पिछले दिनों मद्रास हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश ने बलात्कार
के मामले में ऐसा फैसला दे दिया जिससे पूरे देश में हलचल मच गई। इस फैसले में एक बलात्कार
के आरोपी को इस आधार पर जमानत दे दी थी कि वह पीड़िता से समझौता करने की कोशिश करे।
अब माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य फैसले के सन्दर्भ में इस फैसले के मंतव्य की कड़ी
आलोचना की है। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त संदेश देते हुए बुधवार को कहा कि बलात्कार या
बलात्कार के प्रयास के मामलों में किसी भी प्रकार का उदार दृष्टिकोण अपनाना या मध्यस्थता
का विचार आना बहुत बड़ी चूक होगी। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने
कहाöजब मानव शरीर मलिन किया जाता
है तो उसकी वेशकीमती अस्मिता नष्ट हो जाती है। न्यायाधीश दीपक मिश्रा का कहना है कि
बलात्कार के मामले में समझौता करने की कोशिश किसी महिला की गरिमा के खिलाफ है। महिला
की गरिमा उसका कभी नष्ट नहीं होने वाला आभूषण है और किसी को भी उसे दूषित करने के बारे
में नहीं सोचना चाहिए। ऐसे मामलों में किसी प्रकार का समझौता नहीं हो सकता,
क्योंकि यह महिला के सम्मान के खिलाफ है जो उसके लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण
है। पेश मामले में न्यायालय ने कहा कि वह स्पष्ट करना चाहते हैं कि बलात्कार या बलात्कार
के प्रयास के मामले में किसी भी स्थिति में समझौते की अवधारणा के बारे में सोचा भी
नहीं जा सकता। यह एक महिला के शरीर के प्रति अपराध है जो उसका अपना मंदिर है। यह ऐसा
अपराध है जो पूरी जिन्दगी उसे कचोटता रहेगा और पीड़िता की प्रतिष्ठा पर धब्बा लगाता
है। न्यायालय ने कहा कि प्रतिष्ठा ही ऐसा बेशकीमती आभूषण है जिसके बारे में जीवन में
कल्पना की जा सकती है और किसी को भी इसे मिटाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायालय
ने सात वर्षीय पीड़िता के माता-पिता और आरोपी मदन लाल के बीच
समझौते से प्रभावित होने के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की भी आलोचना की। उच्च न्यायालय
ने इस मामले में आरोपी को दोषसिद्धि और उसकी पांच साल की कैद की सजा को निरस्त कर दिया
था। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि सजा कम करने के पीछे यह कारण है कि आरोपी ने पीड़िता
के परिवार के साथ कोई समझौता कर लिया था। न्यायमूर्ति मिश्रा ने अदालतों को आगाह किया
कि बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में वे नरम रुख कतई न अपनाएं तथा सुलह-समझौते के लिए प्रेरित न करें। न्यायालय ने कहाöबलात्कार
महिला के उस बदन पर घिनौना अत्याचार है जिसे वह अपना मंदिर समझती है। यह ऐसे जघन्य
अपराध हैं जिससे जीवन दमघोंटू हो जाता है और पीड़िता पर बदनुमा दाग लग जाता है। बलात्कार
के मामलों में अपराधी और पीड़िता के बीच समझौता करने का चलन समाज की सामंती और पुरुषवादी
सोच का ही नतीजा है।
Translater
Saturday, 4 July 2015
Friday, 3 July 2015
क्या दुनिया में फिर आ सकती है 1930 जैसी मंदी?
रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन उन विरले
अर्थशास्त्रियों में से हैं, जिन्होंने 2008 की आर्थिक मंदी की आहट भांप ली थी। इसलिए मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर
उनकी इस चेतावनी को गंभीरता से लेना होगा कि विश्व अर्थव्यवस्था एक बार फिर
1930 जैसी भीषण मंदी में फंस सकती है। उन्होंने दुनियाभर के केंद्रीय
बैंकों से कहा कि संकट से निकलने के लिए नए उपाय तलाशने होंगे। लंदन बिजनेस स्कूल में
उनके भाषण को इसलिए भी गंभीरता से लिया गया है। उनकी चिन्ता का कारण विकसित देशों की
मौद्रिक नीतियां हैं जिनका खामियाजा सबको भुगतना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि हालांकि
भारत में हालात अलग हैं, जहां आरबीआई को अभी निवेश प्रोत्साहित
करने के लिए नीतिगत दरों में कटौती करनी है। वर्ष 1929 में शुरू
हुआ महामंदी का दौर 1939-40 तक चला था। मंदी की शुरुआत
29 अक्तूबर 1929 में अमेरिका के शेयर बाजार में
गिरावट से हुई थी। गिरावट का मनोवैज्ञानिक असर इतना हुआ कि लोगों ने अपने खर्च में
10 फीसदी की कटौती कर दी जिससे मांग में बड़ी गिरावट आई। इस दौरान
5000 बैंक बंद हो गए थे। अमेरिका में इसी साल आए सूखे से कृषि पैदावार
60 फीसदी तक घट गई। धीरे-धीरे इस महामंदी का पूरे
विश्व पर गहरा प्रभाव पड़ा और इससे उभरने में काफी लम्बा समय लगा। 2008 की मंदी में अमेरिका-यूरोप के बैंक दिवालिया हुए थे,
तो इसके पीछे यह कारण था कि कर्ज लेने के लिए बैंकों से बेतहाशा कर्ज
लेने की होड़ लग गई थी। शुक्र है कि अपने यहां कर्ज देने के रिजर्व बैंक के प्रावधान
अब भी काफी सख्त हैं, इसलिए अनहोनी की वैसी आशंका नहीं है। पर
सिर्प इस वजह से नहीं, राजन की चिन्ता वस्तुत मुद्राओं का अवमूल्यन
करने की कोशिश के कारण भी है। मुद्रा का अवमूल्यन कर एक देश को नुकसान होता है तो दूसरा
अपना निर्यात बढ़ाता है, मजबूरन उसे भी इस रास्ते पर चलना पड़ता
है। महामंदी के दौर में तब की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन करने
की होड़ मची थी। रघुराम राजन की चेतावनी सच होती दिख रही है। ग्रीस के प्रधानमंत्री
एलेक्सिस सिपरास ने सोमवार को ग्रीस के सभी बैंकों को बंद रखने को कहा है। इसके साथ
ही एटीएम मशीनों से पैसा निकालने पर भी पाबंदियां लगा दी गई हैं। सरकार का कहना है
कि हफ्तेभर तक बैंकों में कामकाज नहीं होगा। इस दौरान खाता धारकों को दिन में
60 यूरो से ज्यादा निकालने की अनुमति नहीं होगी। लोग बिना पूर्व अनुमति
के अपने पैसे को देश के बाहर भी नहीं भेज सकेंगे। राजन के विचार के उलट आईएमएफ अनुसंधान
पत्र में कहा गया है कि सिर्प मौद्रिक नीति आसान बनाने को ही वित्तीय अस्थिरता के लिए
दोषी नहीं ठहराया जा सकता। विश्व के समक्ष बड़ी समस्याएं वित्तीय प्रणाली की अस्थिरता
की हिफाजत के लिए प्रभावी नियामकीय व्यवस्था के कारण पैदा हुई। सवाल तो यह है कि मौद्रिक
नीति और वित्तीय बाजार के मध्यस्थों की निगरानी की व्यवस्था को कैसे संचालित किया जाएगा
ताकि भविष्य में संकटों की पुनरावृत्ति न हो।
-अनिल नरेन्द्र
समलैंगिकता को कानूनी वैधता देने की तैयारी
समाज में ट्रांसजेंडर
विवाह के मुद्दे को लेकर घमासान मचा हुआ है। भारतीय संविधान धारा 377 समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखती है। हालांकि
दुनिया के कई देशों ने गे मैरिज को स्वीकार कर लिया है और उसके अनुसार इसे अपराध की
श्रेणी से हटा दिया है। हाल ही में अमेरिका की शीर्ष अदालत द्वारा अपने देश में समलैंगिक
विवाह को वैध ठहराया गया है और यह पूरे अमेरिका में स्वीकार्य हो गया है। आस्ट्रेलिया
में मुख्य विपक्षी दल लेबर पार्टी ने समलैंगिकों के विवाह को कानूनी मान्यता देने संबंधी
एक प्रस्ताव को संसद में पेश कर दिया है। कंजरवेटिव पार्टी के प्रधानमंत्री टोनी एबट
के विरोध के बावजूद लेबर पार्टी के प्रस्ताव को संसद में पेश करना पड़ा। आयरलैंड में
एक माह पहले जनमत संग्रह में इस तरह की शादियों को भारी बहुमत के साथ समर्थन मिला जबकि
इस परंपरागत कैथेलिक देश में दो दशक पहले तक समलैंगिक संबंधों को लेकर काफी भेदभाव
किया जाता था। इधर हमारे देश में विधि मंत्री सदानन्द गौड़ा ने मंगलवार को कहा कि भारत
में समलैंगिक विवाहों को अवैध करार देने वाले उच्चतम न्यायालय के फैसले को पलटने का
मुद्दा उनके मंत्रालय के समक्ष लंबित नहीं है। उनका यह बयान अमेरिका की शीर्ष अदालत
द्वारा अपने देश में समलैंगिक विवाह को वैध ठहराने के बाद आया। उन्होंने यह भी कहा
कि इस मुद्दे पर एक अखबार ने उन्हें गलत उद्धृत किया। उन्होंने कहाöसंवाददाता ने सहमति जताई कि इस मुद्दे पर गलत उद्धृत किया गया। गौड़ा ने कथित
तौर पर समाचार पत्र से कहा कि भारत की आईपीसी की धारा 377 को
समाप्त कर सकता है और समलैंगिक विवाहों को वैध बनाने पर विचार कर सकता है। उन्होंने
कहा कि जब भी यह मुद्दा आएगा तब हम सिर्प चर्चा के बाद आगे जा सकते हैं। यह बेहद संवेदनशील
मुद्दा है। इसे इतनी आसानी से नहीं किया जा सकता है। समाज की मुख्यधारा से ट्रांसजेंडर
समुदाय को जोड़ने और उनके सामाजिक आर्थिक अधिकारों से जुड़े बिल को केंद्र सरकार संसद
के मानसून सत्र में पेश कर सकती है। यह बात सामाजिक न्याय व आधिकारिता मंत्री थावर
चन्द गहलोत ने कही। ट्रांसजेंडर के एक कार्यक्रम में शामिल होने आए गहलोत ने कहा कि
हमारी संस्कृति हमें भेदभाव करना नहीं सिखाती है। आगामी सत्र में ट्रांसजेंडर के लिए
तैयार हो रहे बिल को लोकसभा में पेश किया जाएगा। हालांकि पिछले सत्र में गहलोत ने इससे
जुड़े निजी विधेयक को वापस लेने की बात कही थी। हमारा समाज इस तरह के विवाह पर बंटा
हुआ है। कुछ लोग इसे बीमारी और आप्रकृतिक संबंध मानते हैं तो कुछ इसको स्वीकार करने की वकालत कर
रहे हैं। ऐसे नाजुक मामले में केंद्र सरकार को जल्दी नहीं करनी चाहिए। सभी संबंधित
विचारधाराओं को समझना होगा और फिर जाकर अगर कोई निष्कर्ष निकलता है तो आगे बढ़ने पर
विचार हो सकता है। वैसे गे मैरिजें भारत में शुरू हो चुकी हैं चाहे वह गैर कानूनी,
अवैध हों।
Thursday, 2 July 2015
नकली दवा का जहर फैलता जा रहा है
एक क्षेत्र ऐसा है जिस पर सरकार को फौरन ध्यान देना
चाहिए। यह है नकली दवाओं का क्षेत्र। दुनिया के किसी सभ्य देश में नकली दवाओं का पचलन
इतना नहीं जितना हमारे देश में है। नकली दवाओं से लोगों की जानें चली जाती हैं। स्मैक, गांजा, कोकीन,
हेरोइन जैसे ड्रग्स लेने से मौत नहीं होती। मौत तभी होती है जब बहुत
अधिक मात्रा में इनका इस्तेमाल हो पर नकली दवाएं जानलेवा हैं। ये नकली दवाएं आम बीमारियों
जैसे बुखार, दर्द, जख्म सुखाने की होती
हैं। एंटी बाइटिक्स तक डुप्लीकेट दवाएं मौजूद हैं। ऐसे केमिस्टों की कमी नहीं है जो
चंद रुपए के लालच में मरीज को मौत के मुंह में धकेल देते हैं। इन नकली दवाओं का शिकार
आम तौर पर गरीब तबका ज्यादा होता है। ये गैंग अपनी दवाओं को झुग्गी बस्ती, निचले और कम पढ़े-लिखे इलाकों में बेचते हैं। लोग दवा
खरीदते समय पैकिंग पर खास ध्यान नहीं देते और न ही वह दवा की एक्सपायरी डेट पर ध्यान
देते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो कम रुपए की दवाई के बारे में कैमिस्ट से ज्यादा
पूछताछ नहीं करते हैं। अगर करते भी हैं तो घर में कर रहे डाक्टरी जैसे फर्जी डाक्टर
उनकी दवाएं बदलकर लिख देते हैं। नकली दवाई पर असली दवाई से 40 फीसदी मुनाफा होता है। अधिकारी बताते हैं कि अगर किसी दवाई का एक पत्ता
40 रुपए का आता है और उस पर कैमिस्ट को दस रुपए का फायदा होता है तो
वहीं नकली दवाई का पत्ता तीस रुपए में मिलता है और उस पर कैमिस्ट को 15 से 17 रुपए मिल जाता है। अधिकारियों का कहना है कि नकली
दवाई बनाने के लिए एक छोटा सा कमरा और छोटी सी दो-तीन मशीनों
की ही जरूरत होती है। दवाई बनाने का सामान भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है। हाल में
ही 2016 की दवाइयां मार्केट में देखी गई हैं। दिल्ली पुलिस ने
गत वर्ष नकली दवा बेचने वाले और उनका साथ देने वाले कैमिस्ट को गिरफ्तार किया था। नकली
दवा बनाने वाले झोलाछाप डाक्टर ऐसी दवाओं की पर्ची देने वाले और नकली दवा बेचने वाले
कैमिस्ट इनकी आपस में साठगांठ होती है। इसलिए यह जरूरी है कि आप अच्छे डाक्टर को दिखाएं
और अच्छे विश्वासपात्र कैमिस्ट से दवा खरीदें। कैमिस्ट इन डुप्लीकेट दवाओं से इतना
परेशान हैं कि कुछ तो पत्ते के पीछे अपनी दुकान का स्टीकर भी लगा देते हैं। कुछ फर्जी
दवा बनाने वाले मरीज बनकर दवा वापस करने के चक्कर में इन नकली दवाओं को कैमिस्टों को
पेल देते हैं। यह असामाजिक तत्व लोगों की जान से खेल रहे हैं। दुख की बात यह भी है
कि सरकार न तो इस ओर ध्यान देती है और न ही सरकार के पास ऐसा कोई पबंध है कि मार्केट
में इन नकली दवाओं को पकड़ा जाए और कसूरवारों को सख्त सजा दी जाए। हम राजधानी में केंद्रीय
स्वास्थ्य मंत्री और दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री से अनुरोध करते हैं कि वह इन
नकली दवाओं के पसार को रोकने का गंभीर पयास करें। जैसा मैंने कहा कि दुनिया के शायद
ही किसी मुल्क में ऐसी नकली दवाओं का गोरखधंधा चलता हो।
-अनिल नरेन्द्र
व्यापमं घोटाले की उलझती गुत्थी, मामला सुपीम कोर्ट में
मध्य पदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) के पवेश
और भर्ती घोटाले के दो और आरोपियों की मौतों को राज्य सरकार भले ही सामान्य बता रही
हो, लेकिन इसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मुश्किलें
बढ़ती ही जा रही हैं। पदेश के व्यावसायिक कॉलेजों में पवेश, परीक्षा
और पुलिस, वनरक्षक, नाप-तोल निरीक्षक से लेकर संविदा शिक्षकों की भती परीक्षाओं का आयोजन करने वाले
व्यापमं के घोटाले की जांच कर रहे विशेष जांच दल (एसआईटी)
तक ने जबलपुर उच्च न्यायालय के समक्ष स्वीकार किया है कि अब तक इस घोटाले
से जुड़े 23 गवाहों या आरोपियों की अस्वाभाविक मौत हो चुकी है।
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने अब सुपीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्हेंने शीर्ष
अदालत की निगरानी में मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की है और सुपीम कोर्ट में
इस मुद्दे पर याचिका दायर की है। मंगलवार को दिग्विजय ने कहा कि मामले से जुड़े कम
से कम 24 अभियुक्तों और गवाहों की अब तक रहस्यमय परिस्थितियों
में मौत हो जाने के साथ यह मामला और पेचीदा हो गया है। कुछ रिपोर्टें में ऐसी मौतों
की संख्या 40 तक होने का दावा किया गया है। कांगेस महासचिव ने
कहा, फिलहाल घोटाले की जांच कर रही राज्य पुलिस के विशेष जांच
दल ने मामले में इसकी व्यापकता और पुलिस, सिविल सेवा एवं न्यायपालिका
के शीर्ष अधिकारियों और साथ ही भाजपा नेताओं की संलिप्तता के चलते अपनी लाचारी दिखाई
है। दिग्विजय ने कहा जिस मामले में पदेश के मुख्यमंत्री का नाम भी शामिल हो,
राज्य सरकार के अधीन आने वाली कोई एजेंसी जांच नहीं कर सकती । इसलिए
सीबीआई की जांच होनी चाहिए। यह मामला कुछ कुछ उत्तर पदेश के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य
मिशन घोटाले की राह पर चलता दिख रहा है, जिसमें भी कई आरोपियों
और गवाहों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। जाहिर है अहम गवाहों और आरोपियों
की मौत हो जाने से न केवल जांच पभावित हो सकती है, बल्कि यह भी
संभव है कि उस बड़े नेटवर्क का खुलासा भी न हो पाए, जिसके जरिए
इसे अंजाम दिया जा रहा था। मसलन, जिन दो आरोपियों की अभी मौत
हुई है, उनमें से एक 29 वर्षीय असिस्टेंट
पोफेसर नरेन्द्र सिंह तोमर के पिता का आरोप है कि उनका बेटा कुछ बड़े नामों का खुलासा
करने वाला था। यह मामला हालांकि दो वर्ष पहले उजागर हुआ, लेकिन
जांच से ये तथ्य सामने आए कि पिछले सात-आठ वर्षें के दौरान कम
से कम 1000 लोगों की गलत तरीके से या तो नौकरियों में भती हुई
है या उन्हें मेडिकल या वेटनरी कॉलेजों में दाखिला दिलाया गया है। यह घोटाला कितना
बड़ा है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मामले में एक पूर्व शिक्षामंत्री,
पूर्व परीक्षक संहित के कई अधिकारियों और नेताओं की गिरफ्तारी हो चुकी
है और राज्यपाल के एक आरोपी बेटे तक की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है। बेशक
यह मामला बहुत बड़ा है जिसमें करीब 500 आरोपी अब भी फरार हैं,
लेकिन समयबद्ध तरीके से इसकी जांच पूरी न हुई तो मामला और उलझता जाएगा।
Wednesday, 1 July 2015
सतह पर आई टीम इंडिया की अंतर्पलह
बांग्लादेश
से सीरीज गंवाने के बाद यह बात लगभग जाहिर हो चुकी है कि टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम
का माहौल कुछ ठीक नहीं चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक वाकई टीम के भीतरी स्थिति सामान्य
नहीं है। खिलाड़ियों के चयन व अहम के टकराव के कारण टीम दो धड़ों में बंट गई है। टेस्ट
कप्तान विराट कोहली और वनडे कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के बीच कुछ न कुछ गड़बड़ी चल रही है। विराट ने एक इंटरव्यू में कहा कि बांग्लादेश
के दौरे में मैदानी निर्णय लेने में आत्मविश्वास की कमी थी। जाहिर है कि उनका इशारा
कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी की ओर था, क्योंकि फैसला तो कप्तान
ही लेता है। कोहली के इस बयान को संकट से घिरे महेंद्र सिंह धोनी के नेतृत्व पर हमले
के रूप में देखा जा रहा है। कोच के मामले में भी दोनों के मतभेद सामने आ गए हैं। कोच
के मसले पर जहां विराट अभी भी टीम निदेशक रवि शास्त्राr को बेहतर
मान रहे हैं वहीं धोनी कहीं न कहीं डंकन फ्लेचर के महान मार्गदर्शन पर विचार कर रहे
हैं। जहां कोहली को टीम के फास्ट बॉलरों से कोई शिकायत नहीं है वहीं धोनी ने तेज गति
के गेंदबाजों पर निराशा जताई है। सूत्रों के मुताबिक कुछ खिलाड़ी कोहली की आक्रामकता
के मुरीद हैं तो कुछ को धोनी के अजीबोगरीब फैसले रास नहीं आए। कोहली का यह बयान रविचन्द्रन
अश्विन के उस बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने अपने कप्तान के लिए जान देने तक की
बात की थी। सुरेश रैना ने भी धोनी का समर्थन किया है। कोहली के बयान से धोनी के खिलाफ
विद्रोह की बू आ रही है। धोनी के नेतृत्व में टीम इंडिया ने कई शानदार उपलब्धियां अर्जित की हैं। धोनी के निर्णय आमतौर
पर सही बैठते हैं पर वह भी कभी गलती कर सकते हैं। आखिर हैं तो वह भी मानव। दुख से कहना
पड़ता है कि विराट कोहली थोड़े अहसान फरामोश हैं। सुपर स्टार विराट कोहली गत वर्ष इंग्लैंड
के दौरे में जब बेहद खराब दौर से गुजर रहे थे तब कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने उनका
लगातार समर्थन किया था लेकिन विराट ने बांग्लादेश के खिलाफ सीरीज हार के बाद जिस तरह
मैदानी निर्णय लेने में गलती की बात उठाई है उससे यह साफ होता है कि वह धोनी के उस
समर्थन को भुला बैठे हैं। विराट को गेम के तीन फार्मेट में कप्तान बनने की जल्दी है
और वह धोनी को इसमें सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं। सूत्रों के अनुसार कहा जा रहा है कि
टीम निदेशक रवि शास्त्राr विराट का समर्थन कर रहे हैं। धोनी ने
भी सीरीज के दौरान कहा था कि टीम इंडिया का कोच रखने में किसी तरह की जल्दबाजी नहीं
की जानी चाहिए थी जबकि ऐसा माना जा रहा है कि शास्त्राr टीम इंडिया
के अगले कोच बन सकते हैं। विराट को यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी समय सचिन ने कप्तानी
के बोझ से अपनी बल्लेबाजी को प्रभावित होता देख कप्तानी ही छोड़ दी थी जिसके बाद उनका
करियर लंबा चला था। टेस्ट कप्तानी विराट को मिल चुकी है और अगले कुछ वर्षों में वह
वनडे कप्तान भी बन सकते हैं लेकिन यदि उनकी बल्लेबाजी प्रभावित होती रही तो वह खुद
भी अपनी जगह को लेकर कोई तर्प नहीं दे पाएंगे। फिलहाल उन्हें धोनी की कप्तानी से सीखना
चाहिए। धोनी के योगदान को कम नहीं किया जा सकता।
-अनिल नरेन्द्र
आतंकियों को नाकाम करने हेतु 80 मस्जिदें बंद होंगी
ब्रिटेन ने उत्तरी अफ्रीकी देश ट्यूनीशिया में एक होटल
पर शुक्रवार को हुए आतंकी हमले के बाद देश में ऐसे ही और हमलों की चेतावनी दी है। इस
हमले में 39 लोग मारे गए थे जिसमें
15 ब्रिटेन के नागरिक थे। उधर फ्रांस, कुवैत और
ट्यूनीशिया के बाद आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस)
शनिवार को ब्रिटेन को दहलाने की फिराक में था। लेकिन पुलिस ने आर्म्स
डे परेड के दौरान धमाके की साजिश को विफल कर दिया। ली रिग्बी रेजीमेंट के सैनिकों की
परेड देखने आए लोगों को निशाना बनाकर प्रेशर कुकर बम के जरिए यह हमला किया जाना था।
2013 में भी इस रेजीमेंट के सैनिकों को इस्लामी कट्टरपंथियों ने निशाना
बनाया था। शुक्रवार को ट्यूनीशिया पर हुए आतंकी हमले के बाद अगले दिन शनिवार को यहां
की सरकार ने देश की 80 मस्जिदें बंद करने की घोषणा की है। इन्हें
एक हफ्ते के अंदर बंद कर दिया जाएगा। ये मस्जिदें सरकारी नियंत्रण से बाहर हैं। प्रधानमंत्री
हबीब अल असीद ने कहा कि इन मस्जिदों में जहरीला प्रचार किया जाता है और हिंसा भड़काई
जाती है। शुक्रवार को ट्यूनीशिया के पर्यटन स्थल सूस में हुए आतंकी हमले में
39 लोग मारे गए थे। इनमें काफी संख्या में यूरोपियन नागरिक भी थे। हमले
की जिम्मेदारी आतंकी गुट आईएस ने ली है। प्रधानमंत्री हबीब अल असीद ने कहा कि संविधान
के खिलाफ काम करने वाले दलों और समूहों पर भी कार्रवाई होगी। इस बीच ब्रिटिश टूर ऑपरेटरों
थामसन और फर्स्ट च्वाइस ने सैलानियों को ट्यूनीशिया से निकालने के लिए 10 विमान भेजे हैं। इनसे 2500 लोगों को बचाकर लाया जा सकेगा।
इन दोनों ऑपरेटरों ने कहा है कि मरने वालों में ज्यादातर इनके कस्टमर थे। ट्यूनीशिया
के सकल घरेलू उत्पाद का 15.2 फीसदी हिस्सा पर्यटन से आता है और
करीब 13.2 फीसदी नौकरियों के अवसर भी पर्यटन क्षेत्र से जुड़े
हैं। पिछले साल ट्यूनीशिया में आने वाले पर्यटकों की संख्या 60 लाख थी। शुक्रवार को आईएस ने सोची-समझी रणनीति के तहत
साउसे के ऐसे होटल पर हमला किया जहां यह विदेशी सैलानी रहते हैं। उन्होंने ट्यूनीशिया
की अर्थव्यवस्था पर चोट पहुंचाने के लिए ऐसा स्थान चुना जहां पर्यटक ठहरते हैं ताकि
देश का टूरिज्म प्रभावित हो। दूसरी ओर ट्यूनीशिया के प्रधानमंत्री हबीब अल असीद की
हिम्मत की दाद देनी होगी कि उन्होंने 80 मस्जिदों को बंद करने
की घोषणा की है। मस्जिदों से कट्टरपंथियों को उकसाने के भाषण दिए जाते हैं पर ऐसा नहीं
कि सारी मस्जिदों में कट्टरपंथी प्रचार होता है पर कुछ मस्जिदों में युवाओं को भड़काने
का काम किया जाता है। यह कटु सत्य किसी से छिपा नहीं। पर अवाम और मौलवियों व कट्टरपंथियों
के डर से कोई देश ऐसी मस्जिदों पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई करने से कतराता है। ट्यूनीशिया
ने हिम्मत दिखाई है। अगर वह इन 80 मस्जिदों को बंद करने में सफल
होता है तो यह काम सारी दुनिया के लिए एक उदाहरण होगा।
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