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Tuesday, 8 October 2024

मामला जग्गी वासुदेव यानि सद्गुरु का


सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तमिलनाडु के कोयंबटूर में आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन आश्रम में दो महिलाओं को कथित तौर पर अवैध रूप से बंधक बनाकर रखने के मामले की पुलिस जांच पर प्रभावी ढंग से रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति द्वारा मद्रास हाईकोर्ट में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया, जिसमें आरोप लगाया था कि उसकी दो बेटियों को ईशा फाउंडेशन के परिसर में बंधक बनाकर रखा गया है। मद्रास हाईकोर्ट ने एक रिटायर्ड प्रोफेसर कामराज की उस याचिका के बाद ये आदेश दिया था, जिसमें कहा गया था कि उनकी दो बेटियां योग केंद्र में हैं और उन्हें बाहर लाया जाए। प्रोफेसर का आरोप है कि उनकी बेटियों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है और उन्हें सेंटर में कैद करके रखा गया है। लेकिन प्रोफेसर की बेटियों ने मद्रास हाईकोर्ट को बताया कि वे ईशा सेंटर में अपनी मर्जी से रह रही हैं। ईशा योग केंद्र ने भी कहा है कि किसी को शादी करने या सन्यास लेने के लिए मजबूर नहीं किया जाता है, इस मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने पुलिस को जांच करने के आदेश दिए थे और 4 अक्टूबर को रिपोर्ट जमा करने को कहा था। इसके बाद पुलिस ने ईशा योग केंद्र पर छापा मारा और यह कार्रवाई बुधवार शाम तक चली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस को इस तरह से संस्थान में प्रवेश की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। कोयम्बटूर के जिला पुलिस अधीक्षक कार्तिकेयन के नेतृत्व में समाज कल्याण विभाग व बाल कल्याण अधिकारियों की संयुक्त टीम ने ईशा योग केंद्र की तलाशी ली थी। जांच रिपोर्ट अब सुप्रीम कोर्ट में 18 अक्टूबर को जमा करवानी होगी। ईशा योग केंद्र की स्थापना 1992 में जग्गी वासुदेव ने तमिलनाडु के कोयम्बटूर जिले के वेलिगिरी में की थी। इस केंद्र में हजारों विवाहित, अविवाहित और कुछ ब्रह्मचार्य पथ पर चलने वाले लोग रहते हैं। बेटियों के पिता कामराज तमिलनाडु विश्वविद्यालय के कृषि इंजीनियर विभाग के पूर्व प्रमुख हैं। उनकी 42 और 39 साल की दो बेटियां हैं। बड़ी बेटी ने इंग्लैंड के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रोनिक्स में मास्टर्स किया है। साल 2008 में उनका तलाक हो गया था, उसके बाद वह ईशा सेंटर से जुड़ गईं। छोटी बेटी साफ्टवेयर इंजीनियर है। अपनी याचिका में बेटियों के पिता कामराज ने आरोप लगाया था कि उनकी बेटियों को उनके दिभाग की कार्यक्षमता को कम करने के लिए दवा दी गई थी और इसी वजह से उन्हेंने परिवार से अपना रिश्ता तोड़ लिया था। आरोप लगाया कि बेटियों को ब्रेनवॉश करके उन्हें जवान संन्यासी बना दिया जाता है और उन्हें अपने माता-पिता से भी मिलने नहीं दिया जाता है। मद्रास हाईकोर्ट में सुनवाई के समय दोनों बेटियां अदालत में मौजूद थीं और उन्होंने कहा कि वह अपनी मर्जी से रह रही हैं और किसी ने उन्हें मजबूर नहीं किया। जजों ने सवाल किया कि सद्गुरु के नाम से जाने वाले जग्गी वासुदेव योग केंद्र में अपनी बेटी की शादी क्यों करते हैं और अन्य महिलाओं को अपना सिर मुंडवाने और संन्यासी के रूप में रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं? न्यायाधीशों ने अदालत में मौजूद महिलाओं से पूछा था, आप आध्यात्मिक मार्ग पर होने का दावा करती हैं। क्या अपने माता-पिता को छोड़ना पाप नहीं लगता? मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि इसके पीछे की सच्चाई का पता लगाने के लिए आगे की जांच की जरूरत है। ईशा योग केंद्र के एक प्रवक्ता ने एक लिखित बयान में कहा कि ईशा योग केंद्र किसी को शादी करने या संन्यास लेने के लिए मजबूर, प्रोत्साहित या प्रेरित नहीं करता। ईशा योग केंद्र के मुताबिक 2016 के जजों ने कहा था माता-पिता का दायर मामला सच नहीं है और हम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जिन लोगों को हिरासत में लिए जाने का आरोप है, वे अपनी मर्जी से केंद्र में रह रही हैं।

-अनिल नरेन्द्र


Friday, 4 October 2024

कम से कम भगवान को तो राजनीति से दूर रखो

तिरुपति में लड्डू विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नसीहत दी है। राजनेताओं से कहा है कि कम से कम भगवान को तो राजनीति से दूर रखो। यह लोगों की आस्था का मामला है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सुबूत मांगते हुए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के इस दावे पर सवाल उठाया कि तिरुपति मंदिर के लड्डू बनाने में पशुओं की चर्बी का इस्तेमाल किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही इस पर सख्त रुख अपनाते हुए चंद्रबाबू नायडू की तीखी आलोचना की। तिरुपति के प्रसाद से जुड़े इस विवाद को आधार बनाते हुए जो पांच याचिकाएं दायर की गई हैं, उन पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई हालांकि जारी है, लेकिन पहले ही दिन कोर्ट की नजर में यह तथ्य आ गया कि प्रसाद में मिलावटी घी के इस्तेमाल का कोई ठोस सबूत अभी तक नहीं पाया गया है। इससे न केवल यह पूरा मामला या विवाद ही निराधार साबित हो रहा है बल्कि यह सवाल भी सामने आया कि आखिर क्यों इस विवाद को तूल दिया गया था। न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि मुख्यमंत्री से संबंधित दावा 18 सितम्बर को किया, जबकि मामले में प्राथमिकी 25 सितम्बर को दर्ज की गई और विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन 26 सितम्बर को किया गया। पीठ ने कहा कि एक अन्य संवैधानिक पदाधिकारी के लिए सार्वजनिक रूप से ऐसा बयान देना उचित नहीं है जो करोड़ों लोगों की भावनाओं को प्रभावित कर सकता है। राजनीति और धर्म को मिलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। नायडू ने दावा किया था कि पिछली सरकार के दौरान तिरुपति लड्डू बनाने में इस्तेमाल किया गया घी शुद्ध होने की बजाए जानवरों की चर्बी से युक्त था। अदालत ने सवाल किया कि जांच जब जारी है तो रिपोर्ट आने से पहले आप मीडिया में क्यों गए? लड्डू का स्वाद खराब होने की श्रद्धालुओं की शिकायत की बात उठने पर राज्य सरकार से सवाल किया कि आप कह सकते हैं कि टेंडर गलत तरीके से दिया गया। मगर यह कहना कि मिलावटी घी प्रयोग किया गया, इसका सबूत कहां है? तिरुपति मंदिर देश का एक ऐसा प्रमुख श्रद्धा का केंद्र है, जहां से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने चंद्रबाबू नायडू पर राजनीति के लिए भगवान का प्रयोग करने और जनता का ध्यान सरकार के कामों से हटाने का आरोप लगाया। मंदिर की पवित्रता को ठेस लगाने वाली ये खबरें श्रद्धालुओं के लिए किसी सदमे से कम नहीं कही जा सकतीं। मगर जैसा शीर्ष अदालत ने कहा है कि धर्म को राजनीति से मिलाने की जरूरत नहीं है। आस्था-विश्वास के प्रति राजनीतिज्ञों को विशेष सतर्कता बरतनी सीखनी चाहिए। राजनीतिक लाभ के लिए लोग ये धर्म का दुरुपयोग जनता को दिग्भ्रमित करने और समुदायों के दरम्यान दरारे डालने वालों पर सख्ती की जानी आवश्यक है। सनसनी फैलाने वाले दोषमुक्त नहीं हो सकते। यदि वास्तव में किसी भी तरह की मिलावट हुई है, तो आस्था से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। इस तरह लोगों की आस्था से खेलकर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश वैसे भी हमारे संवैधानिक मूल्यों पर भी आघात है। -अनिल नरेन्द्र

वांगचुक को हिरासत में लेने पर सियासी संग्राम

लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और इसे संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर 700 किलोमीटर लंबी दिल्ली चलो यात्रा को लेकर सोनम वांगचुक को दिल्ली के सिंघु बार्डर पर पुलिस ने हिरासत में ले लिया। हिरासत में लिए जाने से नाराज सोनम वांगचुक मंगलवार को अनशन पर बैठ गए। दरअसल, सोनम वांगचुक सवा सौ साथियों के साथ सोमवार देर रात करीब 11 बजे सिंघु बार्डर पहुंचे थे। इस दौरान आउट नार्थ जिला पुलिस ने उनके काफिले को रोक लिया और वापस जाने के लिए कहा। जब वे नहीं माने तो पुलिस ने सोनम वांगचुक और उनके साथियों को हिरासत में ले लिया। पुलिस सोनम और उनके 40 साथियों को बवाना थाने ले गई। इसके अलावा अन्य को अलग-अलग थानों में रखा गया। सोनम वांगचुक को हिरासत में लेने के बाद सियासत गर्मा गई है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक और दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी वांगचुक से मिलने बवाना थाने पहुंचीं, लेकिन उन्हें मिलने नहीं दिया गया। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पुलिस की कार्रवाई को गलत बताया है। इधर इस मुद्दे पर आक्रामक कांग्रेस ने केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए इसे तानाशाही रवैया करार दिया। मुख्यमंत्री आतिशी ने वांगचुक की गिरफ्तारी और पुलिस के रवैये पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मांग की कि लद्दाख और दिल्ली के एलजी राज खत्म हो और दोनों को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। चुनी हुई सरकार की प्रतिनिधि को वांगचुक से मिलने नहीं देना निंदनीय है। आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल और वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया ने भी भाजपा और केंद्र पर हमला बोला। केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में आने से कभी किसानों को रोका जाता है तो कभी लद्दाख के लोगों को। दिल्ली आने का अधिकार सभी को है। निहत्थे शांतिपूर्ण लोगों से आखिर इन्हें क्या डर लग रहा है? वहीं लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने राजधानी में प्रवेश से रोकने के लिए वांगचुक को हिरासत में लेने के कदम को अस्वीकार्य करार दिया और कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लद्दाख के लोगों की आवाज सुननी पड़ेगी। लद्दाख में वांगचुक के लिए जनसमर्थन की लहर बढ़ी है और संविधान की छठी अनुसूची के तहत आदिवासी समुदायों की सुरक्षा की व्यापक मांग हो रही है। मगर मोदी सरकार अपने करीबी दोस्तों को लाभ पहुंचाने के लिए लद्दाख के परिस्थितिकी रूप से संवेदनशील हिमालयी ग्लेशियरों का दोहन करना चाहती है। राहुल गांधी ने कहा कि पर्यावरण और संवैधानिक अधिकारों के लिए शांतिपूर्वक पदयात्रा कर रहे सोनम वांगचुक और लद्दाख के लोगों को हिरासत में लेना अस्वीकार्य है। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और कई अन्य को दिल्ली सीमा पर हिरासत में लिए जाने के खिलाफ मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता के वकील ने मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ के समक्ष मामले को सूचीबद्ध करने का उल्लेख किया। अदालत ने मामले को मंगलवार सूचीबद्ध करने से इंकार करते हुए इस बात पर सहमति व्यक्त की कि यदि अपराह्न साढ़े तीन बजे तक उसके काम की स्थिति सामान्य हो जाती है तो मामले को जल्द की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। उधर वांगचुक अपने साथियों के साथ बवाना थाने में बेमियादी अनशन पर बैठ गए हैं। वांगचुक को बुधवार को रिहा कर दिया गया।

Thursday, 3 October 2024

नसरुल्लाह विलेन या हीरो?

लेबनान पर इजरायली हमले वैसे तो सितम्बर के मध्य से ही हो रहे थे, लेकिन 27 सितम्बर की शाम राजधानी बेरुत के घनी आबादी वाले दक्षिणी हिस्से में स्थित हिज्बुल्लाह मुख्यालय में हुए हमले में हिज्बुल्लाह प्रमुख सैयद हसन नसरुल्लाह की मौत ने पहले से ही अस्थिर पश्चिम एशिया में स्थितियों को और जटिल तो बनाया ही है, इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध विराम के समर्थकों को भी भारी धक्का लगा है। नसरुल्लाह का मारा जाना हिज्बुल्लाह के लिए ऐसा झटका है, जिससे उभरना उसके लिए आसान नहीं होगा। नसरुल्लाह की मौत से तमाम अरब दुनिया में शोक का माहौल है। बहुत से इस्लामिक देश उसे अपना हीरो मानते थे जो इजरायल से पिछले तीन दशकों से टक्कर ले रहा था। नसरुल्लाह तीन दशक से ज्यादा समय से हिज्बुल्लाह का नेतृत्व कर रहा था। अपने लेबनानी शिया अनुयायियों के आदर्श और अरब तथा इस्लामिक जगत के लाखों लोगों के बीच सम्मानित नसरुल्लाह को सैयद की उपाधि दी गई थी। वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देश और इजरायल उसे दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी मानते थे। उसके मरने के बाद कई देशों ने खुशियां मनाई, मिठाइयां बांटी। नसरुल्लाह को इजरायल ने किस बखूबी से मारा वह भी चौंकाने वाला है। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने अपने मुखबिरों से पता कर लिया था कि नसरुल्लाह किस दिन, किस समय, किस घर में होगा। कहा जा रहा है कि मोसाद का गुप्तचर कोई ईरानी हो सकता है क्योंकि ईरान के पास ही नसरुल्लाह की पूरी जानकारी रही होगी। खैर, ठीक समय में इजरायल ने अपने विमानों से बंकर बस्टर बम गिराए। नसरुल्लाह घर की बेसमेंट में एक कांक्रीट बंकर में मीटिंग लेने गया था जब यह बम आ गिरा। इजरायल ने 80 से अधिक बंकर बस्टर बम गिराए। ये बम इतने शक्तिशाली हैं कि जमीन के भीतर 60 फीट तक की गहराई में तथ्य को ध्वस्त कर सकते हैं। यह बम स्टील, कांक्रीट की मोटी दीवारों को तोड़ सकते हैं। ये गाडेड बम तहखाने, बंकर या सुरंगों को उड़ाने के लिए ही अमेरिका ने तैयार किए हैं। कहा जा रहा है कि इजरायल ने जो बम गिराए वह अमेरिका ने उसे दिए हैं। इजरायली सेना और नेतन्याहू सरकार के लिए यह बड़ी कामयाबी मानी जा रही है, मुझे अफसोस इस बात पर भी है। कथित झटके या कामयाबी के बाद भी इस क्षेत्र में शांति की संभावना मजबूत नहीं हुई है। इसके उलट संघर्ष के बेकाबू होने का खतरा है। पिछले तीन दशक से भी ज्यादा समय में हिज्बुल्लाह का नेतृत्व कर रहा नसरुल्लाह मध्य पूर्व के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में शुमार किया जाता था। उसकी कमी की जल्द भरपाई होना भी आसान नहीं है। मगर हिज्बुल्लाह के लिए यह इकलौता झटका नहीं है। हाल के हमलों में उसके एक दर्जन से ज्यादा टॉप कमांडर मारे जा चुके हैं। बहुचर्चित पेजर और वॉकी-टॉकी हमलों ने उसके इंटर कम्युनिकेशन सिस्टम को भी लगभग खत्म कर दिया है। ताजा झटका कितना बड़ा भी क्यों न हो, यह समझना गलत होगा ]िक इससे हिज्बुल्लाह इजरायल के सामने समर्पण कर देगा। कुछ समय पहले तक 12 देशों की ओर से प्रस्तावित युद्धविराम को लेकर जो भी बची-खुची उम्मीद थी, अब वह समाप्त हो गई है। इजरायल अभी रूका नहीं है वह अब लेबनान के अंदर घुसकर पूरा आक्रमण करने जा रहा है, इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। निगाहे ईरान पर भी टिकी हैं, तेहरान के ही गेस्ट हॉउस में हमास नेता इस्माइल हानिया की मौत का बदला भी उसने लेना है, नसरुल्लाह की मौत उसके लिए भी झटका है। देखना होगा कि उसकी प्रतिक्रिया कितनी और कैसी होगी। -अनिल नरेन्द्र

वित्त मंत्री सीतारमण पर एफआईआर

शायद यह पहली बार हो रहा है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी भी केंद्रीय वित्त मंत्री पर एफआईआर दर्ज हुई हो। इससे पहले जहां तक मेरी जानकारी है कभी भी किसी केंद्रीय वित्त मंत्री पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई। मामला इलेक्टोरल बांड संबंधी है। अब समाप्त हो चुकी चुनावी बांड योजना से संबंधित एक शिकायत के बाद बेंगलुरू से चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए नामित मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश के बाद इलेक्टोरल बांड के मुद्दे पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ जबरन वसूली और आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। कोर्ट ने यह फैसला आदर्श अय्यर की याचिका पर सुनाया था। आदर्श जनाधिकार संघर्ष परिषद (जेएसपी) के सह-अध्यक्ष हैं। उन्होंने मार्च में स्थानीय पुलिस को एक शिकायत दी थी जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। हाईकोर्ट के आदेश के अगले ही दिन यानि शनिवार दोपहर तीन बजे एफआईआर दर्ज की गई। इसमें केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण, ईडी के अधिकारी, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के पदाधिकारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 304 (जबरन वसूली) 120बी (आपराधिक साजिश) और 34 (सामान्य इरादे से कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कृत्य) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। जनाधिकार संघर्ष परिषद के सह-अध्यक्ष आदर्श आर अय्यर ने शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने चुनावी बांड की आड़ में जबरन वसूली की और 8000 करोड़ रुपए से अधिक का फायदा उठाया। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि सीतारमण ने ईडी अधिकारियों की गुप्त सहायता और समर्थन के माध्यम से राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर दूसरों के फायदे के लिए हजारों करोड़ रुपए की जबरन वसूली की। शिकायत में कहा गया है कि चुनावी बांड की आड़ में जबरन वसूली का काम विभिन्न स्तरों पर भाजपा के पदाधिकारियों की मिलीभगत से चलाया जा रहा था। फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बांड योजना को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि इससे संविधान के तहत सूचना के अधिकार और भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लघंन होता है। इस केस की जानकारी सामने आते ही भाजपा और कांग्रेस ने एक दूसरे पर निशाना साधना शुरू कर दिया। कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर आशोक ने कहा कि इलेक्टोरल बांड का लाभार्थी कांग्रेस भी रही है और निर्मला सीतारमण ने मुख्यमंत्री सिद्धरमैया की तरह अपने ही परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए पैसे नहीं लिए हैं। जब से राज्यपाल का पद गहलोत ने सीएम सिद्धरमैया के खिलाफ मूडा मामले में केस चलाने की मंजूरी दी है, तब से भाजपा उनका इस्तीफा मांग रही है। कर्नाटक हाईकोर्ट की ओर से राज्यपाल की दी गई मंजूरी को रद्द करने के लिए दी गई याचिका जिसे खारिज कर दिया गया। उधर कांग्रेस ने इस संबंध में कहा कि लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए वित्त मंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए। कांग्रेस ने कहा कि वित्त मंत्री खुद से ऐसा नहीं कर सकतीं। हम जानते हैं कि नंबर-1 और नंबर-2 कौन है और यह किसके निर्देश पर किया गया। सिंघवी ने इसे ईबीएस (इंक्सटॉशनिस्ट बीजेपी स्कीम) करार देते हुए कहा था कि बड़ा मुद्दा समान अवसर उपलब्ध कराने का है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है। इस बीच कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार का वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और अन्य के खिलाफ इस मामले की जांच पर रोक लगा दी है। भाजपा नेता नलिन कुमार ने उन्हें आरोपी के रूप में नामजद करने वाली एफआईआर को चुनौती दी थी। अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को होगी। देखें, अब आगे क्या होता है। वैसे यह अभूतपूर्व मामला है जहां किसी केंद्रीय मंत्री को किसी केस में आरोपी बनाया गया हो।

Tuesday, 1 October 2024

अमेरिका की दहलीज तक पहुंचने वाली चीनी मिसाइल

चीन ने प्रशांत महासागर में बुधवार को एक अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) का परीक्षण किया। चीनी मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि मिसाइल पर प्रतिरूपी आयुध (डमी वार हैड) लगाया था, जिसे समुद्र के एक निषेध क्षेत्र में गिराया गया। चीन की इस डीएफ-41 मिसाइल को साल 2017 में सेना के अंदर शामिल किया गया था। इसकी मारक क्षमता 12 हजार से लेकर 15 हजार किलोमीटर तक है। ऐसे में यह मिसाइल अमेरिका की मुख्य भूमि के अंदर तबाही मचा सकती है। चीनी अखबार साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट में प्रकाशित एक खबर के अनुसार इससे पहले चीन ने मई 1980 में अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल डीएफ-5 का परीक्षण किया था। चीन की इस पहली मिसाइल की मारक क्षमता 9 हजार किलोमीटर तक थी। हालांकि ताजा लांच अंतर्राष्ट्रीय कानून और अंतर्राष्ट्रीय अभ्यास के अनुरूप है और किसी भी देश की ओर इसे टारगेट नहीं किया गया पर जापान, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने इस टेस्ट पर चिंता जाहिर की है। इस लांच से हिन्द प्रशांत क्षेत्र में तनाव बढ़ा है। जानकारों का मानना है कि इससे पता चलता है कि चीन की लंबी दूरी तक हमला करने की न्यूक्लियर क्षमता बढ़ी है। अमेरिका ने बीते साल आगाह किया था कि चीन ने डिफेंस अपग्रेड के तहत अपनी परमाणु ताकतों को मजबूत किया है। चीन ने जिस मिसाइल यानि आईसीबीएम का परीक्षण किया है वह 5000 से 12000 किलोमीटर तक मार कर सकती है। इससे चीन की पहुंच अब अमेरिका और हवाई द्वीप तक हो गई है। लेकिन चीन की सैन्य ताकत अब भी रूस और अमेरिका से करीब पांच गुना कम है। चीन कहता रहा है कि उसका न्यूक्लियर रखरखाव सिर्फ इसलिए है कि कोई और हमला न करे। विश्लेषकों का कहना है कि आमतौर पर चीन परीक्षण देश के अंदर ही किसी हिस्से में किया करता था। अतीत में शिजियांग प्रांत के एक रेगिस्तान में ऐसे परीक्षण किए गए थे। न्यूक्लियर मिसाइल विशेषज्ञ अंकित पांडे ने बीबीसी से कहा, इस तरह के परीक्षण अमेरिका जैसे दूसरे देशों के लिए असाक्ष्य नहीं है, मगर चीन के मामले में यह सामान्य बात नहीं है। अंकित ने कहा चीन के परमाणु आधुनिकीकरण के परिणामों के चलते पहले ही काफी बदलाव आ चुके हैं। ये लांच अब चीन के रुख में बदलाव को दिखाता है। जापान ने भी गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि चीन की ओर से कोई नोटिस नहीं दिया गया था। आस्ट्रेलिया ने कहा कि इस कदम से क्षेत्र में अस्थिरता और गलत आंकलन का जोखिम बढ़ता है। आस्ट्रेलिया ने भी इस मामले में चीन से जवाब मांगा है। न्यूजीलैंड ने चीन के परीक्षण का स्वागत नहीं किया है और इसे चिंता पैदा करने वाली हरकत बताया। अंतर्राष्ट्रीय संबंध के प्रोफेसर लिप एरिक एसले ने कहा कि अमेरिका के लिए साफ संदेश है कि ताइवान, स्ट्रेट संघर्ष में किसी भी तरह का सीधा दखल अमेरिका की धरती को भी खतरे में डाल सकता है। उन्होंने कहा चीन का ये परीक्षण अमेरिका और एशिया में उसके सहयोगियों को ये दिखाता है कि चीन कई मोर्चों पर एक साथ लड़ सकता है, बता दें कि यह मिसाइल ताइवान, फिलीपींस और गुआव के पास से गुजरती हुई प्रशांत महासागर में जा गिरी। यह भारत के लिए भी चिंता का विषय है। -अनिल नरेन्द्र

हरियाणा में बागी व छोटे दल बिगाड़ रहे हैं गणित

गुटबाजी भाजपा और कांग्रेस दोनों में है देखना यह होगा कि कौन मतदान से पहले इस पर काबू पा सकता है। कहा तो जा रहा है कि हरियाणा में माहौल कांग्रेsस का है। लेकिन आपसी गुटबाजी जीती हुई बाजी को नुकसान में भी बदल सकती है। राहुल गांधी की सभा में बेशक कुमारी शैलजा व भूपेन्द्र सिंह हुड्डा एक मंच पर दिखे पर इससे क्या गुटबाजी का सिलसिला थम गया है। वहीं भाजपा में भी गुटबाजी चरम पर है। वहां तो कई नेताओं ने अभी से अपने आप को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया है। गांव-देहात में भाजपा उम्मीदवारों को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कई गांवों में तो भाजपा प्रत्याशी को गांव में घुसने ही नहीं दिया जा रहा है। बड़े-बड़े दिग्गजों को अपनी जान बचाने के लिए मौके से भागना पड़ा। भाजपा का सबसे बड़ा वोट केंपेनर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अंभी तक हुई दो चुनावी सभाओं में भीड़ नदारद थी। पांच से दस हजार लोग ही उपस्थित थे। जहां डेढ़-दो लाख आदमियों का हुजूम प्रधानमंत्री को सुनने के लिए आता रहा है। एक तरफ मुख्यमंत्री सैनी का गुट है, दूसरी तरफ मनोहर लाल खट्टर का गुट है तो तीसरी तरफ अनिल विज का गुट डटा हुआ है। संघ अलग नाराज चल रहा है। कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है। वहीं रही-सही कसर बागी और निर्दलीय उम्मीदवार उतार रहे हैं। दोनों प्रमुख पार्टियों की तुलना करते समय कहा जाता है कि भाजपा के साथ एक संगठित सुव्यवस्थित संगठन है। यह संगठन बिल्कुल नीचे तक है। बूथ इंचार्ज से लेकर पन्ना प्रमुख तक सारे पदों पर लोग तैयार हैं, उनकी भूमिका तय है। कहा तो यह भी जाता है कि भाजपा हर समय चुनाव लड़ते रहने वाली दुनिया की एक सबसे बड़ी मशीन है। इसके विपरीत कांग्रेस में संगठन नाम मात्र के लिए है। जैसा कि हमने मध्य प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में देखा था। माहौल पक्ष में होने के कारण अति-विश्वास भी कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकता है। जैसा कि हमने छत्तीसगढ़ में देखा जैसे-जैसे चुनाव प्रचार जोर पकड़ रहा है हरियाणा में मुकाबले कड़े होते जा रहे हैं। बेशक मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच है। चुनिंदा सीटों को छोड़ दिया जाए तो राज्य की 90 सीटों में से ज्यादातर पर मुकाबला नजदीकी बताया जा रहा है। इसका प्रमुख कारण है दोनों दलों के प्रत्याशियों के अतिरिक्त निर्दलीय, इनेलो, जजपा और आप प्रत्याशियों का भी पूरा जोर लगाना है। 30 से ज्यादा सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय या तीन से अधिक प्रत्याशियों में हो गया है। इस कारण से मुकाबला नजदीकी होता जा रहा है। 15 सीटों पर भाजपा और 29 सीटों पर कांग्रेस के 29 बागी मैदान में है। मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों की पहचान वाले इस राज्य में एक बार फिर वह हाशिए पर हैं। इनके चुनिंदा प्रत्याशी ही प्रभावी दिख रहे हैं। इनसे अधिक निर्दलीय और बागी चर्चा में हैं। इनेलो, जजपा और निर्दलीय में बंटे बेनिवाल परिवार के 8 प्रत्याशी मैदान में हैं। अब प्रचार उफान पर है। रैलियां और रोड शो हो रहे हैं, कांग्रेस-भाजपा अपनी गारंटी और संकल्प पत्र के साथ आम जनता के बीच है। मतदान में मुश्किल से चंद दिन ही बचे हैं। अब प्रचार और मुद्दे आक्रामक व तीखे होंगे। ऐसे में मुकाबलों की दिशा बदल सकती है। वैसे माना जाता है कि हरियाणा में तीन मुद्दे सबसे ज्यादा प्रभावी होते हैं, किसान, जवान और पहलवान।