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Friday, 1 June 2012

आरक्षण के नाम पर अल्पसंख्यकों को गुमराह करने का असफल पयास

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 June 2012
अनिल नरेन्द्र
केंद्र सरकार को यह मालूम था कि उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उसने जो कांग्रेस पार्टी को अल्पसंख्यक वोट दिलवाने की उम्मीद से अल्पसंख्यकों के लिए जो साढ़े चार पतिशत आरक्षण किया है उसे अदालत रद्द कर सकता है पर फिर भी केंद्र ने ऐसा किया। जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। आंध्र पदेश हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को तगड़ा झटका देते हुए मजहब के आधार पर आरक्षण देने से इंकार कर दिया। उल्लेखनीय है कि उत्तर पदेश विधानसभा चुनावों के दौरान केंद्र ने ओबीसी के 27 फीसद कोटे से साढ़े चार फीसद आरक्षण देने की घोषणा की थी। यह आरक्षण सभी अल्पसंख्यक वर्गों के लिए था। हालांकि माना जा रहा था कि इस घोषणा के पीछे मुस्लिम वोट बैंक को लुभाना था। ऐन वक्त पर की गई घोषणा पर चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनावों तक इसके अमल पर रोक लगा दी थी। सरकार ने नतीजा घोषित होने के साथ ही इसे लागू कर दिया। केंद्र सरकार ने एक शगूफा छोड़ा था जो अब अदालत ने रद्द कर दिया है। सभी जानते हैं कि भारत के संविधान में धर्म आधारित आरक्षण के लिए कोई जगह नहीं है। केंद्र सरकार का यूपी विधानसभा से ठीक पहले उठाया यह कदम शुद्ध राजनीति से पेरित था और अल्पसंख्यकों को खासतौर से यूपी के मुसलमानों को बेवकूफ बनाने का एक पयास था। उच्च न्यायालय ने साफ कहा कि केंद्र सरकार का यह फैसला केवल धार्मिक आधार पर लिया गया है। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर लापरवाही से काम करने के लिए केंद्र सरकार को आड़े हाथ भी लिया। सरकार की ओर से यह दलील दी गई थी कि यह फैसला सच्चर समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया और ऐसा करके उसने 2009 के घोषणा पत्र में दर्ज अपने वादे को पूरा किया है। बावजूद इस सबके वह यह नहीं बता सकी कि जो वादा 2009 में किया गया था उसे पूरा करने की याद 2012 में तब क्यों आई जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव कार्यकम की घोषणा होने वाली थी? शायद यही कारण रहा कि निर्वाचन आयोग ने चुनाव होने तक इस फैसले के अमल पर रोक लगा दी। निर्वाचन आयोग द्वारा इस पर रोक लगाने से साबित हो गया कि यह चुनावी लाभ के लिए लिया गया एक राजनीतिक फैसला था। अब सरकार और कांग्रेस दोनों अल्पसंख्यक आरक्षण पर हाईकोर्ट की इस चाबुक की मार से उभरने का रास्ता खोजने में लग गए हैं। सलमान खुर्शीद ने कहा है कि सरकार आंध्र पदेश हाईकोर्ट के इस फैसले को सुपीम कोर्ट में चुनौती देगी। दलील यह दी जाएगी कि यह फैसला धार्मिक नहीं भाषाई आधार पर लिया गया था। सरकार अपनी पार्टी कांग्रेस को दिलासा दे रही है कि सुपीम कोर्ट में ठीक से पक्ष रखने से अल्पसंख्यक आरक्षण का मामला सुलझ जाएगा। सरकार अपनी हार को वकीलों द्वारा ठीक से केस पस्तुत न कर पाने की वजह मान रही है। सुपीम कोर्ट में पिछड़ों के कोटे के अंदर मुस्लिमों के लिए एक निश्चित कोटे की बात रखने की मजबूत दलील देनी होगी। कोर्ट चाहेगा कि सरकार बताए कि अल्पसंख्यकों में जो पिछड़े हैं वे वास्तव में कितने पिछड़े हैं? कानून मंत्री सलमान खुर्शीद से जब यही सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि एटार्नी जनरल के लिए अदालत को समझाना मुश्किल नहीं होगा क्योंकि सरकार अल्पसंख्यक पिछड़ों की अलग से सूची नहीं बनाने जा रही है। उन्होंने कहा कि पिछड़ों का आरक्षण तय करने वाले मंडल आयोग ने जो खाका दिया है, सरकार उसके दायरे के भीतर ही कोर्ट में बात करेगी। कानून मंत्री ने स्वीकार किया कि सरकार संविधान के बाहर नहीं जा रही है। सुपीम कोर्ट इस मुद्दे पर क्या रुख अख्तियार करता है समय ही बताएगा। इससे इंकार नहीं कि अल्पसंख्यकों और विशेष तौर पर मुस्लिम समाज की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए अतिरिक्त कदम उठाए जाने की जरूरत है लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं कि ऐसा सिर्प चुनावी लाभ या वोट हासिल करने के लिए किया जाए। मुस्लिम समाज अब राजनीतिक चालबाजियों में फंसने वाला नहीं। उसने देख लिया है कि पिछले छह दशकों से इन राजनीतिक दलों ने उन्हें कैसे गुमराह कर महज वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Minority, Muslim Reservation, Vir Arjun

Friday, 11 May 2012

खत्म की जाए हज सब्सिडी ः सुप्रीम कोर्ट

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11 May 2012
अनिल नरेन्द्र
सुप्रीम कोर्ट ने एक दूरगामी फैसले में पिछले 18 साल से हज यात्रा को दी जा रही सब्सिडी अगले 10 साल में पूरी तरह समाप्त करने का आदेश दिया है। जस्टिस आफताब आलम और रंजना प्रकाश देसायी की बैंच ने कुरान को उद्धृत करके कहा कि सब्सिडी खत्म करना जायज है। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्थलों पर जाने वाले लोगों को इस तरह की सब्सिडी देना अल्पसंख्यकों को लुभाने समान है। हज यात्रा के साथ भेजे जाने वाले सद्भावना प्रतिनिधिमंडल को भी कोर्ट ने सिर्प दो सदस्यों तक सीमित करने को कहा है। सरकार द्वारा हज यात्रियों को विमान किराये में दी जाने वाली रियायत को हज सब्सिडी कहते हैं। 1954 से यह हज सब्सिडी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। ऐसी सुविधा देने वाला भारत दुनिया में एक मात्र देश है। इस सब्सिडी के तहत सरकार हर साल 600 करोड़ हज यात्रियों पर खर्च करती है। सरकार ने पहले हज यात्रियों के लिए 12,000 रुपये का विमान किराया निर्धारित किया था। इसे 2009 में बढ़ाकर 16,000 रुपये कर दिया गया। बाकी लागत सरकार द्वारा खर्च की जाती है। इससे करीब हर यात्री को 40,000 रुपये की सब्सिडी मिलती है। 1.70 लाख तीर्थ यात्री हर साल देश से हज करने जाते हैं। इनमें से 1.25 लाख हज कमेटियों द्वारा चुने जाते हैं, बाकी यात्री निजी ऑपरेटरों के माध्यम से जाते हैं। हज कमेटी द्वारा चुने गए यात्रियों को ही सब्सिडी दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सब्सिडी की रकम का ज्यादा बेहतर इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान में हो सकता है। एमआईएम प्रमुख असुद्दीन ओपोनी ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह सब्सिडी 10 साल में नहीं बल्कि तत्काल प्रभाव से खत्म की जानी चाहिए। हज सब्सिडी के रूप में हज यात्रियों को नहीं बल्कि एयर इंडिया को 600 करोड़ रुपये की मदद की जाती है। फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुकर्रम अहमद का कहना है कि हम इस फैसले का स्वागत करते हैं। अगर अन्य धर्मों के लोगों को धार्मिक यात्राओं में सब्सिडी नहीं मिलती तो हमें भी नहीं मिलनी चाहिए। भारत में सभी नागरिक समान हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब सरकार भी सहमत है और उसकी मानें तो वह इस दिशा में सोच रही थी, लेकिन सवाल यह है कि सरकार ने फिर इस दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठाए और वह भी तब जब मुस्लिम समाज के अनेक नेता और धर्मगुरु भी इस मत के थे कि हज सब्सिडी सही नहीं? कुछ उलेमा तो इसे गैर-इस्लामी मानते हैं। अब बेशक केंद्र सरकार जो भी दावा करे पर कटु सत्य तो यह है कि यह फैसला सरकार को करना चाहिए था न कि सुप्रीम कोर्ट को पर मजबूरन सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला तब किया जब उसे लगा कि इस सब्सिडी के माध्यम से राजनीतिक हित साधे जा रहे हैं। यह सवाल इसलिए क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने यह कहने में संकोच नहीं किया कि इस तरह की नीति अल्पसंख्यकों को लुभाने वाली है। एक पंथनिरपेक्ष व्यवस्था में शासन को अपने आचरण से ऐसा आभास भी नहीं कराना चाहिए कि वह किसी खास वर्ग के प्रति अतिरिक्त उदारता का परिचय दे रही है। अगर सरकार को धार्मिक यात्राओं में सब्सिडी देनी ही है तो सभी धर्मों के लोगों को दे।
सुप्रीम कोर्ट ने एक दूरगामी फैसले में पिछले 18 साल से हज यात्रा को दी जा रही सब्सिडी अगले 10 साल में पूरी तरह समाप्त करने का आदेश दिया है। जस्टिस आफताब आलम और रंजना प्रकाश देसायी की बैंच ने कुरान को उद्धृत करके कहा कि सब्सिडी खत्म करना जायज है। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्थलों पर जाने वाले लोगों को इस तरह की सब्सिडी देना अल्पसंख्यकों को लुभाने समान है। हज यात्रा के साथ भेजे जाने वाले सद्भावना प्रतिनिधिमंडल को भी कोर्ट ने सिर्प दो सदस्यों तक सीमित करने को कहा है। सरकार द्वारा हज यात्रियों को विमान किराये में दी जाने वाली रियायत को हज सब्सिडी कहते हैं। 1954 से यह हज सब्सिडी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। ऐसी सुविधा देने वाला भारत दुनिया में एक मात्र देश है। इस सब्सिडी के तहत सरकार हर साल 600 करोड़ हज यात्रियों पर खर्च करती है। सरकार ने पहले हज यात्रियों के लिए 12,000 रुपये का विमान किराया निर्धारित किया था। इसे 2009 में बढ़ाकर 16,000 रुपये कर दिया गया। बाकी लागत सरकार द्वारा खर्च की जाती है। इससे करीब हर यात्री को 40,000 रुपये की सब्सिडी मिलती है। 1.70 लाख तीर्थ यात्री हर साल देश से हज करने जाते हैं। इनमें से 1.25 लाख हज कमेटियों द्वारा चुने जाते हैं, बाकी यात्री निजी ऑपरेटरों के माध्यम से जाते हैं। हज कमेटी द्वारा चुने गए यात्रियों को ही सब्सिडी दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सब्सिडी की रकम का ज्यादा बेहतर इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान में हो सकता है। एमआईएम प्रमुख असुद्दीन ओपोनी ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह सब्सिडी 10 साल में नहीं बल्कि तत्काल प्रभाव से खत्म की जानी चाहिए। हज सब्सिडी के रूप में हज यात्रियों को नहीं बल्कि एयर इंडिया को 600 करोड़ रुपये की मदद की जाती है। फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुकर्रम अहमद का कहना है कि हम इस फैसले का स्वागत करते हैं। अगर अन्य धर्मों के लोगों को धार्मिक यात्राओं में सब्सिडी नहीं मिलती तो हमें भी नहीं मिलनी चाहिए। भारत में सभी नागरिक समान हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब सरकार भी सहमत है और उसकी मानें तो वह इस दिशा में सोच रही थी, लेकिन सवाल यह है कि सरकार ने फिर इस दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठाए और वह भी तब जब मुस्लिम समाज के अनेक नेता और धर्मगुरु भी इस मत के थे कि हज सब्सिडी सही नहीं? कुछ उलेमा तो इसे गैर-इस्लामी मानते हैं। अब बेशक केंद्र सरकार जो भी दावा करे पर कटु सत्य तो यह है कि यह फैसला सरकार को करना चाहिए था न कि सुप्रीम कोर्ट को पर मजबूरन सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला तब किया जब उसे लगा कि इस सब्सिडी के माध्यम से राजनीतिक हित साधे जा रहे हैं। यह सवाल इसलिए क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने यह कहने में संकोच नहीं किया कि इस तरह की नीति अल्पसंख्यकों को लुभाने वाली है। एक पंथनिरपेक्ष व्यवस्था में शासन को अपने आचरण से ऐसा आभास भी नहीं कराना चाहिए कि वह किसी खास वर्ग के प्रति अतिरिक्त उदारता का परिचय दे रही है। अगर सरकार को धार्मिक यात्राओं में सब्सिडी देनी ही है तो सभी धर्मों के लोगों को दे।
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Saturday, 24 December 2011

और अब मुस्लिम आरक्षण का पत्ता

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th December 2011
अनिल नरेन्द्र

केंद्रीय कैबिनेट ने गुरुवार को अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया। अब पिछड़े वर्गों के लिए तय 27 फीसदी आरक्षण में साढ़े चार फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यकों का होगा। इसे आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का जनाधार के तौर पर देखा जा रहा है। भ्रष्टाचार, लोकपाल, ब्लैक मनी जैसे ज्वलंत मुद्दों से घिरी संप्रग सरकार ने विपक्ष में विभाजन और देश का ध्यान ज्वलंत समस्याओं से हटाने के लिए यह कदम उठाया लगता है। गुरुवार को भोजन का अधिकार देने वाले बिल को संसद में पेश करने वाली मनमोहन सरकार ने राज्य में शिक्षा संस्थानों और नौकरी में अल्पसंख्यकों को आरक्षण का रास्ता साफ करके एक तीर से कई निशाने साधने का प्रयास किया है। कुछ साल पहले रंगनाथ मिश्र आयोग ने मुसलमानों की हालत को बेहतर करने के लिए आरक्षण की सिफारिश की थी। लेकिन संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण देने की इजाजत नहीं देता। इसलिए पिछले वर्ग की सूची में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देकर मुसलमानों को लाभ देने की कोशिश कितनी कारगर होगी, यह तो भविष्य ही बताएगा। राजनीतिक मजबूरियों के चलते सरकार ने मुस्लिम आरक्षण बेशक कर दिया हो या करने की नीयत साफ कर दी हो पर सुप्रीम कोर्ट में यह मामला ठहर पाता है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट 10 साल पहले उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार की ऐसी पहल पर रोक लगा चुका है। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहने के दौरान राजनाथ सिंह ने पिछड़ों के 27 फीसदी कोटे में से ही अतिपिछड़ों को अलग से आरक्षण के लिए सामाजिक न्याय समिति बनाई थी। समिति की ही सिफारिश पर उत्तर प्रदेश सरकार ने विधानसभा से पारित उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति/जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण) संशोधन अधिनियम 2001 लागू तो कर दिया, लेकिन उसी सरकार के पर्यटन मंत्री रहे अशोक यादव ने उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी जबकि कुछ अन्य संगठन भी सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए थे। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राजनाथ सिंह सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी थी। इस बीच पिछड़ों के ही कोटे से मुसलमानों को आरक्षण की पहल पर यादव ने कहा, `चूंकि कोटे के भीतर एक और कोटे' पर सुप्रीम कोर्ट 10 साल पहले रोक लगा चुका है। ऐसे में केंद्र सरकार मुस्लिम आरक्षण को लेकर यदि वाकई गम्भीर है तो संविधान में संशोधन कराए। हकीकत तो यह है कि अलग-अलग पार्टियों की अगुवाई करने वाले पिछड़े वर्गों के कई नेता जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं, पिछड़ों के कोटे से मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ है, लेकिन मुस्लिम वोट के चलते वे खुलकर इसका विरोध नहीं करना चाहते। राजनीतिक दल ऐसा सिर्प इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि वह आने वाले चुनावों में मुस्लिम समुदाय के थोक वोट हासिल करना चाहते हैं। मुस्लिम आरक्षण की वकालत करने वाले दलों के पास इस सवाल का शायद ही कोई जवाब हो कि उन्हें अभी तक इस सप्रदाय का पिछड़ापन क्यों नहीं दिखा? क्या आरक्षण से मुस्लिम समुदाय की समस्याएं खत्म हो जाएंगी? हमारे मुसलमान भाइयों की एक बड़ी समस्या यह भी रही है कि इतने सालों के बाद भी उन्हें सही नेतृत्व नहीं मिल सका और जो नेता खुद को इनका हितैषी बताते हैं उनकी दिलचस्पी सिर्प उनके वोट लेने में है। यह एक सच्चाई है कि मुस्लिम समुदाय पिछड़ेपन से ग्रस्त है, लेकिन इस आधार पर उसे मुख्यधारा से बाहर करार देना उसे जानबूझ कर संकुचित दायरे में सीमित करना है। तालीम की एक बहुत बड़ी समस्या है। पिछले दिनों एक सम्मेलन हुआ था उसमें बताया गया कि दिल्ली के मदरसों में सैकड़ों पद खाली पड़े हुए हैं, इन्हें भरने की किसी ने कोई कोशिश नहीं की। सच्चर कमेटी की सिफारिशें भी मुस्लिम समुदाय का स्तर बढ़ा सकती हैं पर अफसोस से कहा जाएगा कि उस पर कोई अमल नहीं हुआ। जब तक मुस्लिम समाज में तालीम नहीं बढ़ाई जाती, हमें तो उसका उद्धार होता मुश्किल लग रहा है। आवश्यकता तो आज इस बात की है कि ऐसी कोई व्यवस्था बनाएं जिसमें भारतीय समाज के जो भी वंचित निर्धन हैं उन सभी का उत्थान हो भले ही वह किसी भी जाति, समुदाय, क्षेत्र अथवा मजहब के हों।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Minority, Muslim Reservation, Rangnath Misra, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Thursday, 21 April 2011

60 साल दूर रहने के बाद जमात भी उतरा सियासी मैदान में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 21 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

लगभग छह दशकों से राजनीति से दूर रहे देश के प्रमुख मुस्लिम संगठन `जमात-ए-इस्लामी हिन्द' ने सक्रिय राजनीति में उतरने का ऐलान किया है। सोमवार को जमात के अमीर (प्रमुख) सैयद जलालुद्दीन उमरी ने मावलंकर हॉल में यह ऐलान करते हुए कहा कि देश में एक ऐसी पार्टी की जरूरत महसूस हो रही थी जो अल्पसंख्यक, गरीब और समाज के सभी तबकों की आवाज बुलंद करे। हमने इसी वजह से इस पार्टी का गठन किया है। जमात के वरिष्ठ सदस्य मुज्तबा फारुख इसके अध्यक्ष बनाए गए हैं। पार्टी का नाम है वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया। पार्टी का दावा है कि वह इस बात का पूरा प्रयास करेगी, उस पर अल्पसंख्यक पार्टी होने का ठप्पा न लगे। पार्टी महासचिव और जमात के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने कहा कि हमारी पूरी कोशिश होगी कि हमें सिर्प मुसलमानों से जोड़कर न देखा जाए। हम सबको साथ लेकर चलने की नीति पर काम करेंगे। भारत में जमात पहली बार सक्रिय राजनीति में कदम रख वही है। देश को आजादी मिलने के समय इस संगठन ने राजनीति से दूर रहने का फैसला किया था। अब सक्रिय राजनीति में आने की वजह के बारे में फारुक ने कहा कि पार्टी गठित करने में देर हुई है, लेकिन अब और देर नहीं की जा सकती थी।
भारत के मुसलमान बहुत दिनों से यह महसूस करते आ रहे हैं कि उनके हितों की रक्षा करने वाली कोई सियासी जमात नहीं है। हर सियासी पार्टी ने अपने हितों को साधने के लिए अल्पसंख्यकों का इस्तेमाल किया पर कभी किसी ने उनकी तरक्की नहीं कराई। इसी शून्य की कमी करने के लिए अब हम देख रहे हैं कि जमात भी मैदान में उतर आई है। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में पीस पार्टी भी सक्रिय राजनीति में आ गई। आगामी विधानसभा चुनावों में सम्भव है कि पीस पार्टी जोरशोर से दंगल में उतरे। पीस पार्टी की रैलियां आरम्भ हो चुकी हैं। इन रैलियों में
25-30 हजार लोग जुट रहे हैं। पीस पार्टी के अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद अयूब ने कहा कि चुनाव में हमारा मुख्य मुद्दा काले धन और प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहाद है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता से मेरी पार्टी का विश्वास जगा है कि हम भ्रष्टाचार से निजात दिला सकेंगे। डॉ. आयूब ने कहा कि हाल ही में डुमरियागंज में हुए विधानसभा उपचुनाव में पीस पार्टी को 26 हजार मत मिले थे। इसके चलते समाजवादी पार्टी चौथे और कांग्रेस पांचवें नम्बर पर खिसक गई थी। 2012 के चुनाव में भी सपा और कांग्रेस की लड़ाई चौथे और पांचवें नम्बर के लिए होगी। उन्होंने कहा कि सपा और कांग्रेस समेत सभी दलों ने मुस्लिमों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया है जबकि प्रदेश में मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत है। हम एक विकल्प के रूप में उभर रहे हैं। पीस पार्टी का फिलहाल सबसे अधिक जनाधार पूर्वी उत्तर प्रदेश में है। यहां इन दिनों पार्टी की रैलियां हो रही हैं और इनमें हजारों लोगों की मौजूदगी से पार्टी के हौसले बुलंद हैं। डॉ. अयूब कहते हैं कि 2012 के चुनाव में मेरी कोशिश रहेगी कि हम असम की ऑल इंडिया डेमोकेटिक फ्रंट की तरह एक विकल्प बन सकें, जिससे कांग्रेस का अल्पसंख्यक और पिछड़ा वोट दूर हो सके।
प्रदेश की राजनीति में पीस पार्टी की धमाकेदार मौजूदगी से सबसे ज्यादा परेशानी कांग्रेस को हो सकती है और राहुल गांधी के मिशन यूपी 2012 के सपने को धक्का लग सकता है।