Tuesday, 20 January 2026

चाबहार पर भारत के पीछे हटने की अटकलें

ईंरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रातिशत टैरिफ लगाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद से ही यह सवाल बना हुआ था कि भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा? ईंरान से भारत का व्यापार अमेरिकी प्रातिबंधों के कारण बेशक बड़ा नहीं है लेकिन ईंरान रणनीतिक रूप से भारत के लिए काफी अहम है। ईंरान के दक्षिणी तट पर सिस्तानब्लू िचस्तान प्रांत में स्थित चाबहार बंदरगाह इसी रणनीति का अहम हिस्सा है। इसे भारत और ईंरान मिलकर विकसित कर रहे थे ताकि भारत को मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक सीधे पहुंच मिल सके। चाबहार भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि इसके जरिए वह पाकिस्तान को बाइपास करते हुए मध्य एशिया पहुंच सकता है। लेकिन अमेरिका के अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा के बाद से भारत के चाबहार पोर्ट से बाहर होने की खबरें जोर पकड़ने लगी हैं। इन खबरों और अटकलों को देखते हुए भारत सरकार ने बीते शुव््रावार को जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रावक्ता रणधीर जायसवाल ने शुव््रावार को कहा, जैसा कि आप जानते हैं 28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी वित्त विभाग ने एक पत्र जारी किया था जिसमें 26 अप्रौल 2026 तक वैध सशर्त प्रातिबंध छूट के दिशा-निर्देश दिए गए थे। हम इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिकी पक्ष के साथ सपर्व में हैं। ईंरान के साथ हमारा संबंध लंबे समय से चला आ रहा है। हम घटनाव््राम पर करीबी नजर रखे हुए हैं और इस साझेदारी को आगे बढ़ाएंगे।

पिछले वर्ष भारत और ईंरान के साथ व्यापार 1.6 अरब डॉलर का था।

ईंरान, भारत के वुल व्यापार का 0.15 प्रातिशत हिस्सा है। दरअसल, चाबहार को लेकर इन अटकलों को हवा मिली इकनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट से। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत ने चाबहार परियोजना से खुद को रणनीतिक रूप से पीछे करना शुरू कर दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अपने तय निवेश की राशि पहले ही ईंरान को ट्रांसफर कर दी है और इस परियोजना का संचालन करने वाली सरकारी वंपनी इंडिया पोट्र्स ग्लोबल लिमिटेड ने औपचारिक रूप से दूरी बना ली है ताकि भविष्य में किसी भी अमेरिकी प्रातिबंध से बचा जा सके। विपक्षी पार्टियां, वरिष्ठ पत्रकार और यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार भी अमेरिका को लेकर भारत की नीति पर सवाल उठा रहे हैं। इनका दावा है कि भारत बार-बार अमेरिका को नाराज न करने के दबाव में झुक रहा है और अपने बड़े हितो को नुकसान पहुंचा रहा है। कांग्रोस के प्रावक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया एक्स पर सवाल किया है कि भारत आखिर कब तक अमेरिका के दबाव में पैसला लेता रहेगा? उन्होंने लिखा— असल मुद्दा केवल चाबहार या रूस के तेल का नहीं है। असली सवाल यह है कि मोदी अमेरिका को भारत पर दबाव डालने क्यों दे रहे हैं? सामरिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. ब्रrा चेलानी ने एक्स पर लिखा : 2019 में जब अमेरिका ने ईंरान के तेल पर प्रातिबंध लगाए तो भारत ने अचानक ईंरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। इससे भारत और ईंरान के बीच चला आ रहा ऊर्जा संबंध लगभग खत्म हो गया और इसका सीधा फायदा चीन को मिला। चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट जिसे चीन चला रहा है उसके मुकाबले भारत का एक रणनीतिक जवाब माना जाता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ईंरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए बेहद अहम ट्रेड हब है। इस पोर्ट को विकसित करने में हमने 47000 करोड़ रुपए का निवेश किया हुआ है।

चाबहार भारत के पाकिस्तान को बाइपास कर अफगानिस्तान और सैंट्रल एशिया पहुंचाने में मदद करता है। ईंरान को लेकर फिलहाल ट्रंप का रवैया कभी हां, कभी ना वाला रहा है। फिलहाल वूटनीतिक पहल कर भारत अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर अपनी बात मनवा सकता है, ऐसी आशा हम करते हैं। भारत अपने हितों को ऊपर रखे और किसी भी बाहरी दबाव में न आए।

——अनिल नरेन्द्र 

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