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Tuesday, 10 December 2024

असम में बीफ खाने पर पाबंदी



पिछले सप्ताह की शुरुआत में असम में रेस्तरां और सामुदायिक समारोहों सहित सार्वजनिक जगहों पर गाय का मीट यानी बीफ खाने पर पाबंदी लगा दी गई है। आलोचकों ने इस कदम को अल्पसंख्यक विरोधी करार दिया है और इसके पीछे असम में हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार का मकसद संप्रदायों के बीच ध्रुवीकरण करना बताया है। भारत में सबसे ज्यादा आबादी कश्मीर के बाद पूर्वोत्तर राज्यों में है। सरमा ने कहा कि अब किसी भी रेस्तरां या होटल में बीफ नहीं परोसा जा सकेगा। सरमा ने कहा कि यह फैसला 2021 के उस कानून को मजबूत करने के लिए किया गया है, जिसे उनकी सरकार असम में मवेशियों के व्यापार को रेगुलेर करने के लिए लेकर आई थी। असम कैटल प्रदर्शन एक्ट 2021, मवेशियों के ट्रांसपोर्ट पर पाबंदी को कड़ा करता है और मवेशियों की बलि के साथ-साथ हिंदू धर्म के केंद्रों के पांच किमी के किसी दायरे में बीफ खरीद बिक्री पर भी प्रतिबंध लगाता है। हम तीन साल पहले इस कानून को लाए थे और अब इसे काफी कारगर पाया गया कहते हैं सरमा/ मुस्लिम हितो का प्रतिनिधित्व करने वाली सिविल सोसायटी संगठनों के साथ-साथ असम में विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री की इस घोषणा की आलोचना की है। वो इसे इस साल 2026 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उठाया गया कदम बता रहे हैं। कांग्रेsस नेता गौरव गोगोई ने कहा कि मुख्यमंत्री झारखंड के भाजपा की अपमानजनक हार के बाद अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं असम कांग्रेस से अध्यक्ष भूपेन वोरा ने कहा कि इस फैसले का मकसद वित्तीय संकट, महंगाई और बेरोजगारी जैसे वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाना है। असम कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा हमारे (कांग्रेस) नेताओं ने कहा कि भाजपा ने हालिया चुनावों में जीतने के लिए अनुचित हथकंडे अपनाए, जिसमें धांधली और अधिकारियों की निक्रियता शामिल है। अब मुख्यमंत्री बैकफुट पर आ गए हैं। उन्होंने कैबिनेट के इस फैसले को आगे बढ़ाने के फैसले के रूप में बीफ का हवाला दिया है। राजनीतिक बयानबाजी को अलग रुख भी दें तो मुसलमानों की करीब 34 फीसदी आबादी (साल 2011 की जनगणना के मुताबिक) असम में बीफ खाने पर पूरी तरह पाबंदी से जुड़े कई अहम पहलू हैं। इसे सबसे ज्यादा राज्य का बंगाली मुस्लिम समुदाय महसूस करता है, मुस्लिम आबादी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्हें अक्सर बाहरी या बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासी बताया जाता है। इसके अलावा ऐसे कदमों में राज्य के संचालन में चलने वाले मदरसों को ध्वस्त करना, बहु विवाह पर प्रतिबंध और लव जिहाद से निपटने के लिए कानून लाने की योजनाएं भी शामिल हैं। बंगाली मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले छात्र संगठन आल असम माइनारिटीज छात्र यूनियन के अध्यक्ष रेजाउल करीम ने प्रतिबंध को अल्पसंख्यक समुदाय को अलग-थलग करने और उन्हें निशाना बनाने की एक और घटना बताया। अगर बीफ खाने वालों की हम बात करें तो ऐसा नहीं कि बहुत से हिन्दू भी बीफ खाते हैं। गोवा राज्य में बीफ खुलेआम खाया जाता है, पूर्वोत्तर के कई राज्यों में बीफ खाने का प्रचलन है। बीफ न खाना एक धार्मिक मुद्दा तो हो सकता है पर किस को क्या खाना-पहनना है यह थोपा नहीं जा सकता। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि भारत से बीफ सबसे ज्यादा निर्यात (एक्सपोर्ट) करने वाली चार सबसे बड़ी कंपनियां हिन्दुओं की हैं। बेशक नाम उन्होंने गुमराह कररने के लिए उर्दू और अरबी टाइप के रखे हुए हैं। खाना-पीना यह व्यक्तिगत फैसला है जिसे कानून से लागू करना ठीक नहीं है।

Saturday, 7 December 2024

सुखबीर बादल पर जानलेवा हमला

श्री अकाल तख्त साहिब में तनखैया घोषित हो चुके सुखबीर बादल और उनकी तत्कालीन कैबिनेट में रहे मंत्रियों को धार्मिक सजा सुनाते हुए श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदारों ने बड़ा ऐलान किया है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और दिवंगत नेता प्रकाश सिंह बादल को दिया गया। फक्र-ए-कौम सम्मान वापस लेने का ऐलान किया है। इसके साथ ही उनके बेटे सुखबीर बादल को भी धार्मिक सजा सुनाई गई। दरअसल, ये मामला गुरमीत सिंह राम रहीम से जुड़ा हुआ है। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी रघुबीर सिंह ने कहा कि यह शर्म की बात है कि श्री अकाल तख्त साहिब से बनी पार्टी मुद्दों से हटकर बात करने लगी है। दरअसल जिस वक्त पंजाब में गुरू ग्रंथ साहिब की बेअदबियों के मामले हुए उस दौरान पंजाब के सीएम प्रकाश सिंह बादल थे। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी रघुबीर सिंह ने कहा, सुखबीर सिंह बादल ने अपराध कबूल कर लिया है कि उन्होंने जत्थेदार साहिबों को अपने आवास पर बुलाया और गुरमीत राम रहीम को माफी के लिए दबाव डाला। इस काम में दिवंगत मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल भी शामिल थे। सुखबीर सिंह बादल सहित कोर कमेटी मेंबर और साल 2015 में कैबिनेट रहे नेता 3 दिसम्बर को 12 बजे से लेकर 1 बजे तक बाथरूम साफ करेंगे। इसके बाद वो नहाकर लंगर घर में सेवा करेंगे। बाद में श्री सुखमणि साहिब का पाठ होगा। सुखबीर सिंह बादल दरबार साहिब के बाहर बरछा लेकर बैठेंगे। उन्हें गले में तनखैया घोषित किए जाने की तख्ती पहननी होगी। इसी दौरान जब सुखबीर सिंह बादल दरबार साहिब के बाहर बरछा लेकर बैठे थे तभी उनपर एक जानलेवा हमला हुआ। बुधवार सुबह खालिस्तान समर्थक आतंकी ने सुखबीर को जान से मारने का प्रयास किया। सादी वर्दी में तैनात पुलिस के एएसआई की सतर्कता से वह सुरक्षित बच गए। एएसआई जसबीर सिंह ने आतंकी का हाथ पकड़ कर पिस्तौल ऊपर उठा दी। जिससे गोली दीवार पर लगी और कोई हताहत नहीं हुआ। पुलिसकर्मियों ने आतंकी नारायण सिंह चौड़ा को मौके पर ही दबोच लिया। इस बीच सीएम भगवंत मान ने बादल पर हमले की जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने डीजीपी से रिपोर्ट भी तलब की है। कट्टरपंथी संगठन दल खालसा से जुड़ा चौड़ा गुरदासपुर के डेरा बाबा नानक का रहने वाला है। बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआई) और खालसा लिबरेशन फोर्स (केएलएफ) से भी उसके संबंध रहे हैं। बेअदबी के आरोप में अकाल तख्स से मिली सजा के तौर पर दूसरे दिन सुबह नौ बजे शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल स्वर्ण मंदिर के द्वार पर व्हीलचेयर पर बैठकर पहरा दे रहे थे। आतंकी चौड़ा काफी घंटे से इधर-उधर घूम रहा था। करीब 9.30 बजे मौका पाकर वह सुखबीर के सामने आ गया और पाकेट से पिस्तौल निकाल ली। इससे पहले कि वह गोली चलाता एएसआई जसबीर ने उसे पकड़ लिया। इस दौरान हुई हाथापाई में चौड़ा ने गोली चलाई, जो दीवार पर जा लगी। बादल को जेड प्लस सुरक्षा मिली है। इस हमले के पीछे प्राथमिक जांच के दौरान पुलिस को बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआई) और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े इनपुट मिले हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अलगाववाद के मंसूबे को बढ़ावा देने के लिए सुखबीर पर यह हमला हुआ है, ताकि प्रदेश की न केवल शांति भंग की जा सके। बल्कि हमले के जरिए कट्टरपंथी खालिस्तानी और अलगाववादी विचारधारा को हावी दिखाया जा सके। -अनिल नरेन्द्र

बैलेट पेपर से चुनाव कराने का प्रयास

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के मालशिरस विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीणों का एक समूह मतपत्रों से पुनर्मतदान कराने पर जोर दे रहा था, लेकिन पुलिस-प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने मंगलवार को अपनी योजना रद्द कर दी। इस सीट से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चन्द्र पवार), राकांपा-एसपी के विजयी उम्मीदवार ने यह सनसनीखेज जानकारी दी। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उन्होंने ग्रामीणों को चेतावनी दी कि अगर वे मतदान की अपनी योजना पर आगे बढ़े तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इससे पहले, सोलापुर जिले के मालशिरस क्षेत्र के मरकड़वाड़ी गांव के निवासियों ने बैनर लगाकर दावा किया था कि तीन दिसम्बर को पुनर्मतदान कराया जाएगा। इसके लिए उन्होंने बाकायदा मतपत्र भी छपवाए थे और वे चाहते थे कि मतपत्र से पुनर्मतदान कराया जाए। ताकि ईवीएम के परिणामों से उनको मिलाया जा सके। यह गांव मालशिरस विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यहां से राकांपा उम्मीदवार उत्तम जानकार ने भाजपा के राम सतपुते को 13,147 मतों से हराया था। चुनाव के नतीजे 23 नवम्बर को घोषित किए गए थे और इस सीट से जानकार विजयी रही। आमतौर पर हारने वाले उम्मीदवार ही ईवीएम के परिणाम को चुनौती देता है। यहां तो जीते हुए उम्मीदवार के वोटरों ने ही ईवीएम परिणाम को चुनौती दे डाली? मरकड़वाड़ी निवासियों ने दावा किया कि उनके गांव में जानकर को सतपुते के मुकाबले कम वोट मिले, जो संभव नहीं था। स्थानीय लोगों ने ईवीएम पर संदेह जताया। एक अधिकारी ने बताया कि मालशिरस उपमंडल अधिकारी (एसडीएम) ने कुछ स्थानीय लोगों की पुनर्मतदान की योजना के कारण किसी भी संघर्ष या कानून-व्यवस्था सबकी स्थिति से बचने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 (जो पहले 144 होती थी) के तहत दो से पांच दिसम्बर तक क्षेत्र में निषेधाज्ञा लागू कर दी। गांव में मंगलवार सुबह अत्याधिक संख्या में पुलिस कर्मियों को तैनात किया गया, क्योंकि कुछ ग्रामीणों ने मतपत्रों से पुनर्मतदान के लिए इंतजाम किए थे। डीएसपी नारायण शिरगावकर ने कहा कि हमने ग्रामीणों को कानूनी प्रक्रिया समझाई और चेतावनी भी दी ]िक अगर एक भी वोट डाला गया तो मामला दर्ज हो जाएगा। जानकार ने बताया कि पुलिस प्रशासन के रुख को देखते हुए ग्रामीणों ने मतदान प्रक्रिया रोकने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा, हालांकि हम अन्य तरीके से अपना विरोध जारी रखेंगे। हम सब मुद्दे को निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका जैसे विभिन्न अधिकारियों के समक्ष ले जाने का प्रयास करेंगे और जब तक हमें न्याय नहीं मिल जाता, हम नहीं रुकेंगे। इससे पूर्व स्थानीय निवासी रंजीत ने दावा किया कि मतदान के दिन गांव में 2000 मतदाता थे और उनमें से 1900 ने मताधिकार का इस्तेमाल किया। गांव ने पहले भी हमेशा जानकर का समर्थन किया है, लेकिन इस बार ईवीएम के जरिए हुई मतगणना के अनुसार जानकर को 843 वोट मिले, जबकि भाजपा के महायुते को 1003 वोट मिले। यह संभव नहीं है और हमें ईवीएम के इन आंकड़ों पर भरोसा नहीं है, इसलिए हमने मतपत्रों के जरिए पुनर्मतदान कराने का फैसला किया ताकि ईवीएम की धांधली का भांडा फोड़ सकें। खबर है कि महाराष्ट्र के अन्य गांवों में भी ऐसी वोटिंग की योजनाएं चल रही हैं। इससे पता चलता है ईवीएम की विश्वसनीयता का।

Thursday, 5 December 2024

महाराष्ट्र में ईवीएम पर बढ़ता बवाल

महाराष्ट्र में ईवीएम मशीनों और उनके द्वारा निकले विधानसभा चुनाव में नतीजों पर बवाल बढ़ता ही जा रहा है। अब तो महाराष्ट्र में कई स्थानों पर जनता, उम्मीदवार सड़कों पर उतर आए हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पाटी (एसपी) प्रमुख शरद पवार ने आरोप लगाया है कि महाराष्ट्र में पूरे चुनावी तंत्र को नियंत्रित करने के लिए सत्ता और धन का दुरुपयोग जो हुआ है वह पहले कभी किसी विधानसभा या राष्ट्रीय चुनाव में नहीं देखा गया। पवार ने यह बयान 90 वर्ष से ऊपर की आयु के समाजसेवी बाबा आढ़ाव से मुलाकात के दौरान दिया। बाबा आढ़ाव महाराष्ट्र में हाल में हुए विधानसभा चुनाव में कfिथत रूप से ईवीएम के दुरुपयोग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। आढ़ाव (90) ने गुरुवार को समाज सुधारक ज्योतिबा फुले के पुणे स्थित निवास फुले वाडा में अपना तीन दिवसीय प्रदर्शन किया। शरद पवार ने कहा कि देश में हाल में चुनाव हुए हैं और लोगों में उन्हें लेकर बेचैनी है। उन्होंने कहा कि बाबा आढ़ाव का आंदोलन इसी बेचैनी का प्रतिनिधित्व करता है। लोगों में यह सुगबुगाहट है कि महाराष्ट्र में हाल में हुए चुनाव में सत्ता का दुरुपयोग और बड़ी मात्रा में धन का इस्तेमाल हुआ है जो पहले कभी नहीं देखा गया। स्थानीय स्तर के चुनावों में ऐसी बातें सुनने को मिलती रहीं पर धन की मदद से पूरे चुनावी तंत्र पर कब्जा और सत्ता का दुरुपयोग पहले कभी नहीं देखा। पवार ने कहा कि लोग दिवंगत समाजवादी विचारक जयप्रकाश नारायण को याद कर रहे हैं और उन्हें लगता है कि किसी को आगे आकर कदम उठाना चाहिए। कदम उठा भी लिया गया है। महाराष्ट्र में हार का सामना करने वाले महाविकास अघाड़ी (एमवीए) के उम्मीदवारों ने अपने क्षेत्रों में ईवीएम और वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपेट) इकाइयों में सत्यापन की मांग करने का फैसला ले लिया है। कई हारे हुए उम्मीदवारों ने सुप्रीम कोर्ट के ईवीएम सत्यापन के फैसले पर चुनाव आयोग में ईवीएम की कंट्रोल यूनिट पर पुन गिनती कराने की अपनी याचिका दायर भी कर दी है। सोशल मीडिया में दावा किया जा रहा है कि दर्जनों हारे हुए उम्मीदवार ने पुन गिनती की फीस भी जमा कर दी है। अकेले बारामति के हारे उम्मीदवार पवार के भतीजे ने भी 9 लाख रुपए फीस जमाकर दी है। महाराष्ट्र में कई और अन्य दर्जनों उम्मीदवारों ने भी ऐसा ही किया है। लोकतंत्र में शिकायतों का सत्यापन होना जरूरी है और चुनाव आयोग को इसमें पूरा सहयोग करना चाहिए न कि खानापूर्ति करके छुटकारा पाने की कोशिश करनी चाहिए। मुंबई के शिव सेना (यूबीटी) के एक विधायक ने दावा किया कि डाले गए वोट और ईवीएम में गिने गए वोट की संख्या में विसंगतियां हैं। विधायक ने कहा, लगभग सभी उम्मीदवारों ने ईवीएम की कार्यप्रणाली पर संदेह जताया है। मराठी के एक समाचार पत्र ने 95 विधानसभा क्षेत्रों की एक सूची बकायदा छापी है जहां पर चुनावी धांधली के आरोप लग रहे हैं। वोटों की मिसमैच के आरोप लग रहे हैं। चुनाव आयोग ने इन आरोपों से इंकार किया है और कहा है कि आयोग हर सवाल का जवाब देगा। देखें, आगे क्या होता है। -अनिल नरेन्द्र

क्या कांग्रेस कठोर निर्णय लेने में सक्षम है?

पहले हरियाणा अब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस ने इसकी वजहों पर हर बार हार के बाद मंथन किया और माना कि आपसी कलह, संगठन की कमजोरी के साथ-साथ किसी की जवाबदेही स्पष्ट न होने से पार्टी की यह दुर्गति हुई है। साथ ही, ईवीएम पर संदेह का मुद्दा भी उठाया। कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में प्रस्ताव पारित कर आरोप लगाया गया कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संवैधानिक जनादेश है। पर चुनाव आयोग की पक्षपाती कार्यप्रणाली से गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि समाज के कई वर्गों में निराशा व आशंकाएं बढ़ रही हैं। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने दो टूक कहा कि अब पुराना ढर्रा नहीं चलने वाला है। पार्टी नेताओं को बिना सोचे-समझे एक-दूसरे पर टीका-टिप्पणी करने से बाज आना होगा। खरगे ने कहा, हमें तुरंत चुनावी नतीजों से सबक लेते हुए संगठन के स्तर पर अपनी कमजोरियों और खामियों को दुरुस्त करने की जरूरत है। ये नतीजे हमारे लिए स्पष्ट संदेश हैं। खरगे ने लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन से कांग्रेस के पक्ष में बने माहौल के बावजूद हरियाणा व महाराष्ट्र में हार को आश्चर्यजनक बताया। कहा सिर्फ छह महीने पहले जो नतीजे आए थे, उसके बाद ऐसे नतीजे? क्या कारण है कि हम माहौल का फायदा उठा नहीं पाते? मल्लिकार्जुन हfिरयाणा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान से बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं। अगर वे सही मायने में कांग्रेस संगठन को मजबूत करना चाहते हैं। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और खुद मल्लिकार्जुन बेशक माहौल तैयार करें पर उसका फायदा तभी होगा जब कांग्रेस का संगठन इस हवा को कैश कर सकेगा। कटु सत्य तो यह है कि इन तीन नेताओं को छोड़कर बाकी कांग्रेसी अब मेहनत करने के आदी नहीं रहे, जमीन पर उतरने को तैयार नहीं हैं। जनता की भावनाओं से कट चुके हैं। हाई कमान के करीबी लोग अनचाहे टिकटों का बंटवारा करते हैं, यह भी कहा जाता है कि टिकटों की सेल भी होती है। पार्टी को इससे छुटकारा पाना होगा। वह संगठन मंत्री ही क्या जो आज तक जिला अध्यक्ष, ब्लाक अध्यक्ष, बूथ अध्यक्ष तक नहीं बना सके? छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हार को करीब छह महीने बीत चुके हैं पर, पार्टी अभी तक इन राज्यों में जवाबदेही तय करते हुए बदलाव नहीं कर पाई हैं। दोनें राज्यों में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अपने पदों पर अभी भी बरकरार हैं। हिमाचल प्रदेश और ओडिशा में पार्टी प्रदेश कार्यकारिणी को भंग कर चुकी है पर काफी कोशिशों के बावजूद नए अध्यक्ष के नाम पर प्रदेश कांग्रेस के दोनों गुटों में सहमति नहीं बन पा रही है। ऐसे में पार्टी जवाबदेही तय करने की हिम्मत जुटाती है, तो उसे पार्टी के अंदर काफी विरोध का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि, प्रदेश क्षत्रप बदलाव के लिए तैयार नहीं है। महाराष्ट्र में भी पार्टी को नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की नियुfिक्त करते हुए प्रदेश प्रभारी को भी बदलना होगा। प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले और प्रदेश प्रभारी रमेश दोनों के खिलाफ अंदर-अंदर नाराजगी है। हरियाणा चुनाव परिणाम को दो महीने से ज्यादा समय हो चुका है पर पार्टी ने अभी तक हार से कोई सबक नहीं लिया है। आपसी गुटबाजी की वजह से पार्टी विधानसभा में नेता विपक्ष तक इतने दिनों के बाद भी तय नहीं कर पाई। कांग्रेस का ऊपर से नीचे तक ओवर हॉल करना होगा पर सवाल है कि क्या मल्लिकार्जुन ऐसा कर कर सकते हैं।

Tuesday, 3 December 2024

क्या इजरायल और हिजबुल्ला जंग थमी है



7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर आतंकी हमले के चलते पूरे पश्चिम एशिया में अराजकता फैलाने के बाद करीब 14 महीने (418 दिन) के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की पहल पर इजरायल और हिजबुल्ला के बीच सीजफायर यानि युद्ध विराम की घोषणा हुई है। इजरायल-हमास ने युद्ध शुरू होने के बाद से ही उत्तरी सीमा पर हमला करना शुरू किया था। अमेरिका और फ्रांस के संयुक्त बयान में कहा गया कि इस समझौते से लेबनान में जारी जंग रूकेगी और इजरायल पर भी हिजबुल्ला और अन्य आतंकी संगठनों के हमले का खतरा बढ़ जाएगा। युद्ध विराम की कोशिशें आखिर रंग लाई और दुनिया ने चैन की सांस ली। हालांकि यह युद्ध विराम कितना प्रभावी होगा इस पर प्रश्न चिह्न लग रहे हैं। वैसे तो युद्ध विराम के प्रयास कई महीने से चल रहे थे पर नेतन्याहू मान नहीं रहे थे। अब जब हिजबुल्ला ने इजरायल के होश ठिकाने लगा दिए हैं इसलिए नेतन्याहू युद्ध विराम करने पर मजबूर हो गए हैं। दरअसल इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 26 नवम्बर को कहा कि वह तीन कारणों और शर्तों पर युद्ध विराम पर सहमत हुए हैं। पहला कारण बताया कि इजरायली सैन्य बलों को हिजबुल्ला से दूर रखने और ईरान के बढ़ते खतरे पर फोकस करने की जरूरत थी। दूसरा इजरायल के सैन्य अभियानों में रसद संबंधी चुनौतियों विशेष रूप से हथियार और युद्ध सामग्री प्राप्त करने में देरी को स्वीकारा है यानि के इजरायल के पास हथियार और युद्ध सामग्री लगभग समाप्त हो गई है और फिर से सप्लाई को पूरा करने के लिए समय चाहिए। तीसरा कारण उन्होंने बताया कि युद्ध के मैदान से हिजबुल्ला को किनारे कर हमास को अलग-थलग करना। साधारण शब्दों में कहा जाए तो हिजबुल्ला ने इजरायल को ठिकाने लगा दिया है और अपने असित्व को बचाने के लिए घुटने टिकवा दिए हैं। उधर लेबनान में हिजबुल्ला के प्रमुख नईम कासिम ने इस समझौते को हिजबुल्ला की महान जीत बताया और लेबनान के लोगों के धर्म की तारीफ की। हिजबुल्ला के साथ इजरायल की पिछली लड़ाई 2006 में हुई थी जिसमें इजरायल को मुंह की खानी पड़ी थी। उन्होंने कहा हम जीते क्योंकि दुश्मन को हिजबुल्ला को नष्ट करने से रोक दिया। हम जीते क्योंकि रेजिस्टेंस को खत्म करने या पंगु करने से रोक दिया। फिलस्तीन के लिए हमारा समर्थन रूकेगा नहीं। हमने बार-बार कहा है कि हम युद्ध नहीं चाहते हैं लेकिन हम गाजा का समर्थन करना चाहते हैं और अगर इजरायल जंग थोपता है तो हम इसके लिए तैयार हैं। लेबनान का कहना है कि अक्टूबर 2023 से लेकर अब तक 3961 लेबनानी नागरिक मारे गए हैं जिनमें अधिकांश संख्या हाल के सप्ताहों की है। इजरायल की ओर से जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक हिजबुल्ला के साथ हुए संघर्ष में उसके 82 सैनिक और 47 नागरिक मारे गए हैं। उधर इजरायली सेना ने बृहस्पतिवार को कहा कि उसके लड़ाकू विमानों ने एक राकेट भंडारण इकाई पर हिजबुल्ला की गतिविधि का पता लगने के बाद दक्षिणी लेबनान पर गोलीबारी की। यह इजरायल और हिजबुल्ला के बीच संघर्ष विराम लागू होने के एक दिन बाद पहला इजरायली हमला था। इससे प्रश्न यह उठ रहा है कि इजरायल और हिजबुल्ला के बीच जंग जारी है? वैसे अब युद्ध विराम का स्वागत किया जाना चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि यह सिलसिला आगे बढ़े और हमास व इजरायल के बीच भी युद्ध विराम हो और यह युद्ध थमे।

-अनिल नरेन्द्र

महाराष्ट्र में सरकार गठन में फंसा पेंच



महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आए हुए लगभग 10 दिन हो चुके हैं। 23 नवम्बर को नतीजे आए थे और 25 नवम्बर तक सरकार का गठन होना जरूरी था। अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे अनुसार राष्ट्रपति शासन लग सकता था। पर इतने दिन बीतने के बाद महायुति गठबंधन न तो सरकार बनाने का दावा पेश कर सका है और न ही इस संपादकीय लिखने तक यह तय कर सका है कि महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? संभव है कि आगामी एक दो दिन में यह तय हो जाए। पेंच कहां फंसा है? महाराष्ट्र में सरकार गठन से पहले महायुति में मुख्यमंत्री पद और विभागों के बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाई है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के आवास पर बृहस्पतिवार देर रात तीन घंटे चली बैठक में भी कोई फैसला नहीं हो पाया। सारा पेंच एकनाथ शिंदे का फंसा हुआ है। शिंदे समर्थक कहते हैं कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में लड़ा गया था इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री पद मिलना चाहिए। वहीं भाजपा नेताओं का मानना है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है तो मुख्यमंत्री उसका ही होना चाहिए। कायदे से यह बात भी ठीक है। सबसे बड़ी पार्टी का ही मुख्यमंत्री होना चाहिए। पर यह भी सही है कि विधानसभा चुनाव में एकनाथ शिंदे ने कड़ी मेहनत की है, उनकी कई योजनाएं रंग लाई हैं, उनके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा गया था तो मुख्यमंत्री पद पर उनका ही हक बनता है। पर भाजपा इसके लिए तैयार नहीं है। एकनाथ शिंदे नाराज होकर अपने गांव सतारा चले गए थे और कोपभाजन में जाकर बैठ गए थे। इधर भाजपा में भी किसको मुख्यमंत्री बनाना है इस पर भी असमंजस की स्थिति है। एक वर्ग देवेन्द्र फडणवीस को बनाना चाहता है, और फडणवीस को कहा जा रहा है कि संघ का भी समर्थन है। पर भाजपा के अंदर एक तबका इसका विरोध कर रहा है कि एक ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाया तो ओबीसी और खासकर मराठा मतदाता नाराज हो जाएगा। सामाजिक समीकरण भी देखने होंगे। इसलिए किसी अन्य मराठा नेता की तलाश की जा रही है। पर भाजपा नेतृत्व की गले की फांस बने हुए हैं एकनाथ शिंदे। शिंदे को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं करना चाहता भाजपा नेतृत्व। उसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला कि पिछले ढाई साल से एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र की कमान संभाली हुई है। उनके पास कई ऐसी जानकारियां होंगी जिनके उभरने से नेतृत्व को नुकसान हो सकता है। अगर शिंदे के खिलाफ नेतृत्व के पास फाइल तैयार है तो शिंदे के पास भी सारे कारनामों की फाइल तैयार होगी। इसके अलावा हमें यह नहीं भुलना चाहिए कि केंद्र में शिवसेना (शिंदे गुट) के सात सांसद हैं जो भाजपा सरकार का समर्थन कर रहे हैं। कहीं इस विवाद में वह अपना समर्थन वापस न ले लें और केंद्रीय सरकार अस्थिर हो जाए। कुल मिलाकर हमें लगता है कि तुरुप के पत्ते एकनाथ शिंदे के हाथों में हैं। देखें, अब ऊंट किस करवट बैठता है।