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Saturday, 18 October 2025

गठबंधनों में मचा घमासान


बिहार विधानसभा चुनाव में दोनों प्रमुख गठबंधनों में मचा घमासान रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। प्रथम चरण के नामांकन भरने की आखिरी तारीख (17 अक्टूबर) करीब आ जाने के बावजूद भी दोनों गठबंधनों में संग्राम जारी है। गठबंधन की राजनीति में सहयोगी दलें के बीच रूठना-मनाना आम बात है। खासकर जब चुनाव सिर पर हो तो दबाव की राजनीति अपनी चर्म पर होती है। दोनों ही गठबंधनों एनडीए और महागठबंधन में असंतोष चर्म सीमा पर है। पहले बात करते हैं महागठबंधन की। यह किसी से छिपा नहीं कि कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में मतभेद हैं। तभी तो नामांकन की अंतिम तिथि में जाकर सीट बंटवारे की घोषणा फाइनल हो सकी। दरअसल कांग्रेस यह साबित करना चाहती है कि गठबंधन में सीनियर पार्टनर है क्योंकि वह देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है जबकि राजद एक क्षेत्रीय दल है और उसे उसी हिसाब से सीटें का बंटवारा करना चाहिए। दूसरी ओर तेजस्वी यादव का मानना है कि उनकी पार्टी बिहार में कांग्रेस से कहीं बड़ा जनाधार रखती है इसलिए उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उम्मीद है कि दोनों के बीच सही मायनों में मतभेद मिट गए हैं और दोनों अपने इस इरादे पर पक्के हैं कि एनडीए को इस बार हराना है। वहीं अगर एनडीए की बात करें तो यहां कई मसले हैं। नीतीश कुमार चाहते हैं कि वह बड़े भाई की भूमिका में चुनाव में जाएं, इसलिए उन्हें भाजपा से ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए थीं। वह यह भी चाहते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर एनडीए चुनाव में जाए। जबकि भाजपा का कहना है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा यह चुनाव के बाद चुने विधायक करेंगे। एक पेंच तो यह फंसा हुआ है। दूसरा पेच चिराग पासवान को लेकर फंसा हुआ है। नीतीश चिराग को एक आंख नहीं भाते। वह चाहते थे कि चिराग को 15 सीटें मिलें, जबकि भाजपा हाईकमान ने उन्हें 29 सीटें दे दीं। इन 29 सीटों में ऐसी भी कई सीटें शामिल हैं जहां जदयू का सिटिंग विधायक है। नतीजा यह हुआ कि जदयू ने चिराग की 7 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए। बता दें कि चिराग ने पिछले विधानसभा चुनाव में जदयू को करारा झटका दिया था। तब उन्होंने जदयू कोटे की ज्यादातर सीटों पर प्रत्याशी उतार तीन दर्जन सीटों का नुकसान पहुंचाया था। इस कारण जदयू राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी बन कर रह गई थी। कहा जा रहा है कि इस बार चिराग के कोटे की सीटों पर उम्मीदवार उतार नीतीश पुराना हिसाब चुकता कर रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी को 6-6 सीटें दी गई हैं। दोनों ही नाराज चल रहे हैं। भाजपा आलाकमान के दबाव में अब वह कह तो रह हैं कि सब ठीक है पर अंदर खाते आग सुलग रही है और चुनाव में एनडीए एक बंटा हुआ गठबंधन नजर आ सकता है। एक बात फिर से यह तो साबित हो गई कि आज भी बिहार में नीतीश कुमार एक महत्वपूर्ण फैक्टर हैं और उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। यह सही है कि पिछले कुछ समय से नीतीश की सेहत पर सवाल उठते रहे हैं और वह ज्यादा सक्रिय भी नहीं दिखे। पर पिछले तीन-चार दिनों में नीतीश अपने पुराने रंग में दिखाई दिए। जिस तरीके से उन्होंने अपनी पार्टी को संभालने के लिए सख्त कदम उठाए हैं उससे साफ है कि वह यह मानते हैं कि भाजपा उन्हें अगला मुख्यमंत्री नहीं बनाने वाली हैं। उन्हें यह भी समझ आ गया है कि उनके तीनों वरिष्ठ साथी अंदर खाते भाजपा समर्थक हैं और उनके इरादे पर पार्टी को अंदर से तोड़ना चाहते हैं। इसी वजह से नीतीश ने अब कई शर्तें भाजपा के सामने रखी हैं। देखना होगा कि उन्हें भाजपा मानती है या नहीं? उधर भाजपा तहे दिल से चाहती है कि पहला कि वह बिहार विधानसभा चुनाव हर हाल में जीते और बिहार का अगला मुख्यमंत्री भाजपा का हो। अब असल खेला शुरू होने वाला है। देखते हैं, आने वाले दिनों में क्या-क्या होता है? 
-अनिल नरेन्द्र

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