Translater

Thursday, 13 June 2019

सबसे ज्यादा ट्रैफिक मुंबई और दिल्ली में होता है

दुनियाभर में सबसे ज्यादा ट्रैफिक जाम मुंबई वालों को झेलना पड़ता है। जबकि दिल्ली दुनिया का चौथा सबसे ज्यादा ट्रैफिक दबाव झेलने वाला शहर है। यह खुलासा लोकेशन टेक्नोलॉजी कंपनी टॉयटॉय के ट्रैफिक इंडेक्स 2018 में हुआ है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में लोगों को सड़कों पर जाम लगने की स्थिति में अपने गंतव्य तक पहुंचने में 65 प्रतिशत ज्यादा वक्त लगता है। जबकि देश की राजधानी दिल्ली में 58 प्रतिशत ज्यादा समय लगता है। टॉयटॉय इंडेक्स के मुताबिक ट्रैफिक दबाव के मामले में कोलंबिया की राजधानी बागोरा 63 प्रतिशत के साथ दूसरे, पेरू की राजधानी लीमा 58 प्रतिशत और 56 प्रतिशत की जाम से रूस की राजधानी पांचवें स्थान पर है। सूची में शामिल पहले चारों शहर विकासशील देशों के हैं। जबकि पांचवां रूस विकसित है। जीपीएस आधारित इस अध्ययन में आठ लाख से ज्यादा आबादी वाले 400 शहरों को शामिल किया गया था। टॉयटॉय कंपनी एप्पल और उबर के लिए नक्शे भी तैयार करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 में पहले के मुकाबले मुंबई और दिल्ली में ट्रैफिक थोड़ा कम हुआ है। 2018 में जहां दिल्ली में ट्रैफिक का दबाव 58 प्रतिशत था वहीं 2017 में यह 62 प्रतिशत था यानि इसमें चार प्रतिशत की कमी आई है। रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में सबसे कम ट्रैफिक दबाव दो मार्च 2018 को रहा है। इस दौरान यह महज छह प्रतिशत था। वहीं सबसे खराब ट्रैफिक आठ अगस्त 2018 को था। इस दौरान ट्रैफिक दबाव 83 प्रतिशत तक पहुंच गया था। रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई के ट्रैफिक में भी 2017 के मुकाबले सुधार देखा गया है। जहां 2017 में टैफिक दबाव 66 प्रतिशत था वहीं 2018 में यह 65 प्रतिशत था। 2018 में सबसे कम ट्रैफिक दबाव (16 प्रतिशत) दो मार्च 2018 को था। जबकि सबसे ज्यादा (111 प्रतिशत) 21 अगस्त 2018 को था। कंपनी ने यह रिपोर्ट सबसे ज्यादा ट्रैफिक के दौरान लोगों को कितना अतिरिक्त समय लगता है, इसके आधार पर तैयार की है। रिपोर्ट के अनुसार मुंबई में औसतन 500 कारें प्रति किलोमीटर चलती हैं। यह दिल्ली से काफी ज्यादा हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ट्रैफिक का बढ़ना अच्छा और खराब दोनों ही हैं। अच्छा यह है कि इससे मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत मिलता है। नुकसान यह है कि ज्यादा ट्रैफिक से लोगों का समय जामों में खराब होता है और भारी ईंधन की बर्बादी तो होती है साथ-साथ हमारे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है।

-अनिल नरेन्द्र

फांसी से इसलिए बच गए कठुआ के दरिन्दे

जम्मू-कश्मीर के कठुआ में खानाबदोश समुदाय की आठ वर्ष की बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या के मामले में पठानकोट की विशेष अदालत ने छह आरोपियों को दोषी ठहराकर सजा सुनाई है जिससे थ़ोड़ी राहत महसूस की जा सकती है। डेढ़ साल पहले 10 जनवरी 2018 को इस बच्ची को अगवा कर उसके साथ जैसी बर्बरता की गई थी, उसकी किसी सभ्य समाज में कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन इस अपराध को जिस तरह से अंजाम दिया गया, वह रौंगटे खड़े कर देने वाला था। यह बच्ची पशुओं को चराने निकली थी, तभी उसे अगवा कर लिया गया। उसके बाद उसे एक मंदिर में कैद करके रखा गया, जहां उसे नशे की दवाइयां दी जाती रहीं और उसी हालत में उससे सामूहिक बलात्कार किया जाता रहा। शर्मनाक बात यह है कि इस जघन्य अपराध को अंजाम देने वालों में मंदिर का पुजारी, उसका रिश्तेदार, एक विशेष पुलिस अधिकारी भी था। चार-पांच दिन बाद बच्ची की हत्या कर शव को जंगल में फेंक दिया गया था। ऐसे वाकया मुश्किल से ही सुनने में आते हैं। हद तो यह है कि इस जघन्य अपराध में कुछ पुलिस कर्मचारी भी शामिल थे। इस घटना के सामने आने के बाद इसे सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग देने की न केवल कोशिश की गई, बल्कि आरोपियों का महिमामंडन करने के कारण राज्य की तत्कालीन पीडीपी-भाजपा सरकार के दो मंत्रियों को इस्तीफा तक देना पड़ा था। हालत यह हो गई कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस मामले की सुनवाई पड़ोसी प्रांत पंजाब के पठानकोट में स्थानांतरित करनी पड़ी थी। वरना जिस बेहद गरीब तबके से यह खानाबदोश परिवार आता है उसके लिए न्याय के लिए गुहार लगा पाना भी शायद संभव नहीं होता। यह घटना हमारे देश, केंद्र और राज्य सरकारों, समाज सबके लिए शर्मनाक थी। अब फैसला आ गया और दोषियों को सजा भी हो गई। लेकिन इस घटना में जो कुछ हुआ और जिन्होंने इसे अंजाम दिया, उससे साफ है कि यह लोग सिर्प अपराधी नहीं, बल्कि हैवान थे। मंदिर की देखभाल करने वाला ऐसा घृणित और जघन्य अपराध को अंजाम देगा, कोई सोच भी नहीं सकता। इतना ही नहीं, इस पुजारी ने अपने एक रिश्तेदार लड़के को भी फोन करके दूसरे शहर से बुला लिया। विशेष पुलिस अधिकारी जिस स्थानीय लोगों की मदद के लिए नियुक्त किया गया, वह एक ऐसे किसी के अपहरण और बलात्कार की साजिश रचेगा और गुनाह करेगा और दूसरे पुलिस वाले इसके सबूत मिटाएंगे, यह पुलिसिया तंत्र का चेहरा दिखाने के लिए काफी है। हाल ही में अलीगढ़ के टप्पल में बच्ची की हत्या, भोपाल में एक 10 साल की बच्ची से बलात्कार के बाद हत्या जैसी घटनाओं ने पूरे देश को शर्मसार कर दिया है। उज्जैन और जबलपुर में भी दो मासूमों का बलात्कार हुआ। यह सारी घटनाएं बताती हैं कि हमारे समाज में विकृतियां गहरी पैठ बना चुकी हैं। हमारा शासन तंत्र भी कहीं न कहीं अपराधों की अनदेखी करता है। संवेदना हमारी इस कद्र मिट गई हैं कि एक मृतक और हत्यारे की सामाजिक पहचान देखकर तय करते हैं कि उसे किसके साथ खड़ा होना चाहिए। यह सारी घटनाएं बताती हैं कि अपराधियों में संशोधित पॉस्को एक्ट (बाल यौन अपराध संरक्षण कानून) का भी भय नहीं है, जिसमें मृत्यु दंड तक का प्रावधान है। ऐसा लगता है कि कड़े से कड़े कानून भी बच्चियों और महिलाओं के उत्पीड़न और उनके खिलाफ होने वाले अपराध में कवच का काम नहीं कर पा रहे। इतना खौफनाक अपराध करने वाले यह आरोपी फांसी से लिए बच गए क्योंकि यह सजा भारतीय दंड संहिता से नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर में लागू रणवीर दंड संहिता के तहत हुई है। इसमें 12 साल से छोटी बच्चियों से दुष्कर्म पर फांसी का प्रावधान 24 अप्रैल 2018 को कठुआ की घटना के बाद ही जोड़ा गया। यह घटना 10 जनवरी की है। सुनवाई नए प्रावधान के तहत नहीं हो सकती थी। इसलिए दोषी फांसी से बच गए।

Wednesday, 12 June 2019

संसदीय इतिहास में पहली बार पांच-पांच उपमुख्यमंत्री

राज्यों की सियासत में जाति-वर्ग समूहों की बढ़ती आकांक्षाओं को पूरी करने के लिए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने सियासी संतुलन व तुष्टिकरण का नया रास्ता दिखा दिया। जगनमोहन रेड्डी ने पांच उपमुख्यमंत्री बनाए हैं। उनके मंत्रिमंडल में एससी/एसटी, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और कापू समुदाय से एक-एक डिप्टी सीएम होगा। मंत्रियों के लिए 30 महीने के कार्यकाल का फार्मूला भी तय किया गया है। ढाई साल बाद वह 90 प्रतिशत मंत्री बदल देंगे। देश में अपनी तरह का यह पहला प्रयोग है। भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसा अब तक नहीं हुआ। जगनमोहन रेड्डी ने विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। जाहिर है कि सामान्य वर्गों के अलावा उन्हें इन पांचों समुदायों का भी समर्थन मिला है और वह चाहते हैं कि अपने प्रशासन में इन्हें समुचित प्रतिनिधित्व दें। आजादी के बाद से अब तक कई राज्यों में सत्ताधारी पार्टियों ने उपमुख्यमंत्री बनाए हैं, लेकिन ऐसा राजनीतिक समीकरण साधने के लिए ही किया जाता है। इस पद की कोई वैधानिकता मान्यता नहीं है। इस पद पर आसीन व्यक्ति को मुख्यमंत्री की शक्तियां प्राप्त नहीं होतीं और न ही वह मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में प्रदेश की अगुवाई कर सकता है। उसे कोई अतिरिक्त वेतन, भत्ता देने का भी प्रावधान नहीं है। पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार में सरदार वल्लभ भाई पटेल डिप्टी पीएम बनाए गए थे। सरदार पटेल देश के गृहमंत्री भी थे। इसके बाद सन 1967 से 1969 के बीच मोरारजी देसाई उपप्रधानमंत्री बनाए गए। कोई डिप्टी पीएम या सीएम शपथ लेते समय मंत्री की ही शपथ लेता है।  हालांकि चौधरी देवीलाल ने खुद को डिप्टी पीएम कहकर शपथ ली थी। इसके बाद विवाद ने अटॉर्नी जनरल सूली सोराबजी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उपप्रधानमंत्री का संविधान में कोई प्रमाण नहीं है और देवी लाल एक मंत्री की तरह ही रहेंगे। वैसे दो उपमुख्यमंत्री तो कई राज्यों में रहे हैं। देश के कई राज्यों में पहले भी दो-दो उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश और गोवा में अभी दो-दो उपमुख्यमंत्री हैं। बिहार में भी सुशील मोदी हैं। इससे पहले इसी आंध्र प्रदेश में ही पूर्व सीएम चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव ने दो उपमुख्यमंत्री बनाए थे। हाल ही में राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में आई तो यहां अशोक गहलोत को सीएम और सचिन पायलट को डिप्टी सीएम बनाया गया। कर्नाटक में जी. परमेश्वर और दिल्ली में मनीष सिसोदिया डिप्टी सीएम हैं। बिहार में सुशील मोदी डिप्टी सीएम हैं। इससे पहले राजद के साथ सरकार बनी थी तो तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम थे। गोवा में बनी प्रमोद सावंत की सरकार में भी एक डिप्टी सीएम था। जब से  गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ है। उपमुख्यमंत्री का पद आमतौर पर सबसे बड़े साझीदार दल को दिया जाता है। अलग-अलग समुदायों का प्रतिनिधित्व दिखाने के लिए एक या दो उपमुख्यमंत्री बनाने का चलन भी इधर चल पड़ा है। लेकिन जगनमोहन रेड्डी ने तो पांच उपमुख्यमंत्री बनाकर एक नई परंपरा ही कायम कर दी है। देखें कि जगनमोहन रेड्डी का यह महाप्रयोग आने वाले समय में कितना सफल होता है?
-अनिल नरेन्द्र

o:p>

देश में सबसे बड़े किडनी रैकेट का खुलासा

देश के सबसे बड़े किडनी कांड खुलासे ने दिल्ली में हलचल मचा दी है। पुष्पावती सिंघानिया रिसर्च इंस्टीट्यूट (पीएसआरआई) के सीओ डॉ. दीपक शुक्ला को कानपुर क्राइम ब्रांच ने शनिवार को गिरफ्तार कर लिया। जांच टीम ने साक्ष्यों को जुटाने और पूछताछ करने के बाद पुलिस ने यह गिरफ्तारी की। शाम को डॉ. शुक्ला को पुलिस ने कोर्ट में पेश कर दिया और अदालत ने डॉ. शुक्ला को जेल भेज दिया। एसपी क्राइम राजेश यादव के मुताबिक जांच में जो डोनरों के दस्तावेज मिले थे। इनमें लखनऊ का शोएब उर्प शीबू, वरदान चन्द्र, रईस और राजेश गुप्ता शामिल हैं रईस के लीवर और अन्य तीनों की किडनी का सौदा हुआ था। प्रत्येक दस्तावेज पर डाक्टर दीपक शुक्ला के हस्ताक्षर पाए गए। पीएसआरआई हॉस्पिटल ने डोनर-रिलीवर की जांचों के साथ ट्रांसप्लांट की पूरी प्रक्रिया हुई जिसके पूरे साक्ष्य पुलिस ने जुटाए। एसपी के मुताबिक इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर डॉ. दीपक शुक्ला को गिरफ्तार किया गया। पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि डाक्टर दीपक शुक्ला डोनरों को किडनी बेचने के लिए प्रेरित करता था। वह कई-कई घंटे डोनरों की काउंसलिंग करता। प्रेरित करने के लिए वीडियो और फोटो भी दिखाता था, जिसके बाद डोनर उसके विश्वास में आकर किडनी या लीवर निकलवाने को तैयार हो जाते थे। डॉ. दीपक शुक्ला की गिरफ्तारी के बाद कई निजी अस्पतालों पर तलवार लटकती नजर आ रही है। एक दर्जन से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार करने वाली कानपुर पुलिस ने पीएसआरआई के बाद अब फोर्टिस अस्पताल को राडार पर लिया है। अभी तक सबसे ज्यादा अंग प्रत्यारोपण का दावा करने वाले निजी अस्पताल भी जांच के दायरे में लाए जा सकते हैं। इन अस्पतालों के न सिर्प को-ऑर्डिनेटर बल्कि प्रत्यारोपण को मंजूरी देने वाली समितियों तक से पुलिस जांच कर सकती है। देश के सबसे बड़े किडनी कांड में लगातार नए चेहरे सामने आ रहे हैं। सरकारी महकमे से लेकर क्षेत्र के संगठन तक चुप हैं। इस बाबत जब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के महासचिव डॉ. आरवी असोकन से पूछा गयाöक्या आईएमए को किडनी कांड के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए? तो इस पर उन्होंने स्पष्ट किया कि वह हिन्दी भाषा नहीं समझते हैं। देश के सभी राज्यों में करीब तीन लाख से अधिक डाक्टरों के इस संगठन की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। अंगदान पर जागरुकता से लेकर सख्त कानून का पालन कराने वाला राष्ट्रीय अंग एवं प्रत्यारोपण संगठन (नोटो), केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और दिल्ली सरकार चुप्पी साधे हैं, जबकि कानपुर पुलिस की जांच में साबित हो चुका है कि किस तरह अनजान चेहरों को खून के रिश्ते में तब्दाली कर दिल्ली के निजी अस्पतालों में किडनी का रैकेट चल रहा है। कानपुर पुलिस ने दावा किया है कि किडनी रैकेट के माध्यम से मानव अंगों की सौदेबाजी नेपाल, तुर्की और श्रीलंका तक होती थी। नेपाल के दर्जनों लोग इस गिरोह से सम्पर्प में थे। किडनी रैकेट से जुड़े लोगों की पहली पसंद नेपाल था, क्योंकि यहां से आने-जाने के लिए न तो वीजा की जरूरत है और न ही पासपोर्ट की। दिल्ली के निजी अस्पतालों में अंग प्रत्यारोपण कई सालों से हो रहा है और पीएमआरआई अस्पताल में साल 2004 से किडनी रैकेट चल रहा है ताज्जुब है कि न तो केंद्र सरकार जागी और न ही दिल्ली सरकार ने कोई कार्रवाई की अब तक।

Tuesday, 11 June 2019

तीन प्रतिशत वोट की इस जंग में कितनी जानें और जाएंगी?

पश्चिम बंगाल में जारी हिंसा चिन्ता का विषय बनती जा रही है। आए दिन वहां राजनीतिक हत्याएं हो रही हैं और यह थमने का नाम ही नहीं ले रहीं। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच छिड़ी यह वोट बैंक की हिंसा पर यदि काबू नहीं पाया गया तो 2021 के विधानसभा चुनाव तक न जाने और कितनी मौतें हो जाएंगी। अब तक 60 के करीब लोग राजनीति की बलि चढ़ चुके हैं। शनिवार शाम को उत्तर 24 परगना जिले के संदेशखली इलाके में झंडा खोलने को लेकर तृणमूल कांग्रेस और भाजपा समर्थकों में जमकर संघर्ष हुआ। उत्तर 24 परगना जिला के तृणमूल कांग्रेस व ज्योतिप्रिय मलिक ने दावा किया कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या कर दी गई है। वहीं प्रदेश भाजपा महासचिव सायंतन बसु ने दावा किया कि भाजपा के तीन कार्यकर्ताओं की हत्या की गई है और वो लापता हैं। हालांकि पुलिस की ओर से मरने वालों की संख्या को लेकर कोई जानकारी नहीं दी जा रही है। दरअसल ममता बनर्जी व भाजपा के  बीच चल रही जंग के पीछे हैं तीन प्रतिशत वोट। ममता बनर्जी के लिए चिन्ता व गुस्से का कारण यह है कि उनकी पार्टी ने 2019 लोकसभा चुनाव में 12 सीटें खोई हैं, जबकि भाजपा ने वोटों का ध्रुवीकरण कराकर अपनी दो सीटों से बढ़ाकर 18 कर ली हैं। हालांकि पश्चिम बंगाल में भाजपा को 18 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि 2019 में यह  बढ़कर 40.25 प्रतिशत हो गए। इस प्रकार भाजपा ने 22 प्रतिशत का इजाफा किया है। तृणमूल कांग्रेस ने 2019 में 23.23 प्रतिशत वोट हासिल करके 22 सीटें जीती थीं। दीदी को गुस्सा शायद इसलिए भी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने ज्यादा सीटों की उम्मीद लगा रखी थी और कई तरह के सपने पाल रखे थे। पर मोदी लहर के आगे उनकी पार्टी टिक नहीं सकी। भाजपा का अब सारा जोर 2021 के विधानसभा चुनाव को लेकर है। वर्ष 2014 में ममता की पार्टी ने 39 प्रतिशत वोट पाकर 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी। यद्यपि तृणमूल कांग्रेस का भी वोट 4.28 प्रतिशत बढ़ा है किन्तु सीटें 12 घटी हैं। वर्ष 2021 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा गरम है कि भाजपा के तीखे तेवर देखकर ममता के प्रबंधकों को टपके का यम सता रहा है कि यदि 2019 की तर्ज पर भाजपा के खाते में तीन प्रतिशत वोट का इजाफा हुआ तो कमल निशान वाली पार्टी लाल गढ़ में सरकार बनाने का गणित बिठा सकती है। संभवत इसी डर के चलते राज्य में हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है। सवाल तीन प्रतिशत वोट बैंक की लूट-खसोट ओर बेकाबू हिंसा से कितनी जानें और जाएंगी? भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के मत प्रतिशत का आधार मानकर यदि 2021 के विधानसभा चुनाव पर संभावित असर का गणित फैलाया जाए तो लग रहा है कि दोनों दलों के बीच 2021 के विधानसभा चुनाव में सीधी लड़ाई की तैयारी हो रही है। इसके अलावा कांग्रेस और वाम दल सिमटते दिखाई दे रहे हैं। देखना यह होगा कि क्या ममता बनर्जी  अपने वोट बैंक को बचाने में सफल रहेंगी या भाजपा यहां भी अपना झंडा गाड़ देगी?

-अनिल नरेन्द्र

एक बार फिर हैवानियत की हदें पार हुईं

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ स्थित टप्पल में ढाई साल की बच्ची के साथ बर्बरता ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना ने एक बार फिर हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हमारा समाज किस ओर जा रहा है? क्या हमारे समाज में संवेदनशीलता नाम की चीज खत्म हो गई है? बढ़ते अपराधों पर लगाम लगाने के मामले में हमारे प्रशासन तंत्र की क्या भूमिका रह गई है? अलीगढ़ में मासूम के साथ हैवानियत की सारी हदें पार कर दी गई हैं। पुलिस भले ही दुष्कर्म की पुष्टि न करे, लेकिन जो अपराध उस बच्ची के साथ हुआ है वह किसी भी लिहाज से हैवानियत से कम नहीं है। ढाई साल की ट्विंकल शर्मा को पहले बिस्कुट का लालच देकर पास बुलाया और फिर उसके मासूम शरीर के साथ जो कुछ हुआ वह लिखना संभव नहीं है। जिस हालत में शव मिला वह उन सभी के लिए शर्मनाक है जो इस घटना को अंजाम देने वाले अपराधियों के आसपास समाज बनकर रहते हैं। दुखद है कि ऐसे दरिन्दों का भी एक समाज हमारे बीच मौजूद है। जो उन्हें इस अपराध के बाद भी शायद अपने बीच रहने देता है। उस पर यह और ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है कि उस बच्ची और अपराधियों का धर्म एक मुद्दा बनकर सामने आया है। किसी अपराध को धर्म के तराजू पर तोलना कतई वाजिब नहीं। ऐसे अपराधियों का कोई धर्म नहीं होता। यह कोई सांप्रदायिक मुद्दा नहीं है और न ही इसे उस नजरिये से देखना चाहिए। बेगुनाह बच्ची को मारने की वजह सिर्प इतनी सी ही थी कि उसके माता-पिता 10 हजार रुपए का कर्ज नहीं लौटा पाए थे। सवाल यह भी है कि पड़ोसी होने के बावजूद एक व्यक्ति 10 हजार रुपए की वसूली नहीं हो पाने और इस वजह से हुए झगड़े के बाद बदला लेने के लिए एक मासूम बच्ची की हत्या करना और इस बर्बरता से हत्या करने की हद तक कैसे चला गया? अत्यंत दुख से यह भी कहना पड़ता है कि इस प्रकार के घिनौने अपराधियों में कानून व समाज का कोई खौफ ही नहीं है। निर्भया कांड को इतने साल हो गए हैं पर अभी तक अपराधियों को फांसी तक नहीं हुई। केस अदालतों में अपीलों में उलझा पड़ा है। अगर एक भी आरोपी को एक बार फांसी हो जाती है तो इस तरह के हैवानों में थोड़ा-सा तो डर पहुंचता। क्या किसी भी मासूमियत की कोई कीमत हो सकती है? या फिर अपराध का नशा इतना गाढ़ा हो गया कि वह सारी मर्यादाएं ही भूल जाए। यह एक ट्विंकल की कहानी नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की मानें तो हमारे देश में पिछले एक दशक में बच्चों के खिलाफ 500 प्रतिशत अपराध बढ़ गए हैं। जबकि ट्विंकल जैसे मामले जब मीडिया में आ जाते हैं तब सारा देश जागता है। फिर चाहे वह कठुआ कांड हो जिसे लेकर पूरे देश में हंगामा हुआ। इस हंगामे के बाद नाबालिग के साथ दुष्कर्म के अपराधी के लिए सजा--मौत मुकर्रर करने का कानून बनाने की पहल की गई। लोगों के बढ़ते गुस्से के दबाव में आई उत्तर प्रदेश पुलिस ने लापरवाही बरतने वाले पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है। एसआईटी को जांच सौंप दी गई है। हत्यारोपी जाहिद और असलम को गिरफ्तार कर लिया गया है पर ट्विंकल की आत्मा को शांति तभी मिलेगी जब उसके हत्यारे फांसी के फंदे पर लटकाए जाएंगे।

Sunday, 9 June 2019

नशे में गाड़ी चलाई तो खानी पड़ेगी लंबी जेल की हवा

दिल्ली की साकेत कोर्ट ने शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों पर पुलिस को सख्ती के साथ निपटने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे वाहन चालकों को दिनों की नहीं बल्कि महीनों की जेल की सजा सुनिश्चित की जानी चाहिए। साकेत कोर्ट की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुनाली गुप्ता ने मोहन नामक एक शख्स को शराब पीकर गाड़ी चलाने के रूप में दो महीने जेल की सजा सुनाते हुए यह निर्देश जारी किए। इन आदेशों के तहत अब अगर शराब पीकर गाड़ी चलाते पकड़े गए तो लंबी जेल की हवा खानी पड़ सकती है। न्यायाधीश सुनाली गुप्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि नशे की हालत में वाहन चलाने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर गौर करें तो इस तरह के मामलों में 30 से 40 प्रतिशत इजाफा हुआ है। इससे साफ है कि नशे की हालत में पकड़े गए लोगों की सजा काफी कम है। इसलिए उनमें किसी प्रकार का डर नहीं है। सजा कम होने के कारण इस तरह के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में जरूरी हो गया है कि नशे की हालत में पकड़े गए वाहन चालकों को महीनों की जेल की सजा सुनाई जाए। लंबे समय तक जेल में रहने के कारण उनमें डर पैदा होगा और इस तरह के मामलों में कमी आएगी। कोर्ट ने मोहन को सजा सुनाने के साथ तीन हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। आरोपी मोहन को दो साल पहले पुलिस ने आश्रम चौक से नशे की हालत में बाइक चलाते हुए पकड़ा था। नशे की हालत में मोहन गलत तरीके से बाइक चला रहा था। जांच में पाया गया कि मोहन ने शराब पी रखी थी। आरोपी के शरीर में शराब की मात्रा 162/100 एमजी पाई गई। जबकि निर्धारित मात्रा 30/100 एमजी होती है। आरोपी ने निर्धारित मात्रा से 34 गुना अधिक शराब पी रखी थी। एक अन्य मामले में दिल्ली के एक कोर्ट ने शराब पीकर गाड़ी चलाने के मामले में युवक को दो हफ्ते तक सात घंटे रोज वृद्धाश्रम में सेवा करने की सजा सुनाई। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सोनू अग्निहोत्री ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए युवक को दोषी ठहराया। कोर्ट ने कहा कि वह बुजुर्ग लोगों के साथ वक्त गुजारे और उनकी सेवा भी करे। ट्रायल कोर्ट ने युवक को दो दिन जेल और दो हजार रुपए जुर्माने की सजा दी थी और लाइसेंस छह महीने के लिए रद्द करने का निर्देश दिया था। इस फैसले को युवक ने मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में चुनौती दी थी। अतिरिक्त सत्र जज अग्निहोत्री ने कहा कि युवक परिवार में अकेला कमाने वाला है। वह पहली बार नशे में ड्राइविंग करते हुए पकड़ा गया है इसलिए उसके साथ नरमी दिखाई गई है। हम दोनों फैसलों की और दोनों जजों की सराहना करते हैं कि उन्होंने लीक से हटकर नए प्रकार की सजा सुनाई है। उम्मीद करते हैं कि शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले इनसे सबक सीखेंगे और शराब पीकर गाड़ी चलाने से बचेंगे।

-अनिल नरेन्द्र