जंगे हथियारों से नहीं जीती जाती, यह जज्बातों से जीती जाती है। ईरानी आवाम ने यह साबित कर दिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी थी कि आज रात हम ईरान की सभ्यता को ही मिटा देंगे। इसके जवाब में ईरानी आवाम सड़कों पर उतर आई। अपने देश के अस्तित्व और ट्रंप की धमकी के जवाब में ईरानी आवाम अपने देश के पुलों और पावर प्लांटों को बचाने के लिए अमेरिका के सामने सीना तानकर खड़ी हो गई। ईरान के अहवाज, तबरीज, ईलाम सहित कई शहरों में हजारों लोगों ने बिजली संयंत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों के चारों ओर लंबी मानव श्रृंखला बना ली। ईरानी समाचार एजेंसी तसनीम के अनुसार पुरुषों, महिलाओं और यहां तक कि बच्चों सहित बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए और ह्यूमन चेन बनाकर डट गए। प्रतिभागियों के हाथों में ईरानी झंडे और राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरों वाले पोस्टर थे और कई लोग मुख्य मार्ग पर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर लंबी कतार में खड़े थे। ईरान के अ"ाज में व्हाइट ब्रिज में पावर प्लांट सहित कई स्थानों पर मानव श्रृंखला बनाई गई। यह मानव श्रृंखला वाशिंगटन की ओर से बढ़ती आक्रामक बयानबाजी का सीधा जवाब था। ईलाम के लोगों ने देश को निशाना बनाने वाली किसी भी सैन्य कार्रवाई का विरोध करने के लिए इस मानव श्रृंखला का सहारा लिया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय एकता दिखाने के लिए देश भक्ति का यह जबरदस्त प्रदर्शन किया। इसका सीधा असर वाशिंगटन पर पड़ा। शायद उसको सद्बुद्धि आई कि ईरानी जनता जो सड़कों पर मानव श्रृंखला बनाकर खड़ी है उस पर हम हमला करेंगे तो सारी दुनिया में हमारी थू-थू हो जाएगी। इसीलिए ईरान की सभ्यता को खत्म करने की धमकी देने वाले डोनाल्ड ट्रंप आखिरी क्षणों में पीछे हट गए। ईरान का मौजूदा सैन्य रुख स्पष्ट संकेत देता है कि उसकी प्राथमिकता अपने शासन और सेना ढांचे को बचाए रखना है। इस्लामिक रिपब्लिक के नेतृत्व और सैन्य कमांडरों ने पिछले 3-4 दशकों से ऐसे ही संभावित टकराव की तैयारी की है। शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई ने कई वर्षें पहले ही यह देख लिया था कि किसी न किसी दिन यह स्थिति आएगी और अमेरिका-इजरायल हम पर हमला करेगा। आज अगर ईरान की इस जंग में जीत हुई है तो इसका असल हकदार शहीद अयातुल्लाह खामेनेई ही है। दरअसल मोसाद और नेतन्याहू ने ट्रंप को यह आश्वासन दिया था कि अगर हम अयातुल्लाह खामेनेई और ईरान कि वरिष्ठतम सैन्य कमांडरों को मार देंगे तो ईरान में अंदरूनी विद्रोह हो जाएगा और हम अपने समर्थक को सत्ता में बिठा देंगे पर उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत का ईरान की आवाम पर क्या असर होगा। असर उल्टा हुआ जो ईरानी इस्लामी सत्ता के खिलाफ भी थे वे भी अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत के बाद सरकार के समर्थन में आ गए और इस जंग में ईरान का पलड़ा भारी हो गया। जैसे मैंने कहा कि गैर परमाणु युद्ध में जीत हथियारों से नहीं होती, जीत जज्बे से होती है, जिसका प्रदर्शन ईरानी जनता ने बाखूबी किया। दरअसल ईरान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
-अनिल नरेन्द्र
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