इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानि ईवीएम पर विवाद थमने
का नाम नहीं ले रहा है। पिछले महीने पांच राज्यों में सम्पन्न विधानसभा चुनाव एवं महाराष्ट्र
में नगर निकाय चुनाव में ईवीएम के साथ छेड़छाड़ किए जाने के आरोप लगे। ईवीएम में गड़बड़ी
के कई सवाल खड़े किए गए। अब एक बार फिर गड़बड़ी का जिन्न बोतल से बाहर आ गया है। विवाद
का केंद्रबिन्दु है मध्य प्रदेश का भिंड। जहां दो विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव
के लिए अभ्यास कार्यक्रम में वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रायल (वीवी पैट) से केवल
कमल निशान वाली पर्चियां निकल रही थीं। अटेर उपचुनाव से पहले मध्य प्रदेश की मुख्य
निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह ने गत शुक्रवार को ईवीएम मशीन का जायजा लेते समय दो
अलग-अलग बटन दबाए तो वीवीपीएटी से कमल के फूल का प्रिन्ट बाहर
आया। हालांकि चुनाव आयोग द्वारा तलब किए जाने पर जहां राज्य निर्वाचन आयोग ने इस प्रकार
की किसी भी बात से इंकार किया वहीं डेमो के वक्त मौके पर मौजूद पत्रकारों के सवाल उठाने
पर मुख्य चुनाव अधिकारी ने आपा खो दिया और उन्हें जेल में बंद करने तक की धमकी दे डाली।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की हैरतअंगेज जीत पर सबसे आक्रामक मायावती हुई थीं जिन्होंने
ईवीएम में छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। इधर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल
बार-बार यही आरोप लगा रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि दिल्ली नगर
निगम के चुनावों में बैलेट पेपरों का इस्तेमाल हो। चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी के
आरोपों को फिर से खारिज कर दिया है। आयोग ने आप के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए
कहा कि चुनाव में खराब प्रदर्शन के लिए ईवीएम में गड़बड़ी को जिम्मेदार ठहराना बेहद
गलत हरकत है। आयोग ने यह भी कहा कि ईवीएम मशीन पूरी तरह से न सिर्फ विश्वसनीय है बल्कि
इसमें किसी भी तरह से छेड़छाड़ किया जाना संभव नहीं है। सुरक्षा की दृष्टि से आयोग
ईवीएम से पूरी तरह संतुष्ट है। इस बीच ही चुनाव आयोग ने यह भी बताया कि आयोग ने एम-3
टाइप ईवीएम खरीदने का फैसला किया है। खास बात यह है कि नई ईवीएम से किसी
प्रकार की छेड़छाड़ करना संभव नहीं होगा। एम-3 प्रकार की ईवीएम
में मशीनों की यथार्थता के लिए एक सेल्फ डायग्नोस्टिक सिस्टम लगा है। यह मशीनें एक
अपनी प्रमाणन प्रणाली के साथ आएंगी। सिर्फ एक सही ईवीएम क्षेत्र की अन्य ईवीएम के साथ
संवाद कर सकती है। इसका निर्माण ऊर्जा पीएसयूईसीआईएल या रक्षा क्षेत्रों की पीएसयूबीईएल
द्वारा किया जाना चाहिए। किसी भी अन्य कंपनी द्वारा बनाई गई ईवीएम अन्य मशीनों से संवाद
नहीं कर पाएंगी। इस तरह गलत मशीनों का पर्दाफाश हो जाएगा। यह तो अच्छी बात है कि लोकसभा
2019 के चुनाव से पहले यह नई आधुनिक मशीनें आ जाएंगी पर क्या
चुनाव आयोग के इस बयान का यह मतलब निकाला जाए कि वर्तमान में जो ईवीएम मशीनें इस्तेमाल
हो रही हैं उनमें गड़बड़ी हो सकती है? छेड़छाड़ संभव है?
जब चुनाव आयोग यह दावा करता है कि नई मशीनों में अगर छेड़छाड़ हुई तो
वह काम बंद कर देंगी तो इसका मतलब है कि मौजूदा मशीनों में यह छेड़छाड़ संभव है?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनावी प्रणाली
अत्यंत आवश्यक है। यह डेमोक्रेसी की बुनियाद है जिस पर इमारत टिकी हुई है। इसको सही
से करने के लिए ही स्वतंत्र, निष्पक्ष चुनाव आयोग का गठन किया
गया है जो किसी भी प्रकार के दबाव में काम न करे। भारतीय चुनाव आयोग का सिर्फ यही काम
है। अगर मौजूदा ईवीएम मशीनों में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ संभव है तो चुनाव आयोग
को यह स्वीकार करना चाहिए। उसे इसके आरोपियों को यह साबित करने का मौका देना चाहिए
कि वह छेड़छाड़ के अपने आरोपों को सिद्ध करें। चुनाव आयोग को हमारी राय में सियासी
बयानों से परहेज करना चाहिए। उसे यह नहीं कहना चाहिए कि फलां पार्टी को अपनी हार के
कारणों की समीक्षा करनी चाहिए न कि ईवीएम मशीनों पर छेड़छाड़ का आरोप लगाए। मामला सुप्रीम
कोर्ट में जा चुका है। चुनाव आयोग को शीर्ष अदालत के सामने यह साबित करना होगा कि मौजूदा
ईवीएम मशीनों में छेड़छाड़ संभव नहीं है।
Translater
Wednesday, 5 April 2017
Tuesday, 4 April 2017
हाइवे किनारे शराब की दुकानों पर पाबंदी
सुप्रीम
कोर्ट के आदेश के बाद राष्ट्रीय राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में आने वाली शराब की दुकानें बंद होंगी।
यह आदेश एक अप्रैल से लागू होना है। इसी आदेश के तहत 500 मीटर
के दायरे में आने वाली शराब की दुकानों को कोई राहत नहीं दी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने
अपने आदेश में संशोधन करते हुए कहा है कि जिन इलाकों में आबादी 20 हजार से कम होगी तो वहां शराब की दुकानों की दूरी हाइवे से 220 मीटर होगी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहाöनेशनल स्टेट
हाइवे से 500 मीटर के दायरे में तमाम होटल-रेस्टोरेंट और पब भी शराब सर्व नहीं कर सकेंगे। अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी
ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि शराब की दुकानों के अलावा होटलों-रेस्टोरेंटों पर आदेश लागू नहीं किया जाना चाहिए लेकिन सर्वोच्च अदालत ने अटार्नी
जनरल की इस राय को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ
ने कहा कि शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण होने वाले सड़क हादसों के मद्देनजर यह आदेश
दिया गया है। गुरुग्राम में तो इस नए आदेश के कारण कई फाइव स्टार होटल भी प्रभावित
होंगे। नामी होटल जैसे लीला, ट्रायडेंट, वेस्टिन, ओबेराय व क्राउन प्लाजा में भी यह लागू होगा।
इसके अलावा कई पब ऐसे हैं जहां शराब पर सारा धंधा टिका हुआ है और यह युवाओं का लोकप्रिय
पब है। सवाल यह उठता है कि कौन-सा इदारा 500 मीटर के अंदर आता है? यह तय एक्साइज विभाग को करना होगा।
पहले यह तय करना होगा कि कौन-कौन नेशनल स्टेट हाइवे के 500
मीटर के दायरे में आता है। इन इदारों में काम करने वाले मजदूरों का क्या
होगा? क्या इससे बेरोजगारी नहीं बढ़ेगी। कुछ लोग इस फैसले का
स्वागत भी कर रहे हैं। वह कहते हैं कि शराब के ठेकों की वजह से शाम ढलते ही असामाजिक
तत्व सक्रिय हो जाते हैं, जिसकी वजह से आम जनता को परेशानी का
सामना करना पड़ता है। शराब पीकर यह लोग ऑफिस व दुकानों के आगे खाली बोतलें व अन्य सामान
फेंककर गंदगी पैदा करते हैं। मार्केट में खुली शराब की दुकानों की वजह से आसपास के
दुकानदारों व बाहर से आने वाले लोग परेशान हो जाते हैं। शाम ढलते ही मार्केट में शराबियों
का जमघट लगना शुरू हो जाता है। इससे यहां आने वालों को खासकर महिलाओं में असुरक्षा
की भावना बढ़ जाती है। कई बार शराबियों द्वारा महिलाओं व युवतियों पर फब्तियां भी कसी
जाती हैं जिसको लेकर कई बार लड़ाई-झगड़े भी हो चुके हैं। इस पाबंदी
के बाद जहां मार्केट के अन्य दुकानदार खुश हैं वहीं इन ठेकों के आसपास नमकीन,
सोडा व खाने-पीने का सामान बेचने वाले मायूस हैं।
उनका कहना है कि हमारी रोजी-रोटी पर लात लग जाएगी। हमारा धंधा
तो इन शराब की दुकानों की वजह से चल रहा है।
-अनिल नरेन्द्र
चाहे जेल भेज दो पर अगली तारीख पर नहीं होऊंगा पेश
यह पहला मौका है जब किसी अवमानना का आरोपी कोई हाई कोर्ट
का कार्यरत जज सुप्रीम कोर्ट में पेश हुआ हो। मैं बात कर रहा हूं कोलकाता हाई कोर्ट
के जज जस्टिस सीएस कर्णन का मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली सात जजों
की बैंच के समक्ष शुक्रवार को पेश होने की। न्यायिक इतिहास में ऐसा यह पहला वाकया है।
मामले में सात जजों की संविधान पीठ के सामने 50
मिनट सुनवाई चली। इस दौरान जस्टिस कर्णन ने माफी मांगने से इंकार करते
हुए कहा कि मैं भी जज हूं। पर मुझे आतंकी जैसा दिखाया जा रहा है। पीठ ने कर्णन को चार
हफ्ते में जवाब देने को कहा है कि वह माफी मांगने को तैयार हैं या नहीं? जवाब में जस्टिस कर्णन ने पीठ के सातों जजों के न्यायिक अधिकारों को छीनने
और सभी की तनख्वाह से हर महीने 50-50 हजार रुपए काटने का आदेश
सुना दिया। हालांकि इस आदेश पर अमल नहीं होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कर्णन
के सभी न्यायिक अधिकार छीन लिए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों में बहुत तीखी
बहस हुई। सुबह सवा 10 बजे कोर्ट नम्बर वन का ताला खुलते ही कोर्ट
रूम खचाखच भर गया। चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता में सात जजों की संविधान पीठ
बैठी और कार्यवाही शुरू हुई। चीफ ने कहाöमिस्टर कर्णन आप अवमानना
केस में मौखिक तौर पर जो चाहें कह सकते हैं। जस्टिस कर्णनöमैं
भी संवैधानिक पद पर हूं। बिना पक्ष जाने मेरा काम छीन लिया गया है। 20 जजों के खिलाफ शिकायत दी थी। उस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। मैं आरोप साबित
कर सकता हूं। कोर्ट की कार्यवाही से मेरी प्रतिष्ठा चली गई। मेरा काम लौटा दें। जस्टिस
खेहरöजब तक केस चल रहा है, न्यायिक काम
नहीं लौटा सकते। आपके आरोपों से कोर्ट की अवमानना हुई है। आपने प्रधानमंत्री को पत्र
लिखा। प्रेस कांफ्रेंस की। कहने पर भी कोर्ट नहीं आए। ऊपर से कोर्ट के खिलाफ पत्र जारी
कर दिया। जस्टिस कर्णनöमुझे मेरा काम लौटाएं तभी मैं इस पर विचार
करूंगा। काम नहीं लौटाया तो मैं पहले की तरह सामान्य नहीं हो पाऊंंगा। जस्टिस दीपक
मिश्राöमिस्टर कर्णन, क्या आप बिना शर्त
माफी मांगेंगे? ऐसा करेंगे तो राहत देने पर विचार हो सकता है।
जस्टिस कर्णनöइस कार्यवाही से अनुच्छेद-19 और 21 के तहत मिले अधिकार बाधित हुए हैं। जस्टिस खेहरöमिस्टर कर्णन, क्या जजों पर लगाए आरोप वापस लेना चाहेंगे?
माफी मांगने को तैयार हैं या नहीं? जस्टिस कर्णन
शिकायत पर कार्यवाही न करके मुझे ही माफी मांगने को कह रहे हैं। मेरा काम बहाल किया
तो बिना शर्त माफी मांगने पर अपने विचार रखूंगा। जस्टिस खेहरöआप मानसिक तौर पर ठीक नहीं हैं तो किसी डाक्टर से दवा और परामर्श ले सकते हैं।
कोर्ट में मेडिकल रिकार्ड पेश कर सकते हैं। जस्टिस कर्णनöमुझे
किसी डाक्टर से दवा या सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है। मैं पूरी तरह से ठीक हूं।
संविधान पीठ आपके खिलाफ सुनवाई कर रही है। यह संविधान पीठ पूरी तरह से असंवैधानिक है
जस्टिस कर्णन। मैंने संविधान पीठ और जस्टिस कर्णन के बीच सवाल-जवाब, आरोप-प्रत्यारोप का जो दौर
चला उसके प्रमुख अंश पेश कर दिए हैं। मामला पेचीदा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने लंबे
न्यायिक इतिहास में ऐसा केस पहले न सुना और न ही उस पर फैसला देने की जरूरत पड़ी। भारतीय
लोकतंत्र में सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च संस्था है जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती। हमारी
राय में तो यह मामला जस्टिस कर्णन के माफी मांगने से समाप्त हो सकता है। जस्टिस कर्णन
पहले बिना शर्त माफी मांगें तो फिर बाकी मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर सकता है।
जस्टिस कर्णन को हमारी राय में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ को चुनौती देना न केवल
मूर्खता है बल्कि गलत परंपरा है। एक बार जस्टिस कर्णन बिना शर्त माफी मांग लें तो सुप्रीम
कोर्ट को उनकी जायज शिकायतों पर गौर करना चाहिए। खैर यह तो हमारे विचार हैं देखें,
सुप्रीम कोर्ट आगे क्या करता है?
Sunday, 2 April 2017
उफ! अभी से मई-जून की गर्मी झुलसाने लगी है
मार्च
का महीना अभी बीता भी नहीं कि सूरज की तपिश ने आंखें दिखानी शुरू कर दी हैं। उत्तर
प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में पारा 40 के पार पहुंच
रहा है। सोमवार के बाद से ही दिल्ली समेत नौ राज्य लू की चपेट में आ गए हैं। भारतीय
मौसम विभाग ने महाराष्ट्र में लू की चेतावनी जारी की है। विभाग के मुताबिक महाराष्ट्र,
यूपी, हरियाणा, मध्य प्रदेश,
ओडिशा, राजस्थान, छत्तीसगढ़,
झारखंड और गुजरात के ज्यादातर हिस्सों में लू चल रही है। राजस्थान के
पश्चिमी और पूर्वी इलाकों की स्थिति अभी से गंभीर होने लगी है। महाराष्ट्र के स्वास्थ्य
मंत्री ने बताया कि राज्य के औरंगाबाद और सोलापुर जिलों में लू से लोगों के मरने की
खबर है। महाराष्ट्र में ही पांच लोगों की मौत हो गई है। इधर दिल्ली-एनसीआर में तापमान बढ़ना शुरू हो गया है। दो दिनों से बढ़ रहे तापमान ने अपने
सारे पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं, साथ ही गरम हवाओं के थपेड़ों
ने मौसम के मिजाज में उबाल ला दिया है। मौसम विभाग ने गुरुवार को बादल छाने की संभावना
जताई थी, लेकिन इसके उलट दिनभर की तपिश से लोग पसीना-पसीना रहे। गुरुवार के दिन की शुरुआत ही सामान्य दिनों की तुलना में छह डिग्री
अधिक तापमान से हुई और रात आठ बजे तक अधिकतम तापमान 34 डिग्री
सेल्सियस बना हुआ था। ये आंकड़े बता रहे हैं कि पारा अपने पिछले रिकार्ड तोड़ने पर
आमादा है। अभी से कई सारी जगहों का पारा 42 डिग्री सेल्सियस के
पार निकल गया है। माना जा रहा है कि इस साल गर्मी लंबी चलेगी। मौसम विशेषज्ञों का मानना
है कि गर्मी का यह दौर अल नीनो की वजह से हो रहा है। जिस मार्च में अधिकतम तापमान
34-35 डिग्री से आगे नहीं जाता था वह अभी से 42 डिग्री पार कर रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के सन्दर्भ में आशंका तो पहले ही व्यक्त
की जा रही है कि यही रफ्तार रही तो अगले 50 से 100 साल में धरती का तापमान इतना बढ़ चुका होगा कि इसका मुकाबला असंभव हो जाएगा।
इस खतरे के लिए हम खुद दोषी हैं। हमारी अपनी जीवनशैली, वन तो
कटे ही, घरों में आंगन क्या, पौधों की क्यारी
भी खत्म हो गई है। फ्लैट कल्चर ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। बिजली की अभी से मांग
चरम पर पहुंच गई है। एक तरफ गर्मी का प्रकोप दूसरी तरफ बिजली कट से लोगों का जीना मुश्किल
हो जाएगा। मौसमी उल्टफेर से आपदा की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। उधर मानसून की कमी की
भी संभावना प्रकट की जा रही है। सूखा और अकाल पड़ने का खतरा भी बढ़ जाता है। सभी को
अभी से तय करना होगा कि इस गर्मी की हालत में फसल और जीवन दोनों कैसे सुरक्षित रहेंगे?
घरों में, कारों में चलते एयरकंडीशनर भले ही गर्मी
में ठंडक का अहसास दें, लेकिन इनसे निकलने वाली गर्मी ग्रीन हाउस
के असर को बढ़ा रही है।
-अनिल नरेन्द्र
व्हाट्सएप से सीमा पार से संचालित पत्थरबाजी
कश्मीर में आतंकवादियों का मुकाबला करते हुए सुरक्षा
बलों के जवानों को स्थानीय युवकों के विरोध और हिंसा का लगातार सामना करना पड़ रहा
है वह बेहद गंभीर और चिन्ताजनक मामला है। पिछले मंगलवार को बड़गांव के एक गांव में
आतंकियों का मुकाबला करते हुए सुरक्षा बल के जवानों को पत्थरबाजी का सामना करना पड़ा
जिससे 60 से अधिक जवान घायल हो गए तो
जवाबी कार्रवाई में तीन प्रदर्शनकारी भी मारे गए। यह आंकड़ा बताता है कि पिछले पांच
महीनों में सुरक्षा बलों के खिलाफ स्थानीय लोगों के हिंसक विरोध के कारण 25
आतंकवादी भागने में सफल हो गए। घाटी में मौजूदा हालात बहुत गंभीर हैं।
श्रीनगर और अनंतनाग लोकसभा सीटों पर उपचुनावों ने और मामला गरम कर दिया है। घाटी में
ताजा हिंसा और पत्थरबाजी की घटनाओं के पीछे पाकिस्तान समर्थित आतंकी गुटों का हाथ माना
जा रहा है। सरकार को मिली जानकारी के मुताबिक घाटी में अलगाववादी तत्व और पाक समर्थित
आतंकी मिलीभगत करके श्रीनगर और अनंतनाग में होने वाले उपचुनाव को बाधित करना चाहते
हैं। घाटी में अलगाववादी पत्थरबाजों को फिर से सक्रिय करने का प्रयास कर रहे हैं। कश्मीर
में पत्थरबाजी की घटनाओं को लेकर कश्मीर पुलिस की परेशानी का आलम इसलिए है क्योंकि
व्हाट्सएप ग्रुपों के माध्यम से अब कश्मीर की पत्थरबाजी की ऑनलाइन और लाइव रिपोर्टिंग
होने से सीमा पार बैठे पाक आका आतंकियों की ही तरह अब पत्थरबाजों को भी व्हाट्सएप से
कंट्रोल कर उनकी पत्थरबाजी को संचालित करने लगे हैं। हाल ही में श्रीनगर में दर्ज एक
मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने आरोप लगाया है कि पत्थरबाजी
के लिए कई व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए हैं, जिनके एडमिन पाकिस्तानी
हैं। अधिकारी बताते हैं कि इन ग्रुपों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे एनकाउंटर
की सटीक लोकेशन और समय भेजा जाता है, फिर युवाओं से वहां पहुंचने
को कहा जाता है। कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि जैसे ही एनकाउंटर शुरू होता
है पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के लोग लोकेशन के बारे में सटीक जानकारी भेजकर युवाओं
को एक जगह इकट्ठा होने को कहते हैं। इन व्हाट्सएप ग्रुपों में एक एरिये के युवाओं को
अगले एरिये के युवाओं से जोड़ने के लिए भी लिंक डाले जाते हैं। डीजीपी एसपी वैध का
कहना है कि यह तथ्य है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल देश के दुश्मनों द्वारा किया जा
रहा है। इस बीच जम्मू-कश्मीर में पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर
होने वाली आलोचनाओं और सुप्रीम कोर्ट की ओर से इसके विकल्प तलाशने के निर्देशों के
बीच मंगलवार को केंद्र ने इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि दंगाइयों को
काबू करने के सभी विकल्पों के समाप्त होने की स्थिति में ही सुरक्षा बल पैलेट गन का
इस्तेमाल कर सकते हैं। लोकसभा में एक सवाल पूछा गया था कि कश्मीर में पैलेट गन से सैकड़ों
लोगों की आंखों की रोशनी जाने की रिपोर्ट के मद्देनजर सरकार इसके इस्तेमाल की समीक्षा
कर रही है? केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम ने बताया
कि 26 जुलाई 2016 को एक विशेषज्ञ समिति
का गठन किया था। इस समिति को जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वह गैर घातक हथियारों के रूप
में पैलेट गन के अन्य संभावित विकल्पों की तलाश करे। समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी
है और उचित क्रियान्वयन के लिए सरकार ने उसकी सिफारिशों का संज्ञान लिया है। उन्होंने
बतायाöउसी के अनुसार सरकार ने फैसला किया है कि सुरक्षा बल दंगाइयों
को खदेड़ने के लिए विभिन्न उपायों का इस्तेमाल करेंगे। इनमें गोले और ग्रेनेड,
आंसू गैस गोले शामिल हैं। अगर ये उपाय नाकाफी साबित होते हैं तो पैलेट
गन का इस्तेमाल किया जा सकता है।
Saturday, 1 April 2017
कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार जरूरी नहीं
सुप्रीम
कोर्ट ने सोमवार को साफ कर दिया है कि सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने के लिए
सरकार आधार कार्ड की अनिवार्यता लागू नहीं कर सकती। हालांकि शीर्ष अदालत ने यह भी कहा
कि आईटी रिटर्न और खाता खोलने जैसी गैर-कल्याणकारी योजनाओं के लिए वह आधार मांगने से सरकार और उसकी एजेंसियों को रोक
भी नहीं सकती। चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ
ने कहा कि गैर-लाभकारी योजनाओं मसलन बैंक खाते खोलने,
आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए सरकार आधार मांग सकती है मगर गांव में
रहने वाले गरीबों को पेंशन देने के लिए आधार की मांग नहीं की जा सकती। पीठ ने कहा कि
लाभकारी योजनाओं के लिए आधार को अनिवार्य नहीं किया जा सकता। इस पीठ में डीवाई चन्द्रचूड़
और संजय कौल भी शामिल थे। पीठ ने आधार की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं
पर सुनवाई की तारीख तय करने से भी मना कर दिया। इन याचिकाओं में नागरिकों की निजता
के अधिकार के उल्लंघन को आधार बनाया गया है। पीठ ने कहाöइसके
लिए सात जजों की पीठ गठित की जाएगी। फिलहाल यह संभव नहीं है। सोमवार को राज्यसभा में
वित्त विधेयक 2017 पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने सरकार पर कई गंभीर
आरोप लगाए। इसने कहा कि सरकार भाई-भतीजावाद को बढ़ावा दे रही
है, टैक्स अधिकारियों को असीमित अधिकार देकर लोगों में डर पैदा
कर रही है और आधार के जरिये लोगों की जिन्दगी में झांकने की कोशिश कर रही है। ये सबके
लिए फाइनेंस बिल में प्रावधान किए गए हैं। कांग्रेस, सपा और बसपा
और वामदलों ने किसानों के कर्ज माफ करने की भी मांग की। चर्चा शुरू करते हुए कांग्रेस
के कपिल सिब्बल ने कहा कि राजनीतिक दलों के कंपनियों के चन्दे की ऊपरी सीमा खत्म कर
दी है। कंपनियों के लिए इसे सार्वजनिक नहीं करने का प्रावधान भी कर दिया गया है। सिब्बल
ने कहा कि जब भाजपा विपक्ष में थी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण
जेटली ने आधार का विरोध किया था। इसे धोखाधड़ी का औजार तक बताया गया था। मगर अब यह
सरकार आधार पर कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने मामले
पर संज्ञान लिया है और यह हमारे दिमाग में भी है। हम एक-एक करके
सभी मामलों की सुनवाई करेंगे।
-अनिल नरेन्द्र
हम तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कर रहे हैं ः योगी
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अवैध
बूचड़खानों पर सख्ती को लेकर काफी हो-हल्ला हो रहा है। कुछ मीट बेचने वाली दुकानों ने अपने शटर बंद कर दिए हैं और
मीट न सप्लाई होने से बीफ, मटन और चिकन की आपूर्ति प्रभावित हो
गई है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को कहा कि हम तो सुप्रीम कोर्ट
के आदेशों का पालन कर रहे हैं। 17 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध बूचड़खानों पर दिशानिर्देश दिए हैं। योगी बोलेöएनजीटी 12 मई 2015 को इस बारे में
आदेश दे चुका है। क्या कानून का पालन नहीं होना चाहिए? हमने कोई
नया कानून नहीं बनाया है। जो कानून अस्तित्व में है सिर्फ उसका पालन कर रहे हैं। हम
किसी के खिलाफ नहीं हैं। सरकार तो बस कानून का पालन करवा रही है। वैसे बता दें कि अवैध
बूचड़खाने बंद करना भाजपा का चुनावी वादा था। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक
यूपी में 185 बूचड़खाने हैं। इनमें से 45 के पास लाइसेंस हैं। जबकि 140 बूचड़खाने बिना लाइसेंस,
बिना अनुमति के चल रहे हैं। हालांकि सरकारी सूत्रों के मुताबिक राज्य
में 400 से ज्यादा अवैध बूचड़खाने हैं। इनके बंद होने से राज्य
में मीट से जुड़ा 11 हजार करोड़ रुपए का कारोबार प्रभावित हुआ
है। लखनऊ की मशहूर दुकान टुंडे कबाबी पर ताला लटक गया है। दुकान के मालिक उस्मान ने
बताया कि उनके दादा ने यह खास कबाब बनाना शुरू किया था। लेकिन अब मीट और बीफ की सप्लाई
न होने की वजह से इसे बंद करना पड़ा। एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रॉड्क्ट्स डेवलपमेंट
अथार्टी (एपीईडीए) के मुताबिक
2015-16 में यूपी से 5,65,958 मीट्रिक टन भैंस
का मीट निर्यात किया गया था। अभी देश में मीट उत्पादन में यूपी की हिस्सेदारी
19.2 प्रतिशत है। जबकि इसके बाद आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल का नम्बर
आता है। प्रदूषण बोर्ड के एक अधिकारी ने कहा कि हमारे पास ज्यादा अधिकार नहीं हैं।
बोर्ड बूचड़खाना चलाना या न चलने पर सिर्फ सहमति देता है। नगर निकाय के अधिकारी ही
इसका लाइसेंस देते हैं। जनता को यह बताना भी जरूरी है कि यह अवैध बूचड़खाने सेहत के
लिए घातक हैं। बीमार पशुओं के 60 प्रतिशत रोग उनके मांस खाने
वालों में फैलने की आशंका बनी रहती है और विशेषज्ञों का मानना है कि मनुष्यों में टीबी
व रेबीज समेत कई गंभीर बीमारियों का स्रोत ऐसे मांस ही हैं। ऐसे में अवैध बूचड़खानों
के बाद लाइसेंसशुदा बूचड़खाने भी संदेह के घेरे में हैं। उनके यहां पशुओं को काटने
की पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने वाली सरकारी प्रणाली भी ध्वस्त है।
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