ईरान के बुशहर परमाणु केन्द्र के पास चौथी बार अमेरिकी-इजरायली हमला हुआ है। इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई। शनिवार को ईरान के बेहद महत्वपूर्ण बुशहर परमाणु पर से जानलेवा विकिरण का सीधा खतरा तो नहीं है लेकिन हवाओं के जरिए रेडियोधर्मी धूल गल्फ राज्यों और यहां तक कि भारत के पश्चिमी राज्यों तक पहुंचने का खतरा है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की चर्चा होने लगी है। अगर ईरान-इजरायल के बीच जंग खतरनाक स्तर पर पहुंचती है और ईरान की धरती पर परमाणु धमाका होता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है? क्या ईरान से उड़ने वाली रेडियोएक्टिव धूल हमारे शहरों तक पहुंचकर तबाही मचा सकती हैं? वैधानिक और रणनीतिक नजरिए से यह समझना जरूरी है कि हवा का रुख और दूरी इस खतरे को कैसे तय करती हैं? ईरान में अगर कोई परमाणु घटना होती है, तो सबसे ज्यादा तबाही उसके पड़ोसी देशों में देखने को मिलेगी। ईरान के 500 से 1000 किलोमीटर के दायरे में आने वाले इराक, तुर्किए, आर्मिनिया, अजरबैजान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों को बेहद घातक रेडिएशन का सामना करना पड़ेगा। इन देशों में रेडियोधर्मी धूल (फॉलआउट) सीधे तौर पर लोगों की सेहत और पर्यावरण को बर्बाद कर सकती है। हवा का बहाव के आधार पर इन देशों की सुरक्षा पूरी तरह दांव पर लगी होगी। ईरान के दक्षिण में स्थित खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर और यूएई भी इस खतरे की चपेट में हैं। अगर ईरान के बुशहर जैसे तटीय परमाणु बिजली संयंत्रों को निशाना बनाया गया तो रेडियो एक्टिव रिसाव सीधे फारस की खाड़ी और अरब सागर के पानी को जहरीला बना सकता है। इससे समुद्री जीव-जंतुओं के साथ-साथ इन देशों की पेयजल व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा। समुद्री लहरें इस प्रदूषण को भारतीय तटों तक भी पहुंचा सकती हैं। विज्ञान के मुताबिक किसी भी परमाणु विस्फोट के बाद निकलने वाले सबसे खतरनाक और भारी रेडियोधर्मी कण धमाके वाले नगर से कुछ सौ किलोमीटर के दायरे में ही जमीन पर गिर जाते हैं। इतनी लंबी दूरी तय करते समय रेडिएशन का असर काफी हद तक कम हो जाता है। इसलिए तकनीकी रूप से भारत में तत्काल एक्यूट रेडिएशन सिकनेस यानि विकिरण से होने वाली गंभीर बीमारी का सीधा खतरा कम नजर आता है। भले ही भारत ईरान से काफी दूर है, लेकिन वायुमंडल में घुले रेडियोधर्मी कणों को हवाएं दूर तक ले जा सकती हैं। अगर हवा का रुख पश्चिम से पूर्व की ओर रहता है तो परमाणु बादल 48 से 72 घंटों के भीतर भारतीय आसमान तक पहुंच सकते हैं। ऐसी स्थिति में गुजरात, राजस्थान, पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों में रेडियो एक्टिव कणों की मौजूदगी दर्ज की जा सकती है। हालांकि भारत तक पहुंचते-पहुंचते ये कण इतने फैल और हल्के हो चुके होंगे कि इनसे जानलेवा खतरा होने की आशंका बहुत ही कम रहती है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि खाड़ी देशों और ईरान के आसपास बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं। हम ऊपर वाले से प्रार्थना करते हैं कि ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध में परमाणु केंद्रों पर सीधे हमले से बचें। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा असर पूरी कायनात पर पड़ेगा।
-अनिल नरेन्द्र
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