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Wednesday, 17 August 2011

अगस्त क्रांति ः सरकार और अन्ना की आरपार की लड़ाई


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 August 2011
अनिल नरेन्द्र
आजादी की वर्षगांठ पर ही एक बड़े संघर्ष की घोषणा हो गई है। आजादी की 64वीं वर्षगांठ पर एक तरफ प्रधानमंत्री और उनकी सरकार है तो दूसरी तरफ अन्ना हजारे और उनकी सिविल सोसाइटी। एक तरफ सर्वशक्तिमान सरकार है जो हर हालत में अन्ना के आंदोलन को दबाना चाहती है तो दूसरी तरफ आम जनता का समर्थन पा रहे भ्रष्टाचार समाप्त करने की लड़ाई लड़ने पर आमादा अन्ना हजारे। अपने वायदेनुसार अन्ना ने मंगलवार सुबह अपना आमरण अनशन शुरू करने का प्रयास किया पर उन्हें रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ अन्ना के खास समर्थक शांतिभूषण, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी को भी हिरासत में ले लिया गया। इससे पहले 15 अगस्त का दिन गहगमा का रहा। सुबह स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री ने देश को प्राचीन लाल किले परिसर से संबोधित किया। अपने संबोधन में डॉ. मनमोहन सिंह ने अन्ना को सीधी चुनौती दे डाली। उन्होंने कहा कि अनशन से नहीं मिटेगा भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल लाने की लड़ाई लाल किले से और तीखी हो गई। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के दामन पर दाग को स्वीकारते हुए इस बीमारी से लड़ने में अपने संकल्पों की सफाई तो दी, लेकिन भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अनशन को गलत करार दिया। राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ियां बेनकाब होने के बाद पहली बार लाल किले परिसर पर झंडा फहरा रहे पीएम ने सरकारी खरीद में घोटालों, ठेकों में बेइमानी, विवेकाधीन अधिकारों के दुरुपयोग समेत केंद्र सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के छींटों को बेबाकी से स्वीकारा। मनमोहन सिंह ने कहा कि शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मजबूत लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया है। इसके कुछ मुद्दों पर मतभेद हैं, जो लोग इससे सहमत नहीं हैं, वे अपना नजरिया संसद को बता सकते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि इसके लिए भूख हड़ताल का सहारा नहीं लेना चाहिए।
दूसरी ओर अन्ना हजारे ने नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में एक प्रेस कांफ्रेंस कर प्रधानमंत्री, कपिल सिब्बल इत्यादि के प्रश्नों का खुलकर जवाब दिया। अन्ना ने किसी कीमत पर नहीं झुकने के अपने इरादे तो किए ही, प्रधानमंत्री की ओर से लाल किले की प्राचीर से खुद को दी गई सलाह का जवाब भी दे दिया। इसी तरह उन्होंने दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल की ओर से `जन लोकपाल' के खिलाफ दिए तर्कों को भी छलनी कर दिया। प्रधानमंत्री के तर्कों को पूरी तरह नकारते हुए अन्ना ने कहा, `मैं न तो संसद के खिलाफ हूं, न ही संसदीय प्रक्रिया के। लेकिन प्रधानमंत्री जी, आप संसद के सामने सही बिल तो रखिए।' प्रधानमंत्री पर सीधा हमला करते हुए अन्ना ने कहा, `मैं कई बार कहता था कि प्रधानमंत्री अच्छे आदमी हैं, लेकिन ये तो कपिल सिब्बल की ही भाषा बोल रहे हैं।' अपने इरादों को जाहिर करते हुए अन्ना ने कहा, `मैं मंगलवार सुबह 10 बजे जेपी पार्प पहुंच जाऊंगा। अगर पुलिस गिरफ्तार करती है तो जेल में अनशन करूंगा, छोड़ी देती है तो फिर जेपी पार्प कूच करूंगा।' अब यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के तर्कों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, `मैं 100 फीसदी तो गारंटी नहीं दे सकता, लेकिन जन लोकपाल को लागू करने से देश में 60 से 65 फीसदी भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा। इस बात की मैं लिखित गारंटी देने को तैयार हूं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं जिन्दगीभर के लिए सिब्बल के यहां पानी भरने को तैयार हूं।' इससे एक दिन पहले कपिल सिब्बल ने कहा था कि अन्ना हजारे लिखित गारंटी दें कि जन लोकपाल बिल लाने से देश में भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा, तो सरकार उनका मसौदा मानने को तैयार है। अन्ना ने यह भी साफ किया कि उनका मकसद सरकार को गिराना नहीं है। क्योंकि जो दूसरे मौजूदा विकल्प हैं, वे भी कम भ्रष्ट नहीं हैं। साथ ही यह भी साफ किया कि अगर सरकार जनता की भावना को नहीं समझ सकती तो गिर भी जाए तो गम नहीं है।
अन्ना के साथ जन समर्थन है इसका हमें एक उदाहरण सोमवार सुबह राजघाट में मिला। बिना पूर्व सूचना जब अन्ना हजारे राजघाट पहुंचे तो उनके साथ करीब 100 लोग होंगे, लेकिन धीरे-धीरे भारी बारिश के बावजूद भीड़ जुटनी शुरू हो गई और देखते ही देखते यह संख्या हजारों में पहुंच गई, जिसे जहां जगह मिली वहीं खड़ा हो अन्ना के समर्थन में नारे लगाने लगे। अन्ना हजारे नहीं आंधी है, आज के गांधी हैं, के नारे खुलेआम राजघाट में लगने लगे। राजघाट पर जिस तरह अन्ना के समर्थन में लोग सोमवार को उमड़ पड़े, उससे साफ जाहिर है कि केंद्र सरकार अन्ना पर चाहे जितने आरोप लगाए, जनता को वह डिगा नहीं सकते। 80 वर्षीय परवेज जो लाठी के सहारे चल रहे थे, कहते हैं कि हम तो अब जाने वाले हैं, समाज और देश को सही मुकाम तभी मिल सकता है, जब सरकारी तंत्र भ्रष्टाचारमुक्त होगा। उनके साथ उनका पोता भी था, जिसकी तरफ उनका इशारा था कि इसका भविष्य...। अन्ना की साफ-सुथरी छवि से लोगों को जिस तरह लगाव है, उसे इस बात से बल मिलता है कि लोग राजघाट पर अन्ना के पास पहुंचने के लिए इस तरह उतावले थे कि फरीदाबाद और गाजियाबाद से भी चल पड़े। जब अन्ना राजघाट से कांस्टीट्यूशनल क्लब गए तो सैकड़ों लोग पैदल उनके पीछे-पीछे हो लिए।
आगे क्या होगा? अन्ना ने सारे देश का फोकस भ्रष्टाचार पर तो कर ही दिया है। सरकार अन्ना को फेल करने पर तुली हुई है पर इससे अन्ना का जन समर्थन बढ़ता जा रहा है और सरकार ज्यादा बदनाम हो रही है। जिस ढंग से सरकार और उसके मंत्री अन्ना पर कीचड़ उछाल रहे हैं वह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को शोभा नहीं देता। पहले कांग्रेस प्रवक्ता और फिर केंद्र सरकार के मंत्रियों ने अन्ना हजारे को भ्रष्ट और खलनायक साबित करने के लिए जिस तरह गढ़े मुर्दे उखाड़ने का सहारा लिया उससे तो यही सिद्ध होता है कि केंद्रीय सत्ता भिन्न विचार रखने वालों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। अन्ना को अनशन करने की अनुमति न देना और फिर उन्हें गिरफ्तार करना न केवल देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है बल्कि साथ-साथ इस सरकार की बौखलाहट को भी दर्शाता है। यह अफसोस की बात है कि सरकार अन्ना को फेल करने के लिए हर तरह का हथकंडा तो अपना रही है पर उस मर्ज का इलाज करने को तैयार नहीं जो इस देश की सबसे बड़ी बीमारी बन गई है। भ्रष्टाचार का कैंसर बुरी तरह से फैल रहा है और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए अपेक्षित कदम उठाने से भाग रही है। सवाल यह है कि ऐसा करके मनमोहन सिंह सरकार जनता को क्या संदेश देना चाह रही है कि वह भ्रष्टाचार को रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती? संसद के अन्दर अंक-गणित सही रखकर जनता के अरमानों को कुचल देगी? अन्ना के आंदोलन को भारत के विभिन्न राजनीतिक दल ऊपरी तौर पर तो समर्थन कर रहे हैं पर अन्दरखाते कोई भी पार्टी उनके जन लोकपाल बिल का खुला समर्थन करने को तैयार नहीं। अन्ना ने जो आंधी की शुरुआत की है, लगता नहीं कि अब यह थमने वाली है। सरकार ने ऐसी पोजीशन ले ली है कि अब उसका पीछे हटना मुश्किल है। इसलिए आजादी की 64वीं वर्षगांठ में एक नई लड़ाई व संघर्ष की शुरुआत हो चुकी है। आने वाले दिनों में यह पता चलेगा कि यह आंधी क्या रूप-रंग लेती है। अन्ना का आंदोलन चले या न चले, भ्रष्टाचार से जनता आजिज आ चुकी है और अब समय आ गया है कि इस पर काबू पाने के लिए कोई ठोस रणनीति अपनाई जाए। दमनचक्र से आप रोक सकते हो, दबा नहीं सकते।
Anil Narendra, Anna Hazare, Arvind Kejriwal, Civil Society, Daily Pratap, Kiran Bedi, Lokpal Bill, Shanti Bhushan, Tihar Jail, Vir Arjun

Friday, 22 April 2011

क्या शांति भूषण अन्ना हजारे के लिए बोझ बनते जा रहे हैं?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 22 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने वाले अन्ना हजारे के सिपहसालार प्रशांत भूषण व उनके पिता शांति भूषण एक के बाद एक नए विवाद में फंसते जा रहे हैं। जन लोकपाल विधेयक बनाने के लिए गठित संयुक्त समिति में पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और उनके पुत्र प्रशांत भूषण को शामिल करना अन्ना को बहुत भारी पड़ रहा है। अभी सीडी विवाद चल ही रहा है कि शांति भूषण और उनके वकील पुत्र प्रशांत भूषण के खिलाफ एक याचिका अदालत में दर्ज की गई है। याचिका इलाहाबाद में कम कीमत पर आवासीय परिसर की रजिस्ट्री के बारे में है। याचिका में दावा किया गया है कि शांति भूषण और इलाहाबाद के परिसर के मालिक ने कम कीमत पर सम्पत्ति की रजिस्ट्री कराकर शासन को डेढ़ करोड़ रुपये का चूना लगाया है। याचिका में विवादास्पद सीडी के सभी तथ्यों की जांच की भी मांग की गई है। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील मनोहर लाल शर्मा ने सोमवार को दायर की है। इससे पहले शर्मा ने देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में शांति भूषण और प्रशांत भूषण पर न्यायपालिका पर ओछे आरोप लगाकर उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने और अपने हितों की खातिर अदालत का इस्तेमाल करने के आरोपों में दोनों के खिलाफ जांच की मांग की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि ये पिता-पुत्र न्यायपालिका के प्रति जनता की आस्था को ठेस पहुंचाने के इरादे से सुनियोजित तरीके से समय-समय पर बयानबाजी करते आ रहे हैं। यही नहीं, पिता-पुत्र ने समूची न्याय व्यवस्था और पूर्व न्यायाधीशों पर भी भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाए। याचिका में अन्ना को आमरण अनशन करने की गलत सलाह देने का भी आरोप लगाया गया है।
अंग्रेजी के एक दैनिक में एक खबर छपी है जिसके अनुसार शांति भूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण को उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2009 में 10 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र वाले भूखंड आवंटित किए थे। प्रत्येक भूखंड का मूल्य साढ़े तीन करोड़ रुपये है। अखबार के अनुसार शांति भूषण और उनके बेटे ने स्वयं माना है कि योजना में पारदर्शिता नहीं थी और बिना किसी स्पष्ट मानदंड के यह आवंटन हुआ है। इन प्लाटों की कीमत सात करोड़ रुपये बताई जा रही है। ये प्लाट ग्रेटर नोएडा में दिए गए हैं। इस आवंटन को सुप्रीम कोर्ट के एक वकील विकास सिंह सेकानूनी चुनौती भी दे दी है। विकास सिंह का कहना है कि इसी स्कीम में उन्हें भी फार्म हाउस का प्लाट दिया गया है। लेकिन इस योजना में कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई। उन्होंने आरोप लगाया है कि आवंटन के लिए बड़ी रकम का लेन-देन भी हुआ है। हालांकि उन्होंने माना कि रिश्वत के पैसे उन्होंने नहीं दिए, फिर भी प्लाट मिल गया।
शांति भूषण के कारनामों की खबरें छपने से टीम हजारे में फिर बेचैनी फैलना स्वाभाविक ही है। अभी तक बहुचर्चित सीडी प्रकरण सुलटा नहीं कि एक नया विवाद आ खड़ा हो गया है। जयंत भूषण, शांति भूषण के दूसरे पुत्र हैं। ये भी सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं। उन्होंने ही मुख्यमंत्री मायावती के ड्रीम प्रोजैक्ट नोएडा पार्प के मामले में याचिका दायर की थी। इस याचिका के चलते नोएडा पार्प का काम रुक गया था। क्या यह प्लाट जयंत को खुश करने के लिए मायावती सरकार की मेहरबानी तो नहीं थी?

Thursday, 21 April 2011

ताकि अन्ना हजारे के आंदोलन की हवा निकल जाए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 21 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

पाठकों को याद होगा कि मैंने इसी कॉलम में यह आशंका प्रकट की थी कि अन्ना हजारे के लिए इस देश से भ्रष्टाचार दूर करने का संकल्प इतना आसान नहीं होगा। इस देश में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि उन्हें हिलाना मुश्किल है और अन्ना के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा यह राजनेता और नौकरशाह गठबंधन होगा। कभी-कभी पहला कदम ही सबसे कठिन हो जाता है। हम देख रहे हैं कि जन लोकपाल विधेयक के मुद्दे को लेकर बड़ी राजनीतिक साजिश शुरू हो गई है। अब तक दबी जुबान से एक दूसरे पर निशाना साध रहे समाजसेवी अन्ना हजारे और केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेस के कुछ नेता खुलकर एक-दूसरे के सामने आ गए हैं। कभी फर्जी सीडी जारी करके तो कभी अन्ना व उनके सहयोगियों को बदनाम करने का अभियान शुरू हो चुका है। अन्ना इतने परेशान हो गए कि उन्होंने गेंद दस जनपथ के पाले में डालने की कोशिश की है। उन्होंने सीधे-सीधे सोनिया गांधी से पूछ लिया है, बोलो आपकी मर्जी क्या है? क्या दिग्विजय सिंह आपकी सहमति से  बोल रहे हैं? अन्ना ने अपनी दो पेज की चिट्ठी में सोनिया को लिखा है कि ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य और सरकार के कुछ वरिष्ठ मंत्री (कपिल सिब्बल और दिग्विजय) जिस तरह से संयुक्त समिति के लोगों के बारे में भ्रम फैला रहे हैं, उससे कहीं न कहीं बदनीयती की झलक मिलती है। पार्टी के एक महासचिव तो लगातार सिविल सोसाइटी के लोगों के खिलाफ अनर्गल टिप्पणियां करने में जुटे हैं। पिछले कई दिनों से आपके  लोग इस तरह की शरारतें कर रहे हैं, फिर भी इनके खिलाफ पार्टी की तरफ से कोई पहल नहीं दिखाई गई। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार विरोधी उनके आंदोलन को कमजोर करने के लिए इस तरह की गतिविधियां  बढ़ाई गई हैं। इसको देखते हुए वे जानना चाहते हैं कि पार्टी के इन नेताओं की ऐसी शरारतों के प्रति उनका खुद का नजरिया क्या है? पार्टी आखिर चुपचाप यह सब क्यों देख रही है। सोनिया गांधी को लिखा गया अन्ना हजारे का पत्र काफी तीखे तेवर वाला है। अन्ना ने सीधे-सीधे कांग्रेस और यूपीए सरकार की नीयत को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।
कांग्रेसी नेताओं की शिकायत जब श्री अन्ना हजारे ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से की तो कांग्रेस ने भी साफ कह दिया कि उसके नेता कोई अपराध नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का कहना है कि जैसे श्री हजारे लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कह रहे हैं वैसे ही उसके महासचिव दिग्विजय सिंह और दूसरे नेता कह रहे हैं। जनतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है तो फिर कांग्रेस के नेताओं पर वही बात लागू क्यों नहीं होती? मनीष तिवारी ने कहा कि जहां तक अन्ना की सोनिया गांधी को लिखी खुली चिट्ठी का सवाल है तो इसका जवाब तत्काल नहीं दिया जाएगा। सही समय पर इस पत्र का उत्तर पार्टी अध्यक्ष की ओर से दिया जाएगा।
लगता है कि अन्ना सोनिया के जवाब का इंतजार करेंगे और फिर आगे की रणनीति तय करेंगे। यदि उन्हें कांग्रेस और सरकार की नीयत में खोट लगी तो सम्भव है कि वह नए सिरे से आंदोलन की घोषणा कर दें। क्योंकि देश की जनता अब भ्रष्टाचार के खिलाफ हीला-हवाली बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखती। यदि सरकार को सद्बुद्धि आ जाए तो अच्छी बात है वरना गुस्साये लोगों का आक्रोश फिर सड़कों पर नजर आ जाएगा और इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सरकार की होगी।

Wednesday, 20 April 2011

अन्ना की मूवमेंट पर सीडी विवाद का साया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 20 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

पिछले दो-तीन दिनों से उस सीडी को लेकर घमासान मचा हुआ जो आजकल चर्चा में है। उल्लेखनीय है कि इस चर्चित सीडी में अमर सिंह, शांति भूषण का हवाला देकर मुलायम सिंह से कह रहे हैं कि चार करोड़ रुपये में प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट के फ्लां जज को मैनेज करा देंगे। यह सीडी ऐसे समय जारी हुई है जबकि टीम अन्ना ने लोकपाल कानून के मुद्दे पर सरकार पर भारी दबाव बना लिया है। शांति भूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य हैं। लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर जो देशव्यापी बहस शुरू हुई उसे सीडी प्रकरण ने नया मोड़ दे दिया है। अब इस घमासान में कई बड़े नेता व सिपहसालार कूद गए हैं। शांति भूषण के वकील पुन प्रशांत भूषण जहां सीडी को फर्जी, छेड़छाड़ युक्त और विभिन्न सन्दर्भों की बातचीत को तैयार किया गया प्रपंच बता रहे हैं, वहीं लोकपाल विधेयक लाने के लिए आंदोलन की अगुवाई करने वाले अन्ना हजारे ने कहा कि यदि सीडी प्रकरण में शांति भूषण दोषी पाए जाते हैं तो उनके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए और उन्हें संयुक्त समिति से इस्तीफा दे देना चाहिए। हालांकि हजारे ने शांति भूषण पर लगाए गए आरोपों का खंडन किया। उन्होंने कहा कि ये आरोप सही नहीं हैं। अन्ना के मुताबिक प्रयोगशाला में सीडी की जांच कराई गई और पता चला कि यह फर्जी है। इस मामले में एक नया मोड़ और आ गया है। स्वामी अग्निवेश भी इसमें कूद पड़े हैं। एक निजी चैनल में स्वामी ने अमर सिंह पर संदेह जताया। अग्निवेश ने अपने सहयोगियों से अनौपचारिक बात में यह आशंका जताई कि अमर सिंह अपनी खाल बचाने के लिए इस सीडी का इस्तेमाल कर सकते हैं। शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने सीडी में अपने पिता की आवाज होने की बात मानी है लेकिन इसे छेड़छाड़ युक्त और फर्जी सीडी बताया है। इस बारे में एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने फोरेंसिक विशेषज्ञों के हवाले से बताया है कि सीडी से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है। इस सीडी में हुई बातचीत निरन्तर और लगातार एक क्रम में हैं। हालांकि अखबार के मुताबिक फोरेंसिक विशेषज्ञों ने आवाज की सत्यता के संबंध में कुछ नहीं कहा जबकि वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण समेत एक बड़ा वर्ग सीडी में हुई बातचीत को आधार बनाकर संयुक्त समिति से शांति भूषण के इस्तीफे की मांग पर उतर आए हैं।
शांति भूषण ने इस मामले में सोमवार को समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की वहीं अमर सिंह ने भी मानहानि व अवमानना का मामला दर्ज करने की चेतावनी दी। अमर सिंह ने शांति भूषण और प्रशांत भूषण के खिलाफ पुलिस में शिकायत की। इस बीच केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा है कि सरकार विवादित सीडी से जुड़े शांति भूषण के खिलाफ आरोपों की स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं पूरी जांच कराएगी। इस मामले में एक नया आयाम इन्कम टैक्स के पूर्व कमिशनर विश्व बंधु गुप्ता ने यह कहकर जोड़ दिया कि शांति भूषण वाली सीडी सही है। इसलिए शांति भूषण के बारे में सिविल सोसाइटी को नए सिरे से फैसला करना चाहिए। उन्होंने ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य अरविन्द केजरीवाल की छवि को लेकर भी कुछ तीखी टिप्पणियां की हैं। कुल मिलाकर अन्ना हजारे की ओर से उनकी टीम पर चौतरफा कीचड़ उछलना आरम्भ हो गया है। इन सब आरोपों में सच्चाई कितनी है, झूठ कितना यह तो समय ही बताएगा।

Thursday, 14 April 2011

अन्ना के जन लोकपाल विधेयक का विरोध शुरू हो चुका है


प्रकाशित: 14 अप्रैल 2011
अनिल नरेन्द्र

पस्तावित जन लोकपाल बिल का शांत विरोध आरम्भ हो चुका है। राजनेता अब कुछ बातें खुलकर कहने लगे हैं। वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जन लोकपाल बिल का सीधा विरोध तो नहीं किया पर उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा है कि अन्ना हजारे की भूख हड़ताल ने चार दिन में उससे ज्यादा हासिल किया जो विपक्ष ने दो महीने की मांग के बाद पाया? श्री अडवाणी ने लोकपाल विधेयक को और पभावी बनाने के लिए अभियान चलाने के लिए अन्ना हजारे की पशंसा की लेकिन साथ ही उन लोगों की आलोचना की थी जिन्होंने राजनीति या राजनेताओं के खिलाफ घृणा का माहौल बनाया और कहा कि यह लोकतंत्र के खिलाफ है। उधर पंजाब के मुख्यमंत्री पकाश सिंह बादल ने तो खुलकर कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल या लोकपाल बिल लाने से कुछ नहीं होने वाला। इसके लिए सख्त कानून बनाए जाने की जरूरत है। हमारी पार्टी हो या कोई और पार्टी हो चुनाव में सभी काला धन इस्तेमाल करते हैं। अमेरिका की तरह यहां भी एक निश्चित राशि से अधिक धन रखने वालों पर कानूनी पतिबंध लगा देना चाहिए। अमेरिका में 10 हजार डॉलर से अधिक कैश नहीं रख सकते हैं। देश की जीडीपी के बराबर काला धन मौजूद है और यह केवल तीन पतिशत लोगों के पास है। लोकपाल बिल से कुछ नहीं होने वाला चाहे जिसने भूख हड़ताल रखी हो, उसे ही लोकपाल बना दिया जाए।
केन्द्राrय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कह दिया कि लोकपाल बिल से आम आदमी की गरीबी, बिजली और शिक्षा जैसे, मूलभूत समस्याएं खत्म नहीं होने वाली क्योंकि इसका सीधा वास्ता भ्रष्टाचार से जुड़े मामले निपटाने का है। सिब्बल के इस बयान पर एतराज जताते हुए अन्ना ने कहा कि अगर केन्द्राrय मंत्री कपिल सिब्बल को लगता है कि लोकपाल विधेयक से कोई फायदा नहीं होगा तो उन्हें मसौदा समिति से इस्तीफा दे देना चाहिए। वह क्यों हमारा और अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं। अन्ना के पलटवार पर सिब्बल भी सकपका गए। उन्होंने तुरंत डैमेज कंट्रोल करते हुए कहा कि वह अन्ना के साथ हैं और उनके साथ मिलकर एक ऐसा विधेयक बनाना चाहते हैं जो भ्रष्टाचार से लड़ने में सक्षम हो। वहीं सलमान खुर्शीद ने भ्रष्टाचार से लड़ने में सक्षम होने के लोकपाल बिल के सवाल पर कहा कि भगवान के मौजूद होने से भी सभी बुराइयां नहीं मरतीं। हमें तब भी अपने बच्चों को अच्छी बातें बतानी पड़ती हैं और मंदिर बनवाकर पूजा करनी पड़ती है। भाजपा पवक्ता तरुण विजय ने ट्विटर पर लिखा ः अन्ना ने पिता और पुत्र की जोड़ी को स्वीकार किया है। माओवाद समर्थक को भी शामिल किया है। उन्होंने लिखा है कि विपक्ष को समिति में जगह नहीं दिया जाना अन्ना के लोकतात्रिक आंदोलन के लिए अच्छा नहीं है। हालांकि विजय बाद में अपनी बात से पलट गए पर उन्होंने अपना विरोध तो जता दिया।
कांग्रेस पार्टी में ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं जो अन्ना के सामने झुकने को कतई उचित नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि यह तो सरकार ने एक नया रास्ता खोल दिया है। अब हर कोई सरकार की इसी तरह ब्लैकमेल करने की कोशिश करेगा जैसा कि अन्ना और उनके मुट्ठीभर समर्थकों ने किया है यानि कांग्रेस के भीतर जितने मुंह उतनी बातें। हर कोई दूसरों को दोष दे रहा है तथा अपनी बात सही बता रहा है। अन्ना से मिली हार से न केवल पार्टी का आत्मविश्वास डगमगा गया है बल्कि उसके नेताओं के बीच आपसी तालमेल भी बिगड़ता नजर आ रहा है।

Wednesday, 13 April 2011

कुछ राजनेता बेशक भ्रष्ट हों पर यह नौकरशाह इनकी तो पूछो नहीं

प्रकाशित: 13 अप्रैल 2011

-अनिल नरेन्द्र

रविवार को अन्ना हजारे ने नई दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के लिए आंदोलन करेंगे। उन्होंने `राइट टू रिकॉल' यानि तय समय के बाद जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के लिए आंदोलन चलाने का संकल्प दोहराया। सांसदों, विधायकों और पंचायतों तक के जन प्रतिनिधियों को अन्ना से अब अपनी कुर्सी हिलने का खतरा पैदा हो गया है। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कुछ नेताओं ने स्वीकार किया कि अन्ना ने यदि प्रतिनिधियों को वापसी का आंदोलन चलाया तो उस पर जनता का लोकपाल विधेयक से अधिक समर्थन मिल सकता है। दूसरी बात जो अन्ना ने कही कि जन लोकपाल बिल में वह नौकरशाहों पर शिकंजा कसने पर ध्यान देंगे। हम राजनेताओं को तो आए दिन कोसते रहते हैं पर इन नौकरशाहों को कुछ नहीं कहते। जितनी लूट-खसोट इन नौकरशाहों ने मचाई है उतनी किसी अन्य वर्ग ने नहीं।

हमारा मानना है कि भारत का भ्रष्ट अफसरी तंत्र बहुत खतरनाक है। उसमें भ्रष्टाचार का खौफ पैदा करना जरूरी है। अफसर यदि बधेंगे तो अपने आप भ्रष्टाचार बहुत घटेगा। भारत के प्रधानमंत्री और चीफ जस्टिस के बेइमान होने का औसत बहुत कम है। अन्ना हजारे और उनकी समाजसेवी टीम को सौ फीसदी फोकस सचिवों, नौकरशाहों को सख्ती के साथ लोकपाल के दायरे में लाने पर रखना चाहिए। अफसरों के खिलाफ लोकपाल खुद व खुद अपने बूते जांच, कार्रवाई, बर्खास्तगी और सम्पत्ति जब्त के अधिकार से लैश हो तो यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। ऐसा नहीं होने देने के लिए ही 42 सालों से अफसर बिरादरी लोकपाल कानून को इस दलील पर लटकवाती रही है कि इससे राजकाज ठप होगा। प्रधानमंत्री के नाम की आड़ में अफसर अपने को बचाने की साजिश रचते रहे हैं। अफसर कितना शक्तिशाली और बदमाश है इसका ताजा प्रमाण मंत्री समूह के अफसरों के खिलाफ सीबीआई की पूर्व अनुमति की जरूरत बनाए रखने की राय की है। प्रधानमंत्री कार्यालय और कैबिनेट सचिवालय के अफसरों की टॉप प्राथमिकता अफसरशाही को लोकपाल से बाहर रखवाने की है। यह दलील देंगे कि अगर ऐसा किया गया तो सरकार ठप हो जाएगी, गवर्नेंस ठप हो जाएगी। इसके जवाब में अकेला यह तथ्य आंख खोलने वाला है कि दुनिया के सबसे विकसित, आदर्श, ईमानदार, पारदर्शी नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्प, फिनलैंड देशों में लोकपाल की व्यवस्था दशकों से काम कर रही है, वहां तो कोई राजकाज या गवर्नेंस ठप नहीं हुआ।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज देश के अधिकतर राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं पर यह कहना भी शायद ठीक नहीं कि तमाम राजनेता भ्रष्ट हैं। ईमानदार राजनेता भी हैं, उदाहरण के तौर पर जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय, लाल बहादुर शास्त्राr इत्यादि। हमारी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी नौकरशाह प्रवृत्ति के हैं, गैर राजनीतिज्ञ हैं और पूरी तरह अपने अफसरों पर निर्भर हैं। लगभग यही हाल सोनिया गांधी का भी है। मनमोहन तो इन पर इतना निर्भर हैं कि राजनीतिज्ञों से ज्यादा वह अपने अफसरों पर विश्वास करते हैं। हर स्कैंडल में अगर बारीकी से जाएं तो पाएंगे कि इन नौकरशाहों ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यह किसी को जवाबदेही नहीं। यह कभी किसी ने नहीं पूछा कि इन नौकरशाहों की संतानें विदेशों में प़ढ़ रही हैं उन पर महीने का कितने लाखों खर्च हो रहा है। इनको भी अपनी सम्पत्ति और परिवारों की पूरी डिटेल्स सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि जनता को इनकी असलियत पता चले।

Tuesday, 12 April 2011

विपक्षी दलों का दावा:अन्ना ने हमारी लगाई फसल काटी है

प्रकाशित: 12 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र
लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर गांधीवादी विचारक अन्ना हजारे के पांच दिन तक चले अनशन से फजीहत की स्थिति में कई पार्टियां व व्यक्ति अब डैमेज कंट्रोल में लग गए हैं। अन्ना के आंदोलन का सबसे ज्यादा नुकसान विपक्षी दलों और बाबा रामदेव सरीखे के लोगों को हुआ है। बाबा रामदेव पिछले कई महीनों से भ्रष्टाचार के खिलाफ जगह-जगह सभाएं कर रहे थे और इन सभाओं में उन्हें जबरदस्त समर्थन भी मिल रहा था पर अन्ना हजारे मुंबई से उड़कर जन्तर-मन्तर आए और पूरी मूवमेंट को हाइजैक कर गए। आंदोलन के बाद जो जन लोकपाल के गठन के लिए समिति बनी है उसमें बाबा का नामोंनिशान नहीं। समिति के सदस्यों को लेकर बाबा रामदेव ने शांति भूषण और उनके पुत्र सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण दोनों को समिति में लेने पर एतराज किया है। रामदेव ने हरिद्वार में कहा कि समिति में भाई-भतीजावाद क्यों?  देश में और भी कई कानूनविद् हैं जिन्हें समिति में लिया जा सकता है। अन्ना हजारे ने जो समिति बनाई है उसमें चार सदस्य सरकार की ओर से मंत्री हैं और चार सदस्य अन्ना हजारे के। सवाल यह उठता है कि भाजपा सहित अन्य विपक्षी दल कहां गए? क्या अब इनका भविष्य में रोल खत्म हो गया है? सत्तापक्ष और जनता ही सब फैसले करेगी? अन्ना के आंदोलन से यह बात तो साफ हो ही गई है कि जनता की नजरों में राजनेताओं की स्थिति कितनी गिर चुकी है। जनता इन्हें न तो देखना पसंद कर रही है और न ही अब इन्हें अपना नुमाइंदा मानने को ही तैयार है।

यूपीए के भ्रष्टाचार के खिलाफ विपक्ष का अभियान अन्ना हजारे के आंदोलन से पूरी तरह हाइजैक हो जाने के बाद अब भाजपा व उसके सहयोगी यह दावा करने में जुटे हैं कि दरअसल समाजसेवी तबका उन्हीं की बोई मेहनत की फसल काट रहा है। विपक्षी नेता यह कबूल करने को तैयार नहीं कि नागरिक समूह  का इस कदर सड़कों पर उतरना राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है। इन नेताओं की दलील है कि बिल का मसौदा तैयार करने के लिए जितने भी एनजीओ के प्रतिनिधि घुस जाएं, मगर यह बिल तो पारित संसद में ही होना है। एनडीए संयोजक शरद यादव का दावा है कि विपक्ष ने भ्रष्टाचार से जुड़े तथ्यों को लेकर जिस मुस्तैदी से पूरे देश में अलख जगाई उसी का नतीजा है कि आज जनता प्रभावी कानून के लिए सड़कों पर उतर आई।

शनिवार को भाजपा नेताओं ने अन्ना के आंदोलन के आगे सरकार के घुटने टेकने की अलग-अलग अंदाज में व्याख्या की। मगर सभी नेताओं की दलील यही थी कि सिविल सोसाइटी ने विपक्ष के ही आंदोलन को आगे बढ़ाया है। भाजपा ने कहा कि विपक्ष महीनों से यूपीए-दो के भ्रष्टाचार की परतें जनता के सामने लाने में जुटा है। संसद के शीतकालीन सत्र और बजट सत्र में उसकी आक्रामकता सबके सामने है। इसके अलावा भाजपा व दूसरे विपक्षी दलों ने देशभर में घूमकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता में आक्रोश बनाया। भाजपा नेता ने इस बात से तो इंकार किया कि यह राजनीतिक दलों के किनारे किए जाने का संकेत है मगर उन्होंने माना कि अब राजनेताओं पर आसानी से भरोसा करने में जनता कतराती है और हर पार्टी को इस पर आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है।