बिहार में कभी मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की सेवा
करने वाले परिवारों के साथ पूर्व उपप्रधानमंत्री के परिवार की साख भी इस लोकसभा चुनाव
में दांव पर है। जनता की नजरों में इनकी कितनी साख बची है, यह तो नतीजों के बाद ही पता चलेगा।
देखना है कि इस चुनाव में अपनी पारिवारिक विरासत को कौन बचा पाता है? राष्ट्रीय राजनीति के महत्वपूर्ण नेता पूर्व उपप्रधानमंत्री स्वर्गीय जगजीवन
राम की पुत्री मीरा कुमार फिर सासाराम लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस की उम्मीदवार हैं।
मीरा कुमार खुद राष्ट्रीय स्तर की नेता हैं और 15वीं लोकसभा की
स्पीकर रह चुकी हैं। उनके पास पारिवारिक लंबा राजनीतिक अनुभव भी है। सासाराम क्षेत्र
उनके पारिवारिक क्षेत्र के रूप में पहचाना जाता है। इस क्षेत्र के विकास में बाबू जगजीवन
राम के साथ मीरा कुमार की भी बड़ी भूमिका रही है। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी
इस लोकसभा चुनाव में गया संसदीय क्षेत्र से महागठबंधन के प्रत्याशी हैं। इससे पहले
2014 में वो जदयू के प्रत्याशी के रूप में थे। उस चुनाव में हारने के बाद ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने
जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाकर राज्य की कमान सौंप दी थी। बाद में पार्टी
ने उनसे नीतीश के लिए पद छोड़ने को कहा तो उन्होंने इंकार कर दिया। तब मांझी को पार्टी
से निष्कासित कर दिया गया। बहुमत साबित न कर पाने पर उन्हें 20 फरवरी 2015 को इस्तीफा देना पड़ा। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री
लालू प्रसाद यादव व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के परिवार की भी इस लोकसभा चुनाव
में कड़ी परीक्षा है। राजद ने पाटलिपुत्र से लालू की बेटी मीसा भारती को मैदान में
उतारा है। लालू यहां से चुनाव लड़ चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 में राजद प्रत्याशी मीसा भारती को लालू परिवार के खास रहे रामकृपाल यादव और
मीसा भारती के बीच आमने-सामने की टक्कर है। दरभंगा से तीन बार
सांसद रह चुके कीर्ति झा आजाद पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय भागवत झा आजाद के पुत्र हैं।
भागवत भागलपुर से राजनीति करते थे। कीर्ति को इसके बाद भाजपा से मतभेदों के चलते अपना
लोकसभा क्षेत्र भी बिहार छोड़कर झारखंड में बनाना पड़ा। भाजपा से कांग्रेस में आने
वाले कीर्ति आजाद इस बार धनबाद लोकसभा क्षेत्र से चुनावी मैदान में हैं। इनका मूल जन्म
स्थान झारखंड के गोड्डा जिले में है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय केदार पांडे
के पौत्र शाश्वत केदार को कांग्रेस ने बाल्मीकि नगर लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया
है। केदार पांडे चंपारण क्षेत्र के एक कद्दावर नेता थे। उनके समय में चंपारण दो भागों
में बंटा। केदार के पुत्र स्वर्गीय मनोज पांडे के बाद पहली बार उनके पौत्र शाश्वत केदार
ने राजनीति में कदम रखा है। देखें, यह अपने परिवारों की साख बचाने
में कितने सफल होते हैं?
Translater
Monday, 29 April 2019
क्या भोपाल में 35 साल का कांग्रेसी सूखा खत्म कर पाएंगे?
35 साल। जी हां... पूरे 35 साल हो गए हैं, भोपाल से
किसी कांग्रेसी उम्मीदवार को लोकसभा चुनाव में विजयी हुए। इस दृष्टि से मध्यप्रदेश
के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके दिग्विजय सिंह कांग्रेस के लिए संभावना की किरण के रूप
में हैं, देखना यह होगा कि तीन दशकों का सूखा मिटाकर वह कांग्रेस
के लिए लगभग बंजर हो चुकी भोपाल संसदीय सीट की जमीन पर वोटों की फसल लहलहा पाते हैं
या नहीं? एक दशक तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और दो बार कांग्रेस
अध्यक्ष के नाते दिग्विजय को प्रदेश के मुद्दों की गहरी समझ भी है और पकड़ भी। विवाद
उन्हें ताकत देते हैं। खासतौर पर आरएसएस, हिन्दुत्व और भाजपा
को लेकर उनके विवादित ट्वीट्स को लेकर सोशल मीडिया पर जितनी आलोचना उनकी हुई है शायद
ही किसी दूसरे कांग्रेसी नेता की हुई हो। दिग्विजय की लोकप्रियता, जनसम्पर्प और भीतरघात के खतरे से वंचित दिग्विजय सिंह ने शायद यह कभी नहीं
सोचा होगा कि भाजपा उनके सामने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को उतारकर एक चुनौती के रूप में
पेश करेगी। प्रज्ञा ठाकुर को इस सीट से उतारने के पीछे भाजपा का वोटों का ध्रुवीकरण
करना है। दिग्विजय सिंह भाजपा की चाल को समझ गए और उन्होंने साध्वी के मैदान में आते
ही भगवा आतंकवाद, हिन्दुत्व जैसे विषयों को छूना बंद कर दिया।
दिग्विजय भाजपा के दांव में तो नहीं आए अलबत्ता साध्वी खुद चूक कर बैठीं। आतंकवादी
हमले में शहीद हुए महाराष्ट्र के एटीएस के अफसर हेमंत करकरे के बारे में दिए उनके बयान
ने पूरे देश में भूचाल ला दिया। भाजपा को जब लगा कि वह बेवजह कठघरे में आ रही हैं,
जिसका खामियाजा महाराष्ट्र समेत दूसरी सीटों पर भी भुगतना पड़ेगा तो
उन्होंने साध्वी से माफी मांगने को कहा और साध्वी ने बेशक अपना बयान वापस ले लिया पर
जो नुकसान होना था वह तो हो गया। साध्वी के साथ जो कुछ भी उनकी कैद होने पर हुआ हो
पर उन्हें समझ नहीं कि राजनीति कितना खतरनाक खेल है और चुनाव में हर बात का असर होता
है। हेमंत करकरे का श्राप, उसके बाद बाबरी मस्जिद ढहाने पर दिए
बयानों के बाद अब प्रज्ञा ठाकुर ने कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह को आतंकी तक कह
दिया। दिग्विजय पर निशाना साधते हुए कहाö16 साल पहले उमा दीदी
(उमा भारती) ने उसे हराया था और वह 16 साल तक मुंह नहीं उठा पाया। अब फिर से सिर उठा रहा है तो दूसरी संन्यासी सामने
आ गई है, जो उसके कर्मों का प्रत्यक्ष प्रमाण है। एक बार फिर
ऐसे आतंकी का समापन करने के लिए संन्यासी को खड़ा होना पड़ा है। हालांकि बाद में प्रज्ञा
ठाकुर ने कहा कि मैंने दिग्विजय को आतंकी नहीं कहा।
Saturday, 27 April 2019
भाजपा के दुर्ग हिमाचल को क्या कांग्रेस भेद पाएगी?
लोकसभा चुनावों में हिमाचल प्रदेश की कुल चार सीटों
के लिए दोनों भाजपा और कांग्रेस पूरी ताकत लगा रही हैं। बात करते हैं प्रदेश के तमाम
बड़े नेताओं और उनके पुत्रों की इस चुनाव में भागीदारी की। कांग्रेस के प्रत्याशी जीतें
या न जीतें लेकिन प्रदेश के तमाम बड़े नेताओं ने अपने पुत्रों को पार्टी में जगह जरूर
दिला दी है। सवाल यह है कि यह पुत्र प्रदेश की चारों सीटों पर अपने पिताओं का सम्मान
बरकरार रख भी पाएंगे या नहीं? पुत्र ही नहीं, पूर्व केंद्रीय
मंत्री सुखराम ने तो अपने पौत्र तक का पार्टी से टिकट दिलवा दिया है, बेशक इसके लिए उन्हें इस उम्र में अपनी निष्ठाएं बदलने के आरोप भी झेलने पड़
रहे हैं। वह भाजपा में थे, अपने पौत्र की खातिर वह कांग्रेस के
हो लिए। सुखराम के पुत्र अनिल शर्मा जयराम सरकार में बिजली मंत्री हैं। उन्होंने मंत्रिपद
से इस्तीफा देने से इंकार कर दिया है। भाजपा के लिए अब वह न उगले जाते हैं और न ही
निगले जा रहे हैं। इस बार लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी ने परिवारवाद को
जम कर हवा दी। लोकसभा की चार सीटें जीतें या न जीतें लेकिन इन नेताओं ने अपने पुत्रों
के लिए 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए लांचिंग पैड का इंतजाम
जरूर किया है। चूंकि मामला राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का है तो आलाकमान ने
भी कोई
न-नुकुर नहीं
की। फरवरी महीने में आलाकमान ने प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह
सुक्खू को पद से हटाकर उनकी जगह पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा के करीबी कुलदीप
सिंह राठौर को पार्टी अध्यक्ष बना दिया। ऐसे में वीरभद्र सिंह समेत पार्टी के बड़े
नेताओं को अपने-अपने पुत्रों को पार्टी में जगह दिलाने का मौका
मिल गया। पार्टी के बिखरे कुनबे को एक करने के लिए कुलदीप सिंह राठौर ने भी इन पुत्रों
को पार्टी में जगह देने में कंजूसी नहीं बरती। हिमाचल प्रदेश में चुनाव की बात करें
तो सबसे अहम सीट हमीरपुर की है। यहां से अखिल भारतीय युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष,
बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा के मुख्य संयोजक अनुराग ठाकुर तीन
बार भाजपा को जितवा चुके हैं और इस बार भी भाजपा ने उन पर ही भरोसा जताया है। ऐसे में
यदि इसे भाजपा की परंपरागत या हॉट सीट कहा जाए तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भाजपा
के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री
प्रेम कुमार धूमल इसी चुनावी क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। यह सीट प्रदेश का ऐसा दुर्ग
है जिसे पिछले कई चुनावों में कांग्रेस फतेह नहीं कर पाई। अंतिम बार नादौन के प्रो.
नारायण चन्द पराशर 1980-84 में तो ऊना के विक्रम
सिंह 1996 में कांग्रेस के सांसद बने थे। सन 1967 से अब तक हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पांच बार, एक बार जनता पार्टी तो नौ बार भाजपा यहां से काबिज हुई। कांग्रेस पार्टी यहां
से प्रयोग के तौर पर प्रत्याशी बदलती रहती है लेकिन इसके बावजूद उसे सफलता नहीं मिली
है। इस सीट पर जातीय समीकरण हमेशा से हावी रहा है। इसी के मद्देनजर चुनावों में पार्टियां
टिकट भी बांटती रही हैं। यह क्षेत्र राजपूत बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है। भाजपा के
अनुराग ठाकुर शायद इसी वजह से यहां से तीन बार चुने गए हैं। इससे पहले बिलासपुर के
सुरेश चन्देल भी तीन बार इस हलके का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। प्रेम कुमार धूमल भी
यहां से सांसद रहे हैं। देखना होगा कि भाजपा के इस दुर्ग को क्या इस बार कांग्रेस भेद
पाएगी?
-अनिल नरेन्द्र
भगवाधारी मोदी के निशाने पर शेष 241 सीटें
बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी
में बृहस्पतिवार और शुक्रवार को मोदी का ऐसा स्वागत हुआ जो अभूतपूर्व है। ऐसा शो पहले
कभी नहीं देखा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नामांकन के दौरान एनडीए के दिग्गज
नेताओं को वाराणसी में एक साथ लाकर मोदी ने एक साथ कई संदेश दिए। सबसे अहम एनडीए की
एकता का संदेश था।
2014 में मोदी के नामांकन में भी ऐसा जमावड़ा नहीं दिखा। जानकारों का
कहना है कि नेताओं के मेगा-शो में आज से ज्यादा आने वाले
`कल' की चिन्ता दिखाई दी। भाजपा अपने बूते पर बहुमत
हासिल नहीं कर पाती तो दावा कर सकती है कि वह पहले से ही एनडीए को साथ लेकर चल रही
थी। सहयोगियों की अपेक्षा के आरोप झेल रहे मोदी-शाह का मकसद यह
दिखाना भी था कि उनमें अहंकार के आरोप गलत हैं। प्रकाश सिंह बादल, नीतीश कुमार, उद्धव ठाकरे, रामविलास
पासवान, अनुप्रिया पटेल, ओ. पन्नीर सेल्वम के अलावा पूर्वोत्तर के संगी नेताओं से पहले अमित शाह ने बैठक
की, फिर मोदी उनसे मिले। बाबा विश्वनाथ की नगरी में भगवा वस्त्र
धारण करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की बाकी बची लोकसभा की 241 सीटों के मतदाताओं को भी एक संदेश दिया। 2014 के लोकसभा
चुनाव में इन सीटों में से भाजपा ने 161 सीटें जीती थीं।
161 सीटों के अलावा बची बाकी की सीटों में से ज्यादा से ज्यादा सीटें
भाजपा अपनी झोली में डालना चाहेगी, क्योंकि यही सीटें केंद्र
में बनने वाली सरकार का भविष्य तय करेंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से दूसरी
बार लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए यहां पहुंचे। शुक्रवार सुबह उन्होंने अपना नामांकन दाखिल
किया। पर्चा दाखिल करने की आखिरी तारीख 29 अप्रैल है,
लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने 26 अप्रैल को ही नामांकन
दाखिल करने का इसलिए फैसला किया, ताकि 29 अप्रैल को 71 सीटों के लिए होने वाले मतदान के लिए एक
संदेश जाए। दरअसल चौथे, पांचवें, छठे और
सातवें चरण में अब 241 सीटों के लिए मतदान होगा। और यह सारी सीटें
अब उत्तर की तरफ हैं। दक्षिण भारत में मतदान पूरा हो चुका है, जहां भाजपा कमजोर दिखी। अब महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश,
राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, पंजाब, हरियाणा,
दिल्ली, बिहार व असम के लिए मतदान होना है। इस
पूरे क्षेत्र में भाजपा का प्रभाव है। यदि इस क्षेत्र में भाजपा की सीटें कम हुईं तो
केंद्र की सत्ता में लौटना मुश्किल होगा। इसलिए प्रधानमंत्री ने वाराणसी में शक्ति
प्रदर्शन करके 241 सीटों के मतदाताओं को संदेश देने की कोशिश
की। अपने रोड शो और गंगा आरती के दौरान भगवा वस्त्र पहने और एक मई को अयोध्या भी जाएंगे।
अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में वह पहली बार अयोध्या जा रहे हैं। इन दोनों प्रयासों का
मकसद सीधे तौर पर हिन्दू वोट को एकजुट करना है।
कैप्टन और बादल दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर
पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों पर चुनावी शतरंज की
बिसात बिछ गई है तथा इस चुनाव में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह तथा पूर्व
मुख्यमंत्री और शिरोमणि अकाली दल प्रमुख प्रकाश सिंह बादल की प्रतिष्ठा दांव पर है।
शिअद और कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची आ जाने के बाद अब चुनावी परिदृश्य साफ हो गया
है कि बेशक आम आदमी पार्टी मैदान में है पर मुख्य मुकाबला शिअद और कांग्रेस के बीच
है। कैप्टन इस चुनाव को लेकर इतने गंभीर हैं कि उन्होंने अपने मंत्रियों तक को चेतावनी
दे डाली कि लोकसभा चुनाव में अगर मंत्री अपने-अपने क्षेत्रों
में पार्टी उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने में विफल होते हैं तो उन्हें कैबिनेट से
हटा दिया जाएगा। कैप्टन ने कहा कि इसके अलावा उन विधायकों को भी आगामी विधानसभा चुनावों
में टिकट नहीं दिया जाएगा जो अपने विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी उम्मीदवार की जीत
सुनिश्चित नहीं कर पाएंगे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी आलाकमान
ने यह लक्ष्य प्रदेश में मिशन 13 को हासिल करना है। कांग्रेस
आलाकमान के निर्णय के अनुसार पंजाब के मौजूदा मंत्री अगर पार्टी उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित
करने में विफल रहते हैं, खासतौर से अपने निर्वाचन क्षेत्र में,
तो उन्हें मंत्री पद से हटा दिया जाएगा। पिछली बार कांग्रेस ने कुछ युवाओं
को टिकट दी थी लेकिन इस बार दो नौजवान विधायकों को टिकट दिया है। पटियाला सीट पर आप
पार्टी के डॉ. धर्मवीर गांधी से पिछले चुनाव में हारी परनीत कौर
को कांग्रेस ने इस बार फिर टिकट दिया है। इस बार आप पार्टी को अपनों से जितना खतरा
है उतना दूसरों से नहीं। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सुनील जाखड़ तथा मुख्यमंत्री कैप्टन
अमरिन्दर सिंह का कहना है कि राज्य की सभी 13 सीटों पर कांग्रेस
जीतेगी तथा केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनाने में राहुल गांधी के हाथ मजबूत करेगी।
उधर अकाली दल का चुनाव प्रचार लंबे समय से चल रहा है और उसने अपने उम्मीदवार पहले ही
तय कर लिए थे। उसे कुछ नुक्सान इसलिए हो सकता है कि उससे अलग हुए गुट के चुनाव मैदान
में आने से पंथक वोटों के बंटने की आशंका है। पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल भी
मुक्तसर जिले में लोगों से सम्पर्प कर रहे हैं। हालांकि अब उनकी उम्र धुआंधार प्रचार
की इजाजत नहीं देती, फिर भी वह अपनी पुत्रवधू हरसिमरत कौर के
प्रचार में लगे हुए हैं। बादल का कहना है कि कांग्रेस सरकार ने अपने घोषणा पत्र में
किए वादे पूरे नहीं किए। किसानों की हालत जस की तस है। केंद्र सरकार ने राज्य में अनेक
विकास कार्य किए और मोदी सरकार की वापसी तय है।
-अनिल नरेन्द्र
लाइट, कैमरा, एक्शन के कलाकार फंसे चुनावी दंगल में
पश्चिम बंगाल के औद्योगिक-व्यापारिक केंद्र
आसनसोल में इस बार के लोकसभा चुनाव में दो सितारे जमीन पर उतर आए हैंöआमने-सामने। युवा दिलों की चाहत सिंगर बाबुल सुप्रीयो
वर्तमान में सांसद और केंद्रीय मंत्री हैं तो उनके सामने खड़ी हैं प्रख्यात अदाकारा
मुनमुन सेन। यहां चौथे चरण यानि 29 अप्रैल को वोट पड़ेंगे। बंगाल
में इन दोनों कलाकारों की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। दोनों के अपने-अपने फैन और मुद्दे रहे हैं। कांग्रेस और वामपंथियों की इस सीट पर भाजपा ने
सेंधमारी की है तो तृणमूल कांग्रेस इस सीट पर पहली बार कब्जा जमाने के लिए पूरी ताकत
लगा रही है। लाइट, कैमरा, एक्शन जैसे शब्दों
के इर्दगिर्द दोनों कलाकारों का समय जीत के पोस्ट तक पहुंचने के लिए कम होता जा रहा
है लेकिन अब इनके सामने एक अलग टेंशन हैं इसीलिए दोनों की टीमें दिन-रात सक्रिय हैं। बाबुल को जिताने के लिए भाजपा कार्यकर्ता दिन-रात एक किए हैं। तृणमूल उम्मीदवार मुनमुन सेन की ओर से भी मोर्चाबंदी कमजोर
नहीं है। तृणमूल विधायक रहे सह-मेयर जितेन्द्र तिवारी अपनी रणनीति
भी बताते हैं। पिछले चुनाव में हम धार्मिक मोर्चे पर हार गए थे। इस बार पार्टी इस मोर्चे पर पूरी तरह
मुस्तैद है और क्षेत्र में धार्मिक उन्माद रोकने की जिम्मेदारी हमने उठाई है। धार्मिक
कार्यक्रम तय किए गए हैं। क्षेत्र में चार दर्जन मंदिरों में शिवमयी का आयोजन किया
जा रहा है। मकसद साफ है कि धर्म के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर दिखाकर पार्टी इस सीट को भाजपा
के कब्जे से मुक्त कराना चाहती है। भाजपा भी धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजनों में कोई
कमी नहीं छोड़ रही है। वामपंथियों के गढ़ से यह सीट भाजपा की झोली में दिलाने पर बाबुल
सुप्रीमो को इनाम भी मिला और उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया। यहां उनके साथ-साथ भाजपा की प्रतिष्ठा भी दांव पर है सो वह स्वयं और पार्टी के कार्यकर्ताओं
द्वारा मेहनत में कहीं कोई कंजूसी नहीं कर रहे। वामपंथियों के लिए भी यह सीट प्रतिष्ठा
से जुड़ी है, लेकिन फिलहाल यहां लाल झंडा दूर ही दिख रहा है।
वामपंथी विचारधारा से प्रभावित सुदीप्तो मंत्री पर चोट करते हुए सवाल उठाते हैं कि
जब से वह भारी उद्योग मंत्री बने हैं तब से क्षेत्र की दो बड़ी कंपनियां केबल्स लिमिटेड
और बर्न स्टैंडर्ड कंपनी बंद हो गई हैं। सैकड़ों लोग बेरोजगार हो गए हैं। तृणमूल कांग्रेस
भी इसे मुद्दा बना रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष दोनों ने ही
पश्चिम बंगाल में इस बार पूरी ताकत लगा दी है। देखें कि दीदी के गढ़ में क्या कमल खिलेगा?
बिहार में वामपंथ का भविष्य कन्हैया पर टिका हुआ है
बिहार के चौथे चरण में 29 अप्रैल को
पांच संसदीय सीटों पर हो रहे चुनाव में सबसे ज्यादा फोकस इस समय बेगूसराय पर लगा हुआ
है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्मभूमि बिहार की बेगूसराय में इस बार चुनाव
नहीं बल्कि दो विचारधाराओं की जबरदस्त टक्कर है। एक के सामने फिर से खड़े होने की चुनौती
है तो दूसरे के सामने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का मौका है। माकपा के के उम्मीदवार
और जेएनयू छात्र नेता कन्हैया कुमार और भाजपा के फायर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह आमने-सामने हैं। चौथे चरण में 29 अप्रैल को 19 लाख 58 हजार मतदाता जब अपने मताधिकार का प्रयोग करने
जाएंगे तो उनके सामने तीसरा विकल्प भी होगा। राजद के तनवीर हसन को दोबारा उतारकर कन्हैया
की सियासी रफ्तर पर ब्रेक लगाने की कोशिश की है, ताकि लालू प्रसाद
यादव के उत्तराधिकारी का भविष्य महफूज रहे। बेगूसराय में कन्हैया कुमार के आने से देश
में वामपंथी विचारधारा को एक बार फिर प्रासंगिक होने का मौका मिला है। कम्युनिस्ट पार्टी
की चूलें पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा में भी हिल चुकी हैं। केरल एकमात्र एक राज्य
बचा है जहां आज भी वाम विचारधारा चल रही है। बिहार के लेलिनग्राड के नाम से मशहूर बेगूसराय
में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कन्हैया कुमार का प्रचार करने के लिए कई मशहूर हस्तियां
आ रही हैं। इसके साथ-साथ भूमिहार बहुल बेगूसराय में चारों तरफ
बिरादरी की बात भी उछाली जा रही है। गिरिराज और कन्हैया दोनों भूमिहार हैं। तनवीर मुस्लिम।
लिहाजा जाति-धर्म के आधार पर समीकरण बनाए-बिगाड़े जा रहे हैं। भाजपा के परंपरागत वोटर और जातीय समीकरण गिरिराज के काम
आ सकता है। ऐसा ही संयोग कन्हैया के साथ भी है। राजद के मजबूत माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण के सहारे
खड़े हैं तनवीर हसन। तीनों ही अपने-अपने एक तरह से अस्तित्व की
लड़ाई लड़ रहे हैं। कन्हैया की जीत बिहार में वामपंथ को पुनर्जीवन दे सकता है। हार
गए तो गिरिराज की हनक बढ़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है। बेगूसराय में आम जनमानस
में दो तरह के विचारों के बीच ही मुकाबला है। गिरिराज सिंह जिस तरीके की सियासत के
प्रतीक माने जाते हैं, कन्हैया की प्रसिद्धि उसके विपरीत है।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के परिसर में तीन साल पहले कन्हैया की मौजूदगी में जो कुछ भी हुआ, उसकी धमक बेगूसराय की गली-मोहल्ले में सुनाई देती है।
कन्हैया को कई जगह विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। उन्हें घर का बच्चा मानने वालों
के सामने उन पर देशद्रोह का आरोप लगाने वालों की संख्या भी कम नहीं है। भाजपा और राजद
के लोग इसे जमकर भुना
भी रहे हैं। कन्हैया को कठघरे में खड़ा करने की कवायद में न गिरिराज के लोग पीछे हैं
और न ही तनवीर के। बात छिड़ते ही दोनों खेमों पर देशभक्ति हावी हो जाती है। जाहिर है
कि दोनों में से कोई कामयाब हुआ तो खामियाजा वामपंथ को ही भुगतना पड़ेगा। भाजपा समर्थकों
का मानना है कि बेगूसराय में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आकर्षण बना हुआ है,
जबकि विपक्षी गठबंधन को उम्मीद है कि वह अपने सामाजिक अंकगणित से कई स्थानों पर इसकी काट
कर सकते हैं। कन्हैया अगर जीत जाते हैं तो अगली संसद में एक जोरदार वक्ता पहुंच जाएगा।
अगर मोदी जीतते हैं तो उन्हें संसद में कन्हैया का जबरदस्त सामना करना पड़ सकता है।
सीट बदलने के कारण गिरिराज सिंह का प्रचार-प्रसार धीमा शुरू हुआ
है और भाजपा के अंदर भी उन्हें नाकाम होने के प्रयासों से इंकार नहीं किया जा सकता।
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