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Sunday, 14 June 2015

केजरीवाल जी पहले अपने घर की आग तो बुझाओ फिर भिड़ना

आप सरकार व पार्टी के सितारे गर्दिश में चल रहे हैं। एक के बाद एक विवाद में फंसती जा रही है केजरीवाल की सरकार व पार्टी। आप सरकार के लिए कानून विभाग के मंत्री विवाद की जड़ बने हैं। लगातार दो बार पार्टी की दिल्ली में सरकार बनी और दोनों ही बार कानून मंत्री कानूनी शिकंजे में फंसे हैं। 49 दिन की केजरीवाल की पहली सरकार में सोमनाथ भारती और इस बार जितेन्द्र सिंह तोमर पर कार्रवाई हुई है। पहले बात करते हैं सोमनाथ भारती की। सोमनाथ भारती की पत्नी लिपिका ने घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए दिल्ली महिला आयोग में शिकायत की है। आयोग ने उन्हें 26 जून को पेश होने का नोटिस जारी किया है। दिल्ली महिला आयोग में लिपिका ने कहा, `मैं मानसिक, शारीरिक रूप से प्रताड़ित हो रही हूं। इसका प्रभाव बच्चों पर भी पड़ रहा है। मेरी चार साल की बेटी रात में डर कर उठ जाती थी और कहती थी मम्मी को मत मारो।' लिपिका ने बताया, `मैंने सोमनाथ से प्रेम विवाह किया है।' विवाह से पहले भी वह मारपीट करते थे, लेकिन मैं चुप करके सहती रही। मेरे शरीर पर आज भी चोट के निशान हैं। 28 मई को भी सोमनाथ ने उनसे बेटी के सामने मारपीट की। इसके बाद मैंने महसूस किया कि अब इस शादी में कुछ नहीं बचा और मैंने अलग रहने का फैसला किया। लिपिका ने यह भी आरोप लगाया कि जब वह सात माह की गर्भवती थी तो सोमनाथ ने उन्हें कुत्ते से कटवाया था। अब बात करते हैं जितेन्द्र सिंह तोमर की। फर्जी डिग्री में गिरफ्तार दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री जितेन्द्र सिंह तोमर को पुलिस बुधवार सुबह फैजाबाद ले गई। पुलिस टीम उन्हें अवध विश्वविद्यालय लेकर गई, जहां उनकी डिग्री से संबंधित रिकार्ड खंगाला गया। तोमर की शैक्षिक योग्यता को लेकर जो कागजात विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंपे गए वे फर्जी निकले। जितेन्द्र सिंह तोमर को सत्र अदालत से भी राहत नहीं मिल पाई। अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ अदालत गए आप नेता तोमर को इससे करारा झटका लगा। अदालत ने राहत देने से इंकार करते हुए कहा कि उन्हें अंतरिम राहत प्रदान करने से मामला और जटिल हो जाएगा। इसके बाद अदालत ने पुलिस रिमांड के खिलाफ उनकी याचिका को खारिज कर दिया। सियासी फ्रंट पर केजरीवाल को तब और झटका लगा जब दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से जारी अधिसूचना पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। अधिसूचना में केंद्र ने केंद्रीय अधिकारियों पर कार्रवाई करने के प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के अधिकारों को छीन लिया था। जस्टिस एस मुरलीधर एवं जस्टिस आईएस मेहता की पीठ ने कहा कि यह मामला पहले से ही नियमित पीठ के समक्ष चल रहा है, यह अवकाशकालीन अदालत होने के कारण इस स्तर पर आदेश नहीं दे सकती। इतना कुछ हो रहा है और पार्टी मुखिया व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल केवल केंद्र सरकार और उपराज्यपाल से भिड़ने में लगे हुए हैं। आम आदमी पार्टी के अन्दर फर्जी डिग्री और पत्नी उत्पीड़न के दहकते मामलों से बेपरवाह मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जिस तन्मयता से दिल्ली के उपराज्यपाल पर निशाने साध रहे हैं वह बता रहा है कि उनको अपनी पार्टी की चिन्ता नहीं है और वह नरेंद्र मोदी की सरकार से भिड़ने के मौके देखते रहते हैं। केजरीवाल जी आप अपने घर को तो संभालो। केंद्र से तो बाद में भिड़ना पहले घर की आग तो बुझाओ।

-अनिल नरेन्द्र

पाकिस्तान की बौखलाहटö चोर की दाढ़ी में तिनका

तीन दशक के बाद भारतीय सेना ने म्यांमार में जिस दिलेरी से आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया वह अभूतपूर्व और ऐतिहासिक है। 45 मिनट में पूरा ऑपरेशन खत्म करने में हमारी सेना की कुशलता, क्षमता और समन्वय का नायाब नमूना सामने आया है। इसका यह मतलब भी निकाला जा सकता है कि हमारी सेना जवाबी कार्रवाई करने में हर तरह से सक्षम है, कमी रही तो सरकार की इच्छाशक्ति की। इस अत्यंत सफल ऑपरेशन से पाकिस्तान में हड़कम्प मचना स्वाभाविक है। पाकिस्तान के नेताओं की ओर से जैसे बयान सामने आ रहे हैं वे चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत को ही चरितार्थ कर रहे हैं। भारत की ओर से ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया जिस पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया अपेक्षित होती, लेकिन ऐसा लगता है कि उसने म्यांमार में की गई सैन्य कार्रवाई से निकले संदेश को समझने में देरी नहीं की। संभवत पाकिस्तान में यह देखकर सिरहन है कि भारत अब सिर्प प्रतिक्रिया नहीं बल्कि पहल करने की रणनीति पर चल चुका है। पिछले कुछ दशकों में यदि पाकिस्तान लगातार आतंकवाद के सहारे छद्म युद्ध छेड़कर भारत को लहूलुहान करने में कामयाब रहा है इसकी बड़ी वजह उसका यह भरोसा भी रहा है कि भारत किसी आतंकी कार्रवाई के बाद सीमित और संयमित प्रतिक्रिया ही देगा। यूपीए-2 सरकार के समय में ज्यादातर मौकों पर देखा भी गया कि बड़े आतंकी हमलों के बाद भारत ने अधिक से अधिक वार्ता स्थगित कर दीं। क्रिकेट संबंध तोड़ लिए लेकिन ऐसी कारगर कार्रवाई नहीं हुई जिसके जरिए षड्यंत्रकारियों या दोषियों को दंडित किया गया हो। एक तरह से यह अच्छा ही हुआ कि पाक ने परोक्ष रूप से यह मान लिया कि वह भारत में ऐसा कुछ कर रहा है जिसके लिए उसे जवाबदेह भी होना पड़ा सकता है और म्यांमार सरीखे की कार्रवाई का सामना भी करना पड़ सकता है। पूर्वोत्तर में भारतीय सेना के ताजा ऑपरेशन से संदेश निकलता है कि भारत अब खतरे का इंतजार नहीं करेगा बल्कि उसे उसके मूल पर जाकर समाप्त करेगा। पाकिस्तान में जैसी प्रतिक्रिया हुई है वह भय, हताशा और पुंठा का मिश्रण लगती है। यदि पाकिस्तान वाकई भारत के विरुद्ध आतंकवाद को एक रणनीति के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर रहा होता तो उसकी ओर से ऐसी प्रतिक्रिया की कोई वजह नहीं थी। लेकिन जिस तरह पाकिस्तानी नेताओं की ओर से बयान आ रहे हैं कि पाकिस्तान म्यांमार नहीं है, उसका अर्थ यही है कि भारत वहां चल रहे आतंकी अड्डों और आतंकी तंज पर निगाह डालने की जुर्रत न करे। बेहतर होगा कि ऐसी धमकियां देने और बौखलाहट के बजाय पाकिस्तान यह समझे कि उसकी शत्रुतापूर्ण गतिविधियों और आतंकवाद का निशाना बनते रहे भारत का धैर्य अब टूटने लगा है। निसंदेह म्यांमार की तरह पाकिस्तान में सैन्य कार्रवाई करना जोखिम भरा है, लेकिन इसे नामुमकिन भी मानकर नहीं चला जाना चाहिए। भारत को ऐसे संकेत देते रहने चाहिए कि उसके सब्र का पैमाना छलका तो कुछ भी कर सकता है। इस ताजा कार्रवाई ने जाहिर कर दिया है कि वह चीन और पाकिस्तान समेत आतंक के सभी आकाओं से हिसाब लेने को तैयार है। म्यांमार के सहयोगी रुख ने भारत की सफल विदेश नीति पर मुहर लगाई है।

Saturday, 13 June 2015

सिसोदिया के एनजीओ की विदेशी फंडिंग पर लगाम

केंद्र सरकार ने संदिग्ध गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के खिलाफ अपनी कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के संगठन कबीर समेत 4470 संगठनों के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के विदेशी योगदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत की गई इस कार्रवाई के बाद से एनजीओ अब विदेशों से धन हासिल नहीं कर सकेंगे। इन एनजीओ में शीर्ष विश्वविद्यालय, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट शामिल हैं। गृह मंत्रालय ने एफसीआरए के तहत इन एनजीओ की गतिविधियों की जांच के बाद इनके पंजीकरण को रद्द करने का फैसला लिया है। इन एनजीओ ने कथित रूप से अपनी वार्षिक रिटर्न दाखिल नहीं की थी और इनकी अन्य गतिविधियों में भी अनियमितता पाई गई थी। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि सभी एनजीओ को गृह मंत्रालय के विदेश विभाग द्वारा नोटिस भेजा गया था और लाइसेंस रद्द किए जाने से पहले सभी को जवाब देने के लिए पर्याप्त वक्त भी दिया गया था। जिन प्रमुख संगठनों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं उनमें पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़, गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, गार्गी कॉलेज दिल्ली, लेडी इरविन कॉलेज दिल्ली, विक्रम साराभाई फाउंडेशन भी शामिल हैं। अप्रैल में करीब 9000 एनजीओ पर विदेशों से चन्दा लेने पर रोक लगाई गई थी। उल्लेखनीय है कि इसी साल जनवरी में ग्रीन पीस इंडिया की कार्यकर्ता प्रिया पिल्लै को नई दिल्ली एयरपोर्ट से लंदन जाने वाले विमान पर सवार होने से रोक दिया गया था। वह ब्रिटिश संसद को संबोधित करने जा रही थी। हालांकि गृह मंत्रालय के इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट ने बाद में बदल दिया था। इसके बाद केंद्रीय सरकार ने अप्रैल में अमेरिकी संगठन फोर्ड फाउंडेशन की रकम से संचालित ग्रीन पीस के भारतीय बैंकों के सभी खातों को सील कर दिया था। इस पर्यावरण संगठन को अंतरिम राहत अदालत से ही मिली थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने ग्रीन पीस इंडिया को राहत देते हुए उसे रोजाना के कामों के लिए डोमैस्टिक डोनेशन लेने की इजाजत दी है। इसके लिए ग्रीन पीस के दो अकाउंट्स हैं। अदालत ने कहा कि यह एनजीओ घरेलू चन्दे के लिए इन दो एकाउंट्स का इस्तेमाल कर सकता है। अदालत ने सरकार से कहा कि एनजीओ के फंड के लिए उनका गला नहीं घोंट सकते।  हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव शकधर की बैंच ने एनजीओ ग्रीन पीस को इस बात की भी इजाजत दी कि वह अपने टर्म डिपाजिट का इस्तेमाल कर सकता है। अदालत ने सरकार से कहा है कि वह एफसीआरए के नियम के तहत आठ हफ्ते में फैसला ले। रकम के 25 फीसदी हिस्से का इस्तेमाल सरकार की मंजूरी से किया जा सकता है। कई एनजीओ पर आरोप लगा है कि वह विदेशों से आए फंडों का दुरुपयोग करते हैं। सामाजिक कार्य न करके इस राशि का राजनीतिक कामों में इस्तेमाल होता है। इसे रोकने के लिए ही सरकार ने यह सख्त कदम उठाए हैं।
-अनिल नरेन्द्र


दो राज्यों के बीच ऐसी फुटोव्वल पहली बार देखी है

सत्ताधीशों के बीच ऐसी फुटोव्वल देश ने पहले शायद ही देखी हो। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सरकारों के बीच ऐसा घमासान मचा हुआ है कि एक-दूसरे के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ थाने में मामले दर्ज हो रहे हैं। मुख्यमंत्रियों की श्रेष्ठता की परीक्षा के रूप ले रहा है तो आंध्र व तेलंगाना के बीच उस तनाव की चिंगारियां दिख रही हैं जो विभाजन के आघात की उपज है। वोट के बदले नोट मामले में आंध्र प्रदेश पुलिस ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव के खिलाफ आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू का फोन टेप करने के आरोप में मामला दर्ज किया है। वहीं नायडू और मनोनीत विधायक के बीच वोट को लेकर कथित बातचीत के ऑडियो टेप स्थानीय मीडिया में प्रसारित हुए हैं। विशाखापत्तनम के थ्री डाउन पुलिस थाने में सीएम राव के खिलाफ स्थानीय वकील एनवीवी प्रसाद की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री आंध्र प्रदेश में अपने समकक्ष नायडू के खिलाफ जासूसी करा रहे हैं। राव के खिलाफ धारा-464, 647, 471, 166, 167 120बी के तहत मामला दर्ज किया गया है। इस बीच नायडू और मनोनीत विधायक एल्विस स्टीफंसन के बीच कथित बातचीत का ऑडियो टेप स्थानीय टीवी चैनलों पर प्रसारित हुआ है। आंध्र सरकार के सलाहकार (संचार) पी. प्रभाकर ने कहा कि ये टेप गढ़े गए हैं और आंध्र के मुख्यमंत्री की छवि खराब करने की घटिया कोशिश है। चिन्ता की बात यह है कि आंध्र और तेलंगाना सदी के सबसे गर्म मौसम की मार झेल रहे हैं और लू के थपेड़ों से वहां हजारों मौत हो चुकी हैं। संकट की इस बेला पर जरूरत तो यह है कि आम आदमी की मदद होनी चाहिए और हो यह रहा है कि दोनों राज्य सरकारें जिस तरह अहम और वोट बैंक की राजनीति में उलझी हैं वह वाकई शर्मनाक है। तेलंगाना की सत्ताधारी पार्टी ने बेशक बड़े उत्साह से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू का वह ऑडियो टेप सार्वजनिक किया है जिसमें वह रिश्वत का इशारा करते सुनाई पड़ रहे हैं लेकिन इसके पीछे राजनीति को साफ-सुथरी बनाने का पवित्र उद्देश्य है या वोट बैंक पुख्ता करने की चाल? यह तय करना मुश्किल हो रहा है। कटु सत्य तो यह है कि हैदराबाद को दोनों राज्यों की अस्थायी राजधानी घोषित करने के बाद से दोनों सरकारों के बीच जंग शुरू हो गई है जिसमें वहां की पुलिस, खुफिया एजेंसियों और सरकारी कर्मियों का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि एक ही भवन में काम करने वाली दोनों राज्यों की खुफिया एजेंसियों के बीच एक-दूसरे की जासूसी करने की होड़ चल रही है। चन्द्रबाबू नायडू की पार्टी की तरफ से हालांकि तत्काल यह ऑडियो रिकार्डिंग फर्जी होने का दावा आ गया है किन्तु विपक्ष को निशाना बनाने का अवसर तो मिल ही गया है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच कब आएगी? इसके क्या निष्कर्ष होंगे, यह तो दूर की बात है पर जिस तरह की तल्खी दोनों राज्यों में देखने को मिल रही है वह अभूतपूर्व है। आरोप-प्रत्यारोप के बीच चन्द्रबाबू नायडू प्रधानमंत्री से मिले हैं। हो सकता है कि केंद्र सरकार को दोनों के बीच सलाह करानी पड़े।a

Friday, 12 June 2015

शाहजहांपुर का पत्रकार कलम की जंग में जिन्दगी से हार गया

शाहजहांपुर में एक पत्रकार को जिन्दा जलाकर हत्या करने के आरोप में राज्य सरकार में मंत्री राममूर्ति वर्मा और पांच अन्य के खिलाफ मंगलवार को मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोप है कि वर्मा फेसबुक पर जोगेन्द्र की उनके खिलाफ की गई टिप्पणियों से नाराज थे। वर्मा के अलावा शाहजहांपुर सदर कोतवाली के तत्कालीन प्रभारी श्रीप्रकाश राय सहित पांच लोगों के खिलाफ भी हत्या, साजिश रचने, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने की धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गई है। रिपोर्ट दर्ज होने के बाद ही परिजनों ने जोगेन्द्र सिंह का अंतिम संस्कार किया। जोगेन्द्र एक जून को अपने आवास विकास कॉलोनी स्थित घर में पुलिस दबिश के दौरान जल गए थे। पुलिस उन्हें अपहरण और हत्या के प्रयास की कोशिश के मामले में गिरफ्तार करने गई थी। जोगेन्द्र ने पुलिस पर जिन्दा जलाने का आरोप लगाया था जबकि पुलिस का कहना था कि जोगेन्द्र ने दबिश के दौरान दरवाजा नहीं खोला और बंद मकान में खुद को आग लगाई थी। मूल रूप से खुटार के रहने वाले पत्रकार जोगेन्द्र सिंह शाहजहांपुर शहर में पुरानी आवास विकास कॉलोनी स्थित एक मकान में रहते थे। एक जून को यह अपने मकान में गंभीर रूप से जल गए थे। बेहतर इलाज के लिए उन्हें लखनऊ भेजा गया था। जहां आठ जून को दोपहर उनका निधन हो गया। पोस्टमार्टम के बाद सोमवार देर रात उनका शव घर पहुंचा तो कोहराम मच गया। बवाल की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने पीएसी के साथ ही कई थानों की फोर्स खुटार में तैनात कर दी। सीओ और एसडीएम भी रात में कई बार जोगेन्द्र के घर गए और परिवार के लोगों से बात की। पत्रकार जोगेन्द्र सिंह कलम की जंग में जिन्दगी हार गए। सपा सरकार में राज्यमंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा की बढ़ती सम्पत्ति और गुंडागर्दी पर कलम चलाना उनकी मौत का कारण बन गया। उन पर बार-बार हमले हुए लेकिन पुलिस मौन रही। जोगेन्द्र इन हमलों से विचलित नहीं हुए और उनकी कलम चलती रही। उन्हें खामोश करने के लिए जला दिया गया जिन्दा...। अस्पताल में जिन्दगी-मौत की बीच झूलते जोगेन्द्र के सांसों की डोर सोमवार टूट गई। जोगेन्द्र पर पहले 28 अप्रैल को हमला किया गया जिसमें उनके पैर के पंजे की हड्डी टूट गई। पुलिस खामोश रही। कलम का यह बहादुर सिपाही मोर्चा खोलता रहा। फेसबुक पर दर्जनों पोस्ट में राममूर्ति को लेकर खुलासे जारी हैं। मंत्री द्वारा कई ग्रामीणों से जबरन जमीन छीने जाने का भी मुद्दा उठाया। जमीन की लूट और इसके लिए ही हो रही गुंडागर्दी से सपा की छवि को नुकसान पहुंचने की बात भी कही थी लेकिन किसी ने नहीं सुना। एक और बहादुर कलम का सिपाही अपनी ड्यूटी करते हुए शहीद हो गया है। उत्तर प्रदेश की सपा सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह मामले की निष्पक्ष जांच कराए और कसूरवार को दंडित करे। अगर मंत्री, पुलिस व प्रशासन जोगेन्द्र की मौत की साजिश में शामिल है तो उन्हें बचाने का प्रयास नहीं होना चाहिए। उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री से हम यही उम्मीद करते हैं कि वह मामले की सच्चाई तक पहुंचेंगे और दबाएंगे नहीं।

-अनिल नरेन्द्र

लालू-नीतीश मिलन से बढ़ी भाजपा की परेशानी

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के चेहरे से दबाव साफ झलक रहा था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान करते हुए सोमवार को उन्होंने कई बार चेहरे से पसीना साफ किया। शायद मौजूदा स्थिति में उनके पास और कोई विकल्प भी नहीं था। क्योंकि गठबंधन नहीं होने पर सेक्यूलर मतों का बंटवारा होता और चुनाव में इसका फायदा भाजपा को मिल सकता था। दरअसल राहुल गांधी के मास्टर स्ट्रोक से लालू चारों खाने चित हो गए। वह चाह कर भी यह इल्जाम अपने सिर पर नहीं लेना चाहते थे कि मुख्यमंत्री पद के लिए जद (यू) के साथ गठबंधन नहीं किया। वहीं सीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर कांग्रेस के समर्थन के बाद नीतीश का पलड़ा काफी भारी हो गया था। राहुल ने नीतीश से मिलकर साफ कह दिया था कि वह बिहार विधानसभा चुनाव नीतीश के नेतृत्व में गठबंधन करने के इच्छुक हैं। नीतीश कुमार के नाम पर लालू प्रसाद की सहमति बनने के बाद अब बिहार के चुनाव में भी दोनों राष्ट्रीय गठबंधनों की सीधी टक्कर का माहौल बन गया है। अब जद (यू) और राजद के साथ कांग्रेस व वामपंथी पार्टियां भी मिलकर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को टक्कर देती दिखेंगी। इससे भाजपा की सियासी चुनौतियां बढ़ गई हैं। भाजपा को यह फैसला करना है कि वह दिल्ली विधानसभा चुनाव की तरह किसी को चेहरा बनाकर चुनाव मैदान में उतरने का खतरा उठाएगी या फिर बिना चेहरे के मैदान में उतरकर फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर दांव लगाएगी? पार्टी के सामने अगड़ी जाति के वोट बैंक को सहेजे रखने के साथ-साथ लालू-नीतीश के मिलन के बाद पिछड़ी जाति के वोट बैंक में सेंध लगाना बड़ी चुनौती होगी। इसे मुलायम सिंह यादव की मध्यस्थता का असर कहें या लालू यादव और नीतीश की मजबूरी कि दोनों दल एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सहमत हो गए हैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं कि राजद और जद (यू) में सीटों का बंटवारा कैसे होगा। लेकिन जब तक यह हल न हो जाए तब तक यह कहना ठीक नहीं कि नीतीश और लालू के बीच सब कुछ सामान्य हो गया है। बिहार का यह चुनाव अगर लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के लिए राजनीतिक अस्तित्व का मामला है तो इसमें यह तय भी हो जाएगा कि नरेंद्र मोदी के अच्छे दिनों का कितना भरोसा यहां  लोगों में लग रहा है। यह चुनाव यह संकेत भी देगा कि विकास की दौड़ में बुरे तरीके से पिछड़ चुका यह राज्य बदलाव के लिए आकुल है या आज भी जाति और समुदाय की स्मृतियां उसके राजनीतिक फैसलों का कारण बन रही है। इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पिछले लगभग दो दशक से जद (यू) और राजद अलग-अलग खेमों में रहे हैं और उनके कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर एक-दूसरे के खिलाफ सक्रिय रहे हैं। ऐसे में नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच अचानक सौहार्द और समन्वय पैदा हो भी नहीं सकता। बिहार विधानसभा चुनाव पर सारे देश की निगाहें होंगी। निसंदेह भाजपा सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार नहीं कर सकती कि जद (यू) और राजद के तालमेल से उसकी चुनौतियां बढ़ गई हैं, लेकिन वस्तुस्थिति यही है और इसीलिए यह आवश्यक है कि वह इस तालमेल को गंभीरता से ले।

Thursday, 11 June 2015

कानून मंत्री को कानून तोड़ने में गिरफ्तार किया गया है

ऐसा शायद ही कभी पहले हुआ हो कि किसी सरकार के कानून मंत्री को किसी फर्जीव़ाड़े के मामले में गिरफ्तार किया गया हो। राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी के कानून मंत्री जितेन्द्र सिंह तोमर को मंगलवार को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उन पर दो यूनिवर्सिटियों से ली गई साइंस ग्रेजुएशन व लॉ की मार्क शीट और माइग्रेशन में धोखाधड़ी और जालसाजी का आरोप है। शाम को कोर्ट ने तोमर को चार दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया। रातों रात तोमर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे मंजूर कर लिया गया। तोमर के वकील अब सैशन कोर्ट में अपील दायर करेंगे। तोमर पर आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 120 (बी) के तहत केस दर्ज किया गया है। जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश से जुड़ी इन धाराओं में गैर-जमानती भी हैं। इनमें से कुछ में तो उम्र कैद तक का पावधान है। अदालत में तोमर के वकीलों ने आरोप लगाया कि धारा 160 का नोटिस गिरफ्तारी के बाद दिया गया। मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट नवनीत बुद्धिराजा ने पुलिस से पूछा कि आपने आज ही नोटिस दिया था क्या। ऐसे में आज ही गिरफ्तारी की क्या जरूरत थी? पुलिस की ओर से कहा गया कि तोमर पभावशाली शख्स हैं और सबूतों को पभावित कर सकते हैं। मजिस्ट्रेट ने कहा कि यह नोटिस मजाक लगता है। कोर्ट ने पूछा कि क्या गिरफ्तारी में सुपीम कोर्ट की गाइड लाइंस का पालन किया गया था? पुलिस ने हां में जवाब दिया। आप पार्टी ने अपनी पतिकिया में कहा कि तोमर को बिना कोई नोटिस व पूर्व सूचना दिए गिरफ्तार किया गया है। ऐसी क्या इमरजेंसी थी कि तोमर को इस तरह गिरफ्तार किया गया? मामला जब हाई कोर्ट में पेडिंग है, तब इस तरह की कार्रवाई क्यों? तोमर के कॉलेज के हलफनामे में साफ लिखा है कि उन्होंने कानून की डिग्री पास की है जबकि पुलिस की पतिकिया कुछ यह थी कि गिरफ्तारी से पहले नोटिस भेजा गया था। जांच 11 मई से चल रही थी, सोमवार रात एफआईआर दर्ज करके कार्रवाई की गई। गिरफ्तारी सुपीम कोर्ट की गाइड लाइंस और कानूनी पकिया के तहत की गई है। तोमर ने जितनी भी युनिवर्सिटी से डिग्री लेने का दावा किया था, जांच में सभी फर्जी निकलीं। जितेन्द्र सिंह तोमर की गिरफ्तारी चार महीने पुरानी दिल्ली सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। भले ही पुख्ता पमाणों के आधार पर कानून के दायरे में मंत्री की गिरफ्तारी की है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इस घटना से सूबे में जारी सियासी बवाल और जोर पकड़ेगा। जब से दिल्ली से आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है तभी से केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है और इस युद्ध की वजह से दिल्ली में ढंग का पशासन नहीं चल पा रहा है। इसी युद्ध की एक कड़ी है तोमर की गिरफ्तारी। दिल्ली में सरकार चला रही आम आदमी पार्टी के नेताओं ने तोमर की गिरफ्तारी के बाद कहा कि दिल्ली में आपातकाल जैसी स्थिति लागू करने की कोशिश की जा रही है। फर्जी डिग्री के आधार पर तोमर की गिरफ्तारी भले ही एक कानूनी मामला है लेकिन इसके सियासी मायने निकाला जाना भी लाजमी है। जब से यह सरकार बनी है तभी से उपराज्यपाल, गृह मंत्रालय से इसका टकराव हो रहा है। केजरीवाल विधानसभा में खड़े होकर यह आरोप लगाते हैं कि केंद्र सरकार उपराज्यपाल और दिल्ली पुलिस के माध्यम से दिल्ली में अपना राज चलाना चाहती है हालांकि केंद्र की ओर से बार-बार यह स्पष्ट किया गया है कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं और संविधान दिल्ली के मामले में स्पष्ट है। ऐसी परिस्थिति पैदा करने में आप की भी भूमिका है। जिस वक्त तोमर पर फजी डिग्री रखने का आरोप लगा था और  हाई कोर्ट ने इसकी जांच के आदेश दिए थे, तभी इनका इस्तीफा ले लिया जाना चाहिए था। तोमर की गिरफ्तारी से दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल, गृहमंत्रालय के बीच तनातनी बढ़ने वाली है और पूरे मामले में पिस रही है दिल्ली की जनता। दिल्ली में बेहतरी का रास्ता तब तक पशस्त नहीं होगा जब तक दोनों सरकारों के बीच बेहतर तालमेल नहीं होगा और इसकी संभावना मुश्किल नजर आ रही है कम से कम निकट भविष्य में।

-अनिल नरेन्द्र