The issue of US ban on seven Muslim nations and strictness on Pak citizens is still hot in the entire world and meanwhile one more nation Kuwait (itself a Muslim nation) has also banned the entry from five Muslim nations. Kuwait has cancelled the visa issuing process for the residents of Pakistani, Syrian, Iraqi, Afghani and Iranian origin. Such decision of Kuwait has confirmed the issue raised by India that Pak has become the safe shelter for terrorism. As per the local newspaper 'Sputnik News' Kuwait has taken such big decision to stop terrorism in its own nation. It means that citizens of Syria, Iraq, Afghanistan and Iran including Pakistan can't enter Kuwait now. Kuwait has stopped the tourism, trade and tourist visa with these five nations. Kuwait is the only nation who had banned the entry of Syrian citizens much before the Trump administration's ban on Muslim nations. Kuwait cancelled the visas of all Syrian citizens in the year 2011. It means that the initiative taken by the Trump administration was already incorporated by Kuwait. However, the Kuwaiti action against Pakistan was a little bit surprising due to good relations between them. As such the question arises whether Kuwait took this step under the US pressure or supported the Indian stand for so long? It can't be denied that Kuwait is struggling hard with the Islamic terrorism for a long time. The current Kuwaiti action shows that the Islamic terrorism has created internal problems even in the Muslim nations. The same indications were visible in the joint declaration by the Prime Minister Narendra Modi and Prince of Abu Dhabi Al Nahyan, visiting New Delhi on the occasion of the Republic Day on 26th January. Are these incidents indicating the new polarization on the globe against the Muslim nations providing shelter to the terrorism? Banning Pakistan supports the fears of India that Pakistan is behind all the terrorist incidents happening in various parts of the country including Jammu & Kashmir. Kuwaiti ban on Pakistan is an alarm bell for it. Other liberal nations may also take action against the nations sponsoring the terrorism like Kuwait.
Anil Narendra
Translater
Tuesday, 7 February 2017
Kuwait’s trump card on visa
सियासी चन्दे पर अंकुश ः सही कदम पर अधूरा
काले
धन का एक बहुत बड़ा कारण है इन सियासी दलों को मिलने वाला नकद चन्दा। इस पर अंकुश लगाने
के लिए केंद्र सरकार ने इस साल के आम बजट में पहल की है। बजट में वित्तमंत्री के राजनीतिक
दलों के लिए नकदी चन्दे की सीमा 2000 रुपए तय करने का फैसला सही दिशा में सही कदम है। आम बजट में नकद चन्दे की सीमा
20 हजार से घटाकर 2000 रुपए करने का स्वागत है। साथ ही सरकार राजनीतिक दलों के
लिए आय-व्यय का लेखा-जोखा रखने को अनिवार्य
करने वाली है। इस सिलसिले में प्रस्तावित कानून के अनुसार दलों को दिसम्बर तक अपने
बहीखातों का पूरा ब्यौरा आयकर विभाग में जमा करना होगा। अन्यथा उन्हें आयकर में मिलने
वाली छूट समाप्त की जा सकती है। वैसे इस पहल से भी पता नहीं चल पाएगा कि किसी दानदाता
ने चेक या ऑनलाइन माध्यम से कितना पैसा राजनीतिक पार्टियों को दिया, क्योंकि पार्टियां उन दानदाता का चन्दा बताने के लिए बाध्य नहीं हैं जो उन्हें
20 हजार रुपए से कम चन्दा देते हैं। बेशक इससे राजनीतिक दलों में पारदर्शिता
लाने में मदद मिलेगी पर यह अधूरा है। अगर दानदाता 20 हजार रुपए
से कम चन्दा देता है तो अब भी पता नहीं चल पाएगा कि किस राजनीतिक पार्टी को किसने कितना
चन्दा दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चुनाव आयोग से राजनीतिक पार्टियों को छूट मिली
हुई है कि वे दानदाता के 20 हजार रुपए से कम चन्दा देने वाले
का नाम बताने के लिए बाध्य नहीं हैं। यह नियम अब भी लागू है। हाल ही में चुनाव आयोग
ने भारत में 1900 पंजीकृत राजनीतिक दल होने की बात कही थी। इनमें
से 400 से भी ज्यादा ऐसे दल हैं, जिन्होंने
कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है। इस नाते आयोग की यह आशंका सही है कि ये दल संभव है कि
काले धन को सफेद में बदलने का माध्यम बनते हों? आयोग ने अब ऐसे
दलों की पहचान कर उनको अपनी सूची से हटाने व उनका चुनाव चिन्ह जब्त करने की कवायद शुरू
कर दी है। आयोग ने आयकर विभाग से भी कहा है कि ऐसे कथित दलों की आयकर छूट समाप्त कर
दी जाए। बजट में राजनीतिक दलों को मिलने वाले गुप्त चन्दे संबंधी प्रावधान को एडीआर
(एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म) ने
अधूरा बताया। एडीआर के मुताबिक चन्दे के ऑडिट का सिस्टम बनाने के साथ ही इसमें पूरी
पारदर्शिता नहीं लाई जाएगी, जब तक यह जवाबदेही तय नहीं हो सकती।
एडीआर विशेषज्ञों का एक समूह है जो चुनाव, राजनीति और इनसे जुड़े
मुद्दों पर पैनी नजर रखता है। केंद्र सरकार के बजट के एक दिन बाद ही एडीआर ने कहा कि
राजनीतिक दलों को मिलने वाले चन्दे के मामले में अभी पूर्ण पारदर्शिता नहीं आ सकी है।
एक दानदाता से 2000 रुपए तक के चन्दे की सीमा लागू करने के बावजूद
वित्तमंत्री यह नहीं बता सके कि इसका क्रियान्वयन कैसे होगा? छिपी बात नहीं है कि पार्टियों का खर्चा हजार-दो हजार
रुपए के नकद चन्दे से नहीं चलता। तमाम व्यवसायियों और उद्योगपतियों की मदद से और भ्रष्टाचार
से किक बैंक से चुनाव लड़े जाते हैं। उद्योगपतियों से मिलने वाले धन पर अंकुश लगाने
के मकसद से ही निर्वाचन आयोग ने भी प्रत्याशी के चुनाव खर्च पर सीमा तय की थी। मगर
चूंकि उसमें पार्टियों का खर्च शामिल नहीं होता, इसलिए बहुत सारे
प्रत्याशी चुनाव में खुलकर धन-बल का प्रयोग करते हैं। पार्टियों
की तरफ से प्रत्याशियों को मिलने वाले या फिर प्रत्याशियों के पार्टी के नाम से करने
वाले खर्च पर कैंची चलाने के उद्देश्य से सरकार ने पार्टियों के आय-व्यय का ब्यौरा पेश करना अनिवार्य बनाने का मन बनाया है। यह कहां तक संभव होगा।
यह देखने की बात है। हर राजनीतिक दल के मुखिया सार्वजनिक मंचों से अपने कार्यकर्ताओं
को सादगीपूर्ण जीवन और चुनाव सुधार की बात तो करते हैं पर हकीकत में इसे अमल में लाना
नहीं चाहते। उद्योगपति चोरी-छिपे चन्दे के रूप में बड़ी रकम देने
से बाज आएंगे, दावा नहीं किया जा सकता। इसलिए सरकार को काले धन
के स्रोतों की पहचान और मुकम्मल करने की जरूरत है।
-अनिल नरेन्द्र
वीजा पर कुवैत का ट्रंप कार्ड
आतंकवाद को रोकने के लिए अमेरिका द्वारा सात मुस्लिम
देशों पर प्रतिबंध और पाकिस्तानी नागरिकों पर सख्ती का मामला अभी पूरी दुनिया में सरगर्म
है और इसी बीच एक और देश कुवैत ने (जो खुद मुस्लिम देश है) भी पांच मुस्लिम देशों पर अपने
देश में एंट्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। कुवैत ने पाकिस्तान, सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और ईरान
मूल के निवासियों के लिए वीजा जारी करने की प्रक्रिया को निरस्त कर दिया है। कुवैत
के इस फैसले ने भारत द्वारा उठाए जाने वाले इस मुद्दे पर मुहर लगा दी है कि पाक आतंकवाद
की सुरक्षित पनाहगाह बन गया है। स्थानीय समाचार पत्र `स्पूतनिक
न्यूज' के मुताबिक कुवैत ने अपने देश में आतंकवाद को रोकने के
लिए यह बड़ा फैसला लिया है। यानि अब पाकिस्तान समेत सीरिया, इराक,
अफगानिस्तान और ईरान के नागरिक कुवैत में प्रवेश नहीं कर सकते। कुवैत
ने इन पांचों देशों के साथ होने वाला पर्यटन, व्यापार और पर्यटक
वीजा पर रोक लगा दी है। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन द्वारा मुस्लिम देशों पर प्रतिबंध
लगाने से पहले कुवैत एकमात्र ऐसा देश है जिसने सीरियाई नागरिकों के प्रवेश पर पहले
से ही प्रतिबंध लगाया हुआ था। वर्ष 2011 में कुवैत ने सभी सीरियाई
नागरिकों के वीजा को निरस्त करने का काम किया था। यानि ट्रंप प्रशासन ने जो पहल की
उससे पहले कुवैत ऐसे प्रतिबंध लगा चुका था। बहरहाल पाकिस्तान के खिलाफ कुवैत की कार्रवाई
से जरूर थोड़ी हैरत हुई क्योंकि दोनों के बीच अच्छे रिश्ते रहे हैं। ऐसे में यह सवाल
उठता है कि क्या कुवैत ने अमेरिकी दबाव में यह कदम उठाया या फिर जो मांग भारत अरसे
से करता आ रहा है उसका समर्थन किया है? इससे इंकार नहीं किया
जा सकता कि कुवैत काफी अरसे से इस्लामिक आतंकवाद से जूझ रहा है। कुवैत की ताजा कार्रवाई
यह दर्शाती है कि इस्लामिक आतंकवाद ने मुस्लिम देशों में भी आंतरिक समस्याएं पैदा कर
दी हैं। इसी बात के संकेत गत 26 जनवरी को भारतीय गणतंत्र दिवस
के अवसर पर नई दिल्ली आए अबूधाबी के प्रिंस अल नहयान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
के संयुक्त घोषणा पत्र में देखने को मिले। क्या ये सभी घटनाएं आने वाले दिनों में आतंकवाद
को प्रश्रय देने वाले मुस्लिम देशों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर किसी तरह के नए ध्रुवीकरण
का संकेत दे रहे हैं। पाकिस्तान को प्रतिबंधित करने से भारत की आशंकाओं को बल मिलता
है कि जम्मू-कश्मीर समेत देश के अन्य हिस्सों में जो आतंकवादी
घटनाएं हो रही हैं, उनके पीछे पाकिस्तान का ही हाथ है। पाकिस्तान
के खिलाफ कुवैत का प्रतिबंध उसके लिए खतरे की घंटी है। अन्य उदारवादी देश भी कुवैत
की तरह आतंकवाद प्रायोजित करने वाले देशों के खिलाफ कदम उठा सकते हैं।
Monday, 6 February 2017
मतदाता को पटाने के लिए घूस, वह भी सरकारी खजाने से
इस
समय देश में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। चुनाव प्रचार और मतदाता को
पटाने का काम चरम पर है। ऐसे समय में इन दलों व नेताओं को पब्लिक की याद आना स्वाभाविक
ही है। सियासी पार्टियां मतदाता की तकदीर बदलने का वादा कर रही हैं, तरह-तरह के घोषणा
पत्रों में प्रलोभन देने का वादा कर रही है। अपने घोषणा पत्र में मुफ्त पेट्रोल,
चीनी, घी, लैपटॉप,
प्रैशर कूकर देने तक का वादा कर रही है। सरकार बनने के बाद ये पार्टियां
अपना वादा कितना पूरा करेंगी यह तो वक्त ही बताएगा। फ्री में खाने, कलर टीवी व सिलाई मशीन बांटने का ट्रेंड दक्षिण भारत की राजनीति से शुरू हुआ
है। आइए इन चुनावों में किए गए कुछ वादों को देखते हैं...यूपी
में समाजवादी पार्टी ने चुनाव जीतने पर लोगों को फ्री स्मार्टफोन देने का वादा किया
है। बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के मुताबिक इसके लिए करीब 1.5 करोड़ लोग रजिस्ट्रेशन भी करा चुके हैं। पिछले चुनाव में सपा सरकार ने छात्रों
को फ्री लैपटॉप का वादा किया था। सरकार बनने के एक साल तक बांटा भी। फिर पैर वापस खींच
लिए। उत्तर प्रदेश में अपना 15 साल का वनवास खत्म करने के लिए
भाजपा ने वादा किया है कि वह सत्ता में आई तो जहां लघु एवं सीमांत किसानों के सभी फसली
ऋण माफ होंगे। वहीं उन्हें शून्य प्रतिशत के ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। युवा-युवाओं को लुभाने की खातिर लैपटॉप के साथ ही एक जीबी डाटा सालभर तक मुफ्त देगी।
गोवा में छात्रों को हर माह पांच लीटर पेट्रोल मुफ्त देगी कांग्रेस। बिजली-पानी को मुफ्त दिए जाने के बाद अब बारी पेट्रोल की है। इसके अलावा छात्रों
को फ्री कोचिंग देने की बात भी कही गई है। गोवा में कांग्रेस और आप दोनों ने कैसिनो
बंद करने की बात कही है। आम आदमी पार्टी (आप) ने पंजाब में वादा किया कि गांवों और शहरों में फ्री वाईफाई सुविधा देगी। ऐसा
ही वादा आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में भी किया था। आम आदमी पार्टी ने पंजाब की जनता
से ऐसे कानून का वादा किया जिसके तहत ड्रग डीलरों के लिए मरते दम तक कारावास सुनिश्चित
किया जा सके। अकाली दल और भाजपा ने पंजाब के गरीब तबके को 25 रुपए किलो के हिसाब से दो किलो घी और 10 रुपए किलो के
हिसाब से पांच किलो शक्कर का वादा किया है। अकाली दल ने 10वीं
पास लड़कियों को सिलाई मशीन देने का वादा किया है। दक्षिण भारत में सियासी पार्टी गाय
और बकरी तक देने का वादा करते आए हैं। तमिलनाडु का करीब पांच प्रतिशत बजट ऐसी योजनाओं
पर ही खर्च होता है। भले ही वह सफल न हुआ हो, लेकिन निर्वाचन
आयोग पिछले काफी समय से कोशिश कर रहा है कि चुनाव साफ-सुथरे हों।
बावजूद इसके वोट हासिल करने के लिए नए-नए तरीकों से मतदाता को
घूस देने की कोशिशें चलती रहती हैं। अब सियासी दलों ने तरीका बदल लिया है। वे अब चुनाव
घोषणा पत्र में इस तरह के वादे करते हैं और यह घूस भी अपनी जेब से नहीं बल्कि सरकारी
खजाने से दी जाती है।
-अनिल नरेन्द्र
गंगा-यमुना संस्कृति का मिलन तो ठीक पर चुनौतियां भी कम नहीं
वे संग-संग तेजी से आए, हाथ मिलाया, गले
मिले, नई दोस्ती का रंग और गाढ़ा करने के लिए फिर गले मिले...अब वे नए सियासी अवतार में दिखने लगे हैं। यह हैं राहुल गांधी व अखिलेश यादव।
गंगा-यमुना की नई संस्कृति का उदय जो नए जमाने में सियासी हवाओं
का रुख अपनी ओर मोड़ने के लिए साथ-साथ निकल पड़े हैं। युवाओं
के सपनों व उम्मीदों को पंख लगाने में निकल पड़े हैं। कांग्रेस को यूपी में जमाने की
चाह जहां कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी में हैं तो अखिलेश अपनी सरकार दोबारा बनाने
व अपने परिवार को प्वाइंट प्रूफ करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर
लगाए हैं। वक्ती जरूरतों ने दोनों को सियासी सफर में ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है
जहां से मिशन 2017 ही नहीं, 2019 को भी
कामयाब बनाने का संकेत निकलता है। दोनों में इस बात की समझ बनी हुई है कि कौन कहां
किसका सपोट करेगा। लखनऊ रविवार के दिन इन्हीं संभावनाओं, वादों
का गवाह बना। इन दोनों की जोड़ी के लिए गठबंधन साथियों के लिए फायदेमंद भले ही नजर
आ रही हो पर दोनों के लिए चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सपा-कांग्रेस
ने गठजोड़ करके विरोधी पार्टियों पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की दिशा में कदम तो बढ़ाया
है, लेकिन देखना यह होगा कि चुनाव में दोनों कितना कदमताल साथ
कर पाते हैं। इतना तो तय है कि इस बार यूपी की सत्ता की दौड़ में मुकाबला बेहद रोचक
होगा। सपा और कांग्रेस अगर अपना-अपना वोट बैंक एक दूसरे को ट्रांसफर
कराने में कामयाब हो जाते हैं तो ही गठबंधन फायदे में रहेगा। हालांकि यह बहुत आसान
नहीं होगा। सपा में पिछले कुछ महीनों में चला घटनाक्रम और मुलायम सिंह यादव और शिवपाल
सिंह की चुनौती सियासी नक्शे से गायब होना कोई न कोई गुल खिला सकता है। राहुल और अखिलेश
नई पीढ़ी के नेता हैं। दोनों की उम्र में ज्यादा अंतर नहीं है। अखिलेश 43 साल के हैं तो राहुल 46 के। वे भारतीय संस्कारों के साथ
ही कारपोरेट कल्चर से बाखूबी वाकिफ हैं। पार्टी और सरकार चलाने में परंपरागत तरीकों
के साथ नए प्रयोग भी करते रहे हैं। राहुल गांधी और अखिलेश ने न सिर्फ अपने भाषणों में
बार-बार खुद के लिए युवा शब्द का प्रयोग किया, बल्कि युवा दिखने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। अमूमन चुनाव के दौरान बढ़ी दाढ़ी
के साथ लोगों के बीच आने वाले राहुल रविवार को क्लीन शेव, चमकते
दिखे। उत्तर प्रदेश की 403 में से 170 सीटों
पर वोटों में तीन प्रतिशत का रुझान उम्मीदवारों के भाग्य बदल देगा। कांग्रेस और समाजवादी
पार्टी के बीच गठबंधन होने के कारण इन सीटों पर समीकरण तेजी से बदले हैं। पूर्वी और
पश्चिमी यूपी में दोनों पार्टियों के नेता एक-दूसरे के उम्मीदवारों
को तभी जिता सकेंगे जब वोट स्थानांतरित करा पाएंगे। यहां 41 सीटें
ऐसी हैं जहां हार-जीत का अंतर एक हजार से कम रहा।
Sunday, 5 February 2017
अब बीसीसीआई प्रशासक चलाएंगे?
साफ
हो गया है कि बीसीसीआई चाहे जितना टालमटोल करे,
क्रिकेट बोर्ड में लोढ़ा कमेटी की सुधार की सिफारिशें लागू होकर रहेंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई को कोयला घोटाले को उजागर करने वाले पूर्व कैग प्रमुख विनोद
राय की अध्यक्षता वाली चार सदस्यीय प्रशासक समिति को सौंप दिया। समिति में जाने-माने इतिहासकार रामचन्द्र गुहा, भारतीय महिला क्रिकेट
टीम की पूर्व कप्तान डायना एडुलजी और वित्तीय कंपनी आईडीएफसी के प्रबंध निदेशक और सीईओ
विक्रम लिमये शामिल हैं। बीसीसीआई के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को पद
से हटाए जाने के एक माह के अंदर यह नियुक्तियां हुई हैं। कोर्ट पहले ही यह साफ कर चुका
था कि लोढ़ा समिति की सिफारिशें हर हाल में लागू करनी पड़ेंगी। हालांकि इससे भी इंकार
नहीं किया जा सकता कि देश की क्रिकेट का भविष्य तय करने की जिम्मेदारी उन लोगों के
पास होना चाहिए, जिन्हें क्रिकेट खेल की समझ होने के साथ ही खेल
प्रबंधन की भी जानकारी हो। दुर्भाग्य से कहा जाएगा कि इसमें संदेह नहीं कि बीसीसीआई
ने भारत में क्रिकेट को बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है पर पिछले कुछ समय से बीसीसीआई
की स्थिति जैसी हो गई है, उसके लिए इसके कर्ताधर्ता ही जिम्मेदार
हैं। इन्होंने इसे मनमाने ढंग से प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाया, यहां तक कि कायदे-कानून से भी खुद को ऊपर समझने लगे थे।
आईपीएल के मैचों में सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग के कारण ही सर्वोच्च न्यायालय को
हस्तक्षेप करना पड़ा और इसके फलस्वरूप लोढ़ा कमेटी का गठन किया गया। अब प्रशासकों की
नियुक्ति के बाद यह तो स्पष्ट है कि लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू करके बीसीसीआई की
सफाई होना तय है। सुप्रीम कोर्ट की इस मामले में सख्ती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता
है कि बीसीसीआई के बाद केंद्र सरकार ने सिफारिशों में बाधा बने खेल सचिव को प्रशासक
बनाने का सुझाव एकदम से नकार दिया। असल में सिफारिशों के मुताबिक कोई भी नौकरशाह बोर्ड
में पदाधिकारी नहीं बन सकता है, इसलिए कोर्ट ने खेल सचिव को प्रशासकों
के पैनल में लेने से परहेज किया। मानना पड़ेगा कि बीसीसीआई ने देश में क्रिकेट को बढ़ावा
देने का काम बखूबी किया और क्रिकेट को घर-घर का खेल बनाने में
सफलता हासिल की। अगर भारत इस क्षेत्र में दुनिया में अपना दबदबा बनाने में सफल रहा
है तो उसका श्रेय काफी हद तक बीसीसीआई को जाता है। पर नए प्रशासकों के लिए जहां बीसीसीआई
में आई बुराइयों पर अंकुश लगाना है वहीं उन्हें मुख्य उद्देश्य क्रिकेट की तरक्की को
नजरंदाज नहीं करना होगा। यह सही है कि डायना को छोड़कर कोई भी प्रशासक क्रिकेटर नहीं
है पर चाहे विनोद हों या लिमये या गुहा, क्रिकेट से अनजान भी
नहीं हैं।
-अनिल नरेन्द्र
सुनील जोशी हत्याकांड में साध्वी प्रज्ञा बरी
2007 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के
प्रचारक सुनील जोशी की हत्या के मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर सहित आठ आरोपियों
को देवास की अदालत ने बरी कर दिया है। संघ प्रचारक सुनील जोशी की हत्या 29 दिसम्बर 2007 में देवास की चूना खदान में हुई थी। अदालत
ने साध्वी प्रज्ञा को बुधवार को बरी करते हुए जो टिप्पणी की है, उसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। अदालत ने फैसले में कहाöहत्या जैसे संवेदनशील प्रकरण पर देवास पुलिस और एनआईए दोनों ही एजेंसियों ने
पूर्वाग्रह या अज्ञात कारणों से गंभीरतापूर्वक अनुसंधान नहीं किया। जिस तरह दुर्बल
प्रकृति के परस्पर प्रतिकूल साक्ष्य एकत्रित किए गए, वह आरोपों
की दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे विरोधाभासी स्वरूप के साक्ष्य से अभियोजक
के कथानक पर ही गंभीर संदेह उत्पन्न हो गया है, यह कहना था प्रथम
अपर सत्र न्यायाधीश राजीव एम. आप्टे का। गौरतलब है कि
29 दिसम्बर 2007 को संघ के पूर्व प्रचारक सुनील
जोशी की बालगढ़ के चूना खदान क्षेत्र में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मध्यप्रदेश
पुलिस को सबूत नहीं मिले तो उसने केस बंद कर दिया। राजस्थान एटीएस ने हर्षद सोलंकी
नामक व्यक्ति की गिरफ्तारी कर इस हत्याकांड का पर्दाफाश किया। फिर मध्यप्रदेश पुलिस
ने देवास निवासी रामचरण पटेल और साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को अभियुक्त बनाया। प्रवासु
देव परमार, आनंदराज कटारिया को भी आरोपी बनाया गया। तभी हाई कोर्ट
ने एनएआई को जांच के निर्देश दिए, जिसने तीन राजेन्द्र चौधरी,
जितेन्द्र शर्मा और लोकेश शर्मा को आरोपी बनाया। 2014 में स्पेशल कोर्ट ने एनआईए की धाराएं नहीं लगने पर केस को वापस जिला अदालत
देवास को ट्रांसफर कर दिया। यहां पुलिस और एनआईए की कहानी अलग-अलग होने से केस कमजोर हो गया। अभियोजन पक्ष आज तक यह खुले तौर पर स्पष्ट नहीं
कर पाया कि सुनील जोशी की हत्या किसलिए की गई? उनका बढ़ता कद,
राजना]ितक रंजिश, राजदार या कोई और कारण था?
फैसले के वक्त आरोपी प्रज्ञा सिंह ठाकुर बीमारी के चलते कोर्ट नहीं आईं।
वे न्यायिक हिरासत में भोपाल के अस्पताल में इलाज करवा रही हैं। हालांकि इस केस में
तो साध्वी प्रज्ञा बरी हो गई हैं पर मालेगांव ब्लास्ट में उन्हें अभी तक जमानत नहीं
मिली है इसलिए जब तक इस केस में भी उनकी जमानत न हो तब तक उन्हें हिरासत में ही रहना
पड़ेगा। सभी आरोपी बरी हो गए, ऐसे में सरकार क्या फैसले के खिलाफ
हाई कोर्ट में अपील करेगी? एनआईए जैसी एजेंसी भी जांच के बाद
आरोपियों के खिलाफ सबूत नहीं जुटा पाई, इससे तो लगता है कि मामला
राजनीति से प्रेरित था।
Subscribe to:
Posts (Atom)