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Sunday, 23 October 2011

हीरो से विलेन तक का गद्दाफी का लम्बा सफर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23rd October 2011
अनिल नरेन्द्र
लीबिया में 42 साल तक हुकूमत करने वाला 69 वर्षीय तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी अंतत गुरुवार को मारा गया। उसकी मौत गृह नगर सिरते में सिर और पैर में गोली लगने से हुई। हमले में उसके बेटे मुतस्सिम और सेना प्रमुख अबु बकर यूसुफ जबर समेत कई साथी भी मारे गए। गद्दाफी के गढ़ सिरते पर विद्रोही सैनिकों ने कब्जा कर लिया था और नॉटो हमले भी हो रहे थे। गद्दाफी हवाई हमले में पहले ही बुरी तरह घायल हो चुका था। विद्रोही सैनिकों के मुताबिक वह एक पाइप में छिपकर बैठा था। सैनिकों को बढ़ते देख वह गिड़गिड़ाने लगा कि डोंट शूट-डोंट शूट...। लेकिन सैनिकों ने नहीं सुनी और उसके सिर और दोनों पैरों में गोली मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। विद्रोहियों के अनुसार उसके पास सोने की पिस्टल मिली और वह फौजी वर्दी में था। गद्दाफी हमेशा से एक विवादास्पद व्यक्ति रहे। कुछ लोगों की नजरों में जब 42 वर्ष पूर्व उन्होंने राजा इद्रीस का तख्ता पलट कर सत्ता हासिल की तो शुरू के वर्षों में उन्होंने कई अच्छे काम किए। उन्होंने अपना एक राजनीतिक चिंतन विकसित किया था, जिस पर उन्होंने एक किताब भी लिखी, जो उनकी नजर में इस क्षेत्र में प्लेटो, लॉक और मार्क्स के चिंतन से भी कहीं आगे थी। कई अरब और अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में वो न सिर्प अपने अलग किस्म के लिबास की वजह से बल्कि अपने धारदार भाषण और अपरांगत रंग-ढंग से भी औरों से अलग दिखे। वर्ष 1969 में जब उन्होंने सैनिक तख्त पलटकर सत्ता हासिल की थी तो मुअम्मर गद्दाफी एक खूबसूरत और करिश्माई युवा फौजी अधिकारी थे। स्वयं को मिस्र के जमाल अब्दुल नासिर का शिष्य बताने वाले गद्दाफी ने सत्ता हासिल करने के बाद खुद को कर्नल के खिताब से नवाजा और देश के आर्थिक सुधारों की तरफ तवज्जो दी, जो वर्षों की विदेशी अधीनता के चलते जर्जर हालत में थी। अगर नासिर ने स्वेज नहर को मिस्र की बेहतरी का रास्ता बनाया था तो कर्नल गद्दाफी ने तेल के भंडार को इसके लिए चुना। लीबिया में 1950 के दशक में तेल के बड़े भंडार का पता चल गया था लेकिन उसके खनन का काम पूरी तरह से विदेशी कम्पनियों के हाथ में था जो उसकी ऐसी कीमत तय करते थे, जो लीबिया के लिए नहीं बल्कि खरीदारों को फायदा पहुंचाती थी। गद्दाफी ने तेल कम्पनियों से कहा कि वो पुराने करार पर पुनर्विचार करें नहीं तो उनके हाथ से खनन का काम वापस ले लिया जाएगा। लीबिया वो पहला विकासशील देश था, जिसने तेल के खनन से मिलने वाली आमदनी में बड़ा हिस्सा हासिल किया। दूसरे अरब देशों ने भी उसका अनुसरण किया और अरब देशों में 1970 के दशक की पेट्रो-बूम यानि तेल की बेहतर कीमतों से शुरू हुआ खुशहाली का दौर। गद्दाफी ने अपने आरम्भिक दौर में लीबियाई नागरिकों के लिए कई ऐसी स्कीमें चालू कीं कि वह हीरो बन गए पर फिर उन्होंने आतंकवादी तत्वों का समर्थन करना आरम्भ कर दिया और धीरे-धीरे एक तानाशाह बन गए जो अपने किसी भी विरोध को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे। जो भी उनके खिलाफ आवाज उठाता उसे गोली मार दी जाती। बर्लिन के एक नाइट क्लब पर साल 1986 में हुआ हमला गद्दाफी की मदद से चरमपंथियों ने किया। इस क्लब में अकसर अमेरिकी फौजी आया करते थे। घटना से नाराज अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने त्रिपोली और बेन गाजी पर हवाई हमले किए। दूसरी घटना जिसने दुनिया को हिला दिया था, वो थी लॉकर बी शहर के पास पैन अमेरिकन एयरलाइंस जहाज में बम विस्फोट, जिसमें 270 लोग मारे गए थे। कर्नल गद्दाफी ने हमले के दो संदिग्धों को स्कॉटलैंड के हवाले करने से मना कर दिया जिसके बाद लीबिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जो दोनों लोगों के आत्मसमर्पण के बाद 1999 में हटाया गया। 2010 में ट्यूनीशिया से अरब जगत में बदलाव की क्रांति का प्रारम्भ हुआ तो उस संदर्भ में जिन देशों का नाम लिया गया, उनमें लीबिया को पहली पंक्ति में नहीं रखा गया था। क्योंकि गद्दाफी को पश्चिमी देशों का पिट्ठू नहीं समझा जाता था, जो क्षेत्र में जनता की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण समझा जाता था। उन्होंने तेल से मिले धन को भी दिल खोलकर बांटा। यह अलग बात है कि आखिरी कुछ सालों में उसने अपना ध्यान अपने और अपने परिवार को अमीर करने में लगा दिया। एक अनुमान के अनुसार गद्दाफी के पास सात बिलियन डालर (3.50 खरब रुपये) मूल्य का सोना था। कनाडा में 2.4 बिलियन डालर (1.19 खरब रुपये), आस्ट्रिया में 1.7 बिलियन डालर (84 अरब रुपये), ब्रिटेन में एक बिलियन डालर (49 अरब रुपये) तो लीबिया क्रांति के शुरू होने के बाद जब्त किए गए हैं। दुनियाभर के बैंकों में लीबिया की 168 अरब डालर की सम्पत्ति है। छह माह चले विद्रोह में लीबिया को 15 अरब डालर का नुकसान हुआ है।
मुअम्मर गद्दाफी अपनी जीवन शैली एवं जीने के तौर-तरीकों खासतौर पर अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहे। अकसर खबरें आती थीं कि उनकी सुरक्षाकर्मी महिलाएं थीं। एक बार जब वे अमेरिका गए तो किसी भवन में नहीं ठहरकर अपना शिविर लगाकर रहे। वर्ष 1942 में गद्दाफी का जन्म एक खानाबदोश परिवार में हुआ। 1961 में लीबिया की यूनिवर्सिटी में इतिहास का अध्ययन करने गए थे और उसके बाद वह बेनगाजी सैन्य अकादमी में शामिल हो गए। 1965 में ग्रेजुएट होने के बाद गद्दाफी लीबिया सेना में अपनी सेवा देने लगे। उन्हें 1966 में प्रशिक्षण देने के लिए ब्रिटेन की रॉयल सैन्य अकादमी स्टूअर्ट भेजा गया। एक अगस्त 1969 में गद्दाफी के नेतृत्व वाले सैन्य अधिकारियों के एक दल (फ्री ऑफिसर मूवमेंट) ने रक्तहीन क्रांति के जरिये तत्कालीन शासक इद्रीस को मार दिया और लीबिया में अरब गणराज्य की स्थापना की। गद्दाफी कभी भी भारत का दोस्त नहीं रहा। 1971 में युद्ध के बाद वह सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ मातम में शामिल हुआ था। यही नहीं, भुट्टो ने मुस्लिम देशों से इस्लामिक बैंक और इस्लामिक बम बनाने का आह्वान किया था तो तानाशाह गद्दाफी ने भुट्टो को सबसे ज्यादा प्रोत्साहन दिया था। भुट्टो भी गद्दाफी से इतने प्रभावित थे कि उसके नाम पर अपने देश के सबसे अच्छे स्टेडियम में से एक लाहौर स्थित स्टेडियम का नाम गद्दाफी स्टेडियम रखा। गद्दाफी ने एक बार भारत को उस समय भी कूटनीतिक असमंजस में डाल दिया था जब उन्होंने कश्मीर को एक स्वतंत्र देश बनाने का समर्थन किया और कहा कि यह भारत और पाकिस्तान के बीच एक बाथिस्ट देश होना चाहिए। वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र में अपने पहले सम्बोधन में कहा था कि भारत उन देशों में शामिल है जो सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए होड़ कर रहा है। कश्मीर स्वतंत्र देश होना चाहिए न भारतीय न पाकिस्तानी। हमें इस संघर्ष को खत्म करना चाहिए। यह पहली बार था जब भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर किसी इस्लामिक नेता ने भारत और पाकिस्तान से कश्मीर की पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की थी।
गद्दाफी ने सद्दाम हुसैन के शिकंजे में फंसने के बाद पश्चिम देशों के सामने हथियार डाले और अमेरिका का दोस्त बन गया। लेकिन जब अरब क्रांति के शुरू होते ही उनके अन्दर का तानाशाह जाग गया। इस दौरान लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाने के लिए उन्होंने सामूहिक बलात्कार जैसे अमानुषिक हथियार तक इस्तेमाल करने से परहेज नहीं किया। कर्नल गद्दाफी की यह नियति अलबत्ता कहीं न कहीं पश्चिम की दोहरी नीति का ही एक और उदाहरण है। यूरोप-अमेरिका ने अरब देशों का अधिक से अधिक दोहन भी किया और उन्हें उनके हाल पर छोड़ भी दिया। जाहिर है, पश्चिम के समर्थन के बगैर गद्दाफी चार दशकों तक अपना निरंकुश शासन नहीं चला सकता था और अब उनकी मौत के बाद लीबिया को लोकतंत्र के रास्ते पर ले जाने का रास्ता न तो राष्ट्रीय अंतरिम परिषद के पास है और न ही उनके आका यूरोप-अमेरिका के पास। जब अफगानिस्तान और इराक में ही शांति और स्थिरता का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है तो लीबिया के जमीनी हालत तो इनसे भी जटिल हैं। अंतिम क्षणों तक गद्दाफी ने हथियार नहीं डाले और विदेशी सेना और नए शासन के लड़ाकों के खिलाफ घंटों मोर्चा सम्भाले रखा। सैनिकों ने बर्बरता से लात-घूंसों से पिटाई की और पैर-पीठ में गोली मार दी।
A K Antony, America, Anil Narendra, Daily Pratap, Gaddafi, Libya, USA, Vir Arjun

Wednesday, 7 September 2011

हीरो से विलेन बने कर्नल मुअम्मर गद्दाफी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th September 2011
अनिल नरेन्द्र
लीबिया में विद्रोहियों को अब तक न तो कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को पकड़ने में सफलता मिली है और न ही वह उनके गृह नगर सिट्ते पर ही कब्जा कर पाए हैं। पिछले लगभग छह महीने से विद्रोहियों और गद्दाफी समर्थकों में लड़ाई चल रही है। गद्दाफी की हिम्मत और समर्थन की दाद देनी होगी कि एक तरफ तो उनके मुट्ठीभर समर्थक सैनिक हैं और दूसरी तरफ पश्चिमी देशों की पूरी मदद से लड़ रहे विद्रोही। पश्चिमी देश खासकर फ्रांस और अमेरिका हर सम्भव तरीके से इन विद्रोहियों की मदद कर रहा है। अमेरिका का दोहरा चेहरा एक बार फिर लीबिया में बेनकाब हुआ है। एसोसिएटेड प्रेस ने त्रिपोली में लीबियाई सुरक्षा एजेंसी की एक इमारत में पाए गए दस्तावेजों का खुलासा किया है जिससे पता चलता है कि सीआईए ने करीब से मुअम्मर गद्दाफी की खुफिया एजेंसियों के साथ काम किया। उन्होंने लीबिया के लिए संदिग्ध आतंकियों से पूछताछ में मदद की। इस घटनाक्रम से वाशिंगटन और लीबिया के शासकों के बीच तनाव का खतरा बढ़ गया है।
मुअम्मर गद्दाफी एक क्रांतिकारी से विलेन कैसे बन गया? वर्ष 1969 में जब उन्होंने सैनिक तख्ता पलट कर सत्ता हासिल की थी तो मुअम्मर गद्दाफी एक खूबसूरत और करिश्माई फौजी अधिकारी था। स्वयं को मिस्र के जमाल अब्दुल नासिर का शिष्य बताने वाले गद्दाफी ने सत्ता हासिल करने के बाद खुद को कर्नल के खिताब से नवाजा और देश के आर्थिक सुधारों की तरफ तवज्जों दी, जो वर्षों की विदेशी अधीनता के चलते जर्जर हालत में थी। सत्ता पलट से पहले वे कैप्टन के पद पर थे। अगर नासिर ने स्वेज नगर को मिस्र की बेहतरी का रास्ता बनाया था, तो कर्नल गद्दाफी ने तेल के भंडार को इसके लिए चुना।
लीबिया में 1950 के दशक में तेल के बड़े भंडार का पता चला था लेकिन उसके खनन का काम पूरी तरह से विदेशी कम्पनियों के हाथ में था जो उसकी कीमत ऐसी तय करते थे, जो लीबिया के लिए नहीं बल्कि खरीददारों को फायदा पहुंचाती थी। गद्दाफी पहले अरब शासक थे जिन्होंने तेल उत्पादन से आई आमदनी का बड़ा हिस्सा अपने देश के विकास में लगाया और विदेशी कम्पनियों को पहली बार यह समझ आया कि अब वह अरब देशों का शोषण नहीं कर सकेंगे। लीबिया वह पहला विकासशील देश था जिसने तेल के खनन से मिलने वाली आमदनी में बड़ा हिस्सा हासिल किया। दूसरे अरब देशों ने भी उसका अनुसरण किया और अरब देशों में 1970 के दशक की पेट्रो-बूम यानि तेल की बेहतर कीमतों से शुरू हुआ खुशहाली का दौर आरम्भ हुआ।
कम लोगों को मालूम होगा कि लीबिया में गद्दाफी ने अपने नागरिकों को जो सुविधाएं दी थीं उनका मुकाबला करना मुश्किल है। हर लीबियाई नागरिक को बिना ब्याज के कर्जा मिल सकता है। छात्रों को पढ़ाई के दौरान जिस काम के लिए वह पढ़ रहे हैं उसका वेतन दिया जाता है। यह वेतन उतना होता है जितना वह नौकरी करने पर पाते। यह उन्हें पढ़ाई के दौरान ही दे दिया जाता है।
अगर आपको नौकरी नहीं मिल रही तो आपको सरकार नौकरी का पूरा वेतन तब तक देती रहेगी जब तक आपको नौकरी नहीं मिल जाती। जब लीबिया नागरिक शादी करता है तो उसे सरकार की तरफ से एक अपार्टमेंट या घर मुफ्त दिया जाता है।
छात्र दुनिया में कहीं भी पढ़ाई कर सकते हैं। सरकार इस दौरान उन्हें 2500 यूरोस के साथ-साथ रहने का, खाने का व कार एलाउंस तक देती है। लीबिया में गाड़ी कॉस्ट प्राइज पर बिकती है। हर नागरिक के लिए फ्री शिक्षा और मेडिकल चिकित्सा उपलब्ध है। कुल जनसंख्या में से 25 फीसदी लोग यूनिवर्सिटी की डिग्री हासिल किए हुए हैं। आपको सड़कों पर कोई भिखारी नहीं मिलेगा, न ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो बेघर हो। यही वजह थी कि गद्दाफी अमेरिका, फ्रांस जैसे देशों की आंखों में खटकने लगे। गद्दाफी से अमेरिका कई वजहों से नाराज था। दरअसल गद्दाफी ने कुछ वर्षों शासन करने के बाद इस्लामी चरमपंथी संगठनों का समर्थन करना आरम्भ कर दिया। बर्लिन के एक नाइट क्लब पर साल 1986 में हुआ हमला इसी श्रेणी में था, जहां अमेरिकी फौजी जाया करते थे और जिस पर हमले का आरोप गद्दाफी के माथे मढ़ा गया हालांकि इसके कोई ठोस सबूत नहीं थे। घटना से नाराज अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने त्रिपोली और बेनगाजी पर हवाई हमलों की मार की। हालांकि हमलों में गद्दाफी बच गए, लेकिन कहा गया कि उनकी गोद ली बेटी हवाई हमलों में मारी गई। दूसरी घटना जिसने दुनिया को हिला दिया था वह थी लॉकबेरी शहर के पास पैनेम हवाई जहाज में बम विस्फोट जिसमें 270 लोग मारे गए थे। कर्नल गद्दाफी ने भारी दबाव के बावजूद हमले के दो संदिग्ध लीबियाई नागरिकों को स्कॉटलैंड के हवाले करने से मना कर दिया जिसके बाद लीबिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जो दोनों अधिकारियों के आत्मसमर्पण के बाद 1999 में हटाया गया, उनमें से एक मेगराही नाम के अधिकारी को उम्र कैद
हुई। जब दिसम्बर 2010 में ट्यूनीशिया से अरब जगत में बदलाव की क्रांति का प्रारम्भ हुआ तो उस संदेश में जिन देशों का नाम लिया गया उसमें लीबिया को पहली पंक्ति में नहीं रखा गया पर चूंकि कर्नल गद्दाफी पश्चिमी देशों के पिट्ठू बनने से इंकार करते थे इसलिए उन्हें जबरदस्ती निशाना बनाया गया।
उन्होंने तेल से मिले धन को भी दिल खोलकर बांटा। ये अलग बात है कि इस प्रक्रिया में उनका परिवार भी बहुत अमीर हुआ। इसलिए जब क्रांति की बात शुरू हुई तो उन्होंने कहा कि वह लोगों के साथ हैं, क्योंकि उनके पास कोई
सत्ता नहीं है और देश में जम्हूरियत है। लेकिन बाद में लोगों की नाराजगी सामने आई और जाहिर है कि कर्नल गद्दाफी उनका अपनी पूरी ताकत से विरोध कर रहे हैं। देर सवेर कर्नल गद्दाफी का पत्ता साफ होगा, क्योंकि उनके खिलाफ बहुत बड़ी ताकतें काम कर रही हैं और यह है कर्नल गद्दाफी की हीरो से विलेन तक की संक्षिप्त कहानी।
Anil Narendra, Daily Pratap, Libya, Moammar Qaddafi, Vir Arjun

Thursday, 25 August 2011

Another Arab Despot to Depart

Anil Narendra
The revolutionary storm that started from the Tahrir Square in Egypt, has reached Libya. Col Muammar Gaddafi,s days are numbered, who had been ruling over Libya for almost 42 years. Most of the capital Tripoli has been claimed over by the rebels. The opposition forces have captured Gaddafi’s son and his one time heir, Saif al-Islam. Saif along with his father is facing charges of human right violations at the International Criminal Court. NATO is continuing bombing operations over Tripoli and surrounding areas and has said that it would not stop its operation till the pro-Gaddafi forces surrender or return to their barracks. Gaddafi has gone underground. Some sources claim that he has fled to neighbouring Algeria, while others say that he might be hiding in a bunker. Amidst people rejoicing at Tripoli’s Green Square, the symbol of Gaddafi’s power, the international community has demanded that Gaddafi leave power. A number of world leaders including US President Barack Obama, said on Monday that Col Muammar Gaddafi has no place in the Libyan future. They said that this is the easiest way to end the prevalent violence. Col Gaddafi and his government must realize that they have come to a dead end. British Prime Minister, David Cameron has said that Gaddafi is fleeing. There is no possibility for him to stick to power.
There is not an iota of doubt that 42 year-old rule of Col Muammar Gaddafi is approaching its end. The rebels are saying that they would suspend their operations, only if Gaddafi declares to step down, while Gaddafi, prior to accepting rebels’ demands have been exhorting tribals to come to Tripoli to fight rebels, and threatening that otherwise he will join the French Army as a soldier. It is clear that power is slipping out of his hands. The rebellion against Gaddafi of Libya, following Tunisian revolution of last December and then the bloodless coup against Hosni Mubarak of Egypt, was unexpected. In fact the indication of this rebellion started surfacing in early February, but the time taken to its developing in a full blown rebellion, indicates Gaddafi had strong hold over the Libyan military establishment. Gaddafi, at the age of just 27 years came to power in Libya after dethroning King Indris in a coup in 1969. Those were the times when there were conflicts between the communism under the leadership of Soviet Russia and American capitalism. At that time, the young Gaddafi presented a new formula for rule through his green book, which he called Jamhuriya. But, jamhuriat (democracy) was never established in Libya, as the Libyan political parties were banned. The youngman, who had put forth a vision of democracy was soon got addicted to the luxuries. Not only this, there was time when Gaddafi started openly supporting the Islamic jihadis against US and other Western countries. Since then, Gaddafi has become thorn in the flesh of US and other Western countries. The support of these countries to the rebels is also one of the major reasons for rebels strengthening their hold in Libya. It is therefore that Obama has said that there is no place for Gaddafi in Libya. But, what will happen after Gaddafi? These are testing times for Libya. In case the present government goes down, will a new law and order structure be established or will anarchy prevail there? There is another question. Whether efforts will be made to establish a new government or revenge will be resorted to? What is the guarantee that Islamic extremists will not dominate the new government, as has been witnessed in other Arab countries? Even fear has been expressed that after Gaddafi’s ouster, the Libyan society would disintegrate. Coming months could be challenging for Libya.

एक और अरब तानाशाह की विदाई

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th August 2011
अनिल नरेन्द्र
मिस्र के ताहिर स्केवयर से शुरू हुई जन आंधी अब लीबिया तक पूरी तरह पहुंच चुकी है। तकरीबन 42 साल तक लीबिया में राज करने वाले कर्नल मुअम्मर गद्दाफी का अंत आ गया है। सोमवार को राजधानी त्रिपोली के अधिकांश हिस्से पर लीबिया विद्रोहियों का कब्जा हो गया है। विपक्षी लड़ाकों ने गद्दाफी के बेटे और एक तरफ उनके उत्तराधिकारी रहे सैफ अल इस्लाम को पकड़ लिया है। सैफ अपने पिता के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक अदालत में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों का सामना कर रहा है। नाटो की त्रिपोली और आसपास के इलाकों में बमबारी जारी है और उसने कहा है कि जब तक गद्दाफी समर्थक सैनिक आत्मसमर्पण नहीं कर देते या अपने बैरेक में नहीं लौट जाते तब तक वह बमबारी जारी रखेंगे। गद्दाफी लापता है। कुछ का कहना है कि वह पड़ोसी देश अल्जीरिया भाग गए हैं या हो सकता है कि वह किसी बंकर में छिपे बैठे हों। गद्दाफी की सत्ता के पतीक त्रिपोली स्थित ग्रीन चौक में निवासियों की खुशी मनाने के बीच अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने लीबियाई नेता से मांग की है कि वे सत्ता छोड़ दें। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा सहित कई विश्व के नेताओं ने सोमवार को कहा कि लीबिया में भविष्य के रूप में कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंसा के अंत का यह तरीका काफी आसान है। कर्नल गद्दाफी और उनके शासन को यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि उनकी सत्ता का अंत हो चुका है। ब्रिटिश पधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा कि गद्दाफी अब मैदान छोड़कर भाग रहे हैं। गद्दाफी के पास सत्ता में बने रहने की कोई सम्भावना नहीं है।
इसमें कोई संदेह अब नहीं लगता कि पिछले 42 सालों से लीबिया की सत्ता पर काबिज गद्दाफी का शासन अब ध्वस्त होने के कगार पर है। जहां विद्रोहियों का यह कहना है कि गद्दाफी सत्ता छोड़ने की घोषणा कर दें तो वे अपनी कार्रवाई रोक सकते हैं, वहीं गद्दाफी उनकी पेश स्वीकार करने के पहले रेडियो संदेश के जरिए काबलियाई लोगों से आग्रह कर रहे हैं कि वे त्रिपोली आकर विद्रोहियों से युद्ध करें, वरना वे फांसीसी सेना के सेवक बन जाएंगे। उनके इस कदम से स्पष्ट है कि अब वे समझ चुके हैं कि उनके दिन गिने-चुने रह गए हैं। पिछले वर्ष दिसंबर में ट्यूनीशिया की कांति और फिर मिस्र में हुस्नी मुबारक के रक्तहीन तख्ता पलट के बाद लीबिया के गद्दाफी के खिलाफ हुई बगावत अपत्याशित रही है। दरअसल उनके खिलाफ विद्रोह तो फरवरी में ही शुरू हो चुकी थी, जिसे अंजाम तक पहुंचने में इतना वक्त लगा है, तो इसके पीछे लीबिया के सैन्य तंत्र पर गद्दाफी की पकड़ का पता चलता है। महज 27 साल की उम्र में गद्दाफी ने 1969 में राजा इंदरीश को बेदखल कर लीबिया की सत्ता पर कब्जा किया था। यह वह दौर था, जब दुनिया में सोवियत रूस की अगुवाई में साम्यवाद और अमेरिका के पूंजीवाद के बीच द्वंद्व चल रहा था। तब युवा गद्दाफी ने अपनी ग्रीन बुके के जरिए शासन का नया सूत्र पेश किया था और इसे नाम दिया था जम्हारिया। मगर सही मायनों में लीबिया में जम्हूरियत कभी नहीं आई, क्योंकि वहां राजनीतिक दलों पर पतिबंध लगा दिया गया था। जिस युवा ने जम्हूरियत का सपना दिखायाथा, वह बाद में वर्षों तक अपनी विलासता में डूबता चला गया। यही नहीं एक समय तो ऐसा भी आया जब गद्दाफी ने अमेरिका, फांस, इत्यादि देशों पर इस्लामिक जेहादियों को सब तरह का खुला समर्थन दिया। तभी से गद्दाफी अमेरिका और पश्चिमी देशें की आखों में किरकिरी बना हुआ है। आज अगर लीबिया के विद्रोही हावी हो गए हैं तो इसके पश्चिमी देशों का उन्हें समर्थन भी एक कारण है। इसीलिए ओबामा ने गद्दाफी को कहा है कि अब लीबिया में उसका कोई स्थान नहीं। सवाल यह है कि गद्दाफी के बाद क्या होगा? लीबिया के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। यदि वर्तमान शासन हट भी गया तो क्या एक नई कानून-व्यवस्था वहां लागू हो पाएगी या फिर अराजकता का माहौल होगा? सवाल यह भी है कि वहां एक नए सिरे से एक शासन खड़ा करने की कोशिश की जाएगी या बदला लेने पर जोर होगा? इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि नई व्यवस्था में इस्लामी कट्टरपंथी पूरी तरह से हावी हो जाएं जैसे अन्य अरब देशों में हुआ है। इतना ही नहीं यह डर भी मौजूद है कि कहीं कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के हटने के बाद कहीं लीबियाई समाज बिखर न जाए। आने वाले कुछ महीने लीबिया के लिए काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं
 America, Anil Narendra, Daily Pratap, Libya, Obama, USA, Vir Arjun