-अनिल नरेन्द्र
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Tuesday, 2 December 2025
चुनाव आयोग के हाथ खून से रंगे हैं।
यह कहना है तृणमूल कांग्रेस के उस प्रतिनिधिमंडल का जो चुनाव आयोग की पूरी बैंच के साथ दो दिन पहले मिला था। पश्चिम बंगाल में जारी वोटर लिस्ट में बदलाव की प्रािढया के बीच तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ ब्रायन के नेतृत्व में पार्टी के दस सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने आयोग से मुलाकात की। ओ ब्रायन ने मीटिंग के बाद कहा कि पार्टी ने चुनाव आयोग के सामने पांच सवाल उठाए, लेकिन चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार ने उनका कोई जवाब नहीं दिया। तृणमूल के सांसदों का कहना था कि यदि एसआईआर का उद्देश्य नकली वोटरों और घुसपैठियों का पता लगाना है तो फिर बंगाल ही क्यों? मेघालय और त्रिपुरा में क्यों नहीं? जबकि इन राज्यों की सीमाएं भी बांग्लादेश से मिलती हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस सांसदों को सुनने के बाद आयोग ने स्पष्ट किया कि एसआईआर सभी राज्यों में होना है। डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि हम इन एसआईआर की संवैधानिक वैधता पर सवाल नहीं उठा रहे हैं बल्कि उस तरीके पर सवाल उठा रहे हैं, जिस तरीके से जल्दबाजी में इसे लागू किया जा रहा है उस पर एतराज है। एसआईआर के लिए उन्होंने समय बढ़ाने के लिए भी मांग की। तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने जब पावार को चुनाव आयोग की पूरी पीठ से मुलाकात की तो उन्होंने खुलकर आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के कारण कम से कम 40 लोगों की मौत हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के हाथ खून से सने हैं। हमने 5 सवाल उठाए और चुनाव आयोग ने एक घंटे तक बिना रूके हमसे बात की। जब हम बोल रहे थे तब हमें भी नहीं टोका गया लेकिन हमारे पांच सवालों में से किसी का भी जवाब नहीं मिला। लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलकर उन्हें 40 ऐसे लोगों की सूची सौंपी जिनकी मौत कथित तौर पर एसआईआर प्रािढया से जुड़ी थी। हालांकि उन्होंने कहा कि आयोग ने इन्हें केवल आरोपी कहकर खारिज कर दिया। सांसदों की चुनाव आयोग से करीब 40 मिनट में कल्याण बनर्जी, महुआ मोइत्रा और ममता बाला ठाकुर ने अपनी बात रखी और जो कहना था वो कहा। उन्होंने कहा, इसके बाद सीईसी ने एक घंटे तक बिना रूके बात की। जब हम बोल रहे थे तब हमें भी नहीं टोका गया, लेकिन हमें हमारे पांच सवालों में से किसी एक का भी जवाब नहीं मिला। एसआईआर के दूसरे चरण को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। टीएमसी सांसदों के प्रश्नों का संतोषजनक जवाब न देना इस प्रािढया के औचित्य और उपलब्धता पर सवाल उठ रहा है। एसआईआर से जुड़े संदेहों का दूर न होना शुभ संकेत नहीं है। एसआईआर के राजनीतिक पहल को समझा जा सकता है। खासकर बंगाल में जहां भाजपा और तृणमूल की कड़ी टक्कर होने का अंदाजा है। लेकिन इससे जुड़ी चिंताओं को भी खारिज नहीं कर सकते। एसआईआर की प्रासंगिकता पर कोई सवाल नहीं है और न ही आयोग के अधिकार पर। सुप्रीम कोर्ट भी यह बात कह चुका है। लेकिन विपक्ष की चिंताओं को दूर करना भी आयोग की ही जिम्मेदारी है। विपक्ष को अगर लग रहा है कि उनकी बातों को अनसुना किया जा रहा है तो देश की इस संवैधानिक संस्था को न केवल इनका संतोषजनक जवाब देना होगा। बल्कि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव प्रािढया भी अपनानी होगी।
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