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Saturday, 20 August 2011

यह आंदोलन भारत के लिए ही नहीं, सारी दुनिया के लिए उदाहरण है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20 August 2011
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस ने अन्ना हजारे के समर्थन में बड़ी तादाद में लोगों के आगे आने पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इस आंदोलन के पीछे अमेरिका का हाथ है। कांग्रेस का तर्प है कि अमेरिका ने कभी किसी आंदोलन के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की, मगर अन्ना के आंदोलन को लेकर अमेरिका की वकालत संदेह पैदा करती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अन्ना हजारे की गिरफ्तारी को लेकर संसद में दिए अपने बयान में विदेशी ताकतों का जिक्र किया है। मैं नहीं जानता कि इस आंदोलन के पीछे अमेरिका का हाथ है या नहीं। हां, अमेरिका जब भी किसी देश में सरकार दमनकारी कदमों पर लोकतांत्रिक तरीके से जनता आंदोलन करने को समाप्त करने पर उतर आए तो अमेरिका उस पर चेतावनीनुमा सुझाव जरूर देता है। उसने चीन, मध्य-पूर्वी देशों को भी ऐसी चेतावनी दी है और देता है। यह कहना इसलिए भी गलत लगता है कि जितनी अमेरिकापरस्त यह मनमोहन सिंह सरकार है उतनी तो स्वतंत्र भारत के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं होगी। सारा कांग्रेस नेतृत्व अमेरिकी हमदर्द है और यह बात कई बार साबित भी हो चुकी है। सो यह कहना अपनी समझ में तो आया नहीं। अगर कांग्रेस यह कहती कि कुछ ताकतें देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना चाहती हैं इसलिए अंदरुनी हालात अस्थिर कर रहे हैं तो भी बात समझ में आती। अन्ना के आंदोलन ने तो सारे पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं। टीम अन्ना ने कमाल कर दिया है। जिस तरीके से पिछले 3-4 दिनों से जनता सड़कों पर शांतिप्रिय तरीके से आंदोलन कर रही है वह अभूतपूर्व है। इतनी संख्या में लोग सड़कों पर हों और एक भी जगह लाठीचार्ज न हो, एक भी जगह राष्ट्रीय सम्पत्ति को नुकसान न पहुंचा हो यह भारत में क्या सारी दुनिया में एक उदाहरण है। लोगों का जज्बा देखने को मिलता है। बस, एक आवाज और इंडिया गेट पर एक लाख लोग। न कोई सियासी नेता न कोई रैली। इस तरह उमड़ते लोगों को दिल्ली क्या दुनिया ने भी कम देखा होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली और पूरे देश में तनी मुट्ठियां यह बता रही हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अब बात दूर तलक जाएगी। संसद से जुड़े राजपथ पर मुट्ठी बांधे, मशालें लिए और मोमबत्तियां जलाए हजारों लोग ठीक उस समय प्रदर्शन कर जनशक्ति दिखा रहे थे जब लोकसभा में भ्रष्टाचार रोकने की सियासत पर बहस चल रही थी और राज्यसभा भ्रष्टाचार के आरोपी एक जज के महाभियोग की सुनवाई कर रही थी। दिल्ली में ही क्यों बुधवार को पूरे देश में लोग इसी तरह उमड़ आए। मुंबई के आजाद मैदान से लेकर सुदुर लेह तक और चेन्नई से गुवाहाटी तक एक विराट आंदोलन लहरें लेता दिखने लगा है। तिहाड़ से अन्ना ने खासकर यह संदेश भिजवाया कि समर्थकगण अहिंसा के रास्ते को बनाए रखें, क्योंकि सरकार के कुछ लोग आंदोलनकारियों को उकसाने के लिए कुछ अफवाहों का सहारा ले सकते हैं। इससे सावधान रहने की जरूरत है।
कौन कहता है कि देश की युवा पीढ़ी देशभक्त नहीं? कई लोगों को लगता है कि हमारी युवा पीढ़ी के लिए न तो 15 अगस्त या 26 जनवरी कोई महत्व रखता है और वह देश की राजनीति, देश में क्या हो रहा है इसकी परवाह नहीं करते और न ही दिलचस्पी रखते हैं पर पिछले तीन दिनों ने इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है। पूरे देश में अन्ना के समर्थन में देश की युवा पीढ़ी सड़कों पर उतर आई है, जनलोकपाल बिल के समर्थन में और तिहाड़ में बन्द अन्ना हजारे की रिहाई की मांग को लेकर बुधवार को तिहाड़ जेल के बाहर दिल्ली के कोने-कोने से स्कूली छात्र पहुंचे। विशेष बात यह रही कि ये छात्र अपने स्कूलों से हॉफ-डे की विशेष अनुमति लेकर यहां पहुंचे थे। कुछ बच्चों ने तो यहां पहुंचने के लिए बाकायदा स्कूल से एक दिन की छुट्टी ली थी। दिल्ली विश्वविद्यालय ने छात्रों पर अन्ना का समर्थन करने पर पाबंदी लगा दी थी पर छात्रों ने इसकी परवाह नहीं की और किरोड़ीमल, मिरांडा हाउस, भीमराव अम्बेडकर जैसे कई कॉलेजों के छात्रों ने क्लास रूम से बाहर सड़क पर आकर प्रदर्शन किया, रैलियां निकालीं। छत्रसाल स्टेडियम पहुंची छात्राओं ने बताया कि मिरांडा हाउस में शिक्षक तो आए हैं पर क्लासें खाली हैं। सेन्ट स्टीफंस कॉलेज एल्यूमिनई एसोसिएशन की ओर से भी बहुत सारे पुराने छात्र अन्ना के समर्थन में आगे आए। जब 73 वर्ष का एक बुजुर्ग जेल जाने के बाद भी अपना अनशन न तोड़ें और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम जारी रखें तो भला उसका साथ हम छात्र कैसे न दें? उनकी अटूट इच्छाशक्ति देखकर हमारी आत्मा खुश हो जाती है, यह थी छात्रों की भावना। लोगों का जज्बा ऐसा अद्वितीय था कि तिहाड़ जेल के बाहर और छत्रसाल स्टेडियम में जनता वहां बैठे आंदोलनकारियों के लिए घंटों से खाने के पैकेट और पानी बांट रहे थे। ऐसे दृश्य इससे पहले कभी नहीं देखे गए। स्वेच्छा से, बिना कोई लीडर, बिना पार्टी, बिना पैसे जनता यूं सड़कों पर उतर आए, यह सारी दुनिया के लिए एक उदाहरण है। आप कहीं भी चले जाएं डिस्कशन का मुद्दा एक ही था। अन्ना हजारे। अन्ना की क्रांति बसों से लेकर चाय की दुकानों तक सभी जगह फैल गई है। अन्ना की आंधी सड़कों के साथ बसों में भी सवार है। मजे की बात यह है कि युवा, बुजुर्ग, महिलाएं, हर आयु वर्ग के लोग इस आंधी में शामिल हैं। सुबह पार्कों में घूमने वाले बुजुर्गों की टोली भी अन्ना के बहाने देश में कैंसर की तरह फैल रहे भ्रष्टाचार की समस्या पर चर्चा करते नजर आए। अन्ना के समर्थन में बुधवार को वकीलों का सैलाब सड़कों पर उतर आया। राजधानी की सभी छह जिला अदालतों में पूरी तरह हड़ताल रही। अन्ना की आंधी ने लोगों को प्रेम, सेवा और अनुशासन की डोर में बांध दिया है। तिहाड़ जेल के बाहर मंगलवार शाम से जुटे अन्ना समर्थकों के लिए स्थानीय लोग चाय-पानी और नाश्ता लेकर पहुंच गए। रातभर से थके-मांदे समर्थकों के लिए चादर, दरी लेकर दौड़े चले आए। अनुशासन इतना कि खाने की प्लेट, प्लास्टिक के गिलास और केले के छिलके भी उन्होंने साफ किए। समर्थकों की भीड़ की वजह से सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को कोई परेशानी न हो, इसके लिए उन्होंने खुद ही यातायात व्यवस्था की कमान सम्भाल ली। तिहाड़ जेल के विभिन्न गेटों के बाहर अन्ना के समर्थकों की वजह से जेल में राशन का जब टोटा पड़ा तो किरण बेदी ने जेल गेट नम्बर चार पर बैठे समर्थकों को गेट खाली करने की अपील की, जिसके बाद समर्थकों ने राशन लाने-जाने के लिए गेट खाली कर दिया। अन्ना का समर्थन कर रहे आंदोलनकारियों की तबीयत की देखभाल करने के लिए बाकायदा डाक्टरों ने अपनी एक टीम बना ली जिसने जरूरतमंद लोगों को सम्भाला। मजेदार बात तो यह थी कि विदेशी भी इस आंदोलन में साथ आ गए। फ्रांस की एक महिला कहती हैं कि आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत हथियार है। फ्रांसीसी अखबार में काम करने वाली जैनी का कहना है कि मैं इस आंदोलन के बारे में ज्यादा नहीं जानती लेकिन लोगों को अपने देश के लिए इस कदर आवाज उठाते देख अच्छा लगा। दो व्यक्ति तो इलाहाबाद से साइकिल से दिल्ली इसलिए आए ताकि वह अन्ना का समर्थन कर सकें। ऐसी जनभावना सालों के बाद दिखी है। राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के लिए पूरा देश एकजुट हो गया है। उस युवा पीढ़ी ने दिखा दिया है कि जरूरत पड़ने पर वह किसी से पीछे नहीं। इतने दिन से आंदोलन हो रहा है, हजारों लोग सड़कों पर हैं पर न तो कोई राष्ट्रीय सम्पत्ति को हानि पहुची है, न कोई बस जलाई गई, न ही कहीं आंसू गैस चली, लाठीचार्ज हुआ और गिरफ्तारी हुई पर हमें चौकस रहना होगा। अन्ना की टीम ने बड़े ही ढंग से अब तक आंदोलन को चलाया है पर कुछ तत्व इसे हिंसात्मक बनाने का प्रयास कर सकते हैं। वह तरह-तरह की अफवाहें फैला सकते हैं। ध्यान रहे कि एक भी चिंगारी काफी होगी। दुनिया को अन्ना हजारे ने दिखा दिया कि अहिंसा का रास्ता कितना प्रभावी आज भी है।
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Friday, 19 August 2011

Anna Hazare the Second Gandhi

- Anil Narendra
Monday the 16th August will always be remembered. It was no less than a film full of all suspense, drama, emotions. All eyes were riveted on Anna Hazare. People were anxious to know what Anna was going to do today. But Anna was true to his words. Despite all pressures, Anna was firm on his resolve and would remain so. With about 250 police personnel, senior officers of Delhi Police reached Prashant Bhushan’s flat in Supreme enclave in Mayur Vihar Phase-1 on the Monday morning, where Anna was staying. After futile discussions for half an hour, Police took Anna into custody. As Crime Branch officials accompanying Anna came out in an Innova car, a huge crowd surrounded it. People blocked the UP link road. Anna Hazare was brought to the Officers’ Mess at Alipur Road. Later, apprehending breach of peace, Anna’s arrest was announced. Fearing reactions from Anna supporters, the Police made arrangements to send him to an undisclosed location. Police took away Anna in a car. Uncertainty over Anna prevailed for about two hours. Police, too, refused to say anything in this regard. Anna along with the police team reached DCP office in Rajauri Garden at about 12.15 in the afternoon. He was produced before the Court of the Executive Magistrate. After Anna’s refusal to sign an affidavit, he was sent to judicial custody. At about 1515 hrs, the police team started for Tihar Jail along with Anna, but the agitating crowd outside DCP office started protesting. In the ensuing stone-pelting, window pane of Innova, in which Anna was traveling, was also broken. Police reached Tihar Jail with Anna at about 3.45 PM. Tihar authorities decided to lodge Anna in Jail No 4. His other associates – Arvind Kejariwal, Shanti Bhushan, Kiran Bedi were also brought to Tihar Jail after their arrest.
The news of Anna’s arrest spread all over the country like wild fire. The atmosphere was similar to that of JP Movement’s. People were on streets, they were raising slogans and there was demonstration of solidarity among the people that included women, children, elders etc. But there was a great difference between JP and Anna movements. And the difference was that of the presence of electronic media. Television had made a significant difference. Not only in India, but all over the world, the news of Anna’s arrest was being watched/listened with great interest. Public in many cities took to the streets and sit-ins and demonstrations began. Perhaps, the Central government was not expecting of such a massive support to Anna’s movement. The decision to take Anna to Tihar proved that the Manmohan Singh government is loosing its ability to take logical decisions, which according to an adage happens in the face of doomsday. Anna was taken to same Jail, where corrupt persons like A Raja, Kanimojhi, Suresh Kalmadi were lodged. What an irony that a person who, like Gandhiji, is carrying a non-violent crusade against corruption, had been taken to a jail, where great names accused of corruption had gathered. Even the prisoners of Tihar started raising slogans in support of Anna. According to sources, even the security personnel posted there were eager to get a glimpse of Anna. Some of the prisoners said that it can be understood that persons like them are put behind bars, but what is the logic behind the arrest of a person like Anna Hazare?, He is just following Gandhian principles of protest and leading an anti-corruption movement for the relief of common man. What is the fault of such people for which they are being put behind the bars? They wanted to see such people. Sources say that some of the prisoners expressed their desire to be part of this movement after being released from the Jail, while others offered to go on fast for a day. When Anna Hazare was in jail, large number of people had thronged the Tihar and they were exhibiting their support to Anna Hazare and at India Gate, people were taking a candle march at the same time. Chhatrasal Stadium, where agitators were being kept, was resounding with slogans and electronic media was reporting about public coming to streets all over the country. The government was seething with anger over the support Anna was getting and action taken by the Delhi Police was perhaps, unprecedented. It had sent an order to Tihar authorities to release Anna unconditionally. This time the Delhi Police acted a little sensibly. There was no repetition of the use of force that was witnessed on 4 June to oust the supporters of Baba Ramdev from Ramlila Grounds and the Police handled this whole episode with maturity.
Anna movement was at its peak. The issue for which Anna was agitating was different from that of Baba Ramdev. Real issue was corruption and price rise. People have come to the conclusion that corruption is the real cause for the present inflation and this government is neither interested in curbing the corruption nor controlling the inflation. I live in Sunder Nagar. On my return to my home on Tuesday I came across a copy of a circular by the Sunder Nagar Association, which was sent to all the residents. It had an appeal to all the residents to keep their lights off in the evening from 7.00 to 8.00 and lend their support to anti-Corruption movement. With these types of passions running high among common man, you can easily guess how popular the Anna mission has become. Anna is right when he says that the corruption can be mitigated by the Jan Lokpal Bill, but cannot be ruled out completely. Anna’s mission could be considered successful, if at least 65 per cent corruption is reduced.
At present, Anna is firm on his resolve in Tihar. It appears from the news that were coming till the writing of this article that Anna has refused to leave the premises of Tihar until allowed to undertake his protests unconditionally. He is insisting that the terms imposed on his protest fast must be removed. Jail authorities have declared his release, but Anna has refused to step out of the Jail. Tihar Jail spokesman Sunil Gupta says that superior officers have been informed about the terms that have been put forward by Anna for his release. The Manmohan government has failed to feel the pulse of the public. In fact, this government has failed from the beginning to properly gauge the public support, the Anna Movement was gaining. That is why picture of government’s insincerity and anger has emerged and the adage that with approaching doom, a person looses prudence also hold good in the present context. The direction of Gandhian Anna’s movement and massive support to it all over the country proved a serious irritant for the government. The government had to suffer disgrace in the face of efforts to stop Anna’s protest fast. That is why, the Delhi Police which had arrested Anna in the morning, was continuously appealing to him in the evening to step out of the jail. Police withdrew all cases against him, but Anna was adamant to remain in the jail till he is not given written permission to hold protest at JP Park. After his arrest, Anna said that the second movement of independence has begun and that though he has been arrested, but his movement is not going to stop on any account. He said that the real faces of the corrupts have been unveiled. This is a struggle for change. Rule of the people could not be materialized till the change is not brought about. He said that the time has come, when all people should offer arrest and not a single jail in the country should remain vacant. All supporters should take eight days’ leave from their jobs and join the movement. He said the movement would be strengthened, only if people in large numbers join it.

मनमोहन सरकार की मिसहैंडलिंग का नतीजा है यह विस्फोटक स्थिति


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 August 2011
अनिल नरेन्द्र
तिहाड़ जेल के बाहर का दृश्य काहिरा के तहरीर चौक जैसा बना हुआ है। जेल के अन्दर अन्ना हजारे और जेल के बाहर जनता। अगस्त क्रांति चौक बन गया है दिल्ली का जेल रोड। हजारों की संख्या में पब्लिक जेल के बाहर घंटों से डटी हुई है। बुधवार को सारा दिन यही नजारा रहा और बृहस्पतिवार सुबह इस लेख लिखने तक भी नजारा वैसा ही था। जिस तरीके से इस सरकार ने अन्ना की मूवमेंट को हैंडल किया है उसकी जितनी भी निन्दा की जाए कम है। एडमिनिस्ट्रेशन के लिहाज से जितने तरीके की नाकामी हो सकती है, हम उन सभी को गिना सकते हैं। पिछले दो-तीन दिनों से जो कुछ हो रहा है उससे लगता है कि संप्रग सरकार का खुफिया आंकलन तो फेल हुआ ही बल्कि विल पॉवर की कमी नजर आती है और टोटल कंफ्यूजन है, कानून का मजाक बना है, पुलिस की फजीहत के साथ ही मॉरल डाउन होने जैसे हालात बन गए हैं, यानि जिसे कहें टोटल मिसहैंडलिंग। सरकार का दिमाग ही साफ नहीं है। कभी कुछ तो कभी कुछ? इंटेलीजेंस फेल्योर जैसी हालत दिखती है। यह आंकलन ठीक से नहीं हुआ कि अन्ना की गिरफ्तारी के नतीजे दिल्ली और देश में क्या हो सकते हैं? यह हालत तो तब है जब सरकार गत अप्रैल से जन्तर-मन्तर पर अन्ना के अनशन को मिले पब्लिक रिस्पांस को देख चुकी थी? बाबा रामदेव से चार-चार मंत्री एयरपोर्ट मिलने जाते हैं, फिर पुलिस से एक्शन कराते हैं, अन्ना हजारे से बातचीत करते हैं, फिर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर अंधाधुंध अटैक कर डालते हैं, पब्लिक में गुस्सा भर डालते हैं, अनशन पर रोक लगवाते हैं, फिर अरेस्ट होती है, तिहाड़ भेज देते हैं, फिर उसी शाम छोड़ने का फैसला भी करा देते हैं और अन्ना को बाहर आने के लिए नहीं मना पाते हैं? यह क्या हो रहा है? पुलिस और कानून का इस तरह का तमाशा कम से कम दिल्ली में तो शायद ही कभी बना हो? जैसा किसी ने कहा कि हम वैलफेयर स्टेट हैं, वैलफेयर स्टेट में जन भावनाओं से बड़ा कुछ भी नहीं है, लेकिन उस बारे में पहले से सही आंकलन करना, उस हिसाब से कानून की, पुलिस की तैयारी कराना किसका काम है? इस तरह का आंकलन और तैयारी क्यों नहीं हुई कि कानून और पुलिस इस हालत से बच पाते? सरकार की इस मिसहैंडलिंग का नतीजा यह है कि आज पब्लिक सड़कों पर उतर आई है। काहिरा के तहरीर चौक पर भी इसी तरह पब्लिक सड़क पर आ गई थी। दरअसल यह कहना गलत नहीं होगा कि अन्ना हजारे का आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक नई सुबह लेकर आया है। रालेगण सिद्धी से उठा एक व्यक्ति जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण की तरह मुख्यत भ्रष्टाचार के विरोध में देश की आवाज बन जाता है और जिस तरह से समूचे देश में लोग सड़कों पर उतर आते हैं, यह चौंकाने वाला दृश्य भी है। कभी-कभी यह आक्रोश देश की परिभाषा और भूगोल, दोनों को बदल देता है। समूचे विश्व में पिछले दिनों में जितनी भी क्रांतियां हुई हैं, उनके केंद्र में युवा शक्ति और उसकी सोच रही है। यह सोच उस समय और भी धार पकड़ लेती है, जब उसके साथ राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे जुड़ जाते हैं। आज देश सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार, लूट और महंगाई से त्रस्त है और पिछले 64 वर्षों से जिस तरह की सामाजिक व्यवस्था की गंध ने भारतीय समाज और लोकतंत्र को ग्रस्त किया है, उससे आम आदमी का भरोसा सरकार से, लोकतांत्रिक व्यवस्था से ही उठने लगा है और यह सबसे ज्यादा खतरनाक है। सरकार ने कभी भी जनता की परवाह नहीं की, खासकर इस सरकार ने। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, लूटमार इनसे जनता तंग आ चुकी है। कटु सत्य तो यह है कि जिस भारतीय लोकतंत्र में सबको समान अधिकारों की गारंटी भारत का संविधान देता है, उसमें सबसे दुःखी और हताशा में डूबे आखिरी आदमी को इस व्यवस्था में लगने लगा है कि शायद उसका इस व्यवस्था में कोई स्थान नहीं रह गया है। अन्ना के आंदोलन के साथ जिस तरह का सलूक मनमोहन सरकार कर रही है, उससे साफ है कि कांग्रेस एक बार फिर 37 साल पुरानी रिवायत को दोहरा रही है। तब जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को भी कुछ इसी अंदाज में दबाने का प्रयास हुआ था। लेकिन तब कांग्रेस में मोहन धारिया, चन्द्रशेखर, रामधन, कृष्णकान्त जैसे युवा तर्प के तौर पर समाजवादी थे। इनमें से एक चन्द्रशेखर ने साहस दिखाकर इन्दिरा गांधी को समझाने की कोशिश भी की थी। उन्होंने कहा था, जेपी संत हैं, संत से मत टकराओ। संत से जो सत्ता टकराती है, वह चूर-चूर हो जाती है। इतिहास गवाह है कि जयप्रकाश से टकराना कांग्रेस और इन्दिरा गांधी के लिए कितना महंगा साबित हुआ और 1977 के चुनावों में कांग्रेस चारों खाने चित्त हो गई थी। आज कांग्रेस पार्टी में कोई ऐसा दमदार नेता नजर नहीं आता जो मनमोहन सिंह सरकार को बता सके कि जिस रास्ते पर वह चल रही है उसका अन्त अच्छा नहीं। कहीं यह ही न हो कि हम तो डूबे हैं तुम्हें साथ ले डूबेंगे? मनमोहन सरकार को बहरहाल इस बात का धन्यवाद जरूर देना पड़ेगा कि आज उसकी हिमाकत की वजह से पूरा देश एक हो गया है और राष्ट्रीय ध्वज की इज्जत की खातिर जनता सड़कों पर उतर आई है। हमने इसी कॉलम में इस सरकार को बार-बार चेताया कि हालात इतने न बिगड़ने दो कि बाजी हाथ से ही निकल जाए।
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राज्यसभा में जस्टिस सेन के खिलाफ महाभियोग


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 August 2011
अनिल नरेन्द्र
राज्यसभा में बुधवार को एक ऐतिहासिक घटनाक्रम आरम्भ हुआ है। कोलकाता हाई कोर्ट के एक जज सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया राज्यसभा में आरम्भ हो गई है। उच्च सदन के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है। वैसे न्यायमूर्ति सेन देश के न्यायिक इतिहास में ऐसे दूसरे जज होंगे जिनके खिलाफ संसद के किसी सदन में महाभियोग कार्यवाही की जा रही है। राज्यसभा पहली बार एक अदालत की तरह तब्दील हुई। सदन के आसन के सामने वाले प्रवेश द्वार में कठघरे में जस्टिस सेन ने अपना पक्ष रखा। न्यायमूर्ति सौमित्र सेन पर लगे आरोपों की जांच के लिए समिति राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने बनाई थी। समिति ने 53 साल के जज को भ्रष्टाचार के आरोपों में दोषी पाया है। संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी जज को संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाकर ही पद से हटाया जा सकता है। ऐसा प्रस्ताव दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित होना जरूरी है। कदाचार और अयोग्यता साबित करने वाले प्रस्ताव का संसद के समान सत्र में ही पारित होना जरूरी है। संसद के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब किसी जज को हटाने के लिए कार्यवाही की जा रही है। 1993 में न्यायमूर्ति रामास्वामी को हटाने के लिए इस तरह की कार्यवाही शुरू हुई थी। लेकिन लोकसभा में इससे संबंधित महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया था। तब क्षेत्रीय आधार पर सांसदों में मतभेद हो जाने का फायदा भ्रष्टाचार के आरोपी जज को मिल गया था। तब कांग्रेस के यही श्री कपिल सिब्बल न्यायमूर्ति रामास्वामी की ओर से पैरवी करने लोकसभा में पेश हुए थे। नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने महाभियोग प्रस्ताव का विरोध करने का फैसला करके सबको चौंका दिया था। पहला महाभियोग प्रस्ताव खारिज होने के बाद उच्च न्यायपालिका में जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतें बढ़ गईं थी। राज्यसभा में जो प्रस्ताव जस्टिस सेन के खिलाफ पेश किया गया है उसका मूल पाठ कहता है कि यह सदन कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ कथित कदाचार के सबूतों और जांच के संबंध में जांच समिति की उस रिपोर्ट पर विचार करता है जो 10 नवम्बर 2010 को सदन के पटल पर पेश की गई थी। सभापति हामिद अंसारी ने 15 फरवरी को न्यायमूर्ति सेन को हटाए जाने संबंधी प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था। उधर सिक्किम हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीडी दिनाकरन के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए भी राज्यसभा के सभापति ने न्यायिक समिति का गठन किया है। हालांकि न्यायमूर्ति दिनाकरन ने पिछली 29 जुलाई को खुद ही पद से इस्तीफा दे दिया। अगर न्यायमूर्ति सेन भी इस्तीफा दे देते तो उनके खिलाफ भी कार्यवाही न होती। संसद के दोनों सदनों में जो रिपोर्ट तीन सदस्यीय जांच समिति ने पेश की थी उसमें कहा गया कि न्यायमूर्ति सौमित्र सेन को भारत के संविधान के अनुच्छेद 217(1) के (ब) खंड के साथ अनुच्छेद 124(बी) के तहत कदाचार का दोषी पाया गया है। सुप्रीम कोर्ट के जज बी. सुदर्शन रेड्डी की अध्यक्षता वाली जांच समिति ने कहा है कि कोलकाता हाई कोर्ट के रिसीवर के रूप में न्यायमूर्ति सेन द्वारा बड़ी धनराशि की अनियमितता करने और इस संबंध में गलत तथ्य पेश करने के आरोप उचित रूप से सही साबित हुए हैं।
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Thursday, 18 August 2011

No end in sight to the dark night in the British Empire, where ‘the Sun never used to set’

- Anil Narendra
There was a time, when the British used to say arrogantly that the Sun never sets in the British Empire. It was so vast an Empire that a large portion of the World was under the domain of the British. With every manipulation, they tried to retain their Empire world over. But, situation has changed gradually. And now, it appears that the Sun is not rising in England. For the last 5-6 days, England is in the grip of worst ever violent riots England has seen in last 30 years. The British Prime Minister David Cameron said on Thursday that the Police had admitted that their riot tactics were wrong. Addressing the House of Common in England, Cameron announced a relief package of 10 million pounds as compensation to the losses in a number of cities during these riots. The violence sparked after the death of Mark Duggan, a Black of African origin in police firing on last Aug 4 in Tottenham, has spread to Manchester, Salford, Liverpool, Nottingham, Leicester and Birmingham. People of England are considered to be gentlemen, but the Saturday riots have proved that they are also the biggest looters. More than 1,300 persons have been arrested in this connection and these also include persons, who are least expected to resort to loot and plunder. Probably not a single person of these, has a police record. The youngest of these is an eleven year old boy, where as Laura Johnson, daughter of a millionaire parents is also involved in these riots. A teacher has also been arrested. Those arrested also include a housewife. Most of them were produced before a court in London. It was expected that the court would release them, but it has not acquitted any one of them. The most startling name in these rioters is that of Laura Johnson, whose parents Lindsey and Robert Johnson live in a mansion in Orpington, which has all the amenities like swimming pool, tennis court etc. Laura got her education from St Olave Grammar School, Kent, one of the most expensive London schools. When she was arrested, her car was laden with looted goods, worth 5,000 pounds. These goods included a Toshiba TV, microwave oven and mobile phone. It appeared, as if gangsters were ruling over London and other cities. The Englishmen were also seen leading loot and plunder. These rioters and anti-social elements also targeted Asians. Three British citizen of Asian origin (all Muslims of Pak origin) were trying to protect people from their community, but a fast approaching ran over them. The dead have been identified as Shahzad, Harry Hussein and Musavvar Ali. Shahzad and Hussein are brothers. According to reports from Birmingham, these three persons had come out of the mosque and were on the street to protect their car washing company. A fast approaching car of rioters crushed all three of them. They were of 31, 30 and 20 years of age. A British Police official has said that incidents of riots and loot in Manchester were examples of pointless violence and foolish crimes and incidents on such a large scale have not happened during last thirty years. Violence of this magnitude has never been witnessed.
As riots spread all over England and British citizens of Asian origin were convinced that the Police failing in controlling the rioters, all the Indian, Pakistani and Bangladeshi residents of London suburb of South Hall, known as little India, whether they were Hindu, Muslims or Sikhs, assembled and took the control of the situation. Armed with kirpans and hockey sticks they came out in the streets. The Black rioters tried to attack a jewelry shop in South Hall on Monday night. The shop belonged to a Punjabi family living in West Ealing. Immediately a message gone around the entire South Hall that Asian shops, particularly jewelry shops were likely to be targeted by the rioters and looters. Around 300 persons gathered on the streets and they took positions outside Shriguru Singh Sabha Gurudwara and a big mosque. British Prime Minister David Cameron has admitted that the Police failed to handle the riots properly. When the matter concerns Englishmen’s own home, they avoid firing. Readers may be surprised to learn that the Police was not allowed to fire in face of such terrible riots. At last, now they are talking of allowing the use of water cannons and rubber bullets. They are the same Britishers, who had sprayed bullets on peaceful Indians in Jalianwala Bagh. During India’s freedom movement, patriots were tortured by the Britishers, but there is restriction on firing in their own country. You will be surprised to learn that there are only 32,500 police personnel for London city and of these, only 2,740 are armed and rest are engaged in controlling these riots with the help of canes. Even the Armed Forces were not called in. When we see all this, we realize that we are better equipped and capable of dealing with riots and arsons.
The riots sparked in England have raised a number of questions and have made it clear that it is not a matter of law and order alone, but the policies of Tory-Liberal Democratic Alliance government and to some extent the latent sense of insecurity among Englishmen are responsible for such a situation. In fact, Britain, who had expanded its empire world over, is now sitting on a volcano. About five million people have not only migrated from different countries, but they have taken the citizenship of Britain and population of such people is around eight per cent of the total population of Britain. In comparison to the Englishmen, there is vast difference in the standard of living and their economic condition of people of Asian, African and Caribbean origin. The unemployment rate among the people of Black origin is three times to that of Englishmen’s. A large number of Asians and people of other origins have attained tremendous prosperity, but the common Englishman has not been able to accept easily the people of erstwhile British colonies. Death of a youth of African-Caribbean origin, Mark Duggan in police firing is stated to be the cause of these riots. In fact, this incident has ignited the spark, but its spread to cities like London, Manchester, Salford, Liverpool, Nottingham, Leicester and Birmingham within four days, indicates that smoldering fire within, has flared up. The areas, where these riots have spread, are thickly populated with people of Indian, Pakistani and Bangladeshi origin. Considering the violence unleashed by the rioters, it appears that elements, solely concerned with loot, have joined these rioters. Some enthusiasts have also joined hands with the rioters just for the kick of it, who in fact have no need to involve themselves in such acts. What was the need for Laura Johnson to resort to looting during the riots? In fact, Tory-Liberal Democratic government is also responsible for this explosive situation. The poor, unemployed citizens of Britain have to bear the brunt of the impact of the cuts imposed in budget and other expenditure by this government. This is a problem, which is a challenge for every civilized nation, particularly developing nations. It is more important to consider this as England is prominent among the democracies which are often cited world over for better reasons. India, too can learn something out of it. The widening gap between ‘have nots’ and ‘haves’ is neither good for the country nor for our democracy. Wealth is increasing, but the gap between poor and rich is not reducing. In any case, the biggest challenge before the Britain Prime Minister David Cameron is to control these riots at the earliest and the government should review its policies, which have led to these riots. If the Indian team, which is playing cricket during its England tour, follow suit and return home after canceling the tour, as was done by the England cricket team during Mumbai riots, then how will the Englishmen feel?

अन्ना की आंधी है, ये दूसरे गांधी हैं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 August 2011
अनिल नरेन्द्र
मंगलवार 16 अगस्त का दिन हमेशा याद रहेगा। यह कोई फिल्म से कम नहीं था। पूरे दिन में सस्पेंस, ड्रामा, एमोशन सभी देखने को मिले। सारे देश की नजरें अन्ना हजारे पर टिकी हुई थीं कि देखें आज अन्ना क्या करते हैं। अन्ना अपने कहने पर खरे उतरे। तमाम तरह के दबावों के बावजूद अन्ना अपने स्टैंड पर कायम रहे और रहेंगे। मंगलवार को सुबह दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अफसर करीब ढाई सौ जवानों को लेकर मयूर विहार फेस-1 स्थित सुपीम एंक्लेव में पशांत भूषण के फ्लैट पहुंचे। करीब आधा घंटे तक मंत्रणा के बाद कोई नतीजा निकलता न देखकर पुलिस ने अन्ना को जो इसी फ्लैट में रुके थे, को हिरासत में ले लिया। अन्ना को जैसे ही इनोवा कार में लेकर काइम ब्रांच के आदमी बाहर निकले गाड़ी को हुजूम ने घेर लिया। लोगों ने यूपी लिंक रोड जाम कर दी। अन्ना हजारे को अलीपुर रोड स्थित ऑफिसर्स मैस लाया गया। बाद में अन्ना को शांति भंग करने की आशंका में गिरफ्तार करने की घोषणा हुई। अन्ना समर्थकों के डर से पुलिस ने उन्हें अज्ञात स्थान पर भेजने की तैयारी की। पुलिस अन्ना को गाड़ी में बिठाकर ले गई। लगभग दो घंटे तक अन्ना को लेकर संशय की स्थिति बनी रही। पुलिस ने भी इस बारे में कुछ कहने से इंकार कर दिया। लगभग सवा बारह बजे अन्ना को लेकर पुलिस टीम राजौरी गार्डन स्थित पुलिस उपायुक्त कार्यालय पहुंची। यहीं विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में अन्ना हजारे को पेश किया गया। अन्ना के शपथ पत्र देने से इंकार करने पर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। दिन के लगभग सवा तीन बजे अन्ना हजारे को लेकर पुलिस टीम तिहाड़ जेल के लिए रवाना हुई। लेकिन उपायुक्त कार्यालय के बाहर जमा भीड़ ने विरोध पदर्शन शुरू कर दिया। पथराव में अन्ना हजारे को ले जा रही इनोवा कार का शीशा भी टूट गया। लगभग पौने चार बजे शाम अन्ना हजारे को लेकर पुलिस तिहाड़ जेल पहुंची। तिहाड़ अधिकारियों ने अन्ना को जेल संख्या चार में रखे जाने का निर्णय किया। उनके अन्य सहयोगियों, अरविन्द केजरीवाल, शांति भूषण, किरण बेदी को भी गिरफ्तार कर तिहाड़ लाया गया।
अन्ना की गिरफ्तारी की खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई थी। कुछ-कुछ माहौल वैसा ही था जो एक जमाने में जेपी मूवमेंट के समय बना था। जनता सड़कों पर उतर आई थी, नारे लग रहे थे, औरतें, बच्चे, वृद्ध सभी एकजुट होते नजर आए। जेपी मूवमेंट और अन्ना मूवमेंट में एक बहुत बड़ा फर्प नजर आया। वह था इलैक्ट्रानिक मीडिया का आना। टीवी से जमीन आसमान का फर्प पड़ गया है। अन्ना को पुलिस तिहाड़ जेल ले गई है यह खबर भारत के कोने-कोने में तो पहुंची ही पर विदेशों तक उसी समय पहुंच गई। देश के कई शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए, धरने-पदर्शन आरम्भ हो गए। केन्द्र सरकार को शायद यह उम्मीद नहीं रही होगी कि अन्ना को ऐसा जन समर्थन मिलेगा। विनाश काले विपरीत बुद्धि यह कहावत मनमोहन सिंह सरकार पर अन्ना को तिहाड़ ले जाने से साबित होती है। अन्ना को उसी तिहाड़ जेल में ले जाया गया जहां ए. राजा, कनिमोझी, सुरेश कलमाड़ी जैसे भ्रष्ट लोग जमा हुए थे। जो आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ गांधीगिरी से विरोध कर रहा है उसको उसी जेल में ले जाया जाए जहां भ्रष्टाचार के आरोप में यह दिग्गज जमा हैं कितनी विरोधाभास है। तिहाड़ में कैदियों तक में अन्ना के समर्थन में नारे लगने लगे। सूत्रों की माने तो जब अन्ना को शाम को तिहाड़ लाया गया तो यहां के सुरक्षा कर्मियों तक को अन्ना को देखने की लालसा थी। कुछ कैदियों का कहना था कि हमें बंद करें तो बात समझ में आती है मगर अन्ना हजारे जैसे व्यक्ति को गिरफ्तार करना कहां से तर्पसंगत है? यह तो एक आम इंसान की दिक्कत व देश को खोखला करने वालों को सजा दिलवाने के लिए लोकपाल बिल लाने के लिए गांधीगिरी के साथ लेकर अनशन कर रहे हैं। इनका इसमें दोष क्या है, जो इनको बंद या सजा दे रहे हैं? ऐसे लोगों को वह देखना चाहते हैं। सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि कुछ कैदियों ने बाहर निकलकर उनके मिशन का हिस्सा बनने की भी बात की तथा कुछ ने एक दिन अनशन करने की बात कही। जब अन्ना हजारे जेल में बंद थे, उनके हजारों समर्थक जेल के बाहर पदर्शन कर रहे थे, नारे लगा रहे थे उसी समय इंडिया गेट पर कैंडल मार्च हो रहा था। छत्रसाल स्टेडियम में जहां आंदोलनकारियों को रखा गया था जमकर नारे लग रहे थे, पूरे देश से जनता के सड़कों पर आने की रिपोर्टें टीवी पर आ रही थीं। सरकार अन्ना के समर्थन को देखकर बौखला गई और दिल्ली पुलिस ने वह काम किया जो उसने शायद पहले कभी नहीं किया था। उसने तिहाड़ में अन्ना को बिना शर्त छोड़ने का आदेश भेज दिया। इस बार दिल्ली पुलिस ने थोड़ी होशियारी से काम लिया। उसने 4 जून को जिस तरह बाबा रामदेव के समर्थकों को रामलीला मैदान से बल पयोग करके खदेड़ने के लिए लाठी, डंडे का सहारा लिया था इस बार वह नहीं देखने को मिला और पुलिस ने मैचयूरिटी से सारे मामले को हैंडल किया।
अन्ना का आंदोलन अब पूरा रंग ले चुका है। अन्ना मुद्दा, बाबा रामदेव जैसा मुद्दा नहीं। असल मुद्दा है भ्रष्टाचार और महंगाई। जनता का अब मानना है कि भ्रष्टाचार की वजह से ही महंगाई बढी है और यह सरकार न तो भ्रष्टाचार रोकने में या महंगाई कम करने में दिलचस्पी रखती है। मैं सुंदर नगर में रहता हूं। मंगलवार शाम को जब मैं घर लौटा तो हमारी सुंदर नगर एसोसिएशन से एक सर्कुलर पड़ा हुआ था। यह सर्पुलर सारे सुंदर नगर निवासियों को भेजा गया था। इसमें लिखा था कि आज शाम 7 से 8 बजे तक बत्ती बंद रखें और भ्रष्टाचार मुक्त आंदोलन का समर्थन करें। जब जनता में इस पकार का जज्बा हो तो आप खुद ही अन्दाजा लगा सकते हैं कि अन्ना का आंदोलन कितना जनपिय हो चुका है। अन्ना ठीक ही कहते हैं कि जनलोकपाल बिल से भ्रष्टाचार मिट नहीं सकता, कम जरूर हो सकता है। 65 पतिशत तक भ्रष्टाचार कम हो जाए तो अन्ना का मुहिम सफल माना जाएगा।
फिलहाल अन्ना तिहाड़ में ही अपनी बात पर अडिग जमे हुए हैं। इस लेख लिखने तक जो खबरें आ रही हैं उससे पता लगता है कि अन्ना ने तिहाड़ जेल से रिहा होने से मना कर दिया है। उनकी मांग है कि अनशन के लिए लगाई गई शर्तें रद्द की जाएं। जेल पशासन ने उन्हें रिहा करने की घोषणा कर दी है पर अन्ना ने जेल से बाहर निकलने से इंकार कर दिया है, तिहाड़ जेल के पवक्ता सुनील गुप्ता ने बताया कि अन्ना हजारे की शर्तें आला अफसरों तक पहुंचा दी गई हैं। जनता की नवज पहचानने में मनमोहन सरकार नाकाम रही है। यह सरकार शुरू से ही अन्ना आंदोलन को मिलने वाले जन समर्थन को सही से आंकने में फेल रही। इसी वजह से जहां एक तरफ सरकार के खोखलेपन, बौखलाहट की तस्वीर आई वहीं विनाशकाले विपरीत बुद्धि भी फिट बैठी है। गांधीवादी अन्ना हजारे का सत्याग्रह तेवर और उनके समर्थन में मंगलवार को देशभर में उमड़ा जन सैलाब सरकार के लिए भारी साबित हुआ। लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना को अनशन से रोकने की कोशिश में सरकार को मुंह की खानी पड़ी। इसीलिए अन्ना को सुबह गिरफ्तार करने वाली दिल्ली पुलिस रात तक उन्हें तिहाड़ जेल से बाहर आने के लिए मिन्नतें करती रही। पुलिस ने उनके खिलाफ सभी मामले वापस ले लिए लेकिन अन्ना जेल में रहने पर अड़ गए। उन्हें बाहर आने के लिए जेपी पार्प में अनशन करने की लिखित अनुमति देने की शर्त अन्ना ने रखी है। गिरफ्तारी के बाद अन्ना ने कहा कि आजादी का दूसरा आंदोलन शुरू हो गया है और मुझे गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन मेरी गिरफ्तारी से आंदोलन कतई थमने वाला नहीं। भ्रष्टाचारियों का असली चेहरा सामने आ गया है। यह परिवर्तन की लड़ाई है। जब तक परिवर्तन नहीं आएगा तब तक लोकशाही हासिल नहीं होगी, समय आ गया है कि सभी लोग गिरफ्तारी दें और देश में कोई भी जेल खाली न बचे। सभी समर्थक आठ दिनों तक अपने काम से छुट्टी लें और आंदोलन में कूद पड़ें। लोगों के बड़ी संख्या में शामिल होने से ही यह आंदोलन मजबूत होगा।
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Wednesday, 17 August 2011

अगस्त क्रांति ः सरकार और अन्ना की आरपार की लड़ाई


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 August 2011
अनिल नरेन्द्र
आजादी की वर्षगांठ पर ही एक बड़े संघर्ष की घोषणा हो गई है। आजादी की 64वीं वर्षगांठ पर एक तरफ प्रधानमंत्री और उनकी सरकार है तो दूसरी तरफ अन्ना हजारे और उनकी सिविल सोसाइटी। एक तरफ सर्वशक्तिमान सरकार है जो हर हालत में अन्ना के आंदोलन को दबाना चाहती है तो दूसरी तरफ आम जनता का समर्थन पा रहे भ्रष्टाचार समाप्त करने की लड़ाई लड़ने पर आमादा अन्ना हजारे। अपने वायदेनुसार अन्ना ने मंगलवार सुबह अपना आमरण अनशन शुरू करने का प्रयास किया पर उन्हें रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ अन्ना के खास समर्थक शांतिभूषण, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी को भी हिरासत में ले लिया गया। इससे पहले 15 अगस्त का दिन गहगमा का रहा। सुबह स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री ने देश को प्राचीन लाल किले परिसर से संबोधित किया। अपने संबोधन में डॉ. मनमोहन सिंह ने अन्ना को सीधी चुनौती दे डाली। उन्होंने कहा कि अनशन से नहीं मिटेगा भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल लाने की लड़ाई लाल किले से और तीखी हो गई। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के दामन पर दाग को स्वीकारते हुए इस बीमारी से लड़ने में अपने संकल्पों की सफाई तो दी, लेकिन भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अनशन को गलत करार दिया। राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ियां बेनकाब होने के बाद पहली बार लाल किले परिसर पर झंडा फहरा रहे पीएम ने सरकारी खरीद में घोटालों, ठेकों में बेइमानी, विवेकाधीन अधिकारों के दुरुपयोग समेत केंद्र सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के छींटों को बेबाकी से स्वीकारा। मनमोहन सिंह ने कहा कि शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मजबूत लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया है। इसके कुछ मुद्दों पर मतभेद हैं, जो लोग इससे सहमत नहीं हैं, वे अपना नजरिया संसद को बता सकते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि इसके लिए भूख हड़ताल का सहारा नहीं लेना चाहिए।
दूसरी ओर अन्ना हजारे ने नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में एक प्रेस कांफ्रेंस कर प्रधानमंत्री, कपिल सिब्बल इत्यादि के प्रश्नों का खुलकर जवाब दिया। अन्ना ने किसी कीमत पर नहीं झुकने के अपने इरादे तो किए ही, प्रधानमंत्री की ओर से लाल किले की प्राचीर से खुद को दी गई सलाह का जवाब भी दे दिया। इसी तरह उन्होंने दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल की ओर से `जन लोकपाल' के खिलाफ दिए तर्कों को भी छलनी कर दिया। प्रधानमंत्री के तर्कों को पूरी तरह नकारते हुए अन्ना ने कहा, `मैं न तो संसद के खिलाफ हूं, न ही संसदीय प्रक्रिया के। लेकिन प्रधानमंत्री जी, आप संसद के सामने सही बिल तो रखिए।' प्रधानमंत्री पर सीधा हमला करते हुए अन्ना ने कहा, `मैं कई बार कहता था कि प्रधानमंत्री अच्छे आदमी हैं, लेकिन ये तो कपिल सिब्बल की ही भाषा बोल रहे हैं।' अपने इरादों को जाहिर करते हुए अन्ना ने कहा, `मैं मंगलवार सुबह 10 बजे जेपी पार्प पहुंच जाऊंगा। अगर पुलिस गिरफ्तार करती है तो जेल में अनशन करूंगा, छोड़ी देती है तो फिर जेपी पार्प कूच करूंगा।' अब यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के तर्कों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, `मैं 100 फीसदी तो गारंटी नहीं दे सकता, लेकिन जन लोकपाल को लागू करने से देश में 60 से 65 फीसदी भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा। इस बात की मैं लिखित गारंटी देने को तैयार हूं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं जिन्दगीभर के लिए सिब्बल के यहां पानी भरने को तैयार हूं।' इससे एक दिन पहले कपिल सिब्बल ने कहा था कि अन्ना हजारे लिखित गारंटी दें कि जन लोकपाल बिल लाने से देश में भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा, तो सरकार उनका मसौदा मानने को तैयार है। अन्ना ने यह भी साफ किया कि उनका मकसद सरकार को गिराना नहीं है। क्योंकि जो दूसरे मौजूदा विकल्प हैं, वे भी कम भ्रष्ट नहीं हैं। साथ ही यह भी साफ किया कि अगर सरकार जनता की भावना को नहीं समझ सकती तो गिर भी जाए तो गम नहीं है।
अन्ना के साथ जन समर्थन है इसका हमें एक उदाहरण सोमवार सुबह राजघाट में मिला। बिना पूर्व सूचना जब अन्ना हजारे राजघाट पहुंचे तो उनके साथ करीब 100 लोग होंगे, लेकिन धीरे-धीरे भारी बारिश के बावजूद भीड़ जुटनी शुरू हो गई और देखते ही देखते यह संख्या हजारों में पहुंच गई, जिसे जहां जगह मिली वहीं खड़ा हो अन्ना के समर्थन में नारे लगाने लगे। अन्ना हजारे नहीं आंधी है, आज के गांधी हैं, के नारे खुलेआम राजघाट में लगने लगे। राजघाट पर जिस तरह अन्ना के समर्थन में लोग सोमवार को उमड़ पड़े, उससे साफ जाहिर है कि केंद्र सरकार अन्ना पर चाहे जितने आरोप लगाए, जनता को वह डिगा नहीं सकते। 80 वर्षीय परवेज जो लाठी के सहारे चल रहे थे, कहते हैं कि हम तो अब जाने वाले हैं, समाज और देश को सही मुकाम तभी मिल सकता है, जब सरकारी तंत्र भ्रष्टाचारमुक्त होगा। उनके साथ उनका पोता भी था, जिसकी तरफ उनका इशारा था कि इसका भविष्य...। अन्ना की साफ-सुथरी छवि से लोगों को जिस तरह लगाव है, उसे इस बात से बल मिलता है कि लोग राजघाट पर अन्ना के पास पहुंचने के लिए इस तरह उतावले थे कि फरीदाबाद और गाजियाबाद से भी चल पड़े। जब अन्ना राजघाट से कांस्टीट्यूशनल क्लब गए तो सैकड़ों लोग पैदल उनके पीछे-पीछे हो लिए।
आगे क्या होगा? अन्ना ने सारे देश का फोकस भ्रष्टाचार पर तो कर ही दिया है। सरकार अन्ना को फेल करने पर तुली हुई है पर इससे अन्ना का जन समर्थन बढ़ता जा रहा है और सरकार ज्यादा बदनाम हो रही है। जिस ढंग से सरकार और उसके मंत्री अन्ना पर कीचड़ उछाल रहे हैं वह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को शोभा नहीं देता। पहले कांग्रेस प्रवक्ता और फिर केंद्र सरकार के मंत्रियों ने अन्ना हजारे को भ्रष्ट और खलनायक साबित करने के लिए जिस तरह गढ़े मुर्दे उखाड़ने का सहारा लिया उससे तो यही सिद्ध होता है कि केंद्रीय सत्ता भिन्न विचार रखने वालों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। अन्ना को अनशन करने की अनुमति न देना और फिर उन्हें गिरफ्तार करना न केवल देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है बल्कि साथ-साथ इस सरकार की बौखलाहट को भी दर्शाता है। यह अफसोस की बात है कि सरकार अन्ना को फेल करने के लिए हर तरह का हथकंडा तो अपना रही है पर उस मर्ज का इलाज करने को तैयार नहीं जो इस देश की सबसे बड़ी बीमारी बन गई है। भ्रष्टाचार का कैंसर बुरी तरह से फैल रहा है और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए अपेक्षित कदम उठाने से भाग रही है। सवाल यह है कि ऐसा करके मनमोहन सिंह सरकार जनता को क्या संदेश देना चाह रही है कि वह भ्रष्टाचार को रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती? संसद के अन्दर अंक-गणित सही रखकर जनता के अरमानों को कुचल देगी? अन्ना के आंदोलन को भारत के विभिन्न राजनीतिक दल ऊपरी तौर पर तो समर्थन कर रहे हैं पर अन्दरखाते कोई भी पार्टी उनके जन लोकपाल बिल का खुला समर्थन करने को तैयार नहीं। अन्ना ने जो आंधी की शुरुआत की है, लगता नहीं कि अब यह थमने वाली है। सरकार ने ऐसी पोजीशन ले ली है कि अब उसका पीछे हटना मुश्किल है। इसलिए आजादी की 64वीं वर्षगांठ में एक नई लड़ाई व संघर्ष की शुरुआत हो चुकी है। आने वाले दिनों में यह पता चलेगा कि यह आंधी क्या रूप-रंग लेती है। अन्ना का आंदोलन चले या न चले, भ्रष्टाचार से जनता आजिज आ चुकी है और अब समय आ गया है कि इस पर काबू पाने के लिए कोई ठोस रणनीति अपनाई जाए। दमनचक्र से आप रोक सकते हो, दबा नहीं सकते।
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