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Wednesday, 24 April 2019

पुरी संसदीय सीट पर प्रवक्ताओं की टक्कर

भगवान जगन्नाथ ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उनके साथ रहने वाले दो चिन्ह यूं आपस में टकराएंगे। लेकिन इस लोकसभा चुनाव में ऐसा हो रहा है। भगवान जगन्नाथ की पुरी नगरी में शंख और पदम के बीच लड़ाई है। दरअसल बीजू जनता दल (बीजेडी) के प्रतीक शंख और भाजपा के प्रतीक कमल (पदम) के बीच इस बार मुकाबला है। यही नहीं तीनों प्रमुख दलों बीजेडी, भाजपा और कांग्रेस ने अपने प्रवक्ताओं को यहां मैदान में उतारा है। मूल रूप से बीजद की मजबूत जनाधार वाली सीट पर पिछले दो चुनावों में जीत हासिल कर रहे पिनाकी मिश्रा फिर मैदान में हैं। पिनाकी मिश्रा 2009 में कांग्रेस छोड़कर बीजद में आए थे। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने इस बार अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा को टिकट दिया है जो अनूठे तरीकों से इस सीट पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। वहीं कांग्रेस ने सत्य प्रकाश नायक को टिकट दिया है। खास बात यह है कि प्रवक्ताओं की लड़ाई में मतदाता तय नहीं कर पा रहे हैं कि किसको अपना कीमती वोट दें? सत्य प्रकाश नायक कांग्रेस प्रदेश कमेटी मीडिया सेल के प्रमुख हैं। लगभग 14 लाख वोटर इस लोकसभा सीट पर आमतौर पर 50 प्रतिशत वोट बीजद को मिलते आए हैं। पुरी लोकसभा सीट के तहत आने वाली सात विधानसभा सीटों में पांच बीजद के पास हैं। संबित पात्रा की उम्मीदवारी के जरिये भाजपा ने इस बार शेष चार विधानसभा सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। मतदाताओं के बीच कभी गीत गाकर तो कभी स्थानीय लोगों में घुल मिलकर पात्रा ने अपने प्रचार को धार देने की कोशिश की है। बावजूद इसके भाजपा का पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के इर्दगिर्द केंद्रित रहा। भाजपा के पक्ष में बेहतर माहौल के पीछे संबित पात्रा को मोदी के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जा रहा है। वेद की पढ़ाई कर रहे आशीष दूबे का कहना था कि प्रधानमंत्री मोदी को एक बार मौका जरूर मिलना चाहिए। वहीं दो बार सांसद रह चुके पिनाकी मिश्रा के प्रति मतदाताओं में नाराजगी है। पुरी की जनता कहती है कि पिनाकी हमारे प्रतिनिधि हैं, लेकिन वह यहां सिर्प चुनाव के वक्त आते हैं। जनता में नाराजगी की सबसे बड़ी वजह पिनाकी का उपलब्ध न होना है। मंदिरों के इस शहर के चुनावी संघर्ष से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का लिटमस टेस्ट भी होगा। 2014 की मोदी लहर में ओडिशा में भाजपा महज एक सीट जीत पाई थी। 21 सीटों के इस राज्य में बाकी 20 सीटें बीजद जीती थी। धोती-कुर्त्ता पहने व माथे पर चन्दन लगाए पात्रा मोदी के नाम पर वोट मांगते दिखे। बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद यहां प्रधानमंत्री की लोकप्रियता बढ़ी है। भाजपा के बढ़ते अपराध, पर्यटन की अनदेखी और मछुआरों के वित्तीय संकट के मुद्दे यहां प्रमुख हैं। यहां प्रवक्ताओं की लड़ाई तो है ही पर ऊपरी स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री व बीजू जनता दल प्रमुख नवीन पटनायक की लोकप्रियता का भी एक टेस्ट है। पुरी में अनुभवी सांसद पिनाकी मिश्रा राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं और इतनी आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी की छवि और उपलब्धियों के बावजूद पहली बार पुरी से चुनाव लड़ रहे डॉ. संबित पात्रा खारे पानी में कमल खिलाने की पूरी कोशिश करेंगे।

कम वोटिंग से किसका घाटा? सारा जोर अब अगले चरणों पर

लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में गत शुक्रवार को जारी संशोधित आंकड़ों के मुताबिक 11 राज्यों एवं केंद्रशासित पुडुचेरी की 95 सीटों पर 69.13 प्रतिशत मतदान हुआ। जबकि पहले चरण में 69.43 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2014 की बात करें तो लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 69.62 प्रतिशत मतदान हुआ था। क्या पहले दो चरणों के वोटिंग प्रतिशत गिरने का ट्रेंड अगले चरणों में भी जारी रहेगा? पहले दो चरणों में हुई सुस्त वोटिंग के बाद अब सियासी दलों की सबसे बड़ी चिन्ता यही है। 11 अप्रैल के बाद 18 अप्रैल को खत्म हुए दूसरे चरण की 95 सीटों पर भी 2014 के मुकाबले कम वोटिंग हुई। 186 लोकसभा सीटों पर लगभग 68.63 प्रतिशत वोटिंग दर्ज हुई। तीसरा चरण 23 अप्रैल को हुआ, जिसमें 116 लोकसभा सीटों पर मतदान हुआ। इसके साथ ही पूरे देश के आधे से ज्यादा सीटों पर चुनाव खत्म हो गया। अब तक के आंकड़ों के अनुसार शहरी सीटों पर वोटिंग कम हुई। खासकर बेंगलुरु और तमिलनाडु के बाकी शहरों में। माना जाता था कि सामान्यता से बहुत अधिक वोटिंग होने से ऐसा संदेश जाता है कि यह परिवर्तन की भीड़ उमड़ी है। जबकि उदासीन वोट से संदेश जाता है कि वोटरों में इसके प्रति उत्साह नहीं, जिसे सत्तापक्ष अपने लिए उम्मीद के रूप में देखता है। लेकिन यह मिथ्य भी हाल के दौरान कई चुनावों के दौरान टूटा है। सबकी नजर तीसरे चरण की 116 सीटों पर टिकी हुई थी। 23 अप्रैल को 14 राज्यों की 116 सीटों पर मतदान के चलते कांटे की लड़ाई हुई। इस हिसाब से 23 अप्रैल की शाम तक 303 सीटों का मतदान पूरा हो गया। भाजपा-राजग को जहां अपना किला बचाना होगा, साथ ही जहां कुछ घाटा नजर आया तो उसकी पूर्ति भी करनी होगी। तीसरे चरण में छत्तीसगढ़ की सात सीटों पर चुनाव हुआ। यहां कांग्रेस कुछ माह पूर्व विधानसभा में मिली जीत से उत्साहित है हालांकि 2014 में भाजपा ने यहां कांग्रेस का सूपड़ा साफ किया था। इसी तारीख में कर्नाटक की शेष 14 लोकसभा सीटों पर भी मतदान हुआ। इसमें कांग्रेस-जनता दल (एस) गठबंधन को विधानसभा चुनाव की तर्ज पर जीत के लिए समूची ताकत लगानी पड़ी जबकि भाजपा को मोदी लहर पर भरोसा है। महाराष्ट्र व कर्नाटक की 14-14 सीटों पर पिछले चुनाव में राजग का पलड़ा भारी रहा था। दोनों जगहों पर पक्ष तथा विपक्ष को औसत बस अंतर भर था। इसी कड़ी के चलते बिहार व अन्य जगहों पर राजग को पिछली सीटों को बचाना बड़ी चुनौती है। वर्ष 2014 में तब बिहार की 26 में से 25 पर राजग जीती थी। जबकि जनता दल (यू) एक सीट जीती थी। इस बार राजग के घटक दल बदल गए हैं। जनता दल (यू) भाजपा के साथ जुड़ गया है। मोदी की टीम का प्रयास होगा कि पिछले 26 में से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीते जबकि विपक्ष भी कसर बाकी नहीं रखेगा। अंतिम चार चरणों में बिहार में जहां मतदान होगा उसमें दरभंगा, उजियापुर, हाजीपुर, मुजफ्फरपुर, सारण, बाल्मीकि नगर, पटना साहिब प्रमुख होंगी। तीसरे चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गृह राज्य गुजरात की 26 सीटों पर मतदान हुआ। 2014 में भाजपा सभी 26 सीटों पर विजयी रही थी। राजस्थान की 25 सीटों पर चौथे और पांचवें चरण में वोटिंग होगी। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 26 सीटों पर चुनाव हो चुके हैं, बाकी बची 54 सीटों पर आगामी चरणों में वोटिंग होगी। 2014 में भाजपा इन 54 सीटों में से 47 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 16 सीटों के बाद तीसरे चरण में गठबंधन को उन 10 सीटों पर जोर-आजमाइश करनी पड़ी है जहां मुलायम परिवार की साख दांव पर है। वर्ष 2014 में सपा को प्रदेश में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिहाज से यह इलाका मददगार साबित हुआ है। कुल मिलाकर एक तरफ मोदी और दूसरी तरफ कांग्रेस-सपा-बसपा गठबंधन की साख दांव पर होगी।

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 23 April 2019

24 साल की कटुता भुलाकर मायावती-मुलायम एक मंच पर

24 साल पुरानी दुश्मनी भूलकर बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी में शुक्रवार को चुनावी रैली के दौरान मंच साझा किया और मायावती ने बाकायदा मुलायम को जिताने की अपील करते हुए उन्हें असली नेता करार दिया। 1995 में हुए बहुचर्चित गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा से रिश्ते तोड़ चुकी मायावती जब रैली के लिए मैनपुरी के क्रिश्चियन कॉलेज के मैदान में पहुंची तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। बड़ी संख्या में आए सपा-बसपा कार्यकर्ताओं को सपा प्रत्याशी मुलायम सिंह यादव को जिताने की अपील करते हुए कहा कि इस गठबंधन के तहत मैनपुरी में खुद मुलायम के समर्थन में वोट मांगने आई हूं। जनहित में कभी-कभी कुछ कठिन फैसले लेने पड़ते हैं। देश के वर्तमान हालात को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। उन्होंने कहा कि आप मुझसे जानना चाहेंगे कि दो जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बाद भी सपा-बसपा गठबंधन चुनाव क्यों लड़ रहा है? इस गठबंधन के तहत ही आज मैं यहां आई हूं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की सामूहिक ताकत का प्रयोग कई अरसे बाद जमीन पर आंका जाना है। दो चरण बीतने के बाद सत्तारूढ़ दल के समर्थकों को लग रहा है कि जमीन पर ध्रुवीकरण चल रहा है। किसी का दावा है कि मोदी का नाम चल गया तो इसके उलटे विपक्ष की जमीन हरीभरी देख रहे लोगों का दावा है कि ध्रुवीकरण की कोशिश पर उनका समीकरण हावी है। पाकिस्तान से लेकर प्रज्ञा ठाकुर तक ध्रुवीकरण कार्ड के पत्ते हैं। इनका असर नकारा नहीं जा सकता, लेकिन दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यकों का समीकरण का गठबंधन का दांव भी कमजोर नहीं है। दोनों तरफ से पूरा जोर लगाया जा रहा है। केवल मतदाता ही राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों के दावों की पड़ताल कर सकते हैं। भाजपा ने करीब ढाई दशक बाद मुलायम-मायावती की संयुक्त रैली पर कटाक्ष करते हुए कहा कि इस रैली से साफ हो गया है कि उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंधी चल रही है और उनका जनता से गठबंधन बहुत ज्यादा मजबूत है। शाहनवाज हुसैन ने कहा कि मोदी की आंधी से बदहवास लोग खोखले पेड़ से लिपट रहे हैं। न सपा में दम बचा है और न ही बसपा में। उन्होंने कहा कि सपा और बसपा दोनों के कार्यकाल में भ्रष्टाचार हुआ है, दोनों ही परिवारवादी और भाई-भतीजावादी हैं। मैनपुरी की यह रैली सपा-बसपा के साथ मंच पर होने के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं थी, बल्कि सूबे में गठबंधन को स्वीकार्यता दिलाने के लिहाज से भी इस रैली का महत्व है, ऐसा हमारा मानना है। सपा और बसपा का व्यापक जातिगत आधार ही नहीं, उत्तर प्रदेश में उनका व्यापक नेटवर्प भी प्रतिद्वंद्वियों के लिए चुनौती है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस बार निशाने पर हैं नरेंद्र मोदी। सपा-बसपा गठबंधन यह तो साबित कर ही चुका है कि उनका गठबंधन मजबूत है। इसी वजह से इस गठबंधन ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही घर की सीट गोरखपुर और फूलपुर पर लोकसभा उपचुनाव जीतकर दिखा दिया है। सपा और बसपा के कार्यकर्ताओं में अगर वाकई ही दिल मिल जाते हैं तो भाजपा को उत्तर प्रदेश में भारी नुकसान हो सकता है। तीसरे चरण में सपा की साख दांव पर है। तीसरे चरण में मुलायम परिवार की गढ़ कही जाने वाली मैनपुरी, फिरोजाबाद और बदायूं सीटों पर मतदान है। यह तो मतपेटियों के खुलने पर ही पता चलेगा कि किसका पलड़ा भारी है।
किया था और भाजपा को इसका खामियाजा भी भुगताना पड़ा था। कांग्रेस को खोने के लिए कुछ भी नहीं है। भाजपा अगर एक भी सीट हारती है तो उसी को नुकसान होगा।

त्रिकोणीय संघर्ष में फंसे शरद यादव

बिहार में हो रहे तीसरे चरण के चुनाव में सबसे रोमांचक मुकाबला मधेपुरा लोकसभा सीट के लिए होने जा रहा है। राम पोप का, मधेपुरा गोप का नारे के बीच का सबसे बड़ा सच यह है कि त्रिकोणात्मक इस संघर्ष में फंसा मधेपुरा का चुनावी संघर्ष भी तीन यादवों के बीच ही फंसा है। हालांकि इस चुनाव में जदयू के दिनेश चन्द्र यादव का मुकाबला राजद के शरद यादव से है। यहां संघर्ष का तीसरा कोण जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के उम्मीदवार राजेश रंजन उर्प पप्पू यादव बना रहे हैं। लेकिन अपरोक्ष रूप से मधेपुरा के लोकसभा संघर्ष में मौजूदा राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव व जनता दल (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गई है। राजद उम्मीदवार शरद यादव ने जनता दल (यू) से नाराज होकर कई दिग्गज नेताओं को लेकर अलग पार्टी बनाई थी। लेकिन बाद में लालू प्रसाद यादव ने राजद की सदस्यता दिला मधेपुरा की जंग में शामिल कराकर नीतीश कुमार के सामने एक चुनौती रख दी थी। मधेपुरा लोकसभा का चुनाव शरद यादव के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस बार चुनाव जीत जाते हैं तो मधेपुरा लोकसभा से पांचवीं बार सांसद बनने का गौरव प्राप्त होगा। मधेपुरा लोकसभा से शरद यादव पहली बार चुनाव 1991 में जनता दल से लड़े थे। उनकी टक्कर जब जनता पार्टी के आनंद मोहन से हुई थी। इस चुनाव में जनता दल के उम्मीदवार शरद यादव ने आनंद मोहन को हराया था। तब जनता दल उम्मीदवार यादव को 4,37,483 मत मिले थे और आनंद मोहन को मात्र 1,52,106 मत मिले थे। मधेपुरा लोकसभा सीट पर तीसरे चरण में 23 अप्रैल को वोट पड़ेंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव में इस बार एक बार फिर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के प्रभामंडल में शरद यादव राजद के उम्मीदवार बने हैं। यह जब तय है कि 2019 के इस त्रिकोणीय संघर्ष में तीनों उम्मीदवार यादव बिरादरी के हैं तो गैर-यादव मत इस लोकसभा चुनाव में जीत की पुंजी साबित हो सकते हैं। यह तो अब समय के गर्भ में है कि कौन उम्मीदवार गैर-यादव मतों को ज्यादा से ज्यादा अपने पक्ष में कर सकता है? आरजेडी-कांग्रेस के बीच तकरार के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा पप्पू यादव को लेकर था। पप्पू यादव गठबंधन का हिस्सा बनकर मधेपुरा से सीट चाहते थे। लेकिन आरजेडी ने उन्हें सीट नहीं देकर शरद यादव को वहां से उतारने का फैसला किया। अब पप्पू यादव निर्दलीय उम्मीदवार बनकर शरद यादव की नींद हराम करने उतरे हैं। अगर शरद यादव यह चुनाव भी जीतते हैं तो उन्हें पांचवीं बार सांसद बनने का गौरव प्राप्त होगा। असल लड़ाई लालू प्रसाद यादव व तेजस्वी यादव व नीतीश कुमार की है। नीतीश की उपलब्धियों व नरेंद्र मोदी की छवि पर शरद यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

-अनिल नरेन्द्र

गुजरात में कांग्रेस बनाम भाजपा लड़ाई अहम क्यों है?

गुजरात में 23 अप्रैल को राज्य की सभी 25 सीटों के  लिए मतदान होना है। प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों का गृह राज्य है और करीब 20 साल से भाजपा यहां सत्ता में हैं। हालांकि 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और युवा नेताओं की तिकड़ी (हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर) से मिली कड़ी टक्कर के बाद अब गुजरात लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद अहम बन गया है। 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की 22 साल पुरानी सत्ता को चुनौती देने वाली कांग्रेस भले ही सरकार न बना पाई हो लेकिन न केवल उसने भाजपा को 100 का आंकड़ा छूने से रोका बल्कि अपनी सीटों में इजाफा कर 78 सीटें जीतीं। अगर हम लोकसभा चुनावों की बात करें तो 1991 के बाद से ज्यादा सीटें भाजपा के खाते पर गई हैं। भाजपा ने 1991 में 20, 1996 में 16, 1998 में 19, 1999 में 20, 2004 में 14, 2009 में 15 और 2014 में लोकसभा की सभी 26 सीटें जीतीं। 2014 लोकसभा चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी ने रुख दिल्ली का कर लिया। 2017 में भाजपा के लिए स्थिति काफी बेहतर हो गई थी। अमित शाह ने छाती ठोक कर कहा था कि वो 150 से 182 तक सीटें लाएंगे, लेकिन मोदी के सीएम बनने के बाद (2001 में मोदी मुख्यमंत्री बने थे) पहली बार पार्टी 100 सीटों से नीचे खिसक गई। आज के परिदृश्य में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी शहरी इलाकों में है। बेशक यह भाजपा का गढ़ रहे हैं और 2017 में कांग्रेस इन्हें भेद नहीं पाई लेकिन ग्रामीण इलाके में भाजपा कमजोर दिख रही है। यहां के लोग बातचीत में राज्य सरकार के काम से संतुष्ट नहीं दिखते। कहीं पानी की समस्या है तो कहीं रोजगार और किसान के मुद्दे। कहीं भेदभाव की बातें हैं तो कहीं नेताओं का घमंड। रूपाणी सरकार को लेकर जितनी नाराजगी है, उतना ही सॉफ्ट कॉर्नर नरेंद्र मोदी के प्रति है। राहुल गांधी में बदलाव को लोग स्वीकार कर रहे हैं। प्रियंका के राजनीति में आने से और फर्प पड़ सकता है। भाजपा के पक्ष में सबसे बड़ा मुद्दा एयर स्ट्राइक है तो कांग्रेस के पक्ष में न्याय और किसानों की कर्जमाफी। नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, माल्या के भागने की नाकामी भी कांग्रेस मुद्दा बना रही है। जबकि भाजपा समर्थक कहते हैं कि भागता वही है जिसे डर होता है। मोदी का डर था, इसलिए वो भागे। संकेत साफ हैöमोदी आज भी गुजरात का मुद्दा हैं। सौराष्ट्र में पांच सीटेंöजूनागढ़, जामनगर, पोरबंदर, अमरेली, सुरेन्द्र नगर और उत्तर गुजरात में चार सीटें, साबरकांठा, बनासकांठा, पाटण और मेहसाणा और आदिवासी बहुल इलाके की पांच सीटें भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। कांग्रेस 26 सीटों पर फोकस नहीं कर रही है, उसकी रणनीति है कि 13 सीटों पर ध्यान केंद्रित करो और कम से कम 8 या 10 सीटें जीतने की कोशिश करो। पानी की किल्लत और किसानों को पानी मुहैया न हो पाना बड़ा मुद्दा है। तीन युवा नेता बड़ी भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं। पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के नेता हार्दिक पटेल, ऊना कांड से उभरे दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर ने भाजपा को काफी परेशान किया हुआ था। इन युवा नेताओं ने बेरोजगारी, भाजपा की सांप्रदायिक नीतियों का विरोध किया था और भाजपा को इसका खामियाजा भी भुगताना पड़ा था। कांग्रेस को खोने के लिए कुछ भी नहीं है। भाजपा अगर एक भी सीट हारती है तो उसी को नुकसान होगा।

Sunday, 21 April 2019

पाकिस्तान में दूध 120-180 रुपए किलो

पुलवामा हमले के बाद से बदले हुए हालात में समझ नहीं आ रहा कि महंगाई दर चार गुना आखिर क्यों बढ़ गई। आतंकी हमला 14 फरवरी को हुआ था और इसके परिणामस्वरूप भारत ने एयर स्ट्राइक की थी। क्या इसका पाकिस्तान में महंगाई से कोई संबंध हो सकता है? यह हम इसलिए कह रहे हैं कि पुलवामा आतंकी हमले से पहले पाकिस्तान में महंगाई दर 2.2 प्रतिशत थी जबकि 60 दिन बाद अब 9.4 प्रतिशत है। महंगाई के कारण वहां की अवाम परेशान है। खाने-पीने की चीजों के साथ ही पाकिस्तानी अखबार द डॉन के मुताबिक प्रशासन ने दूध के दाम 94 रुपए तय किए हैं, पर ज्यादातर विकेता 120-180 रुपए प्रति लीटर बेच रहे हैं। यहां पहले 70 रुपए प्रति लीटर दूध बिक रहा था। डेयरी एसोसिएशन के मुताबिक सरकार से दाम बढ़ाने का आग्रह किया गया था। सरकार जब नहीं मानी तो उन्होंने खुद ही दूध के दाम बढ़ा दिए। प्रशासन छापेमारी कर रहा है और 11 लाख रुपए जुर्माने का वसूल अब तक कर चुका है। टमाटर जैसी सब्जियां 150 रुपए किलो बिक रही हैं। भारत ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीन लिया था। पाकिस्तानी वस्तुओं पर 200 प्रतिशत ड्यूटी लगा दी थी। इससे पहले दोनों देशों के बीच जुलाई 2018 से जनवरी 2019 तक 7800 करोड़ रुपए का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था। पाकिस्तान ने भारत से 6100 करोड़ रुपए का आयात किया था, जबकि भारत ने पाकिस्तान से 1700 करोड़ रुपए का। हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को साफ्टा से भी हटाने की तैयारी कर ली थी। खाने-पीने की चीजों के साथ ही दवाइयां भी महंगी हो गई हैं। इसे देखते हुए ड्रग रेग्यूलेटरी अथारिटी ने कराची, लाहौर और पेशावर में 28 दवा कंपनियों के ठिकानों पर छापे मारे। इन कंपनियों पर केस भी दर्ज किए गए हैं। इनके गोदामों से 83 तरह की दवाइयां जब्त की हैं। यह कंपनियां भारी कीमत पर दवाइयां बेच रही थीं। पाकिस्तानी मीडिया ने यह रिपोर्ट दी है। पाकिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री आमिर महमूद कियानी ने कहा कि सरकार देशभर में मुनाफाखोरी के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगी। सरकार ने ऑडिटर जनरल को ड्रग रेग्यूलेटरी अथारिटी के खातों को ऑडिट करने को कहा है। पाकिस्तान में दवा उद्योग 90 लाख करोड़ रुपए का है। हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अपने एक भाषण में कहा था कि पाकिस्तान निहायत खतरनाक दौर से गुजर रहा है, देश कंगाली के कगार पर है और बाहरी मदद पर निर्भर है। सऊदी अरब, चीन, यूएई ने पाकिस्तान की माली मदद भी की है पर जब तक पाकिस्तानी इकोनॉमी अपने पैरों पर खड़ी नहीं होती तब तक यह समस्या हल होने वाली नहीं। इसके चलते पाकिस्तानी अवाम महंगाई के बोझ से दबती चली जा रही है।
-अनिल नरेन्द्र

द हो सकती है।

जेट एयरवेज के कैश होने से हजारों सपने टूटे

अंतत वही हुआ जिसकी आशंका पिछले कई महीनों से चल रही थी। जेट एयरवेज ने बुधवार को अपनी आखिरी उड़ान अमृतसर से रात 10.30 बजे मुंबई के लिए भरी। हालांकि जेट ने कहा है कि उड़ानें अस्थायी तौर पर बंद की जा रही हैं। अब उड़ानें कब शुरू होंगी, यह नीलामी पर निर्भर है। नीलामी में भाग लेने वाली कंपनियों के पास 10 मई तक का समय है। मौजूदा सरकार यानि मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में बंद होने वाली जेट एयरवेज सातवीं एयरलाइन है। इससे पहले एयर बिगेसस, एयर कोस्टा, एयर कार्निवल, एयर डेक्कन, एयर ओडिशा और जूम एयर भी बंद हुई। एक समय देश की सबसे बड़ी विमान कंपनी रही जेट के बंद होने की वजह जो भी रही है पर गाज उसके 20 हजार कर्मचारियों पर पड़ेगी। इसकी वजह से 20 हजार कर्मचारी सड़क पर आ गए हैं। होम लोन की ईएमआई, बच्चों के स्कूल की फीस यहीं तक नहीं, जिन्दगी के सारे सपने मानो एक पल में उनके कैश हो गए हों। करीब दो दशक से जेट के कर्मचारियों की जिन्दगी अच्छी तरह उड़ान भर रही थी, अचानक वह ऐसा टर्बुलेंस झेल रहे हैं जिसके खत्म होने के अभी आसार नहीं नजर आ रहे। कुल मिलाकर जेट पर भविष्य में यकीन रखने वाले कम लोग हैं, हालांकि इसके 20 हजार कर्मियों को उम्मीद है कि यह एयरलाइंस बेहतर दिन देखेगी। चुनावी सीजन में 20 हजार नौकरियों के खतरे में आने से एक हद तक राजनीतिक तौर पर संवेदनशील भी हो सकता है। पर देखने की बात यह भी है कि सिर्प नौकरियां बचाने के लिए सरकारी बैंकों को इस बात के लिए विवश नहीं किया जा सकता है कि वो जेट एयरवेज में अपनी रकम लगाएं। सरकारी बैंकों या निजी निवेशकों को अपने आंकलन के हिसाब से यह तय करने का हक है कि उन्हें इस कारोबार में निवेश करना है या नहीं। जेट एयरवेज की इस दुर्दशा के लिए बहुत हद तक उसके कर्ताधर्ता नरेश गोयल जिम्मेदार हैं। नरेश गोयल बरसों से इस जिद पर अड़े रहे कि वह कंपनी के प्रबंधकीय अधिकार नहीं छोड़ेंगे। इस बार ऐसे प्रस्ताव आए जिनमें निवेशक नरेश गोयल की जगह अपने हिसाब की प्रबंधकीय टीम लगाना चाहते थे। पर गोयल की जिद के आगे सारे प्रस्ताव व्यर्थ गए। हैरानी की बात यह है कि 2012 में ऐसी ही हालात में विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस बंद हो गई थी, इसके बावजूद कोई सबक नहीं लिया गया। जहां इसके बंद होने से हजारों कर्मचारी सड़क पर आ गए हैं, वहीं जेट की उड़ानें बंद होने से अचानक विमानन क्षेत्र में मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया है, जिसका असर हवाई यात्रा पर दिखने लगा है। सरकार को देखना चाहिए कि चुनावी आचार संहिता के बीच वह इस संकट को दूर करने में किस तरह से हस्तक्षेप कर सकती है और एयरलाइंस को रिवाइव कर सकती है? यह मुद्दा एक कंपनी और उसके कर्मचारियों के हितों से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि इसका संबंध पूरे विमानन क्षेत्र के निवेशकों के विश्वास से भी है। अब सब नीलामी पर निर्भर है। एसबीआई के अधिकारी ने बताया कि जेट का रिवाइवल इस पर निर्भर करेगा कि खरीददार कितना पैसा लगा रहे हैं? इतिहाद जैसी अनुभवी एयरलाइंस इसके लिए मुफीद हो सकती है।