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Saturday, 19 May 2018

वॉलमार्ट के आने से छोटे कारोबारियों- दुकानदारों को भारी नुकसान होगा

कुछ साल पहले अपने देश में बहुत सारे लोगों ने वॉलमार्ट का नाम पहली बार तब सुना था जब खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देने की पहल हुई थी। तब बड़े पैमाने पर यह आशंका भी जताई गई थी कि अगर यह पहल आगे बढ़ी तो भारत के खुदरा कारोबार पर वॉलमार्ट जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों का कब्जा हो जाएगा और इससे करोड़ों छोटे दुकानदारों की आजीविका पर खराब असर पड़ेगा। उस समय वॉलमार्ट के भारत आने के विरोध करने वालों में भाजपा भी शामिल थी। विरोध के फलस्वरूप आखिरकार मनमोहन सिंह सरकार को बहु-खुदरा व्यवसाय में एफडीआई को मंजूरी देने का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा था। लेकिन जिस वॉलमार्ट को यूपीए सरकार के समय तीखे विरोध के कारण रुक जाना पड़ा था, अब उसने राजग सरकार के समय भारत में प्रवेश के लिए अपने कदम बढ़ा दिए हैं। खुदरा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी वॉलमार्ट ने कई महीनों की चर्चा के बाद आखिरकार भारतीय ऑनलाइन कंपनी फ्लिपकार्ट की 77 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने का ऐलान किया है जिससे भारतीय ऑनलाइन बाजार की पूरी तस्वीर बदल जाएगी। अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट 16 अरब डॉलर (1.07 लाख करोड़ रुपए) में फ्लिपकार्ट की 77 प्रतिशत हिस्सेदारी लेगी। दुनिया की यह सबसे बड़ी ई-कॉमर्स डील है। डील में फ्लिपकार्ट की वैलुएशन 20.8 अरब डॉलर (1.39 लाख करोड़ रुपए) आंकी गई है। इस लिहाज से यह ई-कॉमर्स में दुनिया की सबसे बड़ी डील है। वैसे यह हमारी समझ से परे है ]िक एक फली-फूलती कंपनी के मुख्य साझेदारों ने इस तरह अपने को क्यों बेच दिया? 77 प्रतिशत का मतलब है कंपनी का अधिग्रहण है। हालांकि एक मायने में यह अद्भुत भी है। सामान्य स्टार्टअप के तहत खड़ी की गई कंपनी वॉलमार्ट ने 20.8 अरब डॉलर की कीमत लगाई। इस नाते फ्लिपकार्ट की उपलब्धि भी मानी जा सकती है। हालांकि इसके कुछ शेयरधारकों ने अभी इस डील को अपनी स्वीकृति नहीं दी है। इस डील का विरोध भी हो रहा है। वॉलमार्ट के विरोध में देश व दिल्ली के व्यापारियों ने विरोध में एक विशेष रैली के आयोजन का फैसला किया है। आयोजकों का कहना है कि इस डील से स्पष्ट है कि वॉलमार्ट हमारे देश में बैक डोर एंट्री लेने में सफल रहा है। अगर एफडीआई की बात करें तो हमारे देश में केवल सिंगल ब्रांड की अनुमति है, जबकि वॉलमार्ट मल्टी ब्रांड है। संयोजकों ने कहा कि हमारा विरोध न केवल वॉलमार्ट के खिलाफ है बल्कि केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ भी है, जिसने हमारे देश के छोटे व मझौले व्यापारियों के भविष्य का ख्याल रखे बगैर इस समझौते को होने दिया है। लेकिन इस डील का एसोचैम जैसे कारपोरेट संघ ने स्वागत किया है। वहीं स्वदेशी जागरण मंच ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि यह सौदा छोटे और मझौले कारोबारियों व दुकानदारों को खत्म करेगा और रोजगार सृजन के अवसर भी खत्म करेगा। यह भी आशंकाएं खड़ी की जा रही हैं कि कहीं यह खुदरा बाजार में परोक्ष तरीके से प्रवेश का प्रयास तो नहीं? हालांकि अभी भारत में ई-कॉमर्स को लेकर एकदम साफ नीति-नियम नहीं है, इसलिए यह देखना होगा कि इस सौदे को सरकार की किस तरह मंजूरी मिलती है? वास्तव में वॉलमार्ट को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग सहित कई संस्थाओं से मंजूरी लेनी होगी। सब कुछ होते हुए एक वर्ष तो लग जाएगा। जो भी हो एक विदेशी मल्टीनेशनल कंपनी का आम सामानों की खरीद-फरोख्त में इस तरह का वर्चस्व कोई सुखद प्रगति नहीं मानी जा सकती है।

-अनिल नरेन्द्र

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में निर्माणाधीन फ्लाइओवर का गिरना

वाराणसी में एक निर्माणाधीन फ्लाइओवर के दो स्लैब गिरने से हमें पता चलता है कि अतीत में हुए इसी प्रकार के हादसों से कोई सबक नहीं लिया गया। वाराणसी के चौका घाट से कैंट रेलवे स्टेशन होते हुए लहरतारा तक जाने वाले फ्लाइओवर का काम चल रहा था। मंगलवार की शाम लगभग साढ़े पांच बजे कैंट रेलवे स्टेशन के पास दो पिलर को जोड़ने वाली स्लैब असंतुलित होकर नीचे चलते ट्रैफिक पर जा गिरा। इस हादसे में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई जबकि 30 से ज्यादा घायल हैं। आधा दर्जन से ज्यादा वाहन इन बीमों के नीचे दब गए। एनडीआरएफ, सेना, पुलिस, पीएसी व स्थानीय लोगों की मदद से चार घंटे तक चले राहत और बचाव कार्य के बाद दोनों बीमों को मौके से हटा दिया गया। उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम की लापरवाही से यह हादसा हुआ। तेज धमाका सुनकर लोग घरों से निकल कर भागे। राहगीरों में भी भगदड़ मच गई। आधे घंटे के बाद पुलिस पहुंची व डेढ़ घंटे बाद बचाव कार्य शुरू हो सका। नौ केनों से बीम को हल्का से उठाया गया तो दो ऑटो, दो बोलेरो कार को निकाला गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देर रात को वाराणसी पहुंचे। उन्होंने डीएम-कमिश्नर से पूछा कि बीम कैसे गिरा? इस सवाल का जवाब अफसरों से देते नहीं बना। उन्होंने कहा कि हादसे की जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी। हादसे की हकीकत जानने के लिए तकनीकी टीम का गठन किया गया है। योगी आदित्यनाथ ने मृतकों को पांच-पांच लाख और घायलों को दो-दो लाख रुपए देने की घोषणा की है। वह बीएचयू ट्रॉमा सेंटर भी गए और वहां घायलों का हाल जाना। हालांकि राष्ट्रीय आपदा दल की टीम के जल्द वहां पहुंचने से अनेक घायल लोगों को समय रहते चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जा सकी, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि हमारे यहां ऐसे बड़े निर्माण के दौरान आम लोगों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने की कोई व्यवस्था नहीं है। अलबत्ता दिल्ली में मेट्रो लाइन के निर्माण के दौरान संबंधित इलाके की इस तरह से घेराबंदी की जाती है जिससे नियमित यातायात न तो प्रभावित हो, न लोगों को परेशानी हो, पर इसके बावजूद हादसे हुए हैं। कुछ दिन पहले गुड़गांव और गाजियाबाद में ऐसे हादसे हुए थे जब निर्माणाधीन पुल के हिस्से गिर गए थे। वाराणसी में हुआ हादसा घनघोर आपराधिक लापरवाही का उदाहरण है, जहां प्रशासन ने सावधानी बरती होती तो यह हादसा टाला जा सकता था। हादसे की असली वजह निश्चय ही जांच से पता चलेगी, लेकिन जो शहर प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र हो वहां ऐसी लापरवाही की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। मुझे याद है कि जब कोलकाता में फ्लाइओवर गिरा था तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह भगवान का संदेश है कि बंगाल की तृणमूल कांग्रेस से बचाया जाए। आज मोदी जी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक फ्लाइओवर गिर गया है, अब इसे क्या समझें?

Thursday, 17 May 2018

नतीजों के बाद सबकी नजरें टिकीं राजभवन पर

कर्नाटक विधानसभा चुनाव पर देश भर की निगाहें लगी हुई थीं। 224 संसदीय विधानसभा की 222 सीटों पर शनिवार को मतदान हुआ था। मतदान के बाद विभिन्न चैनलों के एग्जिट पोल में त्रिशंकू विधानसभा की संभावना सही साबित हुई है। एग्जिट पोल की बात करें तो पांच चैनलों के एग्जिट पोल में भाजपा और चार में कांग्रेस को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में fिदखाया गया था। हालांकि दो चैनलों में तो भाजपा और कांग्रेस के बहुमत का अनुमान भी व्यक्त किया गया था। परिणामों में वह चार एग्जिट पोल तो कुछ हद तक सही साबित हुए जिन्होंने दावा किया था कि भाजपा सबसे बड़ी पाटी बनकर उभरेगी। यह भी सही रहा कि त्रिशंकू विधानसभा होगी। फाइनल परिणाम कुछ इस पकार रहे ः भाजपा 104 (46.4 पतिशत), कांग्रेस 78 (34.8 पतिशत) और जेडीएस (37)। यह भी सही रहा कि जेडीएस किंग मेकर की भूमिका में रहेगी। त्रिशंकू विधानसभा के हालात सामने आने के बाद भाजपा और कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन दोनों ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है। इसके बाद राज्य में भावी सरकार को लेकर संशय और गहरा गया है और जोड़-तोड़ की सियासत शुरू हो गई है। अब सारी नजरें राज्यपाल वनुभाई वाला पर टिक गई हैं। उन्हें फैसला करना है कि वे सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी भाजपा को आमंत्रित करें या कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन को। भारतीय राजनीति में हमेशा बोली की मर्यादा का ख्याल रखा गया है पर दुख से कहना पड़ता है कि इस चुनाव में यह मर्यादा टूट गई। पूर्व पधानमंत्री मनमोहन सिंह और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने राष्ट्रपति कोविंद को चिट्ठी लिखकर पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषा पर आपत्ति जताई है। कर्नाटक चुनाव में डा. सिंह के अनुसार पधानमंत्री कांग्रेस को धमकाने का काम कर रहे हैं। दरअसल कर्नाटक के हुबली में 6 मई को चुनाव पसार के दौरान पीएम मोदी ने भाषण देते हुए कहा था, `कांग्रेस के नेताओं कान खोलकर सुन लीजिए, अगर सीमाओं को पार करेंगे तो ये मोदी है लेने के देने पड़ जाएंगे।' कांग्रेस ने इस भाषण का उल्लेख करते हुए इसे आपत्तिजनक बताया है और राष्ट्रपति से पीएम को चेतावनी जारी करने के लिए कहा है। कांग्रेस ने आगे लिखा है कि यह सोचना मुश्किल है कि हमारे जैसे लोकतांत्रिक देश में पीएम के पद पर बैठा कोई व्यक्ति इस तरह की डटने वाली भाषा का इस्तेमाल करे। इस चुनाव में एक नया रिकार्ड भी बना है। वह है कि यह चुनाव अब तक का सबसे महंगा चुनाव रहा। यह सर्वेक्षण सेंटर फार मीडिया स्टडीज ने किया है। यह सेंटर खुद को अपनी वेबसाइट पर एक गैर सरकारी संगठन और थिक टैंक बताता है। इसके द्वारा किए गए सर्वेक्षण में कर्नाटक चुनाव को धन पीने वाला बताया है। सीएमएस के अनुसार विभिन्न राजनीतिक पार्टियों और उसके उम्मीदवारों द्वारा कर्नाटक चुनाव में 9,500 से 10,500 करोड़ केंद्रीय धन खर्च किया गया है। यह खर्च राज्य में आयोजित पिछले विधानसभा चुनाव के खर्च से दोगुना है। सर्वेक्षण में बताया गया कि इसमें पधानमंत्री के अभियान में हुआ खर्चा शामिल नहीं है। सीएमएस के एन भास्कर राव ने खर्च की दर अगर यही रही तो 2019 के लोकसभा चुनाव में 50,000-60,000 कऱोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस चुनाव के लिए कड़ी मेहनत और मुश्क्कत की। हालांकि कर्नाटक की उत्तर पदेश से आधी सीटें हैं, आबादी भी एक तिहाई है, पर मोदी ने ताकत बराबर लगाई। पीएम ने 21 रैलियां कीं। दो बार नमो एप से मुखातिब हुए। करीब 29 हजार किलोमीटर की दूरी तय की। मोदी कर्नाटक में एक भी धार्मिक स्थल पर नहीं गए। इनके मुकाबले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 20 रैलियां कीं और 40 रोड शो-नुक्कड़ सभाएं कीं। राहुल ने मोदी से दोगुनी अधिक दूरी तय की। 55 हजार किलोमीटर की यात्रा की। कांग्रेस की बात करें तो ऐसा पतीत होता है कि इस बार उसे यह एहसास हो गया था कि उसे बहुमत नहीं मिलने वाला है और त्रिशंकू विधानसभा होगी। इसलिए कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मतगणना से पहले दलित कार्ड खेला। कांग्रेस गोवा की गलती दोहराने को तैयार नहीं थी और उसने पार्टी हाई कमान से सबक लिया। जैसे ही परिणाम आए सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं को आदेश दिया कि वह कुमार स्वामी से जाकर मिलें और उनसे कहें कि कांग्रेस मुख्यमंत्री पद के लिए उन्हें समर्थन देने को तैयार है। यह राजनीति के लिहाज से एक बड़ा दांव रहा। अब कम से कम कांग्रेस-जेडीएस सरकार बनाने की रेस में शामिल तो है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण थे। यह लड़ाई कांग्रेस के अस्तित्व की और भाजपा के लिए 2019 के चुनाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था बोमई बनाम केंद्र सरकार के एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए सुपीम कोर्ट ने यह आदेश दिया था कि बहुमत का फैसला विधानमंडल के पटल पर होगा न कि राजनिवास में। अगर राज्यपाल भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं तो जाहिर है कि उसे जेडीएस का समर्थन चाहिए। ऐसे में विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। अलबत्ता हार्स ट्रेडिंग को रोकने के लिए और राजनीति में शुचिता स्थापित करने के लिए कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना बेहतर होगा। देखें, राज्यपाल महोदय क्या फैसला करते हैं?

-अनिल नरेन्द्र

Wednesday, 16 May 2018

जनरल रावत की पथराव करने वालों को चेतावनी

कश्मीर घाटी में पथराव की बढ़ती घटनाओं और आतंकवाद बढ़ने के संकेतों के बीच सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने उपद्रवियों को कड़ा संदेश दिया है। जनरल रावत ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें आजादी कभी नहीं मिलने वाली और इसके लिए हथियार उठाने वालों से हम सख्ती से निपटेंगे। जम्मू-कश्मीर की अस्थिर स्थिति पर यह उनका सबसे बड़ा बयान है। उन्होंने सीधा हमला उस आजादी पर बोला है जिसके नाम पर इन नौजवानों को भड़काया जा रहा है। इसलिए जनरल रावत जब कहते हैं कि यह आजादी उन्हें नहीं मिलने वाली तो इसका सीधा अर्थ यह है कि घाटी में जिस तरह से और जिस तरह की आजादी के सपने बेचे जा रहे हैं। वे बेमतलब तो हैं ही, साथ ही अव्यावहारिक भी हैं। यह सीमा पार से आई एक चुनौती है जिसे नौजवानों के रूप में भारतीय सेना के सामने खड़ा किया जा रहा है। जाहिर है इसका जवाब भारतीय फौज को ही देना है और वह माकूल जवाब दे भी रही है। जनरल रावत ने स्पष्ट किया कि सेना का व्यवहार कभी बर्बर नहीं रहा। इसी स्थिति में सीरिया व पाकिस्तान में टैंक और हवाई हमलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। जनरल रावत के बयान की पुष्टि लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी एजाज गुजरी के वीडियो से भी होती है, जिसमें उसने माना है कि वह झाड़ियों में छिपा था, जहां सेना उसे मार सकती थी लेकिन उसे बंदी बनाकर उसकी जान बचाई। उसने कहा कि सेना ने मुझे नई जिन्दगी दी है। गुजरी ने गलत रास्ते पर चल रहे अपने साथियों को भी हथियार छोड़कर सामान्य जिन्दगी जीने की अपील की है। पाकिस्तानी करतूतों का भी पर्दाफाश करते हुए उसने बताया कि जिस दिन वह पकड़ा गया उसी दिन पाकिस्तान से आतंकियों को निर्देश मिले थे कि भारतीय सेना बर्बरता कर रही है, इसलिए वे उपद्रव फैलाएं। घाटी में शिक्षित युवाओं का आतंकी गुटों में शामिल होना भी पाकिस्तानी साजिश का ही संकेत है। जनरल रावत ने राज्य की महबूबा मुफ्ती सरकार को भी संदेश दे दिया है जो ईद और अमरनाथ यात्रा का हवाला देकर पथराव करने वालों के खिलाफ कार्रवाई रोकने पर जोर दे रही हैं। सेना और सुरक्षा बल कश्मीर में हमेशा से ही अपनी भूमिका अच्छे से निभाते रहे हैं। वहां आपत्ति दरअसल राजनीतिक दलों से ज्यादा है, हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे अलगाववाद संगठनों से ज्यादा है। यह अपनी भूमिका को सही ढंग से नहीं निभाते। कश्मीरी नौजवानों का मुख्य धारा में शामिल करने का मुद्दा हमेशा ही राजनीति की भेंट चढ़ा है। समस्या के समाधान में राजनीतिक दल भी एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन इन सबको अंजाम देने में प्रदेश की राजनीति नाकाम रही है। इसलिए नौजवानों को समझाने का काम भी थलसेना प्रमुख को ही करना पड़ रहा है। हम जनरल रावत के बयान से पूरी तरह सहमत हैं और बहादुर जवानों को अत्यंत कठिन स्थिति से निपटने के लिए सलाम करते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

हिंसा के सहारे चुनाव जीतना

पश्चिम बंगाल में सोमवार को पंचायत चुनाव के लिए मतदान का दिन था। मतदान के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा में कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई और 50 लोग घायल हो गए। ये मौतें पश्चिम बंगाल के आठ जिलों में हुई हैं। हालांकि चुनावों के लिए कड़े सुरक्षा के इंतजाम का दावा किया जा रहा था फिर भी इतने बड़े पैमाने पर हुईं मौतें बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है। बूथ कब्जे, आगजनी, बम फेंकने, धमकी देने और मारपीट की कितनी घटनाएं हुईं इसका पूरा हिसाब दे पाना फिलहाल मुश्किल है। चुनाव शांतिपूर्ण, निष्पक्ष, बिना किसी भय या दबाव के होने चाहिए। लेकिन इनमें से किसी भी कसौटी पर ये चुनाव खरे नहीं उतरते। यही नहीं, ये चुनाव कानून-व्यवस्था की नाकामी भी बयान करते हैं। इस हिंसा से यही पता चलता है कि इस राज्य में लोकतंत्र के नाम पर किस तरह लोकतांत्रिक मूल्यों व मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाई गईं। चिन्ता का विषय तो यह है कि इसके पूरे आसार दिख रहे थे कि पंचायत चुनावों के मतदान प्रक्रिया को बाधित करने के लिए हिंसा का सहारा लिया जा सकता है, लेकिन न तो ममता बनर्जी की राज्य सरकार ने उसे रोकने के लिए कोई दिलचस्पी दिखाई और न ही राज्य चुनाव आयोग ने उसे रोकने के लिए पर्याप्त प्रबंध किए। पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा का इतिहास रहा है इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि राज्य सरकार चुनाव आयोग के साथ मिलकर निष्पक्ष-स्वतंत्र चुनाव का प्रबंध करेगी पर इस काम में राज्य सरकार विफल रही है। राज्य सरकार ऐसे समय में केंद्रीय बल मांग लेते हैं पर राजनीतिक कारणों के चलते ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार ने केंद्र से सुरक्षा बल मांगने के बजाय उनके प्रति अपना अविश्वास प्रकट करने के लिए मुख्यत गैर-भाजपा शासित राज्यों से पुलिस बलों पर ज्यादा भरोसा किया और मांगे भी कितने, दो हजार। यह महज दिखावा था। हिंसा की ताजा घटनाओं पर माकपा, कांग्रेस और भाजपा यानि विपक्ष की सभी पार्टियों ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए तृणमूल का आतंक उसे करार दिया। इसके पलटवार में तृणमूल ने कहा कि पंचायत चुनाव में हिंसा की घटनाएं पहले भी होती थीं, बल्कि वाम मोर्चे के राज में इससे भी ज्यादा हुई थीं। सवाल यह है कि क्या पहले के आंकड़ों का हवाला देकर राज्य सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ सकती है? यह सही है कि बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा का पुराना इतिहास रहा है और जिस पार्टी की सरकार होती है वह विपक्ष के कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। जिस तरह उपद्रवी तत्व बेखौफ थे इससे यह स्पष्ट होता है कि इन्हें उपद्रव करने की खुली छुट मिली हुई थी और इसी वजह से चुनावी हिंसा में इतने अधिक लोग हताहत हुए। इस तरह चुनाव जीतना क्या लोकतंत्र के लिए जायज है?

Tuesday, 15 May 2018

चौथी बार राष्ट्रपति चुने गए ब्लादिमीर पुतिन

रूस में ब्लादिमीर पुतिन ने बतौर राष्ट्रपति अपनी चौथी पारी शुरू कर दी है। वह 1999 से लगातार सत्ता में हैं और जोसेफ स्टालिन के बाद सबसे ज्यादा लंबे समय तक सत्ता में बने रहने का रिकार्ड बना चुके हैं। रविवार को हुए चुनाव में उन्हें 76 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले, जो पिछली बार से करीब 13 प्रतिशत ज्यादा हैं। बता दें कि जोसेफ स्टालिन 30 साल सत्ता में रहे थे। पुतिन के सामने सात उम्मीदवार मैदान में थे। उनके सबसे बड़े आलोचक रहे अलैक्सी नवाहनी को कानूनी वजहों से चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था। नवाहनी ने हालांकि चुनाव को फेल बताया और कहा कि चुनाव में जबरदस्त धांधली हुई है। वहीं चुनाव की कार्यप्रणाली पर नजर रखने वाली संस्था गोलोस के मुताबिक चुनाव के दिन कई जगहों पर अनियमितताएं देखने को मिलीं। जैसे कई बैलेट बॉक्सों में चुनाव शुरू होने से पहले ही कुछ वोटिंग पेपर्स पड़े थे। कई मतदान केंद्रों पर ऑब्जर्वर्स को घुसने नहीं दिया गया। मतदान केंद्रों पर लगे कैमरों को गुब्बारों या अन्य कुछ चीजों से ढंका गया था। हालांकि रूस की सेंट्रल इलेक्ट्रोरल कमीशन की चीफ एला पामलोवा ने कहा कि चुनाव के दिन ज्यादा गड़बड़ियां दर्ज नहीं की गईं। रूस के संविधान के मुताबिक कोई भी शख्स दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं बन सकता। इसलिए 2008 में पुतिन प्रधानमंत्री पद के  लिए खड़े हुए और जीत हासिल की। 2008-12 में दिमित्री मेददेव राष्ट्रपति रहे। 2012 में पुतिन ने दोबारा राष्ट्रपति बनने में दिलचस्पी दिखाई और उनके लिए देश के संविधान में संशोधन भी कर दिया गया। बदलाव के मुताबिक रूस में दो बार राष्ट्रपति बनने की सीमा खत्म की गई। साथ ही उनके कार्यकाल को चार साल से बढ़ाकर छह साल कर दिया गया। बता दें कि ब्लादिमीर पुतिन रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी में जासूस थे। एक्सपर्ट्स की मानें तो दुनिया के सबसे बड़े देश रूस में उनकी पकड़ गहरी बन चुकी है। विपक्ष को उन्होंने करीब-करीब खत्म कर दिया है और टीवी पर अब सरकारी नियंत्रण है। चुनाव अभियान में पुतिन ने रूस को दुनिया की महाशक्ति बताया। साथ ही कहा कि हमारे नए एटमी हथियार किसी से भी कमतर साबित नहीं होंगे। 65 साल की इकोनॉमिक्स ओलगा मैटयुनीना ने कहाöहां मैंने पुतिन को वोट दिया। वो एक लीडर हैं। जब वह क्रीमिया वापस लाए वे मेरे हीरो बन गए। पुतिन इस समय दुनिया के ताकतवर नेताओं में हैं। उधर चीन में भी शी जिनपिंग आजीवन राष्ट्रपति के लिए चुने गए हैं। दोनों नेता मिलकर अमेरिका को नियंत्रण में रख सकते हैं। पर घरेलू फ्रंट पर पुतिन की चुनौतियां बरकरार हैं।

-अनिल नरेन्द्र

अरसे बाद लालू के घर लौटीं खुशियां

जेल से 140 दिन बाद घर पहुंचे राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के घर में खुशियां लौटीं। इसके दो दिन बाद शनिवार को उनके बेटे तेज प्रताप की शादी हुई। करोड़ों रुपए के चारा घोटाले के मामले में सजायाफ्ता लालू को इस शादी में शामिल होने के लिए तीन दिन की पेरोल मिल गई। पिछले वर्ष दिसम्बर से न्यायिक हिरासत में चल रहे लालू जब पटना हवाई अड्डे पहुंचे तो हजारों की संख्या में उनके समर्थक उनका स्वागत करने के लिए पहुंचे हुए थे। पटना के जयप्रकाश नारायण हवाई अड्डे पर शाम करीब 6.40 बजे पहुंचे लालू का स्वागत उनकी बड़ी बेटी और सांसद मीसा भारती, बड़े पुत्र तेज प्रताप, छोटे पुत्र और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, दामाद शैलेश सहित पार्टी के कई अन्य विधायक और नेता मौजूद थे। हवाई अड्डे पर पहुंचने के बाद लालू को भारी सुरक्षा के बीच व्हीलचेयर के जरिये गाड़ी में बिठाकर 10 सर्कुलर रोड स्थित उनकी पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के आवास के लिए रवाना किया गया। इस बहाने लालू ने अपनी सियासी ताकत भी दिखाई। तेज प्रताप की शादी में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत बड़ी संख्या में पक्ष-विपक्ष के नेता शामिल हुए। दरअसल सूबे के दो सियासी परिवारों की दोस्ती, रिश्तेदारी में बदल गई। शनिवार की रात पटना में बैंडबाजे की तेज धुन पर मस्ती में नाचते बड़ी संख्या में लोग, शहनाई की धुन पर पंडितों के मंत्रोच्चारण के बीच राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय की पौत्री व पूर्व मंत्री चंद्रिका राय की पुत्री ऐश्वर्या राय से हो गई। विवाह का कार्यक्रम चंद्रिका राय के सरकारी आवास (5 सर्कुलर रोड) पर हुआ। लालू-राबड़ी के घर से पहली बार बारात निकली थी। सात बेटियों की शादी के बाद उनके बड़े बेटे का विवाह हो रहा था। अरसे बाद लालू परिवार जश्न में डूबा था। बारात में कई दिग्गज नेता थे। समारोह में राज्य और देश से जुटने वाले तमाम नेताओं को विपक्षी एकता के रूप में देखा जाने लगा है। राजद के एक नेता ने बताया कि इस समारोह में कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी सहित कई राज्यों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) विरोधी खेमों में शामिल उन नेताओं को भी आमंत्रित किया गया था, जिनकी पहचान उन क्षेत्रों में क्षत्रपों के तौर पर होती है। बारात में प्रफुल्ल पटेल, शरद यादव, रामविलास पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा, आरके सिंह, दिग्विजय सिंह, राम जेठमलानी, अजीत सिंह, सुबोध कांत सहाय, कीर्ति आजाद आदि शामिल हुए। लालू के लिए राहतभरी एक खबर तब आई जब झारखंड उच्च न्यायालय ने बहुचर्चित चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता लालू को छह सप्ताह की औपबंधिक जमानत (प्रोविजनल बेल) दे दी। मेडिकल के आधार पर उन्हें छह सप्ताह की बेल दी गई है।