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Tuesday, 17 January 2017

बराक ओबामा के आठ साल, अलविदा ओबामा

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा आठ साल का कार्यकाल पूरा करके अपने पद से विदाई ले रहे हैं। राष्ट्रपति बराक ओबामा ऐसे समय व्हाइट हाउस से विदा हो रहे हैं जब अमेरिका ने अपने लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे कटुता भरे चुनाव में अपना नया राष्ट्रपति चुना। ओबामा ने आठ नवम्बर 2008 को बतौर पहले अफ्रीकी अमेरिकन व्यक्ति के रूप में राष्ट्रपति का पद संभाला था। ओबामा को वर्ष 2009 के नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया। ओबामा शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही दो मई 2011 को पाकिस्तान के एबटाबाद में एक अमेरिकी सैनिकों के विशेष दस्ते ने रात में कार्रवाई करके कुख्यात अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मारा। लंबे समय से इराक में फंसी अमेरिकी सेना का वापसी का रास्ता ओबामा ने 15 दिसम्बर 2011 को तब खोला जब उन्होंने इराक युद्ध की समाप्ति की घोषणा की। नौ नवम्बर 2012 को ओबामा रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनो को हराकर दोबारा चार साल के लिए राष्ट्रपति बने। 28 दिसम्बर 2014 को उन्होंने अफगानिस्तान में सेना की कार्रवाई की समाप्ति की घोषणा की। जुलाई 2015 में अमेरिका ने उनके नेतृत्व में ईरान को परमाणु कार्यक्रमों की चरणबद्ध समाप्ति के लिए राजी कर उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने का समझौता किया। इसी महीने के आखिरी दिनों में ओबामा ने क्यूबा के साथ 50 साल पुराने बिगड़े रिश्तों को बहाल किया। कुल मिलाकर बराक ओबामा एक सफल राष्ट्रपति रहे। जब 2008 में ओबामा पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे तो उसे इतिहास की सबसे बड़ी खाई पाटने वाली घटना के रूप में देखा गया थाöक्योकि पहली बार एक अश्वेत अमेरिका का राष्ट्रपति बनाöऔर जब वे लगातार दो कार्यकाल पूरा कर राष्ट्रपति पद छोड़ने जा रहे हैं तो अमेरिका में लोकतांत्रिक मूल्यों तथा सामाजिक सरोकारों को लेकर चिन्ता छाई हुई है। इसलिए ओबामा ने पद छोड़ने से 10 दिन पहले दिए अपने विदाई भाषण में उचित ही उन चिन्ताओं को सामने रखा, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता तथा सामाजिक सौहार्द को अमेरिका की पहचान बताया और अपने उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रंप को नसीहत दी कि अमेरिकी मुस्लिमों समेत देश के सभी अल्पसंख्यकों की रक्षा करना हमारा दायित्व है, अमेरिकी मुस्लिम भी उतने ही देशभक्त हैं जितने अन्य अमेरिकी। बराक ओबामा भारत के दोस्त हैं। उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अच्छी दोस्ती व कैमिस्ट्री रही। अमेरिकी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बारे में उनके कट्टर रवैये की चर्चा हो रही है। माना जा रहा है कि उनके राष्ट्रपति बनने पर विश्व में हिंसा के हालात बनेंगे। उनकी तुलना में डेमोक्रेटिक पार्टी (ओबामा) का शासन बेहतर बताया गया था। पर ताजा आंकड़े तो कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार ओबामा के शासन में अमेरिका बेहद आक्रामक रहा है। 2016 में उनके शासन में विभिन्न देशों में 26,171 बम गिराए गए। यह आंकड़ा पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल से 130 प्रतिशत अधिक है। सबसे अधिक हमले पाकिस्तान, अफगानिस्तान, लीबिया, यमन, सोमालिया, इराक और सीरिया में किए गए। इन देशों में तो गृहयुद्ध के हालात हैं। इस समय 138 देशों में अमेरिकी सेनाएं मौजूद हैं। पाकिस्तान, यमन, सोमालिया, लीबिया में पिछले सात सालों में 600 नागरिक इन अमेरिकी हमलों में मारे गए। दुनिया में हथियार आपूर्ति में भी अमेरिका 31 प्रतिशत की हिस्सेदारी से अव्वल नम्बर पर है। निवर्तमान राष्ट्रपति और नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के बीच के फर्क ने ओबामा के कार्यकाल को और प्रशंसनीय बना दिया है अन्यथा बराक ओबामा का कार्यकाल मिश्रित ही माना जाएगा। खैर, अलविदा बराक ओबामा।

-अनिल नरेन्द्र

राहुल गांधी के भूकंप की टांय-टांय फिस्स

अब जब माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सहारा-बिड़ला डायरी मामले में स्पष्ट व दो टूक फैसला दे दिया है कि इस केस में कोई एसआईटी जांच नहीं होगी तो उम्मीद है कि अब यह मुद्दा समाप्त समझा जाए। अदालत ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से इंकार करते हुए कहा कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को औद्योगिक घरानों की ओर से घूस देने का कोई सबूत नहीं है। कोर्ट के मुताबिक इस मामले में डायरी नोटिंग्स को सबूत की तरह नहीं लिया जा सकता। गौरतलब है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (बतौर मुख्यमंत्री, गुजरात) समेत कई दलों से जुड़े मौजूदा और पूर्व मुख्यमंत्रियों पर बड़े कारपोरेट घरानों से पैसे लेने का आरोप लगाया था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने कांग्रेस व इन विपक्षी दलों के आरोपों की हवा निकाल दी है। महत्वपूर्ण यह नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के तौर पर पेश किए जा रहे कथित दस्तावेजों को अविश्वसनीय पाया, बल्कि उसका यह कथन है कि राजनीतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। इसका मतलब तो यही है कि कांग्रेस ने सहारा-बिड़ला की डायरियों के बहाने सियासी हित साधने की तैयारी की। वैसे भी यह किसी से छिपा नहीं कि दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल ने किस तरह दिल्ली विधानसभा का एक दिन का सत्र केवल इन संदिग्ध डायरियों की एंट्रियों की नुमाइश करने के लिए विशेष रूप से बुलाया और राहुल गांधी ने तो यहां तक घोषणा कर दी कि मैं रहस्योद्घाटन करके भूकंप ला दूंगा। इस प्रकरण से जैन हवाला कांड की याद आना स्वाभाविक है। नरसिंह राव सरकार के समय एक व्यवसायी एसके जैन के यहां मिली डायरी में कुछ नेताओं के नाम के समक्ष धनराशि का विवरण भी दर्ज था। इस विवरण से यह आशय निकाल लिया गया कि उस व्यवसायी ने नेताओं को पैसे दिए हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट गया और जांच के आदेश हो गए। लाल कृष्ण आडवाणी समेत कई नेताओं ने संसद सदस्यता छोड़ी। तमाम गहन जांच के बाद मामला फर्जी निकला। जिन नेताओं ने इस्तीफा दिया था उन्होंने खुद को ठगा हुआ महसूस किया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह बात कहीं  ज्यादा भरोसे के साथ बोली जाने लगी है कि अगर ऐसे किसी भी कागज या डायरी के आधार पर जांच होने लगे तो फिर सिस्टम का चलना ही मुश्किल हो जाएगा। प्रधानमंत्री पर हमला बोलने वाले राहुल गांधी ने इसका जिक्र नहीं किया कि डायरियों में शीला दीक्षित का भी नाम है, बल्कि उन्होंने इसकी भी अनदेखी की कि खुद शीला दीक्षित ने इन दस्तावेजों को झूठा बताया है। नोटबंदी पर सरकार को घेरने में नाकाम रहे विपक्ष के लिए इस मुद्दे का फुस्स हो जाना हताशाजनक तो है ही, साथ ही उसकी सामूहिक दिशाहीनता का भी परिचायक है।

Sunday, 15 January 2017

सारे रिकार्ड तोड़ती आमिर की दंगल

आमिर खान की फिल्म दंगल ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। यह फिल्म भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे अधिक कमाई करने वाली बन गई है। मैंने यह फिल्म देखी है। यह फिल्म हर भारतीय विशेषकर महिलाओं और युवाओं के दिलों को छू जाती है। यह फिल्म लड़कियों के प्रति हमारे समाज के कुछ लोगों के नजरिये पर भी चोट करती है जो लड़कियों को लड़कों से हर दृष्टि से कम आंकते हैं। फिल्म हरियाणा के पहलवान महावीर सिंह फोगाट और उनकी बेटियों गीता व बबीता की जीवनी पर आधारित है। चूंकि यह उनके संघर्ष की सच्ची कहानी है इसलिए भी लोगों को इतनी पसंद आई है। दंगल ने आमिर खान की ही फिल्म पीके और सलमान खान की बजरंगी भाईजान और सुल्तान के भी रिकार्ड तोड़ दिए हैं। इस फिल्म के निर्माता के मुताबिक दंगल ने तीसरे सप्ताह भी 30.5 करोड़ रुपए का कारोबार किया। ऐसा रहा तो यह फिल्म सिनेमाघरों से हटने तक 400 करोड़ रुपए का कारोबार कर लेगी। इससे भी ज्यादा हो सकता है। इससे पहले पीके ने 340 करोड़ का कुल कारोबार किया था, जिसे दंगल तीसरे हफ्ते में ही पार कर चुकी है। अब सबसे ज्यादा कमाई के मामले में नम्बर एक और दो पर आमिर की ही फिल्में हैं। इसके बाद आती है सलमान की सुल्तान जिसने 300 करोड़ रुपए का कारोबार किया। मिस्टर परफैक्शनिस्ट (आमिर खान) ने अपनी फिल्म गजनी से 114 करोड़ रुपए का कारोबार कर 100 करोड़ी क्लब की शुरुआत की थी। इसके बाद उनकी फिल्म थ्री इडियट्स ने 202 करोड़ रुपए कमाकर इस क्लब को दोगुना कर दिया। इतना ही नहीं, तीन सौ करोड़ी क्लब की शुरुआत भी आमिर ने ही अपनी फिल्म पीके से की थी। अब लगता है कि 400 करोड़ी क्लब की शुरुआत भी आमिर करेंगे। आमिर ने फिल्म की सफलता पर एक बयान में कहाöएक आर्टिस्ट के लिए इससे बड़ी हौसला अफजाई नहीं हो सकती। बहुत-बहुत शुक्रिया। और नीलेश सर आपका बहुत-बहुत शुक्रिया, धन्यवाद। हरियाणा के पहलवान महावीर सिंह फोगाट के संघर्षपूर्ण जीवन और अपनी छोरियों को पहलवान बनाने की धुन से प्रभावित नीलेश तिवारी ने इस फिल्म का निर्देशन किया है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि चार बेटियों के पिता महावीर ने किस तरह अपने जुनून के बूते गीता और बबीता को पहलवान बनाया और इन लड़कियों ने साबित कर दिया कि किसी भी मायने में वे छोरों से कम नहीं हैं। गीता फोगाट ने राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा था। उनकी राह पर चलती हुई बबीता ने भी कई पदक जीतकर हरियाणा की दंगल परंपरा की धमक जमाई। हालांकि फिल्म को लेकर कुछ विवाद भी उठा। फिल्म में गीता के कोच की भूमिका पर सवाल उठाए जाने पर उनके असली कोच सोटी ने नोटिस भेजने की धमकी दी तो फिल्म में मांसाहार को बढ़ावा देने का आरोप भी लगा। इन विवादों से दूर दंगल अपने कमाई अभियान पर सक्रिय रही। दंगल से पहले आमिर की गजनी, थ्री इडियट्स और पीके कमाई के झंडे गाढ़ चुकी हैं। हाल ही में आई सलमान की सुल्तान भी दंगल को नहीं पछाड़ सकी। हालांकि कुछ फिल्म प्रेमियों का कहना है कि इसी सब्जैक्ट पर सुल्तान आ चुकी है, शायद दंगल का कारोबार प्रभावित हो। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सुल्तान और दंगल बेशक कुश्ती पर आधारित फिल्में हों पर दोनों की कहानी बिल्कुल अलग है और यह कहना गलत नहीं होगा कि ये दोनों अलग-अलग फिल्में हैं। आमिर के अनुसार फोगाट परिवार से पहले ही वे परिचित हो चुके थे। अपने कार्यक्रम सत्यमेव जयते में उन्होंने फोगाट बहनों से बातचीत की थी। अगर आपने अभी यह फिल्म नहीं देखी तो अपने पूरे परिवार के साथ यह साफ-सुथरी संदेश देने वाली फिल्म जरूर देखें।

-अनिल नरेन्द्र

न थमता किसानों की आत्महत्या का सिलसिला

मोदी सरकार किसानों के हित में भले ही `किसान कल्याण' जैसी तमाम योजनाओं की घोषणा करने में लगी हुई है लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने चौंकाने वाले आंकड़ों का खुलासा किया है। इनके आंकड़ों के मुताबिक 2015 में 2014 से ज्यादा किसानों और कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की हैं। कहने को मोदी सरकार 2014 में ही बनी थी। लेकिन 2015 में पूरी तरह सरकार में थी। यहां यह बता दें कि एनसीआरबी एक साल के पहले के डाटा ही जारी करता है। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने किसानों की आय को दोगुना करने, फसल बीमा योजना जैसी तमाम योजनाएं शुरू की हुई हैं। इससे पहले अगर 2014 और 2015 के आंकड़ों पर नजर डालें तो पाएंगे कि वर्ष 2015 में कुल 8007 किसानों ने आत्महत्या की थी, जो वर्ष 2014 में आत्महत्या करने वाले 5650 किसानों की संख्या से 42 प्रतिशत अधिक है। हालांकि इस दौरान कृषि श्रमिकों की आत्महत्या में कमी भी दर्ज की गई है। 2014 के मुकाबले में 31 प्रतिशत किसानों ने कम आत्महत्याएं की हैं। आंकड़ों के अनुसार 2014 में जहां 6710 कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की थी, वहीं 2015 में 4595 कृषि श्रमिकों ने मौत को गले लगा लिया। एनसीआरबी की रिपोर्ट `एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015' नाम की इस रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 के मुकाबले 2015 में किसानों और कृषि मजदूरों की कुल आत्महत्या में दो प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। वर्ष 2015 में कुल 12602 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की, जबकि वर्ष 2014 में कुल 12360 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की। किसानों की 87 प्रतिशत से अधिक आत्महत्याएं सात राज्योंöमहाराष्ट्र (4291), कर्नाटक (1569), तेलंगाना (1400), मध्यप्रदेश (1290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्रप्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) में हुई हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2014 और 2015 में कम वर्षा के चलते देश का बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में था। बताया जा रहा है कि इनमें 38.7 प्रतिशत किसानों ने कंगाली, कर्ज और खेती में दिक्कत के चलते जान ली। इनमें भी 73 प्रतिशत आत्महत्या करने वाले किसानों के पास दो एकड़ या उससे कम जमीन थी। आंकड़ों पर नजर डालें तो जहां आत्महत्या करने वाले राज्यों में महाराष्ट्र सबसे आगे है वहीं दक्षिण भारत के राज्यों का नाम भी किसानों की आत्महत्या के मामलों में दर्ज है। इन आंकड़ों में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य का कोई ब्यौरा नहीं दिया गया। हमें लगता है कि आत्महत्या करने वाले किसानों का आंकड़ा और भी ज्यादा है। तमाम उपायों, सुविधाओं के बावजूद किसानों की आत्महत्या रोकना किसी भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए जो नहीं हो रही।

Saturday, 14 January 2017

गोवा में भाजपा को दोबारा सत्ता में आने की चुनौती

गोवा में 40 सीटों की विधानसभा के लिए चार फरवरी को मतदान होगा। इस समय भाजपा 21 सीटों के साथ सरकार में है। मुख्यमंत्री हैं लक्ष्मीकांत। गोवा में इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है। चार फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा, विपक्षी कांग्रेस और पहली बार अपनी किस्मत आजमाने वाली आम आदमी पार्टी (आप) आमने-सामने होंगी। 2012 के चुनाव में मनोहर पर्रिकर के नेतृत्व में भाजपा ने जीत हासिल की थी। तब महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) के साथ उसका गठबंधन था। लेकिन अब यह गठबंधन टूट गया है। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) ने चुनावों की घोषणा होने के बाद भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया है। एमजीपी प्रमुख दीपक फवलीकर ने गोवा की राज्यपाल मृदुल सिन्हा और विधानसभा स्पीकर अनंत सेठ को पत्र लिखकर इस संबंध में सूचना दे दी है। राज्य में 40 सीटों पर अब वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व नेता सुभाष वेलिंगकर की पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। शिवसेना के भी इस गठबंधन के साथ शामिल होने की संभावना है। फवलीकर ने बताया कि उनकी पार्टी 22 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। कांग्रेस पार्टी के लिए यह अस्तित्व बचाने का अवसर है। 2012 के चुनाव में नौ सीट के साथ वह न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई थी। पिछले झटके से सबक सीखते हुए अब वह गोवा फारवर्ड, राकांपा और यूनाइटेड गोवांस पार्टी के साथ तालमेल के लिए तैयार हो गई है। अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप ने भी गोवा के चुनावी मैदान में ताल ठोंकी है। भाजपा और कांग्रेस से अलग रहने वाले कई संगठन व नेता आप के साथ जुड़ने से यह पार्टी भी ताकतवर बनकर उभरी है। भाजपा से गठबंधन तोड़ चुकी एमजीपी ने राज्य के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पार्सेकर के खिलाफ मांदेय विधानसभा क्षेत्र में प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है। एमजीपी ने पहले ही पार्सेकर के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था। सुदीप फवलीकर ने आरोप लगाया कि पार्सेकर के कार्यकाल में राज्य 10 साल पीछे चला गया है। पुर्तगाल से आजाद होने के बाद एमजीपी ने राज्य में पहली सरकार बनाई थी। राज्य के पहले दो मुख्यमंत्री भी इसी पार्टी के थे। 18 साल तक गोवा में एमजीपी की ही सत्ता रही। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी तीन सीटें ही जीत पाई थी। चुनाव में प्रमुख मुद्दों पर नजर डालें तो नशे के कारोबार पर अंकुश लगाना सबसे बड़ी चुनौती है। गोवा अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाने के लिए आतुर है। दोहरी नागरिकता भी बड़ा मुद्दा है। राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था भी चिन्ताजनक रही है। कुल मिलाकर मुकाबला तगड़ा है। भाजपा के लिए दोबारा सत्ता हासिल करना आसान नहीं लग रहा है।

-अनिल नरेन्द्र

क्यों न हों जवाबदेह ये गैर सरकारी संगठन?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) को जवाबदेही के दायरे में लाने के लिए उनके खातों का 31 मार्च तक ऑडिट कराने के निर्देश का स्वागत है। वार्षिक लेखाजोखा न देने वाले गैर सरकारी संगठनों को सिर्फ काली सूची में डालने को अपर्याप्त बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ऐसे एनजीओ के खिलाफ दीवानी और आपराधिक कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया है। साथ ही शीर्ष अदालत ने सरकार से पूछा कि आखिर गैर सरकारी संगठनों एवं समितियों के कोष और उनके उपयोग की निगरानी के लिए अब तक कोई नियामक व्यवस्था क्यों नहीं है? किस्म-किस्म के गैर सरकारी संगठन कहां से कितना धन हासिल करते हैं और उसे किस तरह खर्च करते हैं, यह सब सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था का निर्माण तो बहुत पहले कर दिया जाना था यानि अब हर एनजीओ को जनता के पैसों का हिसाब देना होगा। देशभर में लगभग 32 लाख एनजीओ हैं, जिनमें से केवल तीन लाख ही अपनी बैलेंस शीट फाइल करते हैं। उन पर निगरानी रखने के लिए कोई समुचित विकसित तंत्र भी नहीं है। प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर, न्यायमूर्ति एनवी रमण और न्यायमूर्ति धनंजय चन्द्रचूड़ की बैंच ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए गबन करने वाले एनजीओ के खिलाफ फौजदारी मुकदमा चलाने का भी निर्देश दिया। हाल में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने करीब 20 हजार गैर सरकारी संगठनों के विदेश से पैसा लेने के लाइसेंस को इसलिए रद्द किया था, क्योंकि वे विदेशी चन्दा नियमन कानून के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन कर रहे थे। क्या इस बारे में सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि जो गैर सरकारी संगठन विदेश से पैसा नहीं ले रहे हैं वे अपना काम सही तरह कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि ऐसे संगठनों के खातों का कोई ऑडिट नहीं होता। यह तो एक तरह की अंधेरगर्दी ही है कि देश में करीब 30 लाख गैर सरकारी संगठन हैं लेकिन इनमें से मुश्किल से तीन लाख ही अपने आय-व्यय का विवरण देते हैं। लेकिन जनता के पैसों के साथ धोखाधड़ी करने वाले एनजीओ का यह एक पक्ष है। यानि सिर्फ एनजीओ ही इसके लिए अकेले जिम्मेदार नहीं हैं। इसमें चार तरह के गठजोड़ शामिल हैं, जो मिलजुल कर हेराफेरी और गबन करते हैं। मसलन, केंद्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड, कपार्ट और जिला ब्लॉक स्तर पर कार्यरत सरकारी संस्थाएं जिन्हें दाता (डोनर एजेंसी) संस्था कहा जाता है। दूसरे एनजीओ के कामकाज को मॉनिटर करने वाले, तीसरे ऑडिटर व सीए व चौथा खुद एनजीओ। सबसे गंभीर बात यह है कि कई गैर सरकारी संगठन पर्यावरण और मानवाधिकारों की रक्षा के बहाने विकास विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं। आमतौर पर संदिग्ध किस्म के गैर सरकारी संगठनों के खिलाफ कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि स्पष्ट नियम-कानूनों का अभाव है।

Friday, 13 January 2017

लातों के भूत बातों से नहीं मानते, पाक बाज आने वाला नहीं

पठानकोट की तरह एक बार फिर साल के शुरू में ही जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमला हुआ। जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर में रविवार रात एक बजे आतंकियों ने जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स के शिविर पर हमला करके शिविर में काम करने वाले तीन मजदूरों को मौत के घाट उतार दिया। शिविर पर पहले हथगोले फेंके, फिर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, वहां रखे वाहनों और दफ्तरी दस्तावेजों में आग लगाई और अंधेरे तथा कोहरे का फायदा उठाकर भागने में सफल रहे। उस वक्त शिविर में 10 कर्मचारी और 10 मजदूर मौजूद थे। आतंकी हमले में तीन मजदूर मारे गए। इससे पहले, आतंकियों ने जम्मू के ही नगरोटा क्षेत्र में सेना के एक शिविर पर हमला बोला था, जिसमें दो अधिकारी समेत सात जवानों की जान गई थी। उसी दिन सांबा जिले में सीमा सुरक्षा बल के एक शिविर पर भी आतंकी हमला हुआ था। इन दहशतगर्दों ने 40 दिन बाद फिर हमला बोलकर यह जता दिया कि उनकी सक्रियता न सिर्फ बनी हुई है, बल्कि शायद और बढ़ गई है। आतंकियों ने जिस तरह धावा बोला उससे इसी अंदेशे को बल मिलता है कि इन आतंकियों के लिए भारतीय सीमा को भेदना अभी भी आसान बना हुआ है। इससे आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के मुकम्मल होने पर एक बार फिर सवाल उठते हैं। दूसरे, नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूट जाने के सरकार के दावे पर भी सवालिया निशान लगता है। यह समझना कठिन है कि नियंत्रण रेखा से महज दो किलोमीटर निकट भी सुरक्षा व्यवस्था इतनी पुख्ता क्यों नहीं है कि आतंकी इतनी आसानी से हमले को अंजाम दे रहे हैं? न केवल हमला ही करते हैं, हमला करने के बाद भागने में भी सफल हो रहे हैं? पिछले साल सितम्बर में सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद खूब बढ़चढ़ कर ये दावे किए गए थे कि अब घुसपैठ करने और यहां आकर कोई वारदात करने से पहले आतंकी सौ बार सोचेंगे। 38 आतंकियों को ढेर कर देने तथा सीमा पार स्थित आतंकी ढांचा नष्ट कर देने के दावे से यह भी लगा था कि अब आतंकियों की ताकत बहुत कम हो गई है। लेकिन ये उम्मीदें अब धूमिल होती जा रही हैं। वस्तुस्थिति जो भी हो, इस आशंका को दूर किया जाना चाहिए कि पहली बात कि आतंकियों के लिए अब भी हमारी सीमा में घुसना, दूसरा इतनी आसानी से हमला करना अब भी संभव है। सीमा पर सुरक्षा को प्राथमिकता देना और अभेद्य बनाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि पठानकोट, उड़ी और नगरोटा में हुए भीषण आतंकी हमलों ने यह साबित कर दिया है कि वह जब चाहें, जहां चाहें हमले को अंजाम दे सकते हैं। सेना के शिविरों पर हमलों के बाद भारत सरकार को यह भी समझ लेना चाहिए कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। पाकिस्तान के रुख-रवैये में कोई बदलाव आने की उम्मीद नहीं, हमें अपना घर पक्का करना होगा।