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Friday, 20 January 2017

कानपुर रेल हादसे के पीछे आईएसआई?

कानपुर में पिछले साल 20 नवम्बर को हुई रेल दुर्घटना महज एक हादसा था या किसी ने सुनियोजित साजिश रची थी? 20 नवम्बर को कानपुर से 57 किलोमीटर दूर पुखरायां में सुबह तीन बजे इंदौर-पटना एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई थी। इसमें 152 की मौत हुई और 200 से अधिक यात्री घायल हुए थे। वैसे तो हादसे के कारणों का रेलवे की जांच रिपोर्ट से पता लगेगा पर बिहार के मोतिहारी में गिरफ्तार तीन बदमाशों से पूछताछ के दौरान इस हादसे में पाक कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई के हाथ होने की बात सामने आ रही है। इन बदमाशों ने कबूला है कि भारतीय रेलवे को निशाना बनाने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर काम कर रहे थे। आईएसआई का दुबई में बैठा गुर्गा एक नेपाली के जरिये यह काम करा रहा था। तीन शातिर बदमाशों में शामिल मोती पासवान ने बताया कि इस ट्रेन हादसे में वह भी शामिल था। उसके साथ कानपुर में कई अन्य लोग भी थे। इनमें दिल्ली में पकड़े गए बदमाश जुबैर व जियामुल हक शामिल थे। मोती ने बताया कि कानपुर से पहले पूर्वी चम्पारण के घोड़ासहन स्टेशन के पास रेल ट्रैक व चलती ट्रेन को उड़ाने की साजिश भी उसी संगठन ने की थी। इसके लिए नेपाल में गिरफ्तार ब्रजकिशोर गिरी ने आदापुर निवासी अरुण व दीपक राय को तीन लाख रुपए दिए थे। लेकिन दोनों ने आईईडी लगाने के बाद भी रिमोट का बटन नहीं दबाया। इस कारण वह विस्फोट नहीं हो सका। घटना को अंजाम नहीं दे पाने के कारण नेपाल बुलाकर ब्रजकिशोर ने अरुण व दीपक की हत्या कर शव फेंक दिए थे। बिहार के मोतिहारी से गिरफ्तार किए गए तीन बदमाशों द्वारा बिहार पुलिस को दिए बयान में जुबैर व जियामुल हक का नाम बताने पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दिल्ली के जामिया नगर स्थित बटला हाउस इलाके से उन्हें ढूंढ निकाला। बदमाशों ने इन दोनों पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम करने के आरोप लगाए हैं। यह अत्यंत गंभीर आरोप हैं। जो भी कसूरवार है उसके सिर पर 152 निर्दोषों की मौत के खून का अपराध है। मामले की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। केवल कुछ बदमाशों के बयानों पर इतना बड़ा आरोप लगाना शायद सही नहीं होगा। इस मामले के फोरेंसिक सबूत व पूरी डिटेल्स सामने लाने होंगे। हर हादसे में आईएसआई का नाम लेना फैशन हो गया है। पर अगर यह साबित होता है कि वाकई ही इस ट्रेन हादसे में आईएसआई का हाथ था तो यह तो एक तरह से एक्ट ऑफ वॉर है और इसका जवाब पाकिस्तान को देना पड़ेगा। पाकिस्तान अपनी आदत के मुताबिक इसमें अपना हाथ होने से इंकार कर देगा। साबित तो सबूतों के साथ हमें ही करना होगा।

-अनिल नरेन्द्र

अमेरिका में आठ साल बाद बदलती सत्ता की धुरी

70 वर्षीय डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति 20 जनवरी को शपथ लेंगे। अमेरिका में आठ साल के बाद सत्ता की धुरी बदलेगी। दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क की कमान डेमोक्रेट राष्ट्रपति बराक ओबामा से रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप के हाथों में आ जाएगी। इससे अमेरिकी नीति के साथ पूरी दुनिया में शक्ति संतुलन भी बदल सकता है। डोनाल्ड ट्रंप के एक निकट सहयोगी ने दो दिन पहले कहा कि व्हाइट हाउस में दाखिल होने के पहले दिन ही ट्रंप वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा के उन कई कार्यकारी फैसलों को पलट देंगे जिनके बारे में उनको लगता है कि इनसे आर्थिक प्रगति और रोजगार दोनों प्रभावित हुए हैं। यह घोषणा ट्रंप के होने वाले व्हाइट हाउस के प्रवक्ता सीन स्पाइसर ने एक टीवी कार्यक्रम में की। उन्होंने कहा कि ट्रंप तत्काल उन कई कदमों को निरस्त करेंगे जिन्हें ओबामा प्रशासन की ओर से बीते आठ महीने में उठाया गया है और जिनके कारण अमेरिका का आर्थिक विकास एवं रोजगार सृजन बाधित हुआ है। उन्होंने बहरहाल यह स्पष्ट नहीं किया कि ओबामा के किन-किन कार्यकारी कदमों को ट्रंप निरस्त करेंगे। घरेलू मामलों के साथ-साथ ट्रंप की विदेश नीति पर भी नजरें लगी हुई हैं। यूक्रेन के मुद्दे पर रूस-अमेरिका में शुरू हुई रार 2016 में सीरिया और अमेरिकी चुनाव में हस्तक्षेप को लेकर और बढ़ी, पर पुतिन के प्रति ट्रंप के दोस्ताना रवैये से दोनों देशों में तनाव घटने के आसार हैं। सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद के वफादार सुरक्षा बलों और विद्रोहियों के बीच सालों से चल रहे गृहयुद्ध के खात्मे की उम्मीद की जा रही है। दोनों पक्ष संघर्षविराम की घोषणा पर वार्ता को राजी हो गए हैं। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में शामिल होने की भारत की कोशिशें रंग ला सकती हैं। सुरक्षा परिषद में सुधार और आतंकवाद की सर्वमान्य परिभाषा को लेकर उसकी मुहिम भी सफल हो सकती है। ट्रंप के लिए अमेरिका की विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों में सही तरीके से तालमेल बिठाना कड़ी चुनौती हो सकती है। हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख जॉन बेनन ने ट्रंप को चेतावनी दी है कि उन्हें अपनी टिप्पणियों पर नियंत्रण रखना होगा और रूस के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने के प्रति सचेत रहना होगा। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने जिस प्रकार दुनिया को संदेश दिया है उससे लगता है कि उन्हें अपने देश की खुफिया एजेंसी पर ही भरोसा नहीं है। चुनाव प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने बहुत-सी बातें कीं पर यह जरूरी नहीं कि वह उन पर अमल करें। अब जब वह राष्ट्रपति बन जाएंगे तो सोबर हो जाएंगे और उम्मीद की जाती है कि वह नपी-तुली बातें ही करेंगे। श्री ट्रंप को अमेरिका के राष्ट्रपति पद संभालने पर बधाई।

Thursday, 19 January 2017

क्या नई तकनीक से सीमा पार से घुसपैठ पर नियंत्रण लगेगा?

पाकिस्तान घुसपैठियों को भारत धकेलने का सिलसिला बंद नहीं कर रहा। दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग जिले के पहलगांव के पास आबूरा गांव में देर शाम (रविवार से) जारी मुठभेड़ खत्म हो गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने तीन आतंकियों को मार गिराया है। आतंकियों के पास से तीन एके-47 राइफल बरामद हुए। भारत को इन घुसपैठियों को रोकने के लिए और कड़े उपाय करने होंगे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भारत सीमा पार और एलओसी से घुसपैठ रोकने के लिए 20 अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों की मदद से नई तकनीक विकसित कर रहा है। भारत-इजरायल संयुक्त कार्य समूह ने इस बाबत रणनीति तैयार की है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की कार्ययोजना के तहत इस साल के अंत तक बॉर्डर को हाइटैक बनाने का काम पूरा कर लिया जाएगा। इसके लिए विस्तृत एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली बनाई जा रही है। इसके लागू होने के बाद बॉर्डर पर गश्त के लिए अधिक जवानों की जरूरत नहीं पड़ेगी। राडार घुसपैठ की जानकारी देगा और सूचना के बाद त्वरित कार्रवाई कर घुसपैठ के पाकिस्तानी मंसूबे पर पानी फिर जाएगा। जम्मू-कश्मीर में सांबा और कठुआ के बॉर्डर पर सबसे पहले उच्च तकनीक उपकरण स्थापित किए जाएंगे। जम्मू-कश्मीर से लगने वाले पाकिस्तान बॉर्डर और नियंत्रण रेखा से आतंकियों द्वारा पूरे साल भर घुसपैठ की कोशिशें की जाती हैं। बॉर्डर पर बीएसएफ और एलओसी पर सेना के जवान घुसपैठ रोकने के लिए अग्रिम पोस्टों से नजर रखकर कार्रवाई करते हैं और 24 घंटे गश्त की जाती है। सेना के सूत्रों के मुताबिक हाइटैक प्रणाली लागू होने के बाद बॉर्डर पर स्थित तकनीकी केंद्र पर घुसपैठ की कोशिश होते ही तुरन्त जानकारी मिल जाएगी और मौके पर ही आतंकियों को ढेर किया जा सकेगा। वर्तमान में सेना और बीएसएफ की लगातार गश्त के बावजूद हर साल औसत 100 आतंकी घुसपैठ में कामयाब हो जाते हैं। पाकिस्तान द्वारा सीजफायर उल्लंघन से घुसपैठ करने वाले आतंकियों को पाक सेना द्वारा कवरिंग फायर मिलता है। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद घुसपैठ की कोशिशों में लगातार इजाफा हुआ है। एक साल में पाकिस्तान की ओर से 150 आतंकी घुसपैठ कर जम्मू-कश्मीर के इलाकों में दाखिल हुए। कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी व अन्य हिंसक घटनाओं में बेशक कमी आई है पर सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ में इजाफा ही हुआ है। उम्मीद है कि नई अत्याधुनिक तकनीक से घुसपैठ पर काबू पाया जा सकेगा। सूत्रों के मुताबिक तकनीकी उपकरणों के लिए 20 अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को ऑर्डर दिए गए हैं।

-अनिल नरेन्द्र

क्या यूपी में विकास से ज्यादा जातिवाद हावी रहेगा?

यूपी के बारे में एक कहावत चर्चित है कि यहां वोटर न तो नेता को और न ही विकास जैसे मुद्दे पर वोट देता है। यहां वोट जाति के आधार पर दिए जाते हैं। कम से कम पुराने विधानसभा चुनावों में तो यही स्थिति रही है। यूपी विधानसभा में जिस पार्टी को 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिलेंगे जीत उसकी लगभग तय होगी। लेकिन ये 30 प्रतिशत वोट चार बड़ी जातियों के बीच फंसे हैं। 23 प्रतिशत अगड़ी जाति के हैं तो 41 प्रतिशत पिछड़ी जाति के। 21.1 प्रतिशत दलित हैं तो 19.3 प्रतिशत मुस्लिम। अब तक तो मुलायम यहां यादवों के रहनुमा बने हुए थे और मायावती दलितों की। पिछड़ों के लिए भाजपा ने केशव मौर्य को अध्यक्ष बनाया है तो ब्राह्मणों के लिए कांग्रेस ने शीला दीक्षित को आगे किया। जाति के इस खेल को खुलकर मायावती ही स्वीकार करती हैं। मायावती ने सभी प्रत्याशियों की जातिवार सूची जारी करके यह साबित भी कर दिया। जाति के इस चक्रव्यूह के कारण कांग्रेस 27 साल से यूपी में सत्ता से बाहर है, वहीं भाजपा 14 साल से। हालांकि लोकसभा चुनाव में ध्रुवीकरण ने सारी जातियों को एकजुट कर दिया था। यही वजह है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में 15 प्रतिशत वोट पाने वाली भाजपा ने लोकसभा में 42.43 प्रतिशत तक वोट लाकर 80 में से 71 सीटें जीत ली थीं। वहीं 21 प्रतिशत दलित वोटर होने के बावजूद मायावती की पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका। विधानसभा चुनाव के शंखनाद के साथ उत्तर प्रदेश में चुनावी बिसात की गोटियां बिछनी शुरू हो गई हैं। हर एक सीट पर जीत का आंकड़ा फिट करने के लिए गुणा-भाग शुरू हो गया है। कुछ दलों ने प्रत्याशियों का चयन कर लिया है तो कुछ दल टक्कर का प्रत्याशी उतारने के फेर में हैं। राजनीतिक दल हर सीट पर तमाम गुणा-भाग कर उम्मीदवारों को उतारते हैं ताकि जीत उनके दल के खाते में आए। मतदान का दौर आते-आते मुकाबला कांटे का हो जाता है। लिहाजा मतों का फासला कम हो जाता है कि राजनीतिक दलों की सीटों में काफी अंतर आ जाता है। अंतत चार से पांच प्रतिशत मतों के कम-ज्यादा होने की दशा में बीते विधानसभा चुनावों में इसी तरह के आंकड़े सामने आए हैं। मौजूदा विधानसभा चुनाव में यह परिपाटी दोहराई जाती है या नहीं, यह देखने की बात होगी। यूपी में बीते एक दशक के दौरान हुए दो विधानसभा चुनावों में यह परिपाटी देखने को मिली है। दोनों ही विधानसभा चुनावों में सपा और बसपा में कांटे का मुकाबला हुआ और चार-पांच प्रतिशत मतों के अंतर ने एक पार्टी को सरकार से बाहर और दूसरी के लिए सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। 2007 के विधानसभा चुनाव में सपा को अपनी प्रतिद्वंद्वी बहुजन समाज पार्टी से पांच प्रतिशत कम वोट मिले, वह सरकार बनाने से बाहर हो गई। पार्टी को 97 सीटों से संतोष करना पड़ा था। सपा को कुल मतों का 25.43 प्रतिशत मत मिला था, वहीं बसपा को पांच प्रतिशत अधिक 30.43 प्रतिशत मत मिले थे। मतों के इस अंतर से बसपा की सीटों की संख्या 206 पर पहुंच गई थी। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में यही परिपाटी देखने को मिली। इस चुनाव में बसपा को 25.91 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि सपा को 29.13 प्रतिशत मत हासिल हुए थे और दोनों के बीच सीटों में 100 से ज्यादा का अंतर आ गया था। इस चुनाव में बसपा 80 सीटों पर सिमट गई थी जबकि सपा को 224 सीटें हासिल हुईं। प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में भी यही परिपाटी अगर दोहराई गई तो इस बार भी मत प्रतिशत में मामूली अंतर किसी की जीत तो किसी की हार की वजह बन जाएगी। ऐसे में सभी राजनीतिक दल सीटों और प्रत्याशी के हिसाब से रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। मौजूदा चुनाव में मुद्दे और माहौल कितने प्रभावी होते हैं, किस तरह से मतों का बंटवारा होगा? यह देखने की बात होगी लेकिन दो बातें साफ हैंöयूपी विधानसभा चुनाव में मुद्दों से ज्यादा जातिवाद ज्यादा हावी रहा है और कांटे के इस मुकाबले में हार-जीत का अंतर बहुत कम होगा।

Wednesday, 18 January 2017

क्या सिद्धू की घर वापसी कांग्रेस को जिता पाएगी?

आतिशी बल्लेबाजी, जुमलों से भरी क्रिकेट कमेंट्री में कभी न रुकने वाले ठहाकों वाले नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस का दामन थामकर घर वापसी कर ली है। इसी के साथ ही सिद्धू ने महीनों से चल रही अटकलों पर विराम लगा दिया है। भाजपा से निकलने के बाद आम आदमी पार्टी के दरवाजे पर दस्तक देते हुए अब जब वह कांग्रेस में बाकायदा शामिल हो गए हैं तो उनका कहना कि यह उनकी घर वापसी है अवसरवाद है या हकीकत? बेशक वह पैदायशी कांग्रेसी हो सकते हैं, पर किसी की घर वापसी इतनी लंबी नहीं होती, जितनी कि नवजोत सिंह सिद्धू की रही है। उन्होंने पिछले 18 साल के बाद राज्यसभा और भाजपा से इस्तीफा दिया था और तभी से वह नया ठिकाना तलाश रहे थे। आम आदमी पार्टी से कई दिनों तक असफल सौदेबाजी के बाद सिद्धू के लिए सिवाय कांग्रेस के और कोई विकल्प भी नहीं बचा था। सिद्धू और भाजपा का बुनियादी मतभेद अकालियों को लेकर था। अकालियों के वह मुखर विरोधी थे और भाजपा अकालियों के साथ अपना गठबंधन तोड़ने को तैयार नहीं थी। संभव है कि भाजपा को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़े। सिद्धू ने पंजाब की राजनीति में अपना अलग स्थान बनाया और मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी अमृतसर सीट जीत कर साबित कर दिया कि वह जनता से जुड़े नेता हैं। निश्चय ही नवजोत का कांग्रेस में शामिल होना कांग्रेस के लिए उत्साह बढ़ाने वाली घटना है। सिद्धू की पत्नी जो कि अमृतसर-पूर्व की सीट से विधायक रहीं, पहले ही कांग्रेस में शामिल हो चुकी हैं। सिद्धू को पार्टी में शामिल करने और मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ कैप्टन अमरिंदर सिंह को उम्मीदवार बनाने के पीछे कांग्रेस की राजनीति जाहिर है। यह आम धारणा है और समय-समय पर हुए कई सर्वेक्षणों ने भी इसके संकेत दिए हैं कि एक दशक से राज कर रहे बादल सत्ता विरोधी रुझान का सामना कर रहे हैं। अकाली-भाजपा सरकार से छुटकारा दिलाने में सक्षम होने का भरोसा जो जगा सकेगा बाजी उसी के हाथ लगेगी। अगर आम आदमी पार्टी का उभार न हुआ होता तो कांग्रेस को इस बार ज्यादा चिन्ता करने की जरूरत न थी। पर आप की सशक्त मौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विपक्ष में नम्बर एक शक्ति कौन है? बादल परिवार को भी इस बार एंटी इनकम्बेंसी का अहसास होगा पर उनकी उम्मीद इस पर टिकी है कि सत्ता विरोधी वोटों का कांग्रेस और आप पार्टी के बीच लगभग समान बंटवारा हो जाए। नतीजा क्या होगा इसका पता तो 11 मार्च को ही चलेगा। मगर यह साफ दिख रहा है कि पंजाब में सत्तारूढ़ गठजोड़ के लिए यह चुनाव चुनौतियों से भरा है।

-अनिल नरेन्द्र

टीपू तो साइकिल चलाएंगे पर मुलायम अब क्या करेंगे?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मतदान से पहले ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को एक बड़ी जीत हासिल हुई है। अखिलेश यादव जिन्हें मुलायम सिंह यादव परिवार में टीपू के नाम से कहा जाता है को चुनाव आयोग ने दोनों पार्टी व चुनाव चिन्ह साइकिल सौंप दी है। चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी का विधिवत विभाजन कर दिया है। चुनाव आयोग का यह फैसला मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक जीवन की सबसे करारी हार के रूप में है। जिस पार्टी को उन्होंने अपना खून-पसीना एक करके खड़ा किया वह एक झटके में ही उनके हाथ से निकल गई। सोमवार को पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव के तमाम दावों को दरकिनार करते हुए अखिलेश गुट को ही असली सपा माना गया। कहा जाता है कि मुलायम सिंह राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं और कब क्या दांव लगाना है वह भलीभांति जानते हैं। पर इस बार वह मात खा गए। सियासी धुरंधर होने के बावजूद वह हवा का रुख नहीं देख पाए। पार्टी भी गई, साइकिल भी गई और पुत्र भी हाथ से निकल गया। अब मुलायम के सामने तीन ही विकल्प बचे हैं। पहला कि कोर्ट जाकर चुनाव आयोग के फैसले पर स्टे की अपील करें। हमें नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट अब ऐसा करेगा क्योंकि चुनाव आयोग ने ठोस सबूतों पर ही ऐसा महत्वपूर्ण फैसला दिया है। रामगोपाल यादव ने कहा है कि मुलायम गुट कोई ठोस सबूत चुनाव आयोग के समक्ष पेश ही नहीं कर सका। इसमें फायदा भी नहीं दिखता क्योंकि चुनाव आयोग यूपी चुनाव की अधिसूचना जारी कर चुका है। एक बार अधिसूचना जारी हो जाए तो मामले में न्यायपालिका के दखल की गुंजाइश कम हो जाती है। दूसरा यह कि मुलायम अब शिवपाल एंड कंपनी का साथ छोड़कर अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वीकार कर लें और सपा के संरक्षक की भूमिका स्वीकार कर लें। उनके समधी लालू प्रसाद यादव ने भी यह सलाह दी है कि गुस्सा थूक कर सांप्रदायिक ताकतों को हराने के लिए अखिलेश को आशीर्वाद दें। पर हमें संदेह है कि मुलायम इस विकल्प को चुनें क्योंकि इसका एक मतलब यह होगा कि मुलायम राजनीतिक संन्यास के लिए तैयार हैं, ऐसा शायद ही वह करने पर तैयार हों। अंतिम विकल्प है मुलायम सिंह अलग चुनाव लड़कर जनमत को अपना पक्ष दिखाएं। अगर अखिलेश गुट से ज्यादा वोट और सीटें ले आएं तो उन्हें ही असली समाजवादी पार्टी माना जाएगा, पर इसकी संभावना बहुत कम है। अब जब चुनाव चिन्ह, पार्टी का भी फैसला हो गया है तो अब सबका ध्यान चुनाव पर लग जाएगा। अखिलेश गुट का मानना है कि पूरे विवाद में अखिलेश को बहुत फायदा हुआ है और उनका पुन सत्ता में आना तय है। महागठबंधन बनने की संभावना इस फैसले से बढ़ गई है, अगर ऐसा होता है तो भाजपा-बसपा दोनों के लिए चुनौती बढ़ जाएगी।

Tuesday, 17 January 2017

बराक ओबामा के आठ साल, अलविदा ओबामा

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा आठ साल का कार्यकाल पूरा करके अपने पद से विदाई ले रहे हैं। राष्ट्रपति बराक ओबामा ऐसे समय व्हाइट हाउस से विदा हो रहे हैं जब अमेरिका ने अपने लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे कटुता भरे चुनाव में अपना नया राष्ट्रपति चुना। ओबामा ने आठ नवम्बर 2008 को बतौर पहले अफ्रीकी अमेरिकन व्यक्ति के रूप में राष्ट्रपति का पद संभाला था। ओबामा को वर्ष 2009 के नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया। ओबामा शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही दो मई 2011 को पाकिस्तान के एबटाबाद में एक अमेरिकी सैनिकों के विशेष दस्ते ने रात में कार्रवाई करके कुख्यात अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मारा। लंबे समय से इराक में फंसी अमेरिकी सेना का वापसी का रास्ता ओबामा ने 15 दिसम्बर 2011 को तब खोला जब उन्होंने इराक युद्ध की समाप्ति की घोषणा की। नौ नवम्बर 2012 को ओबामा रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनो को हराकर दोबारा चार साल के लिए राष्ट्रपति बने। 28 दिसम्बर 2014 को उन्होंने अफगानिस्तान में सेना की कार्रवाई की समाप्ति की घोषणा की। जुलाई 2015 में अमेरिका ने उनके नेतृत्व में ईरान को परमाणु कार्यक्रमों की चरणबद्ध समाप्ति के लिए राजी कर उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने का समझौता किया। इसी महीने के आखिरी दिनों में ओबामा ने क्यूबा के साथ 50 साल पुराने बिगड़े रिश्तों को बहाल किया। कुल मिलाकर बराक ओबामा एक सफल राष्ट्रपति रहे। जब 2008 में ओबामा पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे तो उसे इतिहास की सबसे बड़ी खाई पाटने वाली घटना के रूप में देखा गया थाöक्योकि पहली बार एक अश्वेत अमेरिका का राष्ट्रपति बनाöऔर जब वे लगातार दो कार्यकाल पूरा कर राष्ट्रपति पद छोड़ने जा रहे हैं तो अमेरिका में लोकतांत्रिक मूल्यों तथा सामाजिक सरोकारों को लेकर चिन्ता छाई हुई है। इसलिए ओबामा ने पद छोड़ने से 10 दिन पहले दिए अपने विदाई भाषण में उचित ही उन चिन्ताओं को सामने रखा, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता तथा सामाजिक सौहार्द को अमेरिका की पहचान बताया और अपने उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रंप को नसीहत दी कि अमेरिकी मुस्लिमों समेत देश के सभी अल्पसंख्यकों की रक्षा करना हमारा दायित्व है, अमेरिकी मुस्लिम भी उतने ही देशभक्त हैं जितने अन्य अमेरिकी। बराक ओबामा भारत के दोस्त हैं। उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अच्छी दोस्ती व कैमिस्ट्री रही। अमेरिकी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बारे में उनके कट्टर रवैये की चर्चा हो रही है। माना जा रहा है कि उनके राष्ट्रपति बनने पर विश्व में हिंसा के हालात बनेंगे। उनकी तुलना में डेमोक्रेटिक पार्टी (ओबामा) का शासन बेहतर बताया गया था। पर ताजा आंकड़े तो कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार ओबामा के शासन में अमेरिका बेहद आक्रामक रहा है। 2016 में उनके शासन में विभिन्न देशों में 26,171 बम गिराए गए। यह आंकड़ा पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल से 130 प्रतिशत अधिक है। सबसे अधिक हमले पाकिस्तान, अफगानिस्तान, लीबिया, यमन, सोमालिया, इराक और सीरिया में किए गए। इन देशों में तो गृहयुद्ध के हालात हैं। इस समय 138 देशों में अमेरिकी सेनाएं मौजूद हैं। पाकिस्तान, यमन, सोमालिया, लीबिया में पिछले सात सालों में 600 नागरिक इन अमेरिकी हमलों में मारे गए। दुनिया में हथियार आपूर्ति में भी अमेरिका 31 प्रतिशत की हिस्सेदारी से अव्वल नम्बर पर है। निवर्तमान राष्ट्रपति और नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के बीच के फर्क ने ओबामा के कार्यकाल को और प्रशंसनीय बना दिया है अन्यथा बराक ओबामा का कार्यकाल मिश्रित ही माना जाएगा। खैर, अलविदा बराक ओबामा।

-अनिल नरेन्द्र