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Thursday, 14 November 2024

मैं व्यवसाय नहीं, एकाधिकार के खिलाफ हूं

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने हाल में भारत के कई बड़े समाचार पत्रों में एक लेख लिखा था जो विवादों में आ गया है। जहां कुछ लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं और गलत तथ्यों का दावा कर रहे हैं वहीं ऐसे लोगों की कमी नहीं जो इसकी तारीफ कर रहे हैं। आखिर इस लेख में राहुल गांधी ने लिखा क्या था? राहुल ने कहा कि वह व्यवसायों के नहीं, बल्कि एकाधिकार के खिलाफ हैं। उन्होंने अपने एक लेख का हवाला देते हुए यह दावा भी किया कि नियम-कायदे के अनुसार काम करने वाले कुछ कारोबारी समूहों को केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार के कार्यक्रमों की तारीफ करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। उनके इस दावे पर सरकार की तरफ से फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाने के लिए बुधवार को राहुल गांधी की आलोचना की थी और उनसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की जांच करने की सलाह दी थी। राहुल गांधी ने गुरुवार को एक वीडियो जारी कर कहा, भाजपा के लोगों द्वारा मुझे व्यवसाय विरोधी बताने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन मैं व्यवसाय विरोधी नहीं हूं बल्कि एकाधिकार के खिलाफ हूं। उनका कहना है कि वह एक-दो-तीन या पांच लोगों द्वारा उद्योग जगत में एकाधिकार स्थापित करने के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा, मैंने अपने करियर की शुरुआत प्रबंधक सलाहाकार के रूप में की थी। मैं कारोबार को समझता हूं और उनके लिए जरूरी चीजों को भी जानता हूं। इसलिए स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि मैं व्यवसाय विरोधी नहीं हूं, एकाधिकार विरोधी हूं। राहुल गांधी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, मैं नौकरियों के सृजन का समर्थक हूं, व्यवसाय का समर्थक हूं, नवोन्मेष का समर्थक हूं, प्रतिस्पर्धा का समर्थक हूं। मैं एकाधिकार विरोधी हूं। हमारी अर्थव्यवस्था तभी फूलेगी-फलेगी जब सभी व्यवसायों के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष स्थान होगा। बाद में उन्होंने एक अन्य पोस्ट में दावा किया कि मेरे लेख के बाद नियम-कायदे से चलने वाले व्यवसायिक समूहों ने मुझे बताया कि एक वरिष्ठ मंत्री फोन पर कह रहे हैं और उन्हें प्रधानमंत्री मोदी और सरकार के कार्यक्रमों के बारे में सोशल मीडिया पर अपनी बातें कहने के लिए मजबूर कर रहे हैं। राहुल गांधी ने कहा कि इससे उनकी बात बिलकुल सही साबित होती है, कांग्रेस नेता ने बुधवार को एक लेख में दावा किया था कि ईस्ट इंडिया कंपनी भले ही सैकड़ों साल पहले खत्म हो गई है, लेकिन उसने जो डर पैदा किया था वह आज फिर से दिखाई देने लगा है और एकाधिकारवादियों की एक नई पीढ़ी ने उसकी जगह ले ली है। उनका कहना है कि वह एक-दो, तीन या पांच लोगों द्वारा उद्योग जगत में एकाधिकार स्थापित करने के खिलाफ हैं। गांधी ने अपने लेख में कहा कि भारत माता अपने सभी बच्चों की मां है। उनके संसाधनों और सत्ता पर कुछ लोगों का एकाधिकार भारत मां को चोट पहुंचाता है। मैं जानता हूं कि भारत के सैकड़ों प्रतिभाशाली कारोबारी हैं पर वह एकाधिकारवादियों से डरते हैं। -अनिल नरेन्द्र

चुनाव नतीजे तय करेंगे कि असली कौन है और नकली कौन है

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार अब धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंचता जा रहा है। 20 नवम्बर को वोट पड़ेंगे और 23 नवम्बर को पता चलेगा कि सरकार महायुति बनाने जा रही है या महाविकास अघाड़ी जीतेगी। विधानसभा के इस चुनाव में दोनों गठबंधन आमने-सामने हैं। महाविकास अघाड़ी (एमवीए) और महायुति गठबंधन जीत के लिए प्रचार में पूरी ताकत झोंक रहे हैं। जहां दोनों गठबंधनों के बीच कांटे की लड़ाई है वहीं कई छोटी लड़ाइयां गठबंधन के अंदर भी लड़ी जा रही हैं। जैसे असली शिव सेना कौन-सी है, असली एनसीपी कौन-सी है? विधानसभा चुनाव परिणाम दोनों गठबंधनों की हार-जीत के साथ यह भी तय करेंगे कि शिवसेना का कौन सा धड़ा मुंबई में ज्यादा असर पर है। बता दें मुंबई अविभाजित शिवसेना का गढ़ रही है। अभी मुंबई विधानसभा की 36 सीट हैं। वर्ष 2019 में भाजपा अविभाजित शिवसेना एक साथ थे और इस चुनाव में दोनों ने 30 सीट पर जीत दर्ज की थी। इन चुनाव में स्थिति अलग है। शिवसेना (शिंदे) महायुति में शामिल हैं, जबकि शिवसेना (यूबीटी) एमवीए का हिस्सा है। एमवीए के घटक दलों में मुंबई सीट को लेकर काफी तकरार भी हुई। वर्ष 2019 में कांग्रेस ने 36 में से 30 सीट पर चुनाव लड़ा था। इस बार इसके हिस्से सिर्फ 11 सीट आई हैं। वहीं शिवसेना (यूबीटी) 22 सीट पर चुनाव लड़ रही है, बाकी तीन सीट पर दूसरे घटक दल हैं। वहीं महायुति में शामिल एकनाथ शिंदे की अध्यक्षता वाली शिवसेना 16, भाजपा 18 और अजित पवार की एनसीपी सिर्फ दो सीट पर चुनाव मैदान में है। वर्ष 2019 विधानसभा चुनाव में अविभाजित शिवसेना ने भाजपा के साथ गठबंधन में मुंबई में 19 पर चुनाव लड़कर 14 सीट जीती थी। मुंबई की 36 सीट चुनाव के हार जीत में बेहद अहम भूमिका निभाएगी क्योंकि, मुंबई के मतदाता तय करेंगे कि विभाजित के बाद असल शिवसेना कौन है? विधानसभा में शिवसेना के दोनों धड़े 49 सीट पर एक-दूसरे के आमने-सामने लड़ रहे हैं। मुंबई की 14 सीट पर एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे की अध्यक्षता वाली शिवेसेना आमने-सामने है। प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि एमवीए एकजुट है। पिछले ढाई वर्षों में विभाजित हुए शिवसेना के दोनों गुटों के बीच कौन शिवसेना का असली सेनापति होगा यह तय होगा। शिव सेना के दोनों गुट 49 सीटों और राकंपा के दोनों गुट 38 सीटों पर एक-दूसरे के सामने मैदान में हैं। ये 87 सीटें भी भविष्य में उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे, शरद पवार और अजित पवार का वर्चस्व तय करेंगी। 49 सीटों पर सीधा मुकाबला एकनाथ शिंदे व उद्धव ठाकरे की शिवसेना के बीच और 38 सीटों पर सीधा मुकाबला शरद पवार और अजित पवार की राकंपा के बीच हो रहा है। जहां यह चुनाव परिणाम यह तय करेंगे कि असली शिवसेना कौन-सी है वहीं यह भी तय होगा कि असली एनसीपी कौन-सी है? शरद पवार का 38 सीटों पर मुकाबला उनके भतीजे अजित पवार से हो रहा है। इसमें ज्यादातर सीटें पश्चिम महाराष्ट्र बेल्ट की है। इनमें से एक सीट बारामती सीट है जहां अजित पवार का मुकाबला भतीजे युगेन्द्र पवार से हो रहा है।

Tuesday, 12 November 2024

क्या राष्ट्रपति रहते भी जेल का खतरा बना रहेगा?



अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं। कई हफ्तों के चुनावी अभियान और कड़ी टक्कर के बाद रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव जीत लिया है। ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति कार्यालय पहुंचने वाले ऐसे पहले राष्ट्रपति बनेंगे जिनके खिलाफ कई आपराधिक मामलों में फैसला आना अभी बाकी है। चूंकि ट्रंप के खिलाफ कई कानूनी मामले दर्ज होने के बावजूद वह एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति कार्यालय में पहुंचने के लिए तैयार हैं। इसके चलते वहां अनसुलझी स्थिति पैदा हो गई है। जब ट्रंप व्हाइट हाउस पहुंचेंगे तो उनके सामने चार चुनौतियां होंगी। इनमें हर स्थिति के साथ क्या हो सकता है, उसे समझने का प्रयास करते हैं। डोनाल्ड ट्रंप को न्यूयॉर्क में 34 गंभीर मामलों में दोषी ठहराया जा चुका है। यह मामला व्यापार से जुड़े रिकार्ड्स में हेराफेरी करने से जुड़ा है। मई महीने में न्यूयॉर्क की एक ज्यूरी ने ट्रंप को दोषी पाया था। यह मामला पोर्न फिल्म स्टार को चुपचाप भुगतान किए जाने से जुड़ा था। ज्यूरी के मुताबिक ट्रंप इस भुगतान प्रक्रिया में शामिल थे। जज जुआन मर्चेंट ने ट्रंप की सजा को सितम्ब से 26 नवम्बर तक (अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद) के लिए टाल दिया था। बुकलेन के भूतपूर्व अतियोजनक जूलिया रेडलोन ने कहा कि ट्रंप के चुनाव जीतने के बावजूद जज मर्चेंट अपनी योजना के अनुसार सजा को आगे बढ़ा सकते हैं। कानूनी जानकार मानते हैं कि ऐसी संभावनाएं बेहद कम हैं कि ट्रंप को पहली बार उम्रदराज अपराधी के तौर पर सजा सुनाई जाएगी। सुश्री रेंडलमेन कहती हैं कि यदि ऐसा होता है तो ट्रंप के वकील तुरन्त सजा के खिलाफ अपील कर सकते हैं कि यदि ट्रंप को जेल भेजा जाता है तो वो अपने आधिकारिक काम नहीं कर पाएंगे। ऐसे में उनको आजाद रखना चाहिए। अपील करने की प्रक्रिया कई साल आगे बढ़ाई जा सकती है। स्पेशल काउंसिल जैक स्मिथ ने पिछले साल ट्रंप के खिलाफ आपराधिक आरोप तय किए थे। यह मामला जो बाइडन के खिलाफ 2020 का राष्ट्रपति चुनाव हारने के बाद नतीजे को पलटने के लिए की गई कोशिश और हिंसा भड़काने का है। ट्रंप ने इस मामले में खुद को निर्दोष बताया था। यह केस तब से कानूनी अधर में लटका हुआ है। भूतपूर्व फेडरेल प्रॉसिक्यूटर नीम रहमानी के मुताबिक जब से ट्रंप चुनाव जीते हैं, आपराधिक मुकदमों से जुड़ी उनकी समस्याएं दूर हो चुकी हैं। उन्होंने कहा यह बहुत अच्छी तरह से स्थापित हो चुका है कि मौजूदा राष्ट्रपति के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। ऐसे में वाशिंगटन डीसी की जिला अदालत में चल रहा चुनावी धोखाधड़ी से जुड़ा मामला खारिज हो जाएगा। एक और मामला गोपनीय दस्तावेजों को गैर-कानूनी रूप से अपने पास रख लिया था और कानून विभाग ने जब उन फाइलों को वापस लाने की कोशिश की तो ट्रंप ने उस काम में बाधा पहुंचाई। जज ने यह मामला ट्रंप द्वारा नियुक्त एलीन केनन को सौंपा था। उन्होंने जुलाई में यह कहकर खारिज कर दिया था कि कानून विभाग ने इस पूरे मामले की पैरवी करने के लिए स्मिथ की नियुक्ति अनुचित ढंग से की थी। अब जब ट्रंप राष्ट्रपति बन गए हैं तो कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति कार्यालय में ट्रंप के रहते सभी मुकदमों पर रोक की संभावना है। अमेरिका के राष्ट्रपति होने के नाते जब तक वो राष्ट्रपति कार्यालय में हैं, तब तक उनके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।

-अनिल नरेन्द्र

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या असर होगा?


जो यह उम्मीद कर रहे थे कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के माइनॉरिटी स्टेटस को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर हां या न में स्पष्ट जवाब मिल जाएगा। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार को आए फैसले से थोड़ी राहत भी मिली होगी और थोड़ी निराशा भी। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की एहमीयत इस मायने में है कि इस मसले को देखने समझने के तरीकों में निहित कमियों पर रोशनी डालता और उन्हें दूर करता है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने शुक्रवार को 1967 के अपने फैसले को पलट दिया है जिसमें कहा गया था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा हासिल नहीं हो सकता था। सात जजों की संवैधानिक पीठ को बहुमत के फैसले में एस अजीज बाशा बनाम केंद्र सरकार मामले के फैसले को पलटा है। हालांकि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त होगा या नहीं इसका फैसला शीर्ष अदालत की एक रेगुलर बेंच करेगी। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, सूर्यकांत, जेबी पारदीवाला, दीपांकर दत्ता, मनोज मिश्रा और एससी शर्मा सात जजों की बेंच में शामिल थे। इस कानूनी विवाद की जटिलता को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि यह आधी सदी से भी ज्यादा पुराना है, इसकी शुरुआत 1967 में अजीज बाशा के आए सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से मानी जाती है जिसमें कहा गया था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है क्योंकि यह एक कानून अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट 1920 के जरिए अस्तित्व में आया था। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले को पलटते हुए कुछ परीक्षण भी निर्धारित किए हैं। अब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर अगली सुनवाई का फैसला इन्हीं परीक्षणों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। व्यापक तौर पर परीक्षण यह है कि संस्थान की स्थापना किसने की, क्या संस्थान का चरित्र अल्पसंख्यक है और क्या यह अल्पसंख्यकों के हित में काम करता है? माइनारिटी स्टेटस का सवाल यूनिवर्सिटी प्रबंधन के विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं से तो जुड़ा है ही, यहां लागू होने वाली आरक्षण व्यवस्था पर भी निर्णायक प्रभाव डालने वाला है। यूनिवर्सिटी में मुस्लिमों का कितना आरक्षण रहेगा और एससी एसटी ओबीसी आरक्षण मिलेगा या नहीं, यह भी इस सवाल के जवाब में निर्भर करता है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक स्वरूप की बहाली बेशक हो गई है हालांकि अभी तीन सदस्यीय पीठ को इस स्वरूप से जुड़े मानदंड तय करने होंगे। एएमयू इंतेजामिया और अलीगढ़ बिरादरी इसे अपनी बड़ी जीत और रास्ता खुलना मान रहे हैं। इस फैसले के साथ ही सवाल खड़ा हो रहा है कि अब एएमयू के संचालन और व्यवस्थाओं में क्या बदलाव हो सकें। जिस पर एक ही जवाब है कि अभी आदेश के कानूनी पहलुओं की समीक्षा और बारीकियों पर कानूनी राय लेने के बाद ही कुछ कहा जाएगा। और फिर तय होगी। एएमयू के संचालन में अगर गौर करें तो अब तक एएमयू अपने एक्ट, यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय के नियमों से संचालित होता है। इसके तहत एएमयू में 50 फीसदी छात्रों को आंतरिक कोटे का लाभ मिलता है। हालांकि अगर अल्पसंख्यक स्वरूप हटता है तो शायद आरक्षण व्यवस्था लागू होगी। जानकार कहते हैं कि अब स्थितियां यथावत रहेंगी।

Friday, 8 November 2024

एक अहम फैसला जिसका दूरगामी प्रभाव होगा

यूपी बोर्ड ऑफ मदरसा एजुकेशन एक्स 2004 से जुड़े एक मामले में मंगलवार को आया सुप्रीम कोर्ट का पैसला ऐतिहासिक तो है ही बल्कि न केवल इस कानून की संवैधानिकता की पुष्टि करता है, बल्कि यह भी बताता है कि शिक्षा और धर्मनिपेक्षता जैसे मुद्दों को कितनी बारीकी और संवेदनशीलता के साथ देखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा कानून 2004 की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी है। साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक ठहराकर गलती की थी। हाईकोर्ट ने इसी साल इस कानून को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया था। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को]िनयमित स्कूलों में दाखिला दिलाया जाए। उच्चतम न्यायालय ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी। उन्होंने कहा सिर्फ इसलिए कि मदरसा कानून में कुछ मजहबी प्रशिक्षणन शामिल है, इसे असंवैधानिक नहीं माना जा सकता। मदरसा कानून राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एलसीआरटी) की पाठ्य पुस्तकों और मजहबी तालीम का उपयोग कर शिक्षा देने की रूपरेखा प्रदान करता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 22 मार्च को यूपी मदरसा शिक्षा बोर्ड कानून ने 2004 को निरस्त कर दिया था। उनका कहना था कि यह अंसवैधानिक है और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लघंन है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 5 अप्रैल को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, हमारा विचार है कि याचिकाओं में उठाए गए मुद्दों पर बारीकी से विचार किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने अधिनियम के प्रावधानों को समझने की भूल की है। उनका उद्देश्य 17 लाख मदरसा विद्यार्थियों पर असर डालेगा। दस हजार शिक्षकों पर भी सीधा असर होगा। इन छात्रों को स्कूलों में भेजने का आरोप ठीक नहीं है। इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने एक बार टिप्पणी की थी कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब है, जियो और जीने दो। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखा। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अंजुम कादरी मैनेजर्स एसोसिएशन मदारिस, ऑल इंडिया टीचर्स एसोसिएशन, मदारिस अरबियार न्यू दिल्ली। मैनेजर एसोसिएशन अरबी मदरसा, नई बाजार और टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया कानपुर की ओर से याचिकाएं दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट को इस बात का अहसास था कि इस आदेश का प्रभाव न सिर्फ यूपी बल्कि पूरे देश के अल्पसंख्यक साधनों से जुड़े मामलों पर होगा। इसलिए उसने यह साफ करने में काई कमी नहीं रखी कि अल्पसंख्यक समुदायों को अपने मनाने का अधिकार है तो राज्य को भी उन संस्थानों में दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का अधिकार है। इस मामले में जहां सेक्यूलर मूल्यों की अहमियत रेखांकित हुई है। वहीं उन्हें सुनिश्चित करने के तरीकों में बरती जाने वाली सावधानी की जरूरत भी स्पष्ट हुई। -अनिल नरेन्द्र

सभी निजी संपत्ति कब्जे में नहीं ले सकती

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि सरकार हर निजी संपत्ति का अधिग्रहण नहीं कर सकती। केवल इसलिए ऐतिहासिक नहीं है कि यह नौ सदस्यीय संविधान पीठ की ओर से दिया गया है, बल्कि इसलिए भी है, क्योंकि इसे उस विचार को आईना दिखाया है, जिसे सरकारों की रीति-नीति का अनिवार्य अंग बनाने का दबाव रहता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नौ सदस्यीय पीठ ने 7ः2 के बहुमत से यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा, संविधान के तह सरकारों को आम भलाई के लिए निजी स्वामित्व वाले सभी संसाधन को अपने कब्जे में लेने का अधिकार नहीं है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि सरकारें कुछ मामले में निजी संपत्तियों पर दावा कर सकती है। पीठ ने सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस ऋषिकेश राय, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस सुधांशु धूलिया, जस्टिस जेवी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्र, जस्टिस राजेश बिंदल, जस्टिस एससी शर्मा और जस्टिस एजे मसीह शामिल थे। प्रॉपर्टी ऑनर्स एसो. महाराष्ट्र व 16 अन्य ने 1992 में सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की। सुनवाई के दौरान मुद्दा उठा कि क्या निजी सचिव को समुदाय की भलाई का बताकर सरकार अधिग्रहित कर सकती है? सीजेआई चंद्रचूड़ ने इसी साल व जजों की बेंच बनाई और मई को फैसला सुरक्षित रखा। मंगलवार सुबह सीजेआई ने कहा ः मैंने और 6 जजों ने बहुमत से फैसला लिया है। जस्टिस नगरत्ना ने मुख्य फैसले से सहमति जाहिर कर कुछ मुद्दों पर असहमति जताई है। जस्टिस धूलिया का फैसला अस्वीकृति का है। बहुमत ने 1978 के जस्टिस कृष्णा अय्यर फैसले को खारिज किया है। जस्टिस अय्यर ने अल्पमत फैसले में कहा थाö सरकार निजी संपत्ति आम भलाई के लिए अधिग्रहित कर सकती है। सीजेआई ने कहाö इसमें सैद्धांतिक त्रुटि थी। यह निजी संसाधनो पर सरकार के नियंत्रण की वकालत करता है। पुराना शासन विशेष आर्थिक व समाजवादी विचारधारा से प्रभावित था। बीते 30 साल में गतिशील आर्थिक नीति ने भारत सबसे तेज अर्थव्यवस्था बन गया है। जस्टिस नागरत्ना ने कहाö फैसले में जस्टिस कृष्णा अय्यर के फैसले का उल्लेख करते हुए कहाöकेवल अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और निजीकरण की ओर बढ़ने के कारण यह नहीं कहा जा सकता कि बीते वर्षों में इस कोर्ट के जजों ने लोगों से अन्याय किया था। उन्होंने कहा, भारत की सुप्रीम कोर्ट की संख्या उन जजों से बड़ी है जो इसके इतिहास का हिस्सा थे। यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट करने की आवश्यकता भी समझी कि उक्त फैसला एक विशेष आर्थिक और समाजवादी विचारधारा से प्रेरित था। समय बदल चुका है, व्यवस्था बदल चुकी है, परिस्थितियां बदल गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि पिछले कुछ दशकों में गतिशील आर्थिक नीति अपनाने से ही भारत दुनिया में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना है। किसी भी देश को अपने आर्थिक दर्शन देश, काल और परिस्थितियों के हिसाब से अपनाना चाहिए। समय के साथ बदलाव ही प्रगति का आधार है।

Thursday, 7 November 2024

आतंकी हमलों को लेकर गरमाती सियासत


जम्मू-कश्मीर में लगातार हो रहे आतंकी हमलों को लेकर सियासत तेज हो गई है। नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख फारुख अब्दुल्ला ने बड़गाव आतंकी हमले की जांच की मांग की है। उनके समर्थन में एनसीपी के प्रमुख शरद पवार भी उतर आए हैं, मीडिया से बात करते हुए फारुख अब्दुल्ला ने कहा मुझे संदेह है कि आतंकी हमले जम्मू-कश्मीर में सरकार को अस्थिर करने के लिए किए जा रहे हैं। बड़गाव सहित सभी आतंकी हमलों की जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर वे (आतंकवादी) पकड़े जाते हैं तो हमें पता चलेगा कि यह कौन करा रहा है। उन्हें नहीं मारा जाना चाहिए, उन्हें जिंदा पकड़ा जाना चाहिए और पूछना चाहिए कि उनके पीछे कौन है, हमें जांच करनी चाहिए कि क्या कोई एजेंसी है जो उमर अब्दुल्ला सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है? जवाब में केन्द्राrय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमले सुरक्षा में चूक की वजह से नहीं है। हमलों को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय सेना आतंकवादियों से जांबाजी से निपट रही है। पहले की तुलना में आतंकी घटनाएं कम हुई हैं। सुरक्षा बल सर्तक है और जल्द ही ऐसी स्थिति आएगी जब तक आतंकी गतिविधियों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाएगा। आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर में विकास होगा। दरअसल, जम्मू-कश्मीर में हुए शांतिपूर्ण चुनाव और यहां की शांति पड़ोसी देश पाकिस्तान को रास नहीं आ रही है। वह लगातार कश्मीर में नापाक वारदातों को अंजाम दे रहा है। दहशतगर्दों के जरिए प्रवासी लोगों को निशाना बनाए जाने के बाद श्रीनगर के रविवारीय मार्पेट में ग्रेनेड विस्फोट कर एक बार फिर यहां की शांति भंग की साजिश रची है। अब तो पर्यटकों को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है ताकि पिछले दो साल की शांति के कारण घाटी में टूरिज्म बढ़ रहा था। इस पर अंकुश लगाने के लिए आतंकी घटनाएं बढ़ी हैं, पाकिस्तान कश्मीर में चुनी हुई सरकार को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। इसलिए गुलमर्ग, पहलगांव जैसे पर्यटन स्थल और अब श्रीनगर को निशाना बनाकर हमला किया गया है। हालांकि हर आतंकी घटना के बाद सेना का तलाशी अभियान तेज हो जाने का दावा किया जाता है और कुछ आतंकियों को मार गिराया जाता है, मगर यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि आखिर क्या वजह है कि पिछले दस वर्षों से आतंकवाद समाप्त करने के तेज अभियान के दावे के बावजूद इसकी जड़ें घाटी में जमी हुई हैं? सरकार बार-बार दावा करती है कि घाटी में आतंकवादियों की कमर टूट चुकी है, वे केवल कुछ क्षेत्रों तक सिमटकर रह गए हैं मगर हकीकत यह है कि कुछ कुछ अंतराल पर दहशतगर्द अपनी साजिशों को अंजाम देने में कामयाब हो जाते हैं। आतंकवाद को हमारी राय में किसी सियासी चश्मे से नहीं देखना चाहिए। जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला सरकार को केन्द्र सरकार के साथ बैठकर ठोस रणनीति बनाने की आवश्यकता है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद खत्म होना चाहिए पर केन्द्र सरकार के साथ-साथ चुनी हुई उमर सरकार की भी जिम्मेदारी है।

-अनिल नरेन्द्र