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Tuesday, 31 May 2011

आखिर यह तहव्वुर राणा कौन है और उस पर क्या आरोप है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th May 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका में शिकागो के व्यवसायी तहव्वुर राणा के खिलाफ मुकदमा शुरू हो गया है। उस पर 2008 के मुंबई हमले की साजिश में भागीदार होने का आरोप है। इस मुकदमें पर पूरी दुनिया की नजर है क्योंकि इससे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की भूमिका पर नई रोशनी पड़ रही है। उल्लेखनीय है कि इन दिनों शिकागो की अदालत में डेविड कोलमैन हेडली और तहव्वुर राणा पर मुंबई में 26/11 हमले का केस चल रहा है। डेविड हेडली के बारे में तो अब सारी दुनिया जान चुकी है पर यह तहव्वुर राणा कौन है?मुंबई हमले में लश्कर-ए-तैयबा की मदद करने का आरोपी पाकिस्तानी मूल का कनाडाई व्यवसायी तहव्वुर राणा तो डेविड हेडली के लिए सिर्प एक मोहरा भर था। हेडली से राणा के वकीलों ने कहा कि उनका मुवक्किल एक अच्छा आदमी है लेकिन उसे एक ऐसे दोस्त ने धोखा दिया, जिस पर वह विश्वास करता था। राणा के वकील चार्ल्स स्विफट ने हेडली से पूछा, वह आपका दोस्त था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया जैसा आप कह रहे हैं। हेडली ने जवाब दिया हां। हेडली ने राणा को एक ऐसा इंटेलीजेंट छात्र बताया,जो धार्मिक मान्यताओं का पालन करता थाऔर शराब नहीं पीता था। हेडली दूसरी ओर ड्रग्स की तस्करी करता था और कई महिलाओं के साथ समय बिताता था।
तहव्वुर हुसैन राणा पाकिस्तान में पढ़े-लिखे, बड़े हुए। चिकित्सा की डिग्री लेने के बाद वे पाकिस्तान सेना के मेडिकल कोर से जुड़ गए। पचास वर्षीय राणा और उनकी पत्नी दोनों ने 2001 में कनाडा की नागरिकता ले ली। उनकी पत्नी भी चिकित्सक है। वर्ष 2009में गिरफ्तारी से पहले राणा अमेरिका के शिकागो में रहता था। वह ट्रेवल एजेंसी समेत कई धंधों में लिप्त था। तीन साल पहले राणा ने बचपन के अपने दोस्त डेविड हेडली को मुंबई में अपनी ट्रेवल एजेंसी की शाखा खोलने में मदद की। आरोप है कि इस व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य था मुंबई हमलों के लिए लक्ष्यों की टोह लेना। हेडली पहले ही मुंबई हमलों की साजिश में शामिल होने की बात स्वीकार कर चुका है। उम्मीद है कि अब वे राणा के खिलाफ अभियोजन पक्ष का मुख्य गवाह होगा। हेडली ने तो लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से सीधे संबंध होने की बात स्वीकार कर ली है। पिछले कुछ दिनों से तो वह अदालत में 26/11हमले की डिटेल्स बता रहा है। राणा पर कुल मिलाकर 12 आरोप लगाए गए हैं, जिनमें अमेरिकी नागरिकों की हत्या में सहायक होने का भी आरोप शामिल है। मुंबई हमलों में मारे गए 160 से ज्यादा लोगों में छह अमेरिकी शामिल थे। राणा और हेडली को अक्टूबर 2009में डेनमार्प के अखबार के कार्यालयों पर हमले की योजना बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसी अखबार ने पहली बार पैगम्बर पर विवादास्पद कार्टून छापे थे। गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ के दौरान पता चला कि दोनों मुंबई हमलों की साजिश में शामिल हैं। शिकागो की अदालत में दायर चार्जशीट में चार और लोगों के नाम हैं। कैप्टन इकबाल, साजिद मीर, अबू कहाफा और मजहर इकबाल। चारों पाकिस्तानी नागरिक हैं। लेकिन इनमें से सिर्प मजहर इकबाल की ही पाकिस्तान में गिरफ्तारी हो पाई है। हेडली की गवाही से राणा और आईएसआई के संबंध स्थापित होंगे और पाकिस्तान व आईएसआई बेनकाब होगी।

Wednesday, 4 May 2011

दुनिया का सबसे मोस्ट वांटेड ओसामा बिन लादेन मारा गया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 04 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
पूरी दुनिया को इस्लाम के रंग में रंगने का खूंरेजी ख्वाब देखने वाले और अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का पर्याय बन चुके मोस्ट वांटेड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने मौत के घाट उतारकर अमेरिका ने यह साबित कर दिया कि वह अपने इरादों के प्रति अटल है और अपने शत्रुओं का सफाया करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। रविवार की देर रात अमेरिकी सैनिकों ने एक अत्यंत गोपनीय ऑपरेशन में उसे एक ऐसी इमारत के अन्दर मार गिराया जो पाकिस्तान की मिलिट्री अकादमी से कुछ ही दूर स्थित है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 60 किलोमीटर दूर एबटाबाद शहर में स्थानीय समयानुसार रात डेढ़ बजे अमेरिकी सेना के विशेष बल को लेकर चार हेलीकॉप्टर उस इमारत के कम्पाउंड में उतरे जहां ओसामा के छिपे होने की सूचना थी। सोमवार को टीवी पर जो फुटेज दिखाए गए, उनमें खेतों के बीच एक कम्पाउंड दिख रहा था, जो 12 फीट ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था। किलेनुमा इस इमारत के परिसर में हेलीकॉप्टरों के उतरने के बाद उन पर ओसामा के गार्डों ने फायरिंग की। अमेरिकी सैनिकों की जवाबी कार्रवाई में 54 वर्षीय ओसामा की मौत हो गई। उसके बेटे और एक महिला के मारे जाने की भी खबर है। इस अभियान में एक हेलीकॉप्टर को क्षति पहुंची। मालूम हो कि अमेरिका ने ओसामा पर ढाई करोड़ डालर (लगभग 111 करोड़ रुपये) का इनाम घोषित किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने राष्ट्र के नाम संबोधन में ओसामा के मारे जाने की पुष्टि की। लादेन के मारे जाने के  बाद उसकी दो पत्नियों तथा चार बच्चों को हिरासत में ले लिया गया है। अमेरिका का कहना है कि इस्लामी रीति-रिवाज के साथ ओसामा बिन लादेन के शव को समुद्र में दफन किया गया है। समझा जाता है कि उसके अपने देश सऊदी अरब द्वारा शव लेने से इंकार करने पर ऐसा किया गया। हालांकि उसे समुद्र में दफनाने पर इस्लामी विद्वानों ने सवाल उठाए हैं। उसे समुद्र में दफनाने के पीछे अमेरिका की मंशा उसकी कब्रगाह को आस्था का केंद्र बनने से रोकने की रही है। लादेन की पहचान की पुष्टि के लिए अमेरिका ने उसके शव का डीएनए परीक्षण कराया है। यह डीएनए टेस्ट लादेन की बहन के डीएनए से मिलने से किया गया, जिसमें शव लादेन का होने की 99.9 फीसदी पुष्टि हो गई है। बहन का डीएनए सैम्पल 9/11 के हमलों के बाद लिया गया था। लादेन के बारे में किसी भी तरह का शक दूर करने के लिए चेहरे का मिलान करने वाली अत्याधुनिक फेशियल रिकाग्निशन तकनीक का भी सहारा लिया गया। सन 2001 में 9/11 के हमले के बाद अमेरिका लगभग दस साल से अलकायदा सरगना को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने की कोशिश में था। जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लादेन के मारे जाने की खबर की पुष्टि की तो सारे अमेरिका में जश्न का माहौल बन गया। रात के अंधेरे होने के बावजूद व्हाइट हाउस के बाहर खुशी से झूमती भीड़ एकत्र हो गई।
हालांकि अमेरिका ने लादेन ऑपरेशन को काफी खुफिया रखा और आईएसआई और अलकायदा को इसकी हवा नहीं लगने दी पर इस कार्रवाई से कुछ ही दिन पहले अलकायदा की धमकी का महत्व बढ़ जाता है। क्या यह सम्भव है कि ओसामा के सम्भावित अमेरिकी कार्रवाई का आभास हो गया था? इस कार्रवाई के कुछ ही दिन पहले चर्चित विकीलीक्स की ओर से जारी गोपनीय दस्तावेज में कहा गया, अलकायदा के एक वरिष्ठ स्वयंभू कमांडर ने दावा किया है कि उसके संगठन ने यूरोप में एक परमाणु बम छिपा रखा है। अगर लादेन को पकड़ा गया या मारा गया तो वह इसमें विस्फोट कर देंगे? गुआतांनामो कारागार में 780 पकड़े गए लोगों की पृष्ठभूमि और पूछताछ के दौरान उनकी ओर से दिए बयान के आधार पर यह गोपनीय दस्तावेज तैयार किए गए हैं। ओसामा के मारे जाने से दुनिया में हो रही आतंकवादी गतिविधियों पर शायद ही कोई लम्बा-चौड़ा असर पड़े। क्योंकि आज सारी दुनिया में इतने अलकायदा टाइप के सेल स्थापित हो चुके हैं जो स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं कि इनकी गतिविधियों पर कोई असर न पड़े। फिर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पिछले एक दशक में अलकायदा ने विचारधारा का रूप ले लिया है। आतंकवाद को खाद-पानी देने वाली इस विचारधारा  का अन्त नहीं दिखता। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि अलकायदा ने अमेरिका के नेतृत्व में छेड़े गए आतंकवाद विरोधी अभियान को इस्लाम पर हमले का रूप दे दिया है।
अमेरिकी विशेष बल के हाथों इस्लामाबाद के करीब एबटाबाद में एक शानदार बंगले में ओसामा की मौत और इससे पहले अनेक अलकायदा नेताओं की पाकिस्तानी शहरों में हुई गिरफ्तारी से यह स्पष्ट हो जाता है कि आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाह अफगान-पाक सीमा या भारत सीमा पर नहीं बल्कि पाकिस्तान के बीचोबीच है। इससे एक और मूलभूत सच्चाई रेखांकित होती है कि पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व समाप्त किए बिना तथा वहां कट्टरपंथ को समाप्त किए बगैर अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ जंग नहीं जीती  जा सकती। 9/11 हमले के बाद पाकिस्तान से पकड़े गए अन्य आतंकवादी नेताओं में अलकायदा के तीसरे नम्बर का नेता शालिद शेक मुहम्मद, नेटवर्प व्यवस्था का प्रमुख अबु जुबैदिया, आसुर जजीरी शामिल है। इन तमाम गिरफ्तारियों में एक समान कड़ी यह है कि ये सब पाकिस्तानी शहरों में पकड़े गए हैं। इस आलोक में यह हैरानी की बात नहीं है कि बिन लादेन कबाइली इलाकों के बजाय पाकिस्तान की राजधानी के निकट शहर में मारा गया। अगर हैरानी है तो इस बात की कि लादेन इस्लामाबाद के बगल में एबटाबाद में रह रहा था। यहां पाकिस्तानी सेना का बड़ा आधार शिविर, सैन्य अकादमी, सैन्य अस्पताल और अनेक वरिष्ठ सैन्य व खुफिया अधिकारी व पूर्व अधिकारियों के आवास हैं। अमेरिका को लादेन को पकड़ने में दस साल इसलिए भी लगे, क्योंकि लादेन को पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठान के कुछ तत्वों का संरक्षण प्राप्त था। याद रहे कि ओसामा डायलासिस पर था और डायलसिस हर स्थान पर नहीं हो सकता। कटु सत्य तो यह है कि अमेरिका बेशक जितना प्रयास करे जब तक पाकिस्तानी सेना और आईएसआई नहीं सुधरती तब तक न तो आतंकवाद ही खत्म होगा और न ही पाकिस्तान का राष्ट्र निर्माण सम्भव है। बहरहाल अमेरिका को यह खुशी व संतोष जरूर होगा कि उसने 9/11 का बदला ले लिया है।

Thursday, 21 April 2011

60 साल दूर रहने के बाद जमात भी उतरा सियासी मैदान में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 21 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

लगभग छह दशकों से राजनीति से दूर रहे देश के प्रमुख मुस्लिम संगठन `जमात-ए-इस्लामी हिन्द' ने सक्रिय राजनीति में उतरने का ऐलान किया है। सोमवार को जमात के अमीर (प्रमुख) सैयद जलालुद्दीन उमरी ने मावलंकर हॉल में यह ऐलान करते हुए कहा कि देश में एक ऐसी पार्टी की जरूरत महसूस हो रही थी जो अल्पसंख्यक, गरीब और समाज के सभी तबकों की आवाज बुलंद करे। हमने इसी वजह से इस पार्टी का गठन किया है। जमात के वरिष्ठ सदस्य मुज्तबा फारुख इसके अध्यक्ष बनाए गए हैं। पार्टी का नाम है वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया। पार्टी का दावा है कि वह इस बात का पूरा प्रयास करेगी, उस पर अल्पसंख्यक पार्टी होने का ठप्पा न लगे। पार्टी महासचिव और जमात के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने कहा कि हमारी पूरी कोशिश होगी कि हमें सिर्प मुसलमानों से जोड़कर न देखा जाए। हम सबको साथ लेकर चलने की नीति पर काम करेंगे। भारत में जमात पहली बार सक्रिय राजनीति में कदम रख वही है। देश को आजादी मिलने के समय इस संगठन ने राजनीति से दूर रहने का फैसला किया था। अब सक्रिय राजनीति में आने की वजह के बारे में फारुक ने कहा कि पार्टी गठित करने में देर हुई है, लेकिन अब और देर नहीं की जा सकती थी।
भारत के मुसलमान बहुत दिनों से यह महसूस करते आ रहे हैं कि उनके हितों की रक्षा करने वाली कोई सियासी जमात नहीं है। हर सियासी पार्टी ने अपने हितों को साधने के लिए अल्पसंख्यकों का इस्तेमाल किया पर कभी किसी ने उनकी तरक्की नहीं कराई। इसी शून्य की कमी करने के लिए अब हम देख रहे हैं कि जमात भी मैदान में उतर आई है। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में पीस पार्टी भी सक्रिय राजनीति में आ गई। आगामी विधानसभा चुनावों में सम्भव है कि पीस पार्टी जोरशोर से दंगल में उतरे। पीस पार्टी की रैलियां आरम्भ हो चुकी हैं। इन रैलियों में
25-30 हजार लोग जुट रहे हैं। पीस पार्टी के अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद अयूब ने कहा कि चुनाव में हमारा मुख्य मुद्दा काले धन और प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहाद है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता से मेरी पार्टी का विश्वास जगा है कि हम भ्रष्टाचार से निजात दिला सकेंगे। डॉ. आयूब ने कहा कि हाल ही में डुमरियागंज में हुए विधानसभा उपचुनाव में पीस पार्टी को 26 हजार मत मिले थे। इसके चलते समाजवादी पार्टी चौथे और कांग्रेस पांचवें नम्बर पर खिसक गई थी। 2012 के चुनाव में भी सपा और कांग्रेस की लड़ाई चौथे और पांचवें नम्बर के लिए होगी। उन्होंने कहा कि सपा और कांग्रेस समेत सभी दलों ने मुस्लिमों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया है जबकि प्रदेश में मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत है। हम एक विकल्प के रूप में उभर रहे हैं। पीस पार्टी का फिलहाल सबसे अधिक जनाधार पूर्वी उत्तर प्रदेश में है। यहां इन दिनों पार्टी की रैलियां हो रही हैं और इनमें हजारों लोगों की मौजूदगी से पार्टी के हौसले बुलंद हैं। डॉ. अयूब कहते हैं कि 2012 के चुनाव में मेरी कोशिश रहेगी कि हम असम की ऑल इंडिया डेमोकेटिक फ्रंट की तरह एक विकल्प बन सकें, जिससे कांग्रेस का अल्पसंख्यक और पिछड़ा वोट दूर हो सके।
प्रदेश की राजनीति में पीस पार्टी की धमाकेदार मौजूदगी से सबसे ज्यादा परेशानी कांग्रेस को हो सकती है और राहुल गांधी के मिशन यूपी 2012 के सपने को धक्का लग सकता है।