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Friday, 12 April 2019

कठिन है डगर भाजपा की जम्मू-उधमपुर चुनाव में

आतंकी हमले की दहशत झेल रहे जम्मू-कश्मीर की दो सीटों पर दूसरे चरण में 18 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। जम्मू तथा बारामूला के दो संसदीय क्षेत्रों में किस्मत आजमा रहे 33 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला 33 लाख मतदाता करेंगे। जम्मू संसदीय क्षेत्र में 24 उम्मीदवार मैदान में हैं जबकि बारामूला में नौ उम्मीदवार सीट के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। जम्मू संसदीय क्षेत्र चार जिलों में 20 विधानसभा क्षेत्रों में फैला हुआ है, जिनमें जम्मू, सांबा, पूंछ और राजौरी शामिल हैं। संसदीय सीट पर कुल 20,472,29 वोटर हैं। जम्मू-पूंछ तथा उधमपुर, कठुआ के संसदीय क्षेत्रों में भाजपा के लिए अपना गढ़ बचाए रखने की चुनौती पैदा हो गई है। ऐसा तीन विपक्षी दलों द्वारा किए गए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समझौते के कारण है। ऐसे में भाजपा उम्मीदवारों को सिर्प मोदी के नाम का सहारा है। भाजपा ने दोनों ही लोकसभा सीटों पर अपने पुराने चेहरों को मैदान में उतारा है। जम्मू से वर्तमान सांसद जुगल किशोर शर्मा तथा उधमपुर से मंत्री व सांसद जितेन्द्र सिंह किस्मत आजमा रहे हैं। हालांकि दोनों ही संसदीय क्षेत्रों में विपक्षी पार्टियों के उम्मीदवार दम-खम तो नहीं रखते पर चिन्ता का विषय यह है कि कांग्रेस के उम्मीदवार को मगर प्रत्यक्ष तौर पर नेशनल कांफ्रेंस तथा अप्रत्यक्ष तौर पर पीडीपी का समर्थन प्राप्त है। जम्मू से कांग्रेस की ओर से पूर्व मंत्री रमण भल्ला को उतारा है। वह राज्य सरकार में विकास-पुरुष के नाम से जाने जाते थे। जबकि उधमपुर से कांग्रेसी उम्मीदवार डॉ. कर्ण सिंह के सुपुत्र विक्रमादित्य राजघराने से हैं। उनके पिता डॉ. कर्ण सिंह चार बार इस लोकसभा क्षेत्र से विजयी हो चुके हैं। जानकारी के लिए पिछले चुनावों में भी दोनों संसदीय क्षेत्रों से नेशनल कांफ्रेंस ने बिना समझौते के इन लोकसभा क्षेत्रों से प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे थे लेकिन इस बार बाकायदा दोनों दलों में समझौता हुआ है और पीडीपी ने सांप्रदायिक वोटों को बंटने से रोकने की खातिर दोनों ही संसदीय क्षेत्रों से मैदान में अपने उम्मीदवार न उतारने का फैसला किया है। विपक्ष के साझे उम्मीदवारों के अतिरिक्त भाजपा को अपने ही असंतुष्ट और दबंग नेता चौधरी लाल सिंह से भी निपटना होगा। वह भाजपा को छोड़कर डोगरा लोगों के हितों की रक्षा के लिए बना गए संगठन डोगरा-स्वाभिमान के बैनर तले दोनों ही संसदीय क्षेत्रों से किस्मत आजमा रहे हैं। भाजपा को पीडीपी सरकार बनाने का भी खामियाजा भुगतना पड़ेगा। जम्मू क्षेत्र की अपेक्षा की गई और उतना विकास नहीं हुआ जिसकी भाजपा से उम्मीद की जा रही थी। पिछले पांच सालों में जम्मू क्षेत्र में आतंकवाद भी बढ़ा और आतंकी हमले भी ज्यादा हुए। जम्मू क्षेत्र के यह चुनाव राष्ट्र महत्व रखते हैं। हिन्दू बहुल इस क्षेत्र में अगर भाजपा पिछड़ जाती है तो घाटी में तो उसका सफाया तय है। भाजपा नेतृत्व को आरंभ से ही समीक्षा करनी होगी कि जब उनकी सरकार थी तो उन्होंने जम्मू क्षेत्र को क्यों नजरंदाज किया? मुख्य मुकाबला भाजपा बनाम विपक्षी सांझे उम्मीदवार के बीच होगी। कोई भी हारे-जीते अंतत जीत तो भारतीय लोकतंत्र की ही होगी।

-अनिल नरेन्द्र

मैं कैद में हूं, मेरे विचार नहीं

चारा घोटाले में सजा काट रहे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के लोकसभा चुनाव में जेल से बाहर आने के मंसूबों पर पानी फिर गया है। सुप्रीम कोर्ट ने करोड़ों रुपए के चारा घोटाले मामले में लालू जी की जमानत याचिका बुधवार को खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने कहा कि वह लालू को जमानत पर रिहा करने के इच्छुक नहीं हैं क्योंकि वह दंडित ठहराए गए व्यक्ति हैं। पीठ ने लालू के 24 महीनों से जेल में होने की दलीलों को खारिज कर दिया और कहा कि उन्हें दी गई 14 साल जेल की सजा की तुलना में 24 महीने कुछ भी नहीं हैं। बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान खासकर चुनावी सभाओं में मतदाता को नेताओं का यह चुटीला अंदाज नहीं मिल पा रहा है जो लालू प्रसाद की देसज बोली में मिलता था। उनको गांव और शहर के लोग भी याद करते हैं। बगैर लालू प्रसाद उन्हें सुनसान-सा महसूस हो रहा है। तेजस्वी हरेक सभा में मतदाताओं को यह बताने से नहीं चूकते कि पिता लालू प्रसाद यादव को फंसाया गया है। वह जेल से बाहर रहते तो एससी/एसटी एक्ट में संशोधन करने की मजाल नहीं थी किसी की। यह अलग बात है कि ग्रामीणों के जहन में इसका कितना असर होगा। सही तस्वीर तो मतदान के दिन और वोटों की गिनती से पता चलेगी। मगर इतना जरूर है कि वोट देना तो अलग लालू की कमी उन्हें जरूर खल रही है। गांव के मतदाताओं को लुभाने के लिए राजद ने नारा गढ़ा है। करे के बा...लड़े के बा...जीते के बा। यह नारा बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बोल से कुछ मिलता-जुलता है। वहीं लालू ने सुप्रीम कोर्ट से जमानत याचिका खारिज होने के बाद बुधवार को ही जेल से जनता को खुला पत्र लिखा है। रांची के रिम्स में भर्ती लालू प्रसाद यादव ने पत्र में लिखा है कि जब लोकतंत्र का उत्सव चल रहा है, वह रांची के अस्पताल में बैठ कर सोच रहे हैं कि विध्वंसकारी शक्तियां क्या उन्हें कैदा करवाकर बिहार में षड्यंत्र की पटकथा लिखने में सफल होंगे। लालू प्रसाद ने लिखा है कि वह कैद में हैं, उनके विचार नहीं। राजद के फेसबुक व ट्विटर प्रोफाइल पर लालू का पत्र साझा किया गया है। लालू ने लिखा है कि लड़ाई आर-पार की है। उनके गले में सरकार और चालबाजों का फंदा कसा हुआ है। उम्र के साथ शरीर साथ नहीं दे रहा है पर आन-बान की लड़ाई में ललकार हमेशा रहेगी। लालू ने लिखा है कि लड़ाई संविधान में दी गई हिफाजत की लड़ाई है। आरक्षण और संविधान विरोधी सरकार को खदेड़ने के लिए करो या मरो वाले जज्बे की जरूरत है। लालू ने लिखा है कि देश-समाज के लिए उनकी जंग जारी रहेगी। गुरु गोविंद सिंह के बच्चों की तरह उन्हें भी दीवार में भी चुनवा दिया जाएगा तो भी वह पीछे नहीं हटेंगे। हमारे गरीब-गुरबा लोग जो मंडल जी, कुशवाहा जी, यादव जी, बिंद जी, साहनी जी, पासवान जी, मांझी जी कहने लगे थे, वह जाति-सूचक नाम से बुलाए जाएंगे। दुश्मन आपकी ताकत को तोल रहा है। लालू पिछले कुछ महीनों से रांची के राजेन्द्र चिकित्सा विज्ञान संस्थान (रिम्स) में उपचाराधीन हैं।

सुप्रीम कोर्ट के ताजे फैसले से मोदी को करारा झटका

केंद्र सरकार को चुनाव से पहले तगड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राफेल विमानों के सौदे में अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए लीक दस्तावेजों को आधार बनाने की अनुमति दे दी और उन दस्तावेजों पर विशेषाधिकार होने की केंद्र की प्रारंभिक आपत्तियों को खारिज कर दिया। फैसले में कहा कि पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान न सिर्प विमानों की कीमत के मुद्दे पर बल्कि राफेल का निर्माण करने वाली कंपनी दसाल्ट के भारतीय ऑफसेट पार्टनर के चयन के मुद्दे पर भी पड़ताल करेगी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने एक मत से दिए फैसले में कहा कि जो नए दस्तावेज डोमेन में आए हैं, उन आधारों पर मामले में रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई होगी। बेंच में सीजेआई के अलावा जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ शामिल हैं। इस फैसले से भाजपा को चुनाव से ठीक पहले करारा झटका लगना स्वाभाविक है। पिछले दिसम्बर में राफेल पर पाकसाफ होने और राहत पाने का दावा कर रही भाजपा और मोदी सरकार को इसलिए भी झटका लगा है क्योंकि अब कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास करेंगी। सरकार और भाजपा कोर्ट के पिछले फैसले को आधार बनाकर खुद को क्लीन चिट मिलने का दावा कर रहे थे। लेकिन अब विपक्ष खासकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर ज्यादा हमलावर नजर आएंगे। कोर्ट ने सरकार द्वारा चोरी के बताए कागजात पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है। सरकार ने इन कागजात के आधार पर सुनवाई न करने के दलील के साथ कई बातें देश की सुरक्षा के सवालों पर अदालत में कही थी। पहले कहा गया कि फाइल चोरी हो गई, फिर कहा गया कि फाइल तो चोरी नहीं हुई, फाइल से कुछ दस्तावेज चोरी हो गए हैं और इन चोरी के दस्तावेजों का संज्ञान न लिया जाए। सरकार ने कहा था कि जो दस्तावेज प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने कोर्ट में पेश किए हैं, वह प्रिविलेज्ड दस्तावेज हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं। यह दस्तावेज गोपनीय हैं और आरटीआई में उपवाद में हैं। इस दौरान याचिकाकर्ता वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि यह तमाम दस्तावेज पब्लिक डोमेन में हैं। जो दस्तावेज पहले से लोगों के सामने हैं उस पर कोर्ट विचार न करे क्योंकि वह प्रिविलेज्ड दस्तावेज हैं, यह बेकार की दलील है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से जहां केंद्र और मोदी को करारा झटका लगा है वहीं विपक्ष इसे अपनी विजय के रूप में देख रहा है। बुधवार को कांग्रेस ने कहा कि राफेल लड़ाकू विमान सौदे का सच सामने आ गया है और इस मामले में अब न्याय होगा। राहुल गांधी ने कहा कि अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि चौकीदार जी ने चोरी कराई... यह मैं पिछले कई महीनों से कह रहा हूं कि प्रधानमंत्री ने वायुसेना के पैसे अनिल अंबानी को दिए और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकार कर लिया है। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में जांच की गुहार से संबंधित अर्जी 14 दिसम्बर 2018 को खारिज कर दी थी जिसके बाद रिव्यू पिटीशन दाखिल की गई जिस पर आसन कोर्ट में सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच ने मामले की सुनवाई की। 14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस एतराज पर ऑर्डर रिजर्व कर लिया था कि प्रिविलेज्ड दस्तावेज पर सुनवाई होगी या नहीं। बेंच ने एक मत से फैसला दिया था। क्या है यह तीन दस्तावेजöपहला, आठ पेज का नोट, जिसमें भारतीय नेगोशिएटिंग टीम के तीन सदस्यों का जिक्र है। दूसरा, मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस के गोपनीय दस्तावेज और तीसरा डिप्टी सैकेटरी की नोटिंग। कांग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने न्यायालय के बुधवार के आदेश को न्याय की दिशा में पहला कदम करार दिया और कहा कि इस मामले में न्याय संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की जांच से होगी। उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि राफेल की चोरी की परतें खुलती जा रही हैं। मोदी जी के झूठ का किला ध्वस्त हो गया। वामदल भाकपा और माकपा ने भी न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि मोदी सरकार ने देश की सुरक्षा से जो समझौते किए हैं उनका सच अब सामने आएगा। सुरजेवाला ने कहा कि मोदी जी आप झूठ बोलकर जितना चाहे भाग  लें, लेकिन जल्द सच सामने आ जाएगा। अब उसे छिपाने के लिए कोई ऑफिशियल सीकेट एक्ट नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने फिर सम्मानित कानूनी सिद्धांत को बरकरार रखा है। मोदी जी चिन्ता मत करो, अब जांच होने वाली है। आप इसे पसंद करें या न करें। दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि मोदी जी हर जगह कह रहे थे कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राफेल में क्लीन चिट मिली है। आज के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साबित हो गया कि मोदी जी ने राफेल में चोरी की है, देश की सेना से धोखा किया है और अपना जुर्म छिपाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया है। राहुल गांधी द्वारा राफेल डील को लेकर चौकीदार चोर है का नारा कई महीने से लगाया जा रहा है। जवाब में पीएम मोदी ने `हम सब चौकीदार' अभियान देश में शुरू कर दिया। लेकिन कांग्रेस और राहुल गांधी के हमले अब ज्यादा तीखे हो सकते हैं। पहले चरण की 91 सीटों पर प्रचार तो समाप्त हो चुका है लेकिन बाकी सीटों पर प्रचार अभी चल रहा है। जानकार मानते हैं कि राफेल डील मुद्दे का ज्यादा असर शहरी क्षेत्र में ज्यादा पड़ रहा है पर गांव-गांव तक नहीं पहुंच पाया है। इसका प्रभाव अर्बन वोटर पर हो सकता है, ग्रामीण वोटरों पर शायद ही पड़े। दूसरी तरफ बालाकोट स्ट्राइक से उपजी राष्ट्रवाद की भावना ज्यादातर जगहों पर फैल चुकी है। इन हालात में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस यह साबित करने की कोशिश करेगी कि राफेल डील में भ्रष्टाचार हुआ है और इसमें सीधे तौर पर प्रधानमंत्री खुद शामिल हैं। मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धता भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा है। जहां कांग्रेस अब राफेल पर चुनाव लड़ सकती है वहीं भाजपा का प्रयास यही होगा कि पूरा चुनाव राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर नहीं जाए।

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 11 April 2019

15 लाख हर खाते के वादे की हकीकत?

पिछले लोकसभा चुनाव पचार के दौरान क्या पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह वादा किया था कि कालाधन वापस लाकर हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपए जमा कराए जाएंगे या नहीं? भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व पेंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र ने शनिवार को चंडीगढ़ में इस विषय पर पूछे गए सवाल पर कहा, मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि हमने 15 लाख रुपए का कोई वादा नहीं किया था। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने सभी के बैंक खातों में 15 लाख रुपए का वादा 2014 के लोकसभा से पहले नहीं किया था। मिश्र ने इस मुद्दे पर लोगों को भ्रमित करने के लिए दुष्पचार करने का विपक्षी दलें पर आरोप लगाया। रविवार 7 अपैल को छत्तीसगढ़ के बालोद दौरे से पहले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पधानमंत्री पर हमला करते हुए देश और पदेश की जनता से किए गए उनके वादों पर 20 सवाल पूछे। इनमें एक सवाल 15 लाख खाते में डाले जाने के बारे में था। इस पर पलटवार करते हुए भाजपा सांसद रामविचार नेताम ने सीएम बघेल समेत पूरी कांग्रेस को चुनौती दी थी कि अगर वे मोदी के ऐसे किसी भाषण का वीडियो लाते हैं तो भाजपा उन्हें एक करोड़ का इनाम देगी। कांग्रेस दावा कर रही है कि उन्होंने कांकेर का वह वीडियो ढूंढ़ लिया है पर भाजपा का इनाम जरूर ठुकरा दिया। भाजपा का कहना है कि इस वीडियो में हर खाते में 15 लाख रुपए आने की बात है, जमा करने की नहीं। बता दें कि कांकेर में 7 नवंबर 2013 को नरेन्द्र मोदी की सार्वजनिक रैली हुई थी। मोदी ने मंच से कहा था, `पूरी दुनिया कहती है कि भारत में सभी चोर-लुटेरे अपना पैसा बैंकों में जमा करते हैं। विदेशों के बैंकों में काला धन जमा है। कांकेर के मेरे भाइयों और बहनों ... मुझे बताओ, यह चोरी का पैसा वापस आना चाहिए या नहीं? यह कालाधन वापस आना चाहिए या नहीं? क्या हम इन बदमाशों द्वारा जमा किए गए हर पैसे को वापस लेना चाहिए या नहीं? क्या इस धन पर जनता का अधिकार नहीं है? क्या इस धन का उपयोग जनता के काम के लिए नहीं किया जाना चाहिए? अगर एक बार भी विदेशों के बैंकों में इन चोर-लुटेरों द्वारा जमा किया गया धन हम वापस लाते हैं तो हर गरीब भारतीय को 15 से 20 लाख रुपए तक मुफ्त मिलेगा। वहां इतना पैसा है।' पिछले लोकसभा  चुनाव के दौरान पीएम मोदी के देश के हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपए डालने संबंधी इस बयान के बाद राज्य  विधानसभा चुनाव में भी यह मुद्दा छाया रहा। इसी दौरान 2016 में आरटीआई एक्टिविस्ट मोहन कुमार शर्मा ने पीएमओ में आरटीआई लगाकर पूछा था कि हर खाते में 15 लाख रुपए जमा करने का मोदी का वादा कब पूरा होगा? जवाब नहीं मिलने पर मामला केन्द्राrय सूचना आयोग पहुंचा। तब पधानमंत्री कार्यालय ने 26 नवंबर 2016 को आयोग को भेजे जवाब में कहा था कि हर खाते में 15 लाख रुपए जमा होने के वादे को पूरा करने की तारीख बताना सूचना के अधिकार कानून के तहत सूचना के दायरे में नहीं आता, लिहाजा इस बारे में कोई जवाब नहीं दिया जा सकता।

-अनिल नरेन्द्र

सबको समेटने का पयास है भाजपा का संकल्प पत्र

भारतीय जनता पार्टी ने सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव के पहले चरण के मतदान से तीन दिन पहले अपने घोषणा पत्र में राष्ट्रवाद को सबसे अहम बिंदु बताया है। कांग्रेस की न्याय स्कीम का मुकाबला करने के लिए बीजेपी ने किसानों, गरीब और छोटे दुकानदारों के लिए लोकलुभावन घोषणाओं का भी ऐलान किया है। पुलवामा में सीआरपीएफ पर हुए आतंकी हमले और बालाकोट में भारतीय वायुसेना द्वारा आतंकी शिविर पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बीजेपी राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाने में काफी हद तक सफल रही है। बीजेपी के घोषणा पत्र में पाकिस्तान में हवाई हमले को  भुनाने की कोशिश की गई है। राष्ट्रीय सुरक्षा को अहम बताते हुए कहा गया है कि सरकार न सिर्प आतंकवाद पर जीरो टॉयरेंस की नीति रखेगी, बल्कि देशभर के नागरिकता रजिस्टर से घुसपैठियों की समस्या हल करेगी। पूर्वोत्तर के लोगों की भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान की रक्षा के लिए सिटीजनशिप बिल पारित कराने का वादा भी किया है। बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में समाज के हर तबके के लिए कुछ न कुछ वादे जरूर किए हैं। जबसे कर्ज माफी का वादा कर कांग्रेस ने तीन राज्य जीते हैं, किसान हीरो हो गया है। अच्छी बात यह है कि पार्टियों का अंतत फोकस अन्नदाता की तरफ लौट रहा है। कांग्रेस ने पांच करोड़ गरीब परिवारों को 6 हजार रुपए महीने देने का वादा किया है। भाजपा संकल्प पत्र में कांग्रेसी वादों की तोड़ लाई है। छोटे किसानों के साथ दुकानदारों को भी पेंशन देकर भाजपा ने शहर और गांव दोनों के मतदाताओं को लुभाने की घोषणा की है। सबसे ज्यादा व्यावहारिक घोषणा यह है कि किसान केडिट कार्ड पर एक लाख तक का कर्ज बिना ब्याज के मिलेगा। लगभग हर किसान इसका इस्तेमाल करता है। किसान को सबसे ज्यादा फायदा भी इसी से होगा। फसल खराब हो गई तो वह बिना ब्याज का कर्ज दूसरे, तीसरे साल भी लौटा सकेगा। किसानों को फसल का दुगुना दाम दिलाने का भाजपा का वादा पुराना है। पिछली बार भी यह वादा किया गया था, लेकिन कुछ हुआ नहीं। पार्टी ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाने का वादा भी किया है। लेकिन पूर्ण बहुमत के बावजूद वह इससे हिचक रही थी तो उसके पीछे की राजनीतिक बाध्यताओं को समझा जा सकता है। सकंल्प पत्र का हिस्सा बनाकर उसने नई बहस का मुद्दा जरूर बना दिया है। इसकी तीखी पकिया कश्मीर के नेताओं में देखने को मिल रही हैं। हालांकि धारा 370 पर अपने विचार पर केवल कायम रहने की बात कही गई है। इसका कारण इसे हटाने संबंधी संवैधानिक एवं राजनीतिक जटिलताएं भी हैं। किंतु जम्मू-कश्मीर के संबंध में किसी तरह की भावुकता भरा वादा इसमें नहीं है। इसका अर्थ हुआ कि यदि भाजपा सत्ता में लौटती है तो अलगाववादियों एवं मजहबी कट्टरपंथियों के पति कठोरता तथा सुरक्षा बलों की कार्रवाई इसी स्थिति में जारी रहेगी। पार्टी ने नागरिकता संशोधन बिल फिर लाने की बात की है, जिससे लगता है कि इन दोनों मुद्दों के जरिए वह उन राज्यों से अधिक पूरे देश को संदेश देना चाहती है। पधानमंत्री मोदी सीमांत और छोटे किसानों की 2022 तक आय दुगुनी करने की बात पहले भी कह चुके हैं। मगर संकल्प पत्र में इसकी व्यापक रूपरेखा पस्तुत नहीं की गई है, जिससे पता चलता है कि जीडीपी में महज 17 फीसदी की हिस्सेदारी करने वाला कृषि क्षेत्र में इस सुधार के लिए पैसा कहां से आएगा? राम मंदिर को लेकर भाजपा ने 2014 के घोषणा पत्र में भी जिक किया था। पर दुख से कहना पड़ता है कि इस बार भी कोई ठोस वादा नहीं किया गया। पिछली  बार की तरह इस बार भी मामला सुपीम कोर्ट पर छोड़ दिया गया है। 2014 के घोषणा पत्र में रोजगार को बढ़ावा देने की बात कही गई थी। कहा गया था कि उद्योगों पर ध्यान दिया जाएगा और रिटेल क्षेत्र को आधुनिक चेहरा दिया जाएगा? इसके साथ लोन और मार्केट लिंकेज भी देने की बात कही गई थी। 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा भी किया गया था। जमीनी हकीकत यह है कि पिछले पांच सालों में बेरोजगारी रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई है। नोटबंदी और जीएसटी के कारण सैकड़ों छोटी फैक्टरियां बंद हो गई हैं और हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं। कालेधन पर टास्क फोर्स बनाएंगे और विदेश में रखी गई ब्लैक मनी को वापस लाने की पकिया शुरू की जाएगी। टैक्स की दरों में कमी की जाएगी और टैक्स व्यवस्था को सिंपल बनाया जाएगा। सत्ता में आने के बाद बेशक एक टास्क फोर्स तो बनी पर विदेश में काला धन देश में लाने में कोई पगति नहीं हुई। यही वजह है कि जनता पार्टियों के घोषणा पत्रों को ज्यादा महत्व नहीं देतीं। वह काम देखती हैं। पिछले पांच वर्षों में भाजपा कितने कामों पर खरी उतरी इस पर ही वोट मिलेंगे, वादों पर नहीं।

Wednesday, 10 April 2019

पैसा किस पर खर्च होता है यह कोर्ट तय नहीं कर सकता

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने अपने शासनकाल में मूर्तियों की स्थापना को सही कदम मानते हुए सुप्रीम कोर्ट को भेजे जवाब में साफ कहा है कि पैसा शिक्षा के साथ अस्पताल या फिर मूर्तियों पर खर्च हो, यह कोर्ट तय नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में दलित नेता ने कहा है कि सभी राजनीतिक दलों ने प्रतिमाओं पर पानी की तरह पैसा बहाया है। लेकिन सिर्प मेरी प्रतिमाओं पर आपत्ति जताई जा रही है। भाजपा सरकार ने केंद्र, राज्य सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के सीएमआर एंड से गुजरात में सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा लगाई। इस पर तीन हजार करोड़ खर्च किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने लखनऊ के लोक भवन में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 25 फुट ऊंची प्रतिमा लगाई। यह सरकारी पैसे से बनाई गई। लखनऊ में ही स्वामी विवेकानंद और गोरखपुर में महंत अवैद्यनाथ और दिग्विजय नाथ की 12 फुट से अधिक की प्रतिमा सरकारी पैसे से बनाई जानी है। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ गोरखपुर पीठ के प्रमुख हैं। मायावती ने उत्तर प्रदेश में अपनी आदम-कद प्रतिमाएं बनाए जाने के कदम पर सुप्रीम कोर्ट में बचाव करते हुए कहा कि लखनऊ और नोएडा के पार्कों में खड़ीं उनकी प्रतिमाएं लोगों की इच्छा जाहिर करती है। यह जनभावना का प्रतीक है। उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में वंचित और दलित समुदाय के लिए किए गए उनके काम और त्याग को देखते हुए और दलित महिला नेता होने के नाते उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हुए जनभावना के प्रतीक के तौर पर उनकी मूर्तियां लगाई गई हैं। मायावती ने अपने हलफनामे में अपनी मूर्तियों के निर्माण पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाने को लेकर वकील रविकांत ने इन मूर्तियों के निर्माण में सरकारी खर्च को मायावती और बसपा से वसूले जाने की याचिका दायर की है। मांग की गई है कि सरकारी खर्च से निर्मित हुईं इन मूर्तियों पर खर्च किया गया सरकारी धन का दुरुपयोग है और इसे मायावती और उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी से वसूल किया जाए। मायावती ने कहा कि हमने लोगों को प्रेरणा दिलाने के लिए स्मारक बनवाए थे। इन स्मारकों में हाथियों की मूर्तियां केवल वास्तुशिल्प की बनाकर माना है और बसपा के प्रतीक का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। सुप्रीम कोर्ट ने आठ फरवरी को मत व्यक्त किया था कि मायावती को उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्थानों पर अपनी पार्टी के चिन्ह हाथी की मूर्तियां लगाने के लिए  इस्तेमाल किए गए सार्वजनिक कोष सरकारी राजकोष में जमा करानी चाहिए। अदालत ने कहा था कि सुश्री मायावती सारा पैसा वापस करिए। हमारा मानना है कि मायावती को खर्च किए गए सारे पैसे का भुगतान करना चाहिए। अब देखें कि सुप्रीम कोर्ट मायावती के हलफनामे पर क्या प्रतिक्रिया देता है, क्या फैसला करता है?
-अनिल नरेन्द्र



विपक्षी नेताओं पर ही ईडी-आयकर छापे क्यों?

यह अजीब इत्तेफाक है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान होने से कुछ ही समय पहले विपक्षी नेताओं पर आयकर छापे पड़ने लगे हैं। मध्यप्रदेश में लोकसभा के पहले चरण की वोटिंग 11 अप्रैल से आरंभ होगी। मध्यप्रदेश में चौथे चरण में 23 अप्रैल को छह सीटों पर मतदान होना है। ठीक 15-16 दिन पहले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबियों पर आयकर विभाग ने छापे मारे। आयकर विभाग ने रविवार को मध्यप्रदेश, दिल्ली और गोवा के 50 ठिकानों पर छापेमारी की। इस कार्रवाई में 500 आयकर अफसर शामिल थे। यह छापे सोमवार तक जारी रहे। निशाने पर थे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के निजी सचिव प्रवीण कक्कड़, भांजे रातुल पुरी, सलाहकार आरके मृगलानी, कक्कड़ के करीबी प्रतीक जोशी और अश्विन शर्मा के ठिकाने खंगाले गए। अब तक करीब 16 करोड़ रुपए मिलने की बात कही जा रही है। आयकर सूत्रों ने बताया कि ठोस इनपुट के बाद मध्यप्रदेश के भोपाल-इंदौर, गोवा और दिल्ली में एक साथ देर रात तीन बजे कार्रवाई शुरू की गई जो अगले दिन भी जारी रही। पिछले एक साल में आठ ऐसे मौके रहे हैं, जब किसी राज्य में चुनाव के आसपास ईडी व आयकर के छापे पड़े हैं। इनमें आंध्रप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, गुजरात व कर्नाटक शामिल हैं। 24 जनवरी इसी साल ईडी ने सपा सरकार द्वारा शुरू किए गए गौमती रिवर फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजैक्ट मामले में छापे मारे। सात दिसम्बर 2018 को रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी के दफ्तरों में ईडी ने छापेमारी की। 14 दिसम्बर 2018 को कोलकाता में एक साथ नौ जगहों पर छापे मारे। 1.65 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा पकड़ने का दावा किया गया। रेड के दौरान एक मौका ऐसा आया जब सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस के बीच टकराव की स्थिति भी पैदा हो गई। अश्विनी शर्मा के घर के बाहर सीआरपीएफ और पुलिस के बीच गाली-गलौज तक की नौबत आ गई। सीआरपीएफ ने पुलिस पर गाली देने और काम में रुकावट पैदा करने का आरोप लगाया। वहीं पुलिस ने आरोप लगाया कि सीआरपीएफ आम लोगों को परेशान कर रही है। इन छापेमारी से राजनीति तेज होना स्वाभाविक ही था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि पूरा देश जानता है कि संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल यह लोग पिछले पांच वर्षों से करते आए हैं। जब इनके पास विकास और अपने काम पर कुछ कहने के लिए नहीं बचता तो यह विरोधियों के खिलाफ हथकंडे अपनाते हैं। भाजपा को अपनी हार सामने नजर आ रही है इसलिए चुनाव में लाभ लेने के लिए इस तरह की कार्रवाई की जा रही है। पूरा देश जानता है कि यह लोग पांच वर्षों में किस तरह व किन लोगों के खिलाफ संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल करते हैं। इनका उपयोग कर डराने का काम करते हैं। भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कांग्रेस पर निशाना साधा और कहा कि ऐसा लगता है कि केवल चोरों को ही चौकीदार से शिकायत है। वहीं कांग्रेस नेता शोभा ओझा ने भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि यह कार्रवाई राजनीतिक बदला लेने के लिए की गई है। कांग्रेस की छवि खराब करने की यह भाजपा की बेकार कोशिश है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि चुनाव आयोग और आयकर विभाग की एजेंसियां चुनाव के दौरान काले धन पर नजर रखती हैं। यह उनका काम है। राजनीति से इसका कोई लेनादेना नहीं है, जो लोग बेइमानी करने के बाद रो रहे हैं उन्हें बताना चाहिए कि उनके आवासों से करोड़ों रुपए कैसे बरामद हो रहे हैं। हमारा मानना है कि चुनाव के दौरान सभी पार्टियां काले धन का इस्तेमाल करती हैं। इसमें कोई भी अछूती नहीं है। सिर्प विपक्षी नेताओं को निशाना बनाया जाए उसका मैसेज अच्छा नहीं जाता। क्या सत्तारूढ़ दल के नेताओं के पास काला धन नहीं है? क्या वह काले धन का चुनाव में इस्तेमाल करने से इंकार कर सकते हैं? क्या वजह है कि इन पर तो कोई ईडी या आयकर का छापा नहीं पड़ता? सिर्प विपक्षी नेताओं को ही टारगेट क्यों किया जाता है? वैसे इससे फर्प भी ज्यादा नहीं पड़ता क्योंकि आम जनता जानती है कि चुनाव के समय क्या-क्या हथकंडे अपनाए जाते हैं। जब विपक्षी दल सरकार में होगा वह तब भी यही करेगा। जनता ने अपना मन अब तक बना लिया है और इन हथकंडों से कोई फर्प नहीं पड़ता।