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Saturday, 8 April 2017

राम जेठमलानी के 3.8 करोड़ के बिल का भुगतान कौन करे?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और विवादों का पूरा इतिहास रहा है। जब से वह दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं शायद ही कोई दिन ऐसा गया हो जब वह किसी न किसी विवाद में न फंसे हों। विज्ञापन के नाम पर सरकारी धन की बर्बादी का मामला अभी थमा नहीं कि राम जेठमलानी को फीस देने के मामले में केजरीवाल बुरी तरह से घिर गए हैं। मसला दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) में भ्रष्टाचार और करोड़ों के घोटाले का है। आरोप सीधे 13 साल तक डीडीसीए के अध्यक्ष रहे अरुण जेटली पर लगाए गए। आरोप-प्रत्यारोप का लंबा दौर चला। अंतत जेटली ने केजरीवाल पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया। फांस आकर अब यह फंसी है कि केजरीवाल के वकील राम जेठमलानी की फीस कौन देगा? दिल्ली सरकार या अरविन्द केजरीवाल? हुआ यूं कि जेठमलानी ने अपनी फीस वसूली के लिए दिसम्बर 2016 में करीब 3.8 करोड़ रुपए का बिल केजरीवाल के पास भेजा था जिसमें एक करोड़ रुपए रिटेनर फीस तथा 22 लाख रुपए प्रति सुनवाई का जिक्र था। यह बिल उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने पास करके सरकारी खजाने से पेमेंट करने के आदेश के साथ संबंधित अधिकारियों को भेज दिया। अधिकारियों ने इसे उपराज्यपाल अनिल बैजल की स्वीकृति के लिए भेजा। उपराज्यपाल ने कानूनी राय ली तो इसमें यह बात साफ हुई कि यह मुकदमा व्यक्ति पर हुआ है न कि मुख्यमंत्री पर। खुद केजरीवाल ने सफाई दी कि डीडीसीए में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार था। खिलाड़ियों के चयन की शिकायत लेकर बच्चे उनके पास आते थे। दिल्ली सरकार ने जब इस पर जांच बिठाई तो भाजपा वालों ने केस कर दिया। राम जेठमलानी अदालत में इसकी लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि राम जेठमलानी की फीस वह अपनी जेब से क्यों देंगे? जनता बताए सरकार को पैसा देना चाहिए या नहीं? केजरीवाल ने यह भी कहा कि मैंने जो भी आरोप लगाए थे, वह सार्वजनिक हित में और सार्वजनिक पद पर मुख्यमंत्री की हैसियत से लगाए थे। इसलिए इसमें कुछ भी निजी नहीं है। इस बीच जेठमलानी ने कहा है कि वे यह मुकदमा मुफ्त में लड़ने को तैयार हैं, क्योकि केजरीवाल उनके गरीब मुवक्किल हैं और वे ऐसे लोगों के लिए मुफ्त सेवाएं पहले भी देते रहे हैं। लेकिन पहली बात अगर राम जेठमलानी को मुफ्त सेवा देनी थी तो उन्होंने इतना लंबा-चौड़ा बिल भेजा ही क्यों? दूसरी बात कि शायद श्री केजरीवाल यह भूल रहे हैं कि कोर्ट में जस्टिस पीएस तेजी की अदालत ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया था जो जेटली द्वारा दर्ज कराई गई आपराधिक मानहानि की शिकायत में ट्रायल कोर्ट की तरफ से समन जारी किए जाने के खिलाफ दाखिल की गई थी। बीते साल 19 अक्तूबर को दिए कोर्ट के इस फैसले में सीएम की ओर से यह मांग किस आधार पर की गई उसका ब्यौरा दर्ज है। हाई कोर्ट के रिकार्ड में केजरीवाल ने कहा कि मैं जो लड़ाई लड़ रहा हूं वह मैं निजी हैसियत से लड़ रहा हूं। वैसे भी तर्क बेमानी है कि यह सरकारी लड़ाई है। सिविल मामले दो लोगों की निजी लड़ाई होती है। इसमें कहीं से भी पद नहीं आता है। यहां तक कि जेटली ने सिविल मानहानि का केस अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ दायर किया है न कि मुख्यमंत्री केजरीवाल के खिलाफ। हास्यास्पद तथ्य यह है कि राजनीति में जिस आदर्शवाद की दुहाई देकर और ईमानदारी का सब्ज-बाग दिखाकर केजरीवाल मुख्यमंत्री बने थे, उस नैतिकता के कथित चोले को उन्होंने काफी कम वक्त में तार-तार कर दिया। यहां यह भी बताना जरूरी है कि अरुण जेटली ने जो मानहानि का केस किया है वह उन्होंने अपनी निजी हैसियत से किया है जिसमें वकीलों की फीस सहित सारा खर्चा वह खुद उठा रहे हैं। उन्होंने एक पैसा भी वित्त मंत्रालय या किसी और मंत्रालय से नहीं लिया है। अरविन्द जी के नौसिखिएपन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन पर फिलहाल करीब आधा दर्जन मानहानि के कई अन्य मामले अदालत में चल रहे हैं। दरअसल केजरीवाल का सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला नया नहीं है। इससे पहले चाय-समोसे के बिल पर करोड़ों रुपए उड़ चुके हैं। यहां तक कि खुद के विज्ञापन जारी कर उन्होंने नैतिक और मर्यादित आचरण की धज्जियां पहले ही उड़ा रखी हैं। इलाज के नाम पर उन्होंने करोड़ों फूंक दिए, जबकि केजरीवाल खुद दिल्ली के सरकारी अस्पतालों को विश्वस्तरीय बनाने का दावा करते हैं। ऐसे कृत्य यही बयां करते हैं कि जनता को भरमाकर उनके पैसे को खुद के कामों में इस्तेमाल करने के दिन अब लद गए हैं। यह बात जितनी जल्दी अरविन्द केजरीवाल समझ लें, बेहतर होगा। भाजपा ने केजरीवाल पर सार्वजनिक धन की लूट और डकैती करने का आरोप लगाते हुए सवाल उठाया कि निजी मामले में भुगतान करदाताओं के धन से कैसे किया जा सकता है? उधर आम आदमी पार्टी की ओर से कहा गया है कि केजरीवाल ने जो भी आरोप लगाए थे, वह सार्वजनिक हित में और सार्वजनिक पद पर रहते हुए लगाए थे। इसलिए इसमें कुछ भी निजी नहीं है। नए खुलासे से आम आदमी पार्टी की साख को चोट पहुंची है। आम आदमी पार्टी हाई कमान संस्कृति को खत्म करने और सत्ता के दुरुपयोग को बंद करने के वादे पर वजूद में आई थी। विडंबना यह है कि खुद अपनी ही कसौटियों पर आज यह कठघरे में खड़ी है।

-अनिल नरेन्द्र

Friday, 7 April 2017

नगर निगम चुनाव ः बागी बने कांग्रेस व भाजपा के लिए चुनौती

दिल्ली नगर निगम चुनाव में नामांकन के आखिरी दिन सोमवार को दिल्ली नगर निगम के सभी दलों के अधिकृत और पार्टी से बगावत कर मैदान में उतरे उम्मीदवारों ने देर रात तक अपने पर्चे भरे। चुनाव के लिए नामांकन भरने वाले प्रत्याशियों का आंकड़ा 4598 पहुंच गया है। चुनाव आयोग के अधिकारी आंकड़ों को जुटाने में लगे हुए हैं। अभी इस संख्या में इजाफा हो सकता है। पांच अप्रैल को नामांकन पत्रों की जांच होगी और शुक्रवार आठ अप्रैल तक नामांकन वापस लिए जा सकते हैं। तीनों नगर निगमों के 272 वार्डों के लिए 4598 नामांकन हुए हैं। इसका मतलब है कि हर वार्ड के लिए 16-17 नाम (औसतन) भरे गए हैं। निगम चुनाव के टिकट बंटवारे से नाराज कांग्रेस और भाजपा के बागी उम्मीदवारों ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की रातों की नींद हराम कर दी है। दोनों दलों के नेता बागियों को मनाने में जुट गए हैं। यह समस्या कांग्रेस के लिए ज्यादा गंभीर प्रतीत होती है। कांग्रेस में टिकट बंटवारे को लेकर जहां दिग्गज नेता बिफरे हैं वहीं कुछ निगम पार्षदों और पार्टी पदाधिकारियों ने निर्दलीय नामांकन भरकर हाई कमान की मुसीबत और बढ़ा दी है। मैदान में निर्दलीय उतरने वालों में सबसे बुजुर्ग निगम पार्षद रमेश दत्ता दिल्ली गेट, जनता कॉलोनी वार्ड से जाकिर खान, सागरपुर से ऊषा गुप्ता के अलावा कई दिग्गजों ने नामांकन भरा है। मैं रमेश दत्ता को वर्षों से जानता हूं। दावे सह कह सकता हूं कि तमाम दिल्ली कांग्रेस में उनसे कर्मठ कार्यकर्ता कोई नहीं है। उन्होंने अपना सारा जीवन कांग्रेस को दिया है। अस्पताल से ओपन हार्ट सर्जरी कराकर मैदान में उतर आते हैं। इन्हें टिकट न देना कांग्रेस आला कमान के खोखलेपन का संदेश देता है। डाक्टर अशोक वालिया जो एक समय मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, को इस ढंग से नजरंदाज करना कहीं कांग्रेस को भारी न पड़ जाए। बता दें कि रमेश दत्ता कांग्रेस के सबसे लंबे समय तक पार्षद रहे हैं और मिन्टो रोड वार्ड से जीतते आ रहे हैं। परिसीमन के बाद वार्ड बंटा तो दिल्ली गेट वार्ड से टिकट चाहते थे। लेकिन यहां से पूर्व विधायक शोएब इकबाल के बेटे आले मोहम्मद को टिकट दिया गया। रमेश दत्ता पहले भी बतौर निर्दलीय चुनाव जीत चुके हैं। कांग्रेस पार्टी में नेता अपने रिश्तेदारों को टिकट दिलाने में सफल रहे। बेशक अजय माकन कह रहे हैं कि हमने नए चेहरों पर दांव खेला है। पर माफिक माहौल में कहीं टिकट बंटवारा पार्टी पर भारी न पड़ जाए। शीला दीक्षित ने भी टिकट बंटवारे पर असंतोष जताया है। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस ने सभी जिला अध्यक्षों से बतौर बागी नामांकन दाखिल करने वाले पार्टी से जुड़े पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को सूची बनाने को कहा है। ऐसे बागियों को मनाने का काम शुरू हो चुका है।

-अनिल नरेन्द्र

रामनवमी पर किसानों को मिली कर्ज माफी की सौगात

उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए रामनवमी अच्छे दिन का अहसास लेकर आया है। सूबे में सत्ता में आने के करीब दो सप्ताह के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपनी पहली ही बैठक में किसानों को कर्ज माफी की सौगात दे दी। प्रदेश के लघु और सीमांत किसानों के एक लाख रुपए तक का फसली ऋण माफ करने का बड़ा फैसला तो लिया ही, यह कदम उठाकर भाजपा ने अपना वादा भी निभाया है। लाख रुपए तक की इस कर्ज माफी से करीब 86 लाख छोटे और सीमांत किसानों को राहत मिलेगी। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में कहा था कि अगर वह सूबे की सत्ता में आए तो किसानों का कर्ज माफ होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में यहां तक कहा था कि कैबिनेट की पहली बैठक में ही किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा। कर्ज माफी के दायरे में वे किसान आएंगे, जिन्होंने सरकारी य सहकारी बैंकों से कर्ज लिया है। असल में कुछ इलाकों में बिजली के मद में ही अनेक किसानों के यहां लाखों के बकाया हैं। इसके अलावा कई तरह के कर्ज किसानों को दोहरे कर रहे हैं। खासकर पिछले तीन साल से लगातार सूखे और बेरुखे मौसम ने भी किसानों की कमर तोड़ दी थी। सरकारी आकलन के मुताबिक करीब 2.30 करोड़ किसान मौसम की मार से पीड़ित हैं। इसलिए चुनावों के दौरान कांग्रेस, बसपा और यहां तक कि पूर्व अखिलेश सरकार ने भी किसानों के कर्ज माफ करने के वादे किए थे। लेकिन लोगों को शायद सबसे अधिक भरोसा प्रधानमंत्री के लिए वादे पर हुआ कि पहली ही बैठक में किसानों के कर्ज माफ कर दिए जाएंगे। योगी आदित्यनाथ ने पहली ही कैबिनेट बैठक में प्रधानमंत्री का वादा पूरा कर दिया। कैबिनेट ने इसके अलावा अवैध बूचड़खानों को बंद करने और एंटी रोमियो दस्ते के गठन को औपचारिक मंजूरी दी। पूर्वांचल को विकास की मुख्य धारा में लाने की कोशिश के तौर पर देखा जाएगा। गाजीपुर में स्पोर्ट्स कॉम्प्लैक्स की स्थापना का फैसला। अवैध खनन के व्यापार पर जिस तरह एक कमेटी बनी है उससे साफ है कि योगी सरकार सूबे की समस्याओं को लेकर काफी चिंतित है। किसानों की शत-प्रतिशत गेहूं खरीदने का न केवल भरोसा दिया गया है बल्कि हजारों खरीद केंद्र बनाने की बात का स्वागत है। किसानों को आलू की फसल का उचित मूल्य मिले इसके लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई है। किसानों का बकाया कर्ज 62,000 करोड़ रुपए बताया जाता है। इसलिए इसका कोई तोड़ निकालना जरूरी था जिससे लगे कि वादा भी पूरा हुआ और राज्य के खजाने की हालत भी खराब नहीं हुई। इस साल भी गर्मी बेतहाशा बढ़ने और सूखे की आशंका से योगी सरकार का बुंदेलखंड के लिए भी राहत पैकेज का ऐलान किया है। सरकार ने रोजगार बढ़ाने के लिए नई उद्योग नीति बनाने का जो फैसला किया है जो स्वागतयोग्य है पर इसको सही दिशा में ले जाने की चुनौती है। पिछले कुछ वर्षों से उत्तर प्रदेश पिछड़ गया है। दूसरे राज्य कहीं ज्यादा तरक्की कर गए हैं। अखिलेश सरकार ने भी ऐसे ही वादे किए थे पर वह परवान नहीं चढ़ सके। अगर योगी सरकार राज्य में निवेश लाने में सक्षम हो और युवाओं को रोजगार के लिए भटकना न पड़े तो राज्य की तस्वीर बदलने में देर नहीं लगेगी। योगी आदित्यनाथ ने कदम आगे बढ़ा दिए हैं। रामनवमी पर अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में योगी आदित्यनाथ ने जो वादा मोदी ने किया था उसे पूरा कर दिया।

Thursday, 6 April 2017

अजमेर बम विस्फोट मामले में इंद्रेश व साध्वी प्रज्ञा को क्लीन चिट

अजमेर दरगाह बम विस्फोट मामले में एनआईए कोर्ट ने सोमवार को अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश कर दी। इस रिपोर्ट में एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा और आरएसएस प्रचारक इंद्रेश कुमार को क्लीन चिट दे दी है। अब कोर्ट इस रिपोर्ट पर 17 अप्रैल को सुनवाई करेगा। जिसमें तय होगा कि इस रिपोर्ट का क्या करना है। कोर्ट इस मामले में दो दोषियों को उम्रकैद की सजा सुना चुका है। इंद्रेश कुमार और साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। यह फैसला पहले ही सुनाया जा चुका है। एनआईए ने साफ कहा कि उसे इंद्रेश कुमार, साध्वी प्रज्ञा, राजेन्द्र और रमेश उर्फ प्रिंस के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिले। हालांकि एनआईए कोर्ट के जज दिनेश कुमार गुप्ता ने जांच की धीमी गति और मामले में तीन भगोड़ों सुरेश नायर, रामचंद्र कालासांगरा और संदीप डांगे के न पकड़े जाने पर नाराजगी जाहिर की। अदालत ने 8 मार्च को भावेश पटेल, देवेन्द्र गुप्ता और सुनील जोशी को दोषी ठहराया था और स्वामी असीमानंद को बरी कर दिया था। जोशी की सुनवाई के दौरान जेल में मौत हो चुकी है। मामले में 149 गवाह पेश हुए और 451 दस्तावेज कोर्ट के सामने रखे गए। एनआईए ने केस में तीन बार पूरक आरोप पत्र दाखिल किए।  घटना वाले दिन 11 अक्तूबर 2007 को ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह में रोजा इफ्तार के दौरान धमाका हुआ था। इसमें तीन लोग मारे गए थे और 15 घायल हुए थे। राजस्थान एटीएस ने मामले की शुरुआती जांच के बाद केस एनआईए को सौंप दिया था। एनआईए ने 6 अप्रैल 2011 को फिर केस दर्ज किया था। कोर्ट में सुनवाई उन्हीं 13 लोगों के खिलाफ हुई थी, जिन्हें एनआईए की जांच एजेंसी रिपोर्ट में आरोपी माना गया था। जबकि इस कांड में साध्वी प्रज्ञा और इंद्रेश कुमार का नाम भी आ रहा था। जांच एजेंसी ने इन दोनों को अंतिम रिपोर्ट में क्लीन चिट दे दी थी। इसी कोर्ट में सुनवाई के दौरान एनआईए की अंतिम रिपोर्ट पर सवाल खड़े किए गए थे जिसमें इन दोनें को क्लीन चिट क्यों दी गई। इस पर कोर्ट ने आरोपियों में तीन को दोषी मानते हुए सजा सुनाई और एनआईए को अंतिम रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा था। इसके बाद ही सोमवार को यह रिपोर्ट पेश की गई थी। कोर्ट ने एनआईए महानिदेशक को फरार तीन आरोपियों की तलाश के मामले में प्रगति रिपोर्ट पेश करने को भी कहा। अदालत ने केरल के मुख्य सचिव, कोमी कोड और इंदौर के जिलाधिकारियों को पत्र लिखकर यह भी पूछा कि नायर और कालासांगरा की चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा न सौंपे जाने को लेकर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। कोर्ट ने फरवरी में रिपोर्ट मांगी थी।

öअनिल नरेन्द्र

...और अब रूस की मेट्रो में आतंकी हमला


रूस के दूसरे सबसे बड़े शहर सेंट पीटर्सबर्ग में सोमवार को भूमिगत मेट्रो में जबरदस्त धमाका हुआ। इसमें कम से कम 10 लोगों की मौत हो गई और 50 से ज्यादा घायल हो गए। समाचार एजेंसी एपी के अनुसार से सेन्नया प्लोराड और टेक्नोलाजीयेस्की स्टेशनों के बीच दोपहर बाद 2.40 बजे (स्थानीय टाइम) भूमिगत मेट्रो में यह धमाका हुआ। सुरक्षा एजेंसियों ने इसे आतंकी हमला मानते हुए जांच शुरू कर दी है। जांच अधिकारी सर्विलांस कैमरे में आए उस व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं जिस पर धमाका करने का संदेह है। रूसी समाचार वेबसाइट फोंटानका ने संदिग्ध हमलावर की तस्वीर जारी की है। तस्वीर में एक अधेड़ व्यक्ति को काली टोपी पहने देखा जा सकता है। हमले के समय रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन शहर में ही थे। वह बेलारूस के नेता एलेक्जेंडर  लुकाशेंको से मुलाकात करने यहां आए हुए थे। रूस पिछले कुछ समय से आतंकियों के निशाने पर है। 20 मार्च 2010 को मास्को मेट्रो में दो महिलाओं के आत्मघाती हमले में 40 लोग मारे गए थे और 100 घायल हुए थे। चेचेन नेता दोकु उमारोव ने हमले की जिम्मेदारी ली थी। 27 नवंबर 2009 को मास्को के सेंट पीटर्सबर्ग के बीच हाई स्पीड ट्रेन में धमाका हुआ जिसमें 26 लोग मरे और 100 घायल हुए। चेचेन विद्रोहियों ने जिम्मेदारी ली। 24 जनवरी 2011 को मास्को के दोमोदेदेवो एयर पोर्ट पर आत्मघाती हमले में 37 लोग मारे गए और 180 घायल हुए थे। अगस्त 2004 में इसी स्टेशन पर विमान में धमाका हुआ जिसमें 90 की मौत हुई थी। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने धमाके के बाद बयान दिया कि हम दोषियों को किसी भी सूरत में नहीं बख्शेंगे। पुतिन उस वक्त बेलारूस के राष्ट्रपति लुकाशेंको के साथ सेंट पीटर्सबर्ग में बैठक करने जा रहे थे। उन्होंने बैठक को कुछ मिनट के लिए टाला और सरकारी टीवी पर सामने आए। उन्होंने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों को पूरी ताकत से ऐसे खतरों को कुचलने का अधिकार है। 50 लाख की आबादी वाला सेंट पीटर्सबर्ग मास्को के बाद रूस का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और मशहूर पर्यटन स्थल है। हालांकि किसी ने इस धमाके की फिलहाल जिम्मेदारी नहीं ली है लेकिन यह धमाका ऐसे समय हुआ है जब रूस-सीरिया में वहां की बसर अल असद सरकार के साथ मिलकर आईएस आतंकियों के सफाए में लगा हुआ है। वैसे रूस में चेचेन विद्रोहियों के हमले का भी इतिहास रहा है। पुतिन ने चेचेन विद्रोहियों को बुरी तरह कुचलने का अभियान चला रखा है। रूस की आतंकवाद निरोधी समिति ने कहा है कि मेट्रो में जो धमाका हुआ था वह आईईडी से किया गया था। रूस में मेट्रो में बम धमाके के बाद दिल्ली मेट्रो में सुरक्षा और कड़ी करना स्वाभाविक ही है। सुरक्षा व्यवस्था में कोई कमी न रह जाए इसके लिए सीआईएसएफ अधिकारियों द्वारा लगातार मेट्रो स्टेशनों का दौरा किया जा रहा है। यात्रियों की भी दोहरी जांच की जा रही है। यात्रियों के सामान की जांच मशीनों से होने के बावजूद हाथ द्वारा उसकी तलाशी के निर्देश जारी किए गए हैं। ज्ञात हो कि दिल्ली मेट्रो के करीब 160 मेट्रो स्टेशनों से रोजाना 30 लाख यात्री यात्रा करते हैं। इसकी जिम्मेदारी व सुरक्षा सीआईएसएफ के जिम्मे है। ज्यादा भीड़भाड़ की वजह से दिल्ली मेट्रो आतंकी संगठनों के निशाने पर है। गत दिनों खुफिया एजेंसियों को आतंकियों द्वारा दिल्ली मेट्रो में धमाका करने की योजना संबंधी इनपुट भी मिल चुके हैं। तैनात सुरक्षाकर्मी सतर्कता में कोई कमी न आने दें।


Wednesday, 5 April 2017

EC’s response to allegations of EVM tampering

Electronic voting machine i.e. EVM dispute is not going to pause. Allegations of EVM tampering were levelled in assembly elections in five states and local bodies elections in Maharashtra held last month. Many questions were raised for EVM tempering. Now the junk's genie has come out of the bottle. The centre-point of the dispute is Bhind in Madhya Pradesh where slips with only lotus symbol were coming out during Voter Verified Paper Audit Trial (VVPAT) in Ayas programme.

Chief Electoral Officer of Madhya Pradesh Saleena Singh on Friday last, taking a stock of EVM before Ater by-election pushed two different buttons, a lotus print came out of the VVPAT. However, being summoned by the Election Commission, the State Election Commission denied but at the time of the demo, when asked by the reporters the Chief Electoral Officer lost her temper and even threatened them to be jailed. Give it Mayawati was the most pronounced over the BJP's surprise victory in Uttar Pradesh, who alleged of EVM tempering.

Meanwhile Chief Minister of Delhi Arvind Kejriwal is time and again alleging the same time and demanding that ballot papers be used for the elections for Municipal Corporation of Delhi. The Election Commission have once again dismissed the charges by the Aam Aadmi party. Dismissing the charges from AAP, the EC said that it's a wrong move to hold the EVM tempering responsible for the poor performance in the elections. The commission also said the EVM is not only fully reliable but no tempering is possible with it too. The commission is fully satisfied with the EVMs in terms of security. Meanwhile the commission also said that it has decided to by M-3 type EVMs. it is notable that new EVM has no possibility of being tempered. M-3 EVM has a self-diagnostic system for accuracy of the machine. It will come with its certification system. Only an accurate EVM can communicate with another EVMs. It must be manufactured by Energy PSUECIL or Defence PSUBEL. A machine manufactured by any other company may not communicate with other machines. As such the wrong machines will be disclosed.

It's good that these new modern machines will be available before the Loksabha 2019 elections but should the statement of the EC mean that the EVM machines being used at present may be tempered with? If the EC says that new machines will stop working in case of tempering, It means that the existing machines have chances of tempering? Fair and free election system is essential in any democratic system. it the foundation of the democracy upon which the building rests. Free and fair Election Commission has been constituted to maintain it and not for

working under any type of pressure. If the existing EVM machines have any chances of tempering, the commission should admit it. It should give the people levelling charges of tempering to prove them. In my opinion, the EC should avoid the political statements. It should not say that the party should review the causes of its defeat instead of levelling charges of EVM tempering. The case is in the Supreme Court. The Election Commission has to prove before the apex court that tempering is not possible with the existing EVMs.

* Anil Narendra

आखिर ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से तोड़ा नाता

लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर टेरिसा मे ने यूरोपियन काउंसिल (ईयू) से बाहर जाने (ब्रेग्जिट) की बुधवार को आधिकारिक घोषणा कर दी। इसी के साथ 1973 में ईयू के सदस्य बने ब्रिटेन का समूह से 44 साल पुराना रिश्ता खत्म हो गया। ईयू में ब्रिटेन के स्थायी प्रतिनिधि टिम बैरो ने यूरोपीय राष्ट्रीय अध्यक्ष डोनाल्ड टस्क को इस बाबत एक पत्र सौंपा। ब्रिटेन ने लिस्बन संधि के अनुच्छेद-50 को लागू करने की जानकारी दी। अब ब्रिटेन-यूरोपीय संघ से व्यापार, आव्रजन और अन्य मुद्दों पर नए सिरे से वार्ता होगी। ब्रेग्जिट की वार्ता मध्य मई से शुरू होगी और दो साल में पूरी होगी। नौ माह पहले जून 2016 में हुए जनमत संग्रह में ब्रिटिश जनता ने ईयू से अलग होने पर मुहर लगाई थी। ब्रिटिश पीएम मे ने कहा कि ब्रिटेन यूरोप का अहम सहयोगी और दोस्त बने रहना चाहता है। अगर यूरोपीय संघ ने अनावश्यक रोड़े अटकाए तो यह सभी का नुकसान होगा। उधर जर्मन चांसलर एंजेला मर्कल ने कहा कि हम सुनिश्चित करेंगे कि ब्रिटेन में रह रहे यूरोपीय लोगों पर बुरा असर न पड़े। हमें उम्मीद है कि ब्रिटेन और ईयू प्रगाढ़ सहयोगी बने रहेंगे। ब्रेग्जिट अंग्रेजी के ब्रिटेन और एक्सिट शब्द से मिलकर बना है। इसका मतलब है ब्रिटेन का निकलना। इसे ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के सन्दर्भ में इस्तेमाल किया जाता है। ब्रिटेन के ईयू से अलग होने के कई कारण बताए जा रहे हैं। अप्रवासियों, आर्थिक विकास और ईयू के सख्त नियमों से ब्रिटेन के नागरिक नाराज थे। लिहाजा उन्होंने ईयू से अलग होने की मांग की और 23 जून 2016 में वहां जनमत संग्रह कराया गया। जनमत संग्रह में 57.9 फीसदी मतदाताओं ने ईयू से अलग होने के पक्ष में वोट डाला, वहीं 48.1 फीसदी ने वोट के जरिये ईयू के साथ रहने की इच्छा जाहिर की। जनमत संग्रह के नतीजे ब्रेग्जिट के पक्ष में आते ही तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को पद छोड़ना पड़ा। पूर्व गृहमंत्री टेरिसा मे ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। बता दें कि यूरोपीय संघ 28 यूरोपीय देशों का संगठन है। रोम संधि के जरिये 1957 में इसकी नींव रखी गई थी। उस वक्त केवल छह देशों ने आर्थिक सहयोग के लिए हाथ मिलाया था। 1993 में आस्ट्रिया संधि के जरिये नीदरलैंड में मौजूदा ईयू की नींव रखी गई थी। सदस्य देश एक मुद्रा, एक बाजार और एक सीमा के सिद्धांत पर काम करते हैं। 19 की आधिकारिक मुद्रा यूरो है। यूरो को आधिकारिक मुद्रा न बनाने वाले देशों में ब्रिटेन भी शामिल है। अनुच्छेद-50 लागू करने के बाद दोनों पक्षों को दो साल के अंदर अलग होने की शर्तों पर सहमत होना होगा। ब्रिटेन का यह बहुत बड़ा फैसला है। देखें, इसको कैसे क्रियान्वयन किया जाता है। दोनों पक्षों के लिए चुनौती है।

-अनिल नरेन्द्र