इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि खेलों में राजनीति इतनी बढ़ गई है कि फिजूल के विवादों में उलझने की तो फुरसत है पर असल मुद्दों पर कोई ध्यान ही नहीं देता? सुरेश कलमाड़ी लंदन ओलंपिक्स जाएंगे या नहीं, सानिया मिर्जा की मां क्यों लंदन जा रही हैं इत्यादि इत्यादि समय बर्बादी के मुद्दों पर तो दिन रात बहस हो रही है पर यह कोई नहीं पूछ रहा कि लंदन ओलंपिक्स में भारत कितने मैडल जीत कर लाएगा? लंदन ओलंपिक्स में भारतीय खिलाड़ियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है? यह सवाल खिलाड़ियों, कोचों और अधिकारियों से पूछा जाए तो ज्यादातर का जवाब होगा खिलाड़ी की फार्म, भाग्य और बाकी टीमों का दमखम, लेकिन देश का एक बड़ा वर्ग कुछ और ही सोच रहा है। एक सर्वे से पता चला है कि हमारे खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी बीजिंग 2008 ओलंपिक्स में जीते तीन पदकों की बराबरी लंदन में करना। खेल जानकारों के अनुसार भारत के पास इस वर्ष सुनहरा मौका है कि वह तीन की संख्या पीछे छोड़े। भारत के लिए मनोबल बढ़ाने वाली बात यह हो सकती है कि ओलंपिक ब्रिटेन की राजधानी लंदन में हो रहे हैं और ब्रिटेन की विश्व पसिद्ध रेटिंग एजेंसी पाइस वाटर हाउस कूपर्स ने अपने आंकलन में भविष्यवाणी की है कि भारत लंदन में छह पदक जीत सकता है। भारतीय खिलाड़ी इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि उनसे इस बार कितनी उम्मीदें लगाई गई हैं। लंदन ओलंपिक भारतीय खेलों की दिशा और दशा बन सकते हैं। बीजिंग से बढ़िया पदर्शन भारतीय खेलों को मीलों आगे ले जा सकता है लेकिन बीजिंग से कमजोर पदर्शन भारतीय खेलों को मीलों पीछे भी धकेल सकता है। निशानेबाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, तीरंदाजी, बैडमिंटन और टेनिस ऐसे खेल हैं जो ओलंपिक में भारत को पदक दिला सकते हैं। बीजिंग में जीते एक स्वर्ण ओर दो कांस्य पदक भारतीय खेलों की पगति और बदलाव की तस्वीर को लंदन में पेश करेंगे। यदि लंदन में भारत चार पदक भी जीत पाया तो यह मान लेना चाहिए कि भारतीय खेल धीरे-धीरे आगे सरक रहा है। बड़ी कामयाबी मिलती है तो साफ हो जाएगा कि भारतीय खिलाड़ियों ने पदक जीतने और बड़े मुकाबलों में सफल होने का मंत्र सीख लिया है। हालांकि मुक्केबाजी, कुश्ती, निशानेबाजी, तीरंदाजी, टेनिस और बैडमिंटन आदि खेलों में भारत के पास विश्व चैंपियन खिलाड़ी हैं किन्तु ओलंपिक के सामने किसी भी पतियोगिता के मायने नहीं हैं। यही कारण है कि बीजिंग में जीते पदक भारतीय खिलाड़ियों के लिए कड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं। वैसे यह विडम्बना है कि हम भारत के सर्वश्रेष्ठ पदर्शन के नाम पर तीन-चार पदकों की बात करते हैं जबकि हमारा पड़ोसी देश चीन 1984 के लास एंजेलिस के तीन पदकों से 2008 के बीजिंग ओलंपिक में 51 स्वर्ण सहित 100 से ज्यादा पदक जीतकर पदक तालिका में अमेरिका को परास्त कर नंबर वन बन गया था। भारत 112 वर्षों के अपने ओलंपिक इतिहास में कुल 20 पदक ही जीत पाया है, जिसमें 11 पदक तो हॉकी के नाम हैं। खेलों में यह सिद्धांत अब कहीं पीछे छूट चुका है कि पदक जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा लेना है। खिलाड़ी भी जानते हैं ओलंपिक में कामयाबी उन्हें रातों-रात स्टार बना देगा।
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Thursday, 19 July 2012
Wednesday, 28 December 2011
लंदन-पेरिस से भी ठंडी दिल्ली
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 28th December 2011
अनिल नरेन्द्र
दिल्लीवासियों को लग रहा था कि इस साल दिल्ली में ठंड उतनी नहीं पड़ेगी जितनी पड़ती है। लेकिन देर से ही सही जब ठंड अपने रंग में आई तो रिकॉर्ड तोड़ दिया। ढलते साल में यदि आप लंदन-पेरिस या न्यूयॉर्प गए हों तो अपनी यादें ताजा कर लें। इस साल न्यू ईयर मनाने के लिए आपको लंदन-पेरिस जाने की जरूरत नहीं होगी क्योंकि दिल्ली, लंदन-पेरिस व न्यूयॉर्प से ज्यादा ठंडी हो गई है। वहां गए बगैर आप दिल्ली में ही यूरोप का मजा ले लें। दरअसल सूरज छिपते ही अपनी दिल्ली बिल्कुल इन्हीं शहरों की तरह हो जा रही है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रविवार को न्यूनतम तापमान 2.9 डिग्री पहुंच गया। पिछले दस सालों में दिल्ली में सर्दी का यह रिकॉर्ड है। दिल्ली का न्यूनतम तापमान लंदन और पेरिस से भी कम हो गया। इन दोनों शहरों में न्यूनतम तापमान 4 डिग्री सेल्सियस रहा। यह और बात है कि वहां का अधिकतम तापमान दिल्ली की तुलना में काफी कम है। लंदन में यह 7 तो पेरिस में 11 डिग्री सेल्सियस रहा। इस कारण वहां की राहत तो सर्द है ही, दिन भी राहत देने वाला नहीं। दिल्ली में तो कम से कम थोड़ी राहत है और दिन का तापमान 19-20 डिग्री के बीच है। हां दिल्लीवासियों के लिए थोड़ी सुकून की बात यह जरूर रही कि इन दिनों कोहरे का जोर उतना नहीं है जितना इन दिनों में गत सालों में हमने देखा। दिन में सूर्य देव के दर्शन हो जाते हैं। यही कारण है कि दिन का तापमान अधिक है। यानी दिन में मजे की धूप सेंकिए और तैयार हो जाइए रात में लंदन-पेरिस का आनंद उठाने के लिए। यह सिलसिला और कितने दिन चलता है देखिए। दिलचस्प और अजीब बात तो यह है कि उत्तरी भारत के मैदानी इलाको में पहाड़ों से भी ज्यादा ठंड पड़ रही है। उदाहरण के तौर पर राजस्थान में शुरू में रविवार को 1.4 डिग्री तापमान था। हरियाणा के झज्जर में 0.3 और हिसार में 0.0 जबकि अमृतसर में यह 0.6 रहा। उधर हिमाचल के शिमला में 6 डिग्री तापमान था, नैनीताल में भी 6 डिग्री, मसूरी में 4.3। अगर हम यूरोप की बात करें तो रोम में 8, लंदन 7, पेरिस 5, बर्लिन में 2 डिग्री सेल्सियस रहा। मौसम की भी अजब बाजीगरी है। जहां किसमस में बर्प की उम्मीद की जाती है, वहां पारा ऊपर चढ़ रहा है। इसके विपरीत हरियाणा के झज्जर के खेतों में बर्प की दो सेंटीमीटर मोटी परत जम गई। तकरीबन पूरे उत्तर भारत में नश्तर चुनौती हवाओं से जन-जीवन में अस्त-व्यस्तता है। ठंड की वजह से 131 लोग दम तोड़ चुके हैं और मौसम विभाग के अनुसार आने वाले दिनों में भी ठंड से कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। माउंट आबू में तो 65 से 75 साल का रिकार्ड तोड़ दिया है। यहां पारा शून्य से 4.3 डिग्री नीचे चला गया। इससे यहां मकानों की खिड़कियों, कारों के शीशों, पेड़ की पत्तियों और झील पर बर्प की चादर चढ़ गई। लद्दाख क्षेत्र के लेह जिले में भी सत्र का सबसे कम तापमान शून्य से 18.2 डिग्री सेल्सियस नीचे रहा। गुलमर्ग और पहलगाम में न्यूनतम तापमान शून्य से कमश 8.4 और 7.4 डिग्री सेल्सियस नीचे रहा। उत्तर पदेश में कानपुर सबसे ठंडा रहा। जहां तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया। पिछले 24 घंटों के दौरान आगरा में न्यूनतम तापमान एक डिग्री रहा जो सामान्य से सात डिग्री कम था। राजधानी लखनऊ का न्यूनतम तापमान 2.9 डिग्री, फैजाबाद में 3.3 और गोरखपुर में 4.9 डिग्री सेल्सियस रहा। क्या यह ग्लोबल वार्मिंग का असर है? इस हिसाब से वह दिन भी आ सकते हैं जब दिल्ली में बर्प पड़ने लगे।
Anil Narendra, Cold Wave, Daily Pratap, India, London, Paris, Vir Arjun
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Friday, 4 November 2011
केवल प्रतिबंध से ही नहीं, कड़ी सजा से फिक्सिंग दूर हो सकती है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on4th November 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान क्रिकेट के लिए मंगलवार का दिन बेहद शर्मनाक साबित हुआ। उसके दो क्रिकेटरों, पूर्व टेस्ट कैप्टन सलमान बट्ट और तेज गेंदबाज मोहम्मद आसिफ को लंदन में एक अदालत ने स्पॉट फिक्सिंग का दोषी करार दिया। साउथवर्प क्राउन कोर्ट की 12 सदस्यीय ज्यूरी ने 27 वर्षीय बट्ट को गलत तरीके से पैसा लेने की साजिश और धोखाधड़ी की साजिश का दोषी पाया। वहीं आसिफ (28) को धोखाधड़ी की साजिश का दोषी ठहराया गया। मुकदमे की सुनवाई के 20वें दिन अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया। सजा एक-दो दिन में सुनाई जाएगी और तब तक यह जमानत पर बाहर रहेंगे। बट्ट को अधिकतम सात साल की सजा और आसिफ को अधिकतम दो साल की सजा हो सकती है। इस मामले में तीसरे आरोपी मोहम्मद आमेर को मुकदमे का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि उसने पहले ही जुर्म कुबूल कर लिया था। आमेर को स्कैंडल में उसकी भूमिका के लिए सात साल कैद तक की सजा सनाई जा सकती है। मालूम हो कि बन्द हो चुके ब्रिटिश टेब्लॉयड `न्यूज ऑफ द वर्ल्ड' ने स्टिंग ऑपरेशन कर पिछले साल अगस्त में इस स्कैंडल का खुलासा किया था। इसमें कहा गया था कि आसिफ और बट्ट ने सट्टेबाज मजहर मजीद से मिलकर इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स में हुए टेस्ट मैच में नोबाल फेंकने की साजिश रची थी। इस खुलासे के बाद इन तीनों के होटल के कमरों में छापे मारे गए जिसमें नकदी बरामद हुई थी। आसिफ पर गलत तरीके से पैसा लेने के लगे आरोप पर ज्यूरी बंटी हुई थी, जिसके बाद इस पर फिर से विचार करने का फैसला किया गया है। स्पॉट फिक्सिंग मामले में ज्यूरी के फैसला सुनाने के साथ ही सलमान बट्ट और मोहम्मद आसिफ अदालत के भीतर बिना कोई प्रतिक्रिया किए अपने स्थान पर ऐसे स्थिर हो गए मानों वे पत्थर की मूर्त बन गए हों। ब्रिटिश मीडिया और अदालत में मौजूद अन्य लोग दोनों के भाव पढ़ने के लिए उनकी ओर झांक रहे थे लेकिन तब तक इन दोनों के चेहरे भावशून्य हो चुके थे और वे बस ज्यूरी की ओर देखे जा रहे थे। यह भी अजीबोगरीब संयोग रहा कि जब ज्यूरी ने बट्ट को दोषी करार दिया उससे कुछ ही देर पहले उनकी पत्नी गुल हसन ने दूसरे पुत्र को जन्म दिया।स्पॉट फिक्सिंग के इस मामले में फैसला आने के बाद अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट जगत में प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक ही है। हालांकि पीसीबी (पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड) इस फैसले पर खामोश है, उसका कहना है कि यह कानूनी मामला है और आईसीसी इसकी जांच कर रही है। लेकिन आईसीसी के पूर्व सीईओ अहसान मनी ने कहा कि लंदन की अदालत का यह फैसला पीसीबी के लिए कड़ा संदेश है और आसिफ और बट्ट इसी के लायक थे। उस विवादास्पद दौरे पर पाक टीम के मैनेजर रहे भावर सईद ने इस पूरे प्रकरण पर दुख जताते हुए कहा कि मुझे बहुत अफसोस महसूस हो रहा है क्योंकि उस समय एक मैनेजर के तौर पर मैंने सभी खिलाड़ियों को बुरे लोगों से दूर रहने और सिर्प खेल पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी थी। उन्हें यह समझना चाहिए कि जब अगर देश का प्रतिनिधित्व करते हुए आप ऐसी बदतर चीज करते हो तो आपको बुरे अंजाम के लिए भी तैयार रहना चाहिए। टीम इंडिया के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने कहा कि सिर्प खिलाड़ी ही मैच फिक्स नहीं करते। कभी-कभी अम्पायर भी प्रशंसकों की मिलीभगत से ऐसा करते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट को दबा दिया जाता है। यह भ्रष्टाचार का सबसे बुरा प्रारूप है। इसके आगे सब फीका है। पूर्व आईपीएल चेयरमैन ललित मोदी ने ट्विटर पर लिखा है कि मुझे इस पर कभी संदेह नहीं रहा कि पाक क्रिकेटर मैच फिक्सिंग में शामिल रहे हों उन्हें जेल में डाल देना चाहिए ताकि बाकी क्रिकेटरों में खौफ पैदा हो। वैसे पाठकों को बता दें कि स्पॉट फिक्सिंग के रेट इतने ज्यादा हैं कि पाकिस्तान जैसे देश में जहां कि क्रिकेटरों को कोई खास बड़ी रकम बतौर फीस नहीं मिलती, उनके लिए इससे ऊपर उठना मुश्किल है। एक टेस्ट मैच के फिक्सिंग का रेट 7.5 करोड़ रुपये है। टी-20 का 0.3 करोड़ रुपये। 10 ओवर का 60 लाख रुपये और नोबाल का 7.5 लाख रुपये। पाकिस्तानी खिलाड़ी जब पढ़ते और सुनते होंगे कि भारत के क्रिकेटरों को कितना पैसा मिलता है तो जाहिर है कि वह अपने आपको छोटा महसूस करते होंगे। हाल ही में बीसीसीआई ने टीम इंडिया के लिए नए ग्रेडों की घोषणा की है। ग्रेड ए में सालाना एक करोड़ रुपये, ग्रेड बी में 50 लाख और ग्रेड सी में 25 लाख। जब पाकिस्तानी खिलाड़ी यह देखते हैं कि भारतीय खिलाड़ियों को इतना पैसा मिलता है तो वह भी अधिक से अधिक कमाई करने की सोचते हैं और क्रिकेट में ज्यादा लम्बी पारी नहीं खेली जा सकती, कुछ ही वर्षों के लिए आप टॉप पर होते हैं, इसलिए जल्दी से जल्दी पैसा कमाने की होड़ लगी रहती है। दरअसल इससे भारत भी अछूता नहीं रहा। मोहम्मद अजहरुद्दीन, अजय शर्मा, मनोज प्रभाकर और अजय जडेजा उन खिलाड़ियों में से हैं जिन पर आजीवन प्रतिबंध लगाना पड़ा। इसके अलावा सट्टेबाज जॉन को मौसम और पिच की जानकारी देने पर आस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड ने मार्प वॉ और शेन वार्न पर जुर्माना लगाया था। नवम्बर 2010 में पाकिस्तान के विकेटकीपर जुल्करनैन हैदर ने दुबई में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पांचवां वनडे मैच छोड़कर लंदन आ गए और आरोप लगाया कि उन्हें खराब प्रदर्शन करने के लिए धमकी दी जा रही है। इसी के आधार पर उन्होंने वहां शरण भी मांगी। पैसे का लालच खिलाड़ी को कभी-कभी सारी सीमाएं तोड़ने पर मजबूर कर देता है। इसमें इन सट्टेबाजों और बुकियों का भी बड़ा योगदान है और भारतीय सट्टेबाज तो इसमें माहिर हैं। यह सख्त कानून और सख्त सजा से ही रुक सकता है। बीसीसीआई ने 2000 में क्रिकेट से फिक्सिंग को `आहट' करने की दिशा में कड़े कदम उठाए और अपने खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगाया। इसके अच्छे परिणाम रहे। कम से कम उसके बाद किसी भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी पर फिक्सिंग का आरोप तो नहीं लगा। हालांकि पूर्व क्रिकेटरों का कहना है कि प्रतिबंध तो ठीक है पर इसके साथ सजा भी होनी चाहिए। इंग्लैंड की अदालत ने रास्ता दिखा दिया है। अब दुनिया के सभी क्रिकेट बोर्डों और सरकारों को भी ऐसा ही करना चाहिए। मुझे मोहम्मद आमेर पर जरूर थोड़ा दुख हो रहा है। इतना अच्छा नौजवान बालर किनके चक्कर में फंस गया और अपना शानदार भविष्य चौपट कर लिया। इन तीनों के एजेंट और कथित सट्टेबाज मजहर मजीद ने इस सट्टेबाजी प्रकरण का हिस्सा होना न केवल कुबूल ही किया है पर साथ-साथ यह भी माना है कि उसने इन तीन खिलाड़ियों को 77000 पाउंड स्टर्लिंग दी थी।
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Saturday, 13 August 2011
जिस ब्रिटेन साम्राज्य में सूर्य कभी डूबता नहीं था, वहां अंधेरी रात खत्म ही नहीं हो रही
जब अंग्रेजों का भारत पर राज था तो अंग्रेज यह कहते नहीं थकते थे कि `द सन नैवर सैट्स इन द ब्रिटिश एम्पायर' यानि कि ब्रिटिश राज में कभी सूरज ढलता नहीं। वह इतना फैला हुआ था कि दुनिया के एक बड़े हिस्से में अंग्रेजों का राज था। अंग्रेजों ने राज करने के लिए सब तरह से हथकंडे अपनाए। धीरे-धीरे स्थिति बदलती गई। आज यह स्थिति है कि इंग्लैंड में सूर्य उगने का नाम ही नहीं ले रहा। ऐसी काली रात आई है कि रोशनी का मौका ही नहीं आ रहा। पिछले पांच-छह दिनों से इंग्लैंड में ऐसा भयंकर दंगा हो रहा है जो उसके इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने गुरुवार को कहा कि पुलिस ने यह माना है कि दंगों से निपटने के लिए उसकी रणनीति गलत थी। उन्होंने कहा कि हिंसा के लिए अब तक 1300 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इंग्लैंड की लोकसभा हाउस ऑफ कामंस को संबोधित करते हुए कैमरन ने हिंसा के दौरान कई शहरों में हुए नुकसान की भरपायी के लिए एक करोड़ पाउंड के राहत पैकेज की घोषणा की। गत 4 अगस्त को पुलिस की गोलीबारी में मार्प डगन नाम के एक अफ्रीका मूल के अश्वेत के मारे जाने के बाद 6 अगस्त को टोटेनहम से शुरू हुई हिंसा, धीरे-धीरे मैनचेस्टर, सेलफर्ड, लीवरपूल, नाटिंघम, लेस्टर और बर्मिंघम में फैल गई।
इंग्लैंड के लोग आमतौर पर जेंटलमैन माने जाते हैं पर गत शनिवार से भड़के दंगों ने साबित कर दिया है कि ये सबसे बड़े लुटेरे भी हैं। जिन 1300 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया गया है उनमें ऐसे लोग शामिल हैं जिनमें दंगा करना, लूटपाट करने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती थी। इनमें से शायद ही किसी के खिलाफ इससे पहले पुलिस रिकार्ड में कुछ दर्ज हुआ हो। इनमें सबसे छोटा एक 11 साल का बच्चा है तो इनमें करोड़पति मां-बाप की संतान 19 साल की एक लड़की लारा जानसन भी है। एक टीचर भी पकड़ा गया है। गिरफ्तार लोगों में एक हाउस वाइफ भी है। ज्यादातर को लंदन की कोर्ट में पेश किया गया। उम्मीद तो थी कि कोर्ट उन्हें रिहा कर देगी पर कोर्ट ने अभी किसी को बरी नहीं किया है। इन लुटेरों में सबसे चौंकाने वाला नाम सारा जानसन का है। लारा के मां-बाप लिंडसे और रॉबर्ट जानसन आरपिंगटन में एक बड़े मकान में रहते हैं। इसमें स्विमिंग पुल, टेनिस कोर्ट सहित सभी सुविधाएं हैं। लॉरा लंदन के सबसे महंगे स्कूलों में से एक कैंट के ओल्वे ग्रामर स्कूल में पढ़ी है पर उसकी कार लूट के माल से भरी पाई गई। उसकी कार में 5000 पाउंड तक का सामान भरा था, इसमें एक तोशिवा टीवी माइक्रोवेब और मोबाइल फोन भी था। लंदन और दूसरे शहरों में जैसे गुंडों का राज चल रहा हो। मूल इंग्लैंड के लोग ही लूटपाट में आगे नजर आए। इन लुटेरों, गुंडों ने एशियाई मूल के लोगों को भी अपना निशाना बनाया। बर्मिंघम में अपने समुदाय के लोगों को दंगाइयों से बचाने की कोशिश कर रहे तीन ब्रिटिश एशियाई नागरिकों (सभी पाकिस्तानी मूल के मुसलमान) को एक तेज आती कार ने कुचल डाला। मरने वालों की पहचान शहजाद, हैरी हुसैन और मुसव्वर अली के तौर पर की गई है। शहजाद और हुसैन भाई हैं। बर्मिंघम से आई खबरों में बताया गया कि ब्रिटेन में फैली हिंसा के दौरान तीनों मस्जिद से बाहर निकल अपनी कार धुलाई कम्पनी को बचाने के लिए सड़क पर उतर आए थे। दंगाइयों की एक तेज आती कार ने उन्हें कुचल डाला। तीनों मृतकों की उम्र 31, 30 और 20 साल है। ब्रिटेन के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा है कि मैनचेस्टर में हुए दंगों और लूट की घटनाएं निरर्थक हिंसा और मूर्खतापूर्ण अपराध है जो इतने बड़े पैमाने पर पिछले तीस सालों में नहीं हुआ है। इतनी हिंसा पहले कभी नहीं देखी।
इंग्लैंड में जब दंगे फैले और एशियाई मूल के ब्रिटिश नागरिकों ने देखा कि पुलिस इन्हें काबू नहीं कर रही तो लिटल इंडिया कहा जाने वाले लंदन के सबर्ब में बसा साउथ हाल में भारतीय, पाकिस्तानी और बंगलादेशी चाहे वह हिन्दू हो , मुसलमान हो या सरदार हो सभी एकत्र हो गए और उन्होंने मोर्चा संभाल लिया। कृपाणों और हॉकी स्टिकें लेकर ये सड़कों पर उतर आए। सोमवार रात को इन अश्वेत दंगाइयों ने साउथ हॉल की एक ज्यूलरी स्टोर पर हमला करने का प्रयास किया। यह दुकान एक पंजाबी परिवार की थी जो वेस्ट इलींग में रहता है। देखते ही देखते सारे साउथ हॉल में यह खबर फैल गई कि एशियन दुकानों पर खासकर जेवरों की दुकानों पर हमला और लूटमार की संभावना है। लगभग 300 व्यक्ति सड़कों पर आ गए और उन्होंने श्रीगुरु सिंह सभा गुरुद्वारा व एक बड़ी मस्जिद के बाहर मोर्चा संभाल लिया। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने स्वीकार किया है कि पुलिस ने दंगे को ठीक से हैंडिल नहीं किया। जब अंग्रेजों के अपने घर की बात आती है तो वह गोली तक चलाने को कतराते हैं। पाठकों को आश्चर्य होगा कि इतने भयंकर दंगों में भी पुलिस को गोली चलाने की छूट नहीं थी। अब जाकर रबड़ बुलैट, वॉटर कैनन इस्तेमाल करने की बात हो रही है। ये वही अंग्रेज हैं जिन्होंने जलियांवाला बाग में सैकड़ों शांतिप्रिय भारतीयों पर गोलियां बरसाई थीं। स्वतंत्रता संग्राम में देशभक्तों को तरह-तरह की यातनाएं दी थी और अब अपने घर में गोली तक चलाने पर पाबंदी है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पूरे लंदन शहर में कुल 32,500 पुलिसकर्मी हैं। इनमें से केवल 2740 के पास हथियार हैं, बाकी सब डण्डों से ही दंगा कुचलने में लगे हैं। सेना तक को नहीं बुलाया गया। जब हम यह सब देखते हैं तो हमें लगता है कि हम भारत में दंगों से अंग्रेजों से बेहतर निपटने में सक्षम हैं।
ब्रिटेन में भड़के दंगों ने एक साथ बहुत से सवाल खड़े कर दिए हैं और यह साफ कर दिया है कि यह सिर्प कानून व्यवस्था का मामला नहीं है बल्कि इसके पीछे टोरी और लिबरल डेमोकेटिक गठबंधन सरकार की नीतियां और कहीं से छिपा असुरक्षाबोध भी जिम्मेदार है। असल में कभी दुनियाभर में अपना साम्राज्य फैलाने वाला ब्रिटेन खुद एक ज्वालामुखी पर बैठा है। तकरीबन 50 लाख लोग वहीं दूसरे देशों से आकर न केवल बसे हैं बल्कि वहां के नागरिक भी बन गए हैं और यह संख्या ब्रिटेन की कुल आबादी का आठ फीसदी के करीब है। अंग्रेजों की तुलना में एशियाई, अफ्रीकी और कैरेबियाई लोगों के जीवन स्तर से लेकर उनकी आर्थिक दशा में भारी अन्तर है। अंग्रेजों की तुलना में वहां अश्वेत मूल के लोगों में बेरोजगारी की दर तीन गुणा है। बहुत से एशियाई और दूसरे नस्ल के लोगों ने वहां समृद्धि के झंडे भी गाड़े हैं, लेकिन आम अंग्रेज अब भी अपने उपनिवेश रहे देश के लोगों को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। अभी जो दंगा भड़का है उसके पीछे अफ्रीकी-कैरेबियाई मूल के एक युवक मार्प डगन की पुलिस की गोली से हुई मौत को कारण बताया जा रहा है। बेशक इस घटना ने चिंगारी को भड़काने का काम किया, मगर चार दिनों में यह लंदन, मैनचेस्टर, सेलफोर्ड, लीवरपूल, नाटिंघम, लिस्टिर और बर्मिंघम जैसे शहरों तक फैल चुका है, तो इसका मतलब है कि भीतर ही भीतर जो आग सुलग रही थी, वह भड़क उठी है, जिन इलाकों में दंगा फैला है, वहां भारतीय, पाकिस्तानी और बंगलादेशी मूल के लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं। दंगाइयों ने जिस तरह से उत्पात मचा रखा है, उससे तो यही लगता है कि इन दंगों में ऐसे तत्व भी शामिल हो गए हैं जिन्हें सिर्प लूटपाट से मतलब है। कुछ शौकिया लोग, जिन्हें ऐसे कामों में शामिल होने की कोई जरूरत नहीं वे भी किक लेने के चक्कर में इसमें कूद पड़े। लॉरा जानसन को भला दंगे में लूटपाट करने की क्या जरूरत थी? हकीकत यह है कि इन दंगों के लिए टोरी-लिबरेल डेमोकेटिक सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं। इस सरकार ने बजट और अन्य खर्चों में जो कटौती की, उसका मुख्यत खामियाजा वहां के इन गरीब, बेरोजगार नागरिकों को ज्यादा भुगतना पड़ा है। यह एक ऐसी समस्या है जो हर सभ्य देश खासकर विकसित देशों के लिए एक चुनौती है। इस पर गौर करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि दुनिया में जिन लोकतंत्रों की दुहाई दी जाती है उनमें इंग्लैंड भी प्रमुख है। भारत के लिए भी इसमें एक सबक है। हैव नाट्स और हैवस का बढ़ता अन्तर न तो देश के लिए ठीक है और न ही हमारे लोकतंत्र के लिए। अमीरी बढ़ती जा रही है और गरीबों और अमीरों में अन्तर कम नहीं हो रहा। बहरहाल इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के लिए अभी सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि इन दंगों को जल्द से जल्द काबू करवाएं और सरकार की उन नीतियों पर पुनर्विचार करें जिनके कारण यह दंगे भड़के हैं। अगर भारतीय टीम जो इन दिनों इंग्लैंड के दौरे पर क्रिकेट खेल रही है, वह भी वही करें कि दंगों के कारण बीच में ही टूर कैंसिल करके स्वदेश लौट आए जैसा इंग्लैंड टीम ने मुंबई दंगों के दौरान किया था तो अंग्रेजों को कैसा लगे?
Anil Narendra, Daily Pratap, London, London Riots, Vir Arjun
इंग्लैंड के लोग आमतौर पर जेंटलमैन माने जाते हैं पर गत शनिवार से भड़के दंगों ने साबित कर दिया है कि ये सबसे बड़े लुटेरे भी हैं। जिन 1300 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया गया है उनमें ऐसे लोग शामिल हैं जिनमें दंगा करना, लूटपाट करने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती थी। इनमें से शायद ही किसी के खिलाफ इससे पहले पुलिस रिकार्ड में कुछ दर्ज हुआ हो। इनमें सबसे छोटा एक 11 साल का बच्चा है तो इनमें करोड़पति मां-बाप की संतान 19 साल की एक लड़की लारा जानसन भी है। एक टीचर भी पकड़ा गया है। गिरफ्तार लोगों में एक हाउस वाइफ भी है। ज्यादातर को लंदन की कोर्ट में पेश किया गया। उम्मीद तो थी कि कोर्ट उन्हें रिहा कर देगी पर कोर्ट ने अभी किसी को बरी नहीं किया है। इन लुटेरों में सबसे चौंकाने वाला नाम सारा जानसन का है। लारा के मां-बाप लिंडसे और रॉबर्ट जानसन आरपिंगटन में एक बड़े मकान में रहते हैं। इसमें स्विमिंग पुल, टेनिस कोर्ट सहित सभी सुविधाएं हैं। लॉरा लंदन के सबसे महंगे स्कूलों में से एक कैंट के ओल्वे ग्रामर स्कूल में पढ़ी है पर उसकी कार लूट के माल से भरी पाई गई। उसकी कार में 5000 पाउंड तक का सामान भरा था, इसमें एक तोशिवा टीवी माइक्रोवेब और मोबाइल फोन भी था। लंदन और दूसरे शहरों में जैसे गुंडों का राज चल रहा हो। मूल इंग्लैंड के लोग ही लूटपाट में आगे नजर आए। इन लुटेरों, गुंडों ने एशियाई मूल के लोगों को भी अपना निशाना बनाया। बर्मिंघम में अपने समुदाय के लोगों को दंगाइयों से बचाने की कोशिश कर रहे तीन ब्रिटिश एशियाई नागरिकों (सभी पाकिस्तानी मूल के मुसलमान) को एक तेज आती कार ने कुचल डाला। मरने वालों की पहचान शहजाद, हैरी हुसैन और मुसव्वर अली के तौर पर की गई है। शहजाद और हुसैन भाई हैं। बर्मिंघम से आई खबरों में बताया गया कि ब्रिटेन में फैली हिंसा के दौरान तीनों मस्जिद से बाहर निकल अपनी कार धुलाई कम्पनी को बचाने के लिए सड़क पर उतर आए थे। दंगाइयों की एक तेज आती कार ने उन्हें कुचल डाला। तीनों मृतकों की उम्र 31, 30 और 20 साल है। ब्रिटेन के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा है कि मैनचेस्टर में हुए दंगों और लूट की घटनाएं निरर्थक हिंसा और मूर्खतापूर्ण अपराध है जो इतने बड़े पैमाने पर पिछले तीस सालों में नहीं हुआ है। इतनी हिंसा पहले कभी नहीं देखी।
इंग्लैंड में जब दंगे फैले और एशियाई मूल के ब्रिटिश नागरिकों ने देखा कि पुलिस इन्हें काबू नहीं कर रही तो लिटल इंडिया कहा जाने वाले लंदन के सबर्ब में बसा साउथ हाल में भारतीय, पाकिस्तानी और बंगलादेशी चाहे वह हिन्दू हो , मुसलमान हो या सरदार हो सभी एकत्र हो गए और उन्होंने मोर्चा संभाल लिया। कृपाणों और हॉकी स्टिकें लेकर ये सड़कों पर उतर आए। सोमवार रात को इन अश्वेत दंगाइयों ने साउथ हॉल की एक ज्यूलरी स्टोर पर हमला करने का प्रयास किया। यह दुकान एक पंजाबी परिवार की थी जो वेस्ट इलींग में रहता है। देखते ही देखते सारे साउथ हॉल में यह खबर फैल गई कि एशियन दुकानों पर खासकर जेवरों की दुकानों पर हमला और लूटमार की संभावना है। लगभग 300 व्यक्ति सड़कों पर आ गए और उन्होंने श्रीगुरु सिंह सभा गुरुद्वारा व एक बड़ी मस्जिद के बाहर मोर्चा संभाल लिया। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने स्वीकार किया है कि पुलिस ने दंगे को ठीक से हैंडिल नहीं किया। जब अंग्रेजों के अपने घर की बात आती है तो वह गोली तक चलाने को कतराते हैं। पाठकों को आश्चर्य होगा कि इतने भयंकर दंगों में भी पुलिस को गोली चलाने की छूट नहीं थी। अब जाकर रबड़ बुलैट, वॉटर कैनन इस्तेमाल करने की बात हो रही है। ये वही अंग्रेज हैं जिन्होंने जलियांवाला बाग में सैकड़ों शांतिप्रिय भारतीयों पर गोलियां बरसाई थीं। स्वतंत्रता संग्राम में देशभक्तों को तरह-तरह की यातनाएं दी थी और अब अपने घर में गोली तक चलाने पर पाबंदी है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पूरे लंदन शहर में कुल 32,500 पुलिसकर्मी हैं। इनमें से केवल 2740 के पास हथियार हैं, बाकी सब डण्डों से ही दंगा कुचलने में लगे हैं। सेना तक को नहीं बुलाया गया। जब हम यह सब देखते हैं तो हमें लगता है कि हम भारत में दंगों से अंग्रेजों से बेहतर निपटने में सक्षम हैं।
ब्रिटेन में भड़के दंगों ने एक साथ बहुत से सवाल खड़े कर दिए हैं और यह साफ कर दिया है कि यह सिर्प कानून व्यवस्था का मामला नहीं है बल्कि इसके पीछे टोरी और लिबरल डेमोकेटिक गठबंधन सरकार की नीतियां और कहीं से छिपा असुरक्षाबोध भी जिम्मेदार है। असल में कभी दुनियाभर में अपना साम्राज्य फैलाने वाला ब्रिटेन खुद एक ज्वालामुखी पर बैठा है। तकरीबन 50 लाख लोग वहीं दूसरे देशों से आकर न केवल बसे हैं बल्कि वहां के नागरिक भी बन गए हैं और यह संख्या ब्रिटेन की कुल आबादी का आठ फीसदी के करीब है। अंग्रेजों की तुलना में एशियाई, अफ्रीकी और कैरेबियाई लोगों के जीवन स्तर से लेकर उनकी आर्थिक दशा में भारी अन्तर है। अंग्रेजों की तुलना में वहां अश्वेत मूल के लोगों में बेरोजगारी की दर तीन गुणा है। बहुत से एशियाई और दूसरे नस्ल के लोगों ने वहां समृद्धि के झंडे भी गाड़े हैं, लेकिन आम अंग्रेज अब भी अपने उपनिवेश रहे देश के लोगों को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। अभी जो दंगा भड़का है उसके पीछे अफ्रीकी-कैरेबियाई मूल के एक युवक मार्प डगन की पुलिस की गोली से हुई मौत को कारण बताया जा रहा है। बेशक इस घटना ने चिंगारी को भड़काने का काम किया, मगर चार दिनों में यह लंदन, मैनचेस्टर, सेलफोर्ड, लीवरपूल, नाटिंघम, लिस्टिर और बर्मिंघम जैसे शहरों तक फैल चुका है, तो इसका मतलब है कि भीतर ही भीतर जो आग सुलग रही थी, वह भड़क उठी है, जिन इलाकों में दंगा फैला है, वहां भारतीय, पाकिस्तानी और बंगलादेशी मूल के लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं। दंगाइयों ने जिस तरह से उत्पात मचा रखा है, उससे तो यही लगता है कि इन दंगों में ऐसे तत्व भी शामिल हो गए हैं जिन्हें सिर्प लूटपाट से मतलब है। कुछ शौकिया लोग, जिन्हें ऐसे कामों में शामिल होने की कोई जरूरत नहीं वे भी किक लेने के चक्कर में इसमें कूद पड़े। लॉरा जानसन को भला दंगे में लूटपाट करने की क्या जरूरत थी? हकीकत यह है कि इन दंगों के लिए टोरी-लिबरेल डेमोकेटिक सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं। इस सरकार ने बजट और अन्य खर्चों में जो कटौती की, उसका मुख्यत खामियाजा वहां के इन गरीब, बेरोजगार नागरिकों को ज्यादा भुगतना पड़ा है। यह एक ऐसी समस्या है जो हर सभ्य देश खासकर विकसित देशों के लिए एक चुनौती है। इस पर गौर करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि दुनिया में जिन लोकतंत्रों की दुहाई दी जाती है उनमें इंग्लैंड भी प्रमुख है। भारत के लिए भी इसमें एक सबक है। हैव नाट्स और हैवस का बढ़ता अन्तर न तो देश के लिए ठीक है और न ही हमारे लोकतंत्र के लिए। अमीरी बढ़ती जा रही है और गरीबों और अमीरों में अन्तर कम नहीं हो रहा। बहरहाल इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के लिए अभी सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि इन दंगों को जल्द से जल्द काबू करवाएं और सरकार की उन नीतियों पर पुनर्विचार करें जिनके कारण यह दंगे भड़के हैं। अगर भारतीय टीम जो इन दिनों इंग्लैंड के दौरे पर क्रिकेट खेल रही है, वह भी वही करें कि दंगों के कारण बीच में ही टूर कैंसिल करके स्वदेश लौट आए जैसा इंग्लैंड टीम ने मुंबई दंगों के दौरान किया था तो अंग्रेजों को कैसा लगे?
Anil Narendra, Daily Pratap, London, London Riots, Vir Arjun
Wednesday, 10 August 2011
दंगे की चपेट में आया लंदन
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 10 August 2011
अनिल नरेन्द्र
लंदन पिछले तीन दिनों से भयंकर दंगों की चपेट में है। उत्तरी लंदन के टोटेनहम इलाके में गुरुवार को पुलिस फायरिंग में एक व्यक्ति की मौत से भड़के दंगे थमने का नाम ही नहीं ले रहे। गुरुवार को कथित तौर पर पुलिस फायरिंग में 29 साल के मार्व दुग्गन की मौत हो गईं थी जिसके बाद विरोध प्रादर्शन शुरू हो गए थे लेकिन शनिवार के बाद इन प्रादर्शनों ने दंगे का रूप ले लिया। अप्रीकी मूल के अश्वेत लोगों ने पुलिस पर जमकर पथराव किया। समाचार पत्र "द स्टार" की रिपोर्ट के मुताबिक बृहस्पतिवार को मार्व दुग्गन (29) नामक व्यक्ति की हत्या के बाद स्थानीय अश्वेतों ने "न्याय" की मांग करते हुए शनिवार शाम पांच बजे के करीब टोटेनहम के हाईं रोड पर एक शांतिपूर्ण प्रादर्शन किया। प्रात्यक्षदर्शियों ने बताया कि लोगों का गुस्सा देखते-देखते हिंसा में बदल गया। मौके पर सैकड़ों और प्रादर्शनकारी जमा हो गए। दंगाइयों को काबू करने के लिए दंगा पुलिस ने काबू पाने का प्रायास जब किया तो दंगाइयों ने पुलिस वाहनों पर हमला बोल दिया और आग के हवाले कर दिया। मामला यही नहीं रुका, दंगाइयों ने दुकानों के शीशे तोड़कर अन्दर रखा सामान लूटना आरम्भ कर दिया। देखते ही देखते कईं दुकानें लूट ली गईं। दंगाइयों को ट्रकों में सामान लादकर भागते देखा गया। टोटेनहम में बड़ी संख्या में अप्रीकी और वैरीबियाईं समुदाय के लोग रहते हैं। इस क्षेत्र में बाकी लंदन के मुकाबले बेरोजगारी ज्यादा है। टोटेनहम में पहले भी हिंसा होती रही है। विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा दंगे करीब 25 साल पहले 1985 में हुए ब्रिटेन के वुख्यात दंगों से मिलते-जुलते हैं। उस समय नाराज लोगों ने पुलिस अधिकारी कीथ ब्लैकलॉक की हत्या कर दी थी। 500 से ज्यादा युवाओं ने सड़कों पर उतरकर पुलिस पर हमले, बसों में आग लगाने और दुकानें लूटने जैसे कामों को अंजाम दिया था। सड़कों पर गश्त लगा रही दो कारों को भी आग लगा दी। इस बार के दंगे हालांकि 1985 के दंगों जितने भयानक नहीं पर लगभग उसी तरह के हैं।
यह दंगा अभी भी जारी है। बीबीसी टीवी के वुछ कर्मचारी और सैटेलाइट ट्रक भी हमले के शिकार हुए। घटनास्थल पर मौजूद बीबीसी संवाददाता ने बताया कि पुलिस और प्रादर्शनकारियों में झड़पें जारी हैं।
फायर ब्रिगेड की गािड़यां भी हिंसा का शिकार बनी हैं। एक चश्मदीद गवाह ने वुछ यूं सड़क का दृश्य बताया : ˜ये इलाका इस वक्त युद्ध का दृश्य पेश कर रहा है। मैंने पांच युवकों को देखा जिन्होंने अपने चेहरों को ढका हुआ था। उन्होंने कमरे की ट्रॉली को आग लगा दी और उसे पुलिस की तरफ पेंक दिया। पुलिस के अनुसार पुलिस ने एक गाड़ी को रोका जिसमें मार्व दुग्गन बैठा हुआ था, पुलिस के अनुसार मार्व ने पुलिस पर बिना वजह फायरिंग आरम्भ कर दी जिसके बाद पुलिस ने गोली चलाईं।
यहां से मामला शुरू हुआ। प्रादर्शनकारियों का कहना था कि पुलिस ने मार्व दुग्गन को बिना वजह मारा है और उन्हें न्याय चाहिए। टोटेनहम से भड़की हिंसा एनफील्ड, बिक्सन, डाल्सटोन, इसलिंग्टन वाल्थमस्तोव में भी पैल गईं है। हमलों के सिलसिले में अब तक 100 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। हमलों में लगभग दो दर्जन से ज्यादा पुलिसकमा भी घायल हो चुके हैं। इंग्लैंड एक ज्वालामुखी पर बैठा हुआ है। पिछले दिनों खबर आईं थी कि जेहादियों का भी यूके सबसे बड़ा अड्डा बन गया है। वुछ दिन पहले मैंने पढ़ा था कि वुछ लंदनवासियों ने वहां शरिया कानून लागू करने की मांग भी की थी। अप्रीकी मूल के अश्वेत हिंसात्मक प्रावृत्ति के होते हैं। यह दंगे कहीं और न पैल जाएं। अभी तक तो भारतीय, पाकिस्तान के मूल के लोग बचे हुए हैं पर अगर दंगा बढ़ता है तो वह भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
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