Translater

Sunday, 13 May 2018

स्कूलों में मनमानी तरीके से फीस बढ़ाने पर अंकुश सही है

दिल्ली के स्कूलों में मनमानी फीस के मामले में दिल्ली सरकार ने आखिरकार एक्शन शुरू कर दिया है। राजधानी के तीन स्कूलों की मान्यता रद्द हो सकती है। एक अन्य स्कूल की तो मान्यता रद्द कर दी गई है। मौजपुर के एक स्कूल की मान्यता रद्द कर दी गई है। दरअसल मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के जनता दरबार में अभिभावकों की लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि निजी स्कूल मनमानी कर रहे हैं। मौजपुर के विक्टर पब्लिक स्कूल ने ईडब्ल्यूएस के छात्रों को मुफ्त यूनिफॉर्म, स्टेशनरी और किताबें आदि नहीं दीं। वहीं संगम पार्प के महावीर सीनियर मॉडल स्कूल व मॉडल टाउन के क्वीन मैरी पब्लिक स्कूल-थर्ड में मनमाने तरीके से फीस की बढ़ोत्तरी की है। अधिकारी बताते हैं कि मुख्यमंत्री ने मामले में शिक्षा विभाग को सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे। मौजपुर के विक्टर पब्लिक स्कूल को शिक्षा विभाग ने दो बार अपना तरीका सही करने के निर्देश दिए। बावजूद इसके प्रबंधन ने निर्देश को अनसुना किया। इसके बाद अब शिक्षा विभाग ने ईडब्ल्यूएस/डीजी वर्ग से संबंधित नियमों का उल्लंघन करने पर इस स्कूल की मान्यता रद्द करने का नोटिस जारी कर दिया है। पर अब भी कुछ स्कूल हैं जो अपनी मर्जी से फीस बढ़ाने पर तुले हुए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार लोनी रोड स्थित डीएवी स्कूल मैनेजमेंट ने सभी क्लास के बच्चों की स्कूल फीस में अचानक 10 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर दी है। अगर यह रिपोर्ट सही है तो यह ठीक नहीं है। इसकी वजह से पैरेंट्स काफी नाराज हैं। सोमवार को जब फीस बढ़ोत्तरी से नाराज अभिभावकों ने इसका विरोध किया तो स्कूल प्रिन्सिपल ने कहा कि जो भी पैरेंट्स बढ़ी हुई फीस पर सहमत नहीं होंगे उनके बच्चों की टीसी काट कर निकाल दिया जाएगा। इसको लेकर पैरेंट्स ने स्कूल मैनेजमेंट के खिलाफ प्रदर्शन किया है। पैरेंट्स का आरोप है कि स्कूल की ओर से हर साल 10 से 20 प्रतिशत की फीस बढ़ोत्तरी की जाती है, जो उनकी जेब पर भारी पड़ रही है। स्कूल फीस के अलावा मैनेजमेंट द्वारा कई तरह के चार्जेज वसूले जा रहे हैं, जो सीबीएसई गाइडलाइंस के अनुसार अवैध हैं। वहीं फीस बढ़ाने पर कोर्ट ने भी सख्त निर्देश दिए हैं। गुस्साए पैरेंट्स सोमवार को प्रिन्सिपल से बात करने पहुंचे तो प्रिन्सिपल ने दो टूक कहा कि जो भी अभिभावक बढ़ी हुई फीस नहीं देंगे, उनके बच्चों को ट्रांसफर सर्टिफिकेट काट कर स्कूल से निकाल दिया जाएगा। इस बारे में जब एक रिपोर्टर ने प्रिन्सिपल समीक्षा शर्मा से बात की तो उन्होंने टीसी काटने के आरोप से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि पैरेंट्स ने हंगामे के दौरान पुलिस को बुला लिया था। जो भी बात हुई पुलिस के सामने हुई। सच्चाई क्या है यह तो हम नहीं जानते पर हम दिल्ली सरकार का इस मुद्दे पर कि स्कूलों को मनमानी फीस बढ़ाने पर अंकुश लगे हम समर्थन करते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

ईरान परमाणु समझौते से ट्रंप का पीछे हटना

ईरान के साथ 2015 में किए गए महत्वाकांक्षी बहुराष्ट्रीय समझौते से बाहर निकल आने का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फैसला अप्रत्याशित नहीं है, क्योंकि अपने चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने इसका विरोध किया था। ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए जो करार किया था, उससे वह पीछे हट गए हैं। ओबामा के समय से ही इस समझौते की ट्रंप पहली ही कई बार आलोचना कर चुके हैं। ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के पीछे हटने की चौतरफा आलोचना हो रही है। इस डील में शामिल अन्य पांच देशोंöब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी ने कड़ा ऐतराज किया है। ट्रंप का कहना है कि इस समझौते में कई खामियां हैं और यह अमेरिका के हित में नहीं है। ट्रंप ने तो यहां तक कहा कि इससे ईरान को जो धन मिला, उसे परमाणु हथियार हासिल करने से नहीं रोका जा सका। यह समझौता 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में हुआ था। ओबामा ने ट्वीट कर इसे ट्रंप प्रशासन का गलत फैसला कहा है। उन्होंने कहा कि यह समझौता केवल उनकी सरकार और ईरान के बीच नहीं था, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों, वैज्ञानिकों की सलाह के आधार पर इसमें दुनिया की महाशक्तियां शामिल हुई थीं। इस तरह के फैसलों से अमेरिका की साख कम होगी और दुनिया की बड़ी ताकतों के साथ मतभेद बढ़ेंगे, जो किसी के हित में नहीं होगा। इस डील पर सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और रूस ने दस्तखत किए थे। जर्मनी भी शामिल हुआ था। इसलिए इस डील को 5+1 के नाम से भी जाना जाता है। इसके तहत ईरान ने परमाणु कार्यक्रम के बड़े हिस्से को बंद करने और अंतर्राष्ट्रीय निगरानी पर राजी हो गया था। करीब डेढ़ दशक तक ईरान के साथ तनावपूर्ण रिश्तों और वार्ताओं के कई दौर के बाद यह करार हो पाया था। ट्रंप ने ईरान को कट्टरपंथी देश बताते हुए सीरिया में युद्ध भड़काने का आरोप लगाया है। ट्रंप का कहना है कि ईरान समझौते का पालन नहीं कर रहा है। हालांकि ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन ने अमेरिका के इस कदम पर असहमति जताई है और ईरान के साथ हुए समझौते को जारी रखने का फैसला किया है। डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा कि वह अपने विदेश मंत्री को समझौते में शामिल अन्य देशों के साथ बातचीत के लिए भेज रहे हैं। उन्होंने चेतावनी भी दी कि वार्ता विफल होने की स्थिति में वह आने वाले हफ्तों में यूरेनियम संवर्द्धन का काम शुरू कर देंगे। सरकारी टीवी पर रूहानी ने जोर दिया कि अमेरिका के बिना भी यह समझौता कायम है। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी कहा है कि ईरान में 2009 के बाद से परमाणु हथियार विकसित करने की गतिविधियों के कोई संकेत नहीं मिले हैं और ईरान समझौते के हिसाब से काम कर रहा है। ऐसे में समझौते से अमेरिका का हटना वाजिब नहीं कहा जा सकता। इस फैसले के बाद भी भारत ईरान के साथ है। भारत ने कहा कि इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की भावनाओं का ख्याल रखते हुए इसे तय समझौते के तहत सुलझाना चाहिए।

Saturday, 12 May 2018

पद छोड़ने के बाद मुख्यमंत्री भी आम आदमी है

मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी से हटते ही आम नागरिक की श्रेणी में आ जाता है। ऐसे में उसे सरकारी आवास क्यों चाहिए? इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के उस कानून को निरस्त कर दिया जिसमें पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगला देने का प्रावधान था। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति आर. भानुमति की पीठ ने ऐतिहासिक और दूरगामी फैसले में कहा कि पूर्व सीएम और आम नागरिक में किसी तरह का भेद नहीं हो सकता। पूर्व मुख्यमंत्री अपने पास रहे पद की विशेषता के कारण सुरक्षा सहित अन्य प्रोटोकॉल पाने के हकदार हैं। लेकिन पद से हटने के बाद भी सरकारी आवास में रहने की अनुमति देना समानता के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है। शीर्ष अदालत ने कहाöप्राकृतिक संसाधन, सरकारी जमीन व चीजें, जिनमें सरकारी व आधिकारिक आवास भी आते हैं, सार्वजनिक सम्पत्ति है। यह देश के लोगों की है। राज्यों को अपने संसाधनों के वितरण में न्याय की अवधारणा से निकलने वाले समानता के सिद्धांत से प्रेरित होना चाहिए। पीठ ने कहाöउत्तर प्रदेश के मंत्री (वेतन, भत्ते व विविध प्रावधान) 1981 अधिनियम नागरिकों का एक अलग वर्ग तैयार करता है। यह उन्हें पूर्व पब्लिक ऑफिस के आधार पर सरकारी सम्पत्तियों का हकदार बनाता है। पद छोड़ने के बाद भी उन्हें अलग वर्ग की मान्यता देना मनमाना व भेदभावपूर्ण है। यह संवैधानिक प्रावधानों के फैसले के विपरीत है। अभी उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम एनडी तिवारी, मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, अखिलेश यादव और मायावती को राजधानी लखनऊ में सरकारी बंगला मिला हुआ है। दिल्ली में सीएम को पद से हटने के बाद तीन महीने में बंगला खाली करना होता है। इसके बाद वह बाजार दर से किराया देकर छह महीने तक इसमें रह सकते हैं। देश के सभी राजनीतिक दलों को स्वयं आगे आकर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का समर्थन करना चाहिए और जितने भी पूर्व मुख्यमंत्री इस गैर-संवैधानिक सुविधा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें स्वेच्छा से इसे छोड़ देना चाहिए। दरअसल राजनीतिक वर्ग का आचरण, व्यवहार और संस्कृति सामंतों की तरह हो गई है जो आम जनता को प्रजा और स्वयं को प्रजापति यानि शासक वर्ग मानता है। अगस्त 2016 में एक गैर-सरकारी संगठन लोक प्रहरी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम को सरकारी बंगला आवंटित करने के प्रावधान को निरस्त कर दिया था। लेकिन तब की अखिलेश सरकार ने उत्तर प्रदेश मंत्रिगण कानून 1981 में संशोधन करके पूर्व मुख्यमंत्रियों के विशेषाधिकार को सुरक्षित कर दिया था। इस संशोधन को लोक प्रहरी संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश के तमाम राज्यों पर भी लागू होगा। राजस्थान, बिहार, असम जैसे राज्य भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। बंगले जितनी जल्दी खाली हो जाएं, उतना ही अच्छा है।
-अनिल नरेन्द्र

देखें कर्नाटक में ऊंट किस करवट बैठता है?

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में प्रचार खत्म हो गया है और आज वोट डालने की बारी है। प्रचार की बात करें तो इतना भयंकर चुनाव प्रचार पहले शायद कभी नहीं हुआ। कांग्रेस और भाजपा ने प्रचार में, आरोप-प्रत्यारोप में, भाषा में कोई कसर नहीं छोड़ी। अगर यह कहा जाए कि इस बार कर्नाटक में जिस स्तर का प्रचार हुआ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ गलत नहीं होगा। कर्नाटक चुनाव में दोनों कांग्रेस और भाजपा की अब प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। चुनाव पूर्व आए 10 बड़े ओपिनियन पोल्स में से सात ने कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा वोट दिए हैं। इन सभी पोल्स में कांग्रेस को 35 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हैं। यही नहीं, कांग्रेस को इन 35 सालों में हुए आठ विधानसभा चुनावों में से सिर्प एक चुनाव में 34 प्रतिशत से कम वोट मिले हैं। कांग्रेस को सबसे कम वोट 1996 में 26 प्रतिशत वोट और 34 सीटें ही मिली थी। राज्य के पिछले आठ चुनाव में से चार में कांग्रेस को 40 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हैं। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कर्नाटक में पिछले 35 साल में यानि जब से भाजपा राज्य में चुनाव लड़ रही है, तब से अब तक कभी भी कांग्रेस को भाजपा से कम वोट नहीं मिले हैं। यहां तक कि 2008 में जब भाजपा की राज्य में पहली बार सरकार बनी थी तब भी कांग्रेस को भाजपा से करीब एक प्रतिशत वोट ज्यादा मिले थे। 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 33.86 प्रतिशत वोट और 110 सीटें मिली थीं। वहीं कांग्रेस को 34.76 प्रतिशत वोट और 80 सीटें मिली थीं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव प्रचार के आखिरी दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तीखा हमला करते हुए दावा किया कि भाजपा राज्य में कांग्रेस के खिलाफ मुकाबले में कहीं नहीं है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि बैंकों में जमा 90 प्रतिशत रकम देश के 15 अमीर उद्योगपतियों के हाथों में जा रही है। राज्य में मौजूदा सिद्धरमैया सरकार और इससे पहले भी भाजपा सरकार के कामकाज के तुलनात्मक ब्यौरे का एक ग्रॉफिक ट्विटर पर साझा किया है। कांग्रेस अध्यक्ष की ओर से पोस्ट किए गए ग्रॉफिक में दावा किया गया है कि सिद्धरमैया सरकार भाजपा सरकार की तुलना में काफी आगे है। बेंगलुरु में कपड़ा उद्योग की महिला कर्मियों से बातचीत में राहुल ने कहा कि खनन कारोबारी रेड्डी बंधुओं ने भी 35 हजार करोड़ रुपए चुराए हैं जिससे और हजारों नौकरियां पैदा हो सकती थीं। राहुल गांधी पर तेज हमला करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बुधवार को हैरानी जताई कि क्या देश कभी ऐसे अपरिपक्व और नामदार नेता को प्रधानमंत्री पद के लिए स्वीकार करेगा? गांधी परिवार पर हमला तेज करते हुए मोदी ने कहाöउन्हें (राहुल गांधी) लगता है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी एक परिवार के लिए आरक्षित है और इस पर कोई अन्य नहीं बैठ सकता है। उन्हें लगता है कि यह उनका पैतृक हक है। एक दिन पहले बेंगलुरु में राहुल गांधी ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि अगर कांग्रेस 2019 में चुनाव जीतती है तो वह प्रधानमंत्री का पद संभालने के लिए तैयार हैं। मोदी ने कहाöसुबह से लेकर शाम तक सोते-जागते, उनके मन में सिर्प एक चीज रहती है, वह है प्रधानमंत्री की कुर्सी। मोदी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि दिन में ही सपने देख रहे हैं राहुल गांधी। आज वोट पड़ने हैं। देखें, कर्नाटक में ऊंट किस करवट बैठता है?

Friday, 11 May 2018

पर्यटक की हत्या ने पत्थरबाजों की कलई खोल दी

दक्षिणी कश्मीर के शोपियां जिले में स्कूली बस पर पथराव की घटना के चार दिन बाद सोमवार को पत्थरबाजों ने श्रीनगर-गुलमर्ग हाइवे पर एक वाहन को निशाना बनाया। इसमें चेन्नई के एक पर्यटक की मौत हो गई। इस हमले में एक स्थानीय लड़की भी घायल हो गई। पर्यटक की शिनाख्त चिरुमणि (22) के रूप में हुई है, जबकि घायल लड़की हंदवाड़ा की सबरीना है। इससे पहले गत बुधवार को 40 से 50 बच्चों से भरी स्कूली बस को शोपियां के जबूरा इलाके में घेर कर पथराव किया गया था। इन दो घटनाओं ने सूबे की सरकार की पत्थरबाजों को आम माफी देने की नीति पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। राज्य में एक पर्यटक की मौत की यह पहली घटना है। इस घटना के बाद कश्मीर के पर्यटन पर बुरा असर पड़ने के अलावा आने वाले दिनों में शुरू होने वाली पवित्र अमरनाथ यात्रा पर भी ऐसे हमलों की आशंका के बादल मंडराने लगे हैं। इससे घाटी में अपने ही स्कूली बच्चों की बस पर पहली बार की गई पत्थरबाजी व पर्यटक की मौत से खुफिया तथा सुरक्षा एजेंसियों की भृकुटियां तन गई हैं। पत्थरबाजी करने वाले कोई बच्चे नहीं हैं। सबके सब होशो-हवास वाले बालिग हैं। जाहिर है कि यह दोनों कायराना हमले लक्ष्यविहीन नहीं थे। इनका मकसद खास था। सत्ता और समाज को संदेश देना था। पत्थरबाजों के आका चाहते हैं कि अगर आतंकवादियों को मुठभेड़ में मार गिराया जाता रहा तो पत्थरबाजी जारी रहेगी। यह क्या सीधे-सीधे आतंकवाद का समर्थन नहीं है? वह तो चाहते हैं कि कश्मीर की वादियों में आतंक रहे और आतंकवादी सलामत रहें। सुरक्षा एजेसिंयां या सेना उनको सलाम करती रही। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे कश्मीर के अशांत रहने का इजहार पूरी दुनिया में करेंगे। यह संदेश उस वक्त दिया जा रहा है जब जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती इन पत्थरबाजों को `गुमराह मासूम' मानते हुए उन्हें एकमुश्त माफी दिए जाने और पुनर्वासित करने की वकालत करती रही हैं। मालूम हो कि सूबे की पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार ने इस साल के शुरू में करीब 5500 पत्थरबाजों को आम माफी देते हुए उनके खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस लिया था। सूबे की महबूबा मुफ्ती सरकार ने यह जोखिमपूर्ण कदम घाटी में गुमराह युवकों को मुख्य धारा में जोड़ने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय की रजामंदी के बाद उठाया था। तब सूबे की सरकार ने यह कहा था कि पत्थरबाजी करते हुए पहली बार पकड़े जाने वाले सभी पत्थरबाजों को आम माफी दी गई है। हालांकि उस वक्त भी गठबंधन सरकार के इस फैसले की चौतरफा आलोचना हुई थी। तब विपक्षी दलों के अलावा आलोचकों ने यह भी कहा था कि गठबंधन सरकार का यह कदम उचित नहीं है। इससे पत्थरबाजों को शह मिलेगी और पत्थरबाजी बढ़ेगी। शोपियां की यह घटनाएं इसे साबित ही करती हैं।

-अनिल नरेन्द्र

माल्या केस ः भारत सरकार, बैंकों की शानदार उपलब्धि

भारतीय बैंकों से हजारों करोड़ रुपए लेकर देश छोड़कर भागा भारतीय उद्योगपति की रिकवरी के मामले में भारत सरकार व सरकारी एजेंसियों को भारी सफलता मिली है। मैं बात कर रहा हूं उद्योगपति लिकर बैरन विजय माल्या की। ब्रिटिश हाई कोर्ट ने भारतीय बैंकों की ओर से 1.55 बिलियन डॉलर यानि 10,000 करोड़ रुपए की वसूली के मामले में माल्या के खिलाफ फैसला दे दिया है। जज एंड्रयू हेनशॉ ने दुनियाभर की सम्पत्तियों को जब्त करने के आदेश को पलटने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने भारतीय अदालत के अब फैसले को भी बरकरार रखा है जिसमें 13 बैंकों के कंसोर्टियम को माल्या से करीब 10,000 करोड़ रुपए की वसूली करने का हकदार बताया गया है। भारतीय बैंकों के पक्ष में आए निर्णय से इंग्लैंड और वेल्स में माल्या की सम्पत्तियों पर भी भारतीय अदालत का फैसला लागू होगा। वैश्विक जब्ती का आदेश बहाल रहने के बाद माल्या इंग्लैंड और वेल्स में अपनी किसी सम्पत्ति को बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकेगा और न ही सम्पत्ति का मूल्य घटा सकेगा। जज हेनशॉ ने मंगलवार के फैसले के खिलाफ अपील करने की इजाजत भी नहीं दी। अब माल्या को कोर्ट ऑफ अपील में याचिका दायर करनी होगी। इंग्लैंड के हाई कोर्ट के कॉमर्शियल कोर्ट की क्वीन्स डिवीजन बैंच में मुकदमा जीतने वाले 13 भारतीय बैंकों में एसबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा, कारपोरेशन बैंक, फेडरल बैंक, आईडीबीआई बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, जम्मू एंड कश्मीर बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, यूको बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया और जेएम फाइनेंशियल एसेट रिकंस्ट्रशन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। माल्या पर आरोप लगा था कि उसने जानबूझ कर बंद पड़ी अपनी किंगफिशर एयरलाइंस के लिए करीब 1.4 अरब डॉलर का कर्ज लिया था। जज ने सम्पत्तियों को दुनियाभर में फ्रीज करने का आदेश पलटने की माल्या की मांग भी ठुकरा दी। 62 साल का माल्या ब्रिटेन में ही नहीं भारत में भी कई मुकदमों का सामना कर रहा है। इनमें धांधली और मनी लांड्रिंग के आरोपों से जुड़े मामले शामिल हैं। एक साल पहले उसे लंदन में गिरफ्तार किया गया था और वह प्रत्यर्पण से बचने के लिए एक अन्य कोर्ट में कानूनी लड़ाई भी लड़ रहा है। लंदन की एक दूसरी अदालत में माल्या के प्रत्यर्पण का मुकदमा चल रहा है। माना जा रहा है कि इस फैसले से प्रत्यार्पण की कोशिशों को भी मजबूती मिलेगी। इस केस के फैसले के दूरगामी असर होंगे। अगर माल्या आगे अपील में भी हार जाता है और उसकी रिकवरी होती है तो न केवल भारतीय बैंकों के डूबे पैसे लौटने की उम्मीद जगती है बल्कि मोदी सरकार की यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। इससे और भारतीय भगौड़ों को देश वापस लाने और उनसे पैसों की रिकवरी का भी चांस बनता है। इससे यह संदेश भी जाएगा कि पैसों की हेराफेरी करके आप कहीं नहीं छिप सकते।

Thursday, 10 May 2018

आमेर, नाहरगढ़ समेत दर्जनभर धरोहरों का ठेका

लाल किले को केंद्र सरकार की ओर से डालमिया समूह को दिए जाने का विरोध बढ़ता जा रहा है। आए दिन इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। हाल ही में अजय माकन के नेतृत्व में प्रदेश कांग्रेस का प्रदर्शन हुआ। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा ऐतिहासिक लाल किले को साजिश के तहत निजी हाथों में दिया जाना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि हमें स्वीकार नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता प्रतीकात्मक तौर पर पांच-पांच रुपए दान-पेटी में डालकर एकत्र करके लाल किला के रखरखाव के लिए मोदी जी को भेजेंगे। अगर आवश्यकता पड़ी तो कांग्रेस कार्यकर्ता प्रतिवर्ष पांच करोड़ रुपए एकत्र कर केंद्र सरकार को देंगे, लेकिन मोदी सरकार को लाल किला बेचने नहीं देंगे। माकन ने कहा कि मोदी सरकार अपने प्रचार के लिए 3000 करोड़ रुपए तो खर्च कर सकती है, लेकिन देश की सांस्कृतिक धरोहर लाल किला की मरम्मत व देखभाल के लिए पांच करोड़ रुपए प्रतिवर्ष खर्च नहीं कर सकती। उधर चांदनी चौक से आम आदमी पार्टी की विधायक अल्का लाम्बा ने बताया कि केवल गेट टिकटों से ही लाल किले में प्रवेश के लिए सालाना 18 करोड़ रुपए के टिकट बिकते हैं। दिव्या चेतना समिति के साथियों ने हाथों में डिब्बे लेकर आम जनता से लाल किले को बचाने के लिए बसों, ई-रिक्शा में बैठे यात्रियों के पास जाकर एक-एक रुपए का दान मांगा। प्रदर्शन की अगुवाई करते हुए महासचिव राहुल शर्मा ने कहा कि केंद्र एक तरफ राष्ट्रवादी होने की बात करता है और दूसरी तरफ राष्ट्र की धरोहर लाल किले को संभालने में विफल हो गया है। हम सरकार के इस फैसले का विरोध करते हैं और सभी देशवासियों से यह अपील करते हैं कि ऐतिहासिक धरोहर लाल किले को बचाने के लिए एक रुपए का दान दें और इस दान राशि को प्रधानमंत्री राहत कोष में भेजा जाएगा। खबर यह भी मिली है कि केंद्र सरकार की एडॉप्ट हैरिटेज योजना में राजस्थान की भी करीब एक दर्जन ऐतिहासिक धरोहरों को निजी क्षेत्र को सौंपा जाएगा। इनमें विश्व विख्यात आमेर और नाहरगढ़ का किला भी शामिल है। योजना के तहत वर्ष 2018 में 90 से ज्यादा ऐतिहासिक धरोहरों को गोद दिया जाएगा। इनमें तीन श्रेणियां बनाई गई हैं, जिनमें ग्रीन, ब्ल्यू और ऑरेंज श्रेणी हैं। ग्रीन श्रेणी में रखे गए धरोहर लेने वालों को ब्ल्यू और ऑरेंज श्रेणी की एक धरोहर भी लेनी होगी। वैसे ब्ल्यू और ऑरेंज श्रेणी की धरोहर ही कोई लेना चाहे तो ले सकता है। राजस्थान में जो प्रमुख किले निजी क्षेत्र को सौंपे जाने हैं उनमें चित्तौड़गढ़ का किला जो विश्व धरोहर में शामिल है। पहले चरण में जैसलमेर का किला, योजना के दूसरे चरण में नाहरगढ़ और आमेर किला तीसरे चरण में सौंपा जाएगा। ऑरेंज श्रेणी में रखी गई धरोहरों में डीग पैलेस (भरतपुर), मानगढ़ (अलवर), मंडोर फोर्ट (जोधपुर), भरतपुर फोर्ट, शेरगढ़ फोर्ट (धौलपुर), महल बादशाही (पुष्कर) प्रमुख हैं।

-अनिल नरेन्द्र