पठानकोट की तरह एक बार फिर साल के शुरू
में ही जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमला हुआ। जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर में रविवार
रात एक बजे आतंकियों ने जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स के शिविर पर हमला करके शिविर
में काम करने वाले तीन मजदूरों को मौत के घाट उतार दिया। शिविर पर पहले हथगोले फेंके,
फिर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, वहां रखे वाहनों और दफ्तरी दस्तावेजों में आग लगाई और
अंधेरे तथा कोहरे का फायदा उठाकर भागने में सफल रहे। उस वक्त शिविर में 10 कर्मचारी
और 10 मजदूर मौजूद थे। आतंकी हमले में तीन मजदूर मारे गए। इससे पहले, आतंकियों ने जम्मू
के ही नगरोटा क्षेत्र में सेना के एक शिविर पर हमला बोला था, जिसमें दो अधिकारी समेत
सात जवानों की जान गई थी। उसी दिन सांबा जिले में सीमा सुरक्षा बल के एक शिविर पर भी
आतंकी हमला हुआ था। इन दहशतगर्दों ने 40 दिन बाद फिर हमला बोलकर यह जता दिया कि उनकी
सक्रियता न सिर्फ बनी हुई है, बल्कि शायद और बढ़ गई है। आतंकियों ने जिस तरह धावा बोला
उससे इसी अंदेशे को बल मिलता है कि इन आतंकियों के लिए भारतीय सीमा को भेदना अभी भी
आसान बना हुआ है। इससे आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के मुकम्मल होने पर एक बार फिर सवाल
उठते हैं। दूसरे, नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूट जाने के सरकार के दावे पर भी सवालिया
निशान लगता है। यह समझना कठिन है कि नियंत्रण रेखा से महज दो किलोमीटर निकट भी सुरक्षा
व्यवस्था इतनी पुख्ता क्यों नहीं है कि आतंकी इतनी आसानी से हमले को अंजाम दे रहे हैं?
न केवल हमला ही करते हैं, हमला करने के बाद भागने में भी सफल हो रहे हैं? पिछले साल
सितम्बर में सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद खूब बढ़चढ़ कर ये दावे किए गए थे कि अब
घुसपैठ करने और यहां आकर कोई वारदात करने से पहले आतंकी सौ बार सोचेंगे। 38 आतंकियों
को ढेर कर देने तथा सीमा पार स्थित आतंकी ढांचा नष्ट कर देने के दावे से यह भी लगा
था कि अब आतंकियों की ताकत बहुत कम हो गई है। लेकिन ये उम्मीदें अब धूमिल होती जा रही
हैं। वस्तुस्थिति जो भी हो, इस आशंका को दूर किया जाना चाहिए कि पहली बात कि आतंकियों
के लिए अब भी हमारी सीमा में घुसना, दूसरा इतनी आसानी से हमला करना अब भी संभव है।
सीमा पर सुरक्षा को प्राथमिकता देना और अभेद्य बनाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि पठानकोट,
उड़ी और नगरोटा में हुए भीषण आतंकी हमलों ने यह साबित कर दिया है कि वह जब चाहें, जहां
चाहें हमले को अंजाम दे सकते हैं। सेना के शिविरों पर हमलों के बाद भारत सरकार को यह
भी समझ लेना चाहिए कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। पाकिस्तान के रुख-रवैये में
कोई बदलाव आने की उम्मीद नहीं, हमें अपना घर पक्का करना होगा।
Translater
Friday, 13 January 2017
कांग्रेस और हरीश रावत के लिए चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न
उत्तराखंड में 15 फरवरी को विधानसभा चुनाव के शंखनाद के बाद सियासी
सरगर्मियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस के लिए यह चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
पार्टी दूसरी बार प्रदेश की सत्ता की बागडोर अपने हाथों में लेने को उतावली है तो इसकी
सियासी वजह भी हमें समझ आती है। कांग्रेस की असली चिन्ता राज्यों में सिमटते जनाधार
को बचाने की है। भाजपा के प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता पर बैठने के बाद कांग्रेस
राज्यों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने हेतु आने वाले समय में केंद्रीय सत्ता पर अपनी
दावेदारी को और मजबूत करने के लिए आने वाले पांच राज्यों में चुनाव जीतने का पूरा प्रयास
करेगी। इस लिहाज से विधानसभा चुनाव में भी सत्ताधारी दल होने के बावजूद कांग्रेस अपनी
तैयारी को लेकर बेहद सतर्क और सजग तो है ही, उसे आक्रामक बनाने में कसर नहीं छोड़ रही
है। चुनाव से पहले विभिन्न सर्वेक्षणों में पीछे चल रही कांग्रेस को अब चुनावी रणनीतिकार
प्रशांत किशोर नामक च्यवनप्राश का सहारा है। रविवार को प्रेस कांफ्रेंस में इस बारे
में सवाल करने पर सीएम हरीश रावत ने प्रशांत किशोर को च्यवनप्राश बताते हुए कहाöबढ़ती
उम्र में ऐसे टॉनिकों का सहारा लेना पड़ता है। चुनावी रणनीति तय करने के लिए उत्तराखंड
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से नियुक्त
चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के बीच कई बैठकों का दौर हो चुका है। मुख्यमंत्री हरीश
रावत ने घोषणा की कि 14 या 15 जनवरी तक कांग्रेस के सभी उम्मीदवारों के नामों की घोषणा
कर दी जाएगी। वहीं दूसरी ओर सांगठनिक रूप से खासी मजबूत मानी जाने वाली भाजपा पांच
साल पहले गंवाई सत्ता पर इस बार फिर काबिज होने के लिए हर मुमकिन दांव आजमा रही है।
पिछले कई महीनों से संगठन स्तर पर चलाए जा रहे कार्यक्रमों के जरिये पार्टी अपने कार्यकर्ताओं
को सक्रिय करने में लगी हुई है। पार्टी को सांगठनिक तैयारियों के अलावा प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी व उनकी केंद्र सरकार पर भी बड़ा भरोसा है कि चुनावी नैया को पार लगाने
में केंद्र की भी अहम भूमिका रहेगी। भाजपा ने जनवरी के पहले सप्ताह में सभी 70 विधानसभा
सीटों पर त्रिशक्ति सम्मेलनों का आयोजन कर बूथ स्तर
तक जाकर कार्यकर्ताओं
को सक्रिय करने का अभियान चलाया। पीएम की देहरादून में पिछले दिनों हुई रैली में जिस
कदर जन सैलाब उमड़ा उससे भाजपा फूली नहीं समा रही है। इसी कार्यक्रम में केंद्र सरकार
की महत्वाकांक्षी 12 हजार करोड़ रुपए की ऑल वेदर रोड का शिलान्यास किया गया। पिछले
लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह वाराणसी को स्कैन करना शुरू कर
दिया था, उसी तरह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत भी केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र
को स्कैन करने में जुटे हैं। अपने कार्यकाल में रावत ने इस क्षेत्र में 33 दौरे किए,
जिनमें से 28 केवल केदारनाथ धाम के थे। बदली स्थितियों में केदारनाथ से चुनाव लड़कर
वह गढ़वाल में कांग्रेस संगठन को दे सकते हैं मजबूती। असल में जिन 10 विधायकों ने कांग्रेस
का हाथ छोड़ा, उनमें ज्यादातर गढ़वाल के हैं। इससे यहां पार्टी संगठन की स्थिति कमजोर
हुई है। जबकि कुमाऊं मंडल में मुख्यमंत्री का अब भी अच्छा प्रभाव है। ऐसे में माना
जा रहा है कि केदारनाथ से दांव खेलने पर वह गढ़वाल में कांग्रेस को मजबूती देने का
कार्य कर सकते हैं। उत्तराखंड में दोनों दलों में कांटे की टक्कर है। पिछले चुनाव में
कांग्रेस की एक सीट ज्यादा थी।
-अनिल नरेन्द्र
Thursday, 12 January 2017
गिरगिट की तरह रंग बदलते मुलायम सिंह यादव
तमाम उठापटक के बाद सोमवार को
आखिर समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बोल ही दिया कि चुनाव बाद अखिलेश
ही सीएम होंगे। सपा के इस महादंगल में अभी तक सख्त दिख रहे मुलायम के इस यू-टर्न को
लेकर सियासी गलियारों में चर्चा हो रही है कि यह उनके मन की बात है या तयशुदा पटकथा?
सवाल किया जा रहा है कि क्या अंतत सपा समझौते की राह पर है? सपा में टिकटों के बंटवारे
को लेकर शुरू हुआ विवाद पार्टी के बंटवारे और चुनाव चिन्ह तक पहुंच गया है। अखिलेश
को मुख्यमंत्री का चेहरा न बनाने की घोषणा इसकी बड़ी वजह थी। मुलायम ने पहले कहा था
कि मुख्यमंत्री का चुनाव विधायक दल करेगा (चुनाव परिणाम के बाद)। इसके बाद कहा कि सपा
में किसी को सीएम का चेहरा प्रोजेक्ट करने की परंपरा नहीं है। उन्हीं मुलायम ने सोमवार
को ऐसा यू-टर्न लिया कि राजनीति के दिग्गज अलग-अलग मायने निकालने पर मजबूर हो गए हैं।
दो खेमों में बंट चुकी सपा के दोनों पक्षों ने सोमवार को निर्वाचन आयोग में अपनी-अपनी
बातें, दलीलें रखीं। मुलायम सिंह जब रविवार को लखनऊ से दिल्ली के लिए रवाना हुए थे
तब भी उनका रुख बदला-बदला सा था। अचानक पार्टी कार्यालय पहुंचकर उन्होंने शीघ्र विवाद
सुलझ जाने के संकेत दिए थे। कहा था कि पार्टी में कोई विवाद नहीं है। जो थोड़ा बहुत
मामला है, उसे जल्द सुलझा लिया जाएगा। एक तरफ तो मुलायम कह रहे हैं कि कोई विवाद नहीं
है दूसरी तरफ सपा के दोनों गुट अब सारी लड़ाई चुनाव चिन्ह साइकिल पर लड़ रहे हैं। दोनों
गुटें की रणनीति अब साइकिल के हक पर केंद्रित हो गई है। साइकिल का मलिक तय हो तो उनकी
चुनावी गाड़ी आगे बढ़े। सोमवार को यह लड़ाई या ड्रामा जो भी कहें चुनाव आयोग पहुंच
गया है। एक जनवरी को राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन में अखिलेश यादव को अध्यक्ष चुने
जाने के बाद सपा औपचारिक रूप से दो फाड़ हो गई है। अब समाजवादी पार्टी के दो अध्यक्ष
हैं, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव। कौन असली अध्यक्ष है, यह साबित होना है। पिता-पुत्र
के आमने-सामने आने से सपा के चुनाव चिन्ह साइकिल को लेकर जंग छिड़ी हुई है। दोनों खेमे
चुनाव आयोग में अपने-अपने पक्ष की दलीलें दे चुके हैं। प्रदेश में 17 जनवरी से पहले
चरण के मतदान के लिए नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इससे पहले ही प्रत्याशियों
को चुनाव चिन्ह का आबंटन शुरू हो जाएगा। यानी दोनों ही खेमों के पास वक्त बहुत कम बचा
है। मुलायम को नए सिरे से अपने प्रत्याशियों का चयन करना है तो अखिलेश को गठबंधन को
अंतिम रूप देना है। ये दोनों काम भी बहुत हद तक चुनाव चिन्ह की प्रतीक्षा में अटके
हैं। उम्मीद है कि इसी सप्ताह आयोग कोई फैसला सुनाएगा। जाहिर है कि किसी एक गुट को
सिम्बल मिलेगा या फिर जब्त हो जाएगा? राजनीति के जानकार सिम्बल जब्त होने की ज्यादा
संभावना जता रहे हैं। भारत निर्वाचन आयोग दोनों गुटों को सुन चुका है। सोमवार को दोनों
गुटों ने दूसरी बार अपना पक्ष रखा। आयोग ने जल्द फैसला नहीं सुनाया तो सिम्बल जब्ती
के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। ऐसे में दोनों गुटों को अस्थायी तौर पर मान्यता देते
हुए नए सिम्बल आबंटित किए जा सकते हैं।
öअनिल नरेन्द्र
बीएसएफ जवान सीमा पर भूखे रहने को मजबूर
सीमा
पर अपनी जान की बाजी लगा रहे हमारे बहादुर जवानों को पेट भर खाना भी नसीब नहीं हो रहा
है। जम्मू-कश्मीर में बीएसएफ के एक जवान ने अपने अफसरों पर गम्भीर आरोप लगाए हैं।
29वीं बटालियन के जवान तेज बहादुर यादव ने
रविवार को फेसबुक पर एक के बाद एक 4 वीडियो पोस्ट किए। फेसबुक पर यादव के 4 वीडियो
एक दिन में 65 लाख बार देखे गए। इसमें तेज बहादुर यादव ने जवानों को खराब खाने की शिकायत
करते हुए कहा कि सरहद पर जवान 11 घंटे की ड्यूटी करने के बाद भी भूखे सोने को मजबूर
हैं। क्योंकि अधिकारी राशन बेच देते हैं। पहले वीडियो में यादव ने बताया कि हम सुबह
6 से 5 बजे तक बर्फ में खड़े होकर ड्यूटी देते हैं। हमारी स्थिति न मीडिया दिखाता है,
न मिनिस्टर सुनता है। कोई भी सरकार आए, हमारे हालात वही हैं। हम सरकार पर आरोप नहीं
लगाना चाहते। सरकार हर सामान देती है पर अन्य अधिकारी बेचकर खा जाते हैं। हमें कुछ
भी नहीं मिलता। कई बार जवान भूखे पेट सोते हैं। मैं प्रधानमंत्री से कहना चाहता हूं
कि वे इसकी जांच कराएं। दोस्तो यह वीडियो डालने के बाद शायद मैं रहूं या न रहूं। अधिकारियों
के हाथ बहुत बड़े हैं। वे मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं। वीडियो 2 और 3 में दिखाया गया है कि किस तरह की
दाल जवानों को परोसी जाती है। यह है बीएसएफ की दाल। सिर्फ हल्दी और नमक। न इसमें प्याज
है, न लहसुन, अदरक। तड़का लगाने के लिए जीरा तक नहीं है। जवानों को दस दिन से यही दाल-रोटी
मिल रही है। आप ही बताइए यह खाकर क्या कोई जवान दस घंटे ड्यूटी कर सकता है? अधिकारी
सारा सामान बाजार में बेच देते हैं। चौथे वीडियो में दिखाया गया है नाश्ते का। सुबह
के नाश्ते में एक जला हुआ पराठा और चाय का गिलास ही मिलता है। इसके साथ न जैम, न जेली
और न अचार व दही। कुछ भी नहीं मिलता है। हम यह नहीं कह सकते कि यह आरोप कितने सत्य
हैं पर अगर हैं तो यह अत्यन्त गंभीर हैं। अपनी जान की बाजी लगाने वाले हमारे बहादुर
जवानों को पेटभर खाना न मिले लानत है। इससे बेहतर खाना तो तिहाड़ जेल में बंद खूनियों,
दरिन्दों को मिलता है। बीएसएफ अधिकारी अपनी खाल बचाने के लिए उलटे-सीधे बहाने व आरोप
तेज बहादुर यादव पर लगा रहे हैं। कहा जा रहा है कि उसे काउंसलिंग की जरूरत रही है।
शराबखोरी, अफसरों से दुर्व्यवहार और अनुशासन तोड़ना उसकी आदत है। इस कारण ज्यादातर
समय उसे हेडक्वाटर में ही रखा गया। जो वीडियो तेज बहादुर ने पोस्ट किया उसमें तो वह
बर्फ में ड्यूटी देता दिखाई दे रहा है। अंग्रेजी में कहावत है डोन्ट शूट द मैसेंजर।
यानी तेज बहादुर कैसा है प्रश्न यह नहीं, सवाल तो यह है कि जो वह दिखा रहा है वह सही
है या नहीं। मामले की जांच कर कसूरवार अधिकारियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
Wednesday, 11 January 2017
पंजाब में बिसात बिछ चुकी है
पांच राज्यों के चुनावों की घोषणा के बाद सारे देश की नजरें सबसे
ज्यादा महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश और पंजाब पर टिक गई हैं। पंजाब के लोगों के पास
अपने मन की बात कहने के लिए चुनाव कमिशन ने 30 दिन का वक्त दिया है। पंजाब में आम तौर
पर अकाली-भाजपा गठबंधन बनाम कांग्रेस के बीच मुकाबला होता रहा है। पर इस बार आम आदमी
पार्टी के चुनावी दंगल में कूदने के बाद मुकाबला त्रिकोणीय बनता नजर आ रहा है। चार
फरवरी को होने जा रहे विधानसभा चुनाव में इन्हीं तीनों के बीच कड़ा संघर्ष होगा। पहले
बात हम अकाली दल की करते हैं। 10 साल में राजसत्ता का सुख भोग चुके शिरोमणि अकाली दल
के नेताओं ने पिछले छह महीनों के दौरान वह सब कुछ करने की तमाम कोशिशें की हैं जो उन्होंने
पिछले साढ़े नौ साल के दौरान नहीं कीं। पार्टी का ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत आधार
है और भाजपा के साथ गठबंधन से प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे का भी लाभ है। हरमंदिर साहिब
स्वर्ण मंदिर का विकास, त्रिकोणीय मुकाबले में विरोधी वोटों का संभावित बंटवारे का
भी पार्टी को लाभ मिल सकता है। दूसरी ओर इस गठबंधन के सामने चुनौतियां भी कम नहीं।
एंटी इनकम्बेंसी से जूझना होगा। नशे का कारोबार और नोटबंदी के बाद बढ़ती बेरोजगारी,
कानून व्यवस्था बड़ी चुनौतियां होंगी। कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस की इस जंग में
नेतृत्व कर रहे हैं। नवजोत सिंह सिद्धू अगर कांग्रेस में शामिल होते हैं तो वातावरण
में कांग्रेस को मजबूती मिलेगी। कांग्रेस की ताकत होगी, ड्रग्स, कारोबार, कानून व्यवस्था,
बेरोजगारी और नाभा जेल व पठानकोट हमले जैसे मुद्दे। पर कांग्रेस के सामने भी चुनौतियां
कम नहीं। कांग्रेस के लिए विभिन्न धड़ों को एकजुट करना, पार्टी नेताओं के बीच बेहतर
तालमेल बैठाना, ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी
का प्रभाव बढ़ाना और सत्ता विरोधी वोटों के बंटवारे को रोकना कुछ चुनौतियां हैं। अकाली
दल के साथ नवजोत सिंह सिद्धू जी की निजी रंजिश बहुत गहरी है, जिसका फायदा कांग्रेस
को अवश्य मिलेगा। दूसरी तरफ उनकी जुबां आप पार्टी को भी नहीं बख्शने वाली होगी, क्योंकि
सिद्धू ने आप की कुछ ऐसी-ऐसी हरकतें देखी हैं जिनके बाद वह चुप नहीं रहेंगे। आप पार्टी
को अकाली दल और कांग्रेस से नाराज लोगों के व्यक्तित्व के बजाय मुद्दों पर आधारित सरकार
का विकल्प देने वाले दल के रूप में उभरने का अवसर मिलेगा। नई पार्टी होने से जनता में
शासन प्रणाली को लेकर किसी तरह की नाराजगी या असंतोष नहीं होगा। पर पंजाब में संगठन
का सीमित दायरा, दिल्ली में केजरीवाल सरकार की कारगुजारी, आप से अलग हुए असंतुष्टों
से बचना, पार्टी में एक प्रभावी सिख चेहरे की फिलहाल कमी यह है कुछ चुनौतियां केजरीवाल
के सामने हैं। कुल मिलाकर पंजाब में चुनावी बिसात बिछ चुकी है। देखें, चुनावी प्रचार
कैसा होता है।
-अनिल नरेन्द्र
प्रणब मुखर्जी की चिन्ता वाजिब है
नोटबंदी काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ
बेशक एक बड़ा कदम है मगर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की चेतावनी पर भी गौर करना जरूरी
है कि इस कदम से दीर्घकाल में मिलने वाले लाभ की प्रत्याशा में गरीबों को हो रही तकलीफ
की अनदेखी भी नहीं की जा सकती है। इस पर सरकार को गौर करना जरूरी है। राज्यपालों और
उपराज्यपालों के लिए नए साल के अपने संबोधन में महामहिम ने दोहराया है कि नोटबंदी काले
धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा कदम है लेकिन इसके साथ ही आशंका भी जताई है कि इससे
आंशिक मंदी आ सकती है। आर्थिक विकास के दम पर मजबूत फैसले ले रही केंद्र सरकार के लिए
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के अनुमान से यह साबित होता है कि नोटबंदी से
देश को कुछ क्षेत्रों में नुकसान भी हो रहा है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने
चालू वर्ष के लिए 7.1 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान लगाया है जो कि एक साल पहले 7.6
प्रतिशत के मुकाबले कम है। मगर अर्थविद् और निजी आर्थिक एजेंसियां इस आंकड़े से इत्तेफाक
नहीं रखतीं। उनकी मानें तो जब अंतिम तौर पर आंकड़े आएंगे तो विकास दर की तस्वीर वैसी
नहीं रहेगी, जैसी बताई जा रही है। इन सभी का तर्क है कि जब नोटबंदी के असर को शामिल
नहीं किया गया है तो फिर जीडीपी वृद्धि के आंकड़े सही कैसे हो सकते हैं? इन एजेंसियों
की नजर में देश की विकास दर छह से 6.6 प्रतिशत के बीच रहेगी। यहां यह भी उल्लेखनीय
है कि चालू वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के अनुमान में अधिकतर आंकड़े अप्रैल
से अक्तूबर तक के ही शामिल किए गए हैं। मतलब है कि नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था पर
इसका क्या प्रभाव पड़ा, इसका अनुमान इसमें नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते
आठ नवम्बर को 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों को चलन से हटाने की घोषणा की थी। इसके
बाद से ही विशेषज्ञों ने कहा था कि इस कदम का अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा
और विकास दर में दो प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। स्टेट बैंक का आकलन है कि फरवरी
के अंत तक ही स्थिति 90 प्रतिशत तक सामान्य हो पाएगी। गरीब और वंचित तबके के लिए दो
महीने का वक्त काफी लंबा होता है। जैसा कि राष्ट्रपति ने कहा है, वे अधिक इंतजार नहीं
कर सकते, इसलिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि एक ऐसी पहल, जिसमें विकास की दूरगामी
सोच शामिल है का हिस्सेदार बनने से जनता व हाशिये के लोग न छूट जाएं।
Tuesday, 10 January 2017
अखिलेश कांग्रेस से गठबंधन करने पर मजबूर हो सकते हैं
यूपी में चुनाव से ऐन पहले समाजवादी पार्टी में रार चरम पर पहुंच
गई है। पिता-पुत्र का यह घमासान अगर खत्म हो जाए और समझौता हो जाए (जिसकी संभावनाएं
दिन-प्रतिदिन घटती जा रही हैं) तो और बात है नहीं तो पार्टी दो धड़ों में बंटती नजर
आ रही है। अब सवाल यह है कि क्या अखिलेश और मुलायम अलग-अलग लड़ेंगे। यदि ऐसा होता है
तो किसका पलड़ा भारी होगा? सी वोटर के ताजा सर्वे पोल के अनुसार सभी आयुवर्ग, क्षेत्र
और ज]ित के अधिकतर सपा समर्थक अखिलेश यादव खेमे के साथ हैं मगर सत्ता की दौड़ में बने
रहने के लिए अखिलेश को कांग्रेस का साथ भी जरूरी होगा। अगर कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल
के साथ अखिलेश यादव गुट का गठबंधन होता है तो अब भी वह चुनाव जीतकर सबको चौंका सकते
हैं। इस पारिवारिक विवाद ने मुलायम सिंह यादव को बहुत कमजोर कर दिया है। उनके पारंपरिक
वोटरों ने भी संकट की इस घड़ी में उनका साथ छोड़कर अखिलेश का दामन पकड़ लिया है। ताजा
सर्वे में अखिलेश समर्थित सपा के पाले में 24.9 प्रतिशत मतदाता हैं और मुलायम समर्थित
सपा को 3.4 प्रतिशत लोगों का ही साथ मिल सकता है। सर्वे में कांग्रेस को 5.8 प्रतिशत
लोगों का साथ मिला है। बाकी दलों की बात करें तो सर्वे में भाजपा को 30.2 प्रतिशत,
बसपा को 24.2 प्रतिशत ने समर्थन दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा को 22.4 प्रतिशत
वोट मिला था और कांग्रेस को 7.5 प्रतिशत वोट। इन दोनों को मिलाकर 30 प्रतिशत वोट मिला
था और अगर यही ट्रेंड रहा तो गठबंधन चुनाव जीत सकता है। अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के
सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे हैं और पूरे विवाद से सबसे ज्यादा फायदा उनको ही
हुआ है। यादव परिवार के विवाद से दूसरे दलों के वोट में कोई खास बढ़ोतरी की संभावनाएं
नहीं दिख रही हैं। लेकिन एसपी में दो धड़े होने और पांच प्रतिशत वोट बंटने से वह दूसरे
नम्बर पर आ गई है। इस प्रकरण से एसपी के अनुमानित वोट बंटने से अखिलेश गुट भाजपा से
दूसरे नम्बर पर आ जाता है। लेकिन कांग्रेस और आरएलडी के साथ आने से गठबंधन पूरे राज्य
में सबसे अधिक वोट ले सकता है। सर्वे के अनुसार एसपी का वोट कांग्रेस में शिफ्ट हो
जाएगा लेकिन कांग्रेस का वोट एसपी को जाएगा, इसमें थोड़ा संदेह है क्योकि सर्वे के
अनुसार एसपी के गैर-यादव और मुस्लिम वोटरों ने संकेत दिया है कि विवाद के बाद दूसरे
दल (बसपा) को वोट देने के बारे में भी वह सोच सकते हैं। मुस्लिमों के 18 प्रतिशत के
करीब वोट हैं और इनको यह फैसला करना है कि भाजपा को कौन हरा सकता है? सपा-कांग्रेस
गठबंधन या फिर बहुजन समाज पार्टी?
-अनिल नरेन्द्र
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