्रॉफ लगातार बढ़ रहा है। दूसरा मोर्चा पाक सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी और पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई प्रमुख शुजा अहमद पाशा के बीच खुला हुआ है। हालांकि जनरल कयानी ने कहा है कि पाकिस्तान में सैनिक शासन की सम्भावना नहीं है पर जिस तरीके से दोनों पक्षों के बीच फासला और अविश्वास बढ़ रहा है कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उधर पाकिस्तानी संसदीय समिति ने मेमोगेट की जांच जोरों से शुरू कर दी है। अमेरिकी सरकार को भेजे गोपनीय पत्र (मेमोगेट) मामले की जांच कर रही पाकिस्तानी संसदीय समिति ने तत्कालीन राजदूत हुसैन हक्कानी, पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी व्यापारी मंसूर एजाज और आईएसआई प्रमुख जनरल शुजा पाशा को समन भेजने का फैसला किया है। आगामी 10 जनवरी को समिति की अगली बैठक में इन तीनों को व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होना पड़ सकता है। गत दो मई को अमेरिकी कार्रवाई के बाद ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान की सियासत में मानों भूचाल-सा आ गया। अंदरूनी सियासत में इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट की आशंका को लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने ओबामा प्रशासन को मदद के लिए पत्र लिखा था। इस रहस्योद्घाटन के बाद पाकिस्तान की राजनीति में ऐसा भूचाल आया कि थमने का नाम नहीं ले रहा। उधर पाक सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मेमोगेट कांड की जांच के लिए संसदीय समिति से जांच कराने की सरकार की मांग ठुकरा दी है। अदालत ने इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया है और चार हफ्तों में अपनी जांच पूरी करने को कहा है। तीनों सदस्य इस्लामाबाद, बलूचिस्तान और सिंध उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश हैं। सत्तारूढ़ पीपीपी इस आदेश से खुश नहीं और सरकार सुप्रीम कोर्ट से अपने आदेश की समीक्षा करने का अनुरोध करेगी पर सबसे गम्भीर मामला है पाकिस्तान और अमेरिका के बिगड़ते रिश्ते। न्यूयार्प टाइम्स ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट में कहा हैöअमेरिका अब इस सच्चाई का सामना कर रहा है कि उसकी पाकिस्तान के साथ व्यापक सुरक्षा भागीदारी का समय समाप्त हो चुका है। ऐसे में अमेरिकी अधिकारी एक बेहद सीमित मात्रा में आतंकवाद विरोधी गठबंधन को बचाने के प्रयासों में जुटे हैं। हालांकि उन्हें यह अहसास भी है कि इससे आतंकवादियों के खिलाफ हमले करने की उनकी (अमेरिकी) क्षमता पेचीदा हो जाएगी और अफगानिस्तान में आपूर्ति भी प्रभावित होगी। अमेरिका के एक थिंक टैंक ने तो सारी हदें पार कर दी हैं। अमेरिका में एक असरदार थिंक टैंक ने कहा है कि साल 2012 में अमेरिका जिन सम्भावित खतरों से सबसे ज्यादा जूझ रहा है, उनमें पाकिस्तान के साथ संघर्ष भी शामिल है। अमेरिका में द काउंसिल ऑन फोरेन रिलेशंस सेंटर फॉर प्रिवेंटिव एक्शन ने अमेरिकी अधिकारियों और विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर उन सम्भावित खतरों की सूची तैयार की है, जिनसे नए साल में अमेरिका को जूझना पड़ेगा। किसी हमले या आतंकवाद विरोधी अभियान के चलते पाकिस्तान से लड़ाई इस सूची में काफी ऊपर है। अमेरिका की यह सूची उस समय सार्वजनिक हुई है, जब पाकिस्तान में प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने अमेरिका और नाटो को खुली चेतावनी दी है। सेना प्रमुख अशफाक परवेज कयानी से मुलाकात के बाद गिलानी ने अमेरिका और नाटो देशों को चेताया कि वह भविष्य में अपनी सप्रभुता पर किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब देंगे, क्योंकि उनकी सेना का कहना है कि वह किसी भी खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। पाकिस्तान ने मौजूदा हालात में नाटो की सप्लाई रोक दी है और भविष्य में इस पर कोई भी फैसला कैबिनेट ही लेगी। कुल मिलाकर पाकिस्तान एक निहायत खतरनाक चौराहे पर खड़ा हुआ है। हम उम्मीद करते हैं कि पाकिस्तान के सियासतदान इन गम्भीर चुनौतियों से निपटने में कामयाब रहेंगे और सारी आशंकाएं गलत साबित होंगी।
America, Anil Narendra, Asif Ali Zardari, Daily Pratap, General Kayani, Haqqani Network, ISI, Osama Bin Ladin, Pakistan, USA, Vir Arjun

Wednesday, 28 December 2011

क्या पाकिस्तान में आया सियासी भूचाल थमेगा?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th December 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान की सियासत एक निहायत खतरनाक दौर से गुजर रही है। लड़ाई अब जरदारी, गिलानी की चुनी हुई सरकार बनाम एक तरफ जनरल कयानी, अहमद शुजा पाशा तो दूसरी तरफ इंसाफ पार्टी के इमरान खान के बीच छिड़ गई है। पहले हम बात करते हैं जरदारी बनाम कयानी जंग की। पाक पधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने मुल्क की सेना को दो टूक चेतावनी दी है कि सेना खुद को मुल्क में सत्ता का दूसरा केन्द्र नहीं माने। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार के खिलाफ तख्ता पलट की साजिशें रची जा रही हैं। गिलानी ने बृहस्पतिवार को मुल्क में ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी का पता लगाने के लिए रही नाकामी के लिए भी सेना को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि 2008 में मुंबई हमलों के बाद हमारी सरकार अन्य संस्थाओं के साथ खड़ी रही थी। उनका इशारा सेना और आईएसआई की तरफ था। खबर यह है कि पाकिस्तान सरकार ताकतवर सेना पमुख जनरल अशफाक कयानी और आईएसआई पमुख लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शुजा पाशा को हटाने पर भी अब गम्भीरता से विचार कर रही है। समाचार पत्र `द न्यूज' ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि सरकार कयानी तथा पाशा से नाखुश है और यह अब एक खुला राज है। कयानी को तीन साल का सेवा विस्तार दिया गया है। पाशा का कार्यकाल पिछले वर्ष एक साल के लिए बढ़ाया गया था। गिलानी ने यह भी माना कि कोई भी संस्थान देश की व्यवस्था के भीतर किसी दूसरी व्यवस्था की तरह नहीं हो सकता। इस देश का हर संस्थान पधानमंत्री के नीचे आता है। ऐसा दावा कोई नहीं कर सकता कि वह सरकार के नियंत्रण से बाहर है। हम निर्वाचित और पाकिस्तान की जनता के चुने हुए पतिनिधि हैं। गिलानी का साफ इशारा पाक सेना व आईएसआई की ओर था। उधर सियासी पंट पर पाकिस्तान के पूर्व किकेट खिलाड़ी और तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के पमुख इमरान खान ने लाहौर, कसूर और पाकिस्तान के अन्य शहरों के बाद अब कराची में अपना शक्ति पदर्शन किया है। इमरान ने पाक संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की समाधि के पास एक जलसे में एक बार फिर सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पमुख विपक्षी दल मुस्लिम लीग नवाज की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि अगले आम चुनाव में किसी उम्मीदवार को उस समय तक उनकी पार्टी का टिकट नहीं मिलेगा जब तक वह अपनी सम्पत्ति की घोषणा नहीं करता। उन्होंने संकल्प लिया कि वह पाकिस्तान को कल्याणकारी इस्लामी राज्य बनाएंगे, उनकी टीम में किसी सिफारिशी को जगह नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार की नीतियां 90 फीसदी जनता के लिए होंगी जिसके तहत स्वास्थ्य, शिक्षा और न्याय मुफ्त मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि जरदारी अब ज्यादा दिनों के मेहमान नहीं हैं। नवाज शरीफ को ललकारते हुए इमरान ने कहा कि वह मेरे साथ मैच खेलना चाहते हैं तो जल्दी करें, ऐसा न हो कि उन्हें कोई टीम भी न मिले। उनके मुताबिक वे आसिफ अली जरदारी के साथ भी मैच खेलना चाहते थे लेकिन वे अब बूढ़े हो गए हैं। इमरान को जैसा जन समर्थन मिल रहा है उससे कहा जा सकता है कि भविष्य में वह एक बड़े सियासी खिलाड़ी बन सकते हैं। दूसरी ओर पाक सेना अध्यक्ष कयानी ने पहली बार गुप्त ज्ञापन (मेमोगेट) दस्तावेज के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए उसे सेना के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ षड्यंत्र करार देकर इस पूरे मामले की गहन जांच की मांग की है। मीडिया में पकाशित खबरों में कहा गया है कि कयानी ने यह टिप्पणी सुपीम कोर्ट में दायर अपने जवाब में की है। आईएसआई पमुख ले. जनरल अहमद शुजा पाशा ने अलग से दिए गए जवाब में कहा कि वह गुप्त ज्ञापन के बारे में मंसूर एजाज की ओर से दिए गए सबूतों से संतुष्ट हैं। कयानी ने कहा कि उस गुप्त ज्ञापन की सच्चाई सामने आनी ही चाहिए जो कि अमेरिकी सेना को भेजा गया था। जियो न्यूज चैनल ने कयानी के हवाले से कहा कि उस पूरे मामले ने पाक की राष्ट्रीय सुरक्षा को पभावित किया। गुप्त ज्ञापन का मकसद उन सैनिकों के हौसले व मनोबल को पभावित करना था जो लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बलिदान कर रहे हैं। पाकिस्तानी सियासत में आया भूचाल अब थमने वाला नहीं लगता। सियासत के जरिए से आसिफ जरदारी-गिलानी की सरकार बहुत कमजोर विकेट पर है। उसे एक तरफ इमरान से खतरा है तो दूसरी तरफ नवाज व अन्यों से। कट्टरपंथी पार्टियां भी उसके अमेरिकी पेम से नाराज हैं। दूसरी ओर जनरल कयानी और जनरल पाशा हर हालत में जरदारी को हटाने पर तुले हैं, हालांकि कयानी यह भी कह रहे हैं कि उनका तख्ता पलट का कोई इरादा नहीं। इसका मतलब साफ है कि वह पाकिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था तो बरकरार रखना चाहते हैं पर जरदारी को हटाने पर तुले हैं।
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Tuesday, 20 September 2011

सलीम शहजाद की हत्या जनरल कयानी के इशारे पर हुई



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th September 2011
अनिल नरेन्द्र

अमेरिका की प्रमुख खोजी पत्रिका `न्यू यार्पर' ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी के इशारे पर ही वहां के खोजी पत्रकार सलीम शहजाद की हत्या की गई थी। पत्रिका के नवीन अंक में शहजाद की मौत के बारे में प्रकाशित आलेख में कहा गया है कि जनरल कयानी के स्टाफ के एक बड़े अधिकारी ने अपने आका के इशारे पर इस खोजी पत्रकार की हत्या का आदेश दिया। पत्रिका ने अमेरिका के खुफिया सूत्रों के हवाले से कहा कि पाक सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई शहजाद की रिपोर्टों से खफा थी। पत्रिका के अनुसार सेना और आईएसआई का गुस्सा उस समय सातवें आसमान पर चढ़ गया जब शहजाद ने `एशिया टाइम्स' में अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया कि कराची के मेहरान नौसैनिक अड्डे पर गत 22 मई को आतंकवादी हमला नौसेना और अलकायदा के बीच साठगांठ के कारण हुआ। इस हमले में सेना के अत्याधुनिक टोही विमान नष्ट कर दिए गए थे। `न्यू यार्पर' के अनुसार सुरक्षा बलों ने शहजाद का 29 मई को अपहरण किया। शुरुआत में अपहरणकर्ताओं को इस पत्रकार को सबक सिखाने का निर्देश दिया। लेकिन बाद में किसी समय ऊपर से आदेश आया कि शहजाद को मौत के घाट उतार दिया जाए। शहजाद का शव पंजाब सूबे में एक नहर के किनारे पड़ा मिला जिस पर गम्भीर यातनाओं के निशान थे। पत्रिका में यह भी कयास लगाया है कि पाक सेना को यह संदेह था कि शहजाद खोजी पत्रिकारिता के सिलसिले में ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एमआई सिक्स और भारत की खुफिया एजेंसी रॉ से भी सम्पर्प में था।
पोलिटजर विजेता पत्रकार डेक्सटर फिलविन्स ने अपने लेख में कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए लिखा है कि इलियास कश्मीरी की हत्या शहजाद की हत्या के बाद हुई थी। इसमें आशंका जताई गई है कि आईएसआई  ने शहजाद का टार्चर किया और इलियास का अता-पता बतलाने पर मजबूर किया। शहजाद से मिली जानकारी उसने अमेरिका को दे दी। इस्लामाबाद के इंस्पैक्टर जनरल पुलिस ने रहस्योद्घाटन किया कि शहजाद के फोन से पता चला कि उसने एक महीने के वक्फे में इलियास कश्मीरी से 258 बार बात की थी। लेख में बताया गया है कि शहजाद आईएसआई के राडार पर महीनों से था। आईएसआई ने उस पर इस बात का दबाव भी बनाया था कि वह उनका सम्पर्प तालिबान नेताओं से स्थगित करवाए। शहजाद ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया था। लेख में आगे बताया गया कि पिछले साल शहजाद नई दिल्ली में एक कांफ्रेंस अटैंड करने आया था उस समय भारतीय खुफिया एजेंसी ने उसे रॉ में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था पर शहजाद इसके लिए तैयार नहीं हुआ था। इस किस्से से पता चलता है कि आज की तारीख में पाकिस्तानी पत्रकार कितने खौफनाक माहौल में अपना काम कर रहे हैं।
Anil Narendra, Daily Pratap, General Kayani, ISI, Journalist Killed in Pakistan, Pakistan, Vir Arjun

Wednesday, 4 May 2011

दुनिया का सबसे मोस्ट वांटेड ओसामा बिन लादेन मारा गया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 04 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
पूरी दुनिया को इस्लाम के रंग में रंगने का खूंरेजी ख्वाब देखने वाले और अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का पर्याय बन चुके मोस्ट वांटेड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने मौत के घाट उतारकर अमेरिका ने यह साबित कर दिया कि वह अपने इरादों के प्रति अटल है और अपने शत्रुओं का सफाया करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। रविवार की देर रात अमेरिकी सैनिकों ने एक अत्यंत गोपनीय ऑपरेशन में उसे एक ऐसी इमारत के अन्दर मार गिराया जो पाकिस्तान की मिलिट्री अकादमी से कुछ ही दूर स्थित है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 60 किलोमीटर दूर एबटाबाद शहर में स्थानीय समयानुसार रात डेढ़ बजे अमेरिकी सेना के विशेष बल को लेकर चार हेलीकॉप्टर उस इमारत के कम्पाउंड में उतरे जहां ओसामा के छिपे होने की सूचना थी। सोमवार को टीवी पर जो फुटेज दिखाए गए, उनमें खेतों के बीच एक कम्पाउंड दिख रहा था, जो 12 फीट ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था। किलेनुमा इस इमारत के परिसर में हेलीकॉप्टरों के उतरने के बाद उन पर ओसामा के गार्डों ने फायरिंग की। अमेरिकी सैनिकों की जवाबी कार्रवाई में 54 वर्षीय ओसामा की मौत हो गई। उसके बेटे और एक महिला के मारे जाने की भी खबर है। इस अभियान में एक हेलीकॉप्टर को क्षति पहुंची। मालूम हो कि अमेरिका ने ओसामा पर ढाई करोड़ डालर (लगभग 111 करोड़ रुपये) का इनाम घोषित किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने राष्ट्र के नाम संबोधन में ओसामा के मारे जाने की पुष्टि की। लादेन के मारे जाने के  बाद उसकी दो पत्नियों तथा चार बच्चों को हिरासत में ले लिया गया है। अमेरिका का कहना है कि इस्लामी रीति-रिवाज के साथ ओसामा बिन लादेन के शव को समुद्र में दफन किया गया है। समझा जाता है कि उसके अपने देश सऊदी अरब द्वारा शव लेने से इंकार करने पर ऐसा किया गया। हालांकि उसे समुद्र में दफनाने पर इस्लामी विद्वानों ने सवाल उठाए हैं। उसे समुद्र में दफनाने के पीछे अमेरिका की मंशा उसकी कब्रगाह को आस्था का केंद्र बनने से रोकने की रही है। लादेन की पहचान की पुष्टि के लिए अमेरिका ने उसके शव का डीएनए परीक्षण कराया है। यह डीएनए टेस्ट लादेन की बहन के डीएनए से मिलने से किया गया, जिसमें शव लादेन का होने की 99.9 फीसदी पुष्टि हो गई है। बहन का डीएनए सैम्पल 9/11 के हमलों के बाद लिया गया था। लादेन के बारे में किसी भी तरह का शक दूर करने के लिए चेहरे का मिलान करने वाली अत्याधुनिक फेशियल रिकाग्निशन तकनीक का भी सहारा लिया गया। सन 2001 में 9/11 के हमले के बाद अमेरिका लगभग दस साल से अलकायदा सरगना को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने की कोशिश में था। जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लादेन के मारे जाने की खबर की पुष्टि की तो सारे अमेरिका में जश्न का माहौल बन गया। रात के अंधेरे होने के बावजूद व्हाइट हाउस के बाहर खुशी से झूमती भीड़ एकत्र हो गई।
हालांकि अमेरिका ने लादेन ऑपरेशन को काफी खुफिया रखा और आईएसआई और अलकायदा को इसकी हवा नहीं लगने दी पर इस कार्रवाई से कुछ ही दिन पहले अलकायदा की धमकी का महत्व बढ़ जाता है। क्या यह सम्भव है कि ओसामा के सम्भावित अमेरिकी कार्रवाई का आभास हो गया था? इस कार्रवाई के कुछ ही दिन पहले चर्चित विकीलीक्स की ओर से जारी गोपनीय दस्तावेज में कहा गया, अलकायदा के एक वरिष्ठ स्वयंभू कमांडर ने दावा किया है कि उसके संगठन ने यूरोप में एक परमाणु बम छिपा रखा है। अगर लादेन को पकड़ा गया या मारा गया तो वह इसमें विस्फोट कर देंगे? गुआतांनामो कारागार में 780 पकड़े गए लोगों की पृष्ठभूमि और पूछताछ के दौरान उनकी ओर से दिए बयान के आधार पर यह गोपनीय दस्तावेज तैयार किए गए हैं। ओसामा के मारे जाने से दुनिया में हो रही आतंकवादी गतिविधियों पर शायद ही कोई लम्बा-चौड़ा असर पड़े। क्योंकि आज सारी दुनिया में इतने अलकायदा टाइप के सेल स्थापित हो चुके हैं जो स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं कि इनकी गतिविधियों पर कोई असर न पड़े। फिर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पिछले एक दशक में अलकायदा ने विचारधारा का रूप ले लिया है। आतंकवाद को खाद-पानी देने वाली इस विचारधारा  का अन्त नहीं दिखता। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि अलकायदा ने अमेरिका के नेतृत्व में छेड़े गए आतंकवाद विरोधी अभियान को इस्लाम पर हमले का रूप दे दिया है।
अमेरिकी विशेष बल के हाथों इस्लामाबाद के करीब एबटाबाद में एक शानदार बंगले में ओसामा की मौत और इससे पहले अनेक अलकायदा नेताओं की पाकिस्तानी शहरों में हुई गिरफ्तारी से यह स्पष्ट हो जाता है कि आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाह अफगान-पाक सीमा या भारत सीमा पर नहीं बल्कि पाकिस्तान के बीचोबीच है। इससे एक और मूलभूत सच्चाई रेखांकित होती है कि पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व समाप्त किए बिना तथा वहां कट्टरपंथ को समाप्त किए बगैर अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ जंग नहीं जीती  जा सकती। 9/11 हमले के बाद पाकिस्तान से पकड़े गए अन्य आतंकवादी नेताओं में अलकायदा के तीसरे नम्बर का नेता शालिद शेक मुहम्मद, नेटवर्प व्यवस्था का प्रमुख अबु जुबैदिया, आसुर जजीरी शामिल है। इन तमाम गिरफ्तारियों में एक समान कड़ी यह है कि ये सब पाकिस्तानी शहरों में पकड़े गए हैं। इस आलोक में यह हैरानी की बात नहीं है कि बिन लादेन कबाइली इलाकों के बजाय पाकिस्तान की राजधानी के निकट शहर में मारा गया। अगर हैरानी है तो इस बात की कि लादेन इस्लामाबाद के बगल में एबटाबाद में रह रहा था। यहां पाकिस्तानी सेना का बड़ा आधार शिविर, सैन्य अकादमी, सैन्य अस्पताल और अनेक वरिष्ठ सैन्य व खुफिया अधिकारी व पूर्व अधिकारियों के आवास हैं। अमेरिका को लादेन को पकड़ने में दस साल इसलिए भी लगे, क्योंकि लादेन को पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठान के कुछ तत्वों का संरक्षण प्राप्त था। याद रहे कि ओसामा डायलासिस पर था और डायलसिस हर स्थान पर नहीं हो सकता। कटु सत्य तो यह है कि अमेरिका बेशक जितना प्रयास करे जब तक पाकिस्तानी सेना और आईएसआई नहीं सुधरती तब तक न तो आतंकवाद ही खत्म होगा और न ही पाकिस्तान का राष्ट्र निर्माण सम्भव है। बहरहाल अमेरिका को यह खुशी व संतोष जरूर होगा कि उसने 9/11 का बदला ले लिया है।

Tuesday, 19 April 2011

जनरल कयानी का अमेरिका को अल्टीमेटम

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 19 अप्रैल 201
-अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान और अमेरिका के आपसी रिश्तों में एक बार थोड़ा तनाव देखा जा रहा है। दरअसल पाकिस्तान अपने उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में अमेरिकी गुप्तचरों और ड्रोन हमलों से परेशान है। घटना से नाराज पाकिस्तान ने इसकी बाकायदा नाराजगी अमेरिकी राजदूत से भी की है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख अशफाक कयानी द्वारा हमले को देश के नागरिकों पर आक्रामण की संज्ञा देने के बाद अमेरिका से माफी मांगने और स्पष्टीकरण देने की मांग कर डाली है। कयानी ने कहा कि इस तरह की घटनाओं  को किसी भी लिहाज से अनुचित और किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जा सकती। उन्होंने हमलों को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताते हुए कहा कि शांतिपूर्ण नागरिकों की जिगरा (परिषद) को लोगों की जान की परवाह किए बगैर गैर-जिम्मेदाराना और संवेदनशील तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।
कयानी ने कहा कि इस तरह की हिंसक घटनाएं आतंकवाद को खत्म करने के लक्ष्य से हमें काफी दूर ले जाएगी। जनरल कयानी ने अपने यहां सक्रिय सीआईए एजेंटों और स्पेशल फोर्स के लोगों की भारी कटौती करने की भी मांग की है। अपने अशांत उत्तर-पश्चिम इलाके में ड्रोन हमलों को रोकने की मांग करके कयानी ने इस बात का संकेत दिया है कि दोनों देशों में खुफिया सहयोग लगभग चरमरा गया है। न्यूयार्प टाइम्स के अनुसार पाकिस्तान द्वारा सीआईए एजेंट रेमंड डेविस को गिरफ्तार करने के बाद से ही दोनों देशों के राजनयिक संबंध में खटास आ गई थी और पाक ने अब सीआईए एजेंटों में कटौती की जो मांग की है, यह उसकी का नतीजा है। आश्चर्य की बात यह है कि पाकिस्तान की यह मांग गिलानी सरकार की ओर से नहीं बल्कि सीधे सेना प्रमुख अशफाक परवेज कयानी की ओर से की गई है। पाकिस्तानी मांग तब सामने आई जब आईएसआई चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शुजा पाशा की सीआईए डायरेक्टर लियोने पेटा और ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन एडमिरल माइक मुलेन से चार घंटे तक बातचीत हुई। सीआईए प्रवक्ता ने भले ही इसके बाद बयान दिया हो कि दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग मजबूती से चल रहा है। लेकिन इस मुलाकातके बाद पाशा ने अचानक अपने दौरे में कटौती कर दी और पाकिस्तान लौट गए। अमेरिकी और पाकिस्तानी अधिकारियों ने इसका कोई कारण नहीं बताया।
पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले से न्यूयार्प टाइम्स ने खबर दी है कि कयानी ने अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशन फौजियों की संख्या में 25-40 फीसदी कटौती की मांग की है। पाक अधिकारियों के अनुसार 335 अमेरिकी एजेंटों और विशेष फौजियों को वापस बुलाने को कहा गया है। यह स्पष्ट नहीं है कि यदि इतनी कटौती की गई तो पाकिस्तान में कितने अमेरिकी एजेंट और फौजी रह जाएंगे, क्योंकि इसका कभी खुलासा किया ही नहीं गया कि पाकिस्तान में कितने अमेरिकी एजेंट और स्पेशल फोर्स तैनात है? बहरहाल, अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यदि यह कटौती की गई तो तालिबान और अलकायदा के खिलाफ लड़ाई कमजोर पड़ जाएगी।